मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

हमें स्वयं ही विभूतिवान सिद्ध होना होगा

Kalpana Shakti
साहित्यकार, कलाकार, धर्म नेता, विज्ञानी-प्रतिभा यहॉं तक कि सत्ताधारी भी युग की आवश्यकता और दिशा का पूर्वाभास अनुभव कर रहे हैं और उन्हें विश्वास हो गया है कि समय के साथ चलने में ही भलाई है । वे नियति की प्रेरणा और भगवान की इच्छा को समझने लगे हैं । तदनुसार उनमें सामयिक परिवर्तन सरलतापूर्वक हो सकेगा । इसकी स्पष्ट झलक-झॉंकी अगले ही दिनों सबके समझ आ जायेगी ।

किन्तु धनाधीशों के बारे में अभी यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे समय को न तो समझ ही पा रहे हैं और न उसके साथ बदलने को तैयार हैं । अधिकाधिक संग्रह, अधिकाधिक अपव्यय और अधिकाधिक अहंकार की पूर्ति में यह क्षेत्र उतने गहरे दलदल में फॅंस गया है कि वापस लौटना कठिन ही दीखता है । कोई धनी अपने को निर्धन बनाने के लिए तैयार नहीं । परमार्थ के नाम पर आत्मविज्ञापन के लिए बदले में परलोकगत विपुल सुख सुविधा खरीदने के लिए ही कोई कुछ पैसे-कौड़ी फेंक सकता है, इससे आगे की आशा नहीं की जा सकती । आज कोई भी भामाशाह, अशोक, मान्धाता, वाजिश्रवा, जनक, भरत, हरिशचन्द्र की तरह उपार्जन क्षमता का लाभ इन्द्रिय लिप्सा की अहंता की तृप्ति से आगे अन्य किसी काम में करने के लिए तैयार नहीं । उपार्जन की, न्याय की व औचित्य की मर्यादाएँ टूट चुकीं हैं । जिससे-जैसे बन पड़ रहा है वह उचित-अनुचित का भेदभाव किये बिना दोनों हाथों से कमाने में लगा है । कौशल के अन्तर कें कारण कोई आगे रहता है कोई पीछे , घुड़-दौड़ में भी यही होता रहता है पर दिशा सभी घोड़ों की एक ही है । उनकी चेतना इतनी परिपक्व हो गई है कि उस पर उपदेशों की बूँदें चिकने घड़े पर पड़ऩे के बाद इधर-उधर ढुलक कर रह जाती हैं । प्रभाव कुछ नहीं होता ।

लगता है विभूति का यह क्षेत्र दुबारा गलाने के लिए भट्टी में भेजना पड़ेगा । वहॉं नये सॉंचे में ढल सकने लायक नरमी पैदा हो सकेगी । गॉंधी की ट्रस्टीशिप, विनोबा का भूदान, सम्पत्ति दान, ऋषियों का अपरिग्रह अब दर्शनशास्त्र का एक पाठ्यप्रकरण भर है । उसे व्यवहार में उतारने की कोई गुजायश नहीं दिखती । फलत: उसके भाग्य में दुर्गति होती ही लिखी दीखती है । फ्राँस के लुई, रूस के जार, भारत के राजाधिराज, चीन के अमीर, महाकाल की एक लात से किस तरह चूर्ण-विचूर्ण हो गये, उसे कोई देख समझ सका तो मानवी निर्वाचन में प्रयुक्त होने वाले चंद पैसों को छोडक़र विपुल सम्पदा का उपयोग लोककल्याण के लिए और अभाव को मिटाने के लिए किया गया होता, मिलजुल कर बाँटा खाया गया होता, तो संसार में शान्ति और समृद्धि की कोई कमी न रहती । यों लंका में विभीषण भी हो सकते हैं, पर उतने भर से क्या बनेगा ?

समय आर्थिक क्षेत्र में साम्यवाद को ही प्रतिष्ठापित करेगा । यह प्रक्रिया कहाँ धीमी होती है, कहाँ झटके से उतरती हैं यह बात दूसरी है पर होना यही है । राजा महाराजाओं का स्वरूप अब अजायबघरों की शोभा बढ़ायेगा । इतिहास के पृष्ठों पर कौतूहलपूर्वक पढ़ा जायेगा । ठीक इसी प्रकार कुछ समय पश्चात् अमीर उमराव, धनाध्यक्ष और वैभवशाली वर्ग भी अपना अस्तित्व समाप्त कर लेगा, समय की आवश्यकता, उपयोगिता से बाहर की चीजें कूड़े-करकट के ढेर में डाली जाती रही हैं । सम्पन्नता की भी अगले दिनों ऐसी दुर्गति ही होने जा रही है ।

यह सब तो भविष्य का दिग्दर्शन हुआ । युग परिवर्तन के लिए आज जिन विभूतियों की आवश्यकता पड़ रही है, उनमें एक का नाम सम्पत्ति भी है । विद्या की तरह उसका भी महत्व है । कॉंटे से कॉंटा निकाला जाता है, तलवार से तलवार का मुकाबला होता है । सम्पत्ति के मोर्चे पर भी हमें लडऩा-अडऩा पड़ेगा । बौद्धिक परिवर्तन के लिए ज्ञानयज्ञ और संघर्षात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन भी साधनों की अपेक्षा करता है । इसकी पूर्ति धनी वर्ग चाहता तो अति सरलतापूर्वक कर सकता था पर वह मरणासन्न रोगी की तरह है उसके सुधरने-बदलने की आशा लगभग छोड़ ही देनी चाहिए और प्रयोजन की पूर्ति के लिए हमें सीता जन्म के लिए किये गये ऋषि रक्त संचय की तरह ही आत्मोत्सर्ग की एक और कड़ी जोडक़र, एक और परीक्षा उत्तीर्ण करनी चाहिए ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (३.४४)

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