शनिवार, 28 अगस्त 2010

एकांत और रचनात्मकता

रचनात्मकता के लिए ‘एकांत’ अथवा ‘निजता’ का बड़ा महत्व है. विश्व इतिहास में अनेक महान रचनाशील चिन्तक, वैज्ञानिक, और कलाकार हुए हैं जिन्होंने एकांत के क्षणों में दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया. ऐसे ही कुछ महान व्यक्तियों जीवन और निजता पर उनके विचारों की बानगी आपके लिए प्रस्तुत है.

वोल्फगैंग अमेडियस मोज़ार्ट (Wolfgang Amadeus Mozart) – मोज़ार्ट उन्नीसवीं शताब्दी के महान शास्त्रीय संगीतकार थे. उन्होंने 600 से भी अधिक अमर धुनों की रचना की. पैंतीस वर्ष की अवस्था में ही उनका निधन हो गया. 

“घोड़ागाड़ी के भीतर सफ़र करते समय, भोजन के बाद की सैर के वक़्त या नींद की तलाश में अपने बिस्तर पर मैं खुद के साथ, निपट अकेला और अपने में मगन रहता हूँ. यही वे क्षण हैं जब मेरे विचारों की श्रृंखला निर्बाध चलती है और रचनात्मकता फूट पड़ती है”.

अलबर्ट आइन्स्टीन – (Albert Einstein) – सैद्धांतिक भौतिकविद, दार्शनिक, और लेखक के रूप में विभूषित होने वाले विद्वान और बीसवीं शती के सबसे चर्चित और प्रभावशाली वैज्ञानिक. इन्हें आधुनिक भौतिकी का जनक भी कहते हैं.

“हांलांकि मैं नियत समय के अनुसार काम करता हूँ पर मुझे अचानक ही समुद्रतट पर अकेले लम्बी सैर पर चल पड़ना जाना अच्छा लगता है. उस समय मैं अपने भीतर हो रही हलचल को सुन सकता हूँ. जब मेरा काम नहीं बन रहा हो तब मैं उसे बीच में ही छोड़कर लेट जाता हूँ और छत को निहारता रहता हूँ. तब मेरी कल्पनाशक्ति मेरे समक्ष साकार हो उठती है. मैं उसे देख और सुन भी सकता हूँ.”

फ्रेंज काफ्का (Franz Kafka) – बीसवीं शताब्दी के सर्वथा मौलिक रचनाकार थे. उनके लघु उपन्यासों और छोटी-छोटी कहानियों को आधुनिक साहित्य में बेजोड़ माना जाता है.

“तुम्हें अपना कमरा छोड़कर कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. अपनी टेबल पर बैठकर ध्यान से सुनते रहो. तुम्हें सुनने की ज़रुरत भी नहीं है – बस इंतजार करो… शांत और अचल रहने का प्रयास करो. यह दुनिया खुद-बखुद तुम्हारे सामने स्वयं को उजागर करेगी. इसके सामने और कोई विकल्प नहीं है…यह भावातिरेक में तुम्हारे पैरों पर उमड़ पड़ेगी.”

निकोला टेस्ला (Nikola Tesla) – आविष्कारक और विद्युत के व्यापारिक उत्पादन के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान देनेवाले वैज्ञानिक. विद्युत चुम्बकत्व के क्षेत्र में उनकी खोज ने अनेक वैज्ञानिकों को प्रेरित किया.

“एकांत में हमारा मन केन्द्रित और स्पष्ट हो जाता है. निजता के क्षणों में मौलिकता उर्वर हो जाती है और इसपर बाहरी उद्दीपनों का प्रभाव नहीं पड़ता. कुछ पल अकेले रहकर देखिये – यही आविष्कारकों का रहस्य है. अकेले रहिये और अपने विचारों को जन्म लेते देखिये.”

जोज़फ़ हैडेन (Joseph Haydn) – ऑस्ट्रिया के संगीतज्ञ हैडेन ने अपना लगभग पूरा जीवन एक धनिक के निजी संगीतज्ञ के रूप में उनकी दूरस्थ रियासत पर व्यतीत किया. इस तरह उनपर दूसरे संगीतज्ञों और रचनाकारो का प्रभाव नहीं पड़ा. उन्हीं के शब्दों में – “मौलिक होना तो जैसे मेरी मजबूरी ही थी”.

योहान वोल्फगैंग वोन गोथे (Johann Wolfgang von Goethe) – जर्मनी के बहुश्रुत लेखक. कविता, नाटक, धार्मिक साहित्य, दर्शन, और विज्ञान के विषयों पर उनका समान अधिकार था.

“सामाजिकता हमें सिखा सकती है पर निजता हमें प्रेरित करती है”.

पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) – बीसवीं शती के लम्बे कालखंड में अपनी विविध रचना शैलियों के कारण आधुनिक कला पर अपनी अभिनव छाप छोड़नेवाले कलाकार. उनकी क्रांतिकारी उपलब्धियों के कारण वे अत्यधिक सम्मानित और समृद्ध हुए. बीसवीं शती के संभवतः एकमात्र प्रतिनिधि कलाकार.

“गहन एकांत के बिना गंभीर कर्म कर पाना मुमकिन नहीं है”.

थॉमस मान (Thomas Mann) – महान जर्मन उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक, मानवतावादी, निबंधकार और 1929 के नोबल पुरस्कार विजेता. वे अपने लेखन में गहन प्रतीकों और विसंगतियों के चित्रण और मानव स्वभाव की परख करनेवाले साहित्यकार के रूप में प्रसिद्द हैं.

“एकांत के क्षणों में हमारे भीतर कुछ मौलिक उपजता है – जैसे अनजानी खूबसूरत या ध्वंसात्मक कविता.”

शनिवार, 21 अगस्त 2010

खुदीराम बोस

आज यदि हम स्वतंत्र हवा में सांस ले पा रहे हैं तो यह उन अनेक वीर भारतवासियों की बदौलत है जिन्होंने अपने वतन को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा दी थी। उनमें से एक अमर शहीद खुदीराम बोस थे।

खुदीराम बोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक चरण में कई क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध आवाज उठाई। खुदीराम बोस भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास में संभवत: सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे।

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। जब वे बहुत छोटे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनकी बड़ी बहन ने उनका लालन-पालन किया था। 1905 में बंगाल का विभाजन होने के बाद वे देश के मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े थे। उन्होंने अपना क्रांतिकारी जीवन सत्येन बोस के नेतृत्व में शुरू किया था। मिदनापुर के क्रांतिकारियों के बीच वह एक साहसी और सक्षम संगठनकर्ता के रूप में जाने जाते थे।

वे स्कूल के दिनों से ही राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेने लगे थे। उन दिनों छोटे-छोटे हिन्दुस्तानी स्कूली बच्चे भी अंग्रेजों से नफरत किया करते थे। बच्चे जलसे जलूसों में शामिल होते थे तथा अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाते थे। 1905 में जब बंगाल का विभाजन हुआ तो घृणा की यह भावना और भी तेज हो गयी। खुदी राम बोस ने 9 वीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया और वह क्रांतिकारी दल के सक्रिय सदस्य हो गए। 1906 में वे पहली बार गिरफ्तार हुए लेकिन पुलिस-हिरासत से बच निकले थे। इसके बाद 1907 में उन्होंने अपने साथियों के साथ हाटागाछा में डाक थैलों को लूटा और दिसंबर 1907 में गवर्नर की विशेष रेलगाड़ी पर बम फेंका। 

उन दिनों किंग्सफोर्ड कलकत्ता का चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट था। वह अपनी कठोर दमनकारी कार्रवाइयों से राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए कुख्यात था। क्रांतिकारियों ने उसे वहां से भगाने या खत्म करने का निर्णय किया और यह काम खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपा गया। 13 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस ने प्रफुल्ल चाकी के साथ एक ऐसे वाहन पर बम फेंका जिसमें किंग्सफोर्ड के होने की संभावना थी। दुर्भाग्य से उस बम कांड में किंग्सफोर्ड के स्थान पर दो अंग्रेज महिलाएं मारी गईं जो उस वाहन में सफर कर रही थीं।

प्रफुल्ल चाकी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उन्होंने खुद को गोली मार ली। खुदीराम को अगले दिन गिरफ्तार किया गया। खुदीराम बोस ने निर्भीक होकर पुलिस को बताया कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को दंड देने के लिए बम फेंका था। 

आजादी की लड़ाई के महत्वपूर्ण सेनानी खुदीराम बोस को 11 अगस्त को फांसी पर लटकाया गया था। अपने चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ केवल 19 साल के इस क्रांतिकारी ने मौत को गले लगा लिया तथा हजारों क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी। उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दिया। 

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है। क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो शहादत के बाद इतने लोकप्रिय हो गए कि नौजवान एक खास किस्म की धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

खुदी राम बोस जैसे वीर सेनानी देशवासियों को निष्ठा, लगन तथा मेहनत से काम करने की प्ररेणा देते रहेंगे।

मधुर जीवन का रहस्य

एक बार संत एकनाथजी के पास एक व्यक्ति आया और बोला, ''नाथ! आपका जीवन कितना मधुर है। हमें तो शांति एक क्षण भी प्राप्त नहीं होती। आप ऐसा कोई उपाय बतावें कि हमें लोभ, मोह, मद, मत्सर इत्यादि दुर्गुण न सता पावें और हम जीवन में आनन्द की प्राप्ति करें।''

एकनाथजी ने कहा ''तुझे वह उपाय तो मैं बता सकता था, किंतु तू तो अब आठ ही दिनों का मेहमान है, अत: पहले की ही भांति अपना जीवन व्यतीत करो।''

उस मनुष्य ने ज्योंही सुना कि वह अब अधिक दिनों तक जीवित न रहेगा, तो वह उदास हो गया और तुरंत ही अपने घर लौट गया। घर में जाकर वह अपनी पत्नी से बोला, ''मैंने तुम्हें कई बार बिना किसी कारण ही कष्ट दिया है, मुझे क्षमा कर दो।''

फिर बच्चों से बोला, ''बच्चों, मैंने तुम्हें कई बार नाहक ही कष्ट दिया है। मुझे क्षमा करो।'' फिर मित्रों के पास जाकर भी उसने क्षमा मांगी। इस तरह जिस-जिस व्यक्ति के साथ उसने दुर्व्यवहार किया था, उन सबके पास जा-जाकर उसने माफी मांगी। इस तरह आठ दिन व्यतीत हो गये। नवें दिन वह एकनाथजी के पास पहुंचा और बोला, ''नाथ, आठ दिन तो बीत गये। मेरी अंतिम घड़ी के लिए कितना समय शेष है?''

संत ने कहा- 'तुम्हारी अंतिम घड़ी तो परमेश्वर ही बता सकता है। किंतु मुझे यह तो बताओ कि तुम्हारे ये आठ दिन कैसे व्यतीत हुए ? भोग-विलास में मस्त होकर तूने आनंद तो प्राप्त किया ही होगा ?'

''क्या बताऊं, नाथ, मुझे इन आठ दिनों में मृत्यु के अलावा और कोई चीज दिखाई ही नहीं दे रही थी। मुझे अपने द्वारा किये हुए सारे दुष्कर्म स्मरण हो गये। उसके पश्चाताप में ही यह अवधि बीत गयी।''

यह सुनकर एकनाथ ने कहा- “तुमने जिस बात को ध्यान में रखकर ये आठ दिन बिताये हैं, हम साधु लोग इसी बात को अपने सामने रखकर सारे काम किया करते हैं। 

ध्यान रखो, यह अपनी देह क्षणभंगुर है और अंतत: इसे मिट्टी में मिलना ही है। अत: इसका गुलाम होने की अपेक्षा परमेश्वर का गुलाम होना ही श्रेयस्कर है। प्रत्येक के साथ समान भाव रखने में ही जीवन की सार्थकता है और यही कारण है कि यह जीवन हमें मधुर मालूम होता है, जबकि तुम्हारे लिए ये असहनीय है।''

ज्ञान की पहली पाठशाला है नम्रता

एक बार विश्व के विभिन्न धर्म-ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए एक युवा ब्रह्मचारी संसार भ्रमण पर निकला। देश-विदेश का भ्रमण कर और वहां के ग्रंथों का अध्ययन कर जब वह अपने देश लौटा, तो सबके पास इस बात की शेखी बघारने लगा कि उसके समान अधिक ज्ञानी-विद्वान् संसार में और कोई नहीं। जो कोई भी उस व्यक्ति के पास जाता, वह उससे प्रश्न किया करता कि क्या उसने, उससे बढ़कर कोई विद्वान् देखा है?

यह बात भगवान् बुद्ध के कानों में भी जा पहुंची। भगवान् बुद्ध ब्राह्मण-वेश में उस व्यक्ति के पास गये। ब्रह्मचारी ने उनसे प्रश्न किया, ''तुम कौन हो, ब्राह्मण?''

''अपनी देह और मन पर जिसका पूर्ण अधिकार है, मैं ऐसा एक तुच्छ मनुष्य हूं।'' बुद्धदेव ने जवाब दिया।

''भलीभांति स्पष्ट करो, ब्राह्मण! मेरे तो कुछ भी समझ में न आया।'' वह अहंकारी बोला।

बुद्धदेव बोले, ''जिस तरह कुम्हार घड़े बनाता है, नाविक नौकाएं चलाता है, धनुर्धारी बाण चलाता है, गायक गीत गाता है, वादक वाद्य बजाता है और विद्वान् वाद-विवाद में भाग लेता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुष स्वयं पर ही शासन करता है।''

''ज्ञानी पुरुष भला स्वयं पर कैसे शासन करता है?'' - ब्रह्मचारी ने पुन: प्रश्न किया।

''लोगों द्वारा स्तुति-सुमनों की वर्षा किये जाने पर अथवा निंदा के अंगार बरसाने पर भी ज्ञानी पुरुष का मन शांत ही रहता है। उसका मन सदाचार, दया और विश्व-प्रेम पर ही केन्द्रित रहता है, अत: प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई असर नहीं पड़ता। यहीं वजह है कि उसके चित्तसागर में शांति की धारा बहती रहती है।''

उस ब्रह्मचारी ने जब स्वयं के बारे में सोचा, तो उसे आत्मग्लानि हुई और बुद्धदेव के चरणों पर गिरकर बोला, ''स्वामी, अब तक मैं भूल में था। मैं स्वयं को ही ज्ञानी समझता था, किंतु आज मैंने जाना कि मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है।''

''हां, ज्ञान का प्रथम पाठ आज ही तुम्हारी समझ में आया है, बंधु! और वह है नम्रता। तुम मेरे साथ आश्रम में चलो और इसके आगे के पाठों का अध्ययन वहीं करना।''

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

आजादी के महानायक सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती देवी था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर के खिताब से नवाजा था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाषचंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थें। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थें। 

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव
कोलकाता के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर, सुभाष, दासबाबू के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने दासबाबू को खत लिखकर, उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की थी। वह रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह पर भारत वापस आए और सर्वप्रथम मुम्बई जा कर महात्मा गाँधी से मिले। मुम्बई में गाँधीजी मणिभवन में निवास करते थे। वहाँ, 20 जुलाई 1921 को महात्मा गाँधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच पहली बार मुलाकात हुई। गाँधीजी ने भी उन्हें कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी। इसके बाद सुभाषबाबू कोलकाता आ गए और दासबाबू से मिले। दासबाबू उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। उन दिनों गाँधीजी ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया था। दासबाबू इस आंदोलन का बंगाल में नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ सुभाषबाबू इस आंदोलन में सहभागी हो गए।

1922 में दासबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा के अंदर से अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने के लिए, कोलकाता महापालिका का चुनाव स्वराज पार्टी ने लड़कर जीता। स्वयं दासबाबू कोलकाता के महापौर बन गए। उन्होंने सुभाषबाबू को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बनाया। सुभाषबाबू ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला। कोलकाता के रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर, उन्हें भारतीय नाम दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करनेवालों के परिवार के सदस्यों को महापालिका में नौकरी मिलने लगी।

बहुत जल्द ही, सुभाषबाबू देश के एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए। पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडन्स लिग शुरू की। 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 

1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह माँग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी 1931 के दिन कोलकाता में सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया। जब सुभाषबाबू जेल में थे, तब गाँधीजी ने अंग्रेज सरकार से समझौता किया और सब कैदियों को रिहा किया गया। लेकिन अंग्रेज सरकार ने सरदार भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को रिहा करने से इन्कार कर दिया। भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिए गाँधीजी ने सरकार से बात की। सुभाषबाबू चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। लेकिन गाँधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को तैयार नहीं थे। अंततः भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने के कारण सुभाषबाबू गाँधीजी और कांग्रेस के तौर-तरीकों से बहुत नाराज हो गए।

कारावास
अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाषबाबू को कुल ग्यारह बार कारावास हुआ था। सबसे पहले उन्हें 1921 में छः महिने की जेल हुई।

1925 में गोपिनाथ साहा नामक एक क्रांतिकारी कोलकाता के पुलिस अधीक्षक चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहता था। उसने गलती से अर्नेस्ट डे नामक एक व्यापारी को मार डाला। इसके लिए उसे फाँसी की सजा दे दी गयी। गोपीनाथ को फाँसी होने के बाद सुभाषबाबू जोर से रोये। उन्होने गोपिनाथ का शव माँगकर उसका अंतिम संस्कार किया। इससे अंग्रेज़ों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सुभाषबाबू ज्वलंत क्रांतिकारकों से न ही संबंध रखते हैं, बल्कि वे ही उन क्रांतिकारकों के नेता हैं। इसी बहाने अंग्रेज़ सरकार ने सुभाषबाबू को गिरफतार किया और बिना कोई मुकदमा चलाए, उन्हें अनिश्चित काल के लिए म्यांमार के मंडाले कारागृह में बंदी बनाया।

5 नवंबर 1925 को देशबंधू चित्तरंजन दास का कोलकाता में निधन हो गया। सुभाषबाबू ने उनकी मृत्यू की खबर मंडाले जेल में रेडियो पर सुनी। मंडाले कारागृह में रहते समय सुभाषबाबू की तबियत बहुत खराब हो गयी। उन्हें तपेदिक हो जाने के बावजूद अंग्रेज़ सरकार ने रिहा करने से इन्कार कर दिया। सरकार ने उन्हें रिहा करने के लिए यह शर्त रखी की वे इलाज के लिए यूरोप चलें जाए। लेकिन सरकार ने यह तो स्पष्ट नहीं किया था कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं। इसलिए सुभाषबाबू ने यह शर्त स्वीकार नहीं की। आखिर में परिस्थिति इतनी कठिन हो गयी की शायद वे कारावास में ही मर जायेंगे। अंग्रेज़ सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी, कि सुभाषबाबू की कारागृह में मृत्यु हो जाए। इसलिए सरकार ने उन्हे रिहा कर दिया। फिर सुभाषबाबू इलाज के लिए डलहौजी चले गए।

1930 में कारावास के दौरान ही सुभाषबाबू को कोलकाता का महापौर चुन लिया गया। इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गयी। 1932 में सुभाषबाबू को फिर से कारावास हुआ। इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत फिर खराब हो गयी। चिकित्सकीय सलाह पर सुभाषबाबू इस बार इलाज के लिए यूरोप जाने को राजी हो गए।

यूरोप प्रवास
1933 से 1936 तक सुभाषबाबू यूरोप में रहे। यूरोप में भी आंदोलन कार्य जारी रखा। वहाँ वे इटली के नेता मुसोलिनी से मिले, जिन्होंने उन्हें, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहायता करने का वचन दिया। आयरलैंड के नेता डी. वॅलेरा सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।

सुभाषबाबू के यूरोप प्रवास के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का ऑस्ट्रिया में निधन हो गया। सुभाषबाबू ने वहाँ जाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को सांत्वना दिया।

बाद में सुभाषबाबू यूरोप में विठ्ठल भाई पटेल से मिले। विठ्ठल भाई पटेल के साथ सुभाषबाबू ने पटेल-बोस विश्लेषण प्रसिद्ध किया, जिसमें उन दोनों ने गाँधीजी के नेतृत्व की बहुत निंदा की। बाद में विठ्ठल भाई पटेल बीमार पड गए, तब सुभाषबाबू ने उनकी बहुत सेवा की। मगर विठ्ठल भाई पटेल का निधन हो गया।

विठ्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में अपनी करोडों की संपत्ती सुभाषबाबू के नाम कर दी। मगर उनके निधन के पश्चात, उनके भाई सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस वसीयत को स्वीकार नहीं किया और उस पर अदालत में मुकदमा चलाया। मुकदमा जीतकर पटेल ने सारी संपत्ति गाँधीजी के हरिजन कार्य को भेंट कर दी।

1934 में अपने पिता की मृत्यु की खबर पाकर सुभाषबाबू कोलकाता लौटे। कोलकाता पहुँचते ही अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कई दिनों तक जेल में रखने के बाद वापस यूरोप भेज दिया।

कांग्रेस का अध्यक्ष पद
सन 1938 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हरिपुरा में होने का तय हुआ था। इस अधिवेशन से पहले गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सुभाषबाबू को चुना। यह कांग्रेस का ५१वां अधिवेशन था। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषबाबू का स्वागत 51 बैलों ने खींचे हुए रथ में किया गया।

इस अधिवेशन में सुभाषबाबू का अध्यक्षीय भाषण बहुत ही प्रभावी हुआ। किसी भी भारतीय राजकीय व्यक्ति ने शायद ही इतना प्रभावी भाषण कभी दिया हो। अपने अध्यक्ष पद के कार्यकाल में सुभाषबाबू ने योजना आयोग की स्थापना की। पंडित जवाहरलाल नेहरू इस के अध्यक्ष थे।

कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा
1938 में गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाषबाबू को चुना तो था, मगर गाँधीजी को सुभाषबाबू की कार्यपद्धति पसंद नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाषबाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाए। हालांकि, गाँधीजी उनके इस विचार से सहमत नहीं थे।

1939 में जब नया कांग्रेस अध्यक्ष चुनने का वक्त आया, तब सुभाषबाबू चाहते थे कि कोई ऐसी व्यक्ति अध्यक्ष बन जाए, जो इस मामले में किसी दबाव के सामने न झुके। ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति सामने न आने पर सुभाषबाबू ने खुद कांग्रेस अध्यक्ष पर बने रहना चाहा। लेकिन गाँधीजी अब उन्हें अध्यक्ष पद से हटाना चाहते थे। गाँधीजी ने अध्यक्षपद के लिए पट्टाभी सीतारमैय्या को चुना। रविंद्रनाथ ठाकुर ने गाँधीजी को पत्र लिखकर सुभाषबाबू को ही अध्यक्ष बनाने का निवेदन किया। प्रफुल्लचंद्र राय और मेघनाद सहा जैसे वैज्ञानिक भी सुभाषबाबू को फिर से अध्यक्ष के रूप में देखना चाहतें थे। लेकिन गाँधीजी ने इस मामले में किसी की बात नहीं मानी। कोई समझौता न हो पाने के कारण कई वर्षों बाद पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ।

सब यही जानता थे कि महात्मा गाँधी ने पट्टाभी सितारमैय्या का साथ दिया है इसलिए वह चुनाव आसानी से जीत जाएंगे। लेकिन वास्तव में हुआ इसके ठीक विपरीत, सुभाषबाबू को चुनाव में 1580 मत मिले जबकि पट्टाभी सीतारमैय्या को 1377 मत मिले। गाँधीजी के विरोध के बावजूद सुभाषबाबू 203 मतों से यह चुनाव जीत गए।

मगर, बात यहीं खत्म नहीं हुई। गाँधीजी ने पट्टाभी सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताकर अपने साथियों से कह दिया कि अगर वें सुभाषबाबू की कार्यपद्धति से सहमत नहीं हैं तो वें कांग्रेस से हट सकतें हैं। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू तटस्थ रहे और अकेले शरदबाबू सुभाषबाबू के साथ बने रहे।

1939 का वार्षिक कांग्रेस अधिवेशन त्रिपुरी में हुआ। इस अधिवेशन के समय सुभाषबाबू तेज बुखार से इतने बीमार पड़ गए थे, कि उन्हें स्ट्रेचर पर लेटकर अधिवेशन में आना पडा। गाँधीजी इस अधिवेशन में उपस्थित नहीं रहे। गाँधीजी के साथियों ने सुभाषबाबू से बिल्कुल सहकार्य नहीं दिया।

अधिवेशन के बाद सुभाषबाबू ने समझौते के लिए बहुत कोशिश की। लेकिन गाँधीजी और उनके साथियों ने उनकी एक न मानी। परिस्थिति ऐसी बन गयी कि सुभाषबाबू कुछ काम ही न कर पाए। आखिर में तंग आकर 29 अप्रैल 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस अध्यक्षपद से इस्तीफा दे दिया।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
3 मई 1939 को सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद सुभाषबाबू को कांग्रेस से निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी।

द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागरण शुरू कर दिया। इसलिए अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे। सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। मजबूर होकर सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा। मगर अंग्रेज सरकार यह नहीं चाहती थी कि सुभाषबाबू युद्ध के दौरान मुक्त रहें। इसलिए सरकार ने उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया।

नजरबंदी से पलायन
नजरबंदी से निकलने के लिए सुभाषबाबू ने एक योजना बनायी। 16 जनवरी 1941 को वे पुलिस को चकमा देने के लिये एक पठान मोहम्मद जियाउद्दीन का भेष धरकर घर से भाग निकले। शरदबाबू के बडे़ बेटे शिशिर ने उन्हें अपनी गाड़ी से कोलकाता से दूर गोमोह तक पहुँचाया। गोमोह रेलवे स्टेशन से फ्रंटियर मेल पकड़कर वे पेशावर पहुँचे। पेशावर में उन्हे फॉरवर्ड ब्लॉक के एक सहकारी मियां अकबर शाह मिले। मियां अकबर ने उनकी मुलाकात कीर्ती किसान पार्टी के भगतराम तलवार से कराई। भगतराम तलवार के साथ में सुभाषबाबू पेशावर से अफ़्ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल की ओर निकल पडे़। इस सफर में भगतराम तलवार, रहमतखान नाम के पठान बने थे और सुभाषबाबू उनके गूंगे-बहरे चाचा बने थे।

काबुल में सुभाषबाबू दो महिनों तक उत्तमचंद मल्होत्रा नामक एक भारतीय व्यापारी के घर में रहे। वहाँ उन्होंने पहले रूसी दूतावास में प्रवेश पाना चाहा। इस में नाकामयाब रहने पर उन्होंने जर्मन और इटालियन दूतावासों में प्रवेश पाने की कोशिश की। इटालियन दूतावास में उनकी कोशिश सफल रही। जर्मन और इटालियन दूतावासों ने उनकी सहायता की। आखिर में ओर्लांदो मात्सुता नामक इटालियन व्यक्ति बनकर सुभाषबाबू काबुल से निकलकर रूस की राजधानी मॉस्को होते हुए जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँच गए।

हिटलर से मुलाकात
उन्होंने जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडिओ की स्थापना की। इसी दौरान सुभाषबाबू नेताजी नाम से जाने जाने लगे। जर्मन सरकार के एक मंत्री एडॅम फॉन ट्रॉट सुभाषबाबू के अच्छे दोस्त बन गए।

आखिर, 29 मई 1942 को सुभाषबाबू जर्मनी के सर्वोच्च नेता एडॉल्फ हिटलर से मिले। लेकिन हिटलर को भारत के विषय में विशेष रूचि नहीं थी। उन्होंने सुभाषबाबू को सहायता का कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया।

कई साल पहले हिटलर ने माईन काम्फ नामक अपना आत्मचरित्र लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाषबाबू ने हिटलर से अपनी नाराजी व्यक्त की। हिटलर ने अपने किये पर माँफी माँगी और माईन काम्फ की अगली आवृत्ति से वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया।

अंत में, सुभाषबाबू को पता चला कि हिटलर और जर्मनी से उन्हें कुछ और नहीं मिलनेवाला हैं। इसलिए 8 मार्च 1943 को जर्मनी के कील बंदर में अपने साथी आबिद हसन सफरानी के साथ एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर पूर्व आशिया की तरफ निकल गए। यह जर्मन पनदुब्बी उन्हे हिंद महासागर में मादागास्कर के किनारे तक लेकर आई। वहाँ वे दोनो खूँखार समुद्र में से तैरकर जापानी पनडुब्बी तक पहुँच गए। यह जापानी पनदुब्बी उन्हे इंडोनेशिया के पादांग बंदर तक लेकर आई।

पूर्व एशिया में अभियान
पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंप दिया। 

जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहकार्य करने का आश्वासन दिया। कई दिनों पश्चात नेताजी ने जापान की संसद डायट के सामने भाषण किया।

21 अक्तूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए। आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकडे़ हुए भारतीय युद्धबंदियोंको भर्ती किया। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।

पूर्व एशिया में नेताजी ने जगह-जगह भाषण करके वहाँ भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भर्ती होने और उसे आर्थिक मदद करने का आह्वान किया। उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने चलो दिल्ली का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। नेताजी ने इन द्वीपों का नाम शहीद और स्वराज द्वीप रखा। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनो फौजो को पीछे हटना पड़ा।

जब आज़ाद हिन्द फौज पीछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परंतु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लड़कियों के साथ सैकडों मिल चलते जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श ही बनाकर रखा।

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता का संबोधन कर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा। इस प्रकार नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया।

मृत्यु का अनुत्तरित रहस्य
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होंने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के के बाद से ही उनका कुछ भी पता नहीं चला।

23 अगस्त 1945 को जापान की दोमेई समाचार संस्था ने बताया कि 18 अगस्त को नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ली।

दुर्घटनाग्रस्त हवाई जहाज में नेताजी के साथ उनके सहकारी कर्नल हबिबूर रहमान थे। उन्होने नेताजी को बचाने का निश्चय किया, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके। फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी टोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए 1956 और 1977 में दो बार आयोग का गठन किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से, इन दोनो आयोगो ने बात ही नहीं की।

1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु, उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।

18 अगस्त 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारतीय इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य है।


तात्या टोपे का बलिदान

तात्या टोपे १८५७ की सशस्त्र क्रांति के तेजस्वी सेनानी थे । बिठूर (कानपुर) से लेकर ग्वालियर तक अनेक युद्धों में उन्होंने अंग्रेजी सेना को एक ऐसी शिकस्त दी थी कि गोरे सेनाधिकारी "तात्या-टोपे" का नाम सुनकर कांप उठते थे । नाना साहेब पेशवा तथा राव साहब तात्या टोपे की तलवार के वार देखकर हतप्रभ रह जाते थे ।

अंग्रेज सेनापति होम्स किसी भी प्रकार अंग्रेजी शासन के लिए आतंक बने तात्या टोपे को पकड़ने के लिया दिन-रात एक किये हुए था । उसने ग्वालियर के सरदार मानसिंह के माध्यम से तात्या टोपे को पकड़ने का षड़यंत्र रचा ।

७ अप्रैल, १८५९ को रात्रि के समय शिवपुरी के बीहड़ जंगल में मानसिंह के ठिकाने पर सोये हुए तात्या टोपे को गोरे सैनिकों ने घेर लिया ।

सैनिक न्यायालय में तात्या पर कानपुर में असंख्य अंग्रेजों की हत्याएं कराने का आरोप लगाकर मुकदमा चला दिया। तात्या टोपे ने अदालत में निर्भीकता से कहा "मैंने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया है । मैं तोप से उड़ाए जाने या फांसी पर चढ़ने के लिए तैयार हूँ।"

१८ अप्रैल, १८५९ को शिवपुरी में तात्या टोपे को फांसी देने ले जाया जा रहा था। नियमानुसार जब फांसी से पूर्व उनके हाँथ पीछे से बांधे जाने लगे तो उन्होंने कहा-"ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मैं स्वयं से ही फंदा गले में डालूँगा।" और देखते देखते वह फांसी पर झूल गये।

वन्देमातरम बोलने पर निष्कासित हुए डा. हेडगेवार

सन १९०७ की बात है। डा. बलिराव केशवराव हेडगेवार जी उन दिनों नागपुर के नीलसिटी में दसवी कक्षा के छात्र थे। उन दिनों "वन्देमातरम" के महामंत्र से देश गूंज रहा था। "वन्देमातरम" शब्द सुनते ही अंग्रेज शासक कांप उठते थे। उन्हें लगता था कि "वन्देमातरम" उच्चारण करने वाले उनके समाज को चुनौती दे रहे हैं ।

एक बार राष्ट्र भक्त छात्रों ने योजना बनाई कि जैसे ही उनके विद्यालय में अंग्रेज निरीक्षक आये कि सभी भारतीय छात्र उठकर उसका "वन्देमातरम" से उदघोष से स्वागत करें। श्री हेडगेवार के नेतृत्व में छात्रों ने निरीक्षक के आते ही "वन्देमातरम" का उदघोष कर दिया। विद्यालय निरीक्षक को ये दृश्य देखकर पसीना आ गया। वह पैर पटकता हुआ नाराज होकर लौट गया ।

उसके जाने के बाद प्रिंसिपल ने वन्देमातरम का उदघोष करने वाले छात्रों के विरुद्ध कार्यवाही का आदेश जारी किया। हेडगेवार जी ने कहा "ये योजना मेरी थी। केवल मेरे विरुद्ध कार्यवाही की जाए।" उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। उन्होंने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा "यदि अपनी मातृभूमि की वंदना करना अपराध है तो मैं इस अपराध को बार-बार दोहराता रहूँगा।

श्री हेडगेवार लोकमान्य तिलक तथा डा. मुंजे जैसे राष्ट्रभक्त नेताओं के संपर्क में आये तथा स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने लगे। तिलक जी के निधन जी के बाद आगे चलकर १९३० के आन्दोलन में भी जेल गये।

'अपने स्वयं के दीपक बनो।'

कम्बोज के सम्राट् तिंग भिंग की राजसभा में एक दिन एक बौद्ध भिक्षुक आया और कहने लगा, ''महाराज! मैं त्रिपिटिकाचार्य हूं। पन्द्रह वर्षों तक सारे बौद्ध जगत् का तीर्थाटन करके मैंने सद्धर्म के गूढ़ तत्वों का रहस्योद्घटन किया है। मैं आपके राज्य का पट्टपुरोहित बनने की कामना से आया हँ। मेरी इच्छा है कि कम्बोज का शासन भगवन के आदेशानुसार संचालित हो।''

यह सुनकर सम्राट् मुस्कराये और बोले, ''आपकी सदिच्छा मंगलमयी है, किन्तु आपसे एक प्रार्थाना है कि आप धर्मग्रंथों की एक और आवृति कर डालें।'' 

भिक्षुक को क्रोध आया, किन्तु साक्षात् सम्राट जानकर वह अपने क्रोध को व्यक्त न कर सका। उसने सोचा, ''क्यों न एक आवृति और कर लूँ। सम्राट् को रूष्ट कर राजपुरोहित के प्रतिष्ठित पद को क्यों हाथ से जाने दूँ।''

दूसरे वर्ष वह सम्राट् के सम्मुख उपस्थित हुआ तो सम्राट् ने फिर कहा ''भगवन्, एकान्त सेवन के साथ एक बार और धर्मग्रन्थों का परायण करें, तो श्रेयस्कर होगा।''

भिक्षुक के क्रोध की सीमा न रही, किन्तु सामने सम्राट् होने के कारण कुछ न कर सकता था। अपमान के दंश से पीड़ित एकान्तवास के लिए वह नदीतट पर गया। कोलाहल से दूर नदीतट पर प्रार्थना करने में उसे बड़ा ही आनंद प्राप्त हुआ। अब तो उसने अपना आसन वहीं जमाया और एकाग्रचित से भगवान् की प्रार्थना में लीन रहने लगा।

साल भर बाद सम्राट् तिंग भिंग अपनी समस्त प्रजा के साथ नदीतट पर उपस्थित हुए। उन्होंने भिक्षुक को तन-मन की सुध भूले आनंदातिरेक में भगवान् की प्रार्थना में लीन पाया। उन्होंने प्रार्थना की, ''भगवन, चलिये, धर्माचार्य के आसन को सुशोभित कीजिये।''

भिक्षुक की धर्माचार्य बनने की महत्वाकांक्षा भस्मसात् हो चुकी थी। पांडित्य के अहंकार का स्थान आत्मज्ञान के आनंद ने ले लिया था। उसके अधरों पर मंद मुस्कान बिखर गयी। वह बोला, ''राजन् ! सद्धर्म उपदेश की नहीं आचरण की वस्तु है। उपदेश में अहंकार है और आचरण में आनंद। मैंने यहाँ आकर आचरण में ही आनंद पाया।

भगवान् के आदेश बड़े स्पष्ट हैं। वहाँ आचार्य की जरूरत नहीं। भगवान् ने एक ही वाक्य में सब कह दिया है- 

'अप्पदीपो भव' अर्थात् 'अपने स्वयं के दीपक बनो।' मुझे राजपुरोहित का पद नहीं चाहिए।''


सच्ची साधना

स्वामी विवेकानंद ने एक बार हिमालय के दुर्गम स्थानों की यात्रा की। उसके बाद उन्हें लगने लगा कि ऐसे दिव्य स्थलों में ही मन-मस्तिष्क एकाग्र पर सफल साधना की जा सकती है। वहां दुबारा जाने की इच्छा उनके अन्दर प्रबल हो उठी।

एक दिन वह अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर विनम्रता के उनसे कहा," गुरुदेव , मैं तपस्या व साधना के लिए हिमालय जाना चाहता हूँ। वहां एकांत में रहकर मैं आत्मिक शांति व शक्ति प्राप्त कर सकूँगा। कृपया आप मुझे वहां जाने की स्वीकृत व आशीर्वाद प्रदान करें।"

स्वामी जी ने कहा," पुत्र इन दिनों बंगाल के कुछ भागों में भूखमरी फैली हुई है। चारों ओर लोग भूख से तड़प रहें हैं। यहाँ लोग मरते रहें, तड़पते रहें, और तुम हिमालय बैठे शान्ति पाओ, क्या यह उचित होगा? मेरे ख्याल से तुम्हारी आत्मा यह कदापि स्वीकार नहीं करेगी।" 

परमहंस जी के शब्दों ने विवेकानंद को उद्वेलित कर डाला। उन्होंने हिमालय जाना स्थगित कर दिया तथा भूख से पीड़ित लोगों के बीच पहुँच कर उनकी सेवा में जुट गये। उन्होंने अपने गुरु भाइयों से कहा,"वास्तव में गरीबों व पीड़ितों की सेवा-सहायता ही सच्ची पूजा साधना है। गुरुदेव ने हमें सही रास्ता दिखाया है। हमे उसी पर चलना चाहिए।"

गुरूजी की विनयशीलता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरूजी) समय मिलते ही वृद्धजनों तथा धार्मिक विभूतियों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तत्पर रहते थे।

एक बार १९७१ में वे इंदौर पधारे। एक स्वयंसेवक अपने नवनिर्मित आवास पर उन्हें सादर भोजन कराने ले गया। भोजन करने के उपरान्त बैठकर आनंदपूर्वक देश व समाज की वर्तमान स्थितियों पर चर्चा होती रही। लौटते समय वे सभी के साथ तीसरे मंजिल से नीचे आ गए। अचानक उन्हें स्मरण आया कि स्वयंसेवक की माताजी को प्रणाम करना तो याद नहीं रहा। स्वयंसेवक ने कहा, "मैं माताजी को यही बुला लेता हूँ।" 

गुरूजी बोले,"अरे, जिनके चरण वंदन करके आशीर्वाद लेना है, उन्हें नीचे बुलाना कहाँ की बुद्धिमानी है।" वे स्वयं तेजी से सीढ़ियाँ चढ़कर तीसरी मंजिल पर पहुँचे तथा माताजी के चरण-स्पर्श करके आशीर्वाद लिया। वृद्ध माता के प्रति सभी उनकी श्रद्धा-भावना देखकर हतप्रभ रह गए।

निंदक नियरे राखिये

विनोबाजी अपने पत्रों को संभालकर रखते थे और उन सबका यथावत् उत्तर भी दिया करते थे। एक दिन उनके पास गांधी जी का एक पत्र आया, तो उन्होंने उसे पढ़कर फाड़ दिया। उनके पास ही श्री कमलनयन बजाज भी बैठे थे। उन्हें यह देख आश्चर्य हुआ। वह अपने उद्वेग को दबा न सके और उन्होंने उन फटे टुकड़ों को जोड़कर पढ़ा तो उसे विनोबा जी की प्रशंसा से ओत-प्रोत पाया। उसमें लिखा था-'आपके समान उच्च आत्मा मैंने और कहीं नहीं देखा।''

साश्चर्य बजाजजी ने पूछा, 'आपने यह पत्र फाड़ क्यों दिया? सही बात जो लिखी थी। इसे संभालकर रखना था।' सस्मित विनोबा जी ने उत्तर दिया, ''यह पत्र मेरे लिए बेकार है, अत: मैंने फाड़ डाला। पूज्य बापू ने अपनी विशाल दृष्टि से मुझे जैसा देखा, इस पत्र में लिख दिया है, पर मेरे दोषों की उन्हें कहां खबर? मुझे तो आत्म-प्रशंसा बिल्कुल पसंद नहीं। हां! कोई मेरे दोष बतावे, तो मैं बराबर उनका ख्याल करूंगा।''

कामना से रहित छत्रपति शिवाजी


महाराष्ट्र-सिरमौर छत्रपति शिवाजी के एक वीर सेनापति ने कल्याण का किला जीता। काफी अस्त्र-शस्त्र के अलावा अटूट संपत्ति भी उसके हाथ लगी। 

एक सैनिक ने एक मुगल किलेदार की परम सुंदर बहू उसके समक्ष पेश की। वह सेनापति उस नवयौवना के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया और उसने उसे शिवाजी को नजराने के रूप में भेंट करने की ठानी। उस सुंदरी को एक पालकी में बिठाकर वह शिवाजी के पास पहुंचा।

शिवाजी उस समय अपने सेनापतियों के साथ शासन-व्यवस्था के संबंध में बातचीत कर रहे थे। वह सेनापति उन्हें प्रणाम कर बोला, ''महाराज! कल्याण में प्राप्त एक सुंदर चीज आपको भेंट कर रहा हूं।'' और उसने उस पालकी की ओर इंगित किया।

शिवाजी ने ज्योंही पालकी का परदा हटाया, उन्हें एक खूबसूरत मुगल नवयौवना के दर्शन हुए। उनका शीश लज्जा से झुक गया और उनके मुख से निम्न उद्गार निकले-

"काश! हमारी माताजी भी इतनी खूबसूरत होतीं, तो मैं भी खूबसूरत होता!"

फिर उस सेनापति को डांटते शिवाजी बोले, 

"तुम मेरे साथ रहकर भी मेरे स्वभाव को न जान सके? शिवाजी दूसरों की बहू-बेटियों को अपनी माता की तरह मानता है। जाओ इसे ससम्मान इसके घर लौटा आओ।"

महाभारत से कुछ चुने हुए अमृत वचन


1-किया हुआ पाप स्वीकार कर लेने या कह देने से, शुभ कर्म करने से, पश्चाताप करने से, दान और तप करने से नष्ट होने लगता है।
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-36
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2-हम आज जो पाप बटोर रहे हैं, कल वह हमारे लिए विकट कष्टों (जन्म और मृत्यु) का कारण बनेगा।
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-41

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3-अर्जुन ! पृथ्वी का शासन तुम करो, मुझे राज्य और भोगों से कोई मतलब नहीं है। 
धर्मराज युधिष्ठिर, महाभारत, शांतिपर्व, 7-42

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4- जगत में निर्धनता को धिक्कार है। सर्वस्व त्यागकर निर्धन या अकिंचन हो जाना यह संतों और मुनियों का धर्म है, राजाओं का नहीं।
महाराजा नहुष, महाभारत, शांतिपर्व, 8-11

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5-जिस राज्य का धन समाप्त हो जाता है उसके धर्म का भी संहार हो जाता है। कोई हमारे धन-धर्म का अपहरण करे तो उसे क्षमा कैसी? 
अर्जुन, महाभारत, शांतिपर्व, 8-13

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6-दरिद्रं पातकं लोके....
दरिद्र मनुष्य पास में खड़ा हो तो लोग इस तरह उसकी ओर देखते हैं मानो उससे बड़ा पापी कोई नहीं। अतएव दरिद्रता जगत में महापाप है, मेरे सामने दरिद्रता की प्रशंसा न करें।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-14

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7-पर्वतों से बहुत-सी नदियां बहती रहती हैं, उसी प्रकार बढ़े हुए संचित धन से सब प्रकार के शुभ कर्मों का अनुष्ठान होता रहता है।
अर्जुन, महाभारत, शांतिपर्व, 8-16

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8-राजा को चाहिए कि प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय करे, विद्वान बने और येन-केन-प्रकारेण संग्रह कर राज्य में धन का निवेश करे और प्रजा के कल्याण के लिए यत्नपूर्वक यज्ञ का अनुष्ठान करे। राजा के लिए दूसरे देश के धन का अपहरण सर्वथा उचित है।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-26,27

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9-राजा का पुनीत कर्तव्य है कि वह साम्राज्य विस्तार करे। सभी राजा पृथ्वी-विजय करते हैं। जीतने के बाद कहते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। ठीक वैसे ही जैसे पुत्र पिता के धन को अपना बताता है। यही राजधर्म है।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-31

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10-जैसे भरे हुए महासागर से जल निकल कर संपूर्ण पृथ्वी पर फैल जाता है उसी प्रकार राजा को चाहिए कि उसके द्वारा एकत्रित धन उसके संपूर्ण राज्य में फैल जाए।
अर्जुन का युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 8-32

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11-कुछ मिले या न मिले, न तो जीवन का अभिनन्दन करूंगा और न मृत्यु से द्वेष। दोनों के प्रति मेरा भाव समान है। इस अपार संसार में त्यागी को ही सुख है।
सम्राट युधिष्ठिर का अर्जुन को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 9-25,33

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12- जीवन में विवेक अमृत समान है। इससे अक्षय, अविकारी एवं सनातन पद प्राप्त हो जाता है।
सम्राट युधिष्ठिर का अर्जुन को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 9-25,36

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13-राजा को अपने राजधर्म की निंदा नहीं करनी चाहिए वरन् अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-2

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14-बुढ़ापे से जर्जरित होने पर, आपत्तिकाल में अथवा शत्रु द्वारा धन-संपत्ति से वंचित कर दिए जाने पर मनुष्य को संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-17

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15-अकर्मण्य पुरूष को कभी कोई सिद्धि नहीं मिलती। उसी प्रकार राजा को मौनी बाबा बनकर अपने स्वधर्म अर्थात् कर्तव्य से नहीं हटना चाहिए।
भीम का सम्राट युधिष्ठिर को उपदेश, महाभारत, शांतिपर्व, 10-21,26

सफल लोग क्या करते है ?

"जीवन की मंजिले पाने के लिए मजबूत रस्सी चाहिए और इसके लिए जरुरत होती है सही धागों की चुनाव की. 

जब अन्य खेल रहे होते है तब सफल लोग योजनाओ को बनाने में व्यस्त रहते है .

जब अन्य सो रहे होते है तब वो पढ़ रहे होते है. 

जब अन्य सपने देख रहे होते है तब वे तैयारिया कर रहे होते है .

जब अन्य स्थगित कर रहे होते है तब वे निश्चित कर रहे होते है .

जब अन्य टालमटोल कर रहे होते है तो वे शुरुआत करते है.

जब अन्य बात कर रहे होते है तो वे धयान से सुन रहे होते है .

जब अन्य गुस्सा कर रहे होते है वे मुस्करा रहे होते है .

जब अन्य छोड़ रहे होते है वो फिर भी डटें रहते है ....

यानी किसी भी हालत को सफलता की ओर मोड़ देना सफल लोगो के जीवन में कोई न कोई टर्निंग पॉइंट जरुर रहा है .

यह तब हुआ जब उन्होंने इस बात का एकतरफा, अडिग ,और सुस्पष्ट निर्णय लिया कि अब वो घिसा-पीटा जीवन नहीं जियेगे .फर्क इतना है कि कुछ ऐसा 15 साल कि उम्र में करते है ,कुछ 50 साल कि उम्र में और बहुत से... कभी नहीं "

सोमवार, 16 अगस्त 2010

राष्ट्र धर्म

राष्ट्र हम में से हरेक के सम्मिलित अस्तित्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम है, कल थे और आने वाले कल में होंगें, सभी कुछ शामिल है। 
हम और हम में से हरेक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यो न हों, राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती है। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत, झर-झर बहते निर्झर, विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन, सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश में विहार करने वाले पक्षी, सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित है। 
प्रांत, शहर, जातियाँ, यहाँ तक कि रीति-रिवाज, धर्म-मजहब, आस्थाएँ-पंरपराएँ राष्ट्र के ही अंग-अवयव है। राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नही हैं।
भारतवासियों की एक ही पहचान है - भारत देश, भारत मातरम् । 
हम में से हरेक का एक ही परिचय है - 
राष्ट्रध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणो का गान हैं ।
हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती है; जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में, राष्ट्र के उत्थान में सहायक है। राष्ट्र की अखंड़ता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को निछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्तव्य है। 
राष्ट्र धर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। 
यह हिंदू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है, जितना कि सिख, मुसलिम या ईसाइ के लिए। 
यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कही अधिक है। 
इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। 
राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है- राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदशील होना, कर्तव्यनिष्ठ होना; राष्ट्रीय हितो के लिए, सुरक्षा के स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत बलिदान करते रहना । 

युग परिर्वतन के अग्रदूत

परमपूज्य गुरुदेव अपने प्रवचन में कहा करते थे-

‘‘ मै धरती का भाग्य-भविष्य बदलने आया हूँ। 

मै आना नही चाहता था, पर मुझे धकेला गया है। और विशिष्ट कार्यो के लिए भेजा गया है । 

लोग मुझे मनोकामना पूरी करने की मशीन मानते है । 

मै उनकी थोड़ी मानकर उन्हें बदलने का प्रयास करता हूँ । 

जो बदल जाते हैं, वे ही मेरे सैनिक-युग परिर्वतन के अग्रदूत बन जाते है । 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रगति रुक गई

एक बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपये की बिकती, पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य केवल आठ-दस आने से अधिक न मिलता। हाट से लौटने पर बेटे को पास बैठाकर बाप, उसकी मूर्तियों में रही त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए कहता। यह क्रम वर्षो चलता रहा। लड़का समझदार था। उसने पिता की बातें ध्यान से सुनीं और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा । कुछ समय बाद लड़के की मूर्तिया भी डेढ़ रुपये की बिकने लगीं। बाप भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता। बेटे ने और अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी। मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपये की बिकने लगी। सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप ने तब भी बंद न किया। एक दिन बेटे ने झुँझलाकर कहा -‘‘आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नही करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे मूर्ति के पाँच रुपये मिलते है; जबकि आप को दो ही रुपये।’’ बाप ने कहा -‘‘पुत्र ! जब मै तुम्हारी उम्र का था, तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपये से अधिक की मूर्तियाँ न बना सका। मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो। 

अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो, ताकि बहुमुल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रंणी में पहुँच सको।’’ 

मनुष्य न चाहे तो भी -------

समुद्र से जल भरकर लौट रहे मरुतगणों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया। मरुत् विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुए और युद्ध ठानने को तैयार हो गए। 

विंध्याचल ने बडे़ सौम्य भाव से कहा-

‘‘महाभाग ! हम आपसे युद्ध करना नहीं चाहते, हमारी तो एक ही अभिलाषा है कि आप यह जो जल लिए जा रहे हैं, वह आपको जिस उदारता के साथ दिया गया, आप भी इसे उसी उदारता के साथ प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो ? ’’मरुतगणों को अपने अपमान की पड़ी थी, सो वे शिखर से भिड़ गए, पर जितना युद्ध उन्होनें किया, उतना ही उनका बल क्षीण होता गया और धरती को अपने आप जल मिल गया। 

मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर अपना काम करा ही लेता है, पर श्रद्धापूर्वक करने का तो आनंद ही कुछ और है। 

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