इंग्लेंड की कॉमन सभा में वाद-विवाद चल रहा था। एक सदस्य ने अपने विरोधी से कहा, ``महाशय ! उन दिनों को भूल गये, जब आप जूतों पर पॉलिश किया करते थे।´´ उस सदस्य ने गम्भीरता पूर्वक उत्तर दिया,-``महोदय ! मेरा काम छोटा रहा हैं, हृदय नहीं। मेरी पॉलिश भी ईमानदारी के साथ ही की जाती थी, किसी को असंतुष्ट नहीं किया।´´ विरोधी सदस्य इस नम्रतापूर्वक उत्तर से बड़े लज्जित हुए और अनुभव किया कि श्रेष्टता का आधार उच्चाधिकार नहीं वरन् सदाचार हैं।
विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
नारियों का साहस
बात स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों की हैं, क्रांग्रेस ने देशवासियों से गांधी दिवस मनाने और तिलक स्वराज फण्ड के लिए चंदा जमा करने की अपील की। लाहौर में पुलिस का कड़ा प्रबंध था, अत: कोई व्यक्ति जब हिम्मत न कर सका, तब वहाँ महिलाओं ने सभा की, भाषण दिए, खद्धर बेचा और चंदा इकट्ठा किया, यह देखकर सारा लाहौर गांधी दिवस मनाने उमड़ पड़ा।
उम्र बढ़ी तो काम बढ़ा
प्रेसीडेंट लिंकन के एक मित्र ने कहा-``आप काफी वृद्ध हो गए हैं, अब काम के घंटे कुछ कम कर देना चाहिए।´´
लिंकन हँसे और बोले-``श्रीमान् जी ! इस परिपक्व अवस्था से बढ़िया काम करने का और कौन-सा समय होगा।´´ यह कहकर उन्होंने अपने सेक्रेटरी से कहकर काम के घंटों में 1 घण्टे की और वृद्धि कर दी।
ईश्वर नही तो उसकी स्रष्टि को पूजो
एक बार साधु ने आकर गांधीजी से पूछा-``हम ईश्वर को पहचानते नहीं, फिर उसकी सेवा किस प्रकार कर सकते हैं ?´´ गांधीजी ने उत्तर दिया-``ईश्वर को नहीं पहचानते तो क्या हुआ,, इसकी स्रष्टि को तो जानते हैं। ईश्वर की स्रष्टि की सेवा ही ईश्वर की सेवा हैं।´´
साधु की शंका का समाधान न हुआ, वह बोला-``ईश्वर की तो बहुत बड़ी स्रष्टि हैं, इस सबकी सेवा हम एक साथ कैसे कर सकते हैं ?´´ ईश्वर की स्रष्टि के जिस भाग से हम भली-भाँति परिचित हैं और हमारे अधिक निकट हैं, उसकी सेवा तो कर सकते हैं। हम सेवा कार्य अपने पड़ौसी से प्रारंभ करे। अपने आँगन को साफ करते समय यह भी ध्यान रखें कि पड़ौसी का भी आँगन साफ रहे। यदि इतना कर लें तो वही बहुत हैं।´´ गांधी जी ने गंभीरतापूर्वक समझाया। साधु उससे बहुत प्रभावित हुए।
गुरुवार, 26 नवंबर 2009
सच्चे अतिथि
महाराष्ट्र के संत श्री एकनाथ जी को छह मसखरे युवक सदा तंग किया करते थे। एक बार एक भूखा ब्राह्मण उस गांव में आया और भोजन की याचना की। गांव के उन्ही दुष्ट जनो ने उससे कहा कि ``यदि तुम संत एकनाथ को क्रोधित कर दो तो हम तुम्हे 200 रूपये देगे। हम तो हार चुके शरारत कर-करके, पर उन्हें क्रोध आता ही नहीं।´´ दरिद्र ब्राह्मण भला कब मौका चूकने वाला था। फौरन उनके घर गया, वहाँ वे न मिले तो मंदिर में जा पहुँचा, जहाँ वे ध्यान मग्न बैठे थे। वह जाकर उनके कंधे पर चढ़ कर बैठ गया। संत ने नेत्र खोले और शांत मुद्रा में बोले-``ब्राह्मण देवता ! अतिथि तो मेरे यहाँ नित्य ही आते हैं, किन्तु आप जैसा स्नेह आज तक किसी ने नहीं जताया, अब तो मैं आपको बिना भोजन किये नहीं जाने दूंगा।
मैं तो बापू का चपरासी हूं।
बिहार के चम्पारन जिले में महात्मा गांधी का शिविर लगा था। किसानों पर होने वाले सरकारी अत्याचारों की जाँच चल रही थी। हजारों की तादाद में किसान आ-आकर बापू से अपने दुख निवेदन कर रहे थे। उस समय उस जाँच आन्दोलन में कृपलानी जी का बड़ा प्रमुख सहयोग था।
वे गांधी जी के केम्प सेक्रेटरी के रूप में काम कर रहे थे। इसलिये जिला अधिकारियों की आँख की किरकिरी बने हुए थे।
डाक ले जाने का काम कृपलानी जी ही करते थे। एक बार कलक्टर ने पूछा, आप ही तो वह प्रोफेसर कृपलानी हैं जो इस सब हलचल के प्रमुख हैं। फिर आप यह डाक का काम क्यों करते है.
कृपलानी जी ने उत्तर दिया - ``मैं तो एक साधारण कार्यकर्ता और बापू का चपरासी हूं।´´ कृपलानी जी का उत्तर सुनकर कलक्टर ने महात्मा गांधी की महानता को समझा और आन्दोलन की गरिमा का अन्दाज लगा लिया।
रविवार, 22 नवंबर 2009
क्या करें, क्या न करें ? - 1
1. दो घटी अर्थात् अड़तालिस मिनट का एक मुहूर्त होता हैं। प्रन्द्रह मुहूर्त का एक दिन और पंद्रह मुहूर्त की एक रात होती हैं। सूर्योदय से तीन मुहूर्त का `प्रात:काल´, फिर तीन मुहूर्त का `संगवकाल´, फिर तीन मुहूर्त का मध्यान्ह काल´, फिर तीन मुहूर्त का `अपरान्हकाल´ और उसके बाद तीन मुहूर्त का `सायंकाल´ होता हैं। (विष्णुपुराण 2/8/61-64)
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2. ऋषियों ने प्रतिदिन सन्ध्योपासन करने से ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी। इसलिए सदा मौन रहकर द्विजमात्र को प्रतिदिन तीन समय सन्ध्या करनी चाहिये। प्रात:काल की सन्ध्या ताराओं के रहते-रहते, मध्यान्ह की सन्ध्या सूर्य के मध्य-आकाश में रहने पर और सांयकाल की सन्ध्या सूर्य के पश्चिम दिशा में चले जाने पर करनी चाहिये। (महाभारत, अनु. 104/18-19)
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3. दोनों सन्ध्याओं तथा मध्यान्ह के समय शयन, अध्ययन, स्नान, उबटन लगाना, भोजन और यात्रा नहीं करनी चाहिये। (पद्मपुराण, स्वर्ग 55/71-72)
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4. रात में दही खाना, दिन में तथा दोनों सन्ध्याओं के समय सोना और रजस्वला स्त्री के साथ समागम करना-ये नरक की प्राप्ति के कारण हैं। (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म. 27/40)
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5. अत्यन्त सबेरे, अधिक साँझ हो जाने पर और ठीक मध्यान्ह के समय कही बाहर नहीं जाना चाहिये। (मनुस्मृति 4/140)
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6. रात्रि मे पेड़ के नीचे नहीं रहना चाहिये। (मनुस्मृति 4/73)
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7. अमावस्या के दिन जो वृक्ष, लता आदि को काटता हैं अथवा उसका एक पत्ता भी तोड़ता हैं, उसे ब्रह्महत्या का पाप लगता हैं। (विष्णुपुराण 2/12/10)
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8. सन्ध्याकाल में भोजन, स्त्रीसंग, निद्रा तथा स्वाध्याय-इन चारों कर्मों को नहीं करना चाहिये। कारण कि भोजन करने से व्याधि होती हैं, स्त्रीसंग करने से क्रूर सन्तान उत्पन्न होती हैं, निद्रा से लक्ष्मी का ह्रास होता हैं और स्वाध्याय करने से आयु का नाश होता हैं। (यमस्मृति 76-77)
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9. पूर्व की तरफ सिर करके सोने से विद्या प्राप्त होती हैं। दक्षिण की तरफ सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि होती हैं। पश्चिम की तरफ सिर करके से प्रबल चिन्ता होती हैं। उत्तर की तरफ सिर करके सोने से हानि तथा मृत्यु होती हैं अर्थात् आयु क्षीण होती हैं। (भगवंतभास्कर, आचारमयुख)
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10. टूटी खाट पर नहीं सोना चाहिये। (महाभारत, अनु. 104/49)
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11. सिर को नीचा करके नहीं सोना चाहिये। (सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा 24/98)
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12. जूठे मुँह नहीं सोना चाहिये। (महाभारत, अनु. 104/67)
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13. नग्न होकर नहीं सोना चाहिये। (मनुस्मृति 4/75)
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14. भीगे पैर नहीं सोना चाहिये। सूखे पैर सोने से लक्ष्मी प्राप्त होती हैं। (मनुस्मृति 4/76)
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15. निद्रा के समय मुख से ताम्बुल, शय्या से स्त्री, ललाट से तिलक और सिर से पुष्प का त्याग कर देना चाहिये। (धर्मसिंधु 3 पू.क्षुद्रकाल)
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16. रात्रि में पगड़ी बाँध कर नहीं सोना चाहिये। (विष्णु धर्मोत्तर . 2/89/24)
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17. दिन में कभी नहीं सोना चाहिये। रात के पहल और पिछले भाग में भी नींद नहीं लेनी चाहिये। रात के प्रथम और चतुर्थ पहर को छोड़कर दूसरे और तीसरे पहर में सोना उत्तम हैं। (नारदपुराण, पू. 26/27)
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18. जिसके सोते-सोते सूर्योदय अथवा सूर्यास्त हो जाय, वह महान् पाप का भागी होता हैं और बिना प्रायिश्चत्त (कृच्छªव्रत)-के शुद्ध नहीं होता। (भविष्यपुराण , ब्राह्म. 4/90)
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19. स्वस्थ मनुष्य को आयु की रक्षा के लिये ब्राह्ममुहूर्त में उठना चाहिये। (देवीभागवत 11/2/2)
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20. किसी सोये हुये मनुष्य को नहीं जगाना चाहिये। (याज्ञवल्क्यस्मृति1/138)
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21. विद्यार्थी, नौकर, पथिक, भूख से पीड़ित, भयभीत, भण्डारी और द्वारपाल-ये सोते हुए हो तो इन्हें जगा देना चाहिये। (चाणक्यनीति. 9/6)
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22. निवास स्थान से दूर दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम (नैऋZत्य) दिशा में जाकर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये। (आपस्तम्बधर्मसूत्र 1/11/32/2)
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23. सिर को वस्त्र से ढककर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिये। (पद्मपुराण, क्रियायोग. 11/9)
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24. गाँव से नैऋZत्यकोण में जाकर इस मन्त्र का उच्चारण करे-
गच्छन्तु ऋषयो देवा: पिशाचा ये च गुह्यका:।
पितृभूतगणा: सर्वे करिष्ये मलमोचनम्।।
`यहाँ जो ऋषि , देवता, पिशाच, गुह्यक, पितर तथा भूतगण हों, वे चले जाये, मै यहाँ मल-त्याग करूँगा।´ - ऐसा कहकर तीन बार ताली बजाये और सिर को वस्त्र से ढककर मलत्याग करे। (नारदपुराण पूर्व.66/3-4)
गुरुवार, 19 नवंबर 2009
पंडित नेहरू का वजन
एक बाल सम्मेलन के अवसर पर पंडित नेहरू बालक-बालिकाओं के बीच प्रश्नोत्तर का आनंद ले रहे थे। तभी एक बालिका ने प्रश्न किया-
``क्या आपने कभी अपना वजन भी लिया हैं ?´´ पंडित नेहरू ने तुरंत उत्तर दिया-``अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने के कारण मैने अनेक बार वजन लिया।´´
बलिका ने फिर प्रश्न किया- अच्छा बताइए, आपका सबसे ज्यादा और सबसे कम वजन कब और कितना था ?
नेहरू ने बिना रूके कहा-``मेरा सबसे ज्यादा 162 पोंड उस समय था जब मैं अहमदनगर जेल में था, और सबसे कम साढ़े सात पोंड वजन जब मैं पैदा हुआ तब था।´´ बालिका ने ताज्जुब से पूछा-``जेल में तो वजन कम हो जाना चाहिए, परन्तु बढ़ कैसे गया ?´´
पंडित नेहरू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-``उस समय मेरा वजन इस खुशी से बढ़ गया कि मैं अपने देश की सेवा में जेल का कष्ट सहन कर रहा हूं।´´
शत्रु वह जो जी दुखाए।
एक बार शेखसादी के पास एक व्यक्ति गया और कहने लगा-``आपका अमुख शत्रु आपकी बुराई कर रहा था और आपको तरह-तरह की गालिया बक रहा था।´´
सो तो में भी जानता हूँ, थोड़ा रूककर शेखसादी बोले- ``भाई शत्रु तो कहलाता वही हैं, जिससे बैर-विरोध हो। पर कम-से-कम इतना तो हैं कि वह मुँह के सामने कुछ नहीं कहता। आप तो मेरे सामने ही बुराई कर रहे हैं, अब आप ही बताइये कि मेरा शत्रु कौन हैं ? अच्छा होता, आपने मेरा जी न दुखाया होता और चुपचाप ही बने रहते। बुराई करने वाला व्यक्ति बहुत लज्जित हुआ और वहाँ से उठ कर चला गया। उस दिन से उसने कभी किसी की बुराई नहीं की।
मानव जाति एकात्मा
चीन में उन दिनों कुछ थोड़े शहरों को छोड़ कर शेष स्थानों पर विदेशियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। कभी भूल से कोई विदेशी वहाँ पहुँच जाता तो चीनी मरने-मारने को उतारू हो जाते, उनकी जान संकट में पड़ जाती।
एक बार स्वामी विवेकानन्द चीन भ्रमण करने गये। उनकी किसी गाँव में भ्रमण की इच्छा हुई। दो जर्मन पर्यटकों की भी इच्छा वहाँ का ग्राम्य जीवन देखने की थी, पर साहस के अभाव में उनकी प्रवेश की हिम्मत नहीं हो रही थी। उन्होनें यह बात स्वामी जी से कही तो स्वामी जी ने कहा-``सारी मनुष्य जाति एक हैं, हमें विश्वास हैं कि यदि हम सच्चे हृदय से वहाँ के लोगों से मिलने चले तो वे लोग हमें मारने की अपेक्षा प्रेम से ही मिलेंगे।´´
वे जर्मन पर्यटकों को लेकर गाँव की ओर चल पड़े। दुभाषिया उनके लिए तैयार नहीं हो रहा था, पर जब स्वामी जी नहीं रूके तो वह भी साथ चला तो गया, पर अन्त तक उसे यही भय बना रहा कि वे लोग उसे मारे नही।
गाँव वाले विदेशियों को देखकर लाठी लेकर मारने दौड़े। स्वामी विवेकानन्द ने उनकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि डालते हुए कहा-``क्या आप लोग अपने भाईयों से प्रेम नहीं करते।´´ दुभाषिया ने यही प्रश्न उनकी भाषा में ग्रामीणों से पूछा। तो वे लोग बेचारे बड़े लज्जित हुए और लाठी फेंककर स्वामी जी के स्वागत-सत्कार में जुट गये। यह देखकरा जर्मन बोले-``सच हैं, यदि आप जैसा निश्छल प्रेम सारे संसार के लोगों में हो जाये, तो धरती पर कहीं भी कष्ट-कलह नहीं रह जाये।´´
मंगलवार, 17 नवंबर 2009
आचार संहिता - सदाचार प्रशंसा
।। श्री हरि:।।
आचारहीनं न पुनन्ति वेदा
यद्यप्यधीता: सह षड्भिरंगे:।
छन्दांस्येनं मुत्युकाले त्यजन्ति
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा:।।
(वसिष्टस्मृति 6/3, देवी भागवत 11/2/1)
" शिक्षा , कल्प, निरूक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष -इन छ: अंगो सहित अध्ययन किये हुए वेद भी आचारहीन मनुष्य को पवित्र नहीं करते। मृत्युकाल में आचारहीन मनुष्य को वेद वैसे ही छोड़ देते हैं, जैसे पंख उगने पर पक्षी अपने घोंसले को।
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आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिता: प्रजा:।
आचाराöनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्।।
(मनुस्मृति 4/156)
`मनुष्य आचार से आयु को प्राप्त करता हैं, आचार से अभिलाषित सन्तान को प्राप्त करता हैं, आचार से अक्षय धन को प्राप्त करता हैं और आचार से ही अनिष्ट लक्षण को नष्ट कर देता हैं।´
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दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति नििन्दत:।
दु:खभागी च सततं व्याधितो•ल्पायुरेव च।।
(मनुस्मृति 4/157, वसिश्ठस्मृति 6/6)
दुराचारी पुरूष संसार में निन्दित , सर्वदा दु:खभागी, रोगी और अल्पायु होता हैं।´
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आचार: फलते धर्ममाचार: फलते धनम्।
आचाराच्छिªयमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम्।।
(महाभारत, उद्योग. 113/15)
`आचार ही धर्म को सफल बनाता हैं, आचार ही धनरूपी फल देता हैं, आचार से मनुष्य को सम्पत्ति प्राप्त होती हैं और आचार ही अशुभ लक्षणों का नाश कर देता हैं।´
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कुलानि समुपेतानि गोभि: पुरूशतो•र्थत:।
कुलसंख्यां न गच्छन्ति यानि हीनानि वृत्तत:।।
वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि।
कुलसंख्यां च गच्छन्ति कशऽन्ति च महद् यश:।।
(महाभारत, उद्योग. 36/28-29)
`गौओं, मनुष्यों और धन से संपन्न होकर भी जो कुल सदाचार से हीन हैं, वे अच्छे कुल की गणना में नहीं आ सकते। परन्तु थोड़े धन वाले कुल भी यदि सदाचार से संपन्न हैं तो वे अच्छे कुलों की गणना में आ जाते हैं और महान् यश को प्राप्त करते हैं।´
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वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हत:।।
(महाभारत, उद्योग. 36/30)
सदाचार की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये। धन तो आता और जाता रहता हैं। धन क्षीण हो जाने पर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता, किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझना चाहिये।´
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न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मति:।
अन्तेश्वपि हि जातानं वृत्तमेव विशिश्यते।।
(महाभारत, उद्योग. 34/41)
`मेरा ऐसा विचार है कि सदाचार से हीन मनुष्य का केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि नीच कुल में उत्पन्न मनुष्यों का भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता हैं।´
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आचारप्रभवो धर्म: धर्मस्य प्रभुरच्युत:।
आश्रमाचारयुक्तेन पूजित: सर्वदा हरि:।।
(नारदपुराण, पूर्व. 4/22)
`आचार से धर्म प्रकट होता हैं और धर्म के स्वामी भगवान् vishnu हैं। अत: जो अपने आश्रम के आचार में संलग्न हैं, उसके द्वारा भगवान् श्रीहरि सर्वदा पूजित होते हैं।´
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स्दाचारवता पुंसा जितौ लोकावुभावपि।।
साधव: क्षीणदोशास्तु सच्छब्द: साधुवाचक:।
तेशामाचरणं यत्तु सदाचारस्स उच्यते।।
(विष्णुपुराण 3/11/2-3)
सदाचारी मनुष्य इहलोक और परलोक दोनों को ही जीत लेता हैं। `सत्´ शब्द का अर्थ साधु हैं और साधु वही हैं, जो दोषरहित हो। इस साधु पुरूष का जो आचरण होता हैं, उसी को सदाचार कहते हैं।´
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आचारहीन: पुरूशो लोके भवति नििन्दत:।
परत्र च सुखी न स्यात्तस्मादाचारवान् भवेत्।।
(शिवपुराण, वा.उ. 14/56)
`आचारहीन मनुष्य संसार में निन्दित होता हैं और परलोक में भी सुख नहीं पाता। इसलिये सबको आचारवान् होना चाहिये।´
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सर्वो•यं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते।
वृत्ते स्थितस्तु शूद्रो•पि ब्राह्मणत्वं नियच्छति।।
(महाभारत, अनु. 143/51)
`लोक में यह सारा ब्राह्मण-समुदाय सदाचार से ही अपने पर पर बना हुआ हैं। सदाचार में स्थित रहने वाला शूद्र भी (इस जन्म में) ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो सकता हैं।
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आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते प्रजा:।
आचारदéमक्षय्यमाचारो हन्ति पातकम्।।
आचार: परमो धर्मो नृणां कल्याणकारक:।
इह लोके सुखी भूत्वा परत्र लभते सुखम्।।
(देवी भागवत 11/1/10-11)
`आचार से ही आयु, सन्तान तथा प्रचुर अन्न की उपलब्धि होती है। आचार सम्पूर्ण पातकों को दूर कर देता है। आचारवान् मनुष्य इस लोक में सुख भोगकर परलोक में भी सुखी होता हैं।´
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आचारवान् सदा पूत: सदैवाचारवान् सुखी।
आचारवान् सदा धन्य: सत्यं च नारद।।
(देवीभागवत 11/24/98)
`(भगवान नारायण बोले-) नारद ! आचारवान् मनुष्य सदा पवित्र, सदा सुखी और सदा ही धन्य हैं-यह सत्य हैं, सत्य हैं।´
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शनिवार, 14 नवंबर 2009
अनमोल सद्विचार आपके मोबाइल पर
नवयुग यदि आयेगा तो विचार-शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं, विचारों की विचारों से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद्विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा।
- परम पूज्य गुरूदेव आचार्य श्रीराम शर्मा, शान्ति कुन्ज, हरिद्वार
-:एक निवेदन:-
मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाले सद्विचार अपने मोबाइल पर नि:शुल्क प्राप्त कर ``युग निर्माण योजना´´ को सफल बनाने में हार्दिक सहयोग करे।
-:आपका सहयोग:-
मनुष्य जीवन को फलदायी बनाने वाले सद्विचार अपने मोबाइल पर प्राप्त करें। इसके लिए आपको अपने मोबाइल से केवल एक बार यह मेसेज भेजना हैं। मेसेज टाइप करे - JOIN लिखे, इसके बाद एक स्पेस दे फिर MOTIVATIONS लिखे यानि JOIN MOTIVATIONS लिखें और इसे 09870807070 पर भेज दें। Successfully Subscribe होने के बाद प्रतिदिन आपको अनमोल सद्विचार अपने मोबाइल पर प्राप्त होते रहेंगे।
यह सेवा पूर्णतया नि:शुल्क हैं।
हमारी आप सभी से यह विनम्र अपील हैं कि आप सभी विचार क्रान्ति अभियान की इस अभिनव योजना से जुड़े और अधिकाधिक लोगों को इस योजना से जोड़ने का प्रयास करावें। आइये ! विचार क्रान्ति की इस अनूठी योजना में हम सभी गिलहरी सा योगदान करे।
This service is currently available to users in India and requires an Indian mobile number.)
जनमानस परिष्कार मन्च
http://yugnirman.blogspot.com/
राजेन्द्र माहेश्वरी, आगुंचा 09929827894 ईमेल - vedmatram@gmail.com
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009
घोषणा पत्र
सिंख सम्प्रदाय के चौथे गुरू श्री रामदास जी के अनेक शिष्य थे। सभी की अपनी-अपनी विशेषताएं थी। उनमें से एक शिष्य ऐसे से थे, जिनकी विशेषता श्रद्धा और आज्ञापालन ही थी। इनका नाम था-अर्जुनदेव।
अर्जुनदेव ने दीक्षा लेकर आश्रम में प्रवेश किया, तो उन्हें बर्तन माजँने का काम सौंपा गया। वे सवेरे से शाम तक बर्तन माँजने में लगे रहते। अन्य शिष्य जबकि धर्म चर्चा और गुरू पूजा में लगे रहते, तब भी अर्जुनदेव अपने नियत कम्र के अतिरिक्त दूसरी बात नही सोचते। बर्तन माजँना ही उनके लिए सबसे बड़ी साधना बना हुआ था । गुरू ने यही आदेश तो उन्हें दिया था।
गुरूजी के अवसान का समय आया। सब शिष्य यह आशा जगाये हुए थे कि बढ़ी चढ़ी योग्यता के कारण उन्हें ही उत्तराधिकार मिलेगा, वे गुरू की गद्दी पर बैठेंगे। गुरूदेव अपना घोषणापत्र लिख चुके थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् ही उसे खोला जाना था।
समय आया। गुरूदेव दिवंगत हुए। घोषणा पत्र खुला। उसमें अर्जुनदेव को उत्तराधिकारी माना गया था। सुनने वालों ने बड़ा आश्चर्य किया कि इस सबसे कम योग्यता वाले को यह पद कैसे मिला ? समाधान करने वालो ने समझाया कि श्रद्धा और अनुशासन- यही शिष्य की सबसे बड़ी योग्यता है। गुरूदेव की परख ठीक ही थी और निर्णय भी ठीक ही था।
अर्जुनदेव सिंख धर्म के पाँचवें गुरू हुए, उन्होनें अपनी योग्यता के बल पर नही, श्रद्धा के बल पर सिख धर्म की भारी सेवा की और प्रगति की।
आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।
सबसे बढ़कर पूजा
लोकमान्य तिलक कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए लखनऊ आए। लखनऊ कांग्रेस में कार्यक्रम अत्यन्त व्यस्त था, क्योंकि इसके दौरान विभिन्न दलों और गुटो में एकता स्थापित करने के लिए लोकमान्य बहुत तड़के से व्यस्त रहे और दोपहर तक एक क्षण के लिए भी विश्राम ना पा सके। बड़ी कठिनाई से उन्हें भोजन के लिए उठाया जा सका। भोजन के समय परोसने वाले स्वयंसेवक ने कहा-``महाराज ! आज तो आपको बिना पूजा किए ही भोजन करना पड़ा।´´ लोकमान्य गंभीर हो गए। बोले- ``अभी तक जो हम कर रहें थे, क्या वह पूजा नही थी ? क्या घंटी-शंख बजाना और चदंन घिसना ही पूजा है ? समाज सेवा से बढ़कर और कौनसी पूजा हो सकती है ?´´
स्वर्ग प्राप्ति का राजमार्ग
एक दिन एक गृहस्थ ने महात्मा रामानुज से प्रश्न किया कि `` महात्मन् ! क्या ऐसा कोई मार्ग नही है कि यह संसार भी नही छोड़ना पड़े और स्वर्ग भी पा लूँ।´´
रामानुज हँसे और बोले - `` हाँ, हैं ऐसा मार्ग। तुम जो कुछ कमाओ, ईमानदारी से कमाओ और जो कुछ व्यय करो-सदा दूसरों की भलाई के लिए करो।´´
गृहस्थ को संदेह हुआ उसने पूछा-`` मगर ऐसे कठिन मार्ग पर कौन चल सकता है -´´रामानुज ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा-`` जो नारकीय यातनाओं से बचना चाहता होगा और जिसे ईश्वर प्राप्ति की सच्ची लगन होगी।´´
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009
साधना का सत्य
मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा हैं, लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता हैं, पर इसे पाया नहीं जा सकता हैं। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना हैं। शब्द से सत्ता नहीं आती हैं। इसका द्वार तो शून्य हैं। शब्द से नि:शब्द में छलाँग लगाने का साहस ही साधना हैं।
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता हैं। इससे `स्व´ का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि `स्व´ सभी विचारों से परे और पूर्ण हैं। `स्व´ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भावदशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती हैं। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं हैं, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं हैं, वहीं अपने सत्यस्वरूप का बोध होता हैं, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती हैं।
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवनक्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैं, 1. बाह्य मुर्छित -अंत:मुर्छित, 2. बाह्य जाग्रत-अंत: जाग्रत। इनमें से पहला रूप मूर्च्छा-अचेतना का हैं। यह जड़ता का हैं। यहीं विचार की स्थिति हैं। दूसरा रूप अर्द्धमूर्च्छा का हैं, अर्द्ध चेतना हैं। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति हैं। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता हैं। यह तीसरा रूप अमूर्च्छा -पूर्ण चेतना का हैं। यह पूर्ण चैतन्य हैं, विचारों से परे हैं।
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं हैं, क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इंद्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता हैं, लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं हैं। यह स्थिति मूर्च्छा की हैं, जो केवल पलायन हैं, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती हैं। सत्य की साधना से ही साधन का सत्य प्रकट होता हैं, यह स्थिति ही समाधि हैं।
अखण्ड ज्योति सितम्बर 2003
श्रद्धया सम्यमाप्यते
माँ ने कहा-बच्चे, अब तुम समझदार हो गए हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस वृक्ष में जल भी चढ़ाया करो। तुलसी की उपासना की हमारी परंपरा पुरखों से चली आ रही हैं।´´
बच्चे ने तर्क किया -``माँ तुम कितनी भोली हो " इतना भी नहीं जानती कि यह तो पेड़ हैं " पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं, इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?"
लाभ हैं मुन्ने ! श्रद्धा कभी निरर्थक नहीं जाती। हमारे जीवन में जो विकास और बौद्धिकता हैं, उसका आधार श्रद्धा ही हैं। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती हैं और अंत में जीवन को महान् बना देती हैं, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।
तब से विनोबा भावे जी ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना प्रारंभ कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, उसका प्रमाण अब सबके सामने है।
बच्चे ने तर्क किया -``माँ तुम कितनी भोली हो " इतना भी नहीं जानती कि यह तो पेड़ हैं " पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं, इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?"
लाभ हैं मुन्ने ! श्रद्धा कभी निरर्थक नहीं जाती। हमारे जीवन में जो विकास और बौद्धिकता हैं, उसका आधार श्रद्धा ही हैं। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती हैं और अंत में जीवन को महान् बना देती हैं, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।
तब से विनोबा भावे जी ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना प्रारंभ कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, उसका प्रमाण अब सबके सामने है।
सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
राष्ट्रीय कर्तव्य
स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारतमाता की आँखे छलक पड़ी थी, इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परन्तु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाये थे कि भारत माँ की एक आँख में खुशी के आँसू छलक रहे थे, जबकि उसकी दूसरी आँख दु:ख के आँसुओं से डबडबायी हुयी थी। खुशी स्वाधीनता की थी और दु:ख विभाजन का था। अपनी ही सन्तानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काट कर अलग कर दिया था। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारूण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी की स्वाधीन देशवासी सम्भवत: समझदार हो जाएँगे और अपनी माँ को अब यह दरद नहीं देंगे।
परंतु दुर्देव और दुर्भाग्य ! स्वाधीनताप्राप्ति के वर्ष पर वर्ष बीतते गये और विभाजन के नये-नये रूप सामने आते गये। भूमि तो नहीं बँटी, पर भावनाएँ बटती गईं। भूगोल तो वही रहा, परन्तु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीरें मिटती गईं। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनों के कितने ही रूप सामने आते गये। विभाजन धर्म के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के नाम पर, विभाजन सांप्रदायिकता और क्षेत्रियता के नाम पर। स्वाधीनता की हर वर्षगाँठ पर भारतमाता की आँखे छलकती तो जरूर हैं, परन्तु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनो आँखों में खुशी के आँसू नहीं, दु:ख के आँसू डबडबा रहे हैं। लेकिन ये आँसू खून के आँसू हैं। इनमें जातियता के संघर्ष का खून हैं। अब उससे सही नहीं जा रही इन नित नये विभाजनों की पीड़ा।
पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने माँ की इस पीड़ा की अनुभूति कर पाएँगे ! क्योंकि यह अनुभूति तो राष्ट्रीयता की अनुभूति से जुड़ी हुई हैं। यह अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्तव्य हैं। उसे अपनी इसी कर्तव्यनिष्ठा में अपने धर्म, जाति एवं क्षेत्रियता को विलीन कर देना चाहिए।
अखण्ड ज्योति अगस्त २००७
सोमवार, 19 अक्टूबर 2009
विद्या विस्तार यज्ञों में युग साहित्य के विस्तार को प्राथमिकता दें
इस संदर्भ में गुरुसत्ता के हृदय के दर्द और उत्साह को स्वयं अनुभव करें विद्या अमृत है
प्रचलित सूत्र वाक्य है 'विद्ययाऽमृतमश्नुते' अर्थात् 'विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है ।' कहते हैं अमृतपान करने वाला मृत्यु से परे हो जाता है । इसीलिए देव संस्कृति में विद्या प्राप्त करने को सबसे अधिक महत्व दिया गया है ।
उपनिषदों में, श्रीराम चरित मानस में परमात्मा की माया (कुशलता) की दो धाराएँ कही गई है ।
१. विद्या और २. अविद्या । ईशोपनिषद् का निर्देश है कि इनमें से उपेक्षा किसी की भी नहीं की जा सकती । जो लोग किसी एक को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं, वे जीवन के असंतुलन में भटक जाते हैं । जो संतुलित जीवन जीना चाहें, लौकिक और पारलौकिक दोनों जीवन धाराओं का लाभ उठाना चाहें, वे विद्या और अविद्या दोनों को जानें और उनका संतुलित उपयोग करें ।
अविद्या उसे कहा गया है, जो हमारे जीवन की नश्वर विभूतियों (शरीर, पद, प्रतिष्ठा, साधनों) आदि के विकास और उपयोग की कुशलता विकसित करती है । हमारे उक्त घटक भले ही नश्वर हैं, किन्तु प्रत्यक्ष जीवन के रहते उनके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता । परमार्थ आदि के लिए भी उनका सहारा तो लेना ही पड़ता है । कहा भी गया है कि 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' अर्थात् धर्म-परमार्थ साधने के लिए भी शरीर ही पहला साधन बनता है । इसलिए उक्त विषयक कुशलता को, अविद्या को भी जानने-समझने, अपनाने की जरूरत है ।
विद्या उसे कहा गया है, जो हमारे जीवन की अनश्वर विभूतियों, आध्यात्मिक क्षमताओं के विकास और उपयोग की कुशलता विकसित करती है । अविद्या आश्रित विभूतियों का सदुपयोग भी इसी विद्या के द्वारा संभव होता है । विद्या की उपेक्षा होने से शरीर, साधन आदि की शक्तियाँ अनियंत्रित, उच्छृंखल होकर तमाम अनिष्ट पैदा करने लगती हैं ।
इसीलिए ईशोपनिषद् के ऋषि ने कहा है ''विद्या और अविद्या इन दोनों को समझो । अविद्या से मृत्यु को पार करो तथा विद्या से अमृत का पान करो । '' इसीलिए युगऋषि ने भी युगनिर्माण की सफलता के लिए दोनों का विवेकपूर्ण समन्वय बनाने की बात कही है । आज अविद्या की तो तमाम धाराएँ जाग्रत् और प्रतिष्ठित हो चुकी हैं, किन्तु विद्या के अभाव में वे बहक रही हैं । इसलिए जिस तरह अविद्या (लौकिक संसाधनों, तकनीकों) के सूत्र जन-जन तक पहुँच गये हैं । उसी तरह विद्या (आध्यात्मिक क्षमता और कुशलता) के सूत्र भी जन-जन तक पहुँचाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है ।
विद्या विस्तार हो कैसे ?
विद्या के सैद्धांतिक सूत्र तो हमेशा से लगभग एक जैसे रहे हैं, किन्तु समयानुसार उन्हें जीवन-व्यवहार में लाने की जरूरत पड़ती है । उनका व्यावहारिक स्वरूप स्पष्ट न होने के कारण लोग उन्हें उचित, किन्तु अव्यावहारिक कहकर छोड़ देते हैं । अवतारी, ऋषि, सिद्ध, संत आदि उन्हें अपने जीवन में उतारकर दिखाते हैं तथा पुनः उन्हें जन जीवन में स्थापित करने का प्रवाह पैदा कर देते हैं । उनके परिजन उसमें उनका साथ देते हैं । पुरुषार्थ बहुतों का लगता है, शक्ति उन्हीं की कार्य करती है ।
इस समय में पू. गुरुदेव ने अपनी विरासत-वसीयत के रूप में अपने जीवन को प्रस्तुत किया है । जो परिजन उनके द्वारा छोड़ी गई जीवन साधना की विरासत को सँभालते हैं, उन्हीं को युगऋषि के शक्ति-अनुदानों की वसीयत प्राप्त हो जाती है । विद्या विस्तार के क्रम में भी ऐसा ही होना है ।
पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर जो उच्चस्तरीय ज्ञान जनहितार्थ प्रस्तुत किया है, उसके ही कारण विज्ञजनों ने उन्हें 'वेदमूर्ति' की पदवी से विभूषित किया । ज्ञान को प्रकट करने के दो माध्यम हैं-वाणी और लेखनी । वाणी का अपना प्रभाव है-किन्तु वह हवा में खो जाती है । सुनने वालों की स्मृति में उसका बहुत थोड़ा अंश रुक पाता है । विज्ञान द्वारा दी गई सुविधाओं से उसे रिकार्ड करके बार-बार सुनना भी संभव हो गया है । उन्हें सुनकर अनुयायी उन्हें लिपिबद्ध या प्रकाशित भी कर लेते हैं । इसलिए उसका टिकाऊ रूप कान से सुनने योग्य (ऑडियो) एवं आँख से देखकर समझने योग्य पुस्तकों के रूप में ही मिलता है ।
इसलिए विद्या विस्तार के क्रम में उनकी लेखनी या वाणी जन्य पुस्तकों को जन-जन तक अधिक से अधिक संख्या में पहुँचाने और उन्हें उनका स्वाध्याय करने के लिए संकल्पित करने-कराने का लक्ष्य रखा गया है । प्रत्येक यज्ञ या कथा आयोजक से यही कहा गया है कि आयोजन के संदर्भ में जो साधक, सहयोगी जुड़ें, उन तक युग साहित्य पहुँचाने के कार्य को प्राथमिकता दें और पूरी तत्परता से उसे अंजाम दें ।
विविध ढंग
पू. गुरुदेव ने इस संदर्भ में परिजनों को जो ढंग समझाए हैं, वे इस प्रकार हैं-
१. पत्रिकाओं के ग्राहक-पाठक बनाना -
(क) अखण्ड ज्योति -
इसे मिशन की मुख्य पत्रिका कहा जाता है । इसे हर परिजन, प्रबुद्ध एवं विचारशील तक पहुँचाने का र्निदेश है । (ख) युग निर्माण योजना-जिनके लिए अखण्ड ज्योति भारी पड़ती है, उन नर-नारियों तक यह पत्रिका पहुँचाना उचित है । (ग) प्रज्ञा अभियान पाक्षिक-इसे अपने प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्त्ता एवं संगठित इकाई (मंडल आदि) तक पहुँचाना चाहिए । कहाँ क्या हो रहा है तथा कब क्या किया जाना है, इसकी संतुलित जानकारी इसी के माध्यम से पहुँचाई जाती है । प्रत्येक आयोजन के संयोजकों को इसके लिए एक निश्चित लक्ष्य बनाकर रखना चाहिए कि किस पत्रिका के न्यूनतम कितने नये ग्राहक बनाने हैं ।
२. पुस्तिका सैट स्थापना -
पूज्य गुरुदेव ने बहुत बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखी हैं । वे तो शक्तिपीठों, प्रज्ञा संस्थानों एवं पुराने नैष्ठिक परिजनों के यहाँ स्थापित करके उनके माध्यम से उन्हें प्रसारित करने की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है । विद्या विस्तार यज्ञों के दौरान जुड़ने वाले श्रद्धालुओं, साधकों के घरों में उनकी श्रद्धा एवं सार्मथ्य के अनुसार छोटे-बड़े सैट स्थापित करने-कराने का सुनिश्चित लक्ष्य हर आयोजन के साथ रखा जाना है । इस संदर्भ में किए गये निर्धारण इस प्रकार हैं-
(क) छोटा गायत्री सैट -जो भी श्रद्धालु आयोजन के लिए साधना में भाग ले रहे हैं, उनमें प्रत्येक परिवार के पीछे कम से कम एक सैट इस साहित्य का स्थापित कराया जाय- पुस्तकों का विवरण (कुल मूल्य-२१ रु.)
१. गायत्री की दैनिक साधना-४ रु.
२. उपासना के दो चरण जप और ध्यान-४ रु.
३. आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना-४ रु.
४. गायत्री विषयक शंका समाधान-४ रु.
५. दो महान अवलम्बन -
(ख) छोटा क्रांतिधर्मी सैट-आयोजन के क्रम में जिन विचारशील समाजनिष्ठ लोगों का जुड़ाव हो, उनके यहाँ यह सैट स्थापित कराने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए । युगऋषि के प्रौढ़तम विचारों की जानकारी इससे जन-जन में फैलेगी ।
पुस्तकों का विवरण (कुल मूल्य-३२ रु.)
१. सतयुग की वापसी-४ रु.
२. परिवर्तन के महान क्षण-४ रु.
३. मनःस्थिति बदले तो परिस्थिति बदले-४ रु.
४. जीवन देवता की साधना-आराधना-६ रु.
५. समस्यायें आज की, समाधान कल के-४ रु.
६. स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा-६ रु.
७. हमारे प्रमुख संस्थान-४ रु.
उक्त दोनों सेटों में से कोई एक अथवा दोनों उपयुक्त श्रद्धालुओं के यहाँ स्थापित कराये जा सकते हैं । प्रत्येक आयोजनकर्ता अपने क्षेत्र का जायजा लेकर लक्ष्य निश्चित करें तथा उस अनुसार सैट पहले से मँगाने की व्यवस्था निकटवर्ती साहित्य विस्तार पटल अथवा जिला संगठन के माध्यम से बना लें । विस्तार पटल से प्राप्त करने पर उन पर २५ प्रतिशत छूट मिल सकती है । यदि भावनाशीलों से २५ प्रतिशत अनुदान लेने की व्यवस्था बनाई जाये, तो ब्रह्मभोज साहित्य के क्रम में श्रद्धालुओं को वह सैट ५० प्रतिशत मूल्य पर दिये जा सकते हैं ।
(ग) नैष्ठिक परिजनों के यहाँ -पुराने नैष्ठिक परिजनों के यहाँ बड़े गायत्री सैट, पूरे क्रांतिधर्मी सैट तथा प्रज्ञापुराण (४ खण्ड) या प्रज्ञोपनिषद् (६ खण्ड) स्थापित करने तथा उनके स्वाध्याय का क्रम चलाया जाने का लक्ष्य भी विद्या विस्तार के अन्तर्गत रखना जरूरी है । यदि अपने अग्रदूतों के मन-मस्तिष्क में ही युगऋषि के विचार सूत्र जीवन्त रूप में न होंगे तो बात कैसे बनेगी?
अन्य उपक्रम
उक्त अनिवार्य क्रमों के लिए तो व्यवस्था बनानी ही चाहिए, यह तो न्यूनतम की बात हुई । प्राण-वानों को तो उससे आगे की बात भी सोचनी चाहिए । जैसे-१. झोला पुस्तकालय-प्रत्येक नये क्षेत्र में कुछ प्राणवान परिजनों को झोला पुस्तकालय चलाने के लिए संकल्पित कराया जाना चाहिए । पूज्य गुरुदेव ने झोला पुस्तकालय को 'अमृत कलश' की संज्ञा दी है । उसके माध्यम से अमृत तुल्य ज्ञान का सिंचन, करने वाले और पाने वाले दोनों को धन्य बनाता है ।
२. ज्ञान रथ-कस्बों या बड़े गाँवों में ज्ञानरथ चालू करने के सबल प्रयास किए जा सकते हैं । पूज्य गुरुदेव ने इसके लाभ स्पष्ट करते हुए लिखा है-''गोरस बेचन, हरि मिलन-एक पंथ दो काज ।'' इससे साहित्य विक्रय से होने वाला लाभ और ज्ञान विस्तार से होने वाला पुण्य, इन दोनों की प्राप्ति होती है ।
३. सम्पर्क से विस्तार-आयोजन क्षेत्रों में जन सम्पर्क एवं साहित्य विक्रय की प्रभावी व्यवस्था बनाकर समाज के विभिन्न वर्गों तक उनके अनुरूप पुस्तकें पहुँचाई जा सकती हैं । जैसे-
* बिल्कुल नये लोगों को प्रारंभिक परिचय देने या आम लोगों में वितरण के लिए-
१. इक्कीसवीं सदी का संविधान
* गुरुसत्ता का परिचय
१. संस्कृति पुरुष हमारे पूज्य गुरुदेव
२. हमारी वसीयत और विरासत
* गायत्री की न्यूनतम आवश्यक जानकारी
१. गायत्री की दैनिक साधना
२. गायत्री की सर्वोपयोगी सरल साधना
३. सबके लिए सुलभ उपासना साधना
४. युगशक्ति गायत्री का अभिनव अवतरण
* आत्मोत्कर्ष के लिए
१. मैं क्या हूँ,
२. तत्त्वदृष्टि से बंधनमुक्ति
३. अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है
४. गहना कर्मणोगति ।
* नियमित सत्संग के क्रम में
१. पूज्यवर की अमृतवाणी
२.प्रज्ञापुराण
३. क्रांतिधर्मी साहित्य (बीस पुस्तकें)
* व्यक्तिगत साधना संबंधी मार्गदर्शन
गायत्री महाविज्ञान भाग-१, भाग-२ एवं भाग-३
* प्रत्येक कार्यकर्त्ता के लिए पठनीय
१. लोक सेवियों को दिशाबोध
२. जीवन देवता की साधना-आराधना
* संगठकों के लिए पठनीय
संगठन की रीतिनीति
* प्रबुद्ध जनों के लिए
क्रांतिधर्मी साहित्य
* अन्य संस्थानों को मिशन का परिचय
१. छोटे फोल्डर एवं पत्रक
२. संजीवनी विद्या का विस्तार
* विद्यालय-विद्यार्थियों के लिए
१. शिक्षा और विद्या के समन्वय से संबंधित ५ पुस्तकें
२. विद्यार्थी जीवन की दिशाधारा
* बहिनों के लिए
महिला जागरण दिशा और धारा उनका दर्द-उनका उत्साह
पूज्य गुरुदेव के मन में यह दर्द हमेशा रहा कि जो लोग मुझे मानते है, वे मेरी बात क्यों नहीं मानते? उन्हें गुरु , ऋषि, विचारक माना है, तो उनके निर्देशों को भी तो मानें । जब र्निदेशों पर ध्यान ही नही दिया जायेगा, तो प्रगति की सीढ़ियों पर साधक चढेंगे कैसे? उनके निर्देश उनके साहित्य में हैं । उन पर बार-बार ध्यान लाया जाय, तो हर चरण पर पूरे किए जाने वाले अपने दायित्वों का बोध हो । इसलिए साहित्य के विस्तार और अध्ययन पर वे बहुत जोर देते रहे । अपने गुरु के निर्देश पाने और उनका निष्ठा पूर्वक पालन करने का जो उत्साह उनके अंदर उमड़ता रहा है । कुछ उसी प्रकार का उत्साह उनके निर्देशों के प्रति हमारा होना चाहिए । हमारे प्रयासों से उन्हें जितनी प्रसन्नता होगी, हमारे सौभाग्य का मार्ग भी उतना ही प्रशस्त होता चला जायेगा ।
ध्यान रखें, शीघ्रता करें
आयोजनों में जिस साहित्य की खपत जितनी मात्रा में करने का संकल्प उभरे, उतनी मात्रा में साहित्य पहले से मँगा लेने की व्यवस्था कर लेनी चाहिए, अन्यथा समय पर उसे प्राप्त करना कठिन होगा । इसे यो समझें-
इस श्रृंखला में २० हजार से अधिक आयोजन नये क्षेत्रों में होने वाले हैं । प्रत्येक आयोजन में यदि कम से कम पाँच-पाँच सैट भी स्थापित किए गये, तो भी एक लाख से अधिक सैटों की जरूरत पड़ेगी । यदि औसतन २० व्यक्तियों ने भी दीक्षा ली, तो कम से कम ४ लाख दीक्षा सैटों की जरूरत पड़ेगी । इतना साहित्य केन्द्र द्वारा एक साथ छापकर भेजना मुमकिन नहीं है । पहले से माँग आयेगी तो क्रमशः उसकी पूर्ति करते रहना संभव होगा । नवम्बर माह में जहाँ-जहाँ आयोजन हैं, वहाँ की माँग तो जल्दी से जल्दी शांतिकुंज के जोनल कार्यालय में फोन, फैक्स या ई-मेल से पहुँचा ही देना चाहिए ।
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