शुक्रवार, 4 मार्च 2011

स्वार्थ को नहीं परमार्थ को साधा जाए

स्वार्थ और परमार्थ में बहुत थोड़ा-सा अन्तर है स्वार्थ उसे कहते हैं जो शरीर को तो सुविधा पहुँचाता हो पर आत्मा की उपेक्षा करता हो । चूँकि हम आत्मा ही है शरीर तो हमारा वाहन या उपकरण मात्र है इसलिए वाहन या उपकरण को लाभ पहुँचे किन्तु स्वामी दुःख पावे तो ऐसा कार्यक्रम मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा । इसके विपरीत परमार्थ में आत्मा के कल्याण का ध्यान प्रधान रूप से रखा जाता है, आत्मा के उत्कर्ष होने से शरीर को सब प्रकार की सुखी एवं सन्तुष्ट रखने वाली आवश्यक परिस्थितियाँ अपने आप उपस्थित होती रहती हैं । केवल अनावश्यक विलासिता पर ही अंकुश लगता है फिर भी यदि कभी ऐसा अवसर आवे कि शरीर को कष्ट देकर आत्मा को लाभ देना पड़े तो उसमें संकोच न करना ही बुद्धिमानी है, यही परमार्थ है । परमार्थ का अर्थ है परम स्वार्थ । 

जिस कार्य के द्वारा तुच्छ स्वार्थ की, शरीर तक सीमित रहने वाले स्वार्थ की पूर्ति होती है वही त्याज्य है । जो स्वार्थ अपनी आत्मा का, शरीर का परिजनों का एवं सारे समाज का हित साधन करता है, वह तो प्रशंसनीय ही है । ऐसा परमार्थ सर्वत्र अभिनंदनीय माना जाता है । वही मनुष्य की सर्वोत्तम दूरदर्शिता का चिह्न भी है । इसी पथ पर चलते हुए इस सुर-दुर्लभ मानव-जीवन का लक्ष्य पूरा हो सकता है । 
-वाङ्मय ६६-२-६८,६९ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

इस अग्निपरीक्षा को स्वीकारें

सभ्य समाज की रचना इस आदर्शवाद को हृदयगंम करने से ही संभव हो सकती है जिसे हमारे पूर्व पुरुषों ने बड़ी श्रद्धा भावना के साथ अपने जीवन का लक्ष्य बनाये रखा था । हो सकता है कि महानता के मार्ग पर चलते हुए किसी को कष्ट और कठिनाईयों की अग्निपरीक्षा में होकर गुजरना पड़े पर उसे आत्मिक-शान्ति और कर्तव्यपालन की प्रसन्न्ता हर घड़ी बनी रहती है । इस मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति को असुविधा हो सकती है पर समाज का विकास इसी त्याग और बलिदान के ऊपर निर्भर रहता है । चरित्रवान् व्यक्ति ही किसी समाज की सुख-सम्पत्ति होते हैं । हम अतीत काल में विश्व के सुदृढ़ आदर्शवाद के आधार पर ही रहे हैं । अतः जबकि हम अपनी उस पुरानी महानता और उज्ज्वल परम्परा को पुनः लौटाने चले हैं तो इस आदर्शवाद का ही अवलम्बन करना होगा । धैर्य और कर्तव्य को दृढ़तापूर्वक जीवन में धारण करना पड़ेगा । 
-वाङ्मय ६६-२-६८ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

महान अतीत को वापस लाने का पुण्य-प्रयत्न

मनुष्य का अन्तःकरण बदलते ही उसकी दुनिया भी बदल जाती है । अब संसार की परिस्थितियाँ जैसी विकृत हो उठी हैं उनका परिवर्तन होना अनिवार्य है अन्यथा हम दिन-प्रति दिन पतन और कष्ट के खड्डे में गिरते जाएँगे । यह परिवर्तन बाहरी हेर-फेर से संभव नहीं हो सकता वरन् उसके लिए मनुष्य की अन्तः चेतना को ही प्रभावित किया जाना चाहिए । इस प्रकार के बदलाव से हम सब रोग-शोक, क्लेश-कलह, पाप-ताप, आधि-व्याधि से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकेंगे । इसके अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा उपाय नहीं है । जिससे संसार भर में फैली अशान्ति मिटकर लोगों को सुख-शान्ति का दर्शन हो सके । 

युग निर्माण योजना इसी को लेकर कार्यक्षेत्र में उतरी है । इस माध्यम से जनता को सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बनाने का एक ठोस प्रयत्न किया जा रहा है । इसके द्वारा अनेक कष्ट, संताप तो मिट ही सकेंगे, पर सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत की महान् निधि 'अध्यात्म' का सच्चा स्वरूप समझने और उसे अपने व्यवहारिक जीवन में स्थान देने का अलभ्य अवसर सर्व-साधारण को प्राप्त हो सकेगा । 

भारतवर्ष यदि अपनी समस्त कठिनाईयों को हल करके संसार का मार्गदर्शन करना चाहे तो उसका एक मात्र आधार अध्यात्म ही है । इसी के द्वारा हमारा भूतकाल महान बन सका था और इसी से भविष्य के उज्ज्वल बनने की आशा भी की जा सकती है । आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम व्यावहारिक अध्यात्म का स्वरूप सर्व-साधारण को समझा सकें और उसके प्रत्यक्ष लाभों से लोगों को अवगत करा दें । 

अशान्ति के दावानल में जलता हुआ समस्त संसार आज अध्यात्म के अमृत के लिए तरस रहा है । हमें आगे बढ़कर इसी महान तत्व ज्ञान का सच्चा स्वरूप प्रकट करने में अपनी शक्ति को लगाना हैयुग निर्माण योजना अध्यात्मवाद को जन-जन के जीवन में प्रविष्ट करने की व्यावहारिक विधि है । जितनी गहराई तक इसकी संभावनाओं पर विचार किया जाता है उतनी ही अधिक आशा बँधती है और लगता है कि यदि हम इस मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चल सके तो प्राचीन काल की तरह भारत पुनः 'स्वर्ग' कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकेगा और संसार के अन्य भागों के निवासी यहाँ से सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा प्राप्त करके पुनः जगद्गुरु का सम्मान प्रदान करेंगे । खोये हुए अतीत को पुनः वापिस लाने का यह अध्यात्मिक प्रयत्न हमारे लिए आशा की किरण बनकर आया है और उसमें हमें अपना योगदान प्रस्तुत करना ही चाहिए । 
-वाङ्मय ६६-२-६३ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

आस्तिकता अर्थात् चरित्रनिष्ठा

इन्हीं मान्यताओं का फल आज हम यह देख रहे हैं कि पूजा-अर्चना में बहुत धन और समय खर्च करने वाले व्यक्ति भी चरित्रिक दृष्टि से बहुत गये-गुजरे देखे जाते हैं । मन्दिर झाँकी, भजन-कीर्तन में बहुत उत्साह दिखाने वाले भी गुप्त-प्रकट रूप से बुरी तरह पाप पंक के डूबे रहते हैं । 'जो कुछ होता है ईश्वर की इच्छा से ही होता है' -ऐसा मानने वाले आलसी और अकर्मण्य बनकर अपनी हीन स्थिति का दोष ईश्वर को लगाते रहते हैं और प्रगति के लिए प्रतीक्षा करते रहते हैं कि जब कभी ईश्वर की इच्छा हो जाएगी तभी अनायास सब कुछ हो जाएगा । ऐसे लोग अनीति और अत्याचारों को भी ईश्वरेच्छा मानकर चुपचाप सहते रहते हैं । वे किसी दीन-दुःखी और निराश्रित की सेवा-सहायता करने से भी इसीलिए विमुख रहते हैं कि इससे ईश्वर की इच्छा को विरोध होगा । इन्हीं मान्यताओं के आधार पर एक हजार वर्ष तक हम विदेशी आक्रमणकारियों के बर्बर अत्याचार सिर झुकाये सहते रहे । सोमनाथ मंदिर की अपार सम्पति लूटते देखकर हमें भगवान की प्रार्थना करने के सिवाय कर्तव्यपालन का कोई अन्य मार्ग न सूझा । 

आस्तिकता का असली स्वरूप भुला कर जो अविवेकपूर्ण धारणा हमने अपनाई, उस के कारण हम वस्तुतः ईश्वर से अधिकाधिक दूर होते गये । आस्तिकता के नाम पर हमने दिखावटी पूजा-पाठ को जो भाव अपनाया उससे हमने पाया कुछ नहीं, केवल खोया ही खोया ।
 
ऐसे विषम समय में तत्वदर्शी लोग भारी पीड़ा अनुभव कर रहे थे कि क्या इन काली घटाओं को चीरकर फिर कभी सच्ची आस्तिकता का सूर्य उदय होगा? यह प्रार्थना ईश्वर ने सुनी और वह दिन फिर सामने आया जिसमें जन साधारण को आस्तिकता का सच्चा स्वरूप समझने का अवसर मिल सके । युग-निर्माण योजना को आस्तिकता के पुनरुद्धार का आन्दोलन ही कहना चाहिए । कहते हैं कि किसी समय नारद जी ने भक्ति का घर-घर प्रचार करने का व्रत लिया था और वे अथक परिश्रम करके सारी पृथ्वी पर अनवरत भ्रमण करते हुए समस्त नर-नारियों को ईश्वर उपासक बनाने में जुट गये । युग-निर्माण-योजना के जन्मदाता ने भी आस्तिकता की प्रेरणा करोड़ों आत्माओं तक पहुँचाई है ओर २४ लाख से अधिक व्यक्ति गायत्री के नैष्ठिक उपासक बनाये हैं । अब प्रयत्न यही है कि घर-घर में आस्तिकता की आस्था फलती-फूलती नजर आवे । युग निर्माण योजना का प्रथम लक्ष्य आस्तिकता का प्रसार करना ही है । समस्त हिन्दू जाति को उसकी संस्कृति के उद्गम केन्द्र से परिचित करने और गायत्री के माध्यम से भावनात्मक एकता उत्पन्न करने के लिए जो प्रयत्न किया जा रहा है, उससे जातीय एकता का एक नवीन अरुणोदय होगा और हम चारों वेदों की जननी महाशक्ति गायत्री के साथ-साथ उसके २४ अक्षरों में सन्निहित अपनी महान् संस्कृति को भी समझ सकेंगे जातीय उत्कर्ष की दृष्टि से निश्चय ही यह एक बहुत बड़ा काम होगा । 

युग निर्माण योजना के अन्तर्गत जिस आस्तिकता का प्रसार किया जा रहा है उसमें जप, तप, हवन, पूजन, भजन, ध्यान, कथा, कीर्तन, तीर्थ, पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि के लिए परिपूर्ण स्थान है पर साथ ही समस्त शक्ति लगा कर हर आस्तिक के मन में यह संस्कार जमाये जा रहे हैं कि ईश्वर को निष्पक्ष, न्यायकारी और घट-घट वासी समझते हुए कुविचारों और दुष्कर्मों से डरें और उनसे बचने का प्रयत्न करें । प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को समाया हुआ समझकर उसके साथ सज्जनता-पूर्ण सद्व्यवहार किया जाए । कर्तव्यपालन को ही ईश्वर की प्रसन्नता का सबसे बड़ा उपहार मानें और प्रभु की इस सुरम्य वाटिका-पृथ्वी में अधिकाधिक सुख-शान्ति विकसित करने के लिए एक ईमानदार माली की तरह सचेष्ट बने रहें अपना अन्तःकरण इतना निर्मल और पवित्र बनाया जाए कि उसमें ईश्वर का प्रकाश स्वयमेव झिलमिलाने लगे । प्रार्थना केवल सद्बुद्धि, सद्गुण, सद्भावना, सहनशीलता, पुरुषार्थ, धैर्य, साहस और सहिष्णुता के लिए आवश्यक क्षमता प्राप्त करने की ही की जाए । परिस्थितियों को सुलझाने और अभावो की पूर्ति के लिए जो साधन हमें मिले हुए हैं उन्हे ही प्रयोग में लाया जाए और संघर्ष का जीवन हँसते-खेलते बिताते हुए मन को संतुलित रखा जाए । ये ही सब आस्तिकता के सच्चे लक्षण हैं । युग निर्माण योजना का प्रयत्न यह हैं कि इन लक्षणों से युक्त भक्ति और पूजा की भावना को जन-मानस में स्थान मिले और सच्ची आस्तिकता के अपनाने के लिए मानव मात्र का अन्तःकरण उत्साहित होने लगें । 

मनुष्य का कल्याण परमपिता परमात्मा की शरण में जाने से ही हो सकता हैं । असुरता के चंगुल से छुड़ाकर देवत्व की ओर अग्रसर होने की प्रवृत्ति ही साधना कहलाती हैं । साधना से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत भी बनता जाता हैं, पर यह तभी सम्भव होता हैं,जब हम जड़-विज्ञान तथा स्वार्थपूर्ण दिखावटी आस्तिकता से बचकर सच्चे स्वरूप में ईश्वर की उपासना करेंगे । युग निर्माण योजना मानव मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिए ही चलाई गई है । 
-वाङ्मय ६६-२-५७,५८,५९ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

आस्तिकता की अभिवृद्धि से विश्व कल्याण की सम्भावना

यह संसार भगवान द्वारा विनिर्मित और उसी से ओत-प्रोत है । यहाँ जो कुछ श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है वह सब भगवान की ही विभूति है । जीव ईश्वर का ही पुत्र-अंश है । उसमें जो कुछ तेज और ऐश्वर्य दिखाई पड़ता है वह ईश्वरीय अंशों की अधिकता के कारण ही उपलब्ध होता है । आत्मा की प्रगति उन्नति और विभूति की संभावना भगवान के सान्निध्य में ही संभव होती है । 

समस्त सद्गुणों का केन्द्र परमात्मा है । जिस प्रकार पृथ्वी पर ताप और प्रकाश सूर्य से ही आता है उसी प्रकार मनुष्य की आध्यात्मिक श्रेष्ठताएँ और विभूतियाँ परमात्मा से ही प्राप्त होती है । इस संसार में समस्त दुःख पापों के ही परिणाम है । मनुष्य अपने किये पापों का दण्ड भुगतता है या फिर दूसरों के पापों के लपेट मे आ जाता है । दोनों प्रकार के दुःखों के कारण पाप ही होते हैं । यदि पापों को मिटाया जा सके तो समस्त दुःख दूर हो सकते हैं । यदि पापों को घटाया जा सके तो मानव जाति के दुःखों में निश्चय ही कमी हो सकती है । कुविचारों और कुकर्मों पर नियंत्रण धर्म-बुद्धि के विकसित होने से ही संभव होता है और यह धर्म-बुद्धि परमात्मा पर सच्चे मन से विश्वास रखने से उत्पन्न होती है । जो निष्पक्ष, न्यायकारी,परमात्मा को घट-घटवासी और सर्वव्यापी समझेगा उसे सर्वत्र ईश्वर ही उपस्थित दिखाई पडे़गा, ऐसी दशा में पाप करने का साहस ही उसे कैसे होगा? पुलिस को सामने खडा देखकर तो दुस्साहसी भी अपनी हरकतें बन्द कर देता है । इसी प्रकार जो व्यक्ति परमात्मा को निष्ठापूर्वक कर्म फल देने वाला और सर्वव्यापी समझ लेगा वह आस्तिक व्यक्ति पाप करने की बात सोच भी कैसे सकेगा? 

ईश्वर का अविश्वास ही पापों की जड़ है, इस अविश्वास से प्रेरित होकर ही मनुष्य मर्यादाओं का उल्लंघन करके स्वार्थ और अहंकार की पूर्ति के लिए स्वेच्छाचारी बन जाता है । आत्म-नियंत्रण के लिए ईश्वर विश्वास अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है । व्यक्तिगत सदाचार और सामूहिक कर्तव्य-परायणता के पालन के लिए ईश्वरीय विश्वास के अतिरक्ति और कोई मार्ग नहीं हो सकता । इसलिए मनीषियों ने मनुष्य के दैनिक आवश्यक कर्तव्यों में ईश्वर उपासना को सबसे प्रमुख और अनिवार्य माना है । जो इसको उपेक्षा करते हैं उनकी र्भत्सना की है और उन्हें कई प्रकार के दण्डों का भय भी बताया है । 

खेद है कि आज नास्तिकता की सत्यानाशी बाढ़ तेजी से बढ़ती चली जा रही है । भौतिकतावादी विचारधाराओं ने यह प्रतिपादित किया है कि ईश्वर न तो आँखों से दिखाई पड़ता है और न प्रयोगशालाओं की जाँच द्वारा सिद्ध होता है इसलिए उसे मानने की आवश्यकता नहीं । अति उत्साही लोग इतनी बात से बहक जाते हैं, न तो वे कर्म आस्था पर विश्वास करते हैं, और न उपासना की कोई आवश्यकता अनुभव करते हैं । 

दूसरे प्रकार के नास्तिक इनसे भी गये-बीते हैं । वे अपने को आस्तिक कहते और किसी ईश्वर को मानते भी हैं पर उनका यह कल्पित ईश्वर वास्तविक ईश्वर से भिन्न होता है । वे समझते हैं कि ईश्वर तो केवल पूजा-स्तुति ही चाहता है, इतने से ही प्रसन्न होकर मनुष्य के पापों पर ध्यान नहीं देता । पूजा करने वालों के समस्त पाप किसी सामान्य धार्मिक कर्मकाण्ड के कर लेने से दूर हो जाते हैं । साथ ही वे ईश्वर से यह आशा रखते हैं कि जरा से पाठ-पूजन के बदले, बिना उनकी योग्यता, पुरुषार्थ और लगन की जाँच किए, वह मनमाना वरदान दे सकता है । और उनकी समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकता है । यह लोग ऐसा भी सोचते हैं कि साधु ब्राह्मण, परमात्मा के अधिक निकट हैं, इसलिए यदि उन्हें दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न कर लिया जाए तो अपनी तगड़ी सिफारिश परमात्मा के यहाँ पहुँच जाती है और फिर तुरन्त ही मनमाने वरदान पाने और पाप के दण्ड से बचने की सुविधा हो सकती है । हम देखते हैं कि आजकल नाममात्र की आस्तिकता इसी विडम्बना की धुरी पर घूम रही है । 

यह प्रच्छन्न नास्तिकता दिखाई तो ईश्वर विश्वास जैसी ही पड़ती है, पर इससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है । आस्तिकता का असली लाभ पाप से भय उत्पन्न करना है । इसके विपरीत जिस मान्यता के अनुसार दस-पाँच मिनट में पूरे हो सकने वाले कर्मकाण्डों द्वारा ही समस्त पापों का फल नष्ट हो सकने का आश्वासन दिया गया हो, उससे तो उलटे पाप के प्रति निर्भयता ही बढ़ेगी । जब पाप-फल से बच सकना इतना सरल मान लिया गया तो दुष्कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले आकर्षणों को छोड़ना कौन पसंद करेगा? ऐसी मान्यता से प्रभावित होकर मध्यकालीन राजाओं और सरदारों ने बर्बर अत्याचार और अनैतिक आचारण करने के साथ-साथ पूजा-पाठ के भी बडे़-बड़े आयोजन किए थे । उन्होंने मंदिर भी बनवाये और भगवान को प्रसन्न करने वाले उत्सव आदि भी किये । पंडितों और ब्रह्मणों को कथा-भजन करने के लिए वृत्तियाँ भी दीं । सम्भवतः वे यही समझते थे कि उनका पहाड़ के बराबर अनैतिकता का कार्य-क्रम इस प्रकार धन द्वारा रचाई पूजा-पाठ की धूमधाम के पीछे छिप जाएगा । पंडितों और पुजारियों ने अपनी आजीविका की दृष्टि से ऐसे आश्वासन भी गढ़ कर रख दिए, जिससे कुमार्गगामी व्यक्ति थोड़ा-बहुत दान-पुण्य करते रहने को तत्पर रहें । दान-पुण्य की परिभाषा भी इन लोगों ने बड़े विचित्र ढंग से की कि केवल ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुये व्यक्ति को जो कुछ दिया जाएगा, वह अवश्य पुण्य माना जाएगा । 

विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रकार की अज्ञानमूलक धारणा व्यक्ति और समाज के लिए हानिकारक परिणाम ही उपस्थित कर सकती है । पापों के दण्ड से बच निकलने का आश्वासन पाकर लोग चरित्रगठन की उपेक्षा करने लगे, पापों का भय जाता रहा । ऐसी अनेक कथा कहानियाँ गढ़ी गईं जिनमें निकृष्ट से निकृष्ट कर्म जीवन भर करते रहने वाले व्यक्ति केवल एक बार अनजाने-धोखे से- 'नारायण' का नाम लेने से मुक्त हो गये । इन कथाओं से सत्कर्मों की व्यर्थता सिद्ध होती है और प्रतीत होने लगता है कि जीवन-शोधन के लिए श्रम और त्याग करने की अपेक्षा थोड़ा-बहुत पूजा पाठ कर लेना ही अधिक सुविधाजनक है । ऐसी शिक्षा देने वाला आध्यात्म वस्तुतः अपने लक्ष्य से ही भ्रष्ट हो जाता है । आस्तिकता का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सदाचारी और र्कत्तव्य परायण बनना है । यदि इस बात को भुलाकर लोग देवताओं को माँस, मदिरा या मिष्ठान्न की रिश्वत देकर मनमाने लाभ प्राप्त करने की बात सोचने लगें तो यह माना जाएगा कि उन्होंने ईश्वर को भी रिश्वत लेकर उल्टा-सीधा,काम करने वाला मान लिया है, फिर तप, त्याग, संयम, धर्म, कर्तव्य आदि के कष्टसाध्य मार्ग की उपयोगिता क्या रह जाएगी? जब ईश्वर अपनी प्रतिमा के दर्शन करने वाले, स्तुति गाने वाले और भोग लगाने वाले पर ही प्रसन्न होने लगा तो फिर यही मार्ग हर किसी को पसन्द आने लगेगा । फिर कोई क्यों उस सद्धर्म के नाम पर कष्ट सहने को प्रस्तुत होगा जिसमें सर्वस्व त्याग और तिल-तिल कर जलने की अग्निपरीक्षा में होकर गुजरना पड़ता है । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

एक समस्या के दो पहलू

भौतिकता और आध्यात्मिकता परस्पर दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं, एक के बिना दूसरी अधूरी है । जंगल में गुफा में भी रहने वाले विरक्त महात्मा को भोजन, प्रकाश, वस्त्र, माला, कमण्डल, आसन, खड़ाऊँ, पुस्तक, कम्बल, आग आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहेगी ही और इन सब को जुटाने को प्रयत्न करना ही पड़ेगा, इसके बिना उसका जीवित रहना भी सम्भव न रहेगा । इतनी भौतिकता तो गुफा निवासी महात्मा को भी बरतनी पड़ेगी और अपने परिवार के प्रति प्रेम और त्याग बरतने की आध्यात्मिकता चोर -उठाईगीर और निरंतर भौतिकवादी को भी रखनी पड़ेगी । भौतिकता को तमतत्व और आध्यात्मिकता को सततत्व माना गया है । दोनों के मिलने से रजतत्व बना है । इसी में मानव की स्थिति है । एक के भी समाप्त हो जाने पर मनुष्य का रूप ही नहीं रहता । तम नष्ट होकर सत ही रह जाए तो व्यक्ति देवता या परमहंस होगा, यदि सत नष्ट होकर तम ही रह जाए तो असुरता या पैशाचिकता ही बची रहेगी । दोनों स्थितियों में मनुष्यत्व का व्यतिरेक हो जाएगा । इसलिए मानव जीवन की स्थिति जब तक है तब तक भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों ही साथ-साथ रहती हैं । अन्तर केवल प्राथमिकता का है । सज्जनो के लिए आध्यात्मिकता की प्रमुखता रहती है, वे उसकी रक्षा के लिए भौतिक आधार की बहुत अंशों तक उपेक्षा भी कर सकते हैं । इसी प्रकार दुर्जनों के लिए भौतिकता का स्थान पहला है । वे उस प्रकार के लाभो के लिए आध्यात्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन भी कर देते हैं । इतने पर भी दोनों ही प्रकृति के लोग किसी न किसी रूप में भौतिक और आत्मिक तथ्यों को अपनाते ही हैं, उन्हें अपनाये ही रहना पड़ता है । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

जीवन के तीन आधार

जितनी आवश्यकता आत्म-कल्याण की है उतनी ही जीवन के तीन आधारों को स्वस्थ रखने की है । शरीर, मन और समाज यही तीन आधार हैं, जिन पर हमारी जीवन-यात्रा गतिमान् रहती है । शरीर अपंग हो जाए, मन उन्मादग्रस्त हो जाए और संसार में युद्ध, दुर्भिक्ष, महामारी, भूकम्प जैसी आपत्तियाँ उत्पन्न हो जाएँ तो कहाँ तो शान्ति रहेगी और कहाँ प्रगति टिकेगी? आत्म-कल्याण का लक्ष्य भी इन परिस्थितियों में किस प्रकार उपलब्ध हो सकेगा? 

राज-शासन और सामाजिक संस्थाओं द्वारा यह प्रयत्न किसी न किसी रूप में रहता ही है कि जनता का शरीर मन और सामाजिक स्तर सुस्थिर रहे, इसके बिना भौतिक प्रगति के सारे प्रयत्न निष्फल रहेंगे । जिस देश के निवासी बीमारी और कमजोरी से घिरे हों, मनों में अविवेक, अन्धविश्वास, असन्तोष घर किए हुए हो, समाज में द्वेष असहयोग, अनीति, पाप स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियाँ पनप रही हों तो उस देश का भविष्य उज्ज्वल कैसे हो सकता है? चाहे कोई देश हो या समाज, गाँव हो या घर, परिवार हो या व्यक्ति जहाँ भी यह असन्तुलन रहेगा, वहाँ न सुख दृष्टिगोचर होगा न शान्ति । पतन और पीड़ा, विक्षोभ और असफलता ही वहाँ फैली-फूटी दिखाई पड़ेगी । 
-वाङ्मय ६६-२-५४ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

हमारे दो कार्यक्रम

हम आत्म-कल्याण और युग-निर्माण इन दो कार्यक्रमों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं । गाड़ी के दो पहियों की तरह हमारे जीवन के दो पहलू हैं-एक भीतरी दूसरा बाहरी । दोनों के सन्तुलन से ही हमारी सुख-शान्ति स्थिर रह सकती है और इसी स्थिति में प्रगति सम्भव है । मनुष्य आत्मिक दृष्टि से पतित हो, दुर्मति-दुर्गुणी और दुष्कर्मी हो तो बाहरी जीवन में कितनी ही सुविधाएँ क्यों न उपलब्ध हों वह दुःखी ही रहेगा । इस प्रगति की यदि बाह्य परिस्थितियाँ दूषित हैं तो आन्तरिक श्रेष्ठता भी देर तक टिक न सकेगी । असुरों के प्रभुता काल में बेचारे सन्त महात्मा जो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ते थे अनीति के शिकार होते रहते थे । भगवान राम जब वनवास में थे तब उन्होंने असुरों द्वारा मारे गये सन्त महात्माओं की अस्थिओं के ढेर लगे देखकर बहुत द़ुःख मनाया । जिस समाज में दुष्टता और र्दुबुद्धि बढ़ जाती है उसमें सत्पुरुष भी न तो अपनी सज्जनता की और न अपनी ही रक्षा कर पाते हैं । इसलिए जीवन के दोनों पहलू ही रथ से जुते हुए दो घोड़ों की तरह संभालने पड़ते हैं । दोनों में ताल-मेल बिठाना पड़ता है । रथ का एक घोड़ा आगे की ओर चले और दूसरा पीछे की तरफ लौटे तो प्रगति अवरूद्ध हो जाती है । इसी प्रकार हमारा बाह्य जीवन और आन्तरिक स्थिति दोनों का समान रूप से प्रगतिशील होना आवश्यक माना गया है ।
-वाङ्मय ६६-२-५३, ५४ 
आत्मा सूक्ष्म है, निराकार है । स्थूल वस्तुओं की सहायता से ही उसका अस्तित्व और आकार सामने आता है । शरीर के आधार पर वह कार्य करता है, मन के आधार पर वह सोचता है और संसार क्षेत्र में गतिशील रहता है । शरीर, मन और संसार यह तीनों ही आत्मा के बाह्य शरीर हैं । इन तीनों की सुव्यवस्था पर आत्मिक स्थिरता निर्भर रहती है । आत्म-कल्याण के लिए ईश्वर उपासना एवं योग साधना की आवश्यकता होती है; यह हमारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है । इसकी पूर्ति के लिए ऋषियों एवं शास्त्रों ने हमें कुछ न कुछ समय नित्य लगाते रहने का आदेश दिया है । उपासना और साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है, स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है । इसीलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष्य के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे अध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है । आत्म-कल्याण का यही मार्ग है । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष

बुराइयों की होली जलाई जा सकती है । जिस प्रकार रामलीला का कागजी रावण मरता है, सूर्पणखा की हर साल नाक कटती है, होली के अवसर पर होलिका राक्षसी की चिता जलाई जाती है, उसी प्रकार अश्लीलता, नशेबाजी, बेईमानी एवं कुरीतियों की होली जलाई जा सकती है और उनके विरूद्ध जन-मानस में घृणा उत्पन्न की जा सकती है । हमें यह पूरा-पूरा ध्यान रखना होगा कि कोई अशान्ति, उत्तेजना या उपद्रव जैसी बात न होने पावे । किसी को चिढ़ाया न जाए, यदि विरोध में कोई कुछ अनुचित व्यवहार भी करे तो पूर्ण शान्त रहा जाए और मुस्कान एवं विनम्रता से उसका उत्तर दिया जाए । 
इस प्रकार के अगणित प्रचारात्मक, सुधारात्मक, आन्दोलनात्मक, विरोधारात्मक, प्रदर्शनात्मक, रचनात्मक एवं सेवात्मक कार्यक्रम हो सकते हैं । स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न योजनाएँ बन सकती है । बड़ों के पैर छूने की, कष्ट पीड़ितों की सेवा करने की और पाठशालाएँ चलाकर विचारात्मक शिक्षा देने की योजना बन सकती है । 

युग-निर्माण की दिशा में उक्त कार्यक्रम पिछले कई वर्षों से भली-भाँति चल रहा है, उसे अब और भी सुव्यवस्थित रूप दिया जाना चाहिए । किन्तु आत्मिक उत्कृष्टता और भौतिक श्रेष्ठता के दोनों लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अब तक के चलते आ रहे अभियान को जितना अधिक हो सके सुव्यवस्थित रूप दिया जाए और इसे सुसंयत रूप से अग्रगामी बनाया जाए । अखण्ड ज्योति जिस मिशन को लेकर अवतीर्ण हुई थी उसे उसने अब तक बहुत शानदार ढंग से निकाला है । अब आगे भी उसे जी जान से जुटे रहना है, लक्ष्य की पूर्ति के लिए हम-सब को अब उसी ओर द्रुतगति से अग्रसर होना है ।
-वाङ्मय ६६-२-५३ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

हमारा आन्तरिक महाभारत

मनुष्य के अन्तःकरण में दो प्रवृत्तियाँ रहती हैं, जिन्हें आसुरी एवं दैवी प्रकृति कहते हैं । इन दोनों में सदा परस्पर संघर्ष चलता रहता है । गीता में जिस महाभारत का वर्णन है और अर्जुन को जिसमें लड़ाया गया है वह वस्तुतः आध्यात्मिक युद्ध ही है । आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल हैं । कौरवों के रूप में उनकी बहुत बड़ी संख्या है, सेना भी उसकी बड़ी है । पाण्डव पाँच ही थे उनके सहायक एवं सैनिक भी थोड़े ही थे फिर भी भगवान ने युद्ध की आवश्यकता समझी और अर्जुन से कहा-लड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं । तामसिक-आसुरी प्रकृति का दमन किये बिना सतोगुणी दैवी प्रकृति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा । इसलिए लड़ना जरूरी है । अर्जुन पहले तो झंझट में पड़ने से कतराये पर भगवान ने जब युद्ध को अनिवार्य बताया तो उसे लड़ने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा । इस लड़ाई को इतिहास 'महाभारत' के नाम से पुकारते हैं । अध्यात्म की भाषा में इसे 'साधना समर' कहते हैं । 

देवासुर-संग्राम की अनेक कथाओं में उसी 'साधना समर' का अलंकारिक निरूपण है । असुर प्रबल होते हैं, देवता उनसे दुःख पाते हैं, अन्त में दोनों पक्ष लड़ते हैं, देवता अपने को हारता-सा अनुभव करते हैं, वे भगवान के पास जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, भगवान उनकी सहायता करते हैं । अन्त में असुर सारे मारे जाते हैं, देवता विजयी होते हैं । देवासुर संग्राम के अगणित पौराणिक उपाख्यानों की पृष्ठभूमि यही है । हमारा अन्तःप्रदेश ही वह धर्म क्षेत्र है, जिसमें महाभारत होता रहता है । असुर मायावी है । तमोगुण का असुर हमें माया में फँसाये रहता है । इन्द्रिय-सुखों का लालच देकर वह अपना जाल फैलाता है और अपने मायापाश में जीव को बाँध लेता है । उस असुर के और भी कितने ही अस्त्र-शस्त्र हैं जिनसे जीव को अपने वशवर्ती करके पद-दलित करने में वह सफल होता है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छह ऐसे ही सम्मोहन अस्त्र हैं, जिसमें मूर्छित होकर जीव बँध जाता है और वह मूर्छा ऐसी होती है कि उससे निकलने की इच्छा भी नहीं होती है वरन् उसी स्थिति में पड़े रहने को जी चाहता है । 

आत्मा का कल्याण उस तम प्रवृत्ति में पड़े रहने से नहीं हो सकता जिसमें माया-मोहित अगणित जीव पाशबद्ध स्थिति में पड़े रहते हैं । इन बन्धनों को काटे बिना कल्याण का और कोई मार्ग नहीं । आत्मा की पुकार 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की है । वह अन्धकार से प्रकाश की ओर जाना चाहती है । तम अन्धकार और सत ही प्रकाश है, उसको धारण करने का 'प्रयत्न ही साधना' है । साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है । तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है । सच्ची शान्ति और प्रगति का मार्ग भी यही है । 

अन्तरात्मा में निरन्तर चलने वाले देवासुर-संग्राम में तामसिकता का पक्ष भौतिक सुख-साधन इकट्ठे करते रहना और सात्विकता का पक्ष आत्म-कल्याण की दिशा में अग्रसर होने का है । जब दोनों में से एक पक्ष प्रबल हो उठता है तो संग्राम में तेजी दिखाई देने लगती है । यदि असुरता प्रबल हुई तो दुष्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होकर पतन का नारकीय परिपाक सामने आ जाता है और यदि सुर पक्ष प्रबल हुआ तो सत्प्रवृत्तियों का उभार आता है और मनुष्य सत्पुरुष, महा-मानव ऋषि एवं देवदूत बनकर पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दु्रतगति से आगे बढ़ता है । 

एक बीच की स्थिति ही, रजोगुण ही अवसाद भूमिका कहलाती है । इसमें तम और सत् दोनों मिले रहते हैं । लड़ाई बन्द हो जाती है और काम-चलाऊ समझौता सा करके दैवी और आसुरी तत्व एक ही घर में रहने लगते हैं, भले और बुरे दोनों की तरह काम मनुष्य करता रहता है । पाप के प्रति घृणा न रहने से, आत्मिक प्रगति की ओर कोई विशेष उत्साह न रहने से दिन काटने की जैसी स्थिति बन जाती है । जैसे मन्द विष पीकर मूर्छित हुए अर्द्धमृत प्राणी की होती है । मानव जीवन जैसा अलभ्य अवसर प्राप्त होने पर इस प्रकार का अवसाद चिन्ताजनक ही है । 
-वाङ्मय ६६-२-१४

आज फिर नये सिरे से हमें उसकी चर्चा जारी करनी होगी, सोई हुई शक्ति को फिर से जगाना होगा, अहंकार को दबा कर रखना होगा । हम दिव्य लोक के जीव हैं, यह ज्ञान हमें फिर से पाना होगा, यही सतयुग की स्थापना करेगा, इसीलिए हमें साधना और तपस्या करनी है । यदि इस प्रयत्न से एक बार भी हम लोग उस स्थान तक पहुँच गये तो पीड़ाओं तथा वेदनाओं से छुटकारा पाकर सिद्ध बनकर सत्य और आनन्द की लीला में प्रविष्ट होकर इस मृत्युलोक को ही स्वर्ग में बदल देंगे । सतयुग के लोग स्वर्गलोक का पता लगाकर इस भूलोक को छोड़ कर वहाँ उस महत् लोक में पहुँचते थे । लेकिन हम लोग स्वर्गलोक के अधिकारी बनकर इस पृथ्वी को नहीं त्यागेंगे हम इस मृत्युलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे । 
-वाङ्मय ६६-२-४५ 

जब तक माया के फंदे से जीव नहीं छूटता है और भेद-भाव के विचार मन में भरे रहते हैं तब तक उसे वास्तविक ज्ञान नहीं होता है । माया के फंदे से छूटकर और भेदभाव के विचारों को भावनाओं को निकालने पर ही उसे ज्ञान होता है, तब दिव्य दृष्टि से देखने लगता है । उसमें तथा ब्रह्म में किसी प्रकार का अन्तर नहीं रह जाता, वास्तव में समस्त ब्रह्माण्ड, यह संसार, हमारा शरीर सभी कुछ ब्रह्ममय है इसलिए इस तरह का ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मृत्युलोक में विचरण करते हुए एक बार फिर से सतयुग की स्थापना करने का भार हम लोगों के ऊपर है जिसे पूरा करना है । नूतन समाज के निर्माण की-नये युग के निर्माण की-जिम्मेदारी हमें उठानी ही होगी । 
-वाङ्मय ६६-२-४५
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

मानसिक स्वच्छता का महत्त्व

मन की चाल दुमुँही है । जिस प्रकार दुमुँहा साँप कभी आगे चलता है, कभी पीछे । उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं । उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाए और किसे रोका जाए यह कार्य विवेक-बुद्धि का है । हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है । यदि सही दिशा में प्रगति हो रही है तो उसे प्रोत्साहन दिया जाये और यदि दिशा गलत है तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाए और, इसी में बुद्धिमत्ता है क्योंकि सही दिशा में चलते हुए मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने में एक दिन दुःखदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ता है । इसलिए समय रहते चेत जाना ही उचित है ।
-वाङ्मय ६६-२-१० 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

युग निर्माण का आधार व्यक्ति-निर्माण

बच्चा आरम्भ में एक पैसा चुराने की आदत सीखता है, बड़ा होने पर वह कुछ बढ़ी-चढ़ी गड़बड़ी करने लगता है, समयानुसार बड़े हाथ मारने की क्षमता प्राप्त करता है और परिस्थितियाँ अनुकूल रहें तो एक दिन नामी चोर होकर जेलखाने पहुंचता है । सभी उसे घृणा की दृष्टि से देखते हैं, कोई अपना नहीं रह जाता । सर्वत्र निन्दा, असहयोग, घृणा ही उसे प्राप्त होती है और कठिनाइयों से पार निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता । एक दूसरा बच्चा उसी का साथी ईमानदारी पर दृढ़ आस्था जमाता है । माँ-बाप उस पर भरोसा करते हैं, अध्यापक उस पर प्रेम और गर्व करते हैं, बड़ा होने पर जहाँ वह कारोबार करता है, वहाँ उसका सम्मान देवता की तरह होता है और अपने कृपालुओं की सहायता से वह बहुत ऊँची स्थिति तक जा पहुँचता है । आरम्भ में इन बालकों के स्वभाव में थोड़ा-सा अन्तर था । एक-दो पैसा चुराने न चुराने या उससे खरीदी जा सकने वाली वस्तु के मिलने न मिलने का कोई बड़ा महत्त्व न था पर इसी भिन्नता ने जब अपनी परिपक्वता प्राप्त की तो दोनों में इतना अन्तर आ गया कि उसका कोई अन्दाजा नहीं । 
-वाङ्मय ६६-२-८ 
बुराई और भलाई की परस्पर विरोधी वृत्तियाँ आरम्भ में बहुत छोटे रूप में होती हैं पर उनका परिपोषण होते रहने से धीरे-धीरे बड़ा विशाल रूप बन जाता है । व्यभिचार का आरम्भ हँसी-दिल्लगी या छोटी उच्छ्रंखलता से होता है, इस मार्ग पर बढ़ते हुए कदम किसी नारी को वेश्या बना सकते हैं । इसके विपरीत यदि सदाचार के प्रति थोड़ी दृढ़ता रहे तो वही वृत्ति उसे आदर्श पतिव्रता के रूप में अजर-अमर बना सकती है । कामचोरी और आलस्य की वृत्ति आरम्भ में छोटी-छोटी उपेक्षा या टालमटोल के रूप में दिखाई पड़ती है पर अन्त में वही व्यक्ति आलस्य, प्रमाद और लापरवाही में अपना सब कुछ गँवा कर दर-दर की ठोकरें खाते-फिरने की स्थिति में पहुंच जाता है । एक-दूसरा व्यक्ति जिसे परिश्रम में अपना गौरव और चमकता भविष्य दीखता है, निरन्तर हँसी-खुशी के साथ परिश्रम करता रहता है और इसी पुरुषार्थ के बल पर वह उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचता है । 
-वाङ्मय ६६-२-८, ९ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

अनैतिक कार्यों में ज्ञान का उपयोग 'ब्रह्मराक्षस'

सामन्तवादी युग में यह विद्या पैसे से खरीदी जाती रही । उनकी विलासी दुष्प्रवृत्तियों के पोषण में कविता साहित्य, गीत, नाटक आदि बड़ी मात्रा में सृजे जाते रहे । मन्दिरों में पाई जाने वाली मूर्तिकला तक में पशु-प्रवृत्तियों की भरमार मौजूद है । वैसे ही चित्र चित्रित किये जाते रहे । यह सब विद्या बुद्धि का दुरुपयोग है । हमारे क्रमिक अधःपतन में यही दुष्प्रवृत्तियाँ प्रधान रूप से कारण बनती चली आई हैं । आततायियों और आक्रमणकारियों ने भी क्षति पहुँचाई पर इस बौद्धिक क्षति ने तो समाज का मेरुदण्ड ही तोड़कर रख दिया । 

आज जबकि घायल समाज को राहत देने वाले साहित्य की जरूरत थी, उद्बोधन आवश्यक थे, तब भी वह ढर्रा बदला नहीं है, वरन् स्वतन्त्रता मिलने के बाद विनाश की स्वतन्त्रता का भरपूर उपयोग किया जा रहा है । धर्म मंच से जो प्रवचन किए जाते रहते हैं उनमें गढे र्मुदे उखाड़ने के अतिरिक्त जीवन संचार और प्रगति के लिये उद्बोधन की दिशा दे सकने वाले तथ्य कहीं ढूँढे नहीं मिलते । व्यक्ति और समाज के युग निर्माण के आधारभूत सिद्धान्तों की कहीं चर्चा तक सुनाई नहीं देती । विद्या से सजी वाणी द्वारा लोकमानस को उद्बोधन मिलना चाहिए था, वह एक प्रकार से मौन ही हो गया है । साहित्य की दशा और भी दयनीय है । पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाला साहित्य लिखा जा रहा है छप रहा है, बिक रहा है । उसी की बाढ़ आई हुई है । लगता है इस बाढ़ में जो कुछ श्रेयस्कर कहीं जीवित रहा होगा वह भी मर-खप जायेगा । 

बहेलियों के पास शिकारी कुत्ते होते हैं । खरगोश, लोमड़ी, हिरण आदि जानवरों के पीछे वे उन्हें दौड़ाते हैं । कुत्ते कई मील दौड़कर भारी परिश्रम के उपरान्त शिकार दबोचे हुए मुँह में दबाये घसीट लाते हैं । बहेलिये उससे अपनी झोली भरते हैं और कुत्तों को एक टुकड़ा देकर सन्तुष्ट कर देते हैं । यही क्रम आज विद्या बुद्धि के क्षेत्र में चल रहा है । पुस्तक-प्रकाशक बहेलिए-तथाकथित साहित्यकारों से चटपटा लिखाते रहते हैं । गन्दे, अश्लील, कामुक, पशु प्रवृत्तियाँ भड़काने वाले चोरी, डकैती, ठगी की कला सिखाने वाले उपन्यास यदि इकट्ठ किए जाएँ तो वे एवरेस्ट की चोटी जितने ऊँचे हो जाएँगे । दिशाविहीन पाठक उन्हीं विष मिश्रित गोलियों को गले निगलता रहता है । चूहों को मारने की दवा आटे में मिलाकर गोलियाँ बनाकर बिखेर दी जाती है, उन्हें खाते ही चूहा तड़प -तड़प कर मर जाता है । यह साहित्य ठीक इसी प्रकार का है । इसे पढ़ने के बाद कोई अपरिपक्व बुद्धि पाठक वैसा ही अनुकरण करने के लिए विवश होता है । अनेक साहित्यकार बहेलियों के कुत्तों की भूमिका प्रस्तुत कर रहे हैं । अनेक प्रकाशक और विक्रेता मालामाल हो रहे हैं । कुछ टुकड़े खाकर यह साहित्यकार पाठकों का माँस इन आततायियों के पेट में पहुँचाने में अपनी विद्या बुद्धि, कला-कौशल का परिचय दे रहे हैं । विद्या माता को व्यभिचारिणी वेश्या के रूप में जिस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, उसे देखकर यही कहना पड़ता है- ''हे भगवान इस संसार से विद्या का अस्तित्व मिटा दो, इससे तो हमारी निरक्षरता ही अच्छी है ।''
-वाङ्मय ६६-१-३५ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

हमारा आत्मवादी जीवन दर्शन

आत्मसम्मान के नाम पर कई बार ओछे स्तर का अहंकार विदूषक जैसा वेष बनाकर सामने आ खड़ा होता है । हमें अहंकार और आत्मसम्मान का अन्तर समझना चाहिए । अहंकार वस्तुओं और परिस्थितियों को खोजता है और उनके आधार पर रुष्ट, तुष्ट होता है, जबकि आत्म-गौरव आन्तरिक स्तर पर-गुण, कर्म, स्वभाव के स्वरूप पर आकांक्षाओं और विचारणाओं की दिशा पर आधारित रहता है । जिसकी अन्तःभूमि उज्ज्वल है उसे बाह्य परिस्थितियों से कुछ लेना-देना नहीं रह जाता । उसे भौतिक जीवन की सफलता, असफलताएँ प्रभावित नहीं करती । सम्पदाएँ नहीं आन्तरिक विभूतियाँ उसकी सन्तुष्टि का केन्द्र रहती है । अहंकारी व्यक्ति जहाँ बाह्य प्रतिकूलताएँ देखकर ही असन्तुलित और रुष्ट-असन्तुष्ट होने लगता है वहाँ आत्मवादी को आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता ही परिपूर्ण सन्तोष दे सकने के लिए पर्याप्त प्रतीत होती है । 
-वाङ्मय ६६-१-२२

'युग निर्माण योजना-दर्शन स्वरूप व कार्यक्रम'

परम पूज्य गुरुदेव युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की घोषणानुसार युग परिवर्तन एक सुनिश्चित संभावना है । युग निर्माण योजना इसी संभावना को साकार करने के लिए बनाई गयी है । युग निर्माण कैसे होगा? इसके सरंजाम कैसे जुटेंगे? तथा इसके भागीदारों का चरित्र-चिंतन कैसा होना चाहिए? इसका विस्तार पूर्वक वर्णन वाङ्मय के खण्ड ६६ 'युग निर्माण योजना-दर्शन स्वरूप व कार्यक्रम' में किया गया है ।
 
इसमें नैष्ठिक परिजनों को झकझोर देने वाली पूज्यवर की अमर-वाणी है । इसे प्रत्येक परिजन को ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए तथा पढ़कर चिंतन-मनन करते हुए आचरण में उतारने का प्रयास करना चाहिए । 

आशा है यह पुस्तक हम सबके भीतर प्रकाश की एक नई किरण बनकर हमारा पथ प्रदर्शन करेगी । 

पहले दो, पीछे पाओ

यह प्रश्न विचारणीय है कि महापुरूष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही क्यों करता है ? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई कि त्याग से बढ़कर प्रत्यक्ष और तुरन्त फलदायी और धर्म नही है। त्याग की कसौटी आदमी के खोटे-खरे रूप को दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन मे जमे हुये कुसंस्कारों और विकारों के बोझ को हलका करने के लिये त्याग से बढकर अन्य साधन हो नही सकता।

आप दुनिया से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, विद्या, बुद्धि संपादित करना चाहते है, तो त्याग कीजिये। गांठ में से कुछ खोलिये। ये चीजें बड़ी मंहगी हैं। कोई नियामत लूट के माल की तरह मुफ्त नही मिलती। दीजिये, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, श्रद्धा, सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो मुक्तहस्त होकर दुनिया को दीजिये, बदले में आप को बहुत मिलेगा। गौतम बुद्व ने राजसिंहासन का त्याग किया, गांधी ने अपनी बैरिस्टरी छोड़ी, उन्होने जो छोड़ा था, उससे अधिक पाया। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टेगोर अपनी एक कविता मे कहते है, ‘‘उसने हाथ पसार कर मुझ से कुछ मांगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक छोटा दाना उसे दिया। शाम को मैने देखा की झोली मे उतना ही छोटा सोने का दाना मोजूद था। मैं फूट-फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला, जिससे मैं भिखारी से राजा बन जाता।’’

आनन्द की खोज

आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान, दरवाजे-दरवाजे पर टकराता फिरता हैं बहुत सा रूपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, सुस्वाद भोजन करें, सुन्दर वस्त्र पहनें, बढ़िया मकान और सवारिया हों, नौकर-चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, बंधुओं से घर भरा हों, उच्च अधिकार प्राप्त हों, समाज मे प्रतिष्ठा हों, कीर्ति हो। ये चीजे आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें ये चीजे प्राप्त नही होती है वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जिनके पास है, वे उससे अधिक लेने का प्रयत्न करते है

इन सब तस्वीरों में आनंद की खोज करते-करते चिरकाल बीत गया, पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती ! उसकी तो खोज ही नही की गई, मानसरोवर की और तो मुँह ही नही किया गया, लम्बी उड़ान भरने की हिम्मत तो बांधी ही नही। मन ने कहा-जरा इसे और देख लूँ। आँखों से न दीख पड़ने वाले मानसरोवर से मोती मिल ही जायेगे, इसकी क्या गारंटी है। फिर ओस चाटी और फड़फड़ाया, फिर यही पहिया चलता रहता है। आपने उनमे खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूंदे ठहरी, वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ी और धूल मे समा गई।

यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिये प्रेरित करती रहती है, फिर भी नाशवान चीजो का नाश होता ही है।

युग निर्माण परिवार के सदस्य इस भाँति सोचें

सार्वजनिक जीवन में कई लोग कई उद्देश्यों से प्रवेश करते हैं । कुछ सचमुच ही आत्मकल्याण और परमार्थ प्रयोजन का लक्ष्य सामने रखकर लोक-मंगल के पुण्य क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । कुछ को धन अथवा यश कमाने की इच्छा रहती है, इसलिए सेवा एवं परमार्थ परायणता की खाल ओढ़कर लोकसेवी बनने का आडम्बर बनाते हैं । युग निर्माण परिवार के परिजनों को उथले स्तर पर खड़े होकर इस क्षेत्र में प्रवेश करना शक्य न होगा ।
 
हमें समझना चाहिए कि भौतिक उद्देश्य के लिए यह युग निर्माण अभियान नहीं चल रहा है । जन मानस का भावनात्मक नवनिर्माण अपना उद्देश्य है । यह कार्य आत्मनिर्माण से ही आरम्भ हो सकता है । अपना स्तर ऊँचा होगा, तो ही हम दूसरों को ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकते हैं । जलता हुआ दीपक ही दूसरे दीपक को जला सकता है । जो दीपक स्वयं बुझा पड़ा है, वह दूसरों को जला सकने में समर्थ नहीं हो सकता ।
 
हम आत्मनिर्माण में प्रवृत्त होकर ही समाज निर्माण का लक्ष्य पूरा कर सकेंगे । युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी स्थिति अनुभव करना चाहिए । उसे विश्वास करना चाहिए कि उसने दैवी प्रयोजन के लिए यह जन्म लिया है । इस युग संधिवेला में उसे विशेष उद्देश्य के लिए भेजा गया है । उसे शिश्नोदर परायण नर-कीटकों की पंक्ति में अपने को नहीं बिठाना है, उसे लोभ-मोह के लिये नहीं सड़ना-मरना है ।
 
युग पुरुष के चरणों पर इस परिवार को जो भावभरी माला सवप्रथम समर्पित की जा रही है, उसका अति महत्त्वपूर्ण मणि मुक्तक है । उसे ऐतिहासिक भूमिका सम्पादन करने का अवसर मिला है । इस अभियान के संचालकों ने उसे प्रयत्न पूर्वक ढूँढ़ा, सँभाला और भावभरी अभिव्यञ्जनाओं से सींचा-सँजोया है । उसे तुच्छता से ऊँचा उठना और महानता का वरण करना है । इसके लिए अवसर उसके सामने गोदी पसारे, चुनौती लिए हुए सामने खड़ा है । आत्मबोध की दिव्य ज्योति से अपने आपको ज्योतिर्मय बनाया जाना चाहिए । इतिहास जिन युग निर्माताओं की खोज में है, उसे उनकी पंक्ति में बिना आग-पीछा सोचे साहसपूर्वक जा बैठना चाहिए । 

युग निर्माण परिवार का प्रत्येक सदस्य आत्मचिन्तन करे, आत्मबोध के प्रकाश से अपना अन्तःकरण आलोकित करे । परिवार की सदस्यता के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्व की गरिमा समझे, तभी वह अपनी समुचित भूमिका सम्पादित कर सकेगा । हमें अपने बारे में इस प्रकार सोचना चाहिए कि जन्म-जन्मान्तर से संग्रहीत अपनी उच्च आत्मिक स्थिति आज अग्नि-परीक्षा की कसौटी पर कसी जा रही है । महाकाल अपने संकेतों पर चलने के लिए बार-बार पुकार रहा है, रीछ-वानरों के पथ पर हमें चलना ही चाहिए । अभियान की संचालक सत्ताएँ बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाए बैठी हैं, उन्हें निराश नहीं करना चाहिए । युग की गुहार जीवित और जाग्रत् सुसंस्कारी आत्माओं का आह्वान कर रही है । उसे तिरस्कृत नहीं किया जाना चाहिए । यह समय ऐसा है जैसा किसी-किसी सौभाग्यशाली के ही जीवन में आता है । कितने व्यक्ति किन्हीं महत्त्वपूर्ण अवसरों की तलाश में रहते हैं, उन्हें उच्चस्तरीय प्रयोजनों में असाधारण भूमिका सम्पादित करने का सौभाग्य मिले और वे अपना जीवन धन्य बनाएँ । यह अवसर युग निर्माण परिवार के सदस्यों के सामने मौजूद है, उन्हें इसका समुचित सदुपयोग करना चाहिए । इस समय की उपेक्षा उन्हें चिरकाल तक पश्चात्ताप की आग में जलाती रहेगी । 

युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने उच्च-स्तर को, महान् कत्तर्व्य और दायित्व को समझना चाहिए । जो कुछ उसे करना है, उसके शुभारम्भ के रूप में आत्मपरिष्कार के लिए आगे बढ़ना चाहिए । अपने आप को हममें से जो जितना उत्कृष्ट, परिष्कृत बना सकेगा, वह उतनी सफलतापूर्वक अपना उत्तरदायित्व पूरा कर सकेगा । समाज का निर्माण, युग का परिवर्तन हमारे अपने निर्माण एवं परिवर्तन के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है । यदि हम दूसरे तथाकथित समाजसेवियों की तरह बाहरी दौड़-धूप तो बहुत करें, पर आत्म-चिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की आवश्यकता पूरी न करें, तो हमारी सामथ्र्य स्वल्प रहेगी और कुछ कहने लायक परिणाम न निकलेगा । लोकनिर्माण व्यक्ति पर अवलम्बित है और व्यक्तिनिर्माण का पहला कदम हमें अपने निर्माण के रूप में ही उठाना चाहिए । 

जिन्होंने युग निर्माण अभियान का घटक परिजन अपने को माना है, उन्हें अपनी वास्तविकता इसी रूप में देखनी, समझनी और स्वीकार करनी चाहिए । भगवान् कुछ करने जा रहे हैं और विश्व की दिशा उलटने वाली है, उसे सर्वनाशी गर्त में गिरने से बचाकर उज्ज्वल भविष्य की दिशा में लौटने के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है । 

इन दिनों सूक्ष्म जगत् में दिव्य हलचलें इसी स्तर की हो रही हैं और उनका क्रम तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है, निकट भविष्य में वह तीव्रतम होने जा रहा है । यह मनुष्यकृत आन्दोलन नहीं है, जो आज चले कल ठप्प हो जाए । जिन लोगों ने इस महाप्रयास में भाग लेने की तड़पन अनुभव की है, उन्हें समझ लेना चाहिए कि यह कोई बहकावा या भाववेश नहीं है । सामयिक उत्तेजना भी इसका कारण नहीं है । यह आत्मा का निर्देश और ईश्वर का संकेत है, उसे उन्होंने एक असाधारण सौभाग्य के रूप में उपलब्ध किया है । ऐसे महान् अवसरों पर अग्रदूत बनने का अवसर हर किसी को नहीं मिलता । रामावतार में जो श्रेय अंगद, हनुमान् और नल-नील को मिला, उससे दूसरों को वंचित ही रहना पड़ा । युग परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में जिन्हें घसीटा या धकेला गया है, उन्हें अपने को आत्मा का, परमात्मा का प्रिय भक्त ही अनुभव करना चाहिए और शान्तचित्त से धैयपूवर्क उस पथ पर चलने की सुनिश्चित तैयारी करनी चाहिए । खींचतान में अनावश्यक समय नष्ट नहीं करना चाहिए । 

आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढररे पर चलते रहे, तो आत्मधिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ, मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत महँगी पड़ेगी । अन्तद्वर्न्द्व उन्हें किसी काम का न छोड़ेगा । मौज-मजा का आनन्द आत्मप्रताड़ना न उठाने देगी और साहस की कमी से ईश्वरीय निर्देश पालन करते हुए जीवन को धन्य बनाने का अवसर भी हाथ से निकल जाएगा । इस दुहरी दुर्गति से बचना चाहिए । उनके लिए इस विषम वेला में अतिरिक्त कार्य और अतिरिक्त उत्तरदायित्व नियति ने निर्धारित किया है, इसे बिना मन डुलाए सच्चे मन से स्वीकार कर लेना चाहिए और उसी के अनुरूप अपनी-अपनी गतिविधियों का निर्माण करना चाहिए । 

युग निर्माण परिवार के हर परिजन को अपने भावी जीवन के लिए एक नियत, निर्धारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और सुनिश्चित कार्यक्रम अपनाना चाहिए । तभी उन्हें शान्ति मिलेगी और वे सन्तोष अनुभव कर सकेंगे । 

श्रेयपथ पर चलने वालों की कुछ आस्थाएँ अत्यन्त सुदृढ़ होनी चाहिए । इस परिवार के प्रत्येक सदस्य की मान्यता यह होनी चाहिए कि वह निःसन्देह एक सुसंस्कारी उच्च आत्मा है । जन्म-जन्मान्तरों से चली आ रही आत्मिक प्रगति के कारण ही उसे जीवित, जाग्रत्, भावनाशील, दूरदर्शी और उदात्त अन्तःकरण मिला है । इस दिव्य परिवार में जुड़ जाना भी इसी शृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । 

ऐसी ही समर्थ आत्माओं को युग परिवर्तन जैसे चिरकाल में सभी आने वाले महान् दैवी प्रयासों में अग्रदूत की तरह नियता नियुक्त किया जाता है । 
अपनी यह आस्था चट्टान की तरह अडिग होनी चाहिए कि युग बदल रहा है, पुराने सड़े-गले मूल्यांकन नष्ट होने जा रहे हैं । दुनिया आज जिस लोभ-मोह और स्वार्थ-अनाचार से सवर्नाशी पथ पर दौड़ रही है, उसे वापस लौटना पड़ेगा । अन्धपरम्पराओं और मूढ़-मान्यताओं का अन्त होकर रहेगाअगले दिनों न्याय, सत्य और विवेक की ही विजय वैजयन्ती फहरायेगी । हमें मूढ़ता और दुष्टतावादियों से तनिक भी प्रभावित नहीं होना चाहिए और विश्वास रखना चाहिए कि बदलना उन्हें भी पड़ेगा । महाकाल के हाथ उन्हें करारी चपत लगाने के लिए उठ ही पड़े हैं । हमें अपने को एकाकी, दुर्बल या साधन-हीन नहीं मानना चाहिए, वरन् यह समझकर चलना चाहिए कि पीछे अजेय शक्तियाँ विद्यमान हैं, जो इस महान् अभियान के अपने प्रयासों को पूर्ण सफलता प्रदान करके रहेंगी । 

हमारा सुदृढ़ निश्चय होना चाहिए कि यह संसार ही भगवान् का सच्चा स्वरूप है । लोकमंगल के लिए किये गये प्रयास भगवान् की सर्वोत्तम पूजा है । ईश्वरीय प्यार को प्राप्त करने के लिए अपना आन्तरिक स्तर को परिष्कृत करना ही सवर्श्रेष्ठ तप-साधना है । इन दिनों यही युग साधना है । योग साधनात्मक विशेष तप संचय के लिये अपना एक शक्तिशाली संयन्त्र काम कर रहा है । उसका उपार्जन हम सभी के लिये है । उसमें से जिस-जिस प्रयोजन के लिए जितनी शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी, सहज ही मिलती रहेगी । अलग-अलग, छुट-पुट तप-साधना और योगाभ्यास के झंझट में पड़ने का यह समय बिल्कुल नहीं है । एक बड़ी भट्ठी पर सबका भोजन पक रहा है, तो अलग-अलग चूल्हे जलाने की क्या आवश्यकता ? इन दिनों आत्मकल्याण का सब से उत्तम माध्यम आत्मनिर्माण और युग निर्माण के महान् अभियान का अंग बनकर काम करना चाहिए । 

हमें लोभ और मोह के अवांछनीय अन्धकार से ऊपर उठना ही चाहिए । परिवार के लालन-पालन के लिये शरीर निर्वाह के लिये हमें उचित की सीमा तक ही रहना चाहिए । लोभवश धन कुबेर बनने की आकांक्षा से और अपने स्त्री-बच्चों को राजा-रानी बना जाने की संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊपर उठना चाहिए । अपना उत्तरदायित्व आत्मकल्याण का भी है और समाज का ऋण चुकाने का भी । समाज की ओर से विमुख रहकर आत्मिक स्तर की उपेक्षा बरतकर लोभ और मोह में अन्तःचेतना बुरी तरह डूबी हुई है । परमार्थ प्रयोजन में समय, श्रम, मनोयोग एवं सादगी का उपयोग करने में जी धड़कता है, साहस नहीं उठता और कंजूसी आड़े आती है, तो समझना चाहिए कि अपनी वाचालता और विडम्बना में ही प्रगति हुई है । आत्मिक स्तर तो गढ्ढे में ही पड़ा है । ऐसी हेय स्थिति में हम में से किसी को भी नहीं पड़ा रहना चाहिए । अपनी आधी सम्पदाएँ और विभूतियाँ शरीर निर्वाह और परिवार पालन के भौतिक पथ को और आधी आत्मपरिष्कार, संस्कार, लोक-मंगल के लिये बाँट देना चाहिए । यह बँटवारा न्यायानुकूल है । भौतिकपक्ष के ऊपर सारा जीवन रस टपका दिया जाए और आत्मिक पक्ष एक -एक बूँद के लिये प्यासा मरे, वह जीवन का अत्यन्त दुर्भाग्य और अतीव दुःखात्मक दुर्घटना होगी । हमें नित्य ही लेखा-जोखा लेते रहना चाहिए कि भौतिक पक्ष को हम आधे से अधिक तो नहीं दे रहे हैं । कहीं आत्मिक पक्ष के साथ अन्याय तो नहीं हो रहा है । 

हम अकेले चलें । सूर्य-चन्द्र की तरह अकेले चलने में तनिक भी संकोच न हो । अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे-सुने अनुसार नहीं वरन् अपने स्वतन्त्र चिन्तन के आधार पर विकसित करें । अन्धी भेड़ो की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें । सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें । सही को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही युग निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूँजी है जिसके आधार पर वे युग साधना की वेला में ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व का सही रीति से निवार्ह कर सकेंगे । ऐसी क्षमता पैदा करना हमारे लिए उचित भी है, आवश्यक भी । 

हमें भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि ईटों का समूह इमारत के रूप में, बूँदों का समूह समुद्र के रूप में, रेशों का समूह रस्सों के रूप में दिखाई पड़ता है । मनुष्यों के संगठित समूह का नाम ही समाज है । जिस समय के मनुष्य जिस समाज के होते हैं, वैसा ही समूह, समाज, राष्ट्र या विश्व बन जाता है । युग परिवर्तन का अर्थ है मनुष्यों का वर्तमान स्तर बदल देना । 
यदि लोग उत्कृष्ट स्तर पर सोचने लगें, तो कल ही उसकी प्रतिक्रिया स्वर्गीय परिस्थितियों के रूप में सामने आ सकती है । युग परिवर्तन का आधार है, जनमानस का स्तर ऊँचा उठा देना । युग निर्माण का अर्थ है भावनात्मक नवनिर्माण । अपने महान् अभियान का केन्द्र-बिन्दु यही है । युग परिवर्तन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये कार्य व्यक्ति निर्माण से आरम्भ करना होगा और इसका सबसे प्रथम कार्य है आत्मनिर्माण । दूसरों का निर्माण करना कठिन ही है । दूसरे अपना कहना न मानें यह सम्भव है, पर अपने को तो अपना कहना मानने मे कुछ कठिनाई नहीं होनी चाहिए । आपका सबसे समीपवर्ती अपने प्रभाव क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाला सबसे पहला और सबसे उपयुक्त व्यक्ति अपना आपा है । हमें नवनिर्माण का कार्य यहीं से आरम्भ करना चाहिए । अपने आपको बदलकर युग परिवर्तन का श्रीगणेश करना चाहिए । 

किसी को बाहरी जानकारी देना हो, समाचार सुनाना हो, गणित, भूगोल पढ़ाना हो, तो यह कार्य वाणी मात्र से भी हो सकता है । लिखकर भी किया जा सकता है और वह प्रयोजन आसानी से पूरा हो सकता है । पर यदि चरित्रनिर्माण या व्यक्तित्व का परिवर्तन करना है, तो फिर उसके सामने आदर्श उपस्थित करना ही प्रभावशाली उपाय रह जाता है । प्रभावशाली व्यक्तित्व अपनी प्रखर कार्यपद्धति से अनुप्राणित करके दूसरों को अपना अनुयायी बनाते है । संसार के समस्त महामानवों का यही इतिहास है । उन्हें दूसरों से जो कहना था, कराना था, वह उन्होंने पहले स्वयं किया, उसी कृतत्व का प्रभाव पड़ा । 

बुद्ध ने स्वयं घर त्यागा, तो उनके अनुयायी ढाई लाख युवक, युवतियाँ उसी मार्ग पर चलने के लिए तैयार हो गये । गाँधीजी को जो दूसरों से कराना था, पहले उन्होंने उसे स्वयं किया । यदि वे केवल उपदेश करते और अपना आचरण विपरीत प्रकार का रखते, तो उनके प्रतिपादन को बुद्धिसंगत भर बताया जाता, कोई अनुगमन करने को तैयार न होता । जहाँ तक व्यक्ति के परिवर्तन का प्रश्न है, वह परिवर्तित व्यक्ति का आदर्श सामने आने पर ही सम्भव होता है । बुद्ध, गाँधी, हरिश्चन्द्र आदि ने अपने को एक साँचा बनाया, तब कहीं दूसरे खिलौने, दूसरे व्यक्तित्व उसमें ढलने शुरू हुए । 

युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को यह देखना है कि वह लोगों को क्या बनाना चाहता है, उनसे क्या कराना चाहता है ? उस भारी कार्यपद्धति को, विचारशैली को पहले अपने ऊपर उतारना चाहिए, फिर अपने विचार और आचरण का सम्मिश्रण एक अत्यन्त प्रभावशाली शक्ति उत्पन्न करेगा । उससे अगणित व्यक्ति प्रभावित होते तथा बनते-ढलते चले जायेंगे । अपनी निष्ठा कितनी प्रबल है, इसकी परीक्षा पहले अपने ऊपर ही करनी चाहिए । यदि आदर्शों को मनवाने के लिए अपना आपा हमने सहमत कर लिया, तो निःसन्देह अगणित व्यक्ति हमारे समर्थक, सहयोगी, अनुयायी बनते चले जाएँ । फिर युग परिवर्तन अभियान की सफलता में कोई व्यतिरेक, व्यवधान शेष न रह जाएगा । बाधा एक ही है कि हम जिस विचारणा को दूसरों से मनवाना चाहते हैं, उसे अपने गले उतारने को तैयार नहीं होते । यदि इस समस्या को हल कर लिया गया, तो समझना चाहिए सफलता की तीन चौथाई मंजिल पार कर ली । 

व्यक्तिगत जीवन मे हर मनुष्य को व्यवस्थित, चरित्रवान, सद्गुणी और सत्प्रवृत्ति सम्पन्न बनाने की अपनी शिक्षा पद्धति है । उसे हमें अपने व्यावहारिक जीवन में उतारना चाहिए । समय की पाबन्दी, नियमितता निरालस्यता, श्रमशीलता, स्वच्छता वस्तुओं की व्यवस्था जैसी छोटी-छोटी आदत ही किसी व्यक्तित्व को निखारती, उभारती हैं । बया पक्षी का सुन्दर घोंसला मामूली तिनकों का होता है, पर उसे बनाया कुशलता, तत्परता और मनोयोग के साथ जाता है । अपनी छोटी-छोटी आदतें यदि परिष्कृत स्तर की हैं, तो उसका प्रभाव परिवार, पड़ोस से आरम्भ होकर हर दूर क्षेत्रों तक फैलता चला जाएगा । 

अपनी वाणी में नम्रता, शिष्टता, मधुरता और शीलता का समावेश होना ही चाहिए । उसमें दूसरों के सम्मान का समुचित पुट रहना चाहिए । ईमानदारी और प्रामाणिकता ही किसी व्यक्ति का वजन बढ़ाती है । बेईमान, लफंगे, झूठे, ठग और चालाक व्यक्ति अपनी इज्जत खो बैठते हैं और फिर उनकी साधारण बातों पर भी कोई भरोसा नहीं करता । लोग यह भी भारी भूल करते हैं कि अपने दोष-दुर्गुणों के छिपे रहने की बात सोचते रहते हैं । यह सर्वथा असम्भव है, पारा पचता नहीं, कोई उसे खा ले तो शरीर में से फूट निकलता है । दुष्प्रवृत्तियाँ और दुर्भावनाएँ, पाप और कुकर्म, निकृष्टता और दुष्टता के जो भी तत्त्व अपने भीतर होंगे, उनके छिपे रहने की कोई सम्भावना नहीं है । पाप छत पर चढ़कर चिल्लाते हैं । यह उक्ति सोलहों आने सच है । शराब पीकर भी दुर्गन्ध न आये, नशा न आये, यह सम्भव नहीं । मक्खी खाने पर कै हो ही जायेगी, पेट का सब बाहर निकल ही जाएगा । मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न न करें, यह सम्भव नहीं । शाश्वत सत्य को झुठलाने का प्रयास न करना ही श्रेयस्कर है । आत्म परिष्कार ही उसका एकमात्र हल है । 

युग परिवर्तन का अर्थ है, व्यक्ति परिवर्तन और यह महान् प्रक्रिया अपने से आरम्भ होकर दूसरों पर प्रतिध्वनित होती है । यह तथ्य हमें हजार बार मान लेना चाहिए और उसे कूट-कूट कर नस-नस में भर लेना चाहिए कि दुनिया को पलटना जिस उपकरण के माध्यम से संभव है, वह अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही है । भले ही अपनी वाणी काम न करे, भले ही प्रचार और भाषण करना न आये पर यदि हम अपने को ढालने में सफल हो गये, तो उतने भर में भी अगणित लोगो को प्रभावित कर सकेंगे । अपना व्यक्तित्व हर दृष्टि में आदर्श, उत्कृष्ट बनाने और सुधारने, बदलने के लिए हम चल पड़े, तो निश्चित रूप से हमें निर्धारित लक्ष्य तक पहुचने में तनिक भी कठिनाई न होगी । 
-वाङ्मय ६६.१.२५-२८ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

साधुता ?

एक मित्र साधु हो गए। साधु होने के बाद पहली बार मिलने आए। उन्हें गैरिक वस्त्रों में देखा तो मैने कहा, मैं तो सोचता था कि सच ही तुम साधु हो गए हो, लेकिन यह क्या ? ये वस्त्र क्यों रंग डाले हैं ? मेरे अज्ञान पर मुस्कराते हुए वे बोले, ‘‘साधु का अपना वेश होता हैं।’’ यह सुन मैं सोच में पड़ गया, तो उन्होंने कहा, ‘‘इसमें सोच की क्या बात हैं ? मैंने कहा, ‘‘पहनने की मनाही नहीं हैं, न पहनने की शर्त नहीं हैं। प्रश्न कुछ विशेष पहनने या कुछ भी न पहनने के आग्रह का हैं। मित्र, वेश वस्त्रों में नहीं, आग्रह में हैं।’’ वे बोले, ‘‘वेश से स्मृति रहती हैं कि मैं साधु हूँ।’’ अब हँसने की मेरी बारी थी। 

मैने कहा, ‘‘मैं जो हूँ, उसकी स्मृति रखनी ही नही होती है। मैं जो नहीं हूँ उसकी ही स्मृति को संभालना पड़ता हैं। और फिर जो साधुता वस्त्रों से याद रहे, क्या वह भी साधुता हैं ? वस्त्र तो बहुत ऊपर हैं और उथले हैं। चमड़ी भी गहरी नहीं हैं। मांस-मज्जा भी बहुत गहरी नहीं हैं। मन भी गहरा नहीं हैं। आत्मा के अतिरिक्त और कोई ऐसी गहराई नहीं हैं जो साधुता का आवास बन सके। और स्मरण रहे कि ऊपर जिनकी दृष्टि हैं, वे भीतर से वंचित रह जाते हैं। वस्त्रों पर जिनका ध्यान हैं, वे उस ध्यान के कारण ही आत्मा के ध्यान में नहीं जा पाते हैं। संसार और क्या है ? वस्त्रों पर केन्द्रित चित्त ही तो संसार हैं जो वस्त्रों से मुक्त हो जाता हैं, वही साधु हैं। 
-ओशो 

युगतीर्थ में साधना का विशेष महत्व

शांतिकुंज एक संस्कारित तपस्थली है, जहाँ करोड़ों गायत्री मंत्र के जप-अनुष्ठान अब तक संपन्न हो चुके हैं व नित्य लाक्षाधिक जप संपन्न होकर नौकुंडी यज्ञशाला में साधकों द्वारा आहुतियाँ दी जाती हैं । यह ब्रह्मऋषि विश्वामित्र की तपस्थली भी है तथा परमपावनी पुण्यतोया भागीरथी के तट पर हिमालय के हृदय उत्तरांखड के द्वारा पर यह अवस्थित है । इसी कारण इसे एक सिद्घाश्रम की, युगतीर्थ की उपमा दी जाती है, जिसके कल्पवृक्ष के तले साधना करने वाला साधक अपनी मनोवांछित कामनाएँ ही नहीं पूरी करता, यथाशक्ति मनोबल-आत्मबल भी संपादित करके लौटता है । 

शांतिकुंज की तीर्थगरिमा एवं स्थान की विशेषता का अनुभव करते हुए जब कभी उपासकों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है और सीमित आकार के आश्रम में किसी प्रकार ठूँस-ठाँस करके इच्छुकों का तारतम्य बिठाना पड़ता है तो अनुष्ठान को अति संक्षिप्त पाँच दिन का भी कर दिया जाता है और उतने ही दिन में मात्र १०८ माला का अति संक्षिप्त अनुष्ठान करने से भी काम चला लिया जाता है । कुछ साधक ऐसे भी होते हैं, जिन्हें अत्यधिक व्यस्तता रहती है । उनके लिए भी पाँच दिन शांतिकुंज रहकर अनुष्ठान कर लेने की व्यवस्था बना दी जाती है, पर यह है-आपत्तिकालीन न्यूनतम व्यवस्था ही । 

जिन्हें अत्यधिक व्यस्तता नहीं है और जिन पर काम का अत्यधिक दबाव नहीं है, उनके लिए ९ दिन का २४ हजार जप वाला परंपरागत अनुष्ठान ही उपयुक्त पड़ता है । इतनी अवधि शांतिकुंज के वातावरण में रहकर व्यतीत की जाए तो वह अपेक्षाकृत अधिक फलप्रद और अधिक प्रभावोत्पादक रहती है । इतनी अवधि में सत्संग के लिए प्रवचनपरक वह लाभ भी मिल जाता है, जिसे जीवन-कला का शिक्षण एवं उच्चस्तरीय जीवनयापन का लक्ष्यपूर्ण मार्गदशर्न कहा जा सकता है । कितने ही लोगों की अभिलाषा हरिद्वार, ऋषिकेश, लक्ष्मणझूला, कनखल आदि देखने की भी होती है । वह अवकाश भी तभी मिलता है, जब नौ दिन का संकल्प लेकर अनुष्ठान-प्रक्रिया में प्रवेश किया जाए । जिन्हें सवालक्ष का चालीस दिन में संपन्न होने वाला अनुष्ठान करना हो, उन्हें अपने घर पर ही रहकर उसे करना, चाहिए, क्योंकि शांतिकुंज में इतनी लंबी अवधि तक रहने की सुविधा मिल सकना हर दृष्टि से कठिन पड़ता है । 

इक्कीसवीं सदी में एक लाख प्रज्ञा-संगठन बनाने और एक करोड़ व्यक्तियों की भागीदारी का निश्चित निधार्रण किया गया है । उस निमित्त भी वरिष्ठ भावनाशीलों को बहुत कुछ सीखना, जानना और शक्ति-संचय की आवश्यकता पड़ेगी । यह प्रसंग अधिक विस्तार से समझने और समझाने का है, इसलिए भी नौ दिन का समय निकालकर शांतिकुंज में प्रेरणा, दक्षता एवं क्षमता उपलब्ध करने की आवश्यकता पड़ेगी । अच्छा हो कि जिनके पास थोड़ा अवकाश हो, वे नौ दिन का सत्र हर महीने तारीख १ से ९, ११ से १९ तथा २१ से २९ तक का पूरा करें जो निरंतर जारी रहते हैं किन्तु पाँच दिन के सत्रों में ही जिन्हें आना है, उनके लिए तारीख १ से ५, ७ से ११, १३ से १७ और १९ से २३ तथा २५ से २९ तक का निधार्रण है । ये दोनों साथ-साथ ही चलते रहते हैं । जिन्हें जैसी सुविधा हो, अपने पूरे परिचय समेत आवेदन-पत्र भेजकर समय से पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए । बिना स्वीकृति लिए आने वालों को स्थान मिल सके, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती । अशिक्षितों, जराजीर्ण तथा संक्रामक रोगग्रस्तों को प्रवेश नहीं मिलता । 

पुरूषों की तरह महिलाएँ भी सत्र-साधना के लिए शांतिकुंज आ सकती हैं पर उन्हें छोटे बच्चों को लेकर आने की धमर्शाला-स्तर की व्यवस्था यहाँ नहीं है । साधना, प्रशिक्षण और परामर्श में प्रायः इतना समय लग जाता है कि उस व्यस्तता के बीच छोटे बालकों की साज-सँभाल बन नहीं पड़ती है । अतःमात्र उन्हीं को सत्रों में आना चाहिए, जो निविर्घ्न कुछ समय रहकर साधना कर यहाँ के वातावरण का लाभ ले सकें व अनुशासित व्यवस्था में भी गड़बड़ी न आने दें । 

संस्कारों की सुलभ व्यवस्था 
शांतिकुंज में यज्ञोपवीत-संस्कार और विवाह-संस्कार कराने की भी सुव्यवस्था है । इस प्रयोजन में प्रायः आडम्बर बहुत होता देखा जाता है । खरचीले रस्मो-रिवाज भी पूरे करने पड़ते हैं, इसलिए उनकी ओर हर किसी की अपेक्षा बढ़ती जाती है । शांतिकुंज में यह  कृत्य भी बिना खरच के होते हैं । परिजनों के परिवारों में यह प्रचलन विशेष रूप से चल पड़ा है कि यज्ञोपवीत धारण के साथ जुड़ी हुई गायत्री मंत्र की अवधारणा इसी पुण्यभूमि में संपन्न कराई जाए । 

स्पष्ट है कि खरचीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं । बिना दहेज और जेवर वाली शादियाँ प्रायः स्थानीय प्रतिगामिता के बीच ठीक तरह बिना विरोध के बन नहीं पड़तीं, इसलिए विगत लंबे समय से चलने वाली ९ कुंडों की यज्ञशाला का दैवी प्रभाव अनुभव करते हुए संस्कार संपन्न कराने के लिए गायत्री माता के संस्कारों से अनुप्राणित यह स्थान ही अधिक उपयुक्त माना जाता है । हर वर्ष बड़ी संख्या में ऐसे विवाह यहाँ संपन्न होते रहते हैं । 

साधना के लिए, विशेषतः गायत्री-उपासना के लिए शांतिकुंज में यह उपक्रम संपन्न करना सोने और सुगंध के समिम्मश्रण जैसा काम देता है । 
इस भूमि में रहकर साधना करने की इसलिए भी अधिक महत्ता है कि उसके साथ युगसंधि महापुरश्चरण की प्रचंड प्रक्रिया भी अनायास ही जुड़ जाती है और प्रतिभा-परिष्कार का वह प्रयोजन भी पूरा होता है, जिसके माध्यम से भावी शातब्दी में महामानवों के स्तर की भूमिका निबाहने का सुयोग बन पड़ता है । युगशक्ति गायत्री का, मिशन के संचालन को दिया गया आश्वासन जो है !

उपासना, विधान और तत्त्वदर्शन

सामान्य विधि-विधान में गायत्री मंत्र का ॐकार, व्याहृति समेत त्रिपदा गायत्री का जप ही शांत एकाग्रमन से करने पर अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति हो जाती है । जप के साथ ध्यान भी अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है । गायत्री का देवता सविता है । सविता प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं । यही ध्यान गायत्री-जप के साथ किया जाता है, साथ ही यह अभिव्यक्ति भी उजागर करनी होती है कि सविता की स्वर्णिम किरणें अपने शरीर में प्रवेश करके ओजस्, मनःक्षेत्र में प्रवेश करके तेजस् और अन्तःकरण तक पहुँकर वर्चस् की गहन स्थापना कर रही हैं-स्थलू, सूक्ष्म और कारण-शरीरों को समर्थता, पवित्रता और प्रखरता से सरावोर कर रही हैं । यह मान्यता मात्र भावना बनकर ही नहीं रह जाती वरन् अपनी फलित होने वाली प्रक्रिया का भी परिचय देती है । गायत्री की सही साधना करने वालों में ये तीनों विशेषताएँ प्रस्फुटित होती देखी जाती हैं । 

शुद्घ स्थान पर, शुद्घ उपकरणों का प्रयोग करते हुए शुद्घ शरीर से गायत्री-उपासना के लिए बैठा जाता है । यह इसलिए कि अध्यात्म-प्रयोजनों में सर्वतोमुखी शुद्घता का संचय आवश्यक है । उपासना के समय एक छोटा जलपात्र कलश के रूप में और यज्ञ की धूपबत्ती या दीपक अग्नि के रूप में पूजाचौकी पर स्थापित करने की परांपरा है । पूजा के समय अग्नि स्थापित करने का अर्थ-अग्नि को अपना इष्ट मानना एवं तेजस्विता, साहसिकता और आत्मीयता जैसे गुणों से अपने मानस को ओतप्रोत करना । जल का अर्थ है-शीतलता, शांति नीचे की ओर ढलना अर्थात् नम्रता का वरण करना । 

पूजाचौकी पर साकार उपासना वाले गायत्री माता की प्रतिमा रखते हैं । निराकार में वही काम सूर्य का चित्र अथवा दीपक या अग्नि रखने से काम चल जाता है । पूजा के समय धूप, दीप, नैवेद्य पुष्प आदि का प्रयोग करना होता है । ये सब भी किन्हीं आदर्शें के प्रतीक हैं । अक्षत अर्थात् अपनी कमाई का एक अंश भगवान् के लिए अर्पित करते रहना । दीपक अर्थात् स्वयं जलकर दूसरों के लिए प्रकाश उत्पन्न करना । पुष्प शोभायमान भी होते हैं और सुगंधित भी । मनुष्य को भी अपना जीवनयापन इसी प्रकार करना चाहिए । पंचोपचार की पूजा-सामग्री इसलिए समर्पित नहीं की जाती कि भगवान को उनकी आवश्यकता है वरन् उसका प्रयोजन यह है कि दिव्यसत्ता यह अनुभव करे कि साधक यदि सच्चा हो तो भक्तिभावना में इन सद्गुणों का जुड़ा रहना अनिवार्य स्तर का होना चाहिए । 

उपचार-सामग्री यदि न हो तो सब कुछ ध्यानरूप में मानसिक स्तर पर किया जा सकता है । जिस प्रकार बड़े आकार वाली यज्ञ-प्रक्रिया को छोटे दीपयज्ञों के रूप में सिकोड़ लिया गया है, उसी प्रकार कर्मकाण्ड सहित पूजा-उपचार का मात्र भावना-स्तर पर मानसिक कल्पनाओं के आधार पर किया जा सकता है । रास्ता चलते, काम-धाम करते, लेटे-लेटे भी गायत्री-उपासना कर लेने की परंपरा है, पर वह सब होना चाहिए भाव-संवेदना पूर्वक, मात्र कल्पना कर लेना ही पर्याप्त नहीं है । 

गायत्री-अनुष्ठानों की भी एक परंपरा है । नौ दिन में चौबीस हजार जप का विधान है, जिसे प्रायः आश्विन या चैत्र की नवरात्रियों में किया जाता है, पर उसे अपनी सुविधानुसार कभी भी किया जा सकता है । इसमें प्रतिदिन २७ मालाएँ पूरी करनी पड़ती हैं और अंत में यज्ञ-अग्निहोत्र संपन्न करने का विधान है । 

सवालक्ष-अनुष्ठान चालीस दिन में पूरा होता है । उसमें ३१ मालाएँ प्रतिदिन करनी पड़ती हैं । उसके लिए महीने की पूर्णिमा के आरंभ या अंत को चुना जा सकता है । 

सबसे बड़ा अनुष्ठान २४ लाख जप का होता हैं, प्रायः एक वर्ष में पूरा किया जाता है । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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