महर्षि रमण एक सिद्ध पुरूष थे । मौन ही उनकी भाषा थी । उनके सान्निध्य में सत्संग के माध्यम से सबको एक जैसे ही संदेश मिलते थे, मानों वे वाणी से प्रवचन देकर उठे हों। सत्संग के स्थान पर उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर , उनका संदेश सुनने आया करते थे । बंदर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगंतुको की भीड़ से बिना डरे-झिझके अपने नियत स्थान पर आ बेठते थै । मौन सत्संग समाप्त होते ही अपने घोंसलो व स्थानों को चल दिया करते थे । महापुरुष का सान्निध्य होता ही ऐसा विलक्षण है।
विचार शक्ति इस विश्व कि सबसे बड़ी शक्ति है | उसी ने मनुष्य के द्वारा इस उबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है | उत्थान-पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है | वस्तुस्तिथि को समझते हुऐ इन दिनों करने योग्य एक ही काम है " जन मानस का परिष्कार " | -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
सोमवार, 15 जून 2009
ठक्कर बापा
मुंबई कार्पोरेशन में एक इंजिनियर की नौकरी पाने के बाद वह युवा निरंतर भ्रमण करता । उसे स्वच्छता और प्रकाश की व्यवस्था सौंपी गई । उसे मेहतरों की बस्तियों में जाने के बाद, उनकी दुरवस्था देखने का अवसर मिला । बच्चे असहाय, अशिक्षित, गंदे थे । पुरूष शराब पीते-लड़ते व पत्नियाँ दिन भर बच्चों से मार-पीट करतीं। जुए-शराब ने सभी को कर्जदार बना दिया था। इस प्रत्यक्ष नरक को देखकर उस इंजीनियर ने अपनी आधिकारिक स्थिति के मुताबिक कुछ प्रयास किए, पर कही से कोई सहयोग न मिलने पर नौकरी छोड़ दी और `भारत सेवक समाज´ का आजीवन सदस्य बन गया । उसने सारा जीवन गंदी बस्तियों में अछूतो के उद्धार, उन्हे शिक्षा देने , गंदी आदतें छुड़वाने, उन्हे साफ रखने के प्रयासों में लगा दिया । वही युवक `ठक्कर बापा ´ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । आज के शहरीकृत भारत को, जो और भी गंदा है, हजारो ठक्कर बापा चाहिए।
राजा राममोहन राय
सती प्रथा के विरुद्ध मोरचा खड़ा करने वाले एवं विधवा विवाह के प्रचंड समर्थक राजा राममोहन राय को इस दिशा मे लाने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है । उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई । परिवार के लोगो ने उनकी भोली स्त्री को आवेश दिला के नशीली चीजें खिला चिता पर बैठा दिया । कोई उनकी चीत्कार न सुन सके, इसलिए जोर-जोर से बाजे बजाने की व्यवस्था कर दी गई । धर्म के नाम पर चलने वाली इस नृशंसता को देख कर , राजाराम मोहन राय का दिल चीत्कार कर उठा । वे भाभी को बचा तो नही सके, पर उनने एक प्रचंड आंदोलन इसके विरुद्ध आरंभ किया । अँगरेजी सरकार ने कानून बनाकर सती प्रथा को रोक दिया । `विधवा विवाह मीमांसा´ नामक एक ग्रंथ उनने सारे पुरातन ग्रंथो का अध्ययन कर लिखा । उन्हे विचारशीलो का समर्थन मिलता चला गया । उनने एक हिंदू कॉलेज की भी स्थापना की । फैलती ईसाइयत से लड़ने मे इस विद्यालय ने बड़ी भूमिका निभाई
गुरुवार, 11 जून 2009
शहीद खुदीराम
खुदीराम को फाँसी हो गई । थोड़ी आयु में, जो थोड़ा-सा समय था, वह भी संघर्ष गुजरा कि देश, धर्म और समाज का पुनरुद्धार हो तो वे अंतिम समय में अपने अभीष्ट से कैसे हट जाते। फांसी के समय वे वेसी ही सजावट के साथ गए, जैसा बरात में सजा होता है। दिन भर उनकी कोठरी राष्ट्रीय गीतों से गूजँती रही, पर वे सदैव गहरी नींद में सोए । जेल अवधि में इनका वजन भी आश्चर्यजनक रुप से बढ गया । नित्य वे दंड-बैठक भी लगाते। जिस दिन उन्हें फाँसी होनी थी, प्रात: काल जल्दी उठे । उपासना की, व्यायाम किया । शरीर सँवारा, जैसे वरयात्रा में जाना हो। हँसते हुए गए। वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए , फाँसी के तख्ते पर झूल गए।
धन्य है यह भूमि , जिसने ऐसे शहीदों को जन्म दिया ।
महान योगी चांगदेव
ऐसा कहा जाता है कि चांगदेव 1400 वर्षों से योग-साधना कर रहे थे । उन्हे भारत का महान योगी माना जाता था। ज्ञानेश्वर सहित तीनों अन्य भाई-बहनो की प्रशंसा सुन उनके मन में आया कि इनसे सत्यासत्य की जानकारी लूँ । प्रश्न रुप में एक सादा कागज भेज दिया । मुक्ताबाई के हाथ में पत्र आया तो वे हँस पड़ी । बोलीं-हमारे योगीराज वर्षों की तप-साधना के बावजूद कोरे ही रह गए। निवृतिनाथ ने इस व्यंग्य पर मुक्ताबाई को लताड़ा एवं पत्रवाहक से कहा- ``योगीराज को हमारी कुटिया पर आने का आमंत्रण दें। ´´योग का प्रभाव देखने के लिए, हाथ मे सर्प का चाबुक लिए, सिंह पर सवार, सभी शिष्यों के साथ, वे मिलने गए। आलिंदी में विराजमान ज्ञानेश्वर, जिस दिवार पर भाई-बहन सहित बैठे थे, उसी को सक्रिय कर स्वागत हेतु चल पड़े। चांगदेव ने यह चमत्कार देखा और श्रद्धावनत् हो, ज्ञानदेव से दीक्षित हुए । यह दीवार आज भी आलिंदी (महाराष्ट्र) में देखी जा सकती है।
लौहपुरुष सरदार पटेल
आज देश के सामने कोई समस्या आती है तो बरबस मुँह से निकल पड़ता है-`काश ! आज सरदार पटेल जीवित होते ।´ जर्मनी के एकीकरण में जो भूमिका विस्मार्क ने और जापान के एकीकरण में जो कार्य मिकाडो ने किया , उनसे बढकर सरदार पटेल का कार्य कहा जायेगा, जिनने भारत जैसे उपमहाद्वीप को, विभाजन की आँधी में टुकड़े-टुकड़े होने से रोका । किस प्रकार देशी राज्यों का एकीकरण संभव हो सका । इस पर विचार करते है तो आश्चर्य होता है । एक-दो नहीं, सैकड़ो राजा भारतवर्ष में विद्यमान थे। उनका एकीकरण सरदार पटेल जैसा कुशल नीतिज्ञ ही कर सकता था। इसी कारण उन्हें लौहपुरुष कहा जाता है। आज राष्ट्र वैसी ही परिस्थिति से गुजर रहा है। हमें फिर वैसी ही , उसी स्तर की जिजीविशा वाली शक्तियो की जरुरत है।
गुरु-शिष्य
चैत्र शुक्ल नवमी, रविवार, संवत् 1530 को जन्मे नारायण बालक को भगवान श्री राम का दास होने के कारण रामदास नाम मिला । बाद मे उनके शिष्यों ने उनकी शक्ति को देख, उन्हें समर्थ की उपाधि दी । देश की दशा को ठीक करना, लोकमत को जगाना और परमात्मा के प्रति विश्वास पैदा करना ही, उनका लक्ष्य होता था। शिवाजी को उनने अपने कार्य का निमित्त बनाया । वैशाख शुक्ल नवमी, संवत् 1571 को उनने अपने प्रिय शिष्य शिवा को शिष्य बनाया- गुरुमंत्र दिया और प्रसाद रुप में एक नारियल, मुट्ठी भर मिट्टी दो मुट्टी लीद और चार मुट्टी पत्थर दिये, जो क्रमश: दृढ़ता, पार्थिवता, ऐश्वर्य एवं दुर्ग विजय के प्रतीक थे । महाराज शिवाजी राव ने गुरु का यह प्रसाद ग्रहण किया और साधु जीवन बिताने की अनुमति माँगी ।
समर्थ ने उन्हे समझाया- ``पीड़ितो की रक्षा तथा धर्म का उद्धार तुम्हारा कर्तव्य है। साधु वही है, जो कि अपनी वासना-तृष्णा, संकीर्ण स्वार्थपरता को त्यागकर ,निस्वार्थ भाव से देश-घर्म की रक्षा करे।´´ शिवाजी ने अपनी सैन्यशक्ति से हिंदू पद पादशाही के प्रवर्तक बनने, छत्रपति कहलाने का श्रेय प्राप्त किया । हजारो महावीर मठ ,जो समर्थ द्वारा स्थापित किए गए, वे प्रेरणा एवं जनसहयोग के स्त्रोत बने । परिणामस्वरुप मुगल साम्रज्य की जड़े खोखली हो गई, वह गिरकर ढेर हो गया । सारा श्रेय गुरु-शिष्य की इस जोड़ी को जाता है
रफी अहमद किदवई साहब
रफी अहमद किदवई साहब के एक मित्र की पुत्री का विवाह था। उनसे किदवई साहब का राजनीतिक विरोध था। बोल-चाल तक नही थी । यहाँ तक कि उनने किदवई साहब को विवाह में आमंत्रित तक न किया, किन्तु वे स्वयं वहाँ पहुँचे ओर कन्या को आशीर्वाद दिया ।
उन सज्जन ने जब अपने प्रतिद्वंदी रफी साहब को वहाँ देखा तो पश्चाताप, आत्मग्लानि और स्नेह का प्रवाह उमड़ा कि वे रफी साहब के गले लिपठ गए और क्षमा-याचना करने लगे। रफी साहब विनम्र स्वर में , इतना ही बोले-``आपका -हमारा राजनीतिक मतभेद हो सकता सदा के लिए, किंतु यह तो घर का मामला है । आपकी बेटी, मेरी बेटी है।´´ इस घटना से आपसी मनमुटाव समाप्त हो गया ।
ब्रह्म दर्शन
ब्रह्म दर्शन से मनुष्य चुप हो जाता है। जब तक दर्शन न हों तभी तक विचार होता है । घी जब तक पक न जाए, तभी तक आवाज करता है । पके घी से शब्द नहीं निकलता, पर पके घी में कच्ची पूरी छोड़ते ही फिर वैसा ही शब्द निकलता है । जब कच्ची पूरी को पका डाला, तब चुप हो जाती है। वैसे ही समाधिस्थपुरुश लोक-शिक्षण हेतु नीचे उतरता है, फिर बोलता है ।
-श्री रामकृष्ण परमहंस
संत रैदास
रैदास की एक बार इच्छा हुई कि वे चितौड़ की रानी झाली के यहाँ जाएँ , जिसने काशीवास में आमंत्रण दिया था। संत के आने पर एक भंडारा हुआ। सभी विद्वज्जनो को आमंत्रण गया। एक अछूत चमड़ा गाँठने वाले का इतना सम्मान देख ब्राह्मणो ने यह निर्णय लिया कि आवश्वक खाद्य सामग्री लेकर वे स्वयं भोजन बनाएँगे। जब वे अलग से भोजन करने बैठे तो देखा कि हर ब्राह्मण पंड़ित की बगल में एक रैदास बैठे हैं। सभी रैदास के चरणो में गिर पड़े और क्षमा माँगी ।
बुधवार, 10 जून 2009
महापुरूष रामतीर्थ
22 अक्टूम्बर, 1873 को गुजरांवाला में एक बालक जन्मा । नाम रखा गया - तीर्थराम। पढने-लिखने में कुशल तीर्थराम ने पंजाब भर में प्रथम स्थान प्राप्त एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण की। लाहौर जैसे शहर में छात्रवृति एवं ट्यूशन द्वारा खरच निकालकर वे पढते रहे । बीए. में फिर वे प्रथम आए । एम.ए. का फार्म भर रहे थे तो अँगरेज प्रिंसिपल ने बडे़ स्नेह से पूछा-``क्या मैं तुम्हारा नाम इंडियन सिविल सर्विसेज (आई.सी.एस.) के लिए भेज दूँ । तुम योग्य हो।´´ तीर्थराम बोले -``मेने यह ज्ञान का खजाना धन या उच्च पद पाने के लिए नहीं पाया । मै इस दौलत को बाँटना चाहता हूँ । मै सारा जीवन प्रभु की इस मानव जाति की सेवा करुँगा। तीर्थराम पर स्वामी विवेकानंद, जो उनसे दस वर्ष बडे थे, का बड़ा प्रभाव था । एक दिन वे उत्तराखंड के जंगलो की और निकल गए। नारायण स्वामी से उनका साक्षात्कार हुआ, यहीं वे रामतीर्थ बने। टेहरी नरेश के आग्रह पर, वे टोकियो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेललन में गए। जापान, अमेरिका, यूरोप, तथा मिस्र में उनने व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा दी । सन् 1906 की दीपावली पर उनकी लिखी `मौत का आह्वान´ नामक रचना अपने शिष्य को सौपने के बाद तैतीस वर्ष आयु में ही भागीरथी में जल समाधि ले ली ।
धन्य है वह देश , जहाँ ऐसे महापुरूष जन्मे।
सोमवार, 1 जून 2009
ज्ञान
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2) ब्रह्म ज्ञान बिनु बात न करहीं, पर निन्दा करि विष रस भरही।।
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3) मेघ चाहे उपाधियॉ व जागीरे बरसा दे, धन चाहें हमें खोजें, किन्तु ज्ञान को तो हमें ही खोजना पडेगा।
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4) मनुष्य जीवन पाकर जिसने ज्ञान की कतिपय बूंदे इकट्ठी न की , उसने मानो इस रतन को मिट्टी के मोल खो दिया।
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5) विद्वान वे व्यक्ति हैं जो अपने ज्ञान के अनुसार आचरण करते है।
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6) विज्ञान बाहर की प्रगति हैं और ज्ञान अन्त: की अनुभूति है।
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7) भरे बादल और भरे वृक्ष नीचे झुकते हैं, सज्जन ज्ञान और धन पाकर विनम्र बनते है।
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8) भागवत में ज्ञान और वैराग्य को भक्ति के बेटे कहा है।
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9) पढिबे को फल गुनब हैं, गुनबे को फल ज्ञान। ज्ञान को फल हरिनाम हैं, कहि श्रुति संत पुराण।
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10) परमात्मा का ज्ञान परमात्मा से अभिन्न होने पर ही होता हैं और संसार का ज्ञान संसार से अलग होने पर ही होता है-यह बात आप याद कर ले।
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11) ज्ञान यज्ञ की लाल मशाल में मेरे हर प्रियजन को श्रद्धा और स्नेह डालते ही रहना हैं और इसे किसी भी कीमत पर बुझने नहीं देना है।
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12) ज्ञान की सार्थकता आचरण में है।
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13) ज्ञान की नौका से भवसागर को पार करे।
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14) ज्ञान का अर्थ हैं-उत्कृष्ट चिन्तन तथा भक्ति का तात्पर्य हैं संवेदना, भावना।
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15) ज्ञान को कर्म का सहयोग न मिले तो कितना ही उपयोगी होने पर भी वह ज्ञान निरर्थक है।
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16) ज्ञान के स्पर्श से मनुष्य अत्यधिक महान् बन सकता है।
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17) ज्ञान केवल सत्य में पाया जाता है।
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18) ज्ञान भक्ति की शुरुआत हैं, प्रारम्भ हैं और भक्ति ज्ञान की पराकाष्ठा।
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19) ज्ञान दार्शनिक चिन्तन मात्र से नहीं खुद की परिस्थितियों से जूझने से आता है।
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20) ज्ञान वह पंख हैं जिसके द्वारा हम स्वर्ग की ओर उडते है।
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21) ज्ञान और कर्म से समृद्धि उपलब्ध होती है।
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22) ज्ञान और चरित्र मानव जीवन की कसौटी है।
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23) ज्ञान गुण प्राप्त करने के लिये जिस वस्तु की प्रथम एवं प्रमुख आवश्यकता हैं, वह हैं-शिक्षा। शिक्षा ज्ञान की आधार भूमि है।
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24) ज्ञानयज्ञ इस युग का सबसे बडा परमार्थ है।
रविवार, 31 मई 2009
सत्यनिष्ठा
जिज्ञासु की पहली पात्रता है- सत्यनिष्ठा । सत्यकाम अज्ञात कुल के थे, पर सुशील थे। वे महर्षि गौतम के पास ब्रह्मज्ञान ज्ञान हेतु पहुँचे । सत्यकाम ने कुल-गौत्र का नाम पूछे जाने पर यही कहा कि मेरी माँ यौवनवस्था में निराश्रित थी । कई गृहस्थों के यहाँ काम किया । मेरी उत्पति किससे हुई , मुझे नहीं मालुम । मेरा नाम सत्यकाम है, माँ का जाबाला । महर्षि ने सत्यकाम को जाबाल नाम देकर , ब्रह्माविद्या में ऐसे साधक को दीक्षित कर, नया इतिहास रचा ।
शनिवार, 30 मई 2009
दुःख
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2) सुखदायी परिस्थिति में पुण्य कटते हैं और दु:खदायी परिस्थिति में पाप कटते है।
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3) सुखदायी परिस्थिति सेवा करने के लिये हैं और दु:खदायी परिस्थिति सुख की इच्छा का त्याग करने के लिये है।
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4) सन्त-महात्मा, बडे-बुढे और दीन-दु:खी-ये भगवान् के रहने के स्थान हैं, इनकी सेवा करो।
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5) दरिद्रता, रोग, दु:ख, बन्धन और विपित्तयॉं ये सब मनुष्यों के अपने ही दुष्कर्मरुपी वृक्ष के फल है।
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6) दु:ख में विवेक जागता हैं, सुख में ज्ञान सोता है।।
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7) दु:ख उतना ही अधिक या न्यून रहता है। जितना मनुष्य का मन कोमल तथा सुकुमार होता है।
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8) दु:ख जरुरी हैं, अपने मूल स्वरुप को प्रकट करने के लिये।
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9) दु:ख आया मत रोय रे, मिटसी दो दिन मांय। सुख आया मत फूल रे, औ थिर रैसी नाय।।
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10) दु:ख, घृणा, हादसा कुछ समय के लिये होते हैं पर अच्छाई, प्यार और यादे हमेशा बनी रहती है।
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11) दुखों से भरी इस दुनिया में सच्चे प्रेम की एक बूंद मरुस्थल में सागर की तरह है।
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12) दूसरे के दु:ख से दु:खी होना सबसे ऊंची सेवा हैं और गोपनीय सेवा है, सेवा का मूल है।
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13) जो बाहरी वस्तुओं के अधीन हैं, वह सब दु:ख हैं और जो अधिकार में हैं, वह सुख है।
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14) जो किसी को दु:ख नहीं देता, उसको देखने से पुण्य होता है।
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15) जो भोगी होता हैं, उसी की दृष्टि में परिस्थिति सुखदायी और दु:खदायी-दो तरह की होती है। योगी की दृष्टि में परिस्थिति दो तरह की होती ही नही।
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16) जो दूसरों के दु:ख से दु:खी होता हैं, उसको अपने दु:ख से दु:खी नहीं होना पडता।
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17) जो व्यक्ति समाज में आत्म प्रदर्शन के लिये जितना उत्सुक हैं, वह उतना ही दु:खी है।
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18) अविवेकशील मनुष्य दु:ख को प्राप्त होते है।
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19) अपना दु:ख भूलकर दूसरो के आनन्द में जुट जाने के सिवाय और दूसरा रास्ता आनंदित होने का इस दुनिया में नहीं है।
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20) अपने निकट सम्बन्धी का दोष सहसा नहीं कहना चाहिये, कहने से उसको दु:ख हो सकता हैं, जिससे उसका सुधार सम्भव नही।
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21) अपने सुख-दु:ख का कारण दूसरों को न मानना चाहिये।
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22) अज्ञानी रहने से जन्म न लेना अच्छा हैं, क्योंकि अज्ञान सब दु:खों की जड है।
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23) अज्ञानी दु:ख को झेलता हैं और ज्ञानी दु:ख को सहन करता हैं।
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24) गहरे दु:ख से वाणी मूक हो जाती है।
गुरुवार, 28 मई 2009
यदि दु:ख के बाद सुख न आता तो उसे कौन सहता...
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2) यदि दु:ख के बाद सुख न आता तो उसे कौन सहता।
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3) यह नियम हैं कि दु:खी आदमी ही दूसरे को दु:ख देता है।
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4) इस विश्व में किसी दु:खी मानव के लिये थोडी सी सहायता ढेरों उपदेश से कहीं अच्छी है।
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5) इच्छा से दु:ख आता हैं, इच्छा से भय आता हैं, जो इच्छाओं से मुक्त हैं वह न दु:ख जानता हैं न भय।
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6) बीज मन्त्र :- सम्मान दे, सलाह लें। सुख बॉटे, दु:ख बंटाये।
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7) बुरे स्वभाव वाला मनुष्य जिस योनि में जायेगा, वहीं दु:ख पायेगा। मरने पर स्वभाव साथ में जाता है।
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8) कहा जाता हैं कि जीवन में दु:खो से संघर्ष करने के लिये साहस चाहिये। वास्तविकता यह हैं कि साहसी व्यक्ति तक दु:ख पहुंचता ही नहीं।
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9) कोई वस्तु दुखमय हैं न सुखमय। सुख-दु:ख तो मन के विकार है।
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10) मेरी तो बस एक ही प्रार्थना हैं, सभी प्राणियों का हृदय स्थिर रहें और मैं सब दु:खों को सहन करुं।
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11) मनुष्य जिस-जिस कामना को छोड देता हैं, उस-उस ओर से सुखी हो जाता हैं। कामना के वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दु:ख ही पाता है।
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12) जिसे कभी दु:ख अनुभव नहीं हुआ , वह सुख अनुभव नहीं कर सकता।
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13) निष्फलता, निराशा, निर्धनता, निरुत्साह सब दु:खानुभूति की ही संताने है।
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14) निद्रा भी कैसी प्यारी वस्तु है घोर दु:ख के समय भी मनुष्य को यही सुख देती है।
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15) हमारी मानसिक अशान्ति, उद्विग्नता, क्षोभ, नैराश्य, क्लेश और दु:खादि के मूल में हैं हमारे द्वारा लोकहित का बाधित होना।
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16) भगवान् की कृपा को देखो, सुख-दु:ख को मत देखो। माता कुन्ती ने विपित्त का वरदान मॉगा था।
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17) परपीडा से छलक उठे मन,
यह छलकन ही गंगाजल है।
दु:ख हरने को पुलक उठे मन,
यह पुलकन ही तुलसीदल हैं।।
जो अभाव में भाव भर सके,
वाणी से रसदार झर सके।
जनहिताय अर्पित जो जीवन, यह अर्पण ही आराधन है।
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18) पाप का निश्चित परिणाम दु:ख है।
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19) श्रम का अर्थ हैं-आनन्द और अर्कमण्यता का अर्थ हैं-दु:ख।
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20) शान्त तथा पवित्र आत्मा में क्लेश, भय, दु:ख, शंका का स्पर्श कैसे हो सकता है।
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21) संसार से सुख चाहने वाला दु:ख से कभी बच सकता ही नही।
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22) सच्चे मित्र के सामने दु:ख आधा और खुशी दोगुनी हो जाती है।
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23) सुख ऊपर पत्थर पडो, जो राम हृदय से जाय। बलिहारी वा दु:ख की जो हर पल राम रटाय। कबीरदासजी।
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24) सुख को भोगना दु:ख को निमन्त्रण देना है।
स्वर्गीय हनुमान प्रसाद पोद्दार
धर्म और अध्यात्म के बल पर जीवन का विकास कितना सहज हो सकता है- स्वर्गीय हनुमान प्रसाद पोद्दार ने स्वयं को इसके एक उदाहरण के रुप में प्रस्तुत किया । स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद ने गीता के आधार पर जीवन जीकर, उच्च जीवनमूल्यों का प्रतिपादन किया किया था। गीता एक अर्थ में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की प्रेरणा ग्रन्थ बन गई थी । भाई जी (इसी नाम से पोद्दार जी विख्यात हुए ) ने, इसी महत्ता को देख `साहित्य सम्वार्धिनी समिति´ की स्थापना की और नई सजधज के साथ भारतमाता के चित्र सहित , गीता का प्रकाशन किया । बाद में धर्मप्रेमी , सद्गृहस्थ विद्वान श्री जयदयाल गोयंदका जी के संपर्क में आने से, उनकी गीता निष्ठा बढती गई । दोनो महानुभावो ने गीताप्रेस की स्थापना की । इस बीच उन पर ब्रिटिश सरकार के मुकदमे भी चले । उनके घर की देख-भाल जयदयाल आदि करते । जेल से छूटने पर उनने `कल्याण´ पत्रिका का प्रवर्तन किया । गोरखपुर आकर बसे भाईजी का सारा जीवन धर्मप्रचार , समाजसुधार में लग गया । एक सद्गृहस्थ संत के रुप में उनका जीवन बीता । गीताप्रेस गोरखपुर ने विचार-क्रांति की वह जन-जन में गहरी पैठ कर गई । धन्य हैं भाईजी ! जिनका सारा जीवन अध्यात्म मार्ग के पथिक की तरह बीता ।
Orison Swett Marden
1- No man fails who does his best.
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2- A good system shortens the road to the goal.
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3- A will finds a way.
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4- All men who have achieved great things have been great dreamers.
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5- Be larger than your task.
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6- It is what we do easily and what we like to do that we do well.
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7- No one has a corner on success. It is his who pays the price.
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8- Our thoughts and imagination are the only real limits to our possibilities.
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9- Power gravitates to the man who knows how.
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10- The Creator has not given you a longing to do that which you have no ability to do.
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11- The influential man is the successful man, whether he be rich or poor.
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12- The waste of life occasioned by trying to do too many things at once is appalling.
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13- There is no medicine like hope, no incentive so great, and no tonic so powerful as expectation of something tomorrow.
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14- There is no stimulus like that which comes from the consciousness of knowing that others believe in us.
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15- We advance on our journey only when we face our goal, when we are confident and believe we are going to win out.
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16- We fail to see that we can control our destiny; make ourselves do whatever is possible; make ourselves become whatever we long to be.
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17- We make the world we live in and shape our own environment.
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18- We must give more in order to get more. It is the generous giving of ourselves that produces the generous harvest.
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19- What power can poverty have over a home where loving hearts are beating with a consciousness of untold riches of the head and heart?
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20- Wisdom is knowledge which has become a part of one's being.
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21- You cannot measure a man by his failures. You must know what use he makes of them. What did they mean to him. What did he get out of them.
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22- You have not found your place until all your faculties are roused, and your whole nature consents and approves of the work you are doing.
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23- You will never succeed while smarting under the drudgery of your occupation, if you are constantly haunted with the idea that you could succeed better in something else.
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24- Your expectations opens or closes the doors of your supply, If you expect grand things, and work honestly for them, they will come to you, your supply will correspond with your expectation.
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आप भी हमारे सहयोगी बने।साहित्य सम्राट प्रेमचंद जी
प्रेमचंद जी को साहित्य सम्राट बनाने का श्रेय उनकी माँ को ही जाता है । लोक-जीवन से जुड़े, उनकी माँ के किस्से कहानियाँ कितने लंबे हाते थे कि सुनते-सुनाते खत्म ही नहीं होते । बहुत प्रखर बुद्धि और कई भाषाओं की जानकार थीं वे। पढ तो सब लेती थीं, पर एक भी अक्षर लिख नही पाती थी । प्रेमचद जी की कहानियाँ-उपन्यासों में जो सहज पात्र, स्वाभाविक घटनाक्रम, आदर्शोन्मुखी और भारतीय जनजीवन का सजीव चित्रांकन हुआ है, बहुत कुछ उनकी माता की ही देन था। वे अपनी कहानियों से श्रोताओं को इस तरह बाँधे रखती थी कि वे तन्मय होकर रह जाते । प्रेमचंद जी ने अपनी माँ से कथा-कहानियाँ, लोक-जीवन के चरित्रों के बारे मे सुनकर अपने आप को गढा, तभी वे एक विशिष्ट व्यक्ति बन सके । माँ ने बेटे को बनाया, ऐसे उदाहरणो से हमारा इतिहास भरा पडा है।
महात्मा हुसैन
हुसैन का कहना है कि उसे तीन बार विशेष रुप से लज्जित होना पड़ा। इनमें पहली घटना एक शराबी की है । वह एक दिन शराब के नशे में पैर इधर-उधर पटकता जा रहा था और कभी-कभी कीचड़ में गिर भी जाता था। हुसैन भी वहीं होकर जा रहा था।
उसने कहा- ``अरे भाई ! पैर ठिकाने रखकर चलो , नही तो कीचड़ में गिर जाओगे।´´ यह सुनकर शराबी ने कहा-``अरे भले आदमी ! तू ही अपने पैरों को सँभालकर रख, क्योकि तू एक धार्मिक पुरुष है। मै तो शराबी हूँ, अगर गिर जाऊँगा तो तो फिर उठ बैठूँगा और पानी से शरीर को धो डालूँगा, पर यदि तू गिर जाएगा तो फिर सहज में स्वच्छ न बन सकेगा।´´
दूसरी घटना मे एक बालक दीपक लेकर आ रहा था। हुसैन ने पुछा- `` यह दीपक कहाँ से लाया ? ´´उसी समय संयोगवश हवा के झोंके से दीपक बुझ गया । उस बालक ने कहा-``पहले तो यह बतलाओ कि दीपक गया कहाँ ? फिर मै तुमको बतलाऊँगा कि दीपक कहाँ से आया था। ´´
तीसरी घटना एक रुप-यौवन संपन्न युवती की है । उसने हुसैन बाबा के पास आकर क्रोधपूर्वक अपने पति के निर्मोहीपन की शिकायत की ।
हुसैन ने कहा-´´बेटी! पहले तू अपने माथे के वस्त्र को ठीक कर जो हट गया है, फिर जो कुछ कहना हो सो कहना ।´´ यह सुनकर उस युवती ने कहा-`` अरे भाई ! मैं तो ईश्वर के बनाए एक पदार्थ के प्रेम में मुग्ध होकर बेखबर हो गई थी, मुझे अपने शरीर का भी होश न था। अगर तुमने सावधान न किया होता तो मैं ऐसी ही हालत में बाजार में चली जाती, पर प्रभु के ध्यान में मस्त होने पर भी `माथा उघाडा है या ढका´ है ऐसी साधारण बात का तुम्हे ध्यान बना रहता है, यह देखकर मुझे तो आश्चर्य होता है । ´´
महात्मा हुसैन का कहना है कि इन शब्दों को सुनकर मैं वास्तव में सावधान हो गया ।
बंदा वैरागी
सत्रहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, काश्मीर के डोगरा राजपूत परिवार में जन्मे लक्ष्मण देव (बाद में बंदा वैरागी) शुरु से ही देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए, अत्याचारी मुगल शासको का अंत करने की बात कहते थे। एक दिन शिकार के दोरान गर्भवती हिरनी उनके हाथों गलती से मार दी गई , गर्भ से दो बच्चे छिटककर गिरे तो उन्होने तुरंन्त वैराग्य ले लिया । 16 वर्ष लक्ष्मण देव नासिक के पास पंचवटी में जाकर तप करने लगे । पन्द्रह वर्ष के दौरान उनकी ख्याति वैरागी के रुप में, उस क्षेत्र में हो गई । इससे घबराकर वैरागी दक्षिणी पंजाब चले गए । गुरु गोविंद सिंह ने उन्हें राष्ट्रधर्म के लिए आगे आने को प्रेरित किया । गुरु के बंदे वे बने , इसलिए बंदा वैरागी कहलाए । एक हुक्मनामा और 25 शिष्य (सिख) लेकर खालसा दल उनने बनाया। प्रखर निष्ठा एंव देशभक्ति की भावना से भरे सैनिकों की एक अच्छी फौज तैयार हो गई । सरहिंद के नवाब ने गुरु साहब के पुत्रों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। उसी नवाब वजीर खाँ पर आक्रमण कर उनने सरहिंद जीत लिया । अपने राज्य में उनने गुरु गोविंद सिंह के नाम के सिक्के चलवाए । यवन शासको ने उनका बड़ा बर्बर अंत किया, पर उनके मुख से उफ तक न निकली । शरीर छोड़ दिया , पर धर्म नहीं बदला ।
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