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बुधवार, 8 अगस्त 2012

|| कर्म - विवेचन ||

कर्म कई प्रकार के है , जिनको हम तीन भागों में बाँट सकते हैं -

[ १ ] निषिद्ध कर्म - चोरी , व्यभिचार , हिंसा , असत्य , कपट , छल , जबरदस्ती , अभक्ष्य - भक्षण , प्रमाद आदि |

[ २ ] काम्य कर्म - स्त्री , पुत्र , धन आदि प्रिय... वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग संकट आदि की निवृति के लिए किये जाने वाले कर्म |

[ ३ ] कर्तव्य  कर्म - ईश्वर की भक्ति , देवतावों का पूजन , यज्ञ , दान ,तप , माता - पिता और गुरुजनों की सेवा , वर्णाश्रम धर्म के अनुसार शास्त्र विहित शुभ कर्म , शरीर संबंधी खान - पान के कर्म आदि - आदि |

कर्तव्य - कर्म भी कामनायुक्त होने से काम्य - कर्मों में समझे जा सकते हैं | कर्तव्य - कर्मों के दो भेद होते हैं -

[ १ ] सकाम कर्म - जो केवल कामना व फल की इच्छा को लेकर ही किये जाते हैं | यदि धन के लिए कर्म किया जाता है तो उसे [ कर्ता को ] पल पल में धन की ही स्मृति होती है | धन मिलने पर [ सिद्धि में ] वह हर्षित होता है , न मिलने पर [ असिद्धि में ] वह दु:खीराम होता है | लोभ के कारण उसका पतन भी हो सकता है और वह निषिद्ध कर्मों में प्रवृत हो जाता है |

[ २ ] निष्काम - कर्म - इसमें उसके मन में किसी प्रकार की कामना नहीं रहती , वह फल की इच्छा को छोड़कर , आसक्ति रहित होकर कर्म करता है , जैसे एक पिता अपनी पुत्री का पालन - पोषण , विवाह आदि करता है |

निष्काम कर्म करने वाले का लक्ष्य / उद्देश्य केवल " परमात्मा की प्राप्ति " ही रहता है | तथा सिद्धि - असिद्धि में उसे हर्ष - शोक , विकार नहीं होते | निष्काम कर्म में बीज का नाश नहीं होता और न ही इसका उल्टा फल होता है | अर्थात इसके थोड़े से अनुष्ठान से भी जन्म - मरण के भय से मुक्ति मिल जाती है |

रविवार, 29 जुलाई 2012

पहली रोटी गाय को खिलाएं, क्योंकि..

गाय हिंदु धर्म में पवित्र और पूजनीय मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार गौसेवा के पुण्य का प्रभाव कई जन्मों तक बना रहता है। इसीलिए गाय की सेवा करने की बात कही जाती है।

पुराने समय से ही गौसेवा को धर्म के साथ ...ही जोड़ा गया है। गौसेवा भी धर्म का ही अंग है। गाय को हमारी माता बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि गाय में हमारे सभी देवी-देवता निवास करते हैं। इसी वजह से मात्र गाय की सेवा से ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही गौमाता की भी पूजा की जाती है। भागवत में श्रीकृष्ण ने भी इंद्र पूजा बंद करवाकर गौमाता की पूजा प्रारंभ करवाई है। इसी बात से स्पष्ट होता है कि गाय की सेवा कितना पुण्य का अर्जित करवाती है। गाय के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए कई घरों में यह परंपरा होती है कि जब भी खाना बनता है पहली रोटी गाय को खिलाई जाती है। यह पुण्य कर्म बिल्कुल वैसा ही जैसे भगवान को भोग लगाना। गाय को पहली रोटी खिला देने से सभी देवी-देवताओं को भोग लग जाता है।

सभी जीवों के भोजन का ध्यान रखना भी हमारा ही कर्तव्य बताया गया है। इसी वजह से यह परंपरा शुरू की गई है। पुराने समय में गाय को घास खिलाई जाती थी लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी है। जंगलों कटाई करके वहां हमारे रहने के लिए शहर बसा दिए गए हैं। जिससे गौमाता के लिए घास आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती है और आम आदमी के लिए गाय के लिए हरी घास लेकर आना काफी मुश्किल कार्य हो गया है। इसी कारण के चलते गाय को रोटी खिलाई जाने लगी है।

प्रभावशाली व्यक्तित्व

प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी को कभी भी असफलता का मुख नहीं देखना पड़ता, वे आसानी के साथ दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं तथा उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं..मनुष्य की पहचान उसके व्यक्तित्व से ही होती है..नीचे कुछ बातें हैं जिनकी सहायता से हम अपने व्यक्तित्व का विकास करके स्वयं को प्रभावशाली बना सकते हैं !!

(1) दूसरों के प्रति स्वयं का व्यवहार- 
दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करें। याद रखें कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है।

दूसरों में जो भी अच्छे गुण हैं उनकी ईमानदारी के साथ दिल खोल कर प्रशंसा करें। झूठी प्रशंसा कदापि न करें। यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें। किसी की निन्दा करके आपको कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता उल्ट आप उसकी नजरों गिर सकते हैं।

अपने सद्भाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करें।

सभी को पसंद आने वाला व्यक्तित्व

दूसरों में वास्विक रुचि लें। यदि आप दूसरों में रुचि लेंगे तो दूसरे भी अवश्य ही आप में रुचि लेंगे।

दूसरों को सच्ची मुस्कान प्रदान करें।

प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसका नाम सर्वाधिक मधुर, प्रिय और महत्वपूर्ण होता है। यदि आप दूसरों का नाम बढ़ायेंगे तो वे भी आपका नाम अवश्य ही बढ़ायेंगे। व्यर्थ किसी को बदनाम करने का प्रयास कदापि न करें।

अच्छे श्रोता बनें और दूसरों को उनके विषय में बताने के लिये प्रोत्साहित करें।

दूसरों की रुचि को महत्व दें तथा उनकी रुचि की बातें करें। सिर्फ अपनी रुचि की बातें करने का स्वभाव त्याग दें।

दूसरों के महत्व को स्वीकारें तथा उनकी भावनाओं का आदर करें।

(2) अपने सद्विचारों से दूसरों को जीतें
तर्क का अंत नहीं होता। बहस करने की अपेक्षा बहस से बचना अधिक उपयुक्त है।

दूसरों की राय को सम्मान दें। ‘आप गलत हैं’ कभी भी न कहें।

यदि आप गलत हैं तो अपनी गलती को स्वीकारें।

सदैव मित्रतापूर्ण तरीके से पेश आयें।

दूसरों को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दें।

दूसरों को अनुभव करने दें कि आपकी नजर में उनकी बातों का पूरा पूरा महत्व है।

घटनाक्रम को दूसरों की दृष्टि से देखने का ईमानदारी से प्रयास करें।

दूसरों की इच्छाओं तथा विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।

दूसरों को चुनौती देने का प्रयास न करें।

(3) अग्रणी बनें: बिना किसी नाराजगी के दूसरों में परिवर्तन लायें
दूसरों का सच्चा मूल्यांकन करें तथा उन्हें सच्ची प्रशंसा दें।

दूसरों की गलती को अप्रत्यक्ष रूप से बतायें।

आपकी निन्दा करने वाले के समक्ष अपनी गलतियों के विषय में बातें करें।

किसी को सीधे आदेश देने के बदले प्रश्नोत्तर तथा सुझाव वाले रास्ते का सहारा लें।

दूसरों के किये छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें।

आपके अनुसार कार्य करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करें।

-वृक्ष गंगा अभियान

नादिरशाह फकीर के पास गया। वहाँ उसने देखा कि परिंदे भी हैं, पानी भी हैं, अन्न भी हैं, फल भी है। फकीर ने उसके मन को पढ़ा और कहा कि परिंदों के कारण यहाँ अन्न-जल है। तुम इनसान जिंदा हो तो मात्र परिंदो के कारण। तुम्हारी क्रूरता ने, जल्लादी व्यवहार ने तो परिंदो को भी खतम कर दिया और वृक्ष भी समाप्त हो गए। 

आज पेड़ कट रहे है। परिंदे हमारे लिए पुण्य एकत्र करते हैं, वृक्षों की छाया में मात्र निवास चाहते है। पर हम उनका बसेरा उजाड़ रहे है। पथिकों को छाया, परिंदो को बसेरा, हमें फल-भोजन जंगलों से ही मिलते है। क्या हम समझेंगे कि वृक्षारोपण करने से ही हमारी भविष्य की पीढ़ी सुरक्षित रहेगी। इनसान व प्रकृति के बीच बड़ा सूक्ष्म आध्यात्मिक संबंध है। वह हमें जिंदा रखना है तो जंगल बचाने का-वृक्षों को लगाने का अभियान-वृक्ष गंगा अभियान लोकप्रिय बनाना होगा। 

अखण्ड ज्योति जुलाई 2011

बच्चों को उत्तराधिकार में धन नहीं, गुण दें


(प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश )

सुख का निवास सदगुणों में है, धन-दौलत में नहीं | जो धनी है और साथ में दुर्गुणी भी, उसका जीवन दुःखों का आगार बन जाता है | दुर्गुण एक तो यों ही दुःख के स्रोत होते हैं फिर उनको धन-दौलत का सहारा मिल जाये तब तो वह आग जैसी तेजी से भड़क उठते हैं जैसे हवा का सहारा पाकर दावानल| मानवीय व्यक्तित्व का पूरा विकास सदगुणों से ही होता है | निम्नकोटि के व्यक्तित्व वाला मनुष्य उत्तराधिकार में पाई हुई सम्पत्ति को शीघ्र ही नष्ट कर डालता है और उसके परिणाम में न जाने कितना दुःख, दर्द, पीड़ा, वेदना, ग्लानी, पश्चाताप और रोगपाल लेता है |

जो अभिभावक अपने बच्चों में गुणों का विकास करने की ओर से उदासीन रहकर उन्हें केवल, उत्तराधिकार में धनदौलत दे जाने के प्रयत्न तथा चिंता में लगे रहते हैं वे भूल करते हैं | उन्हें बच्चों का सच्चा हितैषी भी कहा जा सकना कठिन है | गुणहीन बच्चों को उत्तराधिकार में धन-दौलत दे जाना पागल को तलवार दे जाने के समान है | इससे वह न केवल अपना ही अहित करेगा बल्कि समाज को भी कष्ट पहुँचायेगा | यदि बच्चों में सदगुणों का समुचित विकास न करके धन-दौलत का अधिकारी बना दिया गया और यह आशा की गई की वे इसके सहारे जीवन में सुखी रहेंगे तो किसी प्रकार उचित न होगा | ऐसी प्रतिकूल स्थिति में वह सम्पत्ति सुख देने में तो दूर उलटे दुर्गुणों तथा दुःखों को ही बढ़ा देगी |

यही कारण तो है कि गरीबों के बच्चे अमीरों की अपेक्षा कम बिगड़े हुए दीखते हैं | गरीब आदमियों को तो रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना होता है | शराबखोरी, व्याभिचार अथवा अन्य खुराफातों के लिए उनके पास न तो समय होता है और न फालतू पैसा | निदान वे संसार के बहुत से दोषों से आप ही बच जाते हैं | इसके विपरीत अमीरों के बच्चों के पास काम तो कम और फालतू पैसा व समय ज्यादा होता है जिससे वे जल्दी ही गलत रास्तों पर चलते हैं | इसलिए आवश्यक है कि अपने बच्चों का जीवन सफल तथा सुखी बनाने के इच्छुक अभिभावक उनको उत्तराधिकार में धन-दौलत देने की अपेक्षा सदगुणी बनाने की अधिक चिंता करें | यदि बच्चे सदगुणी हों तो उत्तराधिकार में न भी कुछ दिया जाये तब भी वे अपने बल पर सारी सुख-सुविधाएँ इक्ट्ठी कर लेंगे | गुणी व्यक्ति को धन-सम्पती के लिए किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती |

१ बच्चों को उत्तराधिकार में धन नहीं गुण दें 
२ शिशु निर्माण में अभिभावकों का उत्तरदायित्व 
३ संतान पालन की शिक्षा भी चाहिए 
४ बच्चे घर की पाठशाला में 
५ शांति स्नेह और सौम्यता के प्यासे बालक 
६ बालकों का समुचित विकास आवश्यक 
७ बच्चों का पालन पोषण कैसे करें ? 
८ बालकों का विकास इस तरह होगा 
९ बालकों के निर्माण में माता का हाथ 
१० बच्चों को डराया न करें 
११ बच्चों में अच्छी आदतें पैदा कीजिये 
१२ बच्चों को सभ्य और सामाजिक बनाइए 
१३ बच्चे झगडालू क्यों हो जाते हैं ? 
१४ बच्चों को हठी न होने दीजिए 
१५ बच्चों को अनुशासन कैसे सिखाया जाए ? 
१६ बच्चों के मित्र बनकर उन्हें व्यवहार कुशल बनाएँ 
१७ बच्चों को व्यवहार कुशल बनाइये 
१८ बालकों के निर्माण का आधार 
१९ बालकों के निर्माण का आधार 
२० बालकों की शिक्षा में चरित्र निर्माण का स्थान 
२१ किशोरों के निर्माण में सावधानी बरती जाए 
२२ बच्चों की उपेक्षा न कीजिए 
२३ बाल अपराध की चिंता जनक स्थिति 
२४ बाल अपराध बढे तो राष्ट्र गिर जाएगा 
२५ बच्चे अपराधी क्यों बनते है ? 
२६ बालकों को अपराधी बनाने वाला अपराधी समाज 
२७ क्या दंड से बच्चे सुधरते हैं ? 
२८ बच्चों को दंड नहीं दिशाएँ दें

दुख क्या हैं ?

इच्छाएं दरिद्र बनाती हैं। उनसे ही याचना और दासता पैदा होती हैं। फिर, उनका कोई अंत भी नहीं हैं। जितना उन्हे छोड़ो, उतना ही व्यक्ति स्वतंत्र और समृद्ध होता हैं। जो कुछ भी नहीं चाहता हैं, उसके स्वतंत्रता अनंत हो जाती है। 


एक सन्यासी के पास कुछ रूपये थे। उसने कहा कि वह उन्हें किसी गरीब आदमी को देना चाहता हैं। बहुत से गरीब लोगों ने उसे घेर लिया और उससे रूपयों की याचना की। उसने कहा, मैं अभी देता हूँ - मैं अभी उसे रूपये दिए देता हूं जो इस जगत मे सबसे ज्यादा गरीब और भूखा हैं। यह कहकर सन्यासी भीतर गया। तभी लोगों ने देखा कि राजा की सवारी आ रही है। वे उसे देखने में लग गए। इसी बीच सन्यासी बाहर आया और उसने अपने रूपये हाथी पर बैठे राजा के पास फेंक दिए। राजा ने चकित हो, इसका कारण पूछा, फिर लोगो ने भी कहा कि आप तो कहते थे कि मैं रूपये सर्वाधिक दरिद्र व्यक्ति को दूंगा। सन्यासी ने हँसते हुए कहा-मैंने उन्हे दरिद्रतम व्यक्ति को ही दिया हैं। वह जो धन की भूख में सबसे आगे हैं, क्या सर्वाधिक गरीब नही हैं ?

दुख क्या हैं ? कुछ पाने की और कुछ होने की आकांक्षा ही दुःख हैं। दुख कोई नहीं चाहता, लेकिन आकांक्षाएं हो तो दुख बना ही रहेगा। किंतु, जों आकांक्षाओं के स्वरूप को समझ लेता हैं, वह दुख से नहीं, आकांक्षाओ से ही मुक्ति खोजता हैं। जब हम इच्छाओं और आकांक्षाओं के घेरे से बाहर आ जाते हैं तो दुख अपने आप दूर हो जाते हैं। और दुख के आगमन का द्वार अपने आप ही बंद हो जाता है। 

-ओशो

आत्मिक तृप्ति का आधार

संसार के प्रमुख दार्शनिकों का मत है कि जीव की स्वाभाविक इच्छा और अभिलाषा आत्मिक उन्नति की है। भौतिक सुविधाओं को लोग इकट्ठा करते हैं, इन्द्रियों के विष भोगते हैं, पर बारीक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि ये सब कार्य भी आत्मिक तृप्ति के लिये किये जाते है। यह दूसरी बात है कि धुँधली दृष्टि होने के कारण लोग नकल को ही असल समझ बैठें। आपने बड़े परिश्रम से धन इकट्ठा किया है, किन्तु विवाह मे उसे बड़ी उदारता के साथ खर्च कर देते है। उस दिन एक पैसे के लिये प्राण दिये मरते थे, आज आप अशर्फिया क्यों लूटा रहे है? इसलिये कि आज आप धन संचित रखने की अपेक्षा उसे खर्च कर डालने में अधिक सुख का अनुभव करते हैं। डाकू जिस धन का जान हथेली पर रखकर लाया था, उसे मदीरा पीनें में इस तरह क्यों उड़ा रहा है? इसलिये कि वह मदीरा पीने के आंनद को धन जोड़ने की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। बीमारी में धर्म कार्यो मे, या अन्य बातों पर काफी पैसा खर्च हो जाता है, किन्तु मनुष्य कुछ भी रंज नही करता है। यही पैसा यदि चोरी मे चला जाता है तो उसे बड़ा दुख होता है। इन उदाहरणों से आप देखते है कि जिनका अमूल्य धन-संचय में खर्च हुआ जा रहा है। वे अपने उस जीवन रस को भी एक समय बड़ी लापरवाही के साथ उड़ा देते है। ऐसा इसलिये होता है कि उन खर्चीले कामों में आदमी अधिक आंनद का अनुभव करता है।

अखण्ड ज्योति जून 1980 पृष्ठ 16

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

Mahatma Anand Swami and the Rich Man

Once, a wealthy man came to Mahatma Anand swami. He was the owner of several factories. All his sons were pursuing the business well. His wife had passed away previously. In spite of prosperity all around, his heart was not at peace. His hunger and sleep had gone. He humbly intimated his distress and ailment to the great saint.

Mahatma Anand swami said, “In your life, you did give importance to action and labor but not to the emotions. Good company and hearing religious discourses only nourish the thoughts.

Now start giving away love, money and labor in order to remove the inner dryness. Give affection to all, go among the orphans and the poor, help them to be self-reliant. Put your physical efforts also in these noble works, as much as you can. Then see that your hunger will be returned to you and you will have a sound sleep.”

The rich man did accordingly and consequently the miraculous transformation, that he experienced, gave him a great peace and happiness which he had never experienced before.

Pragya Puran, Part-I, Page 143. 

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

पैसों से जुड़ी ये चाणक्य नीति ध्यान रखें, मालामाल रहेंगे...

पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति को जीवन में सुख और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ पानी उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

All religions are same!!!



All religions are same!!!
We have 26 alphabets in English,
as given below?

 A  B  C  D  E  F  G H   I  J   K    L   M    N   O   P   Q   R
1   2   3  4   5   6   7  8  9  10  11  12  13  14  15  16  17  18
S   T     U   V   W    X     Y     Z
19  20   21  22   23   24   25  26 

With each alphabet getting a number, in chronological order, as above, study the following, and bring down the total to a single digit and see the result yourself.

Hindu
S  h  r  e  e   K  r  i  s  h  n  a
19+8+18+5+5+11+18+9+19+8+14+1=135=9

M u s l i m
M  o  h  a  m  m  e  d
13+15+8+1+13+13+5+4=72=9

Jain
M a h a v  i  r
13+1+8+1+22+9+18=72=9

Sikh
G  u  r  u   N  a  n  a  k
7+21+18+21+14+1+14+1+11=108=9
Parsi
Z  a  r  a  t  h  u  s  t  r a
26+1+18+1+20+8+21+19+20+18+1=153=9

Buddhist
G  a   u  t  a  m
7+1+21+20+1+13=63=9 

Christian
Esa Messiah
5+19+1+13+5+19+19+9+1+8=99=18=9

 Each one ends with number 9

THAT IS NATURE’S CREATION. 
That all religions are same!!!

Amazing!!
 YET MAN FIGHTS WITH MAN, ON RELIGIOUS ISSUES???

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

श्री गायत्री चालीसा


ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ 
शान्ति, क्रान्ति, जाग्रति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥

जगत जननी, मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम । 
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
------------
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। 
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥ 

अक्षर चौविस परम पुनीता। 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। 
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥ 

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। 
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥ 

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥ 

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। 
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। 
निराकार की अद्भुत माया॥७॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। 
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। 
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥ 

चार वेद की मात पुनीता। 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥ 

महामन्त्र जितने जग माहीं। 
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। 
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। 
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। 
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। 
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। 
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। 
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। 
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी। 
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई। 
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। 
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥ 

दारिद मिटै कटै सब पीरा। 
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥ 

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। 
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥ 

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। 
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥ 

भूत पिशाच सबै भय खावें। 
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई। 
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी। 
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। 
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। 
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। 
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। 
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें। 
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। 
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना। 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥ 
------------
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥ 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

Guruji-Mataji...

Revered Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharya 
(A seer-sage and a visionary of the New Golden Era)

Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharyas personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. His life and work represent a marvelous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius.

He pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion, relevant in the challenging circumstances of the present times.

He successfully practiced and mastered the highest kinds of sadhanas of Gayatri and Savitri. He also practiced higher-level sadhanas on the arduous heights of Himalayas several times and had established enliven contact with Rishis (Sages) of Himalayas.

His volumes on Gayatri Mahavigyan (Super Science of Gayatri) stand as most authentic and comprehensive treatise on the philosophy and science of the great Gayatri Mantra.

He initiated programs of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status.

Revered Mata Bhagwati Devi Sharma (Mataji)

Born on September 1926, in a famous priestly family, Mata Bhagwati Devi (Vandaniya Mataji), was extraordinary in her own way and unlike other children, was not interested in regular childhood activities such as playing, etc. Instead, she was more interested in worshiping God. She spent most of her time in singing devotional songs. Her favorite pastime was to make the offering of the Bilva tree leaves at the idol of Lord Shiva, and write OM NAMAH SHIVAYA.

During the early stages of her education, she studied Bhagwad Gita, and Ram Charit Manas. After her marriage to Pandit Shriram Sharma Acharya (Gurudev), Mataji took over the responsibility of looking after visitors and guests. She willingly donated all her personal jewelry, which she received at her wedding, to Gurudevs Yug Nirmaan Yojanaa (Movement for the Recreation of the Era) for establishment of Gayatri Tapobhoomi at Mathura.

In 1975, under the leadership of Mataji, Mahilaa Jaagaran Abhiyaan (Movement for Emancipation of Women) was initiated. Soon, about 4000 branches of Mahilaa Jaagaran Abhiyaan were established with more than one million active participants. Its work was not limited to mere slogan-raising, but also womens education, economic self-support, sacramental rites, acquiring self-respect, abolition of dowry and fight against the discrimination of women.

जब भी कोई आपके पैर छुए तो जरूर करें ये दो काम, क्योंकि...

हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है। जिन लोगों के पैर छुए जाते हैं उनके लिए शास्त्रों में कई नियम भी बनाए हैं। यदि कोई आपके पैर छुता है तो आपको क्या करना चाहिए, जानिए...

उम्र में बड़े लोगों के पैर छुने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छुने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं। जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए।

जब भी कोई आपके पैर छुता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छुने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। आशीर्वाद देने से पैर छुने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र बढ़ती है।

किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए?
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गायत्री स्तोत्र


सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं 
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां 
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां 
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं 
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

श्रीराम शर्मा आचार्य विरचित गायत्री महाविज्ञान से

चन्द्रायण व्रत क्या है ?

जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है।

इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है। इस व्रत में व्यक्ति अपनें खानें को १६ हिस्सों में विभाजित करतें है।

प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।

अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।

अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन की मात्रा में १६ वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
व्रत के साथ साथ गायत्री का अनुष्ठान भी चलता रहता है।

कौन कर सकता है या किसे करना चाहिये? 
उस व्यक्ति को जिसे अपना स्वास्थ्य ठीक करना हो, उस व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिये। 

कब व कहां कर सकते है? 
पूर्णमासी से पूर्णमासी तक किसी भी मौसम में कर सकतें है। अत्यधिक शारीरिक श्रम वाले दिनों इसे नही करना चाहिये।
स्थान घर का एक कमरा भी हो सकता है और कोई अन्य सुविधा युक्त स्थान । पर स्थान का चयन करने पर वातावरण की शान्ति और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। 

शारीरिक व आध्यात्मिक महत्व क्या है ? 
- शरीर की शुद्धि होती है।
- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, रोग निवारक शक्ति बढ़ती है।
- आहार विहार शुद्ध होने से मन स्वच्छ बनता है।
- गायत्री अनुष्ठान का साथ होने से आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है और मानव सत्कार्यो की और प्रवृत्त होता है।

इस व्रत को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया ? 
हमारे पूज्य गुरूदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसका प्रयोग स्वयं पर तथा अपने रूग्ण शिष्यों पर किया और अनुभव किया कि यह व्रत मानसिक व शारीरिक स्वस्थता के लिये परम उपयोगी है। उन्होने पाया कि यह व्रत शरीर का कायाकल्प कर देता है।

केवल गायत्री परिवार ही नही स्वास्थ्य को महत्व देने वाले लगभग सभी आश्रमों ने इस व्रत को अपना रखा है। 

प्रज्ञा पुराण कथा क्या है ?

किसी भी अच्छी बात को सिखाने-बताने के लिये कथा-कहानियों का आश्रय लिया जाता है ।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने १८ पुराण लिख कर वेद-उपनिषदों की शिक्षाओं को पुराणों के रूप में उतारा है ।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्री राम शर्मा आचार्य जी ने भी व्यास जी की तरह १९ वां पुराण लिख दिया है जिसमें समझाया है कि ईश्वर पुत्र होने पर भी मनुष्य क्यों दुःखी रहता है, उस दुःख को कैसे दूर कर सकता है। पुराण के अनुसार आचरण करने से मानव मे देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग आयेगा।

कथा कराने में कितना समय लगता है ? 
कथा को यदि सार्वजनिक रूप से दृष्टान्त सहित समझाने का आयोजन किया जाय तो एक माह भी लग सकता है। किन्तु प्रायः सात - आठ दिनों में इसे निम्न प्रकार सम्पन्न कर लेते है।

लोक कल्याण(प्रथम) खण्ड - २ दिन
महामानव-देवमानव (द्वितीय) खण्ड - २ दिन
परिवार (तृतीय) खण्ड - २ दिन
देव संस्कृति (चतुर्थ) खण्ड - २ दिन 

प्रज्ञा पुराण कथा कौन करा सकता है ? कब और कहां करा सकता है ? कौन कह सकता है ?

यही प्रश्ननारद मुनि जी ने भगवान विष्णु से एक कथा में पूछा था।
प्रश्न के ऊत्तर में भगवान नें कहा कि - जिसमें श्रद्धा और विश्वास हों, जिस किसी को अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना हों और जो पाप मुक्त होना चाहता हो वह भक्त इस कथा को कहीं भी अवकाश (फुर्सत) के क्षणों में कथा करायें और सुने।

कोई भी विद्यावान - पढा लिखा व्यक्ति जो कथा को रोचक ढंग से, दृष्टान्तों के साथ सुना सकने में सक्षम हों और स्पष्ट वाणी वाला व्यक्ति कथा कह सकता हैं। 

प्रज्ञा पुराण कथा को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया है ?
गायत्री परिवार का एक उद्देश्य यह भी है- धर्म तंत्र से लोक शिक्षण, इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसे अपनाया हैं। 

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