विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011
बुराई की गति
बुराई आदमी को पहले अज्ञानी व्यक्ति के समान मिलती है और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती है । फिर मित्र बन जाती है और निकट आ जाती है । फिर मालिक बनती है और आदमी के सिर पर सवार हो जाती है एवं उसको सदा के लिये अपना दास बना लेती है । (अखण्ड ज्योति, मार्च-५३)
कर्म की सार्थकता
अंहकार रहित भक्तिमय कर्म की ही सार्थकता है । हम जो भी कार्य करें चाहे वह पड़ोसी का हो, समाज एवं राष्ट्र का हो; कृषि सम्बन्धी, विद्यालय या ऑफिस सम्बन्धी हो; छोटा या बड़ा हो; उसमें समर्पण भाव होना चाहिए, पूर्ण मनोयोग जुड़ना चाहिए, तभी वह कार्य उत्तम, परिणाम उत्कृष्ट और कर्त्ता श्रेष्ठ कहलाता है ।
(वाङ्गमय-४, पृष्ठ १.१९)
बल की उपासना करो
निर्बलता पाप है । पापी व्यक्ति की तरह निर्बल को भी पृथ्वी पर सुख से जीने का अधिकार प्रकृति नहीं देती है । शरीर की कमजोरी से रोग घेरते हैं, मानसिक कमजोरी से चिन्ताएँ सताती हैं । अपनी बौद्धिक क्षमताएँ दुर्बल पड़ी हों तो यह निश्चित है कि आप पराधीनता के पाश में जकड़े होंगे । इसलिये आप बल की उपासना करो । शक्ति अर्जन जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है ।
(अखण्ड ज्योति जून-१९८९, पृ.१)
महानता ही वरेण्य है
महान उद्देश्य के लिये अपने छोटे से सांसारिक हित को शहीद कर देने की परम्परा का पालन करने वाले लोग ही संसार में महापुरुष हुए और मानवता को योगदान देने वाले काम कर सके । जो केवल स्त्री, बच्चे, पद-प्रतिष्ठा, धन और ऐश्वर्य की विडम्बना से चिपका रहा, वह तो संसार में व्यर्थ ही जिया और मरने वालों की एक संख्या बढ़ा गया ।
(वाङमय-५०, पृष्ठ-५.३१)
हम बदलेंगे-युग बदलेगा
हम अपना दृष्टिकोण परिष्कृत करें, रीति बदलें । अनुकरणीय आदर्शवादिता के लिये दुःसाहस कर सकना न तो कठिन है, न असंभव; इसका उदाहरण हमें अपने आचरण द्वारा लोगों के सामने प्रस्तुत करना होगा । परोपदेश की प्रवीणता प्राप्त करके वाक्-विलास भर हो सकता है, उससे कुछ बनता नहीं । दूसरों को गहरी प्रेरणा देने का एकमात्र उपाय यही है कि हम अपना आदर्श प्रस्तुत करके लोगों में अनुगमन का साहस उत्पन्न करें । व्यक्तियों का परिवर्तन ही युग परिवर्तन है । (वाङमय-६६, पृ.२.११)
घमण्ड मत करो
घमण्ड मत करो, वह बहुत बोझिल होता है । उसका रख-रखाव करने के लिये बहुत समय लगता है और खर्च पड़ता है । प्रसन्न रहना उससे कहीं अच्छा है । घमण्डी की तुलना में लोग हँसमुख से अधिक प्रभावित होते हैं । नम्रतायुक्त प्रसन्नता बड़प्पन की निशानी है और शेखीखोरी ओछेपन की ।
(अखण्ड ज्योति मार्च-१९८७, पृ.२)
गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011
सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
सहयोग
एक गाँव में आग लग गई।सभी आदमी तो सुरक्षित भाग निकले, पर दो वृद्ध ऐसे थे जो भाग नहीं सकते थे,एक अंधा और एक पंगा। दोनो ने एकता स्थापित की, अंधे ने पंगे को कंधे पर बैठा लिया, पंगा रास्ता बताने लगा और अन्धा तेज दौड़ने लगा, दोनो सकुशल बाहर आ गये।
सहयोग का अर्थ ही हैं-अनेक तरह की समर्थता से एक परिपूर्ण शक्ति का उद्भव।
ऐसे थे वे लोग
एक बार गाँधी जी स्कूल देर से पहुंचे । बादल छाए रहने और वर्षा होने के कारण उन्हें समय का ठीक पता न चला। स्कूल में अध्यापक ने उनसे देर से आने का कारण पूछा, तो उन्होंने सच बात बता दी। इससे अध्यापक को संतोष न हुआ। उन्होंने इसे बहाना समझकर एक आना जुर्माना कर दिया।
गांधी जी रोने लगे। साथियों ने कहा- एक आना के लिए क्यों रोते हो, आपके पिता तो अमीर हैं। एक आना कौन-सी बड़ी बात है। गाँधी जी ने कहा- मैं एक आना के लिए नहीं रोता, वरन् इसलिए रोता हूँ कि मुझे झूठा समझा गया।
श्रेष्ठ कौन ?
ज्ञान और धन दोनों में एक दिन अपनी श्रेष्ठता के प्रतिपादन पर झगड़ा उठ खड़ा हुआ। दोनों अपनी-अपनी महत्ता बताते और दूसरे को छोटा। आत्मा ने कहा- ``तुम दोनों कारण मात्र हो, इसलिए श्रेष्ठ बात ही तुम में क्या है ? सदुपयोग किये जाने पर ही तुम्हारी श्रेष्ठता है अन्यथा दुरुपयोग होने पर तो तुम दोनों ही घृणित बनकर रह जाते हो।´´
मीठी बानी बोलिये
एक लड़की ने पूछा-``पिताजी ! कौआ और कोयल दोनों काले हैं, पर लोग कौवे को मारते और कोयल को प्यार करते हैं, यह क्यों ? ´´बालिका पर एक करुण दृष्टि डालकर पिता ने उत्तर दिया- ``कोयल सबको प्यार करती हैं, इसलिए मीठा बोलती है। वाणी और भावनाओं की मधुरता के कारण ही वह सर्वप्रिय बन गई है और कौआ तो अपने स्वार्थ और धूर्तता के कारण ही उस आदर से वंचित है।´´
संयम
महर्षि दयानन्द की बीकानेर महाराज से मित्रता थी। वे अक्सर स्वामी जी से अपने ब्रह्मचर्य की शक्ति के प्रदर्शन की बात कहा करते थे, पर स्वामी जी उसे हँसकर टाल देते थे। एक दिन महाराज चार घोड़ों की बग्घी जोतकर प्रात:भ्रमण के लिए तैयार हुए। कोचवान ने घोड़ों को चलने के लिए बहुतेरा चाबुक फटकारा। घोड़े पूरी ताकत लगाकर बढे, किन्तु एक इंच भी आगे न बढ़ सके। बात क्या है, यह देखने के लिए नरेश ने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि महर्षि ने एक हाथ से बग्घी पकड़ रखी है। वे संयम की इतनी शक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
समय की पाबंदी
महात्मा गांधी के जीवन की एक घटना है। एक बार एक परिषद् की कार्यवाही आरंभ करने में उन्हें 45 मिनट की प्रतीक्षा करनी पड़ी। कारण था एक अन्य नेताजी, जिन्हें कार्यक्रम की अध्यक्षता करनी थी, उनका देरी से आना। उनके मंच पर आते ही गांधी जी कह उठे, ``यदि हमारे अग्रगामी नेतागणों की यही स्थिति रही तो स्वराज्य भी 45 मिनट देरी से आएगा।´´ समय के पाबंद, कर्तव्य की यह अभिव्यक्ति उनके अंत:करण से सहज ही स्फुरित हुई थी।
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