सोमवार, 16 अगस्त 2010

राष्ट्र धर्म

राष्ट्र हम में से हरेक के सम्मिलित अस्तित्व का नाम है। इसमें जो कुछ आज हम है, कल थे और आने वाले कल में होंगें, सभी कुछ शामिल है। 
हम और हम में से हरेक के हमारेपन की सीमाएँ चाहे जितनी भी विस्तृत क्यो न हों, राष्ट्र की व्यापकता में स्वयं ही समा जाती है। इसकी असीम व्यापकता में देश की धरती, गगन, नदियाँ, पर्वत, झर-झर बहते निर्झर, विशालतम सागर और लघुतम सरोवर, सघन वन, सुरभित उद्यान, इनमें विचरण करने वाले पशु, आकाश में विहार करने वाले पक्षी, सभी तरह के वृक्ष व वनस्पतियाँ समाहित है। 
प्रांत, शहर, जातियाँ, यहाँ तक कि रीति-रिवाज, धर्म-मजहब, आस्थाएँ-पंरपराएँ राष्ट्र के ही अंग-अवयव है। राष्ट्र से बड़ा अन्य कुछ भी नही हैं।
भारतवासियों की एक ही पहचान है - भारत देश, भारत मातरम् । 
हम में से हरेक का एक ही परिचय है - 
राष्ट्रध्वज, अपना प्यारा तिरंगा। इस तिरंगे की शान में ही अपनी शान है। इसके गुणगान में ही अपने गुणो का गान हैं ।
हमारी अपनी निजी मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ, यहाँ तक कि धर्म, मजहब की बातें वहीं तक कि इनसे राष्ट्रीय भावनाएँ पोषित होती है; जहाँ तक कि ये राष्ट्र धर्म का पालन करने में, राष्ट्र के उत्थान में सहायक है। राष्ट्र की अखंड़ता, एकजुटता और स्वाभिमान के लिए अपनी निजता को निछावर कर देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्तव्य है। 
राष्ट्र धर्म का पालन प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए सर्वोपरि है। 
यह हिंदू के लिए भी उतना ही अनिवार्य है, जितना कि सिख, मुसलिम या ईसाइ के लिए। 
यह गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब या तमिल, तैलंगाना की सीमाओं से कही अधिक है। 
इसका क्षेत्र तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्वत्र व्याप्त है। 
राष्ट्र धर्म के पालन का अर्थ है- राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु व परिस्थिति के लिए संवेदशील होना, कर्तव्यनिष्ठ होना; राष्ट्रीय हितो के लिए, सुरक्षा के स्वाभिमान के लिए अपनी निजता, अपने सर्वस्व का सतत बलिदान करते रहना । 

युग परिर्वतन के अग्रदूत

परमपूज्य गुरुदेव अपने प्रवचन में कहा करते थे-

‘‘ मै धरती का भाग्य-भविष्य बदलने आया हूँ। 

मै आना नही चाहता था, पर मुझे धकेला गया है। और विशिष्ट कार्यो के लिए भेजा गया है । 

लोग मुझे मनोकामना पूरी करने की मशीन मानते है । 

मै उनकी थोड़ी मानकर उन्हें बदलने का प्रयास करता हूँ । 

जो बदल जाते हैं, वे ही मेरे सैनिक-युग परिर्वतन के अग्रदूत बन जाते है । 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रगति रुक गई

एक बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपये की बिकती, पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य केवल आठ-दस आने से अधिक न मिलता। हाट से लौटने पर बेटे को पास बैठाकर बाप, उसकी मूर्तियों में रही त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए कहता। यह क्रम वर्षो चलता रहा। लड़का समझदार था। उसने पिता की बातें ध्यान से सुनीं और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा । कुछ समय बाद लड़के की मूर्तिया भी डेढ़ रुपये की बिकने लगीं। बाप भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता। बेटे ने और अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी। मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपये की बिकने लगी। सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप ने तब भी बंद न किया। एक दिन बेटे ने झुँझलाकर कहा -‘‘आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नही करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे मूर्ति के पाँच रुपये मिलते है; जबकि आप को दो ही रुपये।’’ बाप ने कहा -‘‘पुत्र ! जब मै तुम्हारी उम्र का था, तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपये से अधिक की मूर्तियाँ न बना सका। मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो। 

अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो, ताकि बहुमुल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रंणी में पहुँच सको।’’ 

मनुष्य न चाहे तो भी -------

समुद्र से जल भरकर लौट रहे मरुतगणों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया। मरुत् विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुए और युद्ध ठानने को तैयार हो गए। 

विंध्याचल ने बडे़ सौम्य भाव से कहा-

‘‘महाभाग ! हम आपसे युद्ध करना नहीं चाहते, हमारी तो एक ही अभिलाषा है कि आप यह जो जल लिए जा रहे हैं, वह आपको जिस उदारता के साथ दिया गया, आप भी इसे उसी उदारता के साथ प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो ? ’’मरुतगणों को अपने अपमान की पड़ी थी, सो वे शिखर से भिड़ गए, पर जितना युद्ध उन्होनें किया, उतना ही उनका बल क्षीण होता गया और धरती को अपने आप जल मिल गया। 

मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर अपना काम करा ही लेता है, पर श्रद्धापूर्वक करने का तो आनंद ही कुछ और है। 

कबीर

कबीर की ख्याति चारों ओर सिद्ध पुरुष की थी। दूर-दूर से जिज्ञासु आते, तब भी वे पहले की तरह कपड़ा बनाते और सत्संग चलाते। 

एक शिष्य ने पूछा-
‘‘आप जब साधारण थे तब कपड़ा बुनना ठीक था, पर अब आप एक सिद्ध पुरुष है और निर्वाह की भी कमी नहीं, फिर कपड़ा क्यों बुनते हैं ? 

’’ कबीर ने सरल भाव से कहा-
‘‘पहले मैं पेट पालने के लिए बुनना था, पर अब मैं जनसमाज में समाए भगवान का तन ढकने और अपना मनोयोग साधने के लिए बुनता हूँ। ’’कार्य वही हो, पर दृष्टिकोण भिन्न हो तो सकता है ! यह जानकर शिष्य का समाधान हो गया। 

ईश्वरचंद विद्यासागर

ईश्वरचंद विद्यासागर एक दिन अपने मित्र के साथ अनिवार्य कार्य से जा रहे थे। रास्तें में हैजे से पीड़ित एक दीन-हीन व्यक्ति मुर्छित अवस्था में पड़ा मिला। विद्यासागर उनकी सफाई करके पास के अस्पताल मे पहुँचाने का उपक्रम करने लगे। साथी मित्र ने कहा-‘‘हम लोग आवश्यक काम से जा रहे है, यह काम तो काई भी कर लेगा, हम लोग अपना कार्य क्यों छोडें ? 

विद्यासागर ने कहा-‘‘मानवता की सेवा से बढकर और कोई काम बड़ा हो ही नहीं सकता। निष्ठुर का कोई कार्य भला नहीं कहा जा सकता ।’’

महर्षि रमण

महर्षि रमण एक सिद्ध पुरुष थे । मौन ही उनकी भाषा थी । उनके सान्निध्य में सत्संग के माध्यम से सबको एक जैसे ही संदेश मिलते थे, मानों वे वाणी से प्रवचन देकर उठे हों। सत्संग के स्थान पर उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर, उनका संदेश सुनने आया करते थे । बंदर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगंतुको की भीड़ से बिना डरे-झिझके अपने नियत स्थान पर आ बेठते थै । मौन सत्संग समाप्त होते ही अपने घोंसलों व स्थानों को चल दिया करते थे । 


महापुरुष का सान्निध्य होता ही ऐसा विलक्षण है।

रविवार, 15 अगस्त 2010

घर-घर महावीर की पूजा हो

नरेंद्र न केवल एक अच्छे गायक थे, यंत्र संगीत के भी एक कुशल कलाकार थे । तत्कालीन धु्रपद गायकों से उनने शिक्षा ली थी, पर इसके बावजूद वे एक तैराक, कुशल अश्वारोही एवं मँजे हुए पहलवान भी थे। सभी भारतीय खेलो में सिद्धहस्त थे । वे हनुमान जी से प्रभावित थे। अपने एक भाषण में उनने कहा है-

‘‘सारे भारत में महावीर की पूजा चालू करा दो। दुर्बल जाति के सामने महावीर का आदर्श उपस्थित करो । 

शरीर में बल नही, हृदय में साहस नही तो क्या होगा इन जड़ पिंड़ो से ? 

मैं चाहता हूँ, घर-घर महावीर की पूजा हो’’

भावनात्मक वसीयत

धन-संपदा की वसीयतें तो आम बात हैं, पर भावनाओं की वसीयत के उदाहरण बिरले ही देखने को मिलते हैं। सरदार भगत सिंह के होश सँभालने से पहले ही उनके चाचा सरदार अजीत सिंह अँगरेजी सरकार से विद्रोह करने के सिलसिले में फरार हो चुके थे। भगत सिंह को उसके बाद उनके दर्शन न हो सके । भगत सिंह अपने प्रिय चाचा के चरणचिन्हों पर चलकर देश के लिए मर मिटे। मरते दम तक उनकी ख्वाहिश रही कि उनको अपने उन चाचा के दर्शन हो जाते, जिनने देशभक्ति की प्रबल उमंगे अनदेखे सूत्रो से उन्हे सौंप दी थीं - 

भावनात्मक वसीयत के रुप में । 

ठक्कर बापा

मुंबई कार्पोरेशन में एक इंजिनियर की नौकरी पाने के बाद वह युवा निरंतर भ्रमण करता। उसे स्वच्छता और प्रकाश की व्यवस्था सौंपी गई। उसे मेहतरों की बस्तियों में जाने के बाद, उनकी दुरवस्था देखने का अवसर मिला। बच्चे असहाय, अशिक्षित, गंदे थे। पुरुष शराब पीते-लड़ते व पत्निया दिन भर बच्चों से मार-पीट करतीं। जूए-शराब ने सभी को कर्जदार बना दिया था। इस प्रत्यक्ष नरक को देखकर उस इंजीनियर ने अपनी आधिकारिक स्थिति के मुताबिक कुछ प्रयास किए, पर कही से कोई सहयोग न मिलने पर नौकरी छोड़ दी और ‘भारत सेवक समाज’ का आजीवन सदस्य बन गया । उसने सारा जीवन गंदी बस्तियों में अछुतो के उद्धार, उन्हे शिक्षा देने, गंदी आदतें छुड़वाने, उन्हे साफ रखने के प्रयासों में लगा दिया। 

वही युवक ‘ठक्कर बापा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आज के शहरीकृत भारत को, जो और भी गंदा है, हजारो ठक्कर बापा चाहिए।

राजा राममोहन राय

सती प्रथा के विरुद्ध मोरचा खड़ा करने वाले एवं विधवा विवाह के प्रचंड समर्थक राजा राममोहन राय को इस दिशा मे लाने वाली, एक महत्वपूर्ण घटना है। उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई। परिवार के लोगो ने उनकी भोली स्त्री को आवेश दिला के, नशीली चीजें खिला चिता पर बैठा दिया । कोई उनकी चीत्कार न सुन सके, इसलिए जोर-जोर से बाजे बजाने की व्यवस्था कर दी गई। 

धर्म के नाम पर चलने वाली इस नृशंसता को देख कर, राजाराम मोहन राय का दिल चीत्कार कर उठा। वे भाभी को बचा तो नही सके, पर उनने एक प्रचंड आंदोलन इसके विरुद्ध आरंभ किया। अँगरेजी सरकार ने कानून बनाकर सती प्रथा को रोक दिया। ‘विधवा विवाह मीमांसा’ नामक एक ग्रंथ उनने सारे पुरातन ग्रंथो का अध्ययन कर लिखा। उन्हे विचारशीलो का समर्थन मिलता चला गया। उनने एक हिंदू कॉलेज की भी स्थापना की। फैलती ईसाइयत से लड़ने मे इस विद्यालय ने बड़ी भूमिका निभाई। 

मित्र ! तुम भी .................

रोम की राज्यसभा के सभापति सीजर पर षड्यंत्रकारी ने आक्रमण किया । षड्यंत्रकारी उन पर आघात कर रहे थे । सीजर निशस्त्र थे, फिर भी किसी प्रकार वे अपना बचाव करने का प्रयत्न कर रहे थे । इसी समय उनके परम विश्वासी मित्र ब्रुअस की ओर देखकर कहा-‘‘मित्र ! तुम भी ..................’’। 

सीजर ने अपने बचाव का प्रयत्न छोड़ दिया और आहत होकर मृत्यु की गोद में गिर पड़े। 

खुदीराम को फाँसी

खुदीराम को फाँसी हो गई। थोड़ी आयु में, जो थोड़ा-सा समय था, वह भी संघर्ष में गुजरा कि देश, धर्म और समाज का पुनरुद्धार हो तो वे अंतिम समय में अपने अभीष्ट से कैसे हट जाते। फाँसी के समय वे वैसी ही सजावट के साथ गए, जैसा दुल्हा बरात में सजा होता है। दिन भर उनकी कोठरी राष्ट्रीय गीतों से गूजँती रही , पर वे सदैव गहरी नींद में सोए। जेल अवधि में इनका वजन भी आश्चर्यजनक रुप से बढ गया। नित्य वे दंड-बैठक भी लगाते। जिस दिन उन्हें फाँसी होनी थी , प्रातः काल जल्दी उठे। उपासना की, व्यायाम किया। शरीर सँवारा, जैसे वरयात्रा में जाना हो। हँसते हुए गए। 
वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए, फाँसी के तख्ते पर झुल गए। 

धन्य है यह भूमि, जिसने ऐसे शहीदों को जन्म दिया। 

ज्ञानदेव

ऐसा कहा जाता है कि चांगदेव 1400 वर्षो से योग-साधना कर रहे थे। उन्हे भारत का महान योगी माना जाता था। ज्ञानेश्वर सहित तीनों अन्य भाई-बहनो की प्रशंसा सुन उनके मन में आया कि इनसे सत्यासत्य की जानकारी लूँ। प्रश्न रुप में एक सादा कागज भेज दिया। मुक्ताबाई के हाथ में पत्र आया तो वे हँस पड़ी। बोलीं-हमारे योगीराज वर्षो की तप-साधना के बावजूद कोरे ही रह गए। निवृतिनाथ ने इस व्यंग्य पर मुक्ताबाई को लताड़ा एवं पत्रवाहक से कहा- योगीराज को हमारी कुटिया पर आने का आमंत्रण दें। योग का प्रभाव देखने के लिए, हाथ मे सर्प का चाबुक लिए, सिंह पर सवार, सभी शिष्यो के साथ, वे मिलने गए। आलिंदी में विराजमान ज्ञानेश्वर, जिस दिवार पर भाई-बहन सहित बैठे थे, उसी को सक्रिय कर स्वागत हेतु चल पड़े। चांगदेव ने यह चमत्कार देखा और श्रद्धावनत् हो, ज्ञानदेव से दीक्षित हुए । 

यह दीवार आज भी आलिंदी (महाराष्ट्र) में देखी जा सकती है। 

लौहपुरुष

आज देश के सामने कोई समस्या आती है तो बरबस मुँह से निकल पड़ता है-‘काश ! आज सरदार पटेल जीवित होते। ’जर्मनी के एकीकरण में जो भूमिका बिस्मार्क ने और जापान के एकीकरण में जो कार्य मिकाडो ने किया, उनसे बढकर सरदार पटेल का कार्य कहा जायेगा, जिनने भारत जैसे उपमहाद्वीप को, विभाजन की आँधी में टुकड़े-टुकड़े हाने से रोका । किस प्रकार देशी राज्यों का एकीकरण संभव हो सका। इस पर विचार करते है तो आश्चर्य होता है। एक-दो नहीं, सैकड़ो राजा भारतवर्ष में विद्यमान थे। उनका एकीकरण सरदार पटेल जैसा कुशल नीतिज्ञ ही कर सकता था। इसी कारण उन्हें लौहपुरुष कहा जाता है। 

आज राष्ट्र वैसी ही परिस्थिति से गुजर रहा है। हमें फिर वैसी ही, उसी स्तर की जिजीविषा वाली शक्तियो की जरुरत है। 

गुरु-शिष्य


चैत्र शुक्ल नवमी, रविवार, संवत् 1530 को जन्मे नारायण बालक को भगवान श्री राम का दास होने के कारण रामदास नाम मिला । बाद मे उनके शिष्यो ने उनकी शक्ति को देख, उन्हें समर्थ की उपाधि दी । देश की दशा को ठीक करना, लोकमत को जगाना और परमात्मा के प्रति विश्वास पैदा करना ही, उनका लक्ष्य होता था।

शिवाजी को उनने अपने कार्य का निमित्त बनाया । वैशाख शुक्ल नवमी, संवत् 1571 को उनने अपने प्रिय शिष्य शिवा को शिष्य बनाया- गुरुमंत्र दिया और प्रसाद रुप में एक नारियल, मुट्ठी भर मिट्टी दो मुट्टी लीद और चार मुट्टी पत्थर दिये, जो क्रमशः दृढ़ता, पार्थिवता, ऐश्वर्य एवं दुर्ग विजय के प्रतीक थे । महाराज शिवाजी राव ने गुरु का पह प्रसाद ग्रहण किया और साधु जीवन बिताने की अनुमति माँगी । 

समर्थ ने उन्हे समझाया - 

‘‘पीड़ितो की रक्षा तथा धर्म का उद्धार तुम्हारा कर्तव्य है। साधु वही है, जो कि अपनी वासना-तृष्णा, संकीर्ण स्वार्थपरता को त्यागकर, निस्वार्थ भाव से देश-घर्म की रक्षा करे।’’ शिवाजी ने अपनी सैन्यशक्ति से हिंदू पद पादशाही के प्रवर्तक बनने, छत्रपति कहलाने का श्रेय प्राप्त किया । हजारो महावीर मठ, जो समर्थ द्वारा स्थापित किए गए, वे प्रेरणा एवं जनसहयोग के स्त्रोत बने । परिणामस्वरुप मुगल साम्रज्य की जड़े खोखली हो गई, वह गिरकर ढेर हो गया । सारा श्रेय गुरु-शिष्य की इस जोड़ी को जाता है ।

राजनीतिक विरोध

रफी अहमद किदवई साहब के एक मित्र की पुत्री का विवाह था। उनसे किदवई साहब का राजनीतिक विरोध था। बोल-चाल तक नही थी । यहाँ तक कि उनने किदवइ साहब को विवाह में आमंत्रित तक न किया , किन्तु वे स्वयं वहाँ पहुँचे ओर कन्या को आशीर्वाद दिया । 

उन सज्जन ने जब अपने प्रतिद्वंद्वी रफी साहब को वहाँ देखा तो पश्चाताप् , आत्मग्लानि और स्नेह का प्रवाह उमड़ा कि वे रफी साहब के गले लिपट गए और क्षमा-याचना करने लगे। रफी साहब विनम्र स्वर में , इतना ही बोले-‘‘आपका -हमारा राजनीतिक मतभेद हो सकता सदा के लिए , किंतु यह तो घर का मामला है । आपकी बेटी , मेरी बेटी है।’’

इस घटना से आपसी मनमुटाव समाप्त हो गया । 

शनिवार, 14 अगस्त 2010

आपके अंदर क्या हैं ?

एक अजनबी किसी गांव में पहुंचा। उसने उस गांव के बाहर बैठे एक बूढ़े आदमी से पूछा क्या इस गांव के लोग अच्छे व दोस्ती करने वाले हैं। उस बूढ़े आदमी ने सीधे उसके प्रश्न का उतर देने के बजाय उसी से पूछ लिया कि बेटा तुम जहां से आए हो वहां के लोग कैसे?

वह अजनबी गुस्से से बोला बहुत बुरे, पापी और अन्यायी। सारी परेशानियों के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। बूढ़ा थोड़ी देर सोचता रहा और बोला यहां के लोग भी वैसे ही हैं, तुम इन्हें भी वैसा ही पाओगे।

वह व्यक्ति जा भी नहीं पाया था कि एक दूसरे व्यक्ति ने आकर वही प्रश्न दोहराया तो वृद्ध ने उससे भी वही प्रश्न किया कि बेटा तुम बताओ जहां से तुम आए हो वहां के लोग कैसे हैं? उस व्यक्ति की आंखें आंसुओं से भर गईं और वह बोला बहुत प्यार करने वाले, दयालु, मेरी सारी खुशी का कारण वे लोग ही थे।

वह वृद्ध बोला यहां के लोग भी ऐसे ही हैं, तुम यहां के लोगों को भी कम दयालु नहीं पाओगे।

मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं है। संसार दर्पण है जो हम दूसरो में देखते है वह अपनी ही प्रतिक्रिया है। जब तक सभी में शिव व सुन्दर दिखाई न देने लगे, तब तक यही सोचना चाहिये कि स्वयं में ही कोई खोट है।

जो खुद मे ही नहीं है उसे दूसरों में खोजना असंभव है। जो जैसा होता है उसे दूसरे भी वैसे ही नजर आते हैं। सुन्दर को खोजने के लिए सारी धरती भटक लें पर जो खुद के अंदर ही नहीं है, उसे कहीं भी पाना असंभव है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

महात्मा और कन्फ्यूशियस

कन्फ्यूशियस पदयात्रा पर निकले। मार्ग में एक महात्मा पेड़ की छाया में विश्राम कर रहे थे । उन्होंने उन महात्मा से पूछ- "महात्मन ! आप नगर छोड़ कर यहाँ एकांत में क्यों पड़े हैं ?"महात्मा ने उत्तर दिया- "इस राज्य का राजा अत्याचारी , कुटिल और दुष्ट है। प्रजा भी राजा को देख कर वैसी ही बनती जा रही है । ऐसे वातावरण में रहना कठिन हो गया था, इसलिए मैं यहाँ आ गया। यहाँ किसी तरह की चिंता नहीं है ।"

कन्फ्यूशियस ने मुस्करा कर कहा- 
"थोड़ी-सी बुराईयों या बुरे व्यक्तियों के कारण आप नगर छोड़ कर चले आए? 

क्या बुराई के आगे हार मान लेनी चाहिए ? 
यह तो आपका पलायनवाद है ।

"महात्मा ने कहा- 
"ठीक है, मगर इतने झंझटों की अपेक्षा स्वयं बुराई से हट जाना क्या बेहतर नहीं है? हम बुराई से हट कर अच्छाई का आनंद क्यों न लें ?

"इस पर कन्फ्यूशियस ने कहा- 
"आप भूल रहे हैं की झंझटों से भरा जीवन ही आपका आधार है । आपकी जो शान्ति आपके पास है वह छिनी नहीं जा सकती । फिर, यहाँ रह कर भी आप उसी समाज को आप बुरा कह रहे हैं । क्या यह कृतध्नता नहीं होगी की आप समाज को सुधारने की बजाय मुख मोड़ कर जंगल की ओर भाग आये ? आप भाग कर साबित कर रहे हैं की सद्गुण दुर्गुण से दुर्बल है । सत्य असत्य की अपेक्षा निर्बल है । ज्ञान पर अज्ञान ने अधिकार कर लिया है ।"

महात्मा ने उत्तर दिया - 
"मैं यहाँ सद्गुणों की ही रक्षा कर रहा हूँ , बुराईयों की ओर से आखें मूंद कर। आप ही बताईये , क्या मैं भलाई को बुराई का ग्रास होने से नहीं बचा रहा हूँ ?"

कन्फ्यूशियस ने कहा-
आप एकांत में साधना कर अपने को तों बचा लेंगे , लेकिन क्या एक साधक का इतना ही कर्तब्य है ? उसे केवल अपनी मुक्ति की ही बात नहीं सोचनी चाहिए । उसे समाज एवम व्यापक जनमानस की बात भी सोचनी चाहिए । इसी में उसकी साधना की सार्थकता है ।"

उनकी बातो का महात्मा पर बहुत असर हुआ ,और महात्माजी नगर की ओर लौट आये 

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

इसको आगे से पकड़ो

एक चित्रकार ने एक चित्र बनाया ,यह थोडा अजीब था.इसमें उसने एक ऐसे व्यक्ति के सिर को दर्शाया था जिसके अगले भाग पर बहुत सारे बाल थे पर इसका पिछला हिस्सा बिलकुल सपाट और गंजा था.लोग इसके चित्र पर बहुत हँसे, कई लोगो ने कहा चित्रकार बलकुल पागल लगता है इसे नहीं मालुम कि किसी भी गंजे व्यक्ति के सिर के अगले हिस्से पर इतने बाल नहीं हो सकते .

एक पत्रकार ने उससे पूछ ही लिया कि आखिर ऐसी तस्वीर उसने क्यों बनायीं तो चित्रकार ने कहा -' मैंने यह अवसर का चित्र बनाया है .इस चित्र में मैंने बाल प्रतीकात्मक रूप से दिखाया है कि अवसर जब भी आये तो उसे सामने से पकडे तो उसे बहुत आसानी से पकड़ा जा सकता है अगर आपने देरी कर दी और यह आगे चला गया तो फिर यह पकड़ में नहीं आएगा क्योंकि इसका पिछला हिस्सा बिलकुल चिकना और सपाट होता है फिर आप चाह कर भी इसे नहीं पकड़ सकते क्योंकि जब भी पकड़ने की कोशिश करेगे आप फिसल जायेगे .'

बीता हुआ अवसर कभी लौट कर नहीं आता इसलिए इसे हमेशा सामने से पकड़िये अगर यह आपके लिए अच्छा रहा तो इसके साथ रहिये वरना अगले का इन्तजार करिये . 

LinkWithin

Blog Widget by LinkWithin