रविवार, 16 जनवरी 2011

महान् कृतियाँ लिखकर या महान कृत्य करके जाएं

जोधपुर के श्री चुन्नी लाल बाहेती को हार्ट अटैक हो गया। डाक्टरों ने कह दिया- कुछ भी हो सकता हैं। उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि अगर मैं बच गया तो एक दुकान को गौशाला के नाम से समर्पित कर दूंगा। प्रभुकृपा से वे बच गए। पिता का संकल्प सुनकर बेटों ने एक दुकान को गायों के नाम कर दिया। जब कर्मचारियों ने सुना तो उन्होने भी ईमानदारी पूर्वक काम करना शुरू कर दिया। उस साल दुकान में पाँच लाख का मुनाफा हुआ। कहते हैं वे हर साल राजस्थान की समस्त गौशालाओं को पचास लाख का दान भिजवाते हैं, एक छोटे से संकल्प ने जीवन का कल्याण कर दिया। 

-संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी

बच्चों को दे संस्कार

जार्ज वाशिंगटन को किसी अपराध के कारण अदालत में हाजिर होना पड़ा। उनसे कहा गया- बाइबिल पर हाथ रखकर झूठ न बोलने की कसम खाइये। उन्होनें कहा- इसकी जरूरत नहीं हैं क्योंकि वाशिंगटन आज तक झूंठ नही बोला हैं। उन्होने अपराध स्वीकार कर लिया। उनसे पूछा गया- आप झूठ क्यों नही बोलते ? उन्होनें कहा- बचपन में एक बार मैने माँ के सामने झूठ बोल दिया था। माँ ने कहा था- बेटा, सावधान मर जाना पर आज के बाद कभी-भी झूठ मत बोलना क्योंकि मैं झूठे बच्चे की माँ कहलवाने की बजाय खुद को बाँझ कहलवाना कहीं ज्यादा पसंद करूंगी। 

रामप्रसाद बिस्मिल

रामप्रसाद बिस्मिल को ब्रिटिश सरकार ने फाँसी की सजा सुना दी। आज उनका अंतिम दिन था। जेलर ने उनको देखा तो आश्चर्य से कहा- अरे, तुम्हारी एक घंटे बाद तो फाँसी होने वाली हैं और तुम योगासन, कसरत, प्राणायाम कर रहे हो। क्या तुम्हें मौत से भय नहीं ? इसकी बजाय तो तुम भगवान को याद करो। बिस्मिल ने कहा- भगवान ने मुझे धरती पर स्वस्थ शरीर देकर भेजा था और मैं चाहता हूँ कि जब वापस भगवान के पास जाऊँ तो लटके चेहरे के साथ नहीं स्वस्थ शरीर के साथ जाऊँ। 

मन की निर्मलता

शिकागो में विवेकानन्द के तेज को देखकर एक युवती उन पर मोहित हो गई। वह उनसे मिलने गई और एकांत देखकर कहने लगी- स्वामीजी, मैं आप जैसे एक तेजस्वी पुत्र की माँ बनना चाहती हूँ। क्या आप मेरी यह इच्छा पूरी कर सकते हैं ? विवेकानन्द ने युवती से कहा- भारतीय संत अपने द्वार पर आए किसी को भी कभी खाली हाथ नहीं लौटाते। मैं तुम्हारी यह इच्छा अभी पूरी कर देता हूँ। लो तुम मुझे ही आज से अपना बेटा मान लो। इसे कहते है। मन का संयम।

क्रोध काबू में तो स्वर्ग हथेली में

सुभाष चन्द्र बोस एक जगह भाषण दे रहे थे। अचानक एक युवक ने उत्तेजित होकर उन पर जूता फैंक दिया। उन्होनें जूते को उठाते हुए भरी सभा से कहा- मेरे देश के लोग कितने अच्छे हैं जो बिना जूते वाले को जूते भी दे देते हैं। मेरा उस युवक से निवेदन हैं कि उसके तो एक जूता काम आएगा नहीं इसलिए वह दूसरा जूता भी फैंक दे क्योंकि पिछली सभा में मेरे जूते खो गए थे। 

स्वेट मार्डन

एक युवक-युवती आपस में एक-दूसरे को बेहद चाहते थे, पर युवती को न जाने क्या सूझा कि उसने किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ली। यह देखकर वह सदमें मे चला गया। उसका खाना-पीना छूट गया। उस पर नशे का भूत सवार हो गया, मात्र दो सालों में वह सूखकर कंकाल हो गया। एक दिन न्यूज पेपर में उसने देखा-एक युवक ने फाँसी खाकर आत्महत्या कर ली। वह यह देखकर चैक उठा क्योंकि वह युवक और कोई नहीं उसकी प्रेमिका का पति था। उसने लिखा था- मैंने जिससे शादी की वह औरत इतनी गुस्सैल थी कि मैं उससे तंग आकर आत्महत्या कर रहा हूँ। यह पढ़ते ही उसने दोनो हाथ ऊपर उठाए और भगवान से कहा-तेरा लाख-लाख शुक्रिया हैं। अगर मेरी शादी उससे हो जाती तो आज अखबार में उसका नहीं मेरा फोटो छपा होता। वही व्यक्ति आगे चलकर दुनिया का महान् लेखक स्वेट मार्डन के नाम से मशहूर हुआ।

पुरूषार्थ

शिष्य जयद्रथ ने एक बार गुरू द्रोणाचार्य से पूछा- गुरूदेव, आखिर क्या कारण हैं कि एक ही गुरू से शिक्षा लेने के बावजूद एक धनुर्धारी अर्जुन बन गया और दूसरा जयद्रथ रह गया। गुरू द्रोण ने कहा- जयद्रथ, मैने तो समान भाव से दोनों को शिक्षा दी थी, पर तुमने मेरे द्वारा दिये गए ज्ञान में संतोष कर लिया और अर्जुन ने संतोष न करने की बजाय दिन-रात मेहनत करके उसे बढ़ाने का काम किया और इसी के चलते तुम तो पीछे रह गए और अर्जुन तुमसे आगे निकल गया। जो बच्चे पुरूषार्थ करके अपनी सोई हुई प्रतिभा को जगा देते हैं वे ही आने वाले कल में पूजे जाते हें। 

जो हैं उसका आनन्द उठाओ

एक मछुआरा हमेशा मछली पकड़ने जाता। एक दिन वह भोर होने से पहले ही समुद्र पर पहुँच गया। रास्ते में उसे एक पत्थरों से भरी हुई थैली मिली। उसने उसे उठा ली। वह पत्थरों को समुद्र में फेंककर आनन्द लेने लगा। तभी एक सज्जन उसके पास से गुजरे। वह अंतिम पत्थर फेंकने वाला ही था कि सज्जन ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा- मूर्ख, यह पत्थर नहीं हीरा हैं हीरा। यह सुनते ही वह चोक गया। हे भगवान, यह मैंने क्या कर दिया ? हाथ में आई हुई किस्मत को फैंक दिया। वह रोने लगा। सज्जन ने कहा-भाई, दुखी मत हो, भगवान को शुक्रिया दे कि उसने अंतिम हीरा हाथ से जाते-जाते बचा दिया। इसको बेच और जिंदगी का आनन्द उठा। जो चला गया उसका रोना रोने की बजाय जो हैं उसका आनन्द उठाओ।

आत्मज्ञान

आत्मज्ञानी संत एक गांव में पहुँचे। एक युवक आत्मज्ञान पाने के लिए उस संत की कुटिया में दौडा-दौड़ा पहुँचा। उसने जूतों को साइड में पटका, धड़ाम से दरवाजा खोला और संत को प्रणाम करते हुए कहने लगा- मुझे आत्मज्ञान देने की कृपा कीजिए। संत ने उसे भलीभाँति देखा और कहा-पहले जूतों की व्यवस्थित रखकर आओ और दरवाजे से माफी मांगो। उसने कहा-भला आत्मज्ञान का जूतों और दरवाजे से क्या संबंध ? संत ने कहा-जो व्यक्ति अपने जूतों तक को सही ढंग से उतारना नहीं जानता और दरवाजे को भी आदरपूर्वक नहीं खोलता वह भला आत्मज्ञान पाने का उत्तराधिकारी कैसे बन पाएगा और ऐसा व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त भी कर लेगा तो कौनसा तीर मार लेगा।

सफलता का राज क्या हैं ?

सुकरात नदी में नहा रहे थे। तभी एक युवक आया और पूछने लगा- सफलता का राज क्या हैं ? सुकरात ने उसे अपने पास बुलाया। जैसे ही वह पास आया तो सुकरात ने उसे पकड़ा, नदी में डुबोया और खुद उस पर बैठ गए। युवक पानी के अंदर तड़फड़ाने लगा। उसने खूब कोशिश की, पर सफल न हो पाया। अंत में उसने पूरी ताकत झौकते हुए सुकरात को पछाड़ा और बाहर निकल आया वह सुकरात को भला-बुरा कहने लगा। मैं तो कुछ पूछने आया था और तुम मुझे ही डुबोकर मारने लगे। सुकरात ने कहा- मैं तो तुम्हारे सवाल का जवाब दे रहा था। युवक ने पूछा- क्या मतलब ? सुकरात ने कहा-‘‘जैसे पानी में तुम्हारी एक ही इच्छा थी कि जैसे-तैसे करके बाहर निकलूँ ओर इसके लिए तुमने अपनी पूरी ताकत झौंक दी ठीक वैसे ही जब तुम सफल होने के लिए अपनी सौ प्रतिशत ताकत लगा दोगे तो एक दिन अवश्य सफल हो जाओगे।

आत्मविश्वास

राष्ट्रपति बिल क्लिंटन अपने लवाजमे के साथ किसी कार्यक्रम में जा रहे थे। बीच में पेट्रोल भरवाने के लिए गाड़ियाँ रोकी गई। संयोग से पेट्रोल पंप का मालिक बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन के बचपन का मित्र निकला। व उससे गपशप करने लगी। बिल क्लिंटन ने मजाक करते हुए हिलैरी से कहा- ये तो अच्छा हुआ तुम्हारी शादी मेरे से हो गई अन्यथा तुम राष्ट्रपति की पत्नी कहलाने की बजाय पेट्रोल पंप की मालकिन भर कहलाती। हिलेनी ने कहा-‘‘ माफ करना सर ! अगर मेरी शादी इनसे हो गई होती तो आज अमेरिका के राष्ट्रपति आप नहीं ये होते। इसे कहते हैं आत्मविश्वास। ’’

मेरी प्यारी मम्मी, आई लव यू।

एक महिला बाजार-आफिस के काम निपटाकर गर्मी में दोपहर के दो बजे घर पहुँची। चेहरे पर थकावट स्पष्ट नजर आ रही थी। तभी बड़ा बेटा आकर बोला- मम्मी, आज छोटू ने कोयले से लिखकर फिर दीवार खराब कर दी। मैने उसे समझाया लेकिन वह नहीं माना। यह सुनते ही महिला आग बबूला हो उठी। उसने बच्चे को पकड़ा और दनादन मारने लगी। चार साल का छोटा बच्चा आखिर कब तक सहन करता। वह बेहोश हो गया यह देखते ही महिला के होश उड़ गए। वह उसे अस्पताल लेकर गई। चार घंटे में उसे होश आया। डाक्टर ने कुछ बनाकर लाने को कहा। वह घर आकर दलिया बनाने लगी। दलिया पके तब तक दीवार साफ कर देती हूँ यह सोचकर वह पौंछा लेकर गई तो उसकी आँखों में यह देखकर आँसू आ गए क्योंकि दीवार पर लिखा था-‘‘ मेरी प्यारी मम्मी, आई लव यू। ’’

जिंदगी को नरक बनाता हैं गुस्सा

एक शहर में दंगे छिड़ गए। संवेदनशील इलाके में एस.पी. पुलिस दल के साथ पहुँचा। एक गुस्साए युवक ने एस.पी. पर थूंक दिया। साथ चल रहे हवलदार ने युवक पर रिवाल्वर तान दी। एस.पी. ने रूमाल से चेहरा पौंछा और आगे बढ़ने लगा। हवलदार ने कहा- सर, इसने आप पर थूका हैं, इसे रिवाल्वर से मार देना चाहिए। एस.पी. ने कहा- ‘‘मेरे भाई ! जो काम रूमाल से निपट सकता हैं उसके लिए रिवाल्वर चलाने की कोई जरूरत नहीं हैं।’’

दिमाग की कीमत

एक फैक्ट्री में मशीन चलते-चलते रूक गई। फैक्ट्री के मेकेनिक ने कोशिश की, पर मशीन सही न हुई। बाहर से इंजीनियर को बुलाया गया। उसने मशीन को अच्छी तरह से देखा और कहा- एक हथोड़ा लाओ। उसने मशीन के एक विशेष भाग पर जोर से हथोड़ा मारा और मारते ही मशीन चल पड़ी। सभी उसकी प्रशंसा करने लगे। उसने मालिक को बिल पकड़ाया। एक लाख रूपये का बिल देखकर मालिक भौचक्का रह गया। उसने कहा- आपने किया क्या, केवल एक हथोड़ा मारा और उसके एक लाख रूपये। इंजीनियर ने कहा- साहब माफ करना, हथौड़ा मारने का तो केवल एक रूपया हैं, पर वह कहाँ मारना हैं इसके 99999 रूपये हैं। मालिक समझ गया- हाथ की कीमत कितनी हैं और दिमाग की कीमत कितनी।

शनिवार, 15 जनवरी 2011

हितकारी सोच

एक सड़क पर बहुत बड़ा भारी पत्थर पड़ा हुआ था। उससे किसी का स्कूटर टकराता तो किसी की गाड़ी। लोग वापस संभलते, पत्थर को व पत्थर रखने वाले को दस-बीस गालियाँ निकालते और आगे बढ़ जाते। सुबह से लेकर साँझ तक कोई बीस-पच्चीस लोग टकरा गए होंगे, पर सभी की वही आदत-गालियाँ निकालना और चले जाना। शाम को साईकिल पर एक फूलों वाला गुजरा। वह भी टकराया और उसके सारे फूल बिखर गए। फूल इकट्ठा करके वह रवाना होने ही वाला था कि उसके मन में विचार आया, कोई और इससे टकराएगा तो नुकसान हो जाएगा इसलिए यहाँ से इसे हटा देना चाहिए। उसने आधे-एक घंटे की मशक्कत करके पत्थर हटा दिया। जैसे ही पत्थर हटा कि उसके नीचे एक लिफाफा व पर्ची निकली। वह बड़ा खुश हुआ क्योंकि पर्ची पर लिखा था- "दूसरों के प्रति हितकारी सोच रखने वाले को हजार रूपये का ईनाम।" 

शील, सत्य और धर्म की शक्ति

जब रामसेतु बनने की खबर लंका पहुँची तो लंकावासियों ने विद्राह कर दिया। सेनापति ने रावण से कहा- इस युद्ध में जनता आपका साथ नहीं देगी। जिस राम के नाम के पत्थर तैर रहे हैं उस राम में कितनी ताकत होगीं, यह सोचकर जनता भयभीत हैं। जनता का विश्वास जीतने के लिए आपको भी अपने नाम का पत्थर तिराना होगा। यह सुन रावण अन्दर से हिल गया। उसने कुछ क्षण सोचा और पत्थर तिराने की घोषणा कर डाली। सब लंकावासी समुद्र तट पर पहुँच गए। रावण ने बड़ा भारी पत्थर उठाकर रावण लिखा और समुद में फेंक दिया और यह देखकर सबको आश्चर्य हुआ कि पत्थर डूबने की बजाय तिर गया। सभी रावण की जयजयकार करने लगे। रात को मंदोदरी ने पूछा- राम में तो शील, सत्य और धर्म की शक्ति है।, पर आपने ऐसा कमाल कैसे कर दिया ? रावण ने कहा- प्रियतमे, तुमसे क्या छिपाना। मैने पत्थर से कहा था- ‘‘हे पत्थर ! तुझे राम की सौगंध अगर डूब गए तो।

सुकरात

सुकरात शिष्यों को पढ़ा रहे थे। पत्नी ने आवाज दी- भोजन तैयार हैं, खा लो। सुकरात तो पढ़ाने में मग्न थे। फिर जोर से आवाज आई- खाना खालो। सुकरात ने कहा- आ रहा हूँ। थोड़ी देर बाद भी सुकरात नही पहुँचे तो पत्नी क्रोधित हो गई। इस बार उसने गुस्से में लाल होकर कहा- जल्दी आ जाओ और खाना खा लो। शिष्य समझ गए, उन्होंने कहा- गुरूदेव चले जाइए, पर सुकरात तो पढ़ाने में मस्त थे। पत्नी का पारा चढ़ गया, उसने उठाया पानी का मटका और सुकरात के माथे पर उँडेल दिया। सभी शिष्य भौचक्के रह गए। मुस्कुराते हुए सुकरात ने कहा- देखो, मेरी पत्नी कितनी अच्छी हैं, यह पहले तो गरजती हैं फिर बरसती भी हैं। 

समर्थ गुरू

समर्थ गुरू रामदास व छत्रपति शिवाजी कहीं जा रहे थे। बीच में नदी आई । समर्थ गुरू ने शिवा से कह- नदी गहरी हैं, पहले मैं जाता हूँ, कोई खतरा नहीं होगा तो तुम्हें आवाज दे दूंगा। शिवाजी ने कहा- नहीं, पहले मैं जाउंगा। दोनों के बीच तें तनातनी हो गई। आखिर पहले शिवाजी चले गए। सकुशल पहुँचने के बाद उन्होंने गुरूजी को कहा- आप भी आ जाइए। गुरूजी ने पहुँचते ही कहा- शिवा, आज तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं दूसरा शिवा कहाँ से लाता। शिवाजी ने कहा- मैं डूब जाता तो समर्थ गुरू रामदास में इतनी ताकत हैं कि वह सौ-सौ दूसरे शिवा पैदा कर देता, पर आपको कुछ हो जाता तो इस शिवा में इतनी ताकत नहीं हैं कि वह एक भी समर्थ गुरू रामदास को पैदा कर पाता। 

बुधवार, 12 जनवरी 2011

साँसो के समुद्र में डूबते जाइए।

1. स्वयं की आध्यात्मिक सच्चाइयों से रू-ब-रू होने का मार्ग हैं ध्यान। ध्यान धर्म भी हैं, विज्ञान भी। यह व्रत भी हैं और विकास का द्वार भी।
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2. ध्यान वह विज्ञान हैं जिससे अशांति, उद्वेग, आक्रोश और विकारों से घिरे मन का समाधान निकल सकता हैं। 

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3. ध्यान क्रिया नहीं हैं। यह सारी क्रियाओं के शान्त होने पर घटित होता हैं।

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4. सचेतन प्राणयाम ध्यान का प्रवेश द्वार हैं। साँसो को शांत गति से गहराई देते चलना प्राणायाम हैं। 

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5. प्राणायाम करते समय साँसों का मूल्यांकन मत कीजिए। बस, गहरी साँस लीजिए, लेते रहिए। साँसो के समुद्र में डूबते जाइए। साँस धीरे-धीरे स्वतः लयबद्ध और शांत होती जाएगी। श्वास रहित स्थिति घटित होते ही ध्यान की अन्तर-दशा प्रगट हो जाएगी।

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6. साँस सेतु हैं स्वयं की अन्तस् चेतना तक पहुँचने का। चेतना स्वयं साँस लेती हैं। साँस, शरीर और मन में एकलयता लाने के लिए सचेतन साँस लीजिए या सोहम्-भीतर उतरती साँस के साथ सो और बाहर निकलती साँस के साथ ऽहम् की स्मृति बनाए रखिए।

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7. चित्त की शांत और निर्मल स्थिति ही ध्यान हैं, ध्यान कब किस क्षण घटित होगा, कहा नहीं जा सकता। ज्यों-ज्यों ध्यान का अभ्यास गहरा होता जाएगा, ध्यान हमारा सहचर होता जाएगा।

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8. प्रयासपूर्वक किया गया ध्यान एकाग्रता हैं, अनायास घटित होने वाली एकाग्रता ध्यान हैं। अध्ययन एक तरह का मौन हैं, शांति हैं, आनंद हैं, बोध हैं। जब हम आनंद में होते हैं, तब हम अपने अस्तित्व में ही होते हैं।

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9. ध्यान बुद्धि की गुफा में प्रवेश हैं। हम बुद्धि की गुफा में प्रवेश करने से पूर्व हृदय के द्वार खोले। हृदय सत्य का द्वार रहित द्वार हैं। हम साँसो के जरिए हृदय में उतरते जाएँ, दोनो काँखों के मध्य क्षेत्र में व्याप्त होते जाएँ।

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10. हृदय शांति का धाम हैं। वहाँ स्वर्ग जैसी शांति हैं। स्वर्ग का रास्ता वास्तव में हृदय से ही खुलता हैं। ध्यान- आनंद, आह्लाद और अहोभाव का अनुभव हैं। यह फूलों की खिलावट की तरह है। साक्षीत्व ध्यान की आत्मा हैं। ध्यान में हम थोडे़-थोडे नहीं जा सकते। इसमें जब भी प्रवेश होता हैं समग्रता से होता हैं। 

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11. ध्यान में जीने वाले महल में रहे या जंगल में, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे संसार के प्रति प्रेम और करूणा से भर उठते हें। वे जहाँ होते हैं उनकी शांति और दिव्यता से वातावरण चार्ज रहता है।

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12. ध्यान को सरलता से जीने के लिए क्यों न अपने हर कार्य को ध्यानपूर्वक करने की आदत डाली जाएं ध्यानपूर्वक खाइए, ध्यानपूर्वक कार चलाइए, ध्यानपूर्वक दाढ़ी बनाइए और ध्यानपूर्वक सोइए। ध्यान को हर क्रिया के साथ जोड़िए, ध्यान हमें हर क्रिया का आध्यात्मिक परिणाम देगा।

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13. ध्यान की एक बैठक 30 मिनट की कीजिए, एकांत-शांत वातावरण में बैठिए, बाहर-भीतर से मौन और अन्तरलीन होते जाइए, ध्यान का आभामण्डल आपको स्वतः आनंदित और सत्यबोध से भरता जाएगा।
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साभार- संबोधि टाइम्स, संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी

आहार सुधरिए, आरोग्य सुधरेगा

1. हमारा आरोग्य मन, मस्तिष्क और पेट से जुड़ा हैं। 90 प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट ही होता हैं। निर्मल विचार मन-मस्तिष्क को प्रसन्न रखते हैं और सात्विक आहार हमारे पेट को।
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2. हम जैसा अन्न खाते हैं वैसा ही हमारा तन-मन होता हैं। सच्चाई तो यह हैं कि आप वैसा ही सोचते हैं, जैसा खाते है। इंसान के खानपान से ही उसके खानदान का पता चलता हैं। 

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3. आहार-विहार, शयन-जागरण, भोग और योग संयमित हो तो बेहतर रहता हैं। जो सीमित खाता हैं वह ज्यादा जीता हैं। इसलिए ज्यादा खाकर जल्दी मरने वालों से वह व्यक्ति ज्यादा खा सकता हैं जो कम खाकर ज्यादा जीता है।

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4. कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं, कुछ खाने के लिए जीते हैं। वह भोगी हैं जो खाने के लिए जीता हैं पर जो जीने के लिए संयमित खाता हैं वह योगी हैं।

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5. अन्न प्राण हैं और प्राणदाता हैं पर इसको जरूरत से ज्यादा खा लिया जाए तो यही प्राणहर्ता भी बन जाता हैं। 

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6. आहार के चार चरण हैं- उगाना, पकाना, चबाना और पचाना। खेत से लेकर पेट तक होने वाली यह यात्रा अगर स्वस्थ हो तो अपना चिकित्सक व्यक्ति स्वयं होता है। 

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7. रसोईघर हमारे स्वास्थ्य का नियंत्रण-कक्ष हैं। कृपया किचन में किच-किच मत कीजिए। अग्निदेव के इस मंगलगृह में घर के सब सदस्य मिलजुल कर भोजन बनाइए और फिर उसे प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण कीजिए।

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8. स्वाद के लिए खाना अज्ञान हैं, जीने की लिए खाना बुद्धिमानी हैं, पर संयम की रक्षा के लिए खाना साधना हैं। 

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9. होटल में खाने से बचिए। याद रखिए, जो होटल में खाते हैं उनको होस्पीटल में मरना पड़ता हैं। फिर भी होटल में खाना खाने का मन कर रहा हो तो जहाँ खाना बनता हैं वहाँ जाकर देखिए फिर आप कभी होटल में खाना खाने का नाम भी नहीं लेंगे।

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10. भोजन हमेशा सीधे कमर बैठकर कीजिए। औरों को खिलाकर खाइए और मौनपूर्वक भोजन कीजिए।

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11. भोजन करते समय पेट को चैथाई खाली भी रखिए। कम खाइए, गम खाइए और सुखी रहिए। एक बार योगी खाता हैं दो बार भोगी खाता हैं और बार-बार खाने वाला स्वतः रोगी हो जाता हैं।

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12. शादी-विवाह के भोज में ज्यादा गरिष्ठ भोजन मत कीजिए। उसने भले ही 40 तरह के आईटम बनाए हो पर आप उसमें से 10 का ही उपयोग कीजिए। यह सोचने की बेवकूफी मत कीजिए कि पराया माल मिलना दुर्लभ हैं शरीर तो फिर भी मिल जाएगा।

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13. दोपहर के भोजन बाद भले ही आराम कीजिए पर शाम को भोजन करके जरूर टहल लीजिए। जहाँ तक हो सके रात्रि-भोजन से बचिए, आप जीवन में 100 बीमारियों से बचे रहेंगे।

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14. भोजन में अन्न को आधा कीजिए, शाक-सब्जी को दुगुना लीजिए, पानी तिगुना पीजिए और हँसी को चार गुना कीजिए।

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15. ज्यादा मिर्च-मसाले या तेल-घी वाले भोजन से दूर रहिए जिससे आपकी वृत्ति सात्विक बनी रहेगी।

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16. घर में जो भोजन बना हैं उस पर किसी प्रकार की टिप्पणी मत कीजिए। प्रेम, शांति और आनन्द का भी भोजन के साथ स्वाद लीजिए।

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साभार- संबोधि टाइम्स, संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी

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