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रविवार, 9 जनवरी 2011

समस्या-अपनी सामथ्र्य, प्रभाव-प्रखरता को बढ़ाने, निखारने के लिए क्या करना चाहिए ?

समाधान- अपनी निज की समर्थता, दक्षता, प्रामाणिकता और प्रभाव-प्रखरता एकमात्र इसी आधार पर निखरती हैं कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश हो। अनगढ़, अस्त-व्यस्त लोग गई-गुजरी जिंदगी जीते हैं दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर, अपना गुजारा तक जिस-तिस के सामने गिड़गिड़ाते, हाथ पसारते बड़ी कठिनाई से ही कर पाते हैं। पर जिसकी प्रतिभा प्रखर हैं, उनकी विशिष्टताएँ मणिमुक्तकों की तरह झिलमिलाती हैं, दूसरों को आकर्षित-प्रभावित भी करती हैं और सहारा देने में भी समर्थ होती हैं, सहयोग और सम्मान भी ऐसों के आगे-पीछे चलता हैं। बीमारियों, कठिनाइयों और तुफानों से वे ही बच पाते हैं, जिनकी जीवनी शक्ति सुदृढ़ होती है।

समर्थता को ओजस मनस्विता को तेजस और जीवट को वर्चस कहते हैं। यही हैं वे दिव्य संपदाएँ, जिनके बदले इस संसार के हाट-बाजार से कुछ भी मनचाहा खरीदा जा सकता हैं दूसरों की सहायता भी वे लोग ही कर पाते हैं, जिनके पास अपना वैभव और पराक्रम हो। संसार के वातावरण का सुधार वे ही कर सकेंगे, जिन्होंने अपने आप को सुधारकर यह सिद्ध कर दिया हो कि उनकी सृजन-क्षमता असंदिग्ध हैं। परिस्थितियों की विपन्नता को देखते हुए उन्हें सुधारे जाने की नितांत आवश्यकता हैं, पर इस अति कठिन कार्य को कर वे ही सकेंगे, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करके यह सिद्ध कर दिया हो कि वे आड़े समय में कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सफल हो सकते हैं। इस स्तर को उपलब्ध कर सकने की कसौटी एक ही हैं-अपने व्यक्तित्व को दुर्गुणों से मुक्त करके, सर्वतोमुखी समर्थता से संपन्न कर लिया हो। सद्गुणों की संपदा प्रचुर परिमाण में अर्जित कर ली हो। 

(जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र, पृष्ट 13-14)

रविवार, 25 जुलाई 2010

समस्या

विद्वानो एवं महापुरुषों ने समय के एक-एक क्षण के सदुपयोग का उपदेश 
सदैव दिया हैं, क्यों ?

समाधान
समय संसार की सबसे मूल्यवान संपदा हैं। विद्वानों एवं महापुरुषों ने समय को सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना हैं। जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की संभावना लेकर आता हैं। हर घड़ी एक महान् मोड़ का समय हो सकती हैं। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस समय, क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा हैं, वह ही क्षण, वह ही वक्त, उसके भागयोदय का वक्त नहीं हैं। वह ही हमारे लिए अपनी झोली में कोई सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो। सबके जीवन में एक परिवर्तनकारी वक्त आया करता हैं, किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता हैं, इसलिए हर बुद्धिमान मनुष्य हर क्षण को, बहुमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। कोई भी क्षण व्यर्थ न जाने देने से निश्यच ही वह क्षण हाथ से छूटकर नहीं जा सकता जो जीवन में वांछित परिवर्तन का सन्देशवाहक होगा। सिद्धि की अनििश्वत घड़ी से अनभिज्ञ साधक जिस प्रकार हर समय लौ लगाए रहने से इसको पकड़ लेता हैं, ठीक उसकी प्रकार हर क्षण को सौभाग्य के द्वार खोल देने वाला समझकर महत्वाकांक्षी कर्मवीर अपने जीवन के एक छोटे से क्षण की उपेक्षा नहीं करता और नििश्चत ही सौभाग्य का अधिकारी बनता हैं। हर मनुष्य को समय के छोटे से छोटे क्षण का मूल्य और महत्व समझना चाहिए। जीवन का समय सीमित हैं और काम बहुत हैं। अपने से लेकर परिवार, समाज एवं राष्ट्र के दायित्वपूर्ण कर्तव्यो के साथ मुक्ति की साधना तक कामों की एक लंबी श्रृंखला चली गई हैं कर्तव्यों की इस अनिवार्य परंपरा को पूरा किए बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इतने विशाल कर्तव्य क्रम को मनुष्य तब ही पूरा कर सकता हैं, जब जीवन के एक-एक क्षण, एक-एक पल और एक-एक निमेश को सावधानी के साथ उपयोगी एवं उपयुक्त दिशा में प्रयुक्त करे। जीवन में उन्नति करने और सफलता पाने वाले व्यक्तियों की जीवनगाथा का निरीक्षण करने पर निश्यच ही उनके इन गुणों में समय के पालन एवं सदुपयोग को प्रमुख स्थान मिलेगा जो जीवन की उन्नति के लिए अपेक्षित होते हैं।
(समय का सदुपयोग, प्रष्ठ-21,22) 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

समस्या-उपवास काल में एवं लम्बे उपवास को तोड़ते समय क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?



समाधान 
उपवास प्रारम्भ होने पर नित्य के नियमानुसार भोजन से शरीर को शक्ति प्राप्त नहीं होती, अतएव इसके लिये अन्य उपाय कामें लाने चाहिए, यथा-शुद्ध वायु और शुद्ध जल का उपयोग। शुद्ध वायु में गहरी सांस लेने से प्राणवायु के स्पर्श से रक्त में पहले से उपस्थित विषेले तत्व दूर होते हैं। उपवास काल में कोई अप्राकृतिक खाद्य शरीर में नही जाता, अतएव विजातीय द्रव्य रक्त में नहीं मिलते तथा उसकी शुद्धि होती है। धूप-स्नान से शरीर को अनेक विटामीन मिलते हैं तथा रोगों के कीटाणु नष्ट होते हैं। उपवास काल में अधिक पानी पीना चाहिये, जिससे कि अधिक मूत्र विसर्जन के माध्यम से शरीर से अधिक गन्दगी बाहर हो। मूत्र गुर्दो में रक्त छनकर बनता हैं, अतएव रक्त में जल की अधिकता होने से अधिक गन्दगी साफ होती है। उपवास शारीरिक स्थिति एवं रोग के अनुसार 2-3 दिन से लेकर निरन्तर दो मास तक किया जा सकता हैं। एक सप्ताह से अधिक का उपवास लम्बे उपवास की श्रेणी में आता हैं। लम्बा उपवास अत्यन्त सावधानी पूर्वक विधिवत किया जाना चाहिए, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि का भय रहता हैं। लम्बे उपवास तोड़ने में काफी सावधानी बरतनी चाहिए। नींबू के पानी या सन्तरे-मौसमी आदि के रस से तोड़ना चाहिए। फिर एक दिन तक मौसम के फल लेने चाहिए। जितने दिन तक उपवास किया गया हो, उसके चौथाई समय तक फल लेने चाहिए,

तदुपरान्त अन्न खाना चाहिए। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि उपवास के बाद पुन: गलत भोजन न ले। ऐसा करने पर उपवास का लाभ भी जाता रहेगा तथा शरीर शुद्ध हो जाने पर यदि विजातीय द्रव्य शरीर में जाएगा तो पूरी मात्रा में वह शरीर के लिए हानिकारक होगा। 

-स्वास्थ्य रक्षा प्रकृति के अनुसरण से ही सम्भव, पृष्ठ-47, 48)

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