रविवार, 11 अक्तूबर 2009

सेवाधर्म एक सरल और व्यावहारिक योग साधना

मानवी काय-कलेवर अनेकानेक शक्तियों का भण्डागार है । ये शक्तियाँ प्रायः प्रसुप्त स्थित में पड़ी रहती हैं । प्रसुप्त को जाग्रत् करना ही महान् पुरुषार्थ है । योग साधनाओं की विविध परम्पराओं का सृजन इसी निमित्त हुआ है । उनमें अनेकता-विविधता देखते हुये किसी को भी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के आहार, पोशाक, भाषा, परम्परा एवं विनोद क्रम में अन्तर पाया जाता है, उसी प्रकार यदि अध्यात्म-साधनाओं में अन्तर पाया जाता है, तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये और भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । वे सभी उपयोगी हैं । लक्ष्य सभी का एक है-आत्म परिष्कार । वह जिस सीमा तक पूरा होता है, उसी क्रम से गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता है । इस प्रकार परिपुष्ट हुआ व्यक्ति अपने में सामान्यजनों की अपेक्षा प्रतिभा, प्रामाणिकता, सुव्यवस्था और तत्परता की मात्रा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी देखता है । यही ऋद्धि-सिद्धियों का बीज है । इसके पल्लवित होने पर सामान्य स्थिति में जन्मे, पले लोग भी उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं । वे ऐसे काम कर दिखाते हैं, जिन्हें अभिवंदनीय, अनुकरणीय कहा जा सके । इसी प्रगतिक्रम के साथ-साथ आत्म-सन्तोष और लोक सम्मान उपलब्ध होता चलता है । जन सहयोग की भी कमी नहीं रहती है ।

योगाभ्यासों में, तप-साधनाओं में सभी उपासना परक कर्मकाण्डों में अनुबंधित हों, ऐसी बात नहीं है । एक अति सरल और व्यावहारिक योग भी है-सेवायोग । इस निमित्त भी आत्मसंयम बरतना पड़ता है । शक्तियों को अनावश्यक कार्यों में क्षरित होने से रोकना पड़ता है । इतना ही नहीं समय, साधन, चिंतन आदि को सत्प्रयोजनों के निमित्त अर्पित करना पड़ता है । सादा जीवन और उच्च विचार का जीवनचर्या में सघन समावेश किया जाता है । औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है । 

सेवाधर्म अपनाने का संकल्प-उत्साह मन में तब उठता है, जब आत्मा की मलीनता हटती है और सद्गुण बढ़ते हैं । संकीर्ण स्वार्थपरता के भव-बंधनों से जैसे-जैसे छुटकारा मिलता जाता है, वैसे ही आत्मा की महानता उसी प्रकार परिलक्षित होने लगती है जैसे कीचड़ में दबकर तली में बैठी हुई लकड़ी पानी भरते चलने पर ऊपर उभरती चलती है । मलीनता का दबाव हटते ही महानता का ऊपर उभरना आरम्भ हो जाता है । 

सद्भावना फूल है और जन-कल्याण के निमित्त प्रयत्नशीलता उसका प्रतिफल । सेवा कृत्यों में मात्र हलचल ही नहीं होती रहती, उसके साथ सत्प्रवृत्तियों का समागम भी चलता रहता है । जो आदर्शवादी न होगा, उसे अपनी लोभ-लिप्सा से ही फुरसत न मिलेगी । सस्ती वाहवाही लूटने के लिये लोग दिखावटी आडम्बर मात्र ओढ़ पाते हैं । नाम छपने, फोटो प्रकाशित होने, पदाधिकारी कहलाने भर में उनकी रुचि होती है । उस विज्ञापनबाजी के लिये ही वे थोड़ा समय और धन खर्च कर पाते हैं । जहाँ ऐसा अवसर न हो, वहाँ से वे दूर ही रहते हैं । उदार आत्मीयता की भावनायें परिपक्व होने पर ही यह सूझता है कि दूसरों का दुःख बँटाया जाय, अपना सुख बाँटा जाय । गिरतों को उठाया जाय, उठतों को बढ़ाया जाय । 

सेवा की उमंग तभी उठती है, जब अन्यों में भी अपनी ही आत्मा का प्रतिबिम्ब परिलक्षित होने लगे । इस स्तर की सद्भावना, सदाशयता अनायास ही नहीं उभर आती । इसके लिये लम्बे समय तक आत्मशोधन की साधना करनी पड़ती है । तुच्छता को महानता में, कामना को भावना में बदलना पड़ता है । जब सेवाभावी चिन्तन जग पड़े और उसे कार्यान्वित करने की विधा चल पड़े, तो समझना चाहिये कि चिंतन क्षेत्र में उत्कृष्टता घर बनाने लगी । जब वह कार्यान्वित होने लगे, तो मानना चाहिये कि श्रद्धा ने मूर्तरूप धारण कर लिया । 

सेवाधर्म अपनाने पर पग-पग पर उदारता का परिचय देना पड़ता है । सहृदयता के बिना सेवा बन ही नहीं पड़ती । इसी तथ्य को यों कहा जा सकता है कि जन-कल्याण में प्रवृत्त होने वाला क्रमशः अधिकाधिक उदार बनते चलने के लाभ से वंचित नहीं रह सकता । सदाशयता और सेवा एक ही प्रक्रिया के अविच्छिन्न पक्ष हैं । एक के रहते दूसरी का भी आ पहुँचना स्वाभाविक है । प्रकाश के सामने अंधकार नहीं टिक सकता । उदारता के उभरते ही संकीर्ण स्वार्थपरता का निर्वाह हो नहीं सकता । सेवा परायण व्यक्ति दुर्जन बना नहीं रह सकता । उसे सज्जनता का पक्षधर बनना ही पड़ता है । 

अन्य योग साधनाओं में विधि-विधान सही न होने पर उल्टा परिणाम भी हो सकता है । हानि भी उठानी पड़ सकती है । पर सेवायोग में ऐसा कोई खतरा नहीं है । पुण्य-परमार्थ का स्वल्प समयदान भी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करता है । जन-कल्याण में निरत व्यक्ति सज्जन बन कर रहता है । इतना बन पड़ने पर आत्म-कल्याण की दिशा में प्रगति क्रम अनुगामी ही बनता है ।

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