प्रतिष्ठा पा लेना सरल है, पचा पाना कठिन है। बुद्ध के एक शिष्य प्रव्रज्या से लौटे। उसके प्रवचन से प्रभावित जनमानस की प्रशंसा सुनने के बाद उसके पाँव जमीन पर नहीं थे। वरिष्ठ व्यवस्थापक अनाथपिंडक ने उनके हाथ में अगले दिन कुल्हाडी थमा दी जंगल से ईधन काटने के लिए। सभी के लिए नियम था कि नित्य श्रम करना है। कुल्हाड़ी एक ओर फेंक दी और मुँह लटका लिया। अनाथपिंडक ने उन्हें बुद्ध के पास श्रावस्ती भेज दिया। बुद्ध स्वयं भिक्षाटन करने गए थे। देखा, तथागत भिक्षा घर-घर से लेकर आ रहे हैं एवं रास्ते में उपले भी बटोर रहे हैं, ताकि आश्रम में काम आ सकें। उनके मन को पढ बुद्ध बोल उठे- ``अर्हत बना है तो पहले अहंता गलाओ। श्रम से गरिमा नहीं घटेगी। यह न होने पर पाखंड बढे़गा । शिष्य ने यथार्थता समझी और कदमों में झुक गए । हर शिष्य के लिए यही हर सदगुरू का मार्गदर्शन है।
विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
रविवार, 20 सितंबर 2009
सुकरात
सुकरात पर नवयुवकों को गलत शिक्षा देकर भ्रमित करने का मुकदमा चला । उन्होने न्यायालय में ही सबको खरी-खोटी सुनाई । एथेंस के कुछ संभ्रांत नागरिक, जो सुकरात की सहायता से परिचित थे। उनके पास आए और बोले- ``आपके विषय में बात कर ली है। आप युवको को उपदेश देना बंद कर दे तो मृत्यु दंड टल जायेगा। ´´ सुकरात ने उत्तर दिया-``इस बात को मान लेना मेरी दृष्टि से भगवान का अपमान है। अगर मे शील-सदाचार के विषय में चर्चा नहीं कर सकता और आत्मान्वेषण बंद कर देता हूँ तो मेरा जीवन जीना निरर्थक है। उससे विष का प्याला पी लेना ज्यादा श्रेयस्कर है। ´´
`साक्षरता निकेतन´
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में स्थित `साक्षरता निकेतन´ एवं इसके द्वारा की जा रही सेवाओं को काफी लोग जानते है , पर उनकी जन्मदात्री श्रीमती वेल्दीफिशर के बारे में संभवत: बहुत लोग अधिक नहीं जानते। 18 सितंबर, 1879 को न्यूयॉर्क राज्य के रोम नामक कसबे में वेल्दीफिशर ने सबसे पहले गाँव-गाँव जाकर पाठशालाएँ चलाई। एक मिशनरी के रूप में वे चीन गई । वहाँ चीनी समाज की महिलाओं की स्थिति देखकर वे बहुत दुखी हुई । उनके लिए भी साक्षरता विस्तार, कुरीति-उन्मूलन जैसे कार्य किए। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वे अमेरिका लौटी तो उनका परिचय वान फेडरिक फिशर से हुआ, जिनके विचार उनसे मिलते-जुलते थे। यद्यपि दोनो चालीस से ऊपर थे, पर वे विवाह-सूत्रों में बँधकर एक ओर एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति सिद्ध करना चाहते थे। दम्पति भारत आए। उन्होने सर्व-धर्म-समभाव का एक आर्दश यहाँ देखा। पति की मृत्यु के बाद वे अमेरिका लौटीं पर 1947 में पुन: भारत आई । गांधी जी के विचारों से प्रभावित श्रीमती फिशर स्थायी रूप से यहीं बस गई । पहले इलाहबाद (नैनी) और बाद में लखनऊ को उन्होंने कार्यक्षेत्र बनाया । लक्ष्य था-साक्षरता का गाँव-गाँव में विस्तार । 13-9-1956 को साक्षरता निकेतन की स्थापना हुई। वस्तुत: आदर्शों पर जीने वाले देश, धर्म की परिधि से बाहर जीते हैं।
`थियोसोफिकल सोसाइटी´
रूस के छोटे से कसबे में 1831 में एक बच्ची जन्मी। हेलेना नामक इस संवेदनशील बालिका को समाज में स्त्रियों की दुर्दशा देखकर रोना आ जाता था। उन्हें एक प्रौढ से जबरदस्ती विवाह के बंधनों मे बाँध दिया गया, पर उस वातावरण से निकल वे विश्वयात्रा पर निकल पड़ीं । अपना नाम रखा मैडम ब्लावट्स्की। उन्होनें न केवल काफी भ्रमण किया, स्वाध्याय भी किया । नियति उन्हें भारत ले आई। यहाँ के योगी-सिद्ध-संतो से वे मिली । अज्ञात की खोज को उन्होनें अपना प्रिय विषय बना लिया, ताकि सभी अपना आत्मविकास कर सकें । इसके लिए उनने `सीक्रेट डॉक्ट्रीन´ नामक ग्रंथ लिखा । वे लोक से परे पारलौकिक शक्तियों का अस्तित्व मानती थी। बाद में जब वे 1873 में अमेरिका में बस गई तो उनने अपने कार्य को विधिवत् संस्थागत रूप दिया। `थियोसोफिकल सोसाइटी´ की उन्होने स्थापना की। बाद में मद्रास में अडयार नदी के तट पर समुद्र किनारे उन्होंने इसके अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की । वे सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थी, विश्वबंधुत्व की साकार प्रतिमा थीं।
स्वर्ग-नरक
स्वर्ग-नरक की आलंकारिक मान्यताएँ पौराणिक काल की काल्पनिक गल्पकथाएँ भर है। वस्तुत: स्वर्ग आत्मसंतोष को कहते है । स्थायी आनंद भावनाओं का ही होता है। यदि व्यक्ति का द्रष्टिकोण परिष्कृत और क्रियाकलाप आदर्शवादी मान्यताओं के अनुरूप हों तो वह वस्तुत: स्वर्ग में ही जी रहा है। नरक भी कोई लोक नही है। कुसंस्कारी, दुर्गुणी मनुष्य अपने ओछे चिंतन की आग में स्वयं ही हर घड़ी जलते रहते है। चिंता, भय, क्रोध, ईश्र्या, द्वेष शोषण , प्रतिशोध की प्रवृत्ति हर घडी विक्षुब्ध बनाए रहती है। ये नरक की अनुभूतियाँ है।
नीम एक बहुत उपयोगी वृक्ष
नीम एक बहुत उपयोगी वृक्ष है । इसकी जड़ से लेकर फूल-पत्ती-कोंपल, फल तक सभी अवयव औषधीय गुणों से भरे-पूरे है। भारतवर्ष के गरीब लोगो के लिए यह एक प्रकार से कल्पवृक्ष है। चैत्र मास में नीम की नई कोपंलो को दस-पंद्रह दिन तक नित्य प्रात:काल चबाकर खाने से रक्त शुद्ध होता है। फोड़े-फुंसी नही निकलते और मलेरिया ज्वर नही आता। नीम की पत्तियों का रस दो चम्मच शहद में मिलाकर प्रात: काल पीने से पीलिया रोग में लाभ होता है।
क्रोध से पित्त बढता है
आयुर्वेद में रोग के निदान के लिए `माधव निदान´ श्रेष्ठ ग्रंथ माना गया है। इस ग्रंथ में वात, पित्त, कफ किन कारणों से बढ़ते हैं, इस पर तीन श्लोक लिखे है । `क्रोधात्´ शब्द लिखकर स्पष्ट बतलाया है कि क्रोध से पित्त बढता है। आज का मनुष्य बात-बात पर गुस्सा हो जाता है, तनावग्रस्त हो अंदर ही अंदर रूठी स्थिति में घुटता रहता है। उससे पित्त की वृद्धि होती है। अधिकांश बिना निदान (डायग्नोसिस) किए हुए पेट के दरदों में इस पित्त का बढना एवं क्रोध ही मूल कारण होता है, जबकि चिकित्सक दवा पर दवा लिखते जाते है । पित्तशमन की औषधियां भी काम नहीं करेंगी। मात्र क्रोध पर नियंत्रण एवं प्रसन्न मन:स्थिति ही किसी तकलीफ को दूर कर सकती है।
शिरडी के साईंबाबा
शिरडी के साईंबाबा से जुड़ा एक बड़ा विलक्षण प्रसंग है। प्रयाग में कुंभ का योग आया। शिरडी के लोगों ने सोचा कि इस वर्ष प्रयाग चलकर त्रिवेणी में स्नान किया जाए। नीम के पेड़ के नीचे `द्वारकामाई´ नामक स्थान पर विराजमान साईंबाबा के पास सभी भक्तजन आएं एवं जाने की अनुमति माँगी। साईबाबा ने कहा-``बेकार उतनी दूर जाने से क्या फायदा-`मन चंगा तो कठौती में गंगा´ तुमने सुना होगा। अपना प्रयाग तो यही है। बस, मन में विश्वास कर लों तो त्रिवेणी स्नान का पुण्यफल यहीं प्राप्त हो जायेगा।´´ कथन का प्रभाव पड़ना आरंभ हुआ ही था , सभी ने सिर झुकाया, तभी देखा कि बाबा के दोनों पैरो के अँगूठों से गंगा-यमुना की धाराएँ प्रवाहित हो रही है। सभी इसमे स्नान कर स्वयं को धन्य मानने लगे। लगा कि भक्तों पर न केवल असीम कृपा हुई है, वरन् एक तथ्य भी बताया गया है कि संतो, सद्गुरू अवतारी महापुरूष के चरणों में ही प्रयागस्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।
बुधवार, 9 सितंबर 2009
येंसुबाई
हमारे इतिहास में अनेक प्रसंग आते है , जिनमें पथभ्रमित पति को सती, साध्वी, विवेकशील पत्नी ने सत्पथ पर आरूढ़ किया। महाराष्ट्र पर से समर्थ रामदास, वीरश्रेष्ठ छत्रपति शिवाजी और माता जीजाबाई की छत्रछाया उठ चुकी थी। शिवाजी के उत्तराधिकारी संभाजी विलासिता के कारण पन्हाला के दुर्ग में कैद थे। संभाजी को एक लंपट व्यक्ति से ऊपर उठाकर यशस्वी बनाने में येंसुबाई का हाथ था ।उन्होने अपने पति को सँभाला । उँच-नीच समझाई, पिता के आदर्श स्मरण कराए। एक प्रकार से संभाजी का येसुबाई ने कायाकल्प कर दिया । वे संभाजी के साथ छाया की तरह लगी रहती थी। उन्हाने अपने पति को इस सीमा तक मजबूत बना दिया कि वे जब अँगरेज द्वारा पकड़े गए ,प्रताड़ित किए गए, तब भी उन्होने धर्म परिवर्तन स्वीकार नही किया। अंतत: संभाजी का वध कर दिया गया । येसुबाई ने अपने देवर राजाराम को मराठों का नेता बना दिया। यहाँ तक कि औरंगजेब ने उन्हे पकड़ कर सोलह वर्ष तक दिल्ली में बंद रखा, पर वे वहाँ से भी संदेश भेजती रहीं कि और राजाराम को छत्रपति बना दिया । 1719 में येसुबाई मुक्त हुई। सत्तर वर्ष की आयु में अपने ही राज्य में जो अभी भी स्वतंत्र था, उन्होंने अंतिम साँस ली।
नागारानी गिडालू
नागारानी गिडालू के बारे में आम भारतवासी अधिक जानता नही है। नागारानी नागा पहाडियों की पवित्र संतान कोबाई कबीले के एक पुरोहित के घर जन्मी थी। सोलह साल की गिडालू पर भारत भर में चल रहे असहयोग आंदोलन का बड़ा प्रभाव पड़ा, जब उसकी प्राचार्या ने राष्ट्रधर्म के बारे मे बताया। उसने दस-पंद्रह सहयोगिनी बहनों का एक संघठन बनाया । धीरे-धीरे यह संगठन बड़ा होता गया। अनेक कबीले अँगरेज सत्ता के विरोध में उठ खडे हुए और उन्होने विदेशी वस्तुओं की होली जलाई । पुलिस ने अपना दमनचक्र चलाया । अतत: उन्हें गिरफ्तार कर आजन्म कारावास की सजा मिली। आजादी के भी दो वर्ष बाद 19 जुलाई, 1949 को वे 18 वर्ष की सजा काटकर निकली। तब वे 37 वर्ष की प्रोढा हो चुकी थीं, पर उनके जेल में रहते हुए क्रांति की जो चिनगारी फूटी, उसने पूरे नेफा क्षेत्र में एक अलख जगा दी। अपनी सारी जवानी आजादी के लिए कुरबान कर देने वालों को सारा राष्ट्र नमन करता है।
सरदार पटेल
सरदार पटेल कहते थे कि `यदि मणि न होती तो मै न जाने कब का मर गया होता ! मणि बेन सरदार पटेल की पुत्री थीं। वे इस तथ्य की परिचायक थीं कि मानव का सच्चा आभूषण सादगी है। मणि बेन अपने पिता को कुछ दवा पिला रही थी कि वरिष्ठ कांग्रेसी महावीर त्यागी वहाँ प्रविष्ट हुए। बातचीत के दौरान उन्होने देखा कि सरदार पटेल की धोती में जगह-जगह पैबन्द लगे है। एक और धोती वे इसी तरह सीं रही थीं। त्यागी जी ने यह देखकर कहा-``मणि बेन ! तू तो एक ऐसी बाप की बेटी हो, जिसने साल भर में भारत को एक चक्रवर्ती राज्य बना दिया । तुम्हें संकोच नही होता। तुम्हारे एक आदेश पर कई धोतियाँ, सरदार व तुम्हारे लिए आ सकती है ।´´ मणि का उत्तर था- शरम उन्हे आए, जो झूठ बोलते है, बेईमानी करते है और शेखी बघारते है। हमे कैसी शरम ! डॉ0 सुशीला नय्यर, जो वहाँ बैठी थी, ने कहा- `किससे बात कर रहे है आप महावीर जी ! मणि दिन भर चरखा कातकर सूत से धोती-कुरते बनाती है । फट जाते है तो उसी से अपने लिए धोती ब्लाउज बना लेती है । आपकी तरह सरदार का कपडा खद्दर भंडार से नही आता । आज के झकाझक सफेद कपडे या सफारी पहनने वाले नेताओ के लिए यह एक तमाचा है ।
रविवार, 23 अगस्त 2009
Forgiveness Quotes
1- A soft refusal is not always taken, but a rude one is immediately believed. - Alexander Chase
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2- Always forgive your enemies - nothing annoys them so much. - Oscar Wilde
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3- For my part I believe in the forgiveness of sin and the redemption of ignorance.
- Adlai E. Stevenson
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4- Forgive many things in others; nothing in yourself. - Ausonius
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5- Forgive your enemies, but never forget their names. - John F. Kennedy
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6- Forgiveness is a funny thing, it warms the hearts and cools the sting. - Peter Allen
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7- Forgiveness is a funny thing. It warms the heart and cools the sting. - William A. Ward
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8- Forgiveness is a gift you give yourself. - Suzanne Somers
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9- Forgiveness is a virtue of the brave. - Indira Gandhi
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10- Forgiveness is the final form of love. - Reinhold Niebuhr
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11-Forgiveness is the fragrance that the violet sheds on the heel that has crushed it.
- Mark Twain
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12- Forgiveness is the giving, and so the receiving, of life. - George MacDonald
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13- Forgiveness is the key to action and freedom. - Hannah Arendt
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14- Forgiveness is the remission of sins. For it is by this that what has been lost, and was found, is saved from being lost again. - Saint Augustine
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15- Forgiveness means letting go of the past. - Gerald Jampolsky
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16- God will forgive me. It's his job. - Heinrich Heine
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17- If there is something to pardon in everything, there is also something to condemn.
-Friedrich Nietzsche
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18- It is easier to forgive an enemy than to forgive a friend. - William Blake
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19- It is easier to forgive an enemy than to forgive a friend. - John Dryden
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20- It is often easier to ask for forgiveness than to ask for permission. -Grace Hopper
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21- It takes one person to forgive, it takes two people to be reunited. -Lewis B. Smedes
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22- It's far easier to forgive an enemy after you've got even with him. - Olin Miller
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23- Life is an adventure in forgiveness. - Norman Cousins
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24- Without forgiveness, there's no future. - Desmond Tutu
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Faith
1- A man of courage is also full of faith. - Marcus Tullius Cicero
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2- Be faithful in small things because it is in them that your strength lies. - Mother Teresa
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3- Doubt is a pain too lonely to know that faith is his twin brother. - Kahlil Gibran
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4- Faith consists in believing when it is beyond the power of reason to believe. - Voltaire
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5- Faith has to do with things that are not seen and hope with things that are not at hand.
Saint Thomas Aquinas
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6- Faith is a passionate intuition. - William Wordsworth
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7- Faith is not contrary to reason. Sherwood Eddy
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8- Faith is reason grown courageous. - Sherwood Eddy
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9- Faith is spiritual imagination. - Henry Ward Beecher
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10- Faith is taking the first step even when you don't see the whole staircase.
- Martin Luther King, Jr।
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11- Faith, to my mind, is a stiffening process, a sort of mental starch. - E. M. Forster
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12- Faith: not wanting to know what is true. - Friedrich Nietzsche
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13- Have faith in God; God has faith in you. - Edwin Louis Cole
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14- I do not pray for success, I ask for faithfulness. - Mother Teresa
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15- If patience is worth anything, it must endure to the end of time. And a living faith will last in the midst of the blackest storm. - Mohandas Gandhi
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16- In faith there is enough light for those who want to believe and enough shadows to blind those who don't. - Blaise Pascal
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17- In the affairs of this world, men are saved not by faith, but by the want of it.
Benjamin Franklin
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18- Nor shall derision prove powerful against those who listen to humanity or those who follow in the footsteps of divinity, for they shall live forever. Forever. Kahlil Gibran
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19- Reason is our soul's left hand, faith her right. John Donne
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20- Take the first step in faith. You don't have to see the whole staircase, just take the first step.
Martin Luther King, Jr.
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21- The faith that stands on authority is not faith. Ralph Waldo Emerson
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22- To me faith means not worrying. John Dewey
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23- Ultimately, blind faith is the only kind. Mason Cooley
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24- Your faithfulness makes you trustworthy to God. Edwin Louis Cole
बुधवार, 19 अगस्त 2009
नरसी महता
अंतकाल में महापुरूषों को देह की पीड़ा तो रहती है, पर मन कभी विकल नहीं होता । वे मन से प्रसन्न रहकर कष्ट को सहन करते हैं। अपने सारे भोग काट कर ही जाते है। नरसी महता की पत्नी मरी । लोगों ने आकर देखा-वे कीर्तन कर रह थे। खूब प्रसन्न थे। लोगो ने सोचा वियोग में पागल हो गए हैं, बहुत स्नेह करते थे अपनी पत्नी को, लेकिन वो प्रसन्न-मुक्त हो गई। इस तथ्य को संसारी आदमी नही समझ सकते।
नियमित उपासना
नियमित उपासना का काई न कोई उपक्रम बैठा लिया जाए तो उसके बड़े ही चमत्कारी सत्परिणाम सामने आते है। श्री कंदकरि बीरेश लिंगम् ने जिस दिन से दीक्षा संस्कार ग्रहण किया, उसी दिन से निष्ठापूर्वक एक सौ बार गायत्री मंत्र का जप नित्य नियमित रूप से करने का दृढ निश्चय कर लिया। उपासना में श्रद्धा और नियमितता अपनी शक्ति होती है। श्री बीरेश लिंगम् की माँ भूत-प्रेतों का नाम सुनकर ही भयभीत हो जाती थी । उन्ही दिनों उनके यहाँ एक तांत्रिक योगी आता था। जो अपने को प्रेतविद्या का निष्णात मानता और भूत भगाने का आश्वासन देता था। उसकी माता जी को उस तांत्रिक के प्रति गहरी श्रद्धा थी । यह एक प्रकार का अंधविश्वास ही था। बीरेश लिंगम् इस अंध मान्यता को कहाँ स्वीकार करने वाले थे। उनने उस तांत्रिक को घर में आने से मना कर दिया । तांत्रिक क्रोधित होकर उनके उपर आक्रमण करने पर उतारू हो गया और बुरे से बुरा शाप देने लगा।
नियमित रुप से गायत्री उपासना करने वाले पर उसकी धमकी का काई प्रभाव नहीं पड़ा , वरन् `शिकारी खुद शिकार बन गया´ वाली उक्ति ही चरितार्थ होती देखी गई । तांत्रिक बीरेश लिंगम् की गरजना को सुनकर बीमार पड़ गया और दिन-प्रतिदिन दुर्बल होता चला गया । उस महान उपासक के हृदय में करुणा कूट-कूट कर भरी थी, इसलिए उस तांत्रिक को कुछ आर्थिक सहायता प्रदान कर उसे वापस घर भेज दिया । उस दिन से तांत्रिक ने भी उपासना का महत्व समझ लिया और संकल्प किया कि आज से मैं गायत्रीसाधक के साथ कोई ऐसी हरकत नहीं करुँगा, एक साधक की तरह ही रहूँगा।
राष्ट्र धर्म
राष्ट्र हम में से हरेक के सम्मिलित अस्तित्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम है, कल थे और आने वाले कल में होंगें, सभी कुछ शामिल है। हम और हम में से हरेक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यो न हों, राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती है। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत , झर-झर बहते निर्झर , विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन , सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश में विहार करने वाले पक्षी, सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित है। प्रांत, शहर , जातियाँ, यहाँ तक कि रीति-रिवाज, धर्म-मजहब , आस्थाएँ-पंरपराएँ राष्ट्र के ही अंग-अवयव है।
राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नही हैं। भारतवासियों की एक ही पहचान है-भारत देश, भारत मातरम् । हम में से हरेक का एक ही परिचय है-राष्ट्रध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणो का गान हैं । हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती है( जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में , राष्ट्र के उत्थान में सहायक है। राष्ट्र की अखंड़ता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को निछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्तव्य है।
राष्ट्र धर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। यह हिंदू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है, जितना कि सिख, मुसलिम या ईसाई के लिए। यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कही अधिक है। इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है- राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदशील होना, कर्तव्यनिष्ठ होना( राष्ट्रीय हितो के लिए, सुरक्षा के स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत बलिदान करते रहना । )
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
सुभद्राकुमारी चौहान
सारे मनोरोग विषाद सें आरंभ होते है। कोई ऐसा विधान नही कि विषाद को योग बना दे। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता युगों-युगों से मानव मात्र को विषाद को योग में बदलना सिखाती आई है। पांडवों का सारा जीवन कष्टों मे ही बीता । और कौरवो का जीवन सुख में, ईश्र्या-द्वेष में, भाँति-भाँति के कुचक्रो में बीता । पाडंवो ने जो कुछ भी जीवन विद्या का शिक्षण लिया, वह अपने दु:ख के क्षणों में ही उन्हे मिला । महाभारत में उनके जीवन का अंतिम सोपान आता है, जब युद्ध आरंभ होते ही धनुर्धरश्रेष्ठ अर्जुन विषादग्रस्त हो जाता है- तनाव, अत्यधिक आत्मग्लानि एवं राग की पराकाष्ठा के क्षणों से गुजरता है। तब भगवान उसे मन की चंचल लता से जुझना सिखाते है। अपनी शरण में आने को कहते है। (मामेकं शरणं व्रज)। यह सब आज के अर्जुनो के लिए भी है। आज का युवा दिग्भ्रांत है। परीक्षा आते ही घबरा जाता है। कैसे जूझे ? सीखे गीता के योग से।
`वीरो का कैसा हो वसंत´ जैसी कविताओं की सृजेता सुभद्राकुमारी चौहान (1904-1948) प्रयाग में जन्मी थीं। चौदह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह खंडवा के ठाकुर लक्ष्मणसिंह चौहान के साथ हुआ। ठाकुर साहब स्वयं माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा प्रकाशित , संपादित राष्ट्रवादी पत्र `कर्मवीर´ के सहायक संपादक थे। उन्होने चाहा कि उनकी पत्नी की आगे बढने की इच्छा रोकी नही जानी चाहिए। उन्हें थियोसॉफिकल स्कूल में भरती कर दिया गया। बाद में वे स्वतंत्रता-संग्राम में भी कूद पड़ीं। जेल गई। लौटने पर खांडवा में पति के साथ रहते हुए माखनलाल जी के संमर्क मे आई । उन्होनें सुभद्रा जी की काव्य प्रतिभा को पहचाना । धीरे-धीरे उनकी कविता में देशभक्ति के अंगारे धधकने लगे । `खुब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी´ यह उनकी ही कविता थी । उनकी सरल, सुबोध, चुभती भाषा में लिखी कविताओं ने जन-जन को प्रभावित किया । ठाकुर साहब राष्ट्रदेव की सेवा में अपनी तरह लगे रहे। वे भी गृहस्थी सँभालतीं, साथ ही पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलनों में भाग लेती । वंसत पंचमी ,1948 को एक रोड एक्सीडेंट में वे चल बसी , पर नारी जगत के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई।
मन: स्थिति
बिंबसार महावीर के दर्शन करने गए। मार्ग में एक महात्मा का स्थान भी पड़ता था। वे एक साम्राज्य के स्वामी थे, पर सब छोड़कर कठोर तप कर रहे थे। उनके दर्शन कर महावीर के पास पहुँचे तो पूंछा कि वो दीर्धकाल से तप कर रहे है । उनकी गति क्या होगी , अंत क्या होगा , महावीर बोले-``इस क्षण यदि वो शरीर छोड़ दे तो सातवे नरक को प्राप्त होंगें।´´ बिंबसार स्तब्ध रह गए। पुन: कहा-``हाँ ,मै उन्ही के विषय में बता रहा हूँ। अभी मरे तो स्वर्ग लोक में जाएँगे।´´ बडी अजीब बात लगी बिंबसार को । फिर पूंछा-``फिर से देखिए-बताएँ क्या गति होगी -``अब वे सिद्धो के लोक को जाएँगे-अब वे मोक्ष को प्राप्त हो गए है।´´ रहस्य खोलते हुए महावीर ने कहा-``जिस पल तुमने पूंछा था, उस समय उसके पास राज्य पर शत्रु के हमले की खबर आई थी। मंत्री ने आकर कहा-`बहु मार दी गई´ उनके अंदर का क्षत्रिय जाग उठा था। `लाओ तलवार´, यह कह उठे थे। इसीलिए कहा था `नरक जाएँगे।´ दूसरे पल उनने सोचा, सिर पर जटाएँ है-किसका बेटा , किसकी बहु-कैसा राज्य, किसका बदला ! विकृति धुल गई । मै अपने रास्ते चलूँगा । फिर स्वर्ग सिद्धों के लोक की बात कही । कर्म की अंतिम पीड़ा वे भुगत चुके थे। अत: अशेष हो गए थे। इसलिए मैने कहा-मुक्त हो गए । जैसी मन: स्थिति में आप जीते हैं, वैसी ही गति होती है। ´´
आध्यात्मिक कार्य
स्वामी विवेकानंद अमेरिका से लौटकर मद्रास रुके थे। वहाँ उन्होने फरवरी, 1897 में `मेरी समर नीति´ ,`भारत के महापुरूष´, `राष्ट्रीय जीवन में वेदातं की उपयोगिता´ तथा `भारत का भविष्य´विषय पर व्याख्यान दिए। थकान के बावजूद विभिन्न विषयों पर स्वामी जी का इतना गूढ़ प्रतिपादन व उसकी श्रमशीलता देखकर आयोजक श्री सुंदरराम अय्यर ने पुछा कि उन्हे इतना परिश्रम करने के लिए शक्ति कहाँ से मिलती है " स्वामी जी ने कहा-``किसी भी भारतीय से पूंछकर देख लीजिए। आध्यात्मिक कार्य हेतु किसी भी भारतीय को कभी थकान का बोध नही होता ।´´
शनिवार, 15 अगस्त 2009
स्वाइन फ्लू उपचार
१- बाबा रामदेव ने कहा है कि कपाल भारती और अनुलोम-विलोम जैसे योग के जरिए स्वाइन फ्लू जैसी खतरनाक बीमारी से कारगर ढंग से निपटा जा सकता है। बाबा का दावा है कि सुबह उठकर गहरी सांस लेने से इस फ्लू का वाइरस आप पर हमला नहीं करेगा२- बाबा रामदेव एक सामान्य भारतीय पौधे गिलोए (बेल) का रस पीकर स्वाइन फ्लू से बचा जा सकता है। असल में आयुर्वेद में इस बेल का बहुत पहले से प्रयोग हो रहा है और लीवर से जुड़ी बीमारियों में इसका प्रयोग होता रहा है। इसके प्रयोग का तरीका काफी आसान है। बेल की करीब दो इंच मोटी टहनी को तुलसी की पांच पत्तियों के साथ मूसली या किसी और तरीके से कूट लिया जाए और रात को आधा गिलास पानी में डालकर सुबह छानकर पी लिया जाए। यह एक व्यक्ति के लिए है और इसका प्रयोग दिन में एक बार ही काफी है। इसकी टहनी और तुलसी की पत्ती को अच्छी तरह उबालकर भी पीया जा सकता है।
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३- यूनानी में "हुम्मा-ए-वबाईया" - यूनानी चिकित्सा पद्धति में स्वाइन फ्लू को "हुम्मा-ए-वबाईया" नाम से जाना जाता है। इसके अनुसार यह बलगमी बुखार है। राजस्थान यूनानी मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल के डॉ। परवेज अख्तर वारसी ने बताया कि बचाव के लिए सब्जियों में हींग का उपयोग करें। अजवाइन का पानी उबालकर दिन में दो बार पीएं।
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४- आयुर्वेद में है उपाय - द आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री आयुर्वेद केन्द्र के वरिष्ठ आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ। मणीकांतन एवं डॉ. निशा मणीकांतन ने बताया कि आयुर्वेद में लक्ष्मी तरू की पत्तियों की चाय, तुलसी, आंवला और अमृत प्रतिरक्षा को बढ़ाने का काम करते हैं।--------------------
५- तुलसी के पत्ते हैं कारगर - आध्यात्मिक संत बाबा जयगुरूदेव ने स्वाइन फ्लू के इलाज का देशी नुस्खा सुझाया है। उन्होंने तुलसी के 15-20 पत्ते दो कप पानी में उबालें। इसमें चीनी या नमक नहीं डालें। तीन उबाल आने पर छानकर सुबह खाली पेट इसका सेवन करें।
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६- होम्योपैथी में भी इलाज - राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय के चिकित्सा अधिकारी डॉ। टी.पी. यादव ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति में बीमारी का डर बैठा हुआ है तो प्राथमिक स्तर पर होम्योपैथी में एकोनाइट और आरसेनिक एलबम दवा ली जा सकती है।
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७- पाँच पत्तियाँ तुलसी तथा पाँच दाने काली मिर्च मुंह में रख कर चबाइए और इसका रस धीरे-धीरे गले से नीचे उतारिये। दिन में तीन बार -सुबह ,दोपहर,शाम यह काम कीजिए और निश्चिंत होकर घूमिये। जितने दिन संभव हो सके यही काम करते रहिये।
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८- होम्योपैथी के अन्टीबायोटिक मदर टिन्क्चर का उपयोग प्रति दिन एक या दो बार अवश्य करें ।छोटे बच्चों को इस मिसरन की ५ से १० बूण्द द्वा किसी मीठे शर्बत में मिलकर या शहद में मिलाकर पिला दें ।
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९- भीड़ भाड़ वाली जगह से लौटने के बाद पहले हाथ और फिर मुंह धोएं।
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१०- डॉक्टरों का कहना है कि खांसने या छींकने या नाक साफ करने के बाद अपने हाथ आंख, नाक और मुंह पर कतई नलगाएं। शरीर के ये हिस्से सबसे ज़ल्दी फ़्लू की चपेट में आते हैं. सावधानी के लिए समय समय पर हाथ धोते रहें।
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११- मेज़, खाना बनाने की जगह, बाथरूम के फ़र्श और कोनों को साफ़ रखें। इन जगहों पर बैक्टरिया आसानी से पनपतेहैं. सफ़ाई के लिए पानी के साथ कीटनाशकों का इस्तेमाल करें।
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१२- हवा के जरिए फैलने वाले इस तरह के किसी भी विषाणु से स्रुरक्षा पाने का सीधा सा उपाय अपनाइये कि जब भी घर से बाहर निकलें तो जेब में दो-चार कपूर(camphor) की टिकिया डाल लीजिये और यदि मिल जाएं तो तुलसी की चार-पांच पत्तियां मुंह में रख लें।
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१३- लावण्य आयुर्वेदिक हास्पिटल के चेयरमैन अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि शास्त्रों में जिस स्वाइन फ्लू सरीखे रोग का जिक्र है, उसके लक्षणों में - शरीर में भारीपन, शिरा शूल, सर्दी जुकाम, खांसी, बुखार और संधियों में पीड़ा होना है। तीव्रावस्था में यह अवस्था शीघ्रकारी और प्राणघातक सिद्घ हो सकती है। इस अवस्था विशेष को 'मकरी' नाम से जाना जाता है। इसके लिए शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने वाली औषधियां - गुड़ची, काली तुलसी, सुगंधा आदि का प्रयोग करना चाहिए। रोग के विशिष्ट उपचार के लिए पंचकोल कषाय, निम्बादि चूर्ण, संजीवनी वटी, त्रिभुवन कीर्ति रस, गोदंति भस्म और गोजिहृदत्वात् औषधियां प्रयोग की जाती हैं, लेकिन इनका प्रयोग रोग की अवस्था के अनुसार आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए।
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१४- होम्योपैथी डॉक्टर पंकज भटनागर के अनुसार स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए जेल्सिमिनम 30 की दस-दस गोलियां दिन में तीन बार लेनी चाहिए। रोग के उपचार के लिए उनका कहना है कि एकोनाइट 30, बेलेडोना 30, आरसेनिक अल्बम 30, रूसटॉक्स 30, नक्सवोमिका 30 और इन्फ्लुऐंजीनम 30 उपयोगी सिद्घ होती हैं। पर ये दवाएं रोग के लक्षण के अनुसार ही लेनी चाहिए।
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१५- अपने हाथ बार बार धोएं कम से कम१५ सेकंड्स तक और बहते स्वच्छपानी मे धोएं।
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१६- कमसे कम ८ घंटे की नींद लें अपने सुरक्षात्मक सिस्टम को ठीक रखने के लिए यह जरुरी है।
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१७- रोज ८ से १० ग्लास पानी पियें
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१८- अल्कोहोल का उपयोग न करें क्योंकि ये आपकी सुरक्षा कम करता है
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१९- लक्षण : स्वाइन फ्लू के लक्षण यू तो सामान्य जुकाम जैसे ही होते है परंतु इससे 100 डिग्री तक की बुखार आती है, भूख कम हो जाती है और नाक से पानी बहता है। कुछ लोगों को गले में जलन, ऊल्टी और डायरिया भी हो जाता है। जिस किसी को भी स्वाइन फ्लू होता है। उसमें उपरोक्त लक्षणों में से कम से कम तीन लक्षण तो जरूर दिखाई देते है।
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२०- बच्चों में लक्षण तेज साँस चलना या साँस लेने में तकलीफ होना। त्वचा के रंग में बदलाव आना अगर बच्चा यथोचित पानी नहीं पी रहा है लगातार उल्टियाँ होना फ्लू जैसे लक्षण और ठीक होने के बाद पुनः बुखार आना और खाँसी की बहुत ज्यादा तकलीफ होना। बच्चों के इस बीमारी की चपेट में आने की आंशका ज्यादा है क्योंकि वे स्कूल में दोस्तों से करीब से मिलते-जुलते हैं, बच्चों को इससे बचाएँ।
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२१- खाँसी या छींक आने पर टिशु पेपर का इस्तेमाल करें एवं उसे तुरंत डस्टबीन में फेंकें।
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२२- भीड़ वाली जगह पर न जाएँ।
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२३- यदि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना भी पड़ता है, तो फेस मास्क या रेस्पिरेटर पहनें।
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२४- आसिलटेमाविर (टेमीफ्लू) नाम की दवा यदि लक्षण आरंभ होने के 48 घंटे के अंदर शुरू की जाए तो सहायक हो सकती है।
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