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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

श्री गायत्री चालीसा


ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ 
शान्ति, क्रान्ति, जाग्रति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥

जगत जननी, मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम । 
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
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भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। 
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥ 

अक्षर चौविस परम पुनीता। 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। 
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥ 

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। 
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥ 

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥ 

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। 
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। 
निराकार की अद्भुत माया॥७॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। 
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। 
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥ 

चार वेद की मात पुनीता। 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥ 

महामन्त्र जितने जग माहीं। 
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। 
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। 
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। 
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। 
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। 
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। 
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। 
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी। 
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई। 
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। 
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥ 

दारिद मिटै कटै सब पीरा। 
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥ 

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। 
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥ 

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। 
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥ 

भूत पिशाच सबै भय खावें। 
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई। 
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी। 
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। 
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। 
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। 
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। 
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें। 
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। 
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना। 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥ 
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यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥ 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 7 मार्च 2011

हम गायत्री माँ के बेटे

हम गायत्री माँ के बेटे, तुम्हें जगाने आये हैं । 
जाग उठो भारत के वीरो, तुम्हें जगाने आये हैं॥ 

एक बनेंगें नेक बनेंगे, प्यार बढ़ाने आये हैं । 
तपोभूमि मथुरा के नारे , तुम्हें सुनाने आये हैं॥ 
हम सुधरेंगे युग बदलेगा, यही बताने आये हैं । 
ऊँच - नीच और जाति-पाँति का, भेद मिटाने आये हैं॥ 

गायत्री के महामंत्र की, महिमा गाने आये हैं । 
युग निर्माण योजना का, संदेश सुनाने आये हैं॥ 
विश्वधर्म को निर्मित करने, नई प्रेरणा लाये हैं । 
हर मानव में सद्बुद्घि का ,दीप जलाने आये हैं॥ 
अत्याचार का अंत करेंगे, लोभ मिटाने आये हैं । 
कुरीतियाँ और पाखण्डों को, जड़ से मिटाने आये हैं॥ 

नया उजाला नई रोशनी,जग में लेकर आये हैं । 
अनाचार के अंधकार को,जड़ से मिटाने आये हैं॥ 
ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल, तुम्हें थमाने आये हैं । 
श्रीराम शर्मा जी का, संदेश सुनाने आये हैं॥ 
हम गायत्री माँ के बेटे, तुम्हें जगाने आये हैं । 

जागेगा इन्सान जमाना देखेगा

जागेगा इन्सान जमाना देखेगा । 
नवयुग का निर्माण जमाना देखेगा॥ 

देवता बनेंगे मेरे , धरती के प्यारे । 
हम सुधरें तो , जग को सुधारें॥ 
चमकेगा देश हमारा , मेरे साथी रे । 
आँखों में कल का नजारा, मेरे साथी रे॥ 
धरती पे भगवान् , जमाना देखेगा॥ 

मिलजुल के होंगे सारे, खुशियों के मेले । 
कोई न रो पायेगा, दुख में अकेले । । 
जागेगा देश हमारा, मेरे साथी रे । 
आँखों में कल का नजारा, मेरे साथी रे । 
कल का हिन्दुस्तान जमाना देखेगा । 
जागेगा...........................................॥ 

हम बदलेंगे, युग बदलेगा

हम बदलेंगे, युग बदलेगा, यह संदेश सुनाता चल । 
आगे कदम बढ़ाता चल, बढ़ाता चल, बढ़ाता चल॥ 

अंधकार का वक्ष चीरकर ,फूटे नव प्रकाश निर्झर । 
प्राण-प्राण में गूँजे शाश्वत,सामगान का नूतन स्वर॥ 
तुम्हें शपथ है हृदय हृदय में,स्वर्णिम दीप सजाता चल । 
स्नेह सुमन बिखराता चल तू, आगे कदम बढ़ाता चल॥ 

पूर्व दिशा में नूतन युग का, हुआ प्रभामय सूर्य उदय । 
देव दूत आया धरती पर, लेकर सुधा पात्र अक्षय॥ 
भर ले सुधा पात्र तू अपना, सबको सुधा पिलाता चल । 
शत-शत कमल खिलाता चल तू, आगे कदम बढ़ाता चल॥ 

ओ,नवयुग के सूत्रधार,अविराम सतत बढ़ते जाओ । 
हिमगिरि के ऊँचे शिखरों पर,स्वर्णिम केतन फहराओ॥ 
मंजिल तुझे अवश्य मिलेगी,गीत विजय के गाता चल । 
नव चेतना जगाता चल तू, आगे कदम बढ़ाता चल॥ 

गायत्री आरती

जयति जय गायत्री माता , जयति जय गायत्री माता । 
आदि शक्ति तुम अलख- निरंजन जग पालन कर्त्री॥ 
दुःख शोक,भय-क्लेश कलह,दारिद्रय दैन्य हर्त्री॥ जयति..॥
 
ब्रह्मरूपिणी प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे । 
भवभय हारी जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥ जयति...॥
 
भय हारिणि भव तारिणि अनघे , आनन्द राशी । 
अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले अविनाशी॥जयति..॥ 

कामधेनु सत् चित् आनन्दा , जय गंगा गीता॥ 
सविता कि शाश्वती शक्ति तुम, सावित्री सीता॥ जयति..॥ 

ऋग,यजु,साम अथर्व प्रणयनी, प्रणव महामहिमे । 
कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्ना, शोभागुण गरिमे॥ जयति...॥ 

स्वाहा स्वधा शची ब्रह्माणी, राधा रूद्राणी । 
जय सतरूपा, वाणी, विद्या,कमला कल्याणी॥ जयति..॥ 

जननी हम हैं दीन-हीन ,दुख दारिद के घेरे । 
यद्यपि कुटिल कपटी कपूत तऊ, बालक हैं तेरे॥ जयति..॥ 

स्नेह सनी करूणामयि माता , चरण शरण दीजै । 
बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे,दया दृष्टि कीजै॥ जयति..॥ 

काम, क्रोध, मद लोभ,दम्भ, दुर्भाव ,द्वेष हरिये । 
शुद्घ बुद्घि निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥ जयति..॥ 

तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि पुष्टि त्राता । 
सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता ॥ जयति..॥

इतने रतन दिये हैं कैसे

इतने रतन दिये हैं कैसे , जिससे देश महान् है । 
भारत की परिवार व्यवस्था, ही रतनों की खान है । 

इसी खान के रतनों के, इतिहास चाव से पढ़े गये । 
अध्यायों की अँगूठियों में, यही नगीने जड़े गये॥ 
सजे हुए हैं यही रतन तो , जन मंगल के थाल में । 
दमक रहे हैं ये हीरे ही, मानवता के भाल में 
इसी खान के रतनों की तो, सदा निराली शान है॥ 

इसी खान में ध्रुव निकले थे, माँ ने उन्हें संवारा था । 
इस हीरे को नारद जी ने, थोड़ा और निख्रारा था 
तप की चमक लिये जा बैठा, परम पिता की गोद में । 
कितनों का बचपन कट जाता, है आमोद प्रमोद में॥ 
नभ में ध्रुव परिवार कीर्ति का शाश्वत अमर निशान है॥ 

जाना था बनवास राम को, लक्ष्मण सीता साथ गये । 
कीर्तिमान स्थापित सेवा, स्नेह त्याग के किये नये॥ 
सौतेली माँ का मुख उज्ज्वल, किया सुमित्रा माता ने । 
था सोहार्द सगे भाई से, ज्यादा भ्राता भ्राता में॥ 
वह संस्कारित परिवारों का, ही अनुपम अनुदान है॥ 

ऐसे ही परिवार चाहिए, फिर से नव निर्माण को । 
जहाँ देव संस्कार मिले, धरती के इन्सान को॥ 
राम-भरत का स्नेह चाहिए, घर-घर कलह मिटाने को । 
दशरथ जैसा त्याग चाहिए, राष्ट्र धर्म अपनाने को॥ 
हो परिवार जहाँ नन्दनवन, वह भू, स्वर्ग समान है॥ 

- माया वर्मा 

दुनियाँ आगे बढती जाए

दुनियाँ आगे बढती जाए , रहे क्यों पिछे नारी रे । 
रहे क्यों पिछे नारी रे, रहे क्यों पिछे नारी रे ॥ 

नारियों को आगे आना , 
काम कुछ करके दिखलाना । 
मार्ग उन्नति का अपनाना, 
न बाधाओं से घबराना॥ 
समझ लें मिल-जुलकर हम आज, हमारी जिम्मेदारी रे । 
दुनियाँ आगे बढती जाए........................................ 

करें आओ हम नव निर्माण, 
व्यक्ति का करें चलो उत्थान । 
बनायें अपने को गुणगान, 
करे जग नारी का गुणगान । 
मिले हर नारी को सम्मान , करें इसकी तैयारी रे, 
दुनियाँ आगे बढती जाए........................................ 

अगर सारी बहिनें जागें, 
हमारे सारे दुख भागें । 
नारियाँ आ जायें आगे, 
आज का युग यह ही माँगे॥ 
करें आओ युग का निर्माण, इसी में शान हमारी रे । 
दुनिया आगे बढ़ती जाय, रहे क्यों पिछे नारी रे॥ 

बहुत सो चुकी अब तो जाग

बहुत सो चुकी अब तो जागो, ओ नारी कल्याणी । 
परिवर्तन के स्वर में भर दो, निज गौरव की वाणी॥ 

बन कौशल्या आज देश को, फिर से राम महान् दो । 
और सुनैना बनकर फिर से, सीता-सी संतान दो॥ 
वीर जननि हो तुम संतानें, अर्जुन भीम समान दो । 
भारत माता माँग रही है, वापस उसकी शान दो॥ 
केवल तुम ही बन सकती हो ,नूतन युग निर्माणी । 
बहुत सो चुकी अब तो......................... 

भारत भ्रमित जितने तुलसी हैं, सबको दो ललकार । 
रतनावली तुम्हारा गौरव, तुमको रहा पुकार॥ 
कालिदास सम सोयी प्रतिभा ,सकतीं तुम्हीं निखार । 
महानता की देवी तुमको, जगती रही निहार॥ 
बनो प्रेरणा, राह देखता, जग का प्राणी-प्राणी । 
बहुत सो चुकी अब तो.......................... 

जीजाबाई बनो देश को, वीर शिवा की है फिर चाह । 
सिवा तुम्हारे कौन बताये , बलिदानी वीरों को राह॥ 
जागो अब तो मत होने दो, तुम मानवता को गुमराह । 
वह जौहर दिखलाओ जग के, मुख से बरबस निकले वाह॥ 
नयी सदी की नींव तुम्हीं को है अब तो रखवानी॥ 
बहुत सो चुकी अब तो................................. 

बनो अहिल्याबाई अपनी, आत्म शक्ति फिर दिखलाओ । 
लक्ष्मीबाई बन अनीति का, गर्व चूर कर बतलाओ॥ 
दुर्गावती बनो शासन की, डोर थामने आ जाओ । 
सावित्री बन सत्यवान को, यम से पुनःछुड़ा लाओ॥ 
रच दो अपनी गौरव गरिमा, की फिर नई कहानी । 
बहुत सो चुकी अब तो............................ 

-सुरभि कुलश्रेष्ठ 

यज्ञ महिमा

यज्ञ रूप प्रभो हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए । 
छोड़ देवें छल, कपट को,मानसिक बल दीजिए॥ 

वेद की बोले ऋचाएँ, सत्य को धारण करें । 
हर्ष में हो मग्न सारे ,शोक सागर से तरें॥ 

अश्वमेधादिक रचाएँ, यज्ञ पर उपकार को । 
धर्म मर्यादा चलाकर, लाभ दें संसार को॥ 

नित्य श्रद्घा भक्ति से, यज्ञादि हम करते रहें 
रोग-पीड़ित विश्व के,संताप सब हरते रहें॥ 

कामना मिट जाए मन से, पाप अत्याचार की । 
भावनाएँ शुद्घ होवें, यज्ञ से नर- नारि की॥ 

लाभकारी हो हवन, हर जीवधारी के लिए । 
वायु, जल सर्वत्र हों, शुभ गंध को धारण किए॥ 

स्वार्थ भाव मिटे हमारा, प्रेम-पथ विस्तार हो । 
इदं न मम् का सार्थक, प्रत्येक में व्यवहार हो॥ 

हाथ जोड़ झुकाये मस्तक वंदना हम कर रहे । 
नाथ करूणा रूप करूणा, आपकी सब पर रहे॥ 

यज्ञ रूप प्रभो हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए॥ 

यन्मण्डलम्

यन्मण्डलं दीप्तिकरं विशालम्, रतनप्रभं तीव्रमनादि रूपम् । 
दारिद्रय दुःख क्षय कारणं च, पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यं॥ 

यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितम्, विपैः स्तुतं मानवमुक्ति कोविदम् । 
तं देव देवं प्रणमामि भर्गं, पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम्॥ 

यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं, त्रैलोक्य पूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् । 
समस्त तेजोमय दिव्य रूपम् पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम्॥ 

यन्मण्लं वेदविदोपगीतं, यद्योगिनां योगपथानुगम्यम् । 
तत्सर्ववेदं प्रणमामि दिव्यं, पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम्॥ 

देवियाँ देश की जाग जायें अगर

देवियाँ देश की जाग जायें अगर । 
युग स्वयं ही बदलता चला जायेगा । 
शक्तियाँ जागरण गीत गाएँ अगर । 
हर हृदय ही मचलता चला जायेगा । 

वीर संतान से कोख खाली नहीं । 
गोद में कौन-सी शक्ति पाली नहीं॥ 
जननियाँ शक्ति को साध पायें अगर । 
शौर्य शिशुओं में बढ़ता चला जायेगा । 

मूर्ति पुरुषार्थ में है सदाचार की । 
पूर्ति श्रम से सहज साध्य अधिकार की । । 
पत्नियां सादगी साध पायें अगर । 
पति स्वयं ही बदलता चला जायेगा॥ 

छोड़ दें नारियाँ यह गलत रूढ़ियाँ । 
तोड़ दें अंध विश्वास की बेड़ियाँ॥ 
नारियाँ दुष्प्रथायें मिटायें अगर । 
दम्भ का दम निकलता चला जायेगा॥ 

धर्म का वास्तविक रूप हो सामने । 
धर्म गिरते हुओं को लगे थामने॥ 
भक्तियाँ भावना को सजा लें अगर । 
ज्ञान का दीप जलता चला जायेगा॥ 

यह धरा स्वर्ग सी फिर सँवरने लगे । 
स्वर्ग की रूप सज्जा उभरने लगे॥ 
देवियाँ दिव्य चिंतन जगायें अगर । 
हर मनुज देव बनता चला जायेगा॥ 

माया वर्मा 

बहिनों हो जाओ तैयार


आदिशक्ति तुम वीर प्रसुता, प्रेम मूर्ति साकार । 
दुष्प्रवृत्तियों के रावण का, करना है संहार॥ 
बहिनो हो जाओ तैयार । 

उठो समय आमन्त्रण देता, युग करता आह्वान । 
नवल सृजन का समय आ गया, लाओ नया बिहान॥ 
शान्ति-मार्ग को रोके बैठा, अंधकार अज्ञान । 
बनकर ज्ञान सूर्य की किरणें, छेड़ो नव अभियान॥ 
छुआ-छुत का भूत भगाकर, करो देश उद्घार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 

भय कुरीतियों के जंगल में पनप न पाते फूल । 
ज्ञान बिना जीवन के सपने, आज चाटते धूल॥ 
ऊँच-नीच की रची हुई है, छाती पर चट्टान । 
मानवता की फसलें चरता, अहंकार अभिमान॥ 
भेदभाव की जड़ काटो तुम, लेकर शक्ति कुठार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 

परदा बन कलंक का टीका , देता है संताप । 
आज अंधविश्वास बना है, पाप-ताप अभिशाप॥ 
चलो कदम से कदम मिलाकर ,लेकर ज्ञान मशाल । 
आज विश्व में ऊँचा कर दो, भारत माँ का भाल॥ 
अबला नहीं बनो तुम सबला, शक्तिपुज अंगार । 
बहिनो हो जाओ तैयार॥ 
-अज्ञात 

ऐ धरती के रहने वाला

ऐ धरती के रहने वालो, धरती को स्वर्ग बनाना है॥ 
है स्वर्ग कहीं यदि ऊपर तो, उसको इस भू पर लाना है॥ 

है स्वर्ग लोक इस धरती पर, ऊपर अथवा अन्यत्र नहीं । 
तुम उसको यहीं तलाश करो, जाओ न ढुंढने और कहीं ॥ 
अपने पुरूषार्थ प्रयत्नों से , कर दो उसका निर्माण यहीं । 
यह आशा का संदेश तुम्हें, भू मण्डल पर फैलाना है॥ 

पिता-पुत्र, पति-पत्नी भाई, भाई में हो प्यार जहाँ । 
देवरानी और जेठानी में, हो प्रेम पूर्ण व्यवहार जहाँ॥ 
हो सास-बहू भाभी व ननद में, नहीं कभी तकरार जहाँ । 
ऐसे परिवार बना करके, घर-घर में स्वर्ग बुलाना है॥ 

चिंताएँ तजकर लाभ हानि, सब में प्रसन्न रहना सीखो । 
दुख व्यथा विघ्न बाधा संकट, सबको हँस-हँस सहना सीखो॥ 
ईष्र्या व द्वेष को छोड़, प्रेम की धारा में बहना सीखो । 
रोने-धोने को छोड़ मधुर, संगीत सदा ही गाना है॥ 

सम्बंधी मित्र पड़ोसी से, निष्कपट मधुर व्यवहार करो । 
उनके सुख में तुम सुखी बनो, सेवा कर उनके दुःख हरो॥ 
निर्बल सज्जन से डरो सदा, बलवान दुष्ट से भी न डरो । 
सच्चे अर्थों में बन मनुष्य, जीवन आर्दश बिताना है॥ 

जिस ग्राम नगर में वास करो, उसको आर्दश बनाओ तुम । 
दुर्गन्ध गंदगी दूर हटा, विद्या घर-घर फैलाओ तुम॥ 
अज्ञान हटाकर इस जग का, फिर से आलोक जगाना है॥ 
ऐ धरती के रहने वालो, धरती को स्वर्ग बनाना है॥ 

-मंगल विजय 

दयाकर दान भक्ति का

दयाकर दान भक्ति का , हमें परमात्मा देना । 
दया करना हमारी आत्मा में, शुद्घता देना॥ 

हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ । 
हमारे दिल में आकर के , परम ज्योति जगा देना । । 

बहा दे प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर । 
हमें आपस में मिल जुलकर , प्रभु रहना सिखा देना॥ 

हमारा धर्म हो सेवा, हमारा कर्म हो सेवा । 
सदा ईमान हो सेवा, व सेवकचर बना देना॥ 

वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना । 
वतन पर जाँ फिदा करना, प्रभु हमको सिखा देना॥ 

हरो विश्व विपदा श्री राम

हरो विश्व विपदा श्री राम, हे अन्तर्यामी सुखधाम । 

जब-जब विपत्ति धरा पर आई, दुख दर्दों की बदली छाई । 
तब-तब शपथ तुम्हीं ने खाई, और आसुरी वृत्ति जलाई । 
पुनः सम्भालो बिगड़े काम, अजर-अमर हे नाथ अकाम॥ 
हरो विश्व....................॥ 

तुमने ही हर युग में आकर, दमकाया कर्तव्य दिवाकर । 
अर्जुन को संदेश सुनाकर, रची विश्व हित गीता सुखकर॥ 
करते विनय सुबह और शाम, रचो परिस्थितियाँ अभिराम॥ 
हरो विश्व...................॥ 

असुर वृत्तियाँ दूर भगा दो, साहस और विवेक जगा दो । 
नवल सृजन में चित्त लगा दो, सद्गुण की गंगा उमगा दो॥ 
भरो प्रेरणा आठों याम हो समृद्घ नगरी और ग्राम॥ 
हरो विश्व...................॥ 

- बाबूलाल जलज 

आओ आओ सुहागिन नारी

आओ आओ सुहागिन नारि कलश सिर धारण करो । 
आओ सीता लक्ष्मी नारि, कलश सिर धारण करो॥ 

कलश के मुख में विष्णु जी सोहें, 
कंठ में लगकर शंकर सोहें । 
ऐ जी ब्रह्मा सोहें मूलाधार, कलश ....
तेरी चूड़ी अमर हो जाय.....

सात समुद्र का निर्मल जल है, 
सात द्वीप अरू पृथ्वी अंचल है । 
गंगा यमुना की पावन धार,कलश.. ...
तेरो ललना अमर हो जाय, कलश..... 

चारों वेद का ज्ञान भरा है, 
वसुधा और संसार भरा है । 
ये तो मन वांछित दातार , कलश... 
तेरी बिंदिया अमर जो जाय.....

आओ माता बहिनों आओ, 
कलश गीत को मिलकर गाओ । 
ये तो गायत्री सावित्री परिवार कलश.... 
तेरी बिंदिया अमर हो जाय..... 

हे गुरुवर श्रीराम तुम्हारी

देवदूत बनकर आये, तपोपूत तुम कहलाये । 
ऋषि बनकर सबको भाये, नमन तुम्हें शत बार है॥ 

राष्ट्र धर्म में मस्त रहे, जप तप के अभ्यस्त रहे । 
नये सृजन में व्यस्त रहे, जान गया संसार है॥ 

तुमने कार्य महान किया, जगती का कल्याण किया । 
संस्कृति का उत्थान किया, जो युग का उपचार है॥ 

यज्ञ और गायत्री को, सविता को, सावित्री को । 
माता देवी धरित्री को, दिया नया उपहार है॥ 

संस्कृति को विज्ञान से, जीवन को सद्ज्ञान से । 
पौरूष को निर्माण से, जोड़ा सभी प्रकार है । 

वर्ग भेद को दूर किया, अहंकार को चूर किया । 
अनुशासन भरपूर दिया, जग का हुआ सुधार है॥ 

मिटा गये अज्ञान तुम, लुटा गये अनुदान तुम । 
बाँट गये वरदान तुम, यह अद्भूत व्यापार है । 

हे गुरुवर श्री राम तुम्हारी, महिमा अपरम्पार है॥ 

- विरेश्वर उपाध्याय 

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

दान की महिमा

(पं0 श्री देवेन्द्र कुमार जी पाठक ‘अचल’)

दान ही को मान होत, दान ही महान होत,
दान ही से नम्रता, विनम्रता फरत हैं। 
दान से अभाव जात, वैरी दुर्भाव जात,
दान की सुबेलि ही से सुमन झरत है।।

दान ही से ज्ञान होत दान ही से ध्यान होत,
दान ही से द्वेष दम्भ जियत जरत है।
दान ही से हारे देव दान से विजय स्वमेव,
दान द्वारे भोर होत ध्वजा फहरत हैं।।1।।

राखी दान मरजाद डोम के बिकानो हाथ,
मृत पुत्र देख हरीचंद नहीं गीलो है।
कर्र कर्र चीरो अरकसिया चला के पुत्र,
मोरध्वज दृढ़, दान हित गर्वीलो है।।

साढे़ तीन पग भूमि बलि दियो बामन को,
शेष पै नपायो तन अलग हठीलो हैं।
दान-दानी मारग को कहाँ लौं बखान करौं,
सुनत में सूदो चलिबे मे पथरीलो हैं।।2।।

साभार - कल्याण (दानमहिमा अंक-जनवरी 2011)

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

माँ

सहनशीलता में धरती हैं, मन विस्तृत आकाश हैं, 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

माँ से अधिक न प्रेरक होते नए-नए प्रतिमान भी,
मूल्यहीन हैं उसके सम्मुख बड़े-बड़े अनुदान भी, 
माँ के निकट पहुँचकर देखो, जब भी मन असहाय हो,
उस आँचल में थम जाएँगे भीषणतम तूफान भी,

इसके आशीषों में होता ईश्वर का आभास हैं। 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं।

स्नेह उसी ने भरा दीप में, फिर जलने की सीख दी, 
हर विपरीत हवा में निर्भय हो चलने की सीख दी,
वाणी से ही नहीं, आचरण से, अविरल अभ्यास से,
हमें फसल पाने को बीजों-सा गलने की सीख दी,

अपना सब-कुछ उसे त्यागने, देने में उल्लास हैं।
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

ऐसा हैं माहौल कि घर भी लगता अब बाजार हैं, 
कीमत से आँका जाता अब हर नाता, हर प्यार हैं,
मन मरूथल हो गए, सूखता हैं नयनों का नीर भी,
कहीं न मिलती दूर-दूर तक कोई सजल बयार हैं,

इस मौसम में केवल माँ ही सहज-विमल वातास हैं।
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

ऐसी माँ का मन न दुखाना जाने या अनजान में, 
उसे न हीन समझना धन-पद-शिक्षा के अभिमान में,
माँ के मन का एक शब्द भी सरल-सहज आशीष का,
स्वयं परावर्तित हो जाता हैं दैवी वरदान में,

प्राण प्रवाहित करता सबमें माता का हर श्वास हैं। 
अविश्वास की झंझा में माँ ममतामय विश्वास हैं। 

-शचीन्द्र भटनागर
अखण्ड ज्योति सितम्बर 2010

बुधवार, 26 जनवरी 2011

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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