शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

उगना और चुगना.

दो बीज वसंत के मौसम में उपजाऊ मिटी मे पास -पास पड़े थे । पहले बीज ने कहा , 'में उगना चाहता हूँ ! में अपनी जड़े जमीं की गहराई में भेजना चाहता हूँ और अपने अंकुरों को जमीं के परत के ऊपर धकेलना चाहता हूँ ...वसंत के आगमन की घोषणा करने के लिए मैं अपनी कोमल कलियों को झंडो की तरह लहराऊंगा.. अपने चेहरे पर सूरज की गर्मी और अपनी पंखुडियों पर सुबह की ओस महसूस करना चाहता हूँ '

इसलिए वह बीज उग गया ।

दुसरे बीज ने कहा ,

'मुझे डर लग रहा है, अगर मैंने अपनी जड़े जमीं के नीचे भेजी ,तों क्या पता अंधेरे में वहां क्या मिलेगा? अगर मैंने अपने ऊपर की कठोर जमीं में अपने अंकुर गडाये तो हो सकता है की मेरे नाजुक अंकुरों को नुकसान हो जाए ... अगर मैंने कलियाँ खोली , और कही घोंघे ने उन्हें खाने की कोशिश की , तो क्या होगा ? अगर मैंने अपनी फूल की पंखुडिया खोली तो कोई भी छोटा बच्चा मुझे उखाड़ सकता है । नही, अच्छा यही रहेगा की मैं सब कुछ सुरक्षित होने तक यही इंतजार करूं । 'इसलिए वह बीज इन्तजार करता रहा ।

एक दिन एक मुर्गी मैदान में खाना खोज रही थी, तभी उसे वह बीज दिखायी दे गया और उसने झट से उसे खा लिया ।

डरना किसी चीज का हल नही है । आप अन्धेरें में जाने से डरेंगे तो हो सकता है की बिजली की कड़क भी आपको भरी रौशनी में नष्ट करने को तैयार मिले ।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

ख़ुद पर भरोसा

एक बार बहुत से मेंढक जंगल से जा रहे थे। वे सभी आपसी बातचीत में कुछ ज्यादा ही व्यस्त थे। तभी उनमें से दो मेंढक एक जगह एक गड्ढे में गिर पड़े। बाकी मेंढकों ने देखा कि उनके दो साथी बहुत गहरे गड्ढे में गिर गए हैं। गड्ढा गहरा था और इसलिए बाकी साथियों को लगा कि अब उन दोनों का गड्ढे से बाहर निकल पाना मुश्किल है। साथियों ने गड्ढे में गिरे उन दो मेंढकों को आवाज लगाकर कहा कि अब तुम खुद को मरा हुआ मानो। इतने गहरे गड्ढे से बाहर निकल पाना असंभव है।

दोनों मेंढकों ने बात को अनसुना कर दिया और बाहर निकलने के लिए कूदने लगे। बाहर झुंड में खड़े मेंढक उनसे चीखकर कहने लगे कि बाहर निकलने की कोशिश करना बेकार है। अब तुम बाहर नहीं आ पाओगे। थोड़ी देर तक कूदा-फाँदी करने के बाद भी जब गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाए तो एक मेंढक ने आस छोड़ दी और नीचे की तरफ लुढ़क गया। नीचे लुढ़कते ही वह मर गया।

दूसरे मेंढक ने कोशिश जारी रखी और अंततः पूरा जोर लगाकर एक छलाँग लगाने के बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। जैसे ही दूसरा मेंढक गड्ढे से बाहर आया तो बाकी मेंढक साथियों ने उससे पूछा- जब हम तुम्हें कह रहे थे कि गड्ढे से बाहर आना संभव नहीं है तो भी तुम छलाँग मारते रहे, क्यों ? इस पर उस मेंढक ने जवाब दिया- दरअसल मैं थोड़ा-सा ऊँचा सुनता हूँ और जब मैं छलाँग लगा रहा था तो मुझे लगा कि आप मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं और इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और देखिए मैं बाहर आ गया।

जब हमें अपने आप पर भरोसा हो तो दूसरे क्या कह रहे हैं इसकी कोई परवाह नहीं करनी चाहिए और कोशिशों को जारी रखना कहिये ।

ज्ञान का घमंड

एक पढ़ा-लिखा दंभी व्यक्ति नाव में सवार हुआ। वह घमंड से भरकर नाविक से पूछने लगा, ‘‘क्या तुमने व्याकरण पढ़ा है, नाविक?’’

नाविक बोला, ‘‘नहीं।’’दंभी व्यक्ति ने कहा, ‘‘अफसोस है कि तुमने अपनी आधी उम्र यों ही गँवा दी!’’ थोड़ी देर में उसने फिर नाविक से पूछा, “तुमने इतिहास व भूगोल पढ़ा?” नाविक ने फिर सिर हिलाते हुए ‘नहीं’ कहा।

दंभी ने कहा, “फिर तो तुम्हारा पूरा जीवन ही बेकार गया।“ मांझी को बड़ा क्रोध आया। लेकिन उस समय वह कुछ नहीं बोला।

अचानक तुफान के प्रचंड झोंकों ने नाव को भंवर में डाल दिया। नाविक ने ऊंचे स्वर में उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘महाराज, आपको तैरना भी आता है कि नहीं?’’ सवारी ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे तैरना नही आता।’’ “फिर तो आपको अपने इतिहास, भूगोल को सहायता के लिए बुलाना होगा वरना आपकी सारी उम्र बरबाद होने वाली है क्योंकि नाव अब भंवर में डूबने वाली है।’’ यह कहकर नाविक नदी में कूद तैरता हुआ किनारे की ओर बढ़ गया।

मनुष्य को किसी एक विद्या या कला में दक्ष हो जाने पर गर्व नहीं करना चाहिए।

पहले दो कदम तो चल

ऊँची पहाड़ी के किनारे एक गाँव बसा था । वह पहाड़ी बहुत हरी-भरी और सुंदर दिखती थी । उसी गाँव में एक नौजवान रहता था जो उन हरियाली से लदी पहाडियों की चोटियों को अपने खेतों से ही देखता था और सोचता था कि एक दिन वह जरूर उन चोटियों पर पहुँच कर रहेगा । पर उसने सुन रखा था कि उन पर जाने के लिए रात के अंधेरे में ही निकलना पड़ेगा क्योंकि सूरज निकलने के बाद चढाई कठिन हो जाती थी, पत्थर तप जाते थे और रस्ते में प्यास बुझाने के भी उपाय नही थे । कुल मिलाकर रात का सफर ही एकमात्र आसान तरीका था ।

उसके पास एक लालटेन थी बस उसे लेकर वह हमेशा दुविधा में रहता था , उसको चिंता होती कि उसके पास जो लालटेन है उसका उजाला दो-चार क़दमों से जयादा नही होता जबकि पहाड़ कि दो मील चढाई करनी है। दो मील दूर मंजिल और दो कदम उजाला भला कैसे बात बनेगी ? इतना से प्रकाश में यात्रा करना कहाँ तक उचित होगा ? ये तो बड़ा मुश्किल लगता है यह सोचकर वह हिम्मत हार जाता ।

एक दिन वह रात्रि में उसी पहाडियों के किनारे से गुजर रहा था तो उसने देखा कि एक साधू लालटेन लिए पहाडियों से उतर रहे है ,आख़िर वो कैसे इतनी छोटी लालटेन लेकर पहाडियों पर चले गए यह जानने के लिए वह उनका बेसब्री से इन्तजार करने लगा और वो जैसे ही नीचे उतरे उसने अपनी मन कि दुविधा और चिंता बताई ।

उस नौजवान कि बातें सुनकर महात्मा जोर से हँसे और बोले ,"पागल ! तू पहले दो कदम तो चल ,जितना दिखता है उतना आगे तो बढ़ । अगर एक कदम भी दिखता है तो सारे धरती कि परिक्रमा की जा सकती है ,और तुझे तो दो कदम दिखाए देते है। 

बहुत दूर के सोच-विचार में अक्सर ही निकट को खो दिया जाता है जबकि निकट ही सत्य है और निकट में ही वह छिपा रहता है जो दूर है। एक छोटे से कदम में ही बड़ी से बड़ी मंजिल का आवास होता है।

जीवन एक वीणा

एक घर में बहुत दिनों पुरानी एक वीणा रखी हुई थी । लोग उसको उपयोग में नही लाते थे जिसके चलते पड़ी-पड़ी वो धूल खाती रहती थी। रात में अगर भूल से कोई बच्चा उसे गिरा देता तो आधी रात में उसके तार झनझना जाते और घर के लोगो की नींद टूट जाती । वह वीणा एक उपद्रव का कारण बन गयी थी ।

अंततः उस घर के लोगो ने यह तय किया की इसे घर के बाहर फ़ेंक दिया जाए क्योंकि यह जगह घेरती है, कचरा इकठ्ठा करती है और घर की शान्ति भी भंग करती है । सब मिलकर वीणा को घर के बाहर कूडेदान में फेकने चल दिए।

अभी वो फेंककर लौट भी न पाये थे की उधर से एक व्यक्ति गुजरा और उसकी नजर उस वीणा पर पड़ी । उसने उस वीणा को उठाकर धुल झाडे और तारो को ठीक से कसा और उनके तारो को छेड़ने लगा । फिर क्या था ? अब तो नजारा ही बदल गया । जो भी उस रास्ते से गुजरता वही ठिठक कर खड़ा हो जाता और उसके मधुर संगीत में खो जाता, चारो ओर भीड़ लग गयी। वह व्यक्ति मंत्रमुग्ध होकर वीणा बजा रहा था चारो तरफ शमां सा बाँध गया । जैसे ही उसने वीणा बजाना बंद किया की फिर सब झपट पड़े, बोले, यह वीणा हमारी है, इसे हमे वापस कर दो।

वह व्यक्ति हंस पड़ा और बोला, 'पहले इसे बजाना तो सीख लो , अन्यथा फिर यह उपद्रव पैदा करेगा । बजाना न आता हो तो वीणा घर की शान्ति भंग कर देती है। और यदि बजाना आता हो तो घर को शांतिपूर्ण एवं संगीतमय बना देती है। '

जीवन भी एक वीणा की तरह है । इस वीणा को बजाना बहुत कम लोग ही जान पाते है इसलिए तो इतनी उदासी है ,दुःख है,इतनी पीडा है। जो जीवन एक संगीत बन सकता था ,वह विसंगतिपूर्ण बन गया है।

बुधवार, 28 जुलाई 2010

आपका दुश्मन कौन?

एक बहुत बड़ी कंपनी के कर्मचारी लंच टाइम में जब वापस लौटे, तो उन्होंने नोटिस बोर्ड पर एक सूचना देखी। उसमे लिखा था कि कल उनका एक साथी गुजर गया, जो उनकी तरक्की को रोक रहा था। कर्मचारियों को उसको श्रद्धांजलि देने के लिए बुलाया गया था।

श्रद्धांजलि सभा कंपनी के मीटिंग हॉल में रखी गई थी। पहले तो लोगो को यह जानकर दुःख हुआ कि उनका एक साथी नही रहा, फिर वो उत्सुकता से सोचने लगे कि यह कौन हो सकता है? धीरे धीरे कर्मचारी हॉल में जमा होने लगे। सभी होंठो पर एक ही सवाल था! आख़िर वह कौन है, जो हमारी तरक्की की राह में बाधा बन रहा था।

हॉल में दरी बिछी थी और दीवार से कुछ पहले एक परदा लगा हुआ था। वहां एक और सूचना लगी थी कि गुजरने वाले व्यक्ति की तस्वीर परदे के पीछे दीवार पर लगी है। सभी एक एक करके परदे के पीछे जाए, उसे श्रद्धांजलि दे और फिर तरक्की की राह में अपने कदम बदाये, क्योकि उनकी राह रोकने वाला अब चला गया। कर्मचारियों के चेहरे पर हैरानी के भाव थे!

कर्मचारी एक एक करके परदे के पीछे जाते और जब वे दीवार पर टंगी तस्वीर देखते, तो अवाक हो जाते। दरअसल, दीवार पर तस्वीर की जगह एक आइना टंगा था। उसके नीचे एक पर्ची लगी थी, जिसमे लिखा था "दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति है, जो आपकी तरक्की को रोक सकता है, आपको सीमाओं में बाँध सकता है! और वह आप ख़ुद है. "अपने नकारात्मक हिस्से को श्रद्धांजलि दे चुके 'नए' साथियो का स्वागत है.

आपके ख़ुद के नकारात्मक विचार और आपके द्वारा पाली गई कमजोरियां ही आपके सबसे बड़े दुश्मन है।

अन्तिम इच्छा

एक आदमी ने जिन्दगी भर कंजूसी की, उसने काम किया, पैसा कमाया, पर ज्यादा से ज्यादा बचाने में जुटा रहा। इस चक्कर में उसने परिवार की बुनियादी जरूरतों में भी खूब काट छांट की और पर्याप्त धन होते हुए भी उसके बीवी बच्चे अभावो में जीते रहे। जब उसका अंत समय आया, तो उसने अपनी बीवी को बुलाकर कहा - देखो तुम तो जानती हो कि किसी और चीज़ की तुलना में मुझे अपना पैसा सबसे ज्यादा प्यारा है। इसलिए मै चाहता हूँ कि मेरी मौत के बाद तुम सारा पैसा मेरी कब्र में रखवा देना। उसकी बात सुनकर पत्नी को बहुत गुस्सा आया, लेकिन चूंकि वह मर रहा था और मरते आदमी की इच्छा जरूर पूरी की जाती है, इसलिए बीवी ने उसे भरोसा दिलाया कि वह ऐसा ही करेगी।

कुछ समय बाद उस आदमी की मौत हो गई। उसकी बीवी बच्चो ने अन्य सम्बन्धियो को उसकी अन्तिम इच्छा की जानकारी दी। जो लोग उसकी कंजूसी से वाकिफ थे वे दबी जुबान में उसकी इस इच्छा की आलोचना करने लगे। यहाँ तक कि बच्चे भी इस हक़ में नही थे कि सारा पैसा कब्र में रखवा दिया जाए। लेकिन बच्चो की माँ अपने पति की अन्तिम इच्छा पूरी करने पर अडी हुई थी। सबने उसे बहुत समझाया, पर वह नही मानी। इस बीच उसने सारा पैसा इकठ्ठा किया और उसे लेकर कहीं बाहर चली गई और कुछ समय में लौट भी आई।

अब तक अन्तिम संस्कार की सारी तैयारी हो चुकी थी। जब ताबूत को कब्र में उतारा जाने लगा, तो मृतक की पत्नी आगे बढ़ी सभी सोच रहे थे कि वह सारा का सारा पैसा कब्र में डाल देगी। बच्चो के चेहरों पर निराशा थी, तो औरो के चेहरों पर उसके लिए सहानभूति। महिला ने अपना पर्स खोला और उसमे से चेकबुक निकालकर कुछ रकम लिखी, फिर उस चेक को कब्र में डाल दिया और बोली - मैंने तुम्हारी जमापूंजी अपने खाते में जमा कराकर तुम्हारे नाम उस रकम का चेक बना दिया है। यह चेक मै कब्र में छोडे जा रही हूँ, जब भी जरुरत हो कैश करवा लेना।

मजबूरी में मूर्खतापूर्ण वादा करना पड़े, तो उसे पूरा करने का कोई बुद्धिमानी भरा रास्ता खोजना चाहिए!

ईश्वर की कृपा

एक गांव में बाढ़ आने से पहले सभी गांव वाले अपना - अपना घर छोड़ कर भाग रहे थे, सिवाए एक आदमी के जिसने कहा कि इश्वर मुझे बचायेगा, मुझे उस पर पूरा भरोसा है ।

जब पानी का स्तर बढ़ा तो उसे बचाने के लिए एक जीप आई तो उसने मना कर दिया और मकान के दूसरे मंजिल पर चला गया और कहा कि इश्वर मुझे बचायेगा, मुझे उस पर भरोसा है। तभी एक नाव उसे बचाने के लिए आई उसने इंकार कर दिया और कहा कि ईश्वर मुझे बचायेगा, मुझे उस पर भरोसा है। जब पानी स्तर और बढ़ा तो वह मकान के छत पर चढ़ गया, इस बार उसे बचाने के लिए हेलीकॉप्टर आया पर उसने फिर वही बात दुहराई कि ईश्वर मुझे बचायेगा, मुझे उस पर भरोसा है और वो नही चढा। जब पानी का स्तर बढ़कर उसके नाक तक आया तो वह उसे एक लकड़ी का तख्ता मिला पर उसने उसका भी सहारा नही लिया और फिर मन ही मन कहा कि इश्वर मुझे बचायेगा, मुझे उस पर भरोसा है और अंत मे वह पानी मे डूबकर मर गया ।

जब मरकर ईश्वर के पास पंहुचा तो उसने गुस्से से पूछा मुझे तुम पर पूरा भरोसा था फिर तुमने मेरी प्रार्थना क्यो अनसुनी कर दी ? तब इश्वर ने कहा कि वह जीप, नाव, हेलीकॉप्टर, तख्ता आदि किसने भेजा था ? लेकिन नहीं बचने कि गलती तुम्हारी थी, भला मैं क्या कर सकता था ?

भाग्य उन्ही का साथ देता है जो अपनी मदद ख़ुद करते हैं , किस्मत और भगवान् पर जो सब कुछ छोड़ देते हैं उनसे बड़ा बेवकूफ दुनिया में कोई नहीं होता!

खोई हुई सुई

एक बार एक औरत अपने झोपडे के बाहर कुछ खोज रही थी। पास-पड़ोस के लोगो ने सोचा ,बूढी औरत है चलो मदद की जाए ,उन लोगों ने पूछा क्या खोजती हो ? उसने कहा, 'मेरी सुई खो गयी है' इस पर लोगो ने सुई खोजना शुरू कर दिया । अब सुई जैसी छोटी चीज, साँझ का समय जब बहुत देर खोजने के बाद भी नही मिला और अँधेरा होने लगा तों एक आदमी ने पूछा, 'ऐ! बूढी औरत ये तो बता दे की तेरी सुई खोई कहाँ है ? तब बूढी औरत ने कहा,' सुई तों मेरे घर के अन्दर खोई है, लेकिन वहाँ बहुत अँधेरा है और मेरे पास दीया नही है, इसलिए जहाँ उजाला है उसे वही खोजा जा सकता है, क्योकि अंधेरे में तों सुई मिलेगी नही। लोगो ने कहा पागल हो गयी है तू बुढिया, सुई अन्दर है और तू उसे बाहर खोज रही है, चलो सब लौट चलो, चलो इस पागल को खोजने दो, यह कहकर सभी लोग लौटने लगे, जब वो लोग लौटने को हुए तों बूढी औरत हँसने लगी और कहा की तुम मुझे पागल कहते हो तब तो सारी दुनिया ही पागल है, क्योंकि सारे लोग तों बाहर ही खोजते है, उसे जो अन्दर है।

चाहे वो सुख हो या फिर सफलता वो हमारे भीतर छिपा होता है पर दुर्भाग्यवश लोग उसे वहाँ नही खोजते। अपने अन्दर खोजने वालों को ही अपनी शक्ति का एहसास हो सकता है ।

जोड़ना और तोड़ना

एक बार महात्मा बुद्ध पहाड़ी इलाके से गुजर रहे थे तभी एक हत्यारे ने उन्हें घेर लिया, उसने बुद्ध को रोका और कहा कि तुम वापस लौट जाओ तों मैं तुम्हे छोड़ दूँ, अन्यथा यह मेरी तलवार तुम्हरी गर्दन को काट देगी ।

बुद्ध ने कहा, 'एक दिन तों यह गर्दन गिर ही जानी है अगर तुम्हरे काम आ जाए तों मैं तैयार हूँ। लेकिन इससे पहले कि तुम मेरी गर्दन काटो एक छोटा सा काम करके मुझपर कृपा करते जाओ । उस हत्यारे ने पूछा, 'कौन सा काम, मरते हुये आदमी की अब कौन सी इच्छा ? और उसे कौन पुरी न कर दे ?  बोलो क्या काम है ?'

बुद्ध ने कहा,' यह जो सामने पेड़ है उस पर से थोडी पत्तियाँ मुझे तोड़ दो । वह बहुत हैरान हुआ, उसने कहा इसका क्या करोगे ? बुद्ध ने कहा, 'फिर भी तुम इसे तोड़ दो । उस हत्यारे ने अपने तलवार मारी और एक छोटी शाखा काटकर बुद्ध के हाथों में देदी। बुद्ध ने कहा, ' इतना तुमने किया, एक छोटा सा काम और। इसे वापस जोड़ दो । हत्यारा बोला, ' यह तों मुश्किल है यह नही हो सकता।'

तो बुद्ध ने कहा, तोड़ने का काम तो बच्चा भी कर सकता था तुम तो पुरूष हो बहादुर हो, जोड़ने का काम करो तोड़ने में कहा गौरव है, आओ अब तुम मेरी गर्दन काट लो ।

इतना सुनते ही उस हत्यारे ने तलवार पटक दी और बुद्ध की चरणों में गिर पड़ा। 

तोड़ने का काम हमेशा कमजोर और कायर ही करते है, सवाल तो जोड़ने का है। प्रेम जोड़ता है और घृणा तोड़ता है। इस दुनिया में जिसने भी, जितना भी पाया है वो जोड़कर ही पाया ...तोड़कर नही।

सुकरात का नजरिया

सुकरात एक महान दार्शनिक तो थे ही, उनका जीवन संतों के जीवन की तरह परम सादगीपूर्ण था। उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी, यहाँ तक कि वे पैरों में जूते भी नहीं पहनते थे। फ़िर भी वे रोज़ बाज़ार से गुज़रते समय दुकानों में रखी वस्तुएं देखा करते थे।

उनके एक मित्र ने उनसे इसका कारण पूछा। सुकरात ने कहा – “मुझे यह देखना बहुत अच्छा लगता है कि दुनिया में कितनी सारी वस्तुएं हैं जिनके बिना मैं इतना खुश हूँ।” 

खिचड़ी से भी ज्ञान

एक बार खेतड़ी नरेश ने स्वामी विवेकानंद को अपने यहाँ भोजन पर आमंत्रित किया . उन्हें खिचड़ी बहुत पसंद था इस लिए उन्हें गरम-गरम खिचड़ी परोसी गयी. खिचड़ी में ढेर सारी घी होने कि वजह से काफी अच्छी खुशबू आ रही थी जो स्वामी जी के मन को अपनी ओर खिची चली जा रही थी. स्वामी जी ने बिना देर किये तुरंत थाल के बीच में ही हाथ डाल दिया . खिचड़ी अभी बहुत गरम थी इस वजह से स्वामी जी कि उंगलिया जलने लग रही थी. मौका की नजाकत को देखकर राजा ने स्वामी जी को कहा ,

'गर्म खिचड़ी को बीच से न खाकर हमेशा किनारे से ही खाना चाहिए . '

जब स्वामी जी का भोजन हो गया तो चलते वक्त उन्होंने राजा से कहा ,'राजन आज तो हमे खिचड़ी से भी ज्ञान प्राप्त हो गया है कि कोई भी काम बीच से न शुरू करके एक छोर से ही करना चाहिए.'



बुद्ध की सभा

महात्मा बुद्ध को एक सभा में भाषण करना था । जब समय हो गया तो महात्मा बुद्ध आए और बिना कुछ बोले ही वहाँ से चल गए । तकरीबन एक सौ पचास के करीब श्रोता थे । दूसरे दिन तकरीबन सौ लोग थे पर फिर उन्होंने ऐसा ही किया बिना बोले चले गए ।इस बार पचास कम हो गए । 

तीसरा दिन हुआ साठ के करीब लोग थे महात्मा बुद्ध आए, इधर - उधर देखा और बिना कुछ कहे वापिस चले गए । चौथा दिन हुआ तो कुछ लोग और कम हो गए तब भी नहीं बोले । जब पांचवां दिन हुआ तो देखा सिर्फ़ चौदह लोग थे । महात्मा बुद्ध उस दिन बोले और चौदोहों लोग उनके साथ हो गए ।

किसी ने महात्मा बुद्ध को पूछा आपने चार दिन कुछ नहीं बोला । इसका क्या कारण था । तब बुद्ध ने कहा मुझे भीड़ नहीं काम करने वाले चाहिए थे । यहाँ वो ही टिक सकेगा जिसमें धैर्य हो । जिसमें धैर्य था वो रह गए। 

केवल भीड़ ज्यादा होने से कोई धर्म नहीं फैलता है । समझने वाले चाहिए, तमाशा देखने वाले रोज इधर - उधर ताक-झाक करते है । समझने वाला धीरज रखता है । कई लोगों को दुनिया का तमाशा अच्छा लगता है । समझने वाला शायद एक हजार में एक ही हो ऐसा ही देखा जाता है ।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सुकरात की पत्नी

सुकरात की पत्नी जेंथीप बहुत झगड़ालू और कर्कशा थी। एक दिन सुकरात अपने शिष्यों के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। वे घर के बाहर बैठे हुए थे। भीतर से जेंथीप ने उन्हें कुछ कहने के लिए आवाज़ लगाई। सुकरात ज्ञानचर्चा में इतने खोये हुए थे कि जेंथीप के बुलाने पर उनका ध्यान नहीं गया। दो-तीन बार आवाज़ लगाने पर भी जब सुकरात घर में नहीं आए तो जेंथीप भीतर से एक घड़ा भर पानी लाई और सुकरात पर उड़ेल दिया। वहां स्थित हर कोई स्तब्ध रह गया लेकिन सुकरात पानी से तरबतर बैठे मुस्कुरा रहे थे। 

वे बोले“मेरी पत्नी मुझसे इतना प्रेम करती है कि उसने इतनी गर्मी से मुझे राहत देने के लिए मुझपर पानी डाल दिया है।”

सुकरात का एक शिष्य इस पशोपेश में था कि उसे विवाह करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। वह सुकरात से इस विषय पर सलाह लेने के लिए आया। सुकरात ने उससे कहा कि उसे विवाह कर लेना चाहिए।

शिष्य यह सुनकर हैरान था। वह बोला – “आपकी पत्नी तो इतनी झगड़ालू है कि उसने आपका जीना दूभर किया हुआ है, फ़िर भी आप मुझे विवाह कर लेने की सलाह दे रहे हैं?”

सुकरात ने कहा – “यदि विवाह के बाद तुम्हें बहुत अच्छी पत्नी मिलती है तो तुम्हारा जीवन संवर जाएगा क्योंकि वह तुम्हारे जीवन में खुशियाँ लाएगी। तुम खुश रहोगे तो जीवन में उन्नति करोगे और रचनाशील बनोगे। यदि तुम्हें जेंथीप की तरह पत्नी मिली तो तुम भी मेरी तरह दार्शनिक तो बन ही जाओगे! किसी भी परिस्तिथि में विवाह करना तुम्हारे लिए घाटे का सौदा नहीं होगा।”

अनावश्यक भार

गुरु ने शिष्य को हाथ में एक तेल से भरा कटोरा पकड़ा दिया और कहा 'यह तुम्हरी परीक्षा है इसे पकड़ कर पुरे उपवन में घुमो, और फिर मुझे बताओ वहा खिला हुआ सबसे सुन्दर फूल कौन सा है? ध्यान रखना इस कटोरे से एक बूँद भी तेल गिरने नहीं पाए' .

शिष्य ने पुरे उपवन के कई चक्कर लगाये जब वह वापस आया तो गुरु ने पूछा 'अब बताओ सुन्दर फूल का रंग क्या है?'

शिष्य ने कहा'मैं सच कहता हूँ ,उपवन के फूलों को तो मैं ठीक से देख ही नहीं सका मेरा पूरा ध्यान इसी में लगा रहा की तेल की एक भी बूँद कही जमीं पर गिर ना जाये .

तब गुरु ने कहा -'यह तुम्हरी परीक्षा नहीं थी यह तुम्हारी दीक्षा थी.' 

जो अपने साथ अनावश्यक भार ले कर चलता है वह कुछ भी सीख -समझ नहीं पाता . 

अक्लमंद नौकर

सम्राट जहांगीर अपने इन्साफ के लिए बहुत मशहूर थे । एक बार उनका नौकर उनके निकट खड़ा होकर गिलास में शराब डाल रहा था कि एक बूंद शराब की जहांगीर पर गिर गई । जहांगीर को बहुत गुस्सा आया । उसी आवेश में उसने नौकर का सिर काटने का आदेश दे दिया ।

नौकर ने यह आदेश सुनकर पूरा ग्लास जहांगीर पर उड़ेल दिया । अब तो वह और भी क्रोधित हो गया और बोला,'' तुमने इतनी हिम्मत कैसे की?''

नौकर ने शांत स्वर में कहा, जहांपनाहा, आप अपने इंसाफ के लिए बहुत मशहूर हैं । मैं नहीं चाहता कि लोग आरोप लगाएं कि एक बूंद शराब के लिए बादशाह ने सिर काटने का हुक्म दे दिया । मैं आपके इन्साफ पर दाग नहीं लगने देना चाहता । इसलिए मैंने यह गुस्ताखी की।'' 

जहांगीर नौकर की अक्लमंदी पर दंग रह गया । उसने उसे इनाम दिया और अपने विश्वासपात्रों में शमिल कर लिया ।

बदूकें बो रहा हूं

एक बार सरदार किशन सिंह ने अपने खेत में आम के कुछ पौधे लगाए थे। एक दिन वह अपने 3-4 साल के लड़के को साथ लेकर खेत पर गए और पौधों का मुआयना कर रहे थे । लड़का वहीं खेलने लगा । खेलते-खेलते उसने मिट्टी में कुछ गाड़ा और 3-4 पौधे खड़े कर दिए । 

यह देख कर सरदार किशन सिंह ने ने पूछा, ''यह क्या कर रहे हो ?

'' बेटे ने जवाब दिया,'' बदूकें बो रहा हूं, जब ये आप के आमों की तरह बड़ी हो जाएंगी तो इनसे अंग्रेंजो को मारूंगा ।''

यह बालक बाद में सरदार भगत सिंह बना, जिसने अपने जीते जी कभी अंग्रेंजो को चैन से नहीं सोने दिया.

आप अपना पता दीजिये

एक व्यक्ति स्वामी विवेकानंद के प्रवचनों से बहुत प्रभावित हुआ .जब सभी लोग चले गए तो वह स्वामी जी के पास गया और बोला -' लगता है आपकी ईश्वर तक पहुँच है, क्या आप मुझे ईश्वर तक पहुंचा सकते है या उनका पता बता सकते है ?'

इस पर विवेकानंद ने कहा -'आप अपना पता लिखकर दे दीजिये जब भी ईश्वर को फुरसत होगी तो आपके घर भेज दूंगा.'

उसने तुरंत एक कागज पर अपने घर का पता लिख डाला और स्वामी जी को थमाते हुए बोला-'जरा जल्दी ही भेजिएगा.'

स्वामी जी ने उसे ध्यान से पूरा पढ़ा, पढने के बाद बोले- 'ये तो आप अपने ईंट-पत्थर से बने मकान का पता दे रहे है, आप अपना पता दीजिये की आप कौन है ? कहाँ है ? किस काम के लिए आपको भेजा गया है और आप क्या कर रहे है ? '

उस व्यक्ति को अपनी गलती का अहसास हुआ स्वामी जी के उत्त्कृष्ट दार्शनिकता को अब वह समझ गया था . वह अब जान गया था कि मनुष्य का असली पता, जिसे वो कभी जानने या खोजने का प्रयास नहीं करता वो तो उसके अन्दर ही है जिसे खोज ले, पता कर ले तो ईश्वर से हर पल मुलाकात होती रहे . 

बाहर की चमड़ी

एक बार अष्टावक्र राजा जनक के सभा में गए . उनके हाथ पांव टेढ़े-मेढ़े थे और वो झुक कर भी चलते थे .उनका कूबड़ निकला हुआ था . उन्हें देखते ही राजा के सभी सभासद हंसने लगे . उन्हें हँसता देखकर अष्टावक्र ने राजा से कहा -"क्यों रे राजा ?तुने अपनी सभा में केवल चमारों को ही भर्ती कर रखा है?"

राजा ने तुरंत उत्तर दिया कि ये चमार थोड़ी है इनमें कोई ब्राह्मण है तो कोई ठाकुर है कुछ बनिये भी है.

अष्टावक्र ने बोला नहीं, सब के सब चमार है क्योंकि इन्हें सिर्फ चमड़ा ही नजर आता है इन्हें चमड़े का ही ज्ञान है.हमारे बाहर की चमड़ी को देखा पर हमारे अन्दर जो देखने लायक है इन्होने हमारे ज्ञान को नहीं देखा .इन्होने सिर्फ चमड़े को देखा और चमड़े को देखने परखने वाला तो चमार ही होता है. 

महानता की झांकी

बंगाल के एक छोटे से स्टेशन पर जब रेल रुकी तो एक युवक अपने छोटे से बक्से के लिए कुली को जोर-जोर से आवाज लगाया पर इतने छोटे स्टेशन पर कुली कैसे मिलता ? तभी एक अधेड़ उम्र का आदमी जो ये सब देख रहा था वह उसके पास चला आया. उस युवक ने उसको कुली समझकर पहले डांटा -'तुम लोग बहुत सुस्त हो जी मैं कब से चिल्ला रहा हूँ ,चलो जल्दी से इस बक्से को उठाओ . '

उस आदमी ने बिना कुछ कहे सुने बक्सा उठाकर उस युवक के पोछे चल पड़ा . घर पहुचने पर जब युवक ने पैसे देने चाहे तो तो वह आदमी बोला -'धन्यवाद मुझे पैसे नहीं चाहिए '

तभी घर में से उस युवक का बड़ा भाई निकला और उस आदमी को देखते ही आदर के साथ बोला -'नमस्कार विद्यासागर जी !'

उस युवक के तो होश उड़ गए तुरंत उसने उनके चरणों में लोटकर ईश्वरचंद विद्यासागर जी से माफ़ी माँगा. उसे उठाकर गले लगते हुए बोले-'भाई ! मेरे देशवासी अभिमान त्याग कर अपने हाथो से अपना काम स्वयं करे मेरी यही इच्छा है ,आगे से स्वावलंबी बनो ,यही मेरा मेहनताना है . '

ऐसे प्रसंग व्यक्ति को आत्मावलंबन हेतु प्रेरणा तो देते ही है, बड़ो की उस विनम्रता -निरहंकारिता को भी दर्शाते है जिसके कारण वे महान कहलाते है . 

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