वेदों में सूर्यकिरण चिकित्सा का विवरण बड़े विस्तार से आता है। मत्स्यपुराण कहता हैं कि नीरोगिता की इच्छा हैं तो सूर्य की शरण में जाओ। वेदों में उदित होते सूर्य की किरणों का बड़ा महत्व बताया गया है। अथर्ववेद 17/1/30 में वर्णन आया हैं कि उदित होता सूर्य मृत्यु के सभी कारणों, सभी रोगों को नष्ट कर देता है। इस समय की इन्फ्रारेड किरणों में प्रचुर जीवनीशक्ति होती है। ऋग्वेद 1/50/11 में उल्लेख हैं कि रक्ताल्पता की सर्वश्रेष्ठ औषधि हैं उदित होते सूर्य के दर्शन, ध्यान। हृदय की सभी बीमारियाँ नित्य उगते सूर्य के दर्शन, ध्यान एवं अर्घ से दूर हो सकती है। (अथर्व.1/22/1)
विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 28 जुलाई 2011
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
2 मिनिट का ऐसा योग और गर्मी देगी छोड़
आज पूरी दुनिया में योग की धूम मची हुई है। वह समय चला गया जब योग को हिन्दू धर्म की उपासना पद्धति मानकर अन्य धर्मों के लोग इससे मुंह फेर लेते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। विज्ञान ने भी अब योग को एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानकर इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी है। गर्मियों की लगभग शुरुआत हो चुकी है। बारिश और ठंड की बजाय गर्मियों का सीजन सभी के लिये ज्यादा कठिन और पीड़ादायक होता
है।
योग में एक ऐसी क्रिया है, जिसे करने मात्र 5 से 7 मिनिट लगते हैं तथा इसके करने से गर्मी में भारी राहत मिलती है। यह क्रिया है-शीतली प्राणायाम। आइये देखें इस योगिक क्रिया को कैसे किया जाता है-
शीतली प्राणायाम: पद्मासन में बैठकर दोनों हाथों से ज्ञान मुद्रा लगाएं। होठों को गोलाकार करते हुए जीभ को पाइप की आकृति में गोल बनाएं। अब धीरे-धीरे गहरा लंबा सांस जीभ से खींचें। इसके बाद जीभ अंदर करके मुंह बंद करें और सांस को कुछ देर यथाशक्ति रोकें। फिर दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। इस क्रिया को 20 से 25 बार करें। प्रतिदिन शीतली प्राणायाम करने से अधिक गर्मीं के कारण पैदा होने वाली बीमारियां और समस्याएं नहीं होती। लू लगना, एसिडिटी, आंखों और त्वचा के रोगों में तत्काल आराम मिलता है।
बुधवार, 26 जनवरी 2011
प्रसन्न रहना
प्रसन्न रहना सब प्रकार के रोगों की दवा हैं और प्रसन्न रहने के लिये आवश्यक है अपना जीवन निष्कलुष बनाया जाये। निष्कलुक, निष्पाप, निर्दोष और पवित्र जीवन व्यतित करने वाला व्यक्ति ही सभी परिस्थियों मे प्रसन्न रह सकता है। और यह तो सिद्व हो ही चुका है कि मनोविकारों से बचकर प्रसन्नचित्त मनःस्थिति ही सुदृढ स्वास्थ्य का आधार है।
बुधवार, 12 जनवरी 2011
आहार सुधरिए, आरोग्य सुधरेगा
1. हमारा आरोग्य मन, मस्तिष्क और पेट से जुड़ा हैं। 90 प्रतिशत रोगों का कारण हमारा पेट ही होता हैं। निर्मल विचार मन-मस्तिष्क को प्रसन्न रखते हैं और सात्विक आहार हमारे पेट को।
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2. हम जैसा अन्न खाते हैं वैसा ही हमारा तन-मन होता हैं। सच्चाई तो यह हैं कि आप वैसा ही सोचते हैं, जैसा खाते है। इंसान के खानपान से ही उसके खानदान का पता चलता हैं।
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3. आहार-विहार, शयन-जागरण, भोग और योग संयमित हो तो बेहतर रहता हैं। जो सीमित खाता हैं वह ज्यादा जीता हैं। इसलिए ज्यादा खाकर जल्दी मरने वालों से वह व्यक्ति ज्यादा खा सकता हैं जो कम खाकर ज्यादा जीता है।
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4. कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं, कुछ खाने के लिए जीते हैं। वह भोगी हैं जो खाने के लिए जीता हैं पर जो जीने के लिए संयमित खाता हैं वह योगी हैं।
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5. अन्न प्राण हैं और प्राणदाता हैं पर इसको जरूरत से ज्यादा खा लिया जाए तो यही प्राणहर्ता भी बन जाता हैं।
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6. आहार के चार चरण हैं- उगाना, पकाना, चबाना और पचाना। खेत से लेकर पेट तक होने वाली यह यात्रा अगर स्वस्थ हो तो अपना चिकित्सक व्यक्ति स्वयं होता है।
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7. रसोईघर हमारे स्वास्थ्य का नियंत्रण-कक्ष हैं। कृपया किचन में किच-किच मत कीजिए। अग्निदेव के इस मंगलगृह में घर के सब सदस्य मिलजुल कर भोजन बनाइए और फिर उसे प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण कीजिए।
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8. स्वाद के लिए खाना अज्ञान हैं, जीने की लिए खाना बुद्धिमानी हैं, पर संयम की रक्षा के लिए खाना साधना हैं।
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9. होटल में खाने से बचिए। याद रखिए, जो होटल में खाते हैं उनको होस्पीटल में मरना पड़ता हैं। फिर भी होटल में खाना खाने का मन कर रहा हो तो जहाँ खाना बनता हैं वहाँ जाकर देखिए फिर आप कभी होटल में खाना खाने का नाम भी नहीं लेंगे।
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10. भोजन हमेशा सीधे कमर बैठकर कीजिए। औरों को खिलाकर खाइए और मौनपूर्वक भोजन कीजिए।
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11. भोजन करते समय पेट को चैथाई खाली भी रखिए। कम खाइए, गम खाइए और सुखी रहिए। एक बार योगी खाता हैं दो बार भोगी खाता हैं और बार-बार खाने वाला स्वतः रोगी हो जाता हैं।
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12. शादी-विवाह के भोज में ज्यादा गरिष्ठ भोजन मत कीजिए। उसने भले ही 40 तरह के आईटम बनाए हो पर आप उसमें से 10 का ही उपयोग कीजिए। यह सोचने की बेवकूफी मत कीजिए कि पराया माल मिलना दुर्लभ हैं शरीर तो फिर भी मिल जाएगा।
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13. दोपहर के भोजन बाद भले ही आराम कीजिए पर शाम को भोजन करके जरूर टहल लीजिए। जहाँ तक हो सके रात्रि-भोजन से बचिए, आप जीवन में 100 बीमारियों से बचे रहेंगे।
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14. भोजन में अन्न को आधा कीजिए, शाक-सब्जी को दुगुना लीजिए, पानी तिगुना पीजिए और हँसी को चार गुना कीजिए।
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15. ज्यादा मिर्च-मसाले या तेल-घी वाले भोजन से दूर रहिए जिससे आपकी वृत्ति सात्विक बनी रहेगी।
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16. घर में जो भोजन बना हैं उस पर किसी प्रकार की टिप्पणी मत कीजिए। प्रेम, शांति और आनन्द का भी भोजन के साथ स्वाद लीजिए।
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साभार- संबोधि टाइम्स, संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी
शनिवार, 1 जनवरी 2011
संगीतशास्त्र
गांधर्ववेद (संगीतशास्त्र) में सात स्वरों के शरीर व मन पर प्रभाव के विषय में विस्तृत प्रकाश डाला गया हैं। सा, रे, ग, म, प, ध, नि प्रत्येक स्वर के विशिष्ट प्रभाव हैं। ‘सा’ षडज स्वर हैं। इसका देवता अग्नि हैं। यह पित्तज रोगों का शमन करता हैं। ‘रे’ ऋषभ स्वर हैं। यह शीतल प्रकृति का हैं। इसका देवता ब्रह्मा हैं एवं यह कफ एवं पित्त प्रधान दोनों ही प्रकार के रोगों का नाशक हैं। ‘ग’ गांधार स्वर हैं। इसकी देवी सरस्वती है। यह पित्तज रोगों का शमन करता हैं। ‘म’ मध्यम स्वर हैं। यह शुष्क स्वरूप का हैं तथा इसका देवता महादेव हैं। वात-कफ रोगों का यह शमन करता हैं। ‘प’ पंचम उत्साहपूर्ण प्रकृति का हैं। लक्ष्मी इसकी देवी हैं। यह मूलतः कफ प्रधान रोगों का शमन करता हैं। ‘ध’ धैवत स्वर हैं। इस स्वर की प्रकृति चित्त को प्रसन्न और उदासीन दोनों ही बनाती हैं। इसके देवता गणेश हैं। यह पित्तज रोगों का शमन करता हैं। ‘नि’ निषाद स्वर हैं। इसका स्वभाव ठंडा-शुष्क हैं तथा प्रकृति आह्लादकारी हैं। इसके देवता सूर्य हैं। यह वातज रोगों का शमन करता हैं।
देखा जा सकता हैं कि हमारे ऋषियों द्वारा अनुसंधान किए गए सभी स्वर न केवल चिकित्सा करते हैं, वरन वे वातावरण को भी आंदोलित कर देते हैं।
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
स्वरयोग
स्वरयोग एवं भोजन ग्रहण करने का परस्पर बड़ा महत्वपूर्ण संबंध हैं। कहा गया हैं-
दाहिने स्वर भोजन करे बाएं पीवे नीर।
ऐसा संयम जब करे सुखी रहे शरीर।।
बाएं स्वर भोजन करे दाहिने पीवे नीर।
दस दिना भूला यों करै पावे रोग शरीर।
भोजन या दूध दही तब ही सेवन करे, जब दायां स्वर चल रहा हो। जल ग्रहण करने के समय बायां स्वर चलना चाहिए। इसके विपरीत आचरण से काया रोगी होती है।
सोमवार, 20 दिसंबर 2010
स्वस्थ व्यक्ति
स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा सुश्रुत ने बड़ी सुन्दर एवं व्यवस्थित की हैं। वे कहते हैं-
‘‘स्वस्थ व्यक्ति वह हैं, जिसमें वात-कफ-पित्तादि दोष, त्रयोदश अग्निया (7 धात्वाग्निया, 5 महाभूताग्निया तथा जठराग्नि ), सप्त धातुए सम अवस्था में हो, मल-मूत्रादि का विसर्जन निर्बाध रूप से हो रहा हो, आत्मा, इंद्रिय एवं मन प्रसन्न हो।’’ (सु.सू. 15/41)
अब हम देंखे कि इस परिभाषा के अनुसार हम कहा हैं ?
कितनी कुछ विकृतिया हमारे जीवन मं आ गई हैं ,? वस्तुतः इस आधार पर बिरले ही स्वस्थ होंगे। ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को भी परिभाषित करते हुए कहा गया हैं कि जो सुख-दुख में सम हैं, लौह और स्वर्ण में समान दृष्टि वाला हैं, प्रिय और अप्रिय में धीर हैं, निंदा-स्तुति में बराबर हैं, वही पूर्णतः स्वस्थ है।
पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये।
भारतीय अध्यात्म बड़ी गहरी दृष्टि रखता हैं। विभिन्न धर्मशास्त्र (स्मृतिया) रोगों की उत्पति के विषय में जन्मांतरीय किस निंदित कर्म से वर्तमान में कौन सा रोग हुआ हैं, इस पर प्रकाश डालते हैं।
कहा गया हैं -
पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये।
बाधते व्याधिरूपेण तस्य जप्यादिभिः शमः।। (शातातप स्मृति 1/5)
इसके अनुसार क्षयरोग, मृगी, जन्मांधता, खल्वाट (एलोपेशिया या गंजापन), मधुमेह, अजीर्ण, श्वास रोग, शूलरोग, रक्तातिसार, भगंदर आदि रोग पूर्वजन्म के कृत्यों के कारण होते हैं।
गायत्री जप आदि, प्रायश्चित, ज्ञानदान, दान-पुण्य आदि कृत्य, सप्ताह में एक दिन उपवास आदि उपायों से इन्हे ठीक किया जा सकता हैं। औषधियों आदि के साथ दैवी चिकित्सा निश्चित ही लाभ देती है।
शनिवार, 31 जुलाई 2010
जीवन विकास के लिए उपयुक्त आहार
अन्न को शास्त्रों में प्राण की संज्ञा दी गई है । अन्न को प्राण कहने में न तो कोई अयुक्तता है और न अत्युक्ति । निःसन्देह वह प्राण ही है । भोजन के तत्वों से ही शरीर में जीवनी शक्ति का निर्माण होता है । उसी से माँस, रक्त, मज्जा, अस्थि तथा ओजवीर्य आदि का निर्माण हुआ करता है । भोजन के अभाव में इन आवश्यक तत्वों का निर्माण रुक जाये तो शरीर शीघ्र ही स्वत्वहीन होकर स्तब्ध हो जाय ।
अन्न सर्व साधन रूप शरीर का आधार है । प्रत्येक मनुष्य तन, मन अथवा आत्मा से जो कुछ दिखाई देता है, उसका बहुत कुछ आधार हेतु उसका आहार ही है । जन्म काल से लेकर मृत्युपर्यन्त प्राणी का पालन, सम्वर्धन एवं अनुवर्धन आहार के आधार पर ही हुआ करता है । किसी का बलिष्ठ अथवा निर्बल होना, स्वस्थ अथवा अस्वस्थ होना बहुत अंशों तक भोजन पर ही निर्भर रहता है ।
समस्त सृष्टि तथा हमारे जीवन के लिए भोजन का इतना महत्व होते हुए भी कितने व्यक्ति ऐसे होंगे जो प्राण रूप आहार के विषय में जानकारी रखते हों और उसके सम्बन्ध में सावधान रहते हों, संसार में दिखलाई देने वाले शारीरिक एवं मानसिक दोषों में अधिकांश का कारण आहार सम्बंधी अज्ञान एवं असंयम ही है । जो भोजन शरीर को शक्ति और मन को बुद्धि को प्रखरता प्रदान करता है, वही असंयमित भी बना देता है । शारीरिक अथवा मानसिक विकृतियों को भोजन विषयक भूलों का ही परिणाम मानना चाहिये । अन्न दोष संसार के अन्य दोषों की जड़ है- जैसा खाये अन्न वैसा बने मन वाली कहावत से यही प्रतिध्वनित होता है कि मनुष्य की अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों का जन्म एवं पालन अच्छे, बुरे आहार पर ही निर्भर है ।
निःसंदेह मनुष्य जिस प्रकार का राजसी, तामसी अथवा सात्विकी भोजन करता है, उसी प्रकार उसके गुणों एवम् स्वभाव का निर्माण होता है और जिनसे प्रेरित उसके कर्म भी वैसे ही हो जाते हैं फलतः कर्म के अनुसार ही मनुष्य का उत्थान-पतन हुआ करता है । जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण पदार्थ भोजन के सम्बन्ध में अनभिज्ञ है अथवा असंयम बरतता है उसे बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता । आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए प्रक्ताहार विहार का नियम कड़ाई के साथ पालन करने के लिए कहा गया है, जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र में स्वस्थ, सुन्दर, सौम्य एवं समुन्नत जीवनयापन करना चाहता है उसके लिए भोजन सम्बंधी ज्ञान तथा उसका संयम बहुत आवश्यक है । भोजन के प्रति असंयम व्यक्ति अन्य किसी प्रकार के संयम का पालन नहीं कर सकता । भोजन का संयम अन्य इन्द्रियों के संयमों के पालन करने में बहुत कुछ सहायक होता है ।
जीवन निर्माण के आधार भोजन सम्बंधी अज्ञान कुछ कम खेद का विषय नहीं है । मनुष्य जो कुछ खाता है और जिसके बल पर जीता है, उसके विषय में क, ख तक न जानना निःसन्देह लज्जा की बात है । कितने आश्चर्य का विषय है जो मनुष्य कपड़ों लत्तों, घर-मकान और देश- देशान्तर के विषय में बहुत कुछ जानता है या जानने के लिए उत्सुक रहता है, वह जीवन तत्व देने वाले भोजन के विषय में जरा भी नहीं जानता और न जानना चाहता है । इसी अज्ञान के कारण हमारी भोजन सम्बंधी न जाने कितनी भ्रान्त धारणायें बन गई हैं । अनेक लोग यह यह समझते हैं कि जो भोजन जिव्हा को रुचिकर लगे, जिसमें दूध, दही, मक्खन आदि पौष्टिक पदार्थों का प्रचुर मात्रा में समावेश हो, मिर्च- मसाले इस मात्रा में पड़े हों जिन्हें देखकर ही मुँह में पानी आये वही भोजन सबसे अच्छा है । इसके विपरीत बहुत से लोग भोजन के नाम पर पापी पेट में जो कुछ माँस, घास, कूड़ा-कर्कट मिल जाये, डाल लेना ही आहार का उद्देश्य समझते हैं ।
भोजन के विषय में यह दोनों मान्यताएँ भ्रमपूर्ण एवं हानिकारक हैं । भोजन का प्रयोजन न तो जिव्हा का स्वाद है और न पेट को पाटना । जो मसालेदार, चटपटे और तले-जले पदार्थों का सेवन करते हैं, उनकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और जो निस्सार एवं तत्व हीन भोजन से पेट को पाटते रहते हैं उनका आमाशय शीघ्र ही अशक्त हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों मान्यताओं वालों को रोगों का शिकार बनना पड़ता है । रोग शरीर के भयानक शत्रु हैं- सभी जानते हैं- किन्तु ऐसा जानते हुए भी उनके मल-मूत्र कारक आहार सम्बन्धी त्रुटियों को दूर करने के लिए तत्पर होने को तैयार नहीं ।
भोजन का एकमात्र उद्देश्य भूख निवृत्ति ही नहीं है, उसका मुख्य उद्देश्य आरोग्य एवं स्वास्थ्य ही है । जिस भोजन ने भूख को तो मिटा दिया किन्तु स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाला वह भोजन उपयुक्त भोजन नहीं माना जायेगा । उपयुक्त भोजन वही है, जिससे क्षुधा की निवृत्ति एवं स्वास्थ्य की वृद्धि हो ।
विटामिनों की दृष्टि से हरे शाक तथा फल आदि ही स्वास्थ्य के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त आहार हैं, । इसके अतिरिक्त क्षार नामक आवश्यक तत्व भी फलों तथा शाकों से पाया जा सकता है । अनाज के छिलकों में भी यह तत्व वर्धमान रहता है किन्तु अज्ञानवश मनुष्य अधिकतर अनाजों को छील-पीसकर यह तत्व नष्ट कर देते हैं ।
कहना न होगा कि प्रकृति जिस रूप में फलों, शाकों तथा अनाजों को पैदा और पकाया करती है, उसी रूप में ही वे मनुष्य के वास्तविक आहार हैं । उनकों न तो अतिरिक्त पकाने अथवा उनमें नमक, शक्कर आदि मिलाने की आवश्यकता है । किन्तु मनुष्य का स्वभाव इतना बिगड़ गया है कि वह शाक-भाजियों तथा अन्न आदि को उनके प्रकृत रूप में नहीं खा सकता । इसके लिए यदि आहार को थोड़ा-सा हल्की आँच पर पका लिया जाये तब भी कोई विशेष हानि नहीं होती । किन्तु जब उनको बुरी तरह तला या जला डाला जाता है तो निश्चय ही उनके सारे तत्व नष्ट हो जाते हैं और वह आहार अयुक्ताहार हो जाता है । जहाँ तक सम्भव हो खाद्य पदार्थों को प्रकृत रूप में ही खाना चाहिये अथवा मंदी आँच या भाप पर थोड़ा- सा ही पकाना चाहिये । मिर्च, मसालों का प्रयोग निश्चय ही हानिकारक है इनका उपयोग तो बिल्कुल करना ही नहीं चाहिए ।
इन सब बातों का मुख्य तात्पर्य यह है कि मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन उसी को कहा जायेगा जिसके विटामिन तथा क्षार आदि तत्व सुरक्षित रहें, जो आसानी से पच जाये और जिसमें अधिक से अधिक सात्विक गुण हों । फल, शाक, मेवा, दूध आदि ही ऐसे पदार्थ हैं, जो मनुष्य के लिए स्वास्थ्यवर्धक आहार हैं ।
इसके साथ ही भोजन के संयम में स्वल्प अथवा तृप्ति तक भोजन करना ही ठीक है, अधिक भोजन से मनुष्य में आलस्य, प्रमाद, शिथिलता आदि ऐसे आसुरी दोष आ जाते हैं, जिनसे न तो वह परिश्रमी रह पाता है और न सात्विक स्वभाव का । असात्विकता अथवा असुरता मनुष्य को पतन की ओर ही ले जाती है । काम, क्रोध, आदि विचारों की प्रबलता भी असंयमित एंव अयुक्त आहार करने से ही होती है । यदि शरीर सब तरह से स्वस्थ एवं शुद्ध है तो मनुष्य का मन निश्चय ही सात्विक रहेगा । सात्विक मन एवं स्वस्थ शरीर के सम्पर्क से आत्मा का प्रसन्न तथा प्रमुदित रहना निश्चित है, जो कि एक दैवी लक्षण है जिसे भोजन के माध्यम से मनुष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना ही चाहिए ।
निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र
नीरोग जीवन एक ऐसी विभूति है जो हर किसी को अभीष्ट है । कौन नहीं चाहता कि उसे चिकित्सालयों-चिकित्सकों का दरवाजा बार-बार न खटखटाना पड़े, उन्हीं का, ओषधियों का मोहताज होकर न जीना पड़े । पर कितने ऐसे हैं जो सब कुछ जानते हुए भी रोग मुक्त नहीं रह पाते ? यह इस कारण कि आपकी जीवन शैली ही त्रुटि पूर्ण है मनुष्य क्या खाये, कैसे खाये! यह उसी को निर्णय करना है । आहार में क्या हो यह हमारे ऋषिगण निर्धारित कर गए हैं । वे एक ऐसी व्यवस्था बना गए हैं, जिसका अनुपालन करने पर व्यक्ति को कभी कोई रोग सता नहीं सकता । आहार के साथ विहार के संबंध में भी हमारी संस्कृति स्पष्ट चिन्तन देती है, इसके बावजूद भी व्यक्ति का रहन-सहन, गड़बड़ाता चला जा रहा है । परमपूज्य गुरुदेव ने इन सब पर स्पष्ट संकेत करते हुए प्रत्येक के लिए जीवन दर्शक कुछ सूत्र दिए हैं जिनका मनन अनुशीलन करने पर निश्चित ही स्वस्थ, नीरोग, शतायु बना जा सकता है ।
परमपूज्य गुरुदेव ने व्यावहारिक अध्यात्म के ऐसे पहलुओं पर सदा से ही जोर दिया जिनकी सामान्यतया मनुष्य उपेक्षा करता आया है और लोग अध्यात्म को जप-चमत्कार, ऋद्धि-सिद्धियों से जोड़ते हैं किंतु पूज्यवर ने स्पष्ट लिखा है कि जिसने जीवन सही अर्थों में सीख लिया उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया । जीवन जीने की कला का पहला ककहरा ही सही आहार है। इस संबंध में अनेकानेक भ्रान्तियाँ है कि क्या खाने योग्य है क्या नहीं ? ऐसी अनेकों भ्रान्तियों यथा नमक जरूरी है, पौष्टिता संवर्धन हेतु वसा प्रधान भोजन होना चाहिए, शाकाहार से नहीं-मांसाहार स्वास्थ्य बनता है- पूज्यवर ने विज्ञान सम्मत तर्क प्रस्तुतः करते हुए नकारा है । एक-एक स्पीष्टरण ऐसा है कि पाठक सोचने पर विवश हो जाता है कि जो तल-भूनकर स्वाद के लिए वह खा रहा है वह खाद्य है या अखाद्यं अक्षुण्ण स्वास्थ्य प्राप्ति का राजमार्ग यही है कि मनुष्य आहार का चयन करें क्योंकि यही उसकी बनावट नियन्ता ने बनायी है तथा उसे और अधिक विकृति न बनाकर अधिकाधिक प्राकृतिक् रूप में लें ।
अनेक व्यक्ति यह जानते नहीं हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं ? उनके बच्चों के लिए सही सात्विक संस्कार वर्धक आहार कौन सा है, कौन सा नहीं ? सही, गलत की पहचान कराते हुए पूज्यवर ने स्थान-स्थान पर लिखा है कि एक क्रांति आहार संबंधी होनी चाहिए, पाककला में परिवर्तन कर जीवन्त खाद्यों को निष्प्राण बनाने की प्रक्रिया कैसे उलटी जाय, यह मार्गदर्शन भी इसमें है । राष्ट्र् के खाद्यान्न संकट को देखते हुए सही पोष्टिक आहार क्या हो सकता है यह परिजन इसमें पढ़कर घर-घर में ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं । अंकुरित मूँग-चना-मूँगफली-हरी सब्जियों के सलाद आदि की व्यवस्था कर सस्ते शाकाहारी भोजन व इनके भी व्यंजन कैसे बनाये जायँ इसका सर्वसुलभ मार्गदर्शन इस खण्ड में है । शाकाहार-मांसाहार संबंधी विवाद को एकपक्षीय बताते हुए शाकाहार के पक्ष में इतनी दलीलें दी गयी हैं कि विज्ञान-शास्त्र सभी की दुहाई देनेवाले को भी नतमस्तक हो शाकाहार की शरण लेनी पड़ेगी, ऐसा इसके विवेचन से ज्ञात होता है ।
हमारी जीवन शैली में कुछ कुटेवें ऐसी प्रेवश कर गयी हैं कि वे हमारे 'स्टेटस' का अंग बनकर अब शान का प्रतीक बन गयीं हैं । उनके खिलाफ सरकारी, गैरसरकारी कितने ही स्तर पर प्रयास चलें हो, उनके तुरन्त व बाद में संभावित दुष्परिणामों पर कितना ही क्यों न लिखा गया हो, ये समाज का एक अभश्प्त अंग बन गयीं हैं । इनमें हैं तम्बाकू का सेवन, खैनी, पान मसाले या बीड़ी-सिगरेट के रूप में तथा मद्यपान । दोनों ही घातक व्यसन हैं । दोनों ही रोगों को जन्म देते हैं-काया को व घर को जीर्ण-शीर्ण कर बरबादी की कगार पर लाकर छोड़ देते हैं । इनका वर्णन विस्तार से वैज्ञानिक विवेचन के साथ करते हुए पूज्यवर ने इनके खिलाफ जेहाद छेड़ने का आव्हान किया है ।
इन सबके अतिरिक्त नीरोग जीवन का एक महत्वपूर्ण सूत्र है हमारा रहन-सहन । हम क्या पहनते हैं ? कितना कसा हुआ हमारा परिधान है ? हमारी जीवनचर्या क्या है ? इन्द्रियों पर हमारा कितना नियंत्रण है ? क्या हमारी रहने की जगह में धूप व प्रचुर मात्रा में है या हम सीलन से भरी बंद जगह में रहकर स्वयं को धीरे-धीरे रोगाणुओं की निवास स्थली बना रहे हैं, यह सारा विस्तार इस वाङ्मय के उपसंहार प्रकरण में है । आभूषणों, सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग, नकली मिलावटी चीजों का शरीर पर व शरीर के अन्दर प्रयोग यह सब हमारे स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालता है यह बहुसंख्य व्यक्ति नहीं जानते । हमारी जीवन-शैली कैसे समरसता से युक्त, सुसंतुलित एवं तनावयुक्त बने, यह शिक्षण जीवन जीने की कला का सर्वांगपूर्ण शिक्षण है एवं इस विद्या में परमपूज्य गुरुदेव को विशेषज्ञ माना जा सकता है ।
हरीतिमा संवर्धन नरवेल परमार्थ साधता है, स्वार्थ भी जीवन शैली आहार-विहार का क्रम बदल कर हर व्यक्ति नीरोग जीवन जी सकता है, यह इस वाङ्मय की धुरी है । निश्चित ही पाठकगण इसके स्वाध्याय से लाभान्वित हो समर्थ स्वस्थ नागरिक राष्ट्र् को दे सकेंगे॥
रविवार, 20 सितंबर 2009
नीम एक बहुत उपयोगी वृक्ष
नीम एक बहुत उपयोगी वृक्ष है । इसकी जड़ से लेकर फूल-पत्ती-कोंपल, फल तक सभी अवयव औषधीय गुणों से भरे-पूरे है। भारतवर्ष के गरीब लोगो के लिए यह एक प्रकार से कल्पवृक्ष है। चैत्र मास में नीम की नई कोपंलो को दस-पंद्रह दिन तक नित्य प्रात:काल चबाकर खाने से रक्त शुद्ध होता है। फोड़े-फुंसी नही निकलते और मलेरिया ज्वर नही आता। नीम की पत्तियों का रस दो चम्मच शहद में मिलाकर प्रात: काल पीने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
क्रोध से पित्त बढता है
आयुर्वेद में रोग के निदान के लिए `माधव निदान´ श्रेष्ठ ग्रंथ माना गया है। इस ग्रंथ में वात, पित्त, कफ किन कारणों से बढ़ते हैं, इस पर तीन श्लोक लिखे है । `क्रोधात्´ शब्द लिखकर स्पष्ट बतलाया है कि क्रोध से पित्त बढता है। आज का मनुष्य बात-बात पर गुस्सा हो जाता है, तनावग्रस्त हो अंदर ही अंदर रूठी स्थिति में घुटता रहता है। उससे पित्त की वृद्धि होती है। अधिकांश बिना निदान (डायग्नोसिस) किए हुए पेट के दरदों में इस पित्त का बढना एवं क्रोध ही मूल कारण होता है, जबकि चिकित्सक दवा पर दवा लिखते जाते है । पित्तशमन की औषधियां भी काम नहीं करेंगी। मात्र क्रोध पर नियंत्रण एवं प्रसन्न मन:स्थिति ही किसी तकलीफ को दूर कर सकती है।
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
चोकर की उपयोगिता
गेहूँ के आटे को छानकर जो चोकर अलग किया जाता है, वह कितना गुणकारी है, यह जानना जरूरी है। यह कब्ज की अद्वितीय प्राकृतिक औषधि है। यह आँतों में उत्तेजना पैदा नही करता तथा कैन्सर से दूर रखता है ( यह प्रयोग द्वारा प्रमाणित हो गया है।) अमाशय के घाव (पेप्टिक अल्सर),आँतों के विभिन्न रोग, उच्च कोलेस्टेरॉल से भी यह बचाता है। चोकर खाने वालों को कभी पाइल्स, भगंदर या मलाशय का कैन्सर नही होता है। मोटापा घटाने के लिए चोकर एक नीरापद औषधि है। मधुमेह निवारण में भी चोकर मदद करता है। चोकर मिश्रित आटा रोटी को और भी स्वादिष्ट बना देता है । गेहूं का चोकर एक आदर्श रेशा (फाइबर डाइट) है। हम आज कि जीवन शैली में मैदे वाली रोटी खाते हैं एवं चोकर के इतने लाभों को पाने से बचे रहते है।
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