बुधवार, 4 अगस्त 2010

गाँधी जी की पसंदीदा 'फरडीनैंड की कहानी'

बहुत पहले की बात है। स्पेन में एक नन्हा बैल रहता था, नाम था फरडीनैंड। फरडीनैंड के हमउम्र बैल तरह-तरह की शैतानियाँ करते रहते थे। उछलते-कूदते और एक-दूसरे से सिर टकराते फिरते। फरडीनैंड की रुचि इन सारे कामों में नहीं थी। उसे तो आराम से बैठकर फूलों की खुशबू लेना ज्यादा पसंद था। चरागाह में कॉर्क के वृक्ष के नीचे वाली जगह उसे खूब सुहाती थी और वह अक्सर वहीं बैठता था। यह उसका पसंदीदा पेड़ था और इसकी छाया में बैठकर वह पूरा दिन फूलों की सुगंध लिया करता था।

फरडीनैंड के भविष्य को लेकर दूसरी माँओ की तरह उसकी माँ को भी चिंता होती थी। माँ को डर था कि इस तरह तो यह अलग-थलग रह जाएगा। तुम दूसरों की तरह उछल-कूद और सिर लड़ाने का खेल क्यों नहीं करते? माँ ने फरडीनैंड से पूछा। 'इसके बजाय मुझे आराम से बैठकर फूलों की खुशबू लेना ज्यादा पसंद है।' 

फरडीनैंड ने जवाब दिया। फरडीनैंड की माँ समझदार थीं और जब उन्होंने देखा कि फरडीनैंड एकदम अकेला भी नहीं है बल्कि उसके आसपास तो बहुत सारी चीजें हैं तो उन्होंने फरडीनैंड की बात पर आपत्ति लेना बंद कर दिया। 

समय बीतता गया फिर फरडीनैंड बड़ा हो गया। अब वह एक ताकतवर और हष्ट-पुष्ट साँड़ था। वहीं के चरागाह पर उसके साथियों का बचपन भी बीता था। फरडीनैंड के साथियों का बचपन सारा दिन एक दूसरे को सींगों से धकेलने और सिर लड़ाने में बीता था। साथियों की कोशिश यही थी कि उन्हें राजधानी मैड्रिड में होने वाली बुल फाइट के लिए चुन लिया जाए। फरडीनैंड को इस तरह की लड़ाई में जाने की कोई इच्छा नहीं थी। उसे तो फूलों की खुशबू लेना ही ज्यादा रुचिकर काम लगता था। 

एक दिन रंगबिरंगी टोपियाँ पहने पाँच आदमी गाँव आए। वे मैड्रिड की लड़ाई के लिए साँड़ के चुनाव के लिए आए थे। उन्हें देखकर साँड़ उछल-कूद मचाने लगे। एक दूसरे से जोर आजमाइश करने लगे। सभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे, जिससे वे बुलफाइट के लिए चुन लिए जाएँ। फरडीनैंड नहीं चाहता था कि उसका चयन हो और वह जानता था कि उसे चुना नहीं जाएगा। 

इसलिए वह अपने पसंदीदा कॉर्क के पेड़ के नीचे जाकर आराम से बैठ गया। वह जहाँ बैठा उस जगह पर उसने गौर नहीं किया और नरम घास पर बैठने के बजाय वह एक मधुमक्खी पर बैठ गया। अगर तुम मधुमक्खी हो और कोई साँड़ तुम्हारे ऊपर बैठ जाए तो तुम क्या करोगे? डंक ही मारोगे न? मधुमक्खी ने भी वही किया। जैसे ही मधुमक्खी ने डंक मारा फरडीनैंड जोर से उछला। वह भागने लगा। जमीन पर अपने पैर पटकने लगा। ऐसा लगने लगा मानो फरडीनैंड पागल हो गया हो। 

जब उन पाँच आदमियों की नजर फरडीनैंड पर पड़ी तो वे खुशी से चिल्लाए - ' हमें सबसे ताकतवर साँड़ मिल गया, बुल फाइट के लिए एकदम उपयुक्त।' तो उन्होंने फरडीनैंड को एक गाड़ी में चढ़ाया और मैड्रिड ले गए।

क्या दिन था वह! झंडियाँ लहरा रही थीं। बैंड बज रहा था। खूबसूरत औरतें अपने जूड़े में महकने वाले फूल लगाकर साँड़ों की लड़ाई देखने आई थीं। रिंग के गोले में पहले एक परेड हुई। सबसे आगे बैंडरीलो सिपाहियों का दस्ता आया। इनके हाथ में वह डंडी थी‍ जिसमें लाल रिबन लगी थी और उसके एक सिरे पर नुकील पिन थी जिसे चुभोकर साँड़ को लड़ने के लिए उकसाया जाता था। इसके बाद घोड़े पर सवार जवान आए जिनके हाथों में भाले थे, जो साँड़ को क्रोधित करने के लिए थे। इसके पीछे इठलाता एक युवक आया जो खुद को बहुत सुंदर समझ रहा था। इस सुंदर युवक ने महिलाओं की तरफ गर्दन झुकाई। उसके सिर पर एक लाल टोपी थी और हाथ में एक तलवार थी। अगर सुई और भाले से भी साँड़ लड़ने को तैयार नहीं हो तो यह तलवार चुभोई जानी थी। और इनके पीछे-पीछे आया लड़ने वाला साँड़। जिसे तुम जानते हो। हमारा फरडीनैंड। 

फरडीनैंड सबसे ताकतवर साँड़, कहकर फरडीनैंड का परिचय करवाया गया। उसे देखकर परेड में मौजूद हर किसी की साँसें थमी रह गई। फरडीनैंड दौड़कर रिंग के बीच में पहुँच गया और तालियाँ बजने लगी। सभी सोचने लगे कि अब भयंकर लड़ाई देखने को मिलेगी, फरडीनैंड योद्धाओं को अधमरा कर देगा। इससे दर्शकों में शोरशराबा बढ़ गया। फरडीनैंड जब रिंग के बीच में पहुँचा तो उसने देखा कि सारी खूबसूरत महिलाओं के जूड़े में लगे फूलों में खुशबू आ रही है। बस फरडीनैंड रिंग के बीचोंबीच बैठ गया और खुशबू सूँघने लगा। 

रिंग के अंदर उसे उकसाने की बहुत कोशिशें हुई, पर फरडीनैंड बैठा रहा और खुशबू सूँघता रहा। फरडीनैंड ने अपने मन में निश्चय कर लिया था कि ये लोग चाहे जो कर लें मैं ना तो किसी को मारूँगा और न ही लड़ूँगा। उसे लड़ाने के लिए उकसाने वाली सारी कोशिशें करके हार गए। सारे योद्धाओं ने सिर पीट लिया। और फिर फरडीनैंड को उसके घर पहुँचा दिया गया। और अपने घर पहुँचने के बाद फरडीनैंड फिर से अपने पसंदीदा कॉर्क के पेड़ के नीचे बैठ गया और फूलों की खुशबू लेने लगा। वह बहुत खुश था।

गाँधीजी को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। मुनरो लीफ की यह कहानी उनकी पसंदीदा कहानियों में से एक है। मुनरो ने उक्त कहानी मात्र एक घंटे में लिखी थी। उन्होंने यह कहानी अपने मित्र रिचर्ड लॉसन की मदद से लिखी थी ता‍कि इस कहानी पर चित्र बनाकर उसे कुछ पैसे मिल जाएँ। 1938 में इसी कहानी पर वाल्ट डिज्नी ने एक फिल्म भी बनाई है। 'फरडीनैंड द बुल' के नाम से यह फिल्म यू-ट्‍यूब पर भी देखी जा सकती है।

शक्तियाँ

प्रकाश नारायण नाटाणी

हर काम के लिए व्यक्ति के अंदर शक्ति का होना आवश्यक है। शक्ति दो प्रकार की होती है। शारीरिक तथा मानसिक। जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसके शरीर और मन दोनों में शक्ति होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति आती है शरीर को स्वस्थ रखने से और मन की शक्ति आती है सत्य के आचरण से। शरीर और मन दोनों की शक्तियाँ जब तक व्यक्ति में हों तभी तक वह सच्चे अर्थों में शक्तिशाली कहलाने का दावा कर सकता है। दोनों में से केवल एक ही शक्ति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता।

कर्ज से अच्छे खजूर

एक स्कूल के छात्रों ने एक बार पिकनिक का प्रोग्राम बनाया। सभी बच्चे इसके लिए अपने घर से कुछ न कुछ खास खाने की चीज बनवाकर लाने वाले थे। स्कूल के स्टूडेंट्‍स में एक गरीब छात्र भी था। उसने घर आकर माँ को सारी बात बताई। माँ ने बताया कि घर में बनाने के लिए कोई खास चीज नहीं है। बालक दुखी हो गया।

तभी माँ ने कहा कि घर में कुछ खजूर रखे हैं तू उन्हें ले जा। कुछ देर बाद माँ को लगा कि पिकनिक पर बाकी सभी बच्चे खाने-पीने की अच्छी चीजें लेकर आएँगे, ऐसे में बेटा खजूर ले जाएगा तो ठीक नहीं लगेगा।

माँ ने तुरंत बेटे से कहा कि तुम्हारे पिताजी आने वाले हैं। जैसे ही वे आएँगे, मैं बाजार से अच्‍छी चीज मँगवा लूँगी। बच्चा निराश होकर एक तरफ बैठ गया। थोड़ी देर बाद पिता घर आए। बेटे को उदास बैठा देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा - क्या हुआ? और पत्नी ने उन्हें सारी बात बताई। पति-पत्नी देर तक आपस में विचार कर रहे थे।

आँगन में बैठा बालक उन्हें देखता रहा उसे दुख था कि उसके कारण उसके माता-पिता परेशानी में हैं। कुछ देर बाद बालक ने देखा कि उसके पिता चप्पल पहनकर बाहर जा रहे हैं। बालक ने पूछा - 'पिताजी क्या जान सकता हूँ कि आप कहाँ जा रहे हैं। बेटा तेरी उदासी मुझसे देखी नहीं जाती, मैं अपने मित्र से कुछ पैसे उधार लेने जा रहा हूँ जिससे तू भी पिकनिक पर ‍अच्छी चीजें ले जा सकेगा।

बालक ने जवाब दिया - नहीं पिताजी उधार माँगना अच्‍छी बात नहीं है। मैं पिकनिक पर ये खजूर ही ले जाऊँगा। कर्ज लेकर शान दिखाना बुरी बात है। पिता ने पुत्र को सीने से लगा लिया। 

यह बालक पंजाब के लाला लाजपतराय के नाम से विख्‍यात हुए ।





अतिथि सत्कार का प्रभाव

महाभारत काल की बात है। कुरुक्षेत्र में मुद्‍गल नाम के एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे। वे सत्यनिष्ठ, धर्मात्मा और जितेंद्रिय थे। क्रोध व अहंकार उनमें बिल्कुल नहीं था। जब खेत से किसान अनाज काट लेते और खेत में गिरा अन्न भी चुन लेते, तब उन खेतों में बचे-खुचे दाने मुद्‍गल ऋषि अपने लिए एकत्र कर लेते थे।

कबूतर की भाँति वे थोड़ा सा अन्न एकत्र करते और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। पधारे हुए अतिथि का सत्कार भी उसी अन्न से करते, यहाँ तक कि पूर्णमासी तथा अमावस्या के श्राद्ध तथा आवश्यक हवन भी वे संपन्न करते थे। महात्मा मुद्‍गल एक पक्ष (पंद्रह दिन) में एक दोने भर अन्न एकत्र कर लाते थे। उतने से ही देवता, पितर और अतिथि आदि की पूजा-सेवा करने के बाद जो कुछ बचता था, उससे परिवार का काम चलाते थे।

महर्षि मुद्‍गल के दान की महिमा सुनकर महामुनि दुर्वासाजी ने उनकी परीक्षा करने का निश्चय किया। उन्होंने पहले सिर घुटाया, फिर फटे वस्त्रों के साथ पागलों-जैसा वेश बनाए हुए, कठोर वचन बोलते मुद्‍गल जी के आश्रम में पहुँचकर भोजन माँगने लगे। महर्षि मुद्‍गल ने अत्यंत श्रद्धा के साथ दुर्वासाजी का स्वागत किया। उनके चरण धोए, पूजन किया और फिर उन्हें भोजन कराया। दुर्वासाजी ने मुद्‍गल के पास जितना अन्न था, वह सब खा लिया तथा बचा हुआ जूठा अन्न अपने शरीर में पोत लिया। फिर वहाँ से उठकर चले आए। 

इधर महर्षि मुद्‍गल के पास भोजन को अन्न नहीं रहा। वे पूरे एक पक्ष में दोने भर अन्न एकत्र करने को जुट गए। जब भोजन के समय देवता और पितरों का भाग देकर जैसे ही वे निवृत्त हुए, महामुनि दुर्वासा पूर्व की तरह कुटी में आ पहुँचे और फिर भोजन करके चले गए। मुद्‍गल जी पुन: परिवार सहित भूखे रह गए। 

एक-दो बार नहीं पूरे छह माह तक इसी प्रकार दुर्वासा जी आते रहे। प्रत्येक बार वे मुनि मुद्‍गलजी का सारा अन्न खाते रहे। मुद्‍गल जी भी उन्हें भोजन कराकर फिर अन्न के दाने चुनने में लग जाते थे। उनके मन में क्रोध, खीज, घबराहट आदि का स्पर्श भी नहीं हुआ। दुर्वासा जी के प्रति भी उनका आदर भाव पहले की भाँ‍ति ही बना रहा। 

महामुनि दुर्वासा आखिर में प्रसन्न होकर कहने लगे- महर्षि! विश्व में तुम्हारे समान ईर्ष्या व अहंकार रहित अतिथि सेवा कोई नहीं है। क्षुधा इतनी बुरी होती है कि वह मनुष्य के धर्म-ज्ञान व धैर्य को नष्ट कर देती है, लेकिन वह तुम पर अपना प्रभाव तनिक भी नहीं दिखा सकी। तुम वैसे ही सदाचारी और धार्मिक बने रहे। विप्रश्रेष्ठ! तुम अपने इसी शुद्ध शरीर से देवलोक में जाओ।'

महामुनि दुर्वासाजी के इतना कहते ही देवदूत स्वर्ग से विमान लेकर वहाँ आए और उन्होंने मुद्‍गलजी से उसमें बैठने की प्रार्थना की। महर्षि मुद्‍गल ने देवदूतों से स्वर्ग के गुण-दोष पूछे और उनकी बातें सुनकर बोले - 'जहाँ परस्पर स्पर्धा है, जहाँ पूर्ण तृप्ति नहीं और जहाँ असुरों के आक्रमण तथा पुण्य क्षीण होने से पतन का भय सदैव लगा रहता है, वह देवलोक स्वर्ग में मैं नहीं जाना चाहता।' 

आखिर में देवदूतों को विमान लेकर लौट जाना पड़ा। महर्षि मुद्‍गलजी ने कुछ ही दिनों में अपने त्यागमय जीवन तथा भगवद्‍ भजन के प्रभाव से प्रभु धाम को प्राप्त किया।

सौजन्य से - देवपुत्र

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