रविवार, 11 अक्टूबर 2009

सेवाधर्म एक सरल और व्यावहारिक योग साधना

मानवी काय-कलेवर अनेकानेक शक्तियों का भण्डागार है । ये शक्तियाँ प्रायः प्रसुप्त स्थित में पड़ी रहती हैं । प्रसुप्त को जाग्रत् करना ही महान् पुरुषार्थ है । योग साधनाओं की विविध परम्पराओं का सृजन इसी निमित्त हुआ है । उनमें अनेकता-विविधता देखते हुये किसी को भी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के आहार, पोशाक, भाषा, परम्परा एवं विनोद क्रम में अन्तर पाया जाता है, उसी प्रकार यदि अध्यात्म-साधनाओं में अन्तर पाया जाता है, तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये और भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । वे सभी उपयोगी हैं । लक्ष्य सभी का एक है-आत्म परिष्कार । वह जिस सीमा तक पूरा होता है, उसी क्रम से गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता है । इस प्रकार परिपुष्ट हुआ व्यक्ति अपने में सामान्यजनों की अपेक्षा प्रतिभा, प्रामाणिकता, सुव्यवस्था और तत्परता की मात्रा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी देखता है । यही ऋद्धि-सिद्धियों का बीज है । इसके पल्लवित होने पर सामान्य स्थिति में जन्मे, पले लोग भी उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं । वे ऐसे काम कर दिखाते हैं, जिन्हें अभिवंदनीय, अनुकरणीय कहा जा सके । इसी प्रगतिक्रम के साथ-साथ आत्म-सन्तोष और लोक सम्मान उपलब्ध होता चलता है । जन सहयोग की भी कमी नहीं रहती है ।

योगाभ्यासों में, तप-साधनाओं में सभी उपासना परक कर्मकाण्डों में अनुबंधित हों, ऐसी बात नहीं है । एक अति सरल और व्यावहारिक योग भी है-सेवायोग । इस निमित्त भी आत्मसंयम बरतना पड़ता है । शक्तियों को अनावश्यक कार्यों में क्षरित होने से रोकना पड़ता है । इतना ही नहीं समय, साधन, चिंतन आदि को सत्प्रयोजनों के निमित्त अर्पित करना पड़ता है । सादा जीवन और उच्च विचार का जीवनचर्या में सघन समावेश किया जाता है । औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है । 

सेवाधर्म अपनाने का संकल्प-उत्साह मन में तब उठता है, जब आत्मा की मलीनता हटती है और सद्गुण बढ़ते हैं । संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बंधनों से जैसे-जैसे छुटकारा मिलता जाता है, वैसे ही आत्मा की महानता उसी प्रकार परिलक्षित होने लगती है जैसे कीचड़ में दबकर तली में बैठी हुई लकड़ी पानी भरते चलने पर ऊपर उभरती चलती है । मलीनता का दबाव हटते ही महानता का ऊपर उभरना आरम्भ हो जाता है । 

सद्भावना फूल है और जन-कल्याण के निमित्त प्रयत्नशीलता उसका प्रतिफल । सेवा कृत्यों में मात्र हलचल ही नहीं होती रहती, उसके साथ सत्प्रवृत्तियों का समागम भी चलता रहता है । जो आदर्शवादी न होगा, उसे अपनी लोभ-लिप्सा से ही फुरसत न मिलेगी । सस्ती वाहवाही लूटने के लिये लोग दिखावटी आडम्बर मात्र ओढ़ पाते हैं । नाम छपने, फोटो प्रकाशित होने, पदाधिकारी कहलाने भर में उनकी रुचि होती है । उस विज्ञापनबाजी के लिये ही वे थोड़ा समय और धन खर्च कर पाते हैं । जहाँ ऐसा अवसर न हो, वहाँ से वे दूर ही रहते हैं । उदार आत्मीयता की भावनायें परिपक्व होने पर ही यह सूझता है कि दूसरों का दुःख बँटाया जाय, अपना सुख बाँटा जाय । गिरतों को उठाया जाय, उठतों को बढ़ाया जाय । 

सेवा की उमंग तभी उठती है, जब अन्यों में भी अपनी ही आत्मा का प्रतिबिम्ब परिलक्षित होने लगे । इस स्तर की सद्भावना, सदाशयता अनायास ही नहीं उभर आती । इसके लिये लम्बे समय तक आत्मशोधन की साधना करनी पड़ती है । तुच्छता को महानता में, कामना को भावना में बदलना पड़ता है । जब सेवाभावी चिन्तन जग पड़े और उसे कार्यान्वित करने की विधा चल पड़े, तो समझना चाहिये कि चिंतन क्षेत्र में उत्कृष्टता घर बनाने लगी । जब वह कार्यान्वित होने लगे, तो मानना चाहिये कि श्रद्धा ने मूर्तरूप धारण कर लिया । 

सेवाधर्म अपनाने पर पग-पग पर उदारता का परिचय देना पड़ता है । सहृदयता के बिना सेवा बन ही नहीं पड़ती । इसी तथ्य को यों कहा जा सकता है कि जन-कल्याण में प्रवृत्त होने वाला क्रमशः अधिकाधिक उदार बनते चलने के लाभ से वंचित नहीं रह सकता । सदाशयता और सेवा एक ही प्रक्रिया के अविच्छिन्न पक्ष हैं । एक के रहते दूसरी का भी आ पहुँचना स्वाभाविक है । प्रकाश के सामने अंधकार नहीं टिक सकता । उदारता के उभरते ही संकीर्ण स्वार्थपरता का निर्वाह हो नहीं सकता । सेवा परायण व्यक्ति दुर्जन बना नहीं रह सकता । उसे सज्जनता का पक्षधर बनना ही पड़ता है । 

अन्य योग साधनाओं में विधि-विधान सही न होने पर उल्टा परिणाम भी हो सकता है । हानि भी उठानी पड़ सकती है । पर सेवायोग में ऐसा कोई खतरा नहीं है । पुण्य-परमार्थ का स्वल्प समयदान भी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करता है । जन-कल्याण में निरत व्यक्ति सज्जन बन कर रहता है । इतना बन पड़ने पर आत्म-कल्याण की दिशा में प्रगति क्रम अनुगामी ही बनता है ।

ऐसे करें अपने बच्चों का विकास


महापुरुषों का कथन है कि बालक की नैतिक शिक्षा उसके जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है । अतः अपनी सन्तान को सच्चरित्र बनाने की अभिलाषा रखने वाले माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि वे बालक के जन्म से ही उन गुणों को स्वयं प्राप्त करने का प्रयत्न करें, जिन गुणों को वे अपनी सन्तान में होना आवश्यक समझते हैं । फिर भी जिन बालकों के माता-पिता ने इस ओर उचित ध्यान नहीं दिया, उनकी प्रवृत्तियों का भी अच्छी परिस्थिति की सहायता से बहुत कुछ सुधार किया जा सकता है । भले साथियों के सहवास से बुरी प्रवृत्तियों का दमन तथा अच्छी प्रवृत्तियों को उत्तेजित किया जा सकता है । 

वंश परम्परा तथा कुसंगति द्वारा प्राप्त कुप्रवृत्तियों का पारिवारिक सुधार कुछ अंशों में सदाचार शिक्षा द्वारा हो सकता है, परन्तु इस प्रकार की शिक्षा देने में निम्नलिखित छः बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है- 
(१) कुछ सीमा के अन्दर बालकों को थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता अवश्यमेव देनी चाहिए । उनकी प्रवृत्तियों का व्यर्थ दमन करने तथा हर समय उनको सख्त कैद में रखने से बहुत हानि की आशंका रहती है । इस प्रकार बालक डरपोक बन जाते हैं और उनमें आत्मविश्वास, स्वावलम्बन, दृढ़ निश्चय, उद्योगशीलता तथा मौलिकता आदि गुणों का विकास नहीं होने पाता । अतः बालकों को स्वतन्त्र रीति से कार्य करने का अधिक से अधिक अवसर देना चाहिए, जिससे कि उनके व्यक्तित्व और चरित्र का उचित रूप से विकास हो सके । 

(२) बालकों में आत्मसंयम का भाव उत्पन्न किया जाय तथा उनकी बुरी प्रवृत्तियों को रोका जाय । यह विशेषकर उन बालकों के लिए बहुत आवश्यक है, जिनकी पारिवारिक परम्परा तथा बाल्यकाल का सहवास अच्छा नहीं होता । इस प्रकार के बालकों को उसी समय दृढ़तापूर्वक रोकने की आवश्यकता होती है, जबकि वे सीमा का उल्लंघन करने को उद्यत होते हैं । ऐसी अवस्था में यदि अन्य साधनों से सफलता प्राप्त न हो, तो दण्ड का भी प्रयोग किया जा सकता है, जिससे कि बालक की कुप्रवृत्तियों का दमन होकर उसमें संयम का भाव उत्पन्न हो सके । 

(३) बालकों को उन गुणों, नियमों आदर्शों तथा कर्त्तव्यों से परिचित करा देना चाहिए, जिनके आधार पर उनके चरित्र का निर्माण करना है । जिससे उनको भली-भाँति विदित हो जाये कि कौन-सी बातें उनके लिए हितकर हैं, कौन-सी अहितकर, कौन-सी बातें उचित हैं और कौन-सी अनुचित तथा उनको किस आदर्श के अनुसार कार्य करना है? शिक्षाप्रद नाटकों, रोचक कथाओं, उत्तम-उत्तम कविताओं, आदर्श पुरुषों के जीवन-चरित्रों से बालक के आचरण संबंधी ज्ञान की वृद्धि तथा पुष्टि करें । बालकों को सुंदर-सुंदर कविताएँ, गीत, पद तथा श्लोक भी कण्ठाग्र करा देने चाहिए, क्योंकि इनके द्वारा उचित निर्णय पर पहुँचने और भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में उचित रीति से व्यवहार करने में बहुत सहायता मिलती है । 

(४) बालकों को निषेधात्मक कार्य की अपेक्षा विधेयात्मक कार्यों का स्मरण दिलाना अधिक श्रेयस्कर है । यदि बालक को किसी कार्य को करने का निषेध किया जाता है, तो उस कार्य को करने के लिए वह अधिक लालायित हो जाता है । यह बात ध्यान देने योग्य है कि केवल शाब्दिक रीति से अच्छी आदतों का बोध देकर ही शिक्षक तथा माता-पिता को सन्तुष्ट न होना चाहिए । उनके मन में उन आदतों के प्रति श्रद्धा तथा उनको अपने जीवन में चरितार्थ करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न की जानी चाहिए । इस प्रकार की दृढ़ इच्छा उत्पन्न हो जाने पर भिन्न-भिन्न गुणों, कर्त्तव्यों तथा सिद्धान्तों के सम्बन्ध में बालकों के मन में स्थायीभाव (सेंटीमेण्ट्स) उत्पन्न हो जाते हैं । इस भाव के उत्पन्न हो जाने से वे उन कार्यों को अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करते हैं । 

(५) ऐसे भावों को बालकों के मन में अवश्य उत्पन्न करना चाहिए, जिनको उसके समाज में विशेष महत्त्व दिया जाता है । इसके साथ-साथ कुछ ऐसे गुणों के प्रति भी उसके मन में स्थायी भाव (सेंटीमेण्ट्स) उत्पन्न कर देना आवश्यक है, जिनका होना मनुष्यता का सूचक है और सभ्य समाज में प्रत्येक के लिए वांछनीय है, जैसे-आत्मसम्मान, सभ्यता, ईमानदारी, सत्य, स्वच्छता, स्वास्थ्य रक्षा, साहस, निर्भीकता, न्यायशीलता, दया, परोपकार, सहनशीलता, आस्तिकता, र्कत्तव्यपालन, संयम, नियम पालन आदि । इसमें सबसे आवश्यक आत्मसम्मान का स्थायीभाव है । बालकों के चरित्र गठन में इससे सबसे अधिक सहायता मिलती है । जिस बालक में यह भाव उत्पन्न हो जाता है, वह कोई अनुचित कार्य कर ही नहीं सकता, क्योंकि इस भाँति के व्यवहार से उसके आत्मसम्मान में धब्बा लग जाने, उसके यश के कलंकित हो जाने और अन्य लोगों की दृष्टि में उसके गिर जाने की उसको सदा आशंका रहती है । इस भाव का विकास शनैः-शनैः होता है । इसको पूर्ण रूप से जाग्रत् करने के लिए बालक पर विश्वास करना चाहिए और उसके उत्तरदायित्व के भाव को जाग्रत् करना चाहिए। 

(६) कोई अनुचित कार्य हो जाने पर बालक को भला-बुरा नहीं कहना चाहिए, बल्कि ऐसा कहकर कि ''इस प्रकार का व्यवहार तुम्हारे योग्य नहीं है । यह कार्य तुम्हें शोभा नहीं देता । तुमसे कदापि ऐसी आशा न थी । इत्यादि-इत्यादि... ।'' उसके आत्मसम्मान के भाव को जाग्रत् करना चाहिए, जिससे भविष्य में वह कोई भी कार्य अनुचित ढंग से न करे । ऐसे अवसर पर भला-बुरा कहने से बालक का उत्साह सदा के लिए भंग हो जाता है और दिन-प्रतिदिन उसकी अवनति होने लगती है । 

चरित्र-गठन के लिए बालकों में दृढ़ संकल्पशक्ति का होना भी आवश्यक है, जिससे कि विघ्न-बाधाओं तथा शारीरिक कष्टों का सामना करते हुए बच्चे अपने निर्णयों को कार्य रूप में परिणत कर सकें । इस दृढ़ता को उत्पन्न करना भी बालक के माता-पिता एवं गुरुजनों का आवश्यक कर्तव्य है ।


बच्चे आपके सच्चे मित्र


सच्चे, सरल और निष्कपट मित्र की तलाश संसार में किसे न होगी ! ऐसा मित्र जिससे अपनी प्रत्येक गुप्त से गुप्त बात प्रकट कर सकें, तो भी ऐसी आश़ंका न रहे कि वह बात कहीं अन्यत्र फैल जायेगी । जो इतना सरल हो कि अपनी प्रत्येक त्रुटि को उदारतापूर्वक क्षमा कर सके । जो हर कार्य में सच्चा सहयोगी सिद्ध हो सके । अभिन्न हृदय, अभिन्न आत्मा, न कोई छल, न कपट; ऐसा मित्र मिल जाय तो पूर्वजन्म का कोई पुण्य, कोई सुकृत ही समझना चाहिए । पर ऐसी मित्रता इस जगत में अपवाद ही हो सकती है । प्रायः मित्रता किसी लाभ या स्वार्थ की दृष्टि से कायम होती है और जब उन परिस्थितियों में ढीलापन आने लगता है, तो आत्मीयता के बंधन भी समाप्त होने लगते हैं । 

हमारी दृष्टि में अपने बच्चों की मित्रता अधिक निश्चिंत और उपयोगी हो सकती है । मित्र में जो गुण होने चाहिए, वे बच्चों में मौलिक रूप से देखे जायें, तो वे सबसे प्रिय संगी, स्नेही और सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं । विश्व प्रसिद्ध कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर कहा करते थे-''परमात्मा की पवित्रता और निश्छलता यदि कहीं है, तो उसे मैंने बच्चों में पाया । बालकों को मैं अपने जीवन का प्रेरणास्रोत मानता हूँ ।'' पं. जवाहरलाल जी की बालकों के साथ घनिष्टता विश्व-विख्यात है । उन्होंने एक बार कहा था-''मैं इस संसार में अपने मित्रों के कारण बहुत सुखी हूँ । यह जो भोले-भाले बच्चे हैं, यही हमारे प्रिय सखा हैं ।'' 

बच्चों में असाधारण सूझ-बूझ होती है, उसे यदि ठुकराया न जाय तो वे ऐसी सुघड़ सलाह देते हैं, जैसी कोई मित्र भी नहीं दे सकता । जॉर्ज बर्नाडर्शा के एक नाटक में किसी पात्र के मुँह से ऐसी बात कहलाई गई थी, जो उसे न कहनी चाहिए थी । उसे एक बालक ने ठीक किया था । ''पिताजी, मनुष्य को उद्देश्यहीन उत्सवों में नहीं शामिल होना चाहिए ।'' यह उपदेश बालक नैपोलियन ने अपने पिता को दिया था । सुभाषचन्द्र बोस अपने घर में नजरबन्द थे, तो वहाँ से मौलवी के वेश में निकल जाने की योजना उनकी छोटी भतीजी ने ही बनाई थी । 

मित्रों से एक अपेक्षा यह की जाती है कि वे सुख-दुःख में सच्चे आत्मीय की तरह हमारे साथ रहें । हम नहीं कह सकते कि इस नियम का व्यवहार में कितना पालन होता है, पर बच्चों से अधिक संवेदनशीलता बड़ों में नहीं होती । माता-पिता को दुःखी देखकर बच्चों के चेहरे पहले मुरझा जाते हैं । वे प्रसन्नता के समय घर को उल्लास से भर देते हैं । इन दोनों समय में बच्चों की आत्मीयता प्राप्त कर सच्चे आत्मसन्तोष का अनुभव किया जा सकता है । दुःख के समय बालकों के ममत्व से दुःख कटता है, सुख में उन पर हल्का उत्तरदायित्व छोड़ने से उनका स्वाभिमान, उनकी आत्मीयता की भावना और उदारता की वृत्ति का परिष्कार होता है । इन दोनों अवसरों पर अपनी मानसिक स्थिति को बच्चों के सामने खुली हुई रखनी चाहिए । 

कभी-कभी मित्रों के गुण-सौन्दर्य बहुत प्रभावित करते हैं । किसी में आत्मीयता अधिक होती है, किसी से मनोविनोद होता है, कोई प्राणवान होते हैं, कोई कर्त्तव्यपालन और व्यवहारकुशलता में श्रेष्ठ होते हैं । बच्चों में इस प्रकार के अनेक सद्गुणों और सद्भावों का सम्मिलित एकीकरण देखा जा सकता है, पर उसे कृपया पुत्र होने की अधिकार भावना से न देखकर मैत्रीपूर्ण भावनाओं से देखिए । एक-दूसरे पर समान अधिकार का आश्वासन देकर ही एक-दूसरे के गुणों का लाभ प्राप्त किया जा सकता है । 

सरलता बालकों का स्वाभाविक गुण है । वे प्रतिदिन ऐसे मनमोहक दृश्य उपस्थित करते रहते हैं । कभी बच्चा कपड़ों और देह में मिट्टी लपेटकर आपके समक्ष आ खड़ा होगा, ठीक बाल-शिव की तरह । उसे देखकर आप मुस्कराये बिना नहीं रहेंगे । उसे कपड़े पहनने के लिए कहेंगे तो उल्टी कमीज पहनकर आ जायेगा । आपकी किताबों को सारे कमरे में बिखेर देगा । उन्हें इस तरह खोलेगा, मानो किसी विशेष सन्दर्भ की तलाश हो । 

आपको भी उसकी इन क्रियाओं से मनोविनोद करना चाहिए, पर यदि उसे इन कौतुकों के फलस्वरूप आपकी डॉट-डपट और मार-झिड़क मिली, तो कुछ ही दिनों में उसकी सारी सरलता कठोरता में बदलने लगेगी । यदि आप इन आदतों में से किसी को सुधारना ही चाहते हैं, तो उसका सही नमूना बार-बार उसके आगे प्रदर्शित कीजिए, बच्चा अपने-आप उसका अनुसरण कर लेगा । समझायें भी तो हँसते हुए कुछ कहें, वह भी आत्मीयता के साथ । ''नहीं, मुन्ने ऐसे नहीं, कंघा यों पकड़ना चाहिए और ऐसे बाल ठीक करने चाहिए ।'' इस प्रकार कहते हुए आप कोई बात उसे समझाइये । चिल्लाकर, चौंकाकर कोई बात कहेंगे तो बच्चा डर जायेगा और आपके प्रति उसकी भावनाओं में कठोरता पनपने लगेगी । यह दबाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कुटिल परिणाम उपस्थित करने वाला होता है । 

आपके बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ आप पर हैं, उन को पूरा करने में निःसन्देह कठिनाइयाँ भी बहुत अधिक आती हैं, पर इससे बालक पर स्वामित्व या अधिकार की भावना प्रकट करना उचित नहीं । आपके घर वह परमात्मा का मेहमान बनकर आता है । आत्मा की दृष्टि से आप में और बच्चे में कोई असमानता नहीं होती । जिम्मेदारियाँ अधिक होने से आप बड़े अवश्य हैं, पर तमाम कत्तर्व्यों का भली-भाँति निर्वाह आप बच्चों के साथ मित्रवत् व्यवहार करके ही पूरा कर सकते हैं । आप उन्हें इस दृष्टि से देखा करें तो निःसन्देह उनका बड़ा भला कर सकते हैं और स्वयं भी आत्म-लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।


भावनाशील बनें और व्यवहार कुशल भी

भावना जीवन-वृक्ष की जड़ है और उसके द्वारा खींचा जाने वाला पोषक पदार्थ व्यवहार । दोनों के समन्वय से ही परिवार को उपयुक्त परिपोषण मिलता है । भावना में आत्मीयता की सघनता होती है । उससे दूसरों को लाभ पहुँचाते समय उल्लास और उनका दुःख बँटाते समय सन्तोष की अनुभूति होती है । लेकिन उस आचार-संहिता को भी महत्व और प्रश्रय देना होगा, जो भावनाओं के अनाचार को रोकती है । रेलगाड़ी की सार्मथ्य कितनी ही बड़ी क्यों न हो, पटरी की मर्यादा में उसे अनुशासित न रखा जाय, तो वह कहीं से कहीं बहकेगी और अन्ततः अपना तथा दूसरों का विनाश करेगी । 

भावुक अक्सर ठगे जाते हैं, इसका कारण यह नहीं कि भावना की श्रेष्ठता में कोई सन्देह है, वरन् यह है कि व्यवहार और मर्यादाओं का नियंत्रण न रहने से उस दिव्य संवेदना का दुरुपयोग होता है । धूर्तों को इस कला में प्रवीणता प्राप्त होती है कि वे भावुकता भड़काकर किस प्रकार उस संवेदनशील मनोभूमि का लाभ उठायें । विपत्ति की सम्भावना बताकर ज्योतिषी और चिकित्सक किस प्रकार उनके स्वजन, परिजनों का अनुचित दोहन करते हैं, इसके प्रमाण-उदाहरण हर जगह उपलब्ध हो सकते हैं । शिशु-वात्सल्य की अतृप्त भावना को पूर्ण करने के लिए पराये बच्चे दत्तक लिये जाते हैं । इस दुर्बलता को वे बच्चे थोड़ी समझ आते ही भाँप लेते हैं और अपने परिपालकों का बुरी तरह शोषण ही नहीं करते, त्रास भी देते हैं । 

युवक-युवतियों के प्रेम-प्रसंगों में भावुकता की उड़ानें ही आकाश में पतंगों की तरह उड़ती दीखती हैं । संध्याकाल की रंगीनी आकाश के पश्चिमी भाग में कितनी मनोहर लगती है, पर उसका न तो कोई अस्तित्व होता है और न आधार । ऐसा ही उन्माद इन तथाकथित प्रेम-प्रसंगों के मूल में रहता है । न औचित्य समझ में आता है, और न यथार्थ । नशे पर नियंत्रण कौन करे? सपनों की सीमा कैसे बाँधे? प्रेमोन्माद भी लगभग ऐसा ही होता है । 

मैत्री के नाम पर कितना शोषण होता है, इसका अपना एक अलग ही क्षेत्र है । पुराने जमाने में शत्रु आमना-सामना करते लड़ाई लड़ते और हानि पहुँचाते थे । आज के जमाने का आधुनिकतम आविष्कार यह है कि मित्रता गाँठी जाय, वफादारी का प्रमाण दिया जाय और रंगीन सपने दिखाकर अथवा अपनी कठिनाई जताकर मित्र का शोषण आरंभ कर दिया जाय । दाव लगते ही उसे चित्त-पट्ट करके रफूचक्कर बना जाय । 

पति-पत्नी की द्विधासत्ता को एकत्व में परिणत कर देने का प्रधान कारण आत्मीयता की सघन भावुकता ही है । यही पतिव्रत और पत्नीव्रत की उच्च सच्चरित्रता के रूप में परिलक्षित होती है । एक-दूसरे के प्रति परिपूर्ण वफादारी का आधार यही है । एक-दूसरे को बहुत कुछ, सब कुछ देने की उमंगें इस संदर्भ में उठती भी हैं और उठनी भी चाहिए, किन्तु यदि यह उभार औचित्य की मर्यादा लाँघने लगे, तो समझना चाहिए कि अर्थ का अनर्थ होने जा रहा है । 

सम्पन्न लोग पत्नी को कुछ भी शारीरिक श्रम न करने देने के लिए नौकरों की व्यवस्था करते हैं । उनके लिए शृंगार और विनोद के अनेकानेक साधन जुटाते हैं । इसके प्रबंध के पीछे उनका उद्देश्य पत्नी पर भारी स्नेह होने का परिचय देना भर होता है । इस एकांगी चिन्तन में अंततः पत्नी की स्वस्थता, समर्थता, प्रखरता और प्रतिभा को बुरी तरह क्षति पहुँचती है और वह अंततः किसी कृषक, मजदूरों की श्रमजीवी पत्नी से भी अधिक घाटे में रहती है । गुड़िया बने रहने में उसके क्या खोया और क्या पाया? 

छोटों का अधिक काम करना, बड़ों को अधिक आराम देना सहज शिष्टाचार है । लेकिन बड़ों को आराम देने का अर्थ उन्हें आलसी और दुर्व्यसनी बना देना है, तो उसके कहीं अच्छा यह है कि उन्हें व्यवस्था, शिक्षा एवं लोकसेवा जैसे किसी उपयोगी काम में जुटाये रखने का ताना-बाना बुना जाय । देखने में यह बड़ों के प्रति अनुदारता बरतने जैसा प्रतीत होता है, किन्तु दूरदर्शिता यही कहेगी कि सद्भावना और सुव्यवस्था का समावेश हर दृष्टि से उचित है । 

जो कमाया जाय, उसका उत्तराधिकार संतान को ही मिले, यह प्रचलन हर दृष्टि से निंदनीय है । इसमें संतान को मुफ्तखोरी की लानत उठानी पड़ती है और संचयकर्त्ता मोहग्रस्त कहलाते हैं । औचित्य इतना ही है कि अभिभावक अपनी संतान को समर्थ, सुसंस्कृत बनाने के साथ अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझें और संतान भी अपने पूर्वजों से इससे अधिक की आशा न करें । असमर्थ आश्रितों को ही पूर्वजों की कमाई पर गुजारा करने का अधिकार रहना चाहिए, पर जो अपने बाहुबल से कमाने में समर्थ हैं, उन्हें स्वावलम्बन पूर्वक निर्वाह करना चाहिए । बिना परिश्रम की कमाई, चाहे वह चोरी में, लॉटरी में या उत्तराधिकार में या किसी दूसरे रास्ते से मिली हो, तथ्यतः अनैतिक है । जो कमाएँ सो खायें, यही सिद्धांत सही है । 

मोहग्रस्त अभिभावक, भावुकतावश अपनी संचित कमाई का उत्तराधिकार अपने वंशजों के लिए छोड़ते हैं तो प्रचलन के अनुसार इसे स्वाभाविक ही कहा जायेगा, किन्तु जहाँ तक विवेक एवं औचित्य का प्रश्न है, इस हस्तांतरण का कोई औचित्य नहीं है । कृषि, उद्योग आदि के तंत्र पीढ़ी-दर पीढ़ी चलते रहें और उनके सहारे परिवार को काम मिलता रहे, यह व्यवस्था अलग है, इसका समर्थन भी हो सकता है । किन्तु जहाँ ऐसा कुछ नहीं, बाप की कमाई बेटों को बँटनी भर है, वहाँ निश्चित रूप से भावुकता का अनुचित उपयोग ही है । इसमें देने वाले और लेने वाले-दोनों पर ही औचित्य की भावुकता के दुरुपयोग का कलंक लगता है । ऐसा धन विशुद्ध रूप से सार्वजनिक उपयोग के लिए प्रयुक्त होना चाहिए । भले ही उसे मृत्यु टैक्स के रूप में सरकार वसूल करे अथवा प्राचीनकाल की श्राद्ध व्यवस्था के अनुसार उसे स्वेच्छापूर्वक धर्म-प्रयोजन के लिए वितरित कर दिया जाय । 

इन दिनों भी परिवारों में भावना का अस्तित्व किसी न किसी रूप में विद्यमान है । भाव संवेदनाएँ घटती तो जा रही हैं, पर वे अभी समाप्त नहीं हुई हैं । अब जो करने योग्य है, वह यह है कि उस दैवी तत्त्व का उपयोग विवेकपूर्वक होने दिया जाय । पारिवारिकता अपने सही स्वरूप में पनपे, उसे मोहग्रस्तता की विकृत स्थिति में न रहना पड़े ।

सवर्श्रेष्ठ है आत्मबल

तप द्वारा आत्मशोधन करने से विकसित होता है आत्मबल 

शरीरबल से साधन 
मित्रो! अगर कभी आपको भौतिक साधनों की जरूरत हो और इस बात की इच्छा हो कि हम शरीर से सुख भोग करेंगे, हम संसार की दौलत इकट्ठी करेंगे, तो आप दो काम करना । दो देवताओं के पास जाना, तीसरे के पास मत जाना । क्या करना? शारीरिक बल इकट्ठा करना । शारीरिक बल किसे कहते हैं? देह की ताकत को भी कहते हैं और दिमाग की ताकत को भी कहते हैं । अपने दिमाग को सक्षम बनाना, योग्यता बढ़ाना और मेहनत करना । दिमाग की योग्यता बढ़ाएँगे तो आपके पास साधन आ जाएँगे । ... 

बुद्धिबल से सुख-शांति 
मित्रो! अगर आपको इस बात की जरूरत हो कि हमारे जीवन में सुख चाहिए, प्रसन्नता चाहिए, मस्ती चाहिए, तो मैं आपसे एक ही बात कहूँगा कि आप विवेकशील बनिए । विवेकशीलता, जिसको हम बुद्धिमत्ता कहते हैं । बुद्धिमत्ता अक्लमंदी को नहीं कहते हैं । अक्लमंदी के ऊपर लानत है । अक्लमंदी हमारे-आप सबके हिस्से में आ गई है । कोई एम.ए. हो गया है, कोई बी.ए. हो गया है, कोई इंजीनियर है, कोई डॉक्टर है । यह क्या है? इसका नाम है अक्लमंदी । कोई पंचायत का मेंबर है, कोई सोसाइटी का मेंबर है । ये कौन हैं? ये हैं अक्लमंद । कोई व्यापारी है, कोई दुकानदार है । ये सब अक्लमंद हैं । अक्ल तो शरीर का हिस्सा है, जो केवल पैसा कमाने के काम आती है । स्वार्थ साधने में काम आती है; और किसी काम में नहीं आती । मैं यह कह रहा था कि बुद्धिमत्ता और विवेकशीलता अगर आपके भीतर हुई, तो आप गई-गुजरी परिस्थितियों में भी अपनी प्रसन्नता कायम रख सकते हैं । परिस्थितियाँ चाहे कैसी क्यों न हों, हर परिस्थिति में आप सुख-शांति, प्रसन्नता कायम रख सकते हैं और बुद्धिमत्ता की कमी हो तो अच्छी से अच्छी परिस्थिति में रोते ही नार आयेंगे । 

आत्मबल से उत्कर्ष 
साथियो! आत्मबल सबसे बड़ा बल है । शरीरबल से अक्लबल बड़ा है और अक्लबल से आत्मबल बड़ा है । दुनिया में आत्मबल सबसे बड़ा होता है । आत्मबल के सहारे मामूली आदमी गाँधी बन सकता है । आत्मबल के सहारे मामूली आदमी बुद्ध बन सकता है । अध्यात्मबल के सहारे मामूली आदमी ईसा मसीह बन सकता है । अध्यात्मबल के सहारे मामूली घर में पैदा हुए व्यक्ति जगद्गुरु शंकराचार्य हो सकते हैं । यह सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कुव्वत है । .... 

आदमी यही सोचता है कि आत्मबल पाने के लिए, भगवान को पाने के लिए, भगवान की सिद्धियाँ पाने के लिए और आध्यात्मिक विशेषताएँ पाने के लिए हमको क्या करना चाहिए? 'करना' नहीं, बेटे! यह शब्द गलत है । क्या करना चाहिए? यह मत कहिए । करेगा तो शरीर । ... अध्यात्मबल कहाँ से आता है? बेटे! अध्यात्मबल बनने से आता है, ढलने से आता है । आप किस तरह से विचार करते हैं? आपके चिंतन का तरीका क्या है? आपने सोचने का ढंग क्या बना रखा है? आपके विचार करने की शैली क्या है, बताइए । ...अगर आपकी यही इच्छाएँ, निष्ठाएँ, आस्थाएँ, भाव-संवेदनाएँ उच्चस्तरीय होतीं तो मजा आ जाता । 

तो फिर क्या करना चाहिए? नहीं बेटे! क्या करना चाहिए नहीं, क्या बनना चाहिए । बेटे! अपने आप को अपने से काट, अपने आप से लड़ । अपने आप को अपने से पछाड़ । अपने आप अपने से कुश्ती लड़ । यह क्या है? इसका नाम है-तप । तप कहते हैं-अपने भीतर एक अंतर्द्वंद्व खड़ा कर और अपने भीतर जद्दोजहद करने के लिए लड़ाई खड़ी कर । अपनी पिटाई अपने आप कर और अपनी धुलाई अपने आप कर । अपने भीतर-बाहर हर हिस्से में गंदगी भरी पड़ी है । इसको कौन ठीक करेगा? मुहल्ले वाला? मुहल्ले वाला नहीं करेगा । आपके भीतर किसी को घुसने की गुंजाइश नहीं है । आप ही अपने घर में घुसिए और अपने को ठीक कीजिए । जो भीतर नहीं घुस सका, आत्मसंशोधन नहीं कर सका, अपने भीतर अपनी लड़ाई नहीं लड़ सका, अपने विरुद्ध अपने आप बगावत नहीं कर सका और अपने आप को ऊँचा उठाने के लिए अपनी कुव्वत नहीं लगा सका, वह कभी नहीं उठेगा और न कभी आत्मबल प्राप्त कर सकेगा । 

गीताकार ने कहा है-उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ अर्थात्-हम ही अपने बैरी हैं और हम ही अपने मित्र हैं । हम ही अपना उद्धार कर सकते हैं और हम ही अपने को पतन की राह में धकेल सकते हैं । 

ये सारी की सारी शिक्षाएँ हमने आपको दीं, गायत्री उपासना हमने आपको सिखाई । गायत्री उपासना के साथ में हमने बराबर विचार किया कि-धियो यो नः प्रचोदयात् । अर्थात् आप अपनी बुद्धि और बल को विकसित करें । साधना करें, तपश्चर्या करें, योगाभ्यास करें और अपने भीतर की लड़ाई-जैसे व्यायामशाला में शरीर को मजबूत करते हैं, जैसे स्कूल में जाकर के अपने दिमाग को मजबूत बनाते हैं, उसी तरीके से आप तपश्चर्या की पाठशालाओं में प्रवेश करें और अपने आप को उसमें तपाएँ । तपा करके जिस तरीके से कच्चा लोहा पक्का बना दिया जाता है, उसी तरीके से आप तप करने का अभ्यास करें । कच्चे लोहे को पकाएँ, पकाकर उसको स्टील बनाएँ, फौलाद बनाएँ और फौलाद के बाद में लौह भस्म बनाएँ । इस तरह एक से बढ़कर एक कीमती चीज बनते चले जाएँ । कीमती से कीमती बनाने की यह विशिष्टता तप की आग में ही होती है ।







सूर्य-साधना पर निर्भर है हम सबका भविष्य

परम पूज्य गुरुदेव -संदर्भ -गायत्री का सूर्योपस्थान, पृष्ठ-३० से ३७ 

दीर्घकालीन कालचक्र के अनुसार इन दिनों दो महाक्रांतियाँ होने को हैं । ... इनमें वृष्टि, अनावृष्टि, सूखा, अकाल ओलावृष्टि आदि ही नहीं, युद्ध और महामारियों के प्रकोप भी होंगे । उन प्रकोपों में उन्हीं की रक्षा होगी, जो सूर्य से अपना संबंध जोड़े रहेंगे । 

इस तरह की जो घोषणाएँ हम काफी समय पहले से ही कर रहे हैं, वह गणित-ज्योतिष और सूर्य विद्या के आधार पर ही कर रहे हैं । वैज्ञानिक निष्कर्ष भी इसकी पुष्टि करते हैं । भारत वर्ष को मुस्लिम और अंग्रेजी सभ्यता के बंधन में रहते हुए कोई पंद्रह सौ वर्ष बीत रहे हैं । सूर्य विद्या के आधार पर इन १५०० वर्षों का अंत इसी शताब्दी में हो जायेगा । (काल गणना देखें मूल पुस्तक के पृष्ठ ३३ पर) इस बीच सूर्य की प्रचण्ड शक्तियों का पृथ्वी पर आविभार्व होगा और उससे वे तमाम शक्तियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो जायेंगी, जो मानसिक दृष्टि से अध्यात्मवादी न होंगी । जो सूर्य शक्तियों से संबंध बनाये रखेंगे, उनकी रक्षा और समुन्नति उसी प्रकार होगी, जिस तरह भयंकर ज्वार-भाटा आने पर भी समुद्र में पड़े फूलों का अनिष्ट नहीं होता, जबकि बड़े-बड़े जहाज यदि साधे न जायें तो अनन्त जल राशि में डूबकर नष्ट हो जाते हैं । गायत्री उपासक इन परिवर्तनों को कौतूहल पूर्वक देखेंगे और उन कठिनाइयों में भी स्थिर बुद्धि बने रहने का साहस उसी प्रकार प्राप्त करेंगे, जिस प्रकार माँ का प्यारा बच्चा माता के क्रुद्ध होने पर भी उससे भयभीत नहीं होता, वरन् अपनी प्रार्थना से उन्हें शांत कर लेता है । 

यह नहीं समझना चाहिए कि इन परिवर्तनों में विश्व संस्कृति का अन्त हो जायेगा ।.... जब तक सूर्य है, तब तक सृष्टि रहेगी, पर अब वह एक बार स्नान कर अपनी संपूर्ण गंदगी साफ कर देने को इच्छुक है । वर्तमान प्राकृतिक हलचलें उसी का प्रमाण हैं । 

वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि सूर्य जब उत्तेजित होता है, तब उससे ज्वालाएँ फूटती हैं और सूक्ष्म कणों की वर्षा होती है । यह कण बाद में कहाँ विलीन हो जाते हैं, इसका पता लगाने में वैज्ञानिक असमर्थ रहे, लेकिन आत्मविद्या के आचार्य कहते हैं कि सूर्य-शक्ति के उत्तेजित कण ही सृष्टि के प्रत्येक अणु में हलचल पैदा करते हैं । उससे प्रकृति ही नहीं, प्राणियों की सूक्ष्म प्रवृत्ति, अर्थात् विचार, भावनाएँ, संकल्प और विश्वास भी प्रभावित होते हैं । इन परिवर्तनों को आँका जाना यद्यपि संभव नहीं होता, पर सामूहिक रूप से विश्व की राजनीति, उद्योग, व्यापार, श्रम, रोजगार, युद्ध एवं सामाजिक गतिविधियों पर उनके प्रभाव को देखकर वस्तु स्थिति को समझा अवश्य जा सकता है । 

जो इन बातों की अनुभूति करेंगे, वे तेजी से गायत्री महाविद्या के अन्तराल में प्रविष्ट होंगे । साधना, ज्ञानार्जन और संयम में उनकी वृत्ति बढ़ेगी, ऐसे लोग ही आगे चलकर विश्व का मार्गदर्शन करेंगे । 

सूर्य को ऋषियों ने त्रयी विद्या कहा है, अर्थात् उसमें स्थूल तत्त्व (जिनसे शरीर बनते हैं ।), प्राण (जिनसे चेतना आती है ।), और मन (जो चेष्टाएँ प्रदान करता है ।) तीनों तत्त्व विद्यमान हैं । हम दृश्य रूप से सूर्य के परिवर्तनों से प्रभावित होकर दुःखी होते हैं, किन्तु गायत्री मंत्र के माध्यम से जब सूर्य के साथ जब हम अपने मनोमय जगत को जोड़ते हैं, तादात्म करते हैं, तो हमें उसके तीनों आध्यात्मिक लाभ-स्वास्थ्य, तेजस्विता और मनस्विता के रूप में मिलते हैं । जिस दिन पृथ्वी के लोग इस विद्या को ठीक-ठीक जान लेंगे, उस दिन सुख-शांति और समृद्धि का कोई अभाव नहीं रहेगा, पर युग परिवर्तन की इस संधिवेला में और संक्रांति अवस्था में उन लागों को अधिक श्रेय-सम्मान मिलेगा, जो इस तत्त्वज्ञान के अवगाहन को सारे विश्व में फैलाने का प्रयत्न करेंगे । 

कैसे प्रभावित करती है गायत्री साधना? 
ध्वनि विज्ञान का एक सरल प्रयोग है । एक पतले तार को दो सिरों से कसकर बाँध दीजिए । उस पर एक छोटा सा कागज का टुकडा मोड़कर रख दीजिए । अंग्रेजी के वाय के आकार का कम्पन उत्पन्न करने वाला एक यंत्र, जिसे ट्यूनिंग फोर्क कहते हैं, लीजिए । ट्यूनिंग फोर्क को किसी ठोस वस्तु से टकराकर उसमें कम्पन उत्पन्न कीजिए और उसे तार के समीप ले जाइये । हम देखेंगे कि ट्यूनिंग फोर्क के तार को स्पर्श किए बिना भी उसके कंपन के प्रभाव से तार में भी कंपन उत्पन्न हो जाते हैं और वह कागज का टुकड़ा नाचने लगता है । 

शास्त्र कथन है-सूर्यात्मा जगतस्थस्थुशश्च अर्थात सूर्य जगत की आत्मा है और हमारी चेतना हमारे शरीर जगत की आत्मा है । इन दो चेतनाओं को समान गति से कम्पित और सम्बंध स्थापित कर सकने की सामर्थ्य उन २४ अक्षरों में है, जिन्हें हम गायत्री मंत्र कहते हैं । 

विज्ञान का नियम है कि उच्चस्तर या अधिक शक्ति का प्रवाह निम्न स्तर अथवा कम शक्ति वाले केन्द्र की ओर तब तक बहता है, जब तक कि दोनों समान न हो जायें । गायत्री से प्राप्त सिद्धियाँ इसी तादात्म्य की परिपक्व अवस्था है । तब मनुष्य भौतिक शरीर में ही सूर्य की चेतना के समान सर्वव्यापी, सर्वदर्शी और सर्व समर्थ हो जाता है । वह न केवल जलवायु, लोगों के मन की बातें जान लेने की सामर्थ्य पा लेता है, वरन् उससे भी सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियों का स्वामी हो जाता है । वह सारे संसार को नष्ट भी कर सकता है, किन्तु सूर्य देवता से संपर्क स्थापित होने के बाद गायत्री उपासक में उन्हीं की-सी करुणा, सद्बुद्धि और पदार्थ उत्सर्ग की भावना विकसित होने लगती है । इसी प्रकार जब गायत्री उपासक अपनी शक्तियों को प्रयत्न पूर्वक सद्गुण, सद्विचार और सत्कर्मों में लगाने लगता है, तो उसकी सफलता और भी सस्वर हो उठती है । 

१९५८ का सहस्र कुण्डीय यज्ञ, सूर्य शक्ति का विशिष्ट प्रयोग 
शांत तालाब में एक छोटा-सा पत्थर भी तरंगें उत्पन्न कर देता है । यह भाव और विज्ञान का मिलाजुला प्रयोग है । उसी प्रकार हमने पढ़ा था कि कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट रीति से गायत्री उपासनाएँ एवं यज्ञादि सम्पन्न किए जायें, तो उससे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है । उनसे न केवल अपने लिए, वरनॅ सम्पूर्ण समाज, राष्ट्र एवं विश्व के लिए सुख, समृद्धि और शांति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है । अक्टूबर सन् १९५८ में उस सूक्ष्म दर्शन का आश्रय लेकर किया गया सहस्र कुण्डीय यज्ञ एक ऐसा ही प्रयोग था । पीछे मौसम विज्ञानियों ने भी हमारी मान्यता के भाव की पुष्टि कर दी । 

१ जुलाई १९५७ से ३१ दिसम्बर १९५८ तक खगोल शास्त्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय शांत सूर्य वर्ष मनाया । इन दो वर्षों में सूर्य बिलकुल शांत रहा । इसी अवधि में हमारे उस यज्ञ की तैयारी हुई थी । साधकों ने एक वर्ष पूर्व से ही गायत्री के पुरश्चरण आरंभ किए थे और अक्टूबर १९५८ में चार दिन तक यज्ञ कर शरद् पूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी थी । गायत्री का देवता सविता है, इसलिए इस गायत्री अभियान का भी उद्देश्य उसका अध्ययन और प्रयोग भी था और उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना भी, जो ऐसे अवसरों पर देवशक्तियों से सुविधा पूर्वक अर्जित की जा सकती हैं । 

यज्ञ के बाद से विश्व की गतिविधियों का हम बराबर अध्ययन कर रहे हैं और यह देखकर आश्चर्यचकित हैं कि न केवल प्रकृति अपने विधान बदल रही है, वरन लोगों की भावनाएँ और विचार भी तेजी से बदल रहे हैं । यूरोप की विलासिता प्रिय और भौतिकवादी प्रजा भी अध्यात्म का आश्रय पाने के लिए भागी चली आ रही है । भारत को तो उसका सुनिश्चित लाभ मिलने ही वाला है, भले ही उसका प्रत्यक्ष दर्शन सन् १९९९ के बाद दिखाई दे ।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

अध्यात्म का प्रवेश द्वार-प्रेम का प्रतिदान


स्नेह-प्रेम में अद्भुत शक्ति है । जब यह विशिष्टता मानवी अन्तःकरण में प्रस्फुटित होती है, तो न सिर्फ व्यक्ति को असाधारण बनाती है, वरन् उस समाज और राष्ट्र को भी अद्वितीय बना देती है, जिसमें इसकी सरिता प्रवाहमान है । 

इन दिनों सर्वत्र अराजकता और अशान्ति का बोलबाला है । घृणा और विद्वेष का वातावरण इस कदर बढ़ा है, जैसा पूर्व में शायद ही कभी रहा हो । लोग प्रत्यक्ष में स्नेह का दिखावा तो करते हैं, पर परोक्ष में न जाने कितनी बार एक-दूसरे की हत्या कर चुके होते हैं, बुरा-भला कहकर निन्दा करते हैं । यह प्रेम का दर्शन मात्र है । इससे न तो अपना भला होने वाला है, न दूसरे का । प्रेम का वह उद्दाम उत्सव अब कहाँ रहा, जिसके कारण धरती को कभी 'स्वर्गादपि गरीयसी' की संज्ञा दी गई थी । उसका प्रवाह वर्तमान में सूखकर संकीर्ण बन गया है । आज हम अनुराग तो करते हैं, पर वह घर-परिवार तक सीमाबद्ध होकर रह गया है, अपने और अपनों तक सीमित हो गया है । यही विकृत प्रेम इन दिनों बढ़ते अपराध के रूप में सामने आ रहा है । हम अपनों से प्यार प्रदर्शित करने के लिए दूसरों की सहानुभूति का अपहरण कर रहे हैं । अपने और अपनों के लाभ के लिये परायों को कष्ट दे रहे हैं । प्रेम इतना संकुचित नहीं हो सकता, न पहले कभी था, न भविष्य में होने वाला है । जब यह बौना बनने का प्रयास करता है, तो इन्हीं दिनों जैसे विकराल दृश्य उपस्थित करता है । 

टॉल्सटॉय की एक कथा है-'प्रेम का प्रतिदान' । इसमें वे लिखते हैं कि एक बार एक व्यक्ति यात्रा के लिए निकला । काफी सफर करने के बाद एक दिन वह चला जा रहा था, तो सामने जंगल पड़ गया । रास्ता उस जंगल से होकर निकलता था । अतः विवश होकर उसे उसमें प्रवेश करना पड़ा । वन अत्यंत सघन था । कुछ दूर चलने के उपरान्त वह मार्ग भूल गया और जंगल में इधर-उधर भटकने लगा । एक रोज उसकी खाद्य सामग्री भी समाप्त हो गई । अब वह भूखा-प्यासा फिरने लगा, किन्तु ऐसा कब तक सम्भव था! एक रात वह बेहोश हो गया । होश आया तो स्वयं को एक कुटिया में पाया । एक सज्जन पुरुष उसकी परिचर्या कर रहा था । पूछा-''तुम कौन हो?'' उसने कहा-''प्रेम ।'' पथिक कुछ क्षण मौन रहा, तत्पश्चात बोला-''तो फिर प्रेम का प्रतिदान मुझे समझो ।'' निश्चय ही तुमने प्रेम के वशीभूत होकर मेरी रक्षा कर मुझको नया जीवन दिया है, अस्तु इससे उऋण हुए बिना अब न रह सकूँगा । यह मेरी आत्मा और आदत में नहीं कि किसी का कर्ज लिए मर जाऊँ । अतएव कौतुक जैसी पुरानी यात्रा का अब यहीं समापन होता है और ऋणोद्धार के लिए आज से नयी यात्रा की शुरूआत होती है । उस दिन से राहगीर ऐसे रहने लगा, जैसे सेवक और सेवित के दो भिन्न शरीरों में एक ही चेतना प्रवाहित होती हो । 

जब तक स्नेह उक्त स्तर का न होगा, वह समाज को आगे नहीं बढ़ा सकेगा । प्रेम कुछ माँगता नहीं, न ही उसमें कोई शर्त होती है । वह सदा निःस्वार्थ होता है । अनुरागी में प्यार की शक्ति होनी चाहिए और प्रतिदान की सामर्थ्य भी । आज इन दोनों का अभाव है । हमारे पास न तो वह विशाल हृदय है, न सभी को आत्मसात करने वाला पवित्र अन्तःकरण । हम प्यार पाने की इच्छा तो रखते हैं, पर उसे चुकाने की, लुटाने की हिम्मत नहीं संजो पाते, यही आज की सबसे बड़ी कमी है । 

संसार में दिन ही दिन होता अथवा रात ही रात होती, तो उन्हें आज जैसा सम्मान और महत्व नहीं मिल पाता । वह नीरस और ऊबाऊ भी होते, किन्तु दोनों पक्षों के समन्वय से एक सरसता पैदा होती है, जो पशु-पक्षी को समान रूप से लुभाती है । जीवन में यदि काम ही काम होता, तो वह कितना एकरस व थकाऊ होता! इसकी कल्पना की जा सकती है, पर आराम के उपलब्ध होने पर व्यक्ति पुनः नये उत्साह और उल्लास के साथ काम में जुट पड़ता है और देखते-देखते उसे समाप्त कर डालता है । यह दो पक्षों के मिलन का चमत्कार है । जीवन में प्यार की परिणति भी ऐसी ही हो सकती है । 

हम वात्सल्य की आकांक्षा भी रखें और उसे बाँटने का साहस भी; सुख इसी में है । पाने का आनन्द लुटाने में ही होता है । कृपणों के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, पर जो सचमुच उदारचेता हैं, वे जितना कमाते हैं उसी अनुपात में बाँटते भी हैं । गुरु-शिष्य परम्परा इसी सिद्धान्त पर आधारित है । किसानों की भी ऐसी ही रीति-नीति होती है । पाने के लिए लुटाना आवश्यक होता है । 

सन् १८९७ में लाहौर में 'वेदान्त' पर व्याख्यान करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि हम सामाजिक विकास के लिए भले ही हजारों समितियाँ गढ़ लें, लाखों सम्मेलन कर लें, पर उसकी वास्तविक उन्नति तभी हो सकेगी, जब समाज के लोगों के प्रति हम सहानुभूति रख सकें, प्रेम प्रदर्शित कर सकें । जब तक हमारे भीतर बुद्ध का हृदय और कृष्ण की वाणी विकसित और व्यवहृत होते नहीं दिखाई पड़ेंगे, तब तक प्रगति की आशा, दुराशा मात्र होगी । 

यह सत्य है कि हम असल की नकल करना बहुत जल्दी सीख जाते हैं, किन्तु इस उपक्रम में अभी भी काफी कच्चे हैं । हमारा अनुकरण बाह्य स्तर तक ही सीमित है । जिस दिन हम अन्दर के भाव को अपनाना और पनपाना सीख जायेंगे, उसी क्षण हम, हमारा समाज व राष्ट्र उन्नत बन जायेगा । अभेदानन्द एक स्थान पर लिखते हैं कि यूरोप में सभा-सम्मेलन जितनी संख्या में प्रतिदिन होते हैं, उतने शायद विश्व के किसी हिस्से में नहीं । इसका अनुकरण कर सहज ही ऐसे सम्मेलन आयोजित किये जा सकते हैं, पर उनकी राजनीतिक गोष्ठियों में जो सौहार्द्र दिखाई पड़ता है, उसका परिचय दे पाना हमारे लिए अभी कठिन है । हमें अब इसी कठिनाई को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए । 

भारतीय संस्कृति में 'आत्म-विस्तार' की प्रक्रिया इसी हेतु सुझायी गई है । हम इस साधना को जीवन में यदि उतार सकें, तो कोई कारण नहीं कि वह मनोभूमि विकसित न हो सके, जिसमें प्यार पाने और लुटाने की दोहरी भूमिका सम्पन्न होती हो । अध्यात्म का प्रवेश द्वार यही है । इस सद्गुण को विकसित किया ही जाना चाहिए ।


विचार-परिवर्तन

आज मनुष्य एक ऐसा जानवर हो गया है, जिसको समझदारी सिखाई जानी चाहिए । उसके लिए दूसरी चीजें, जिनको हम शारीरिक आवश्यकताएँ कहते हैं और जिनको हम आर्थिक आवश्यकताएँ कहते हैं, अगर पहाड़ के बराबर भी जुटा करके रख दी जाएँ, तो आदमी का रत्ती भर भी भला नहीं हो सकता । हम देखते हैं कि गरीब आदमी दुखी हैं । अमीर आदमी उससे भी ज्यादा हजार गुनी परेशानी में, उलझनों में, क्लेशों में पड़े हुए हैं, क्योंकि उनके पास विचार करने की कोई शैली नहीं है । अगर उनके पास कोई विचार रहा होता तो इतना अपार धन उनके पास पड़ा हुआ है, जिसके द्वारा समाज में न जाने क्या व्यवस्था उत्पन्न हो गई होती । न जाने समाज का कैसा कायाकल्प हुआ होता । लेकिन नहीं, वही धन बेटे में, पोते में, जमीन और जेवर-सब में ऐसे ही तबाह होता चला जाता है । 

पैसा है तो इसका क्या करें? समाज के सामने ढेर लगी समस्याओं का हल किस तरीके से करें, कुछ समझ में नहीं आता । ऐसी बेअक्ली की अवस्था को दूर करने के लिए यह आवश्यकता अनुभव की गई कि लोगों को समझदारी सिखाई जाए । समझदारी केवल ज्योमेट्री, इतिहास, भूगोल को नहीं कहते । समझदारी उसे कहते हैं, जिसके द्वारा सही चिंतन करने के बाद में आदमी व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं, समाज की समस्याओं और अपने युग की समस्याओं का समाधान कर सके । ऐसी जानकारियों का नाम ज्ञान है । आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की समझी गई है कि हजार वर्ष की गुलामी के बाद आदमी के विचार करने का ढंग भ्रष्ट हो गया है, उसका कण-कण दूषित और विकृत हो गया है । इसको उखाड़ करके फेंक दिया जाए और सोचने के नए तरीके लोगों के दिमागों में स्थापित किए जाएँ । यह शिक्षण करना मानव जाति की, समाज की सबसे बड़ी सेवा है । 

पिछले हजारों वर्ष ऐसे भयंकर समय में गये हैं, जिसमें सामंतवाद से लेकर के पंडावाद तक छाया रहा । राजसत्ता जिन लोगों के हाथ में रही, उनको हम सामंत कहते हैं, उनको हम राजा कहते हैं और उनको हम डाकू कहते हैं । उन लोगों ने सिर्फ अपने महल, अपनी अय्याशी और विलासिता के लिए समाज का शोषण किया और बराबर ये कोशिश की कि कहीं ऐसा न हो जाए कि विचारशीलता फैल जाए और लोगों में अनीति के विरुद्ध बगावत का भाव पैदा हो जाए, न्याय की भावना पैदा हो जाए । फिर हमारा क्यों करेंगे ये लोग समर्थन? यही कोशिश पंडावाद ने भी की कि लोग समझदार न होने पाएँ । समझदार हो जाएँगे तो हमारे शिकार हमारे हाथ से निकल जायेंगे ।

सामाजिक कुरीतियों को देखिये न; कोई तुक है इसमें? कोई बात है? कोई चीज है इसमें? हमारी कुलदेवी पर हमारे बच्चे का मुंडन होगा । कुलदेवी कहाँ रहती है तुम्हारी? २००० मील दूर रहती है । वहाँ क्या करोगे? बच्चे का मुंडन कराने ले जाएँगे । फिर क्या हो जाएगा? देवी को बालों का चढ़ावा देंगे । क्या करेगी देवी? बालों को खाएगी । रोटी नहीं खाती? नहीं, बाल खाती है । बाल नहीं खिलाये तो? ये देवी बीमार कर देगी और बच्चे को मार डालेगी । देवी है कि चुड़ैल है । इस तरह की चुड़ैलों को देवियाँ बना दिया गया, कुलदेवी बना दिया गया । पागल आदमी कलकत्ता से रवाना होता है और कुलदेवी उसकी जैसलमेर में रहती है । दो हजार रुपया फूँककर के आ जाता है और बच्चे का मुंडन करा के आता है और समझता है कि मैंने देवी के ऊपर अहसान कर दिया या देवी ने उसके ऊपर अहसान कर दिया । हमारी सामाजिक कुरीतियाँ कैसी बेहूदा हैं! ये कुरीतियाँ हमारा सारा का सारा पैसा खा जाती हैं, अक्ल खा जाती हैं । जाने क्या से क्या खा जाती हैं? 

जन्म पत्रियों की बात को ले लीजिए न । जन्मपत्री का जंजाल ऐसा खड़ा हो गया है कि लाखों आदमी उसी से उल्लू बने फिरते हैं । मंगल आ गया, राहू आ गया, चन्द्रमा आ गया, शुक्र आ गया । चन्द्रमा इन्हीं के ऊपर आ गया है और यहीं राजा साहब बैठे हुए हैं । चन्द्रमा भी इन्हीं के पीछे-पीछे फिरेगा । चन्द्रमा के पास काम ही नहीं है । इन्हीं को मारेंगे, इन्हीं की पूजा करेंगे, इन्हीं पर लक्ष्मी बरसाएँगें, इन्हीं को हानि पहुँचाएँगे । बस यही रह गये हैं नवाब के तरीके से । चन्द्रमा इन्हीं के पीछे पड़ेगा । बेवकूफ कहीं के । इस तरीके से बे अक्ली और बेवकूफी का कोई अन्त है क्या? 

आदमी के जी में न जाने कैसे यह विश्वास जम गया है कि हम अगर बेईमान होकर के जिएँगे तो और मालदार हो जाएँगे । कामचोरी करेंगे तो हमारी तरक्की हो जाएगी । ये करेंगे, तो हमारा ये हो जाएगा । भ्रष्ट आदमी का मन ऐसा घटिया हो गया है कि मेरे मन में ऐसा आता है कि सारी की सारी विचार करने की शैली को मैं बदल दूँ । एक और भी जमाना ऐसा आया था कि जिस जमाने में हर आदमी के विचार करने का ढंग बहुत ही घटिया और बहुत ही नीच हो गया था । फिर क्या हुआ? भगवान ने अवतार लिया था और वह परशुराम जी का अवतार था । 

परशुराम जी के अवतार ने हाथ में एक कुल्हाड़ा लिया और उस कुल्हाड़े से आदमियों के सिर काट डाले । सिर काट डालने का क्या मतलब है? परशुराम भगवान का अवतार इसी उद्देश्य के लिए हुआ था कि दुर्गुणों को, लोगों की अक्ल और समझ को हम बदल दें, तो आदमी की निन्यानवें फीसदी समस्या अपने आप हल हो जाएगी । 

मनुष्य की जितनी भी समस्याएँ हैं, सब उसकी बेअक्ली की पैदा की हुई समस्याएँ हैं । संतान नहीं होती है, तो बहुत ही अच्छी बात है । इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? संतान नहीं है, तो आप अकेले हैं । मियाँ-बीबी दो आदमी रहिए और अपना बचा हुआ पैसा समाज के लिए लगाइए । खुशहाली से रहिए, सैर कीजिए । बच्चे के पालन करने की जिम्मेदारी नहीं है, रोने-चिल्लाने की जिम्मेदारी नहीं है । दवा-दारू की जिम्मेदारी नहीं है । बताइए, इसमें क्या बात है? नहीं साहब! हमारे बच्चा नहीं होता, हम तो दुखी हैं । हमारी मनोकामना पूर्ण हो जाए तो अच्छा है । हमारे बच्चा हो जाए, तो अच्छा है । बेवकूफ कहीं का! बेअक्ली और बेवकूफी हमारे रोम-रोम में इस बुरी तरीके से छा गई है कि मनुष्यों को मैं क्या कहूँ? मैं उसको जानवर ही कह सकता हूँ । 

साथियो! अपनी युग निर्माण योजना के युग परिवर्तन के कार्यक्रम में पहला स्थान विचार परिवर्तन को दिया गया है । हमने ये कोशिश की है कि इस तरह के विचारों की एक धारा और उसकी पद्धति और संहिता का निर्माण किया जाए, जो मनुष्यों के गलत सोचने के स्थान पर सही सोचने का मार्गदर्शन कर सके । मैंने ढेरों पुस्तकें पढ़ी है, लेकिन ऐसा साहित्य कहीं नहीं है, जो आदमी को और उलझन में डालने के बजाय उसको सही सोचने का तरीका सिखाए । सही सोचने का तरीका सिखाने के लिए युगनिर्माण योजना ने ऐसा साहित्य, ऐसी विज्ञप्तियाँ, ऐसे ट्रैक्ट कम-से-कम मूल्य पर छापे हैं, जिसको पढ़ने के बाद आदमी को स्वतंत्र चिंतन की दिशा मिले । आदमी को यह प्रकाश मिले कि हमारे सोचने का सही तरीका क्या है, व्यक्ति की उलझनों का वास्तविक कारण क्या है, उनका समाधान किस तरीके से किया जा सकता है? अगर गलत सोचने की बात को आदमी जान ले और सही सोचना शुरू कर दे, तो मजा आ जाए ।

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

सेवा का रस

भूकंप राहत का कार्य उत्तर बिहार में डॉ0 राजेंद्रप्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) की देख-रेख में बड़े जोरों से चल रहा था। दरभंगा से पटना के लिए वे डॉ0 रामबहादुर सिंह के साथ बैठे। वैशाख का माह था। सूर्य तप रहा था। सोनपुर स्टेशन पर गाड़ी रूकी । सभी को प्यास लग रही थी। स्टेशन पर नल में पानी नहीं था एवं पानी पिलाने वाला भी कोई नही था। एक ही आवाज थी-`पानी वाले कहाँ है -´ इस बीच राजेंद्र बाबू डिब्बे से गायब हो गए। कुछ देर बाद लोगों ने देखा कि राजेंद्र बाबू एक बालटी मे पानी और दूसरे हाथ में लोटा लिए आवाज दे देकर सभी को पानी पिला रहे थे। लोग तो प्यास को जानते थे, राजेंद्र बाबू को कौन पहचाता ! सारी रेल में घूम-घूम कर उनने पानी पिलाया । आज बिसलरी की बोतल हाथ में लेकर घुमने वाले क्या जानेंगे इस सेवा का रस, जो इस राष्ट्र के प्रथम प्रमुख ने सहज अकिंचन बनकर की थी।

मौत का आह्वान

1909 की बात है। मथुरा नगर में आयोजित एक धर्म सम्मेलन में सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया। सम्मेलन के अध्यक्ष थे स्वामी रामतीर्थ, जिनकी प्रसिद्धि अच्छी-खासी तब तक हो चुकी थी । न उनका कोई मठ था, न कोई आश्रम । ईसाइ धर्म के प्रतिनिधि फादर स्कॉट ने अपने धर्म का विवेचन करते हुए हिंदू धर्म पर कुछ भोंडे आक्षेप किए। यह उनने जान-बूझकर किया था, ताकि लोग उत्तेजित हों । श्रोतागण क्षुब्ध हो गए। स्वामी जी ने सबको शांत रहने का आग्रह करते हुए बड़ी विनम्रता से फादर स्कॉट के एक-एक आक्षेप का विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया। सबके समक्ष फादर ने माफी माँगी। वस्तुत: यह स्वामी जी के व्यक्तित्व, वाणी के तेज एवं उनके वाक्चातुर्य के साथ अगाध ज्ञान का ही परिणाम था। तीर्थराम से रामतीर्थ बने स्वामी जी ने 1906 की दीपावली के दिन `मौत का आह्वान ´ नामक लेख लिखा और यह कहते हुए -`` ऐ माँ की गोद के समान शांतिदायिनी मृत्यु ! आओ, इस भौतिक शरीर को ले जाओ । मैं शुद्ध, बुद्ध , निरूपराधि ब्रह्म हूँ।´´ गंगा में जलसमाधि ले ली । धन्य है भारतवर्ष , जिसे ऐसे संत, महापुरूषों की थाती मिली है।

वक्कुल स्थविर

वक्कुल स्थविर भगवान बुद्ध के उन शिष्यों में जाने जाते हैं , जिनने सही अर्थों में जीवन-साधना की। महाकाश्यप के समान ही उग्र तप किया, पर धर्म-प्रवचन में उनकी रूचि नही थी। वे लगभग 160 वर्ष जिए, पर अपने जीवन से उनने उपदेश दिया। स्थविर राजगृह के समीप अचेल काश्यप से हुआ उनका वार्तालाप पढ़ने योग्य है। काश्यप ने पूछा-`` आज आप को सन्यस्थ हुए कितना समय हो गया - ´´ वक्कुल बोले-`` मुझे अस्सी वर्ष हो गए।´´ काश्यप ने पुछा-`` इस बीच कभी आपके चिंतन में विषय-वासना ने आक्रमण किया - ´´ भिक्षु बोले-`` एक बार भी भगवान की कृपा से मेरे मन में काम संबंधी विचार नहीं आया।´´ ``कभी `मै´ ने सताया -´´वक्कुल बोले-``द्वेष किसी के प्रति नहीं जागा, मैं समझता हूँ कि यही उत्तर काफी है । हिंसा-द्रोह संबंधी विचार कैसे होते हैं, मै नही जानता । मैने कभी गुरूभाइयों से अपने शरीर की सेवा नही करवाई। हर्रं के टुकड़े के बाराबर की औषधी कभी नही खाई शय्या पर मैं कभी लेटा नहीं। भिक्षुणियों के संपर्क में मै कभी रहा नहीं। ´´ अपने स्वस्थ खिलते चेहरे वाले भिक्षुओं को भगवान ने संबोधित कर कहा-``भिक्षुओं ! वाणी से उपदेश देना जरूरी नहीं। अपने आचरण से सीख दे, वही सच्चा उपदेशक है। मेरे स्वस्थ नीरोग निर्विकार शिष्यों में श्रेष्ठ है वक्कुल ।´´

चंद्रसिंह गढ़वाली

30 अप्रेल, 1930 का प्रसंग है। पेशावर के किस्साखानी बाजार में एक सभा हो रही थी। बड़ा विशाल जनसमुह था। चरखे वाला तिरंगा मंच पर लहरा रहा था। रॉयल गढ़वाल रेजिमेंट के सैनिकों को वहाँ तैनात किया गया था। कप्तान रिकेट उसका कप्तान था। जनता ने जोशोखरोश में `महात्मा गांधी की जय´, `अल्ला हो अकबर´ के नारे लगाना आरंभ कर दिया। तभी एक गोरे अर्दली ने कप्तान को एक कागज थमाया, जिसमें उच्चाधिकारियों द्वारा गोली मारने का आदेश था। उसे पढते ही कप्तान चिल्लाया-``गढ़वाली ! थ्री राउंड फायर ! परंतु कोई प्रतिक्रिया सैनिको पर नही हुई। एक तेजस्वी गढ़वाली हवलदार आगे आया और अकड़कर बोला-``गढ़वाली ! सीज फायर ´´(गोली मत दागो) सबने अपनी राइफलें जमीन पर रख दीं। यह प्रत्यक्ष विद्रोह था। तेजस्वी गढ़वाली हवलदार का नाम था चंद्रसिंह। वे एक कृषक परिवार में जन्में थे और उनने प्रथम विश्वयुद्ध में कई पदक पाए थे। उनका ही संकल्प था कि संपूर्ण रेजिमेंट उनके साथ एकजुट हो गई। सभी सैनिक बंदी बना लिए गए। चंद्रसिंह गढ़वाली को आजन्म कैद मिली । इस घटना का भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में अपना एक महत्तपूर्ण स्थान है। उत्तराखंड के वीर ने`भारत छोड़ो आंदोलन´ की आधारिशला रखी ऐसा कहा जा सकता है।

समर्थ गुरू रामदास

समर्थ गुरू रामदास (1608-1682) ने साधना और ईश्वर साक्षात्कार के बाद पहली यात्रा काशी की की। वहाँ जब वे काशी विश्वनाथ के मंदिर पहुँचे तो वहाँ के कुछ पुजारीगणों ने अनकी वेशभूशा देखकर उन्हें बा्रह्मणों से भिन्न इतर जाति का मान लिया। उनने शिवजी की पिंडी के दर्शन करने से मना कर दिया। इस पर वे` जैसी प्रभु रामचंन्द्र जी की इच्छा´ कहते हुए बाहर से दंडवत् प्रणाम कर लौट पड़े। कहा जाता है कि उनके बाहर निकलते ही पुजारियों ने देखा कि पिंडी लुप्त हो गई है। वहाँ विद्यमान प्रतिमा भी नही है। वे घबराए। दौड़कर समर्थ रामदास से क्षमा-याचना की। जब वे पुन: मंदिर में आए, तब दृश्य पुन: पहले जैसा हो गया। इस चमत्कारी घटना ने काशी में उसका सम्मान बढ़ा दिया। चारों ओर उन्हीं की चर्चा होने लगी।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

अनमोल रतन



मेरे पास दो अनमोल रतन है
एक मै ख़ुद
दुसरा मेरा विशवास 
तीसरा आना चाहता है
लेकिन मै उसे आने नही देता
वह अहंकार है
उसके आते ही हमारे दोनों रत्नों का विनाश हो जाएगा

सोमवार, 21 सितंबर 2009

आचार्य चरक

आचार्य चरक ने आहार ग्रहण करने की आठ विधियाँ बताई हैं ये विधियाँ हैं- प्रकृति, संस्कार, संयोग, राशि (मात्रा), देश (हैबीटेट, क्लाइमेट), काल, उपयोग के नियम तथा उपभोक्ता। आचार्य कहते हैं- ``उष्ण भोजन ही लें, स्निग्ध आहार ग्रहण करें, नियत मात्रा में आहार लें, पूर्ण रूप से पूरे भोजन के पकने पर ही आहार लें, वीर्य विरूद्ध आहार न लें, सही उपकरणों में आहार लें, द्रुतगति से भोजन न करें, अधिक देरी तक भोजन न करें। आहार लेते हुए ज्यादा नही बोलें, हँसते हुए आहार ग्रहण करें । अपनी आत्मसत्ता का विचार कर आहार ग्रहण करें।

रविवार, 20 सितंबर 2009

रामकृष्ण देव

एक धनी व्यक्ति रामकृष्ण देव के विषय में सुनकर उनके पास भेंट हेतु धन देने आया। दस हजार रूपये के सिक्के थे। उनने कहा-``इन्हें स्वीकार करें और साधना का शिक्षण दें।´´रामकृष्ण देव बोले-``साधना में पैसे की जरूरत क्या ! पहले इससे मुक्ति पा। ´´``पर ये तो मैं आपके लिए लाया हूँ।´´ श्री ठाकुर रामकृष्ण देव बोले-``तो ऐसा कर इन्हें गंगाजी में चढाकर आ जा। हमें चढ़ाया, गंगाजी को चढ़ाया- एक ही बात है।´´ काफी देर बीत गई। वह लौटकर नहीं आया। ठाकुर देखने गए तो पाया कि वह एक सिक्का बडे़ दुख के साथ गंगाजी में ड़ाल रहा है। डाल तो रहा है, पर बड़े कष्ट के साथ । ठाकुर बोले-``सब एक साथ फेंक दे। मोह मत कर। जब तक ऐसा नही करेगा, साधना की पात्रता नहीं विकसित हो होगी।´´ उस धनी व्यक्ति ने ऐसा ही किया। हम भी तो कुछ उसी की तरह हैं ना ! हमारी कामनाएँ छूटती ही नहीं है। सौचते हैं-धीरे-धीरे इच्छाएँ छोड़ देंगे मगर छूटती ही नही हैं।


जीवन संदेश

मनुष्य की शक्तियाँ अनंत है, परंतु यह अचरज भरे दु:ख की बात है कि ज्यादातर शक्तियाँ सोई हुई है। यहाँ तक कि हमारे जीवन के सोने कीं अतिम रात्रि आ जाती है, परंतु इन शक्तियों का जागरण नही हों पाता। यदि कही कुछ होता भी है तो बहुत थोडा। ज्यादातर लोग तो अपनी अनंत शक्तियों एवं असीमित संभावनाओं के बारे में सोचते भी नही। मानव जीवन का यथार्थ यही है कि हममे से ज्यादातर लोग तो आधा चौथाई ही जी पाते है। कोई-कोई तों अपने जीवन का केवल सौवाँ, हजारवाँ, या फिर लाखवाँ ही जी पाते है। इस तरह हमारी बहुतेरी शारीरिक, मानसिक शक्तियों का उपयोग आधा-अधुरा ही हो पाता है , आध्यात्मिक शक्तियों का तो उपयोग होता ही नहीं। जीवन का सच यही है कि मनुष्य की अग्नि बुझी-बुझी सी लगती है और इसीलिए वह स्वयं की आत्मा के समक्ष भी हीनता में जीता है।

इससे उबरने के लिए जरूरी है कि हमारा जीवन सक्रिय और सृजनात्मक हो। अपने ही हाथो दीन-हीन बने रहने से बड़ा पाप और कुछ भी नहीं। जमीन को खोदने से जलस्रोत मिलते है, ऐसे ही जीवन को खोदने से अनंत-अनंत शक्तिस्रोत्र उपलब्ध होते है। इसलिए जिन्हे अपने आप की पूर्णता अनुभव करना है, वे सदा-सर्वदा सकारात्मक रूप से सक्रिय रहते है: जबकि दूसरे केवल सोच-विचार, तर्क-वितर्क में ही उलझे-फँसे रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता के साधक हमेशा ही विचारो को क्रियारूप में परिणत करते रहते है।

इस विधि में एक-एक कुदाली चलाकर वे स्वयं में अनंत-अनंत शक्तियों का कुआँ खोद लेते हैं , जबकि तर्क-वितर्क और बहुत सारा सोच-विचार करने वाले बैठे ही रहते हैं। सकारात्मक सक्रियता और सृजनात्मकता ही अपनी अनंत शक्तियों की अनुभूति का सूत्र है। इसे अपनाकर ही व्यक्ति अधिक से अधिक जीवित रहता है और उसकी अपनी पूर्ण संभावित शक्तियों को सक्रिय कर लेता है। अपनी आत्मशक्ति की अनंतता को अनुभव कर पाता है। इसलिए जीवन संदेश के स्वर यही कहते है कि विचार पर ही मत रूके रहो। चलो और करो। लाखों-लाख मील चलने के विचार से एक कदम आगे बढ चलना ज्यादा मूल्यवान है। 

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