सोमवार, 12 दिसंबर 2011

अंधविश्वास ...

एक युवक को नौकरी का इंटरव्यू देने के लिए 24 तारीख को बुलाया गया। युवक 22 तारीख को चलने को हुआ तो घर वालों ने कहा आज शनिवार है, अच्छा दिन नहीं, कल जाना। दूसरे दिन पंडि़त जी बोले रवि, शुक्र को पश्चिम की यात्रा वर्जित है, सो वह दिन भी गया। 23 तारीख को ‘योगिनी बाएँ पड़ेगी’ कहकर ज्योतिषी ने चक्कर में ड़ाल दिया। 24 को कपड़े पहनकर चलने को हुआ कि एक बच्ची ने छ़ीक दिया, लड़की को जुकाम था, पर घर वालों ने नहीं जाने दिया। 25 को घर से बाहर निकलते ही बिल्ली रास्ता काट गई। अपशकुन टालने के लिए, जब तक लड़के को रोककर रखा गया, रेलगाड़ी निकल गई। युवक 26 तारीख को आफिस पहुँचा तो दरवाजे पर लिखा पाया- "नो वेकेन्सी" अब कोई स्थान खाली नहीं।

अंधविश्वासों के कारण अक्सर बड़ी हानियाँ उठानी पड़ती हैं।

तुम यह नहीं समझ सकते....

एक बार भगवान कृष्ण से भेंट करने उद्धव गए। उद्धव और माधव दोनों बचपन के दोस्त थे। द्वारपाल ने कहा-‘‘इस समय भगवान पूजा में बैठे हैं, इसलिए अभी थोड़ी देर आपको ठहरना होगा।’’ समाचार पाते ही भगवान शीघ्र पूजा कार्य से निवृत होकर उद्धव से मिलने आए। कुशल प्रश्न के बाद भगवान ने पूछा-‘‘उद्धव ! तुम किसलिए आए हो ?’’

उद्धव ने कहा-‘‘यह तो बाद में बताऊँगा, पहले मुझे यह बतलाएँ कि आप किसका ध्यान कर रहे थे ?’’ भगवान ने कहा-‘‘उद्धव ! तुम यह नहीं समझ सकते।’’ लेकिन उद्धव ने जिद की, तब भगवान ने कहा-‘‘उद्धव ! तुझे क्या बताऊँ, मैं तेरा ही ध्यान कर रहा था।’’ 

सेवक स्वामी का जितना ध्यान रखते हैं, स्वामी भी सेवक का उतना ही ध्यान, सम्मान रखते हैं।

जितनी बार गिरो, उतनी बार उठो...

सुप्रसिद्ध अँगरेज अभिनेता टाल्या के स्वास्थ्य और सौंदर्य से आकर्षित होकर ड़ाइरेक्टरों ने उसकी माँग स्वीकार कर ली और उसे रंगमंच पर पहुँचा दिया, किंतु उस बेचारे से न तो एक शब्द बोलते बना, न नाचते-कूदते। फिल्म ड़ाइरेक्टर नें गले की कमीज पकड़ी और झिड़ककर नीचे उतार दिया। कई अच्छे लोगों की सिफारिस के कारण एक बार फिर रंगमंच पर पहुँच तो गया, पर बेचारे की एक ड्रामे में बोलते समय ऐसी घिग्गी बँधी कि कुछ बोल ही नहीं पाया। फिल्म की आधी रीलें बेकार गई। ड़ाइरेक्टरों ने ड़ाँटकर कहा-‘‘अब दुबारा आने का प्रयत्न मत करना महाशय ?’’

और उसे ड़ाँटकर वहाँ से भगा दिया। टाल्या फिर भी हिम्मत न हारा, कुलियों जैसे सामान उठाने के छोटे-छोटे पार्ट अदा करते-करते एक दिन सुप्रसिद्ध अभिनेता बन गया। किसी ने पूछा-‘‘तुम्हारी सफलता का रहस्य क्या है ?’’ तो उसने हँसकर कहा-‘‘जितनी बार गिरो, उतनी बार उठो।यह सिद्धान्त स्वीकार कर लें तो आप भी निरंतर उठते चले जाएँगे, किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी।’’

जनमानस के मोती...

स्वाति नक्षत्र था। वारिद जलबिंदु तेजी से चला आ रहा था।

वृक्ष की हरित नवल कोंपल ने रोककर पूछा-‘‘पिय ! किधर चले ?’’

‘‘भद्रे ! जलनिधि पर सूर्य की कोपदृष्टि हुई, वह उसे सुखाए ड़ाल रहा है। जलनिधि की सहायता करने जा रहा हूँ।’’

‘‘छोड़ो भी व्यर्थ की चिंता। खुद को मिटाकर भी कोई किसी की सहायता करता है ! चार दिन की जिंदगी है, कर लो आनंदभोग। कहाँ मिलेगी कोमल शय्या!’’

जलबिंदु ने एक न सुनी। तेजी से लुढ़क पड़ा सागर की ओर। नीचे तैर रही थी सीप। उसने जलबिंदु को आँचल में समेट लिया, वह जलबिंदु न रहकर हो गया मोती। सागर की लहरों से एक धीमी-सी ध्वनि निकली- ‘‘निज अस्तित्व की चिंता छोड़कर समाज के कल्याण के लिए जो अग्रसर होते हैं, वे बन जाते हैं जनमानस के मोती।’’

परिश्रम और पुरूषार्थ का मूल्य

भिखारी दिन भर भीख माँगता-माँगता शाम को एक सराय में पहुँचा और भीतर की कोठरी में भीख की झोली रखकर सो गया।

थोड़ी देर पीछे एक किसान आया। उसके पास रूपयों की एक थैली थी। किसान बैल खरीदने गया था।

भीख की झोली रूपयों की थैली से बोली-‘‘बहन ! हम तुम एक बिरादरी के हैं, इतनी दूर क्यों हैं, आओ हम तुम एक हो जाएँ ?’’

रूपयों की थैली ने हँसकर कहा-‘‘बहन ! क्षमा करो, यदि मैं तुमसे मिल गई तो संसार में परिश्रम और पुरूषार्थ का मूल्य ही क्या रह जाएगा !’’

सहृदयता का आर्दश

एक बार देवता मनुष्यों के किसी व्यवहार से क्रुद्ध हो गए। उन्होंने दुर्भिक्ष को पृथ्वी पर भेजा और मनुष्यो के होश दुरस्त करने की आज्ञा दे दी।

दुर्भिक्ष ने अपना विकराल रूप बनाया। अन्न और जल के अभाव में असंख्य मनुष्य रोते-कलपते मृत्यु के मुख में जाने लगे। अपनी सफलता का निरीक्षण करने दुर्भिक्ष दर्पपूर्वक निकला तो उस भयंकर विनाश के बीच एक प्रेरक दृश्य उसने देखा।

एक क्षुधित मनुष्य कई दिन के बाद रोटी का छोटा टुकड़ा कहीं से पाता है, पर वह उसे स्वयं नहीं खाता, वरन भूख से छट-पटाकर प्राण त्यागने की स्थिति में पहुँचे हुए एक सड़े कुते को वह रोटी का टुकड़ा खिला देता है।

इस दृश्य को देखकर दुर्भिक्ष का हृदय उमड़ पड़ा आँखें भर आई। उसने अपनी माया समेटी और स्वर्ग को वापस लौट गया।

देवताओं ने इतनी जल्दी लौट आने का कारण पूछा तो उसने कहा-‘‘जहाँ सहृदयता का आर्दश जीवित हो, वहाँ देवलोक ही होता। धरती पर भी मैंने स्वर्ग के दृश्य देखे और वहाँ से उलटे पाँवों लौटना पड़ा।’’

रविवार, 11 दिसंबर 2011

खुदा के आदेशों का पालन

खलीफा उमर एक बार अपने धर्मस्थान पर बैठे हुए थे। उन्हें स्वर्ग में एक फरिश्ता उड़ता हुआ दिखाई दिया। उसके कंधे पर बहुत मोटी पुस्तक लदी हुई थी। खलीफा ने उसे पुकारा, वह नीचे उतरा तो उन्होंने उस पुस्तक के बारे में पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जो खुदा की इबादत करते हैं।’’

उन्होंने अपना नाम तलाश कराया तो फरिश्ते ने सारी पुस्तक ढूँढ़ डाली, उसका नाम कहीं न मिला। इस पर खलीफा बहुत दुखी हुए कि हमारा इतना परिश्रम बेकार ही चला गया।

कुछ दिन बाद एक और फरिश्ता छोटी-सी किताब लिए उधर से गुजरा। खलीफा ने उसे भी बुलाया और पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जिसकी इबादत खुदाबंद करीम खुद करते हैं।’’

खलीफा ने पूछा-‘‘क्या ईश्वर भी किसी की इबादत करता हैं?’’फरिश्ते ने कहा-‘‘हाँ! जो लोग खुदा के आदेशों का पालन करते हैं, उन पर दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं, उन्हें खुदा बहुत आदर की दृष्टि से देखता है और उनकी इबादत वह खुदा करता है।’’

क्या इसमें मेरा भी नाम है ? खलीफा ने पूछा। फरिश्ता बोला कुछ नहीं, पुस्तक वहीं छोड़कर आगे अढ़ गया। खलिफा ने खोलकर देखा तो उनका नाम सबसे पहला था।

चमत्कार नहीं, चरित्र और ज्ञान...

एक बार एक व्यक्ति ने एक ऊँची बल्ली पर रत्नजडि़त कीमती कमंड़लु टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमंड़लु उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं, बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान साधुओं ने भी प्रयत्न किया, पर किसी को सफलता न मिली। अंत में कष्यप नामक नट विद्या में बहुत-सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्व भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमंडलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन मिला।

जब यह समाचार भगवान बुद्व के पास पहुँचा तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा-‘‘भविष्य में तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाए और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं, चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हों।’’

चमत्कार नहीं, चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।

उपयोगिता

एक धनपति था। वह नित्य ही एक घृतदीप जलाकर मंदिर में रख आता था। एक दूसरा निर्धन व्यक्ति था। वह सरसों के तेल का एक दीपक जलाकर नित्य अपनी गली में रख देता था। वह अँधेरी गली थी। दोनों मरकर जब यमलोक पहुँचे तो धनपति को निम्न स्थिति की सुविधाए दी गई और निर्धन व्यक्ति को उच्च श्रेणी की। यह व्यवस्था देखी तो धनपति ने धर्मराज से पूछा-‘‘यह भेद क्यों, जबकि मैं भगवान के मंदिर में दीपक जलाता था, वह भी घी का।’’

धर्मराज मुस्कराए और बोले-‘‘पुण्य की महत्ता मूल्यों के आधार पर नहीं, कार्य की उपयोगिता और भावना के आधार पर होती हैं। मंदिर तो पहले से ही प्रकाशमान था। उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया, जिससे हजारों व्यक्तियों ने लाभ उठाया। उसके दीपक की उपयोगिता अधिक थी।’’

नीति और न्याय

रावण ने एक और कूटनीतिक चाल फेंकी। बोला-अंगद ! जिस राम ने तेरे पिता को मारा, तू उन्हीं की सहायता कर कहा है ? मेरे मित्र का पुत्र होकर भी तू मुझ से बैर कर रहा है !

अंगद हँसा और बोला-रावण ! अन्यायी से लड़ना और उसे मारना ही सच्चा धर्म है। चाहे वह मेरा पिता हो अथवा आप ही क्यों न हों।

अंगद के ऐसे तेजस्वी शब्द सुनकर रावण को उतर देते न बना।

संबध नहीं, नीति और न्याय का पक्ष ही वरेण्य है।

सत्पात्र

आचार्य उपकौशल को अपनी पुत्री के लिए योग्य वर की खोज थी। उनके गुरूकुल में कई विद्वान ब्रह्मचारी थे, किंतु वे कन्यादान के लिए ऐसे सत्पात्र की खोज में थे, जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी आत्मा को प्रताडि़त न करे। परीक्षा के लिए उन्होंने सब ब्रह्मचारियों को गुप्त रूप से आभूषण लाने को कहा, जिसे माता-पिता क्या, कोई न जाने। सब छात्र चोरी से कुछ-न-कुछ आभूषण लेकर लौटे। आचार्य ने वे आभूषण सॅंभालकर रख लिए। अंत में वाराणसी के राजकुमार ब्रह्मदत खाली हाथ लौटे। आचार्य ने उनसे पूछा-क्या तुम्हें एकांत नहीं मिला ? ब्रह्मदत ने उत्तर दिया-निर्जनता तो उपलब्ध हुई, पर मेरी आत्मा और परमात्मा तो देखते ही थे चोरी को। बस, आचार्य को वह सत्पात्र मिल गया, जिसकी उन्हें खोज थी।

ईश्वर को सर्वत्र विद्यमान देखने वाला कभी अनुचित कार्य नहीं कर सकता।

माँ की शिक्षा

माँ कहा-बच्चे ? अब तुम समझदार हो गए हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस पौधे में जल भी चढ़ाया करो। तुलसी उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।“


बच्चे ने तर्क किया-माँ ? तुम कितनी भोली हो, इतना भी नहीं जानतीं कि यह तो पेड़ है। पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं ? इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?

लाभ है मुन्ने ? श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अंत में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।

तब से विनोबा भावे जी (बच्चे) ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना शुरू कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, इसका प्रमाण अब सबके सामने है।

आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार

पुजारी नियत समय पूजा करने आता और आरती करते-करते वह भाव विहल हो जाता, पर घर जाते ही वह अपने पत्नी-बच्चों के प्रति कर्कश व्यवहार करने लगता।

एक दिन उसका नन्हा बच्चा भी साथ लगा चला आया। पुजारी स्तुति कर रहा था-हे प्रभु ? तुम सबसे प्यार करने वाले, सब पर करूणा लुटाने वाले हो।

अभी वह इतना ही कह पाया था कि बच्चा बोल उठा-पिताजी ? जिस भगवान के पास इतने दिन रहने पर भी आप करूणा और प्यार करना न सीख सके, उस भगवान के पास रहने से क्या लाभ ? पुजारी को अपनी भूल मालूम पड़ गई, वह उस दिन से आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार में लग गया।

भगवान के गुणों का कीर्तन ही नहीं, उन्हों जीवन में उतारने का प्रयास भी करना चाहिए।

अपने दोष...

बिच्छू बोला-तुम मुझे पार पर पहुँचा दो, डंक नहीं मारूँगा। कछुए ने कहा-अच्छा ! और बिच्छू को पीठ पर बैठाकर पानी में तैर चला। अभी कुछ ही दूर चला था कि बिच्छू ने डंक मार दिया। कछुए ने पूछा-यह क्या किया ?

बिच्छू बोला- यह तो मेरा स्वभाव हैं। कछुए ने कहा- अच्छा हुआ मैंने अपने को सुरक्षित किया हुआ है, पर तेरे आततायीपन का दंड़ तो तुझे मिलना ही चाहिए।

यह कहकर उसने डुबकी मार ली और बिच्छू पानी में डूबकर मर गया।

अपने दोष ही अंततः विनाशकारी सिद्व होते हैं।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

Guruji-Mataji...

Revered Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharya 
(A seer-sage and a visionary of the New Golden Era)

Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharyas personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. His life and work represent a marvelous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius.

He pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion, relevant in the challenging circumstances of the present times.

He successfully practiced and mastered the highest kinds of sadhanas of Gayatri and Savitri. He also practiced higher-level sadhanas on the arduous heights of Himalayas several times and had established enliven contact with Rishis (Sages) of Himalayas.

His volumes on Gayatri Mahavigyan (Super Science of Gayatri) stand as most authentic and comprehensive treatise on the philosophy and science of the great Gayatri Mantra.

He initiated programs of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status.

Revered Mata Bhagwati Devi Sharma (Mataji)

Born on September 1926, in a famous priestly family, Mata Bhagwati Devi (Vandaniya Mataji), was extraordinary in her own way and unlike other children, was not interested in regular childhood activities such as playing, etc. Instead, she was more interested in worshiping God. She spent most of her time in singing devotional songs. Her favorite pastime was to make the offering of the Bilva tree leaves at the idol of Lord Shiva, and write OM NAMAH SHIVAYA.

During the early stages of her education, she studied Bhagwad Gita, and Ram Charit Manas. After her marriage to Pandit Shriram Sharma Acharya (Gurudev), Mataji took over the responsibility of looking after visitors and guests. She willingly donated all her personal jewelry, which she received at her wedding, to Gurudevs Yug Nirmaan Yojanaa (Movement for the Recreation of the Era) for establishment of Gayatri Tapobhoomi at Mathura.

In 1975, under the leadership of Mataji, Mahilaa Jaagaran Abhiyaan (Movement for Emancipation of Women) was initiated. Soon, about 4000 branches of Mahilaa Jaagaran Abhiyaan were established with more than one million active participants. Its work was not limited to mere slogan-raising, but also womens education, economic self-support, sacramental rites, acquiring self-respect, abolition of dowry and fight against the discrimination of women.

जब भी कोई आपके पैर छुए तो जरूर करें ये दो काम, क्योंकि...

हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है। जिन लोगों के पैर छुए जाते हैं उनके लिए शास्त्रों में कई नियम भी बनाए हैं। यदि कोई आपके पैर छुता है तो आपको क्या करना चाहिए, जानिए...

उम्र में बड़े लोगों के पैर छुने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छुने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं। जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए।

जब भी कोई आपके पैर छुता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छुने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। आशीर्वाद देने से पैर छुने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र बढ़ती है।

किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए?
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गायत्री स्तोत्र


सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं 
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां 
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां 
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं 
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

श्रीराम शर्मा आचार्य विरचित गायत्री महाविज्ञान से

चन्द्रायण व्रत क्या है ?

जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है।

इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है। इस व्रत में व्यक्ति अपनें खानें को १६ हिस्सों में विभाजित करतें है।

प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।

अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।

अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन की मात्रा में १६ वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
व्रत के साथ साथ गायत्री का अनुष्ठान भी चलता रहता है।

कौन कर सकता है या किसे करना चाहिये? 
उस व्यक्ति को जिसे अपना स्वास्थ्य ठीक करना हो, उस व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिये। 

कब व कहां कर सकते है? 
पूर्णमासी से पूर्णमासी तक किसी भी मौसम में कर सकतें है। अत्यधिक शारीरिक श्रम वाले दिनों इसे नही करना चाहिये।
स्थान घर का एक कमरा भी हो सकता है और कोई अन्य सुविधा युक्त स्थान । पर स्थान का चयन करने पर वातावरण की शान्ति और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। 

शारीरिक व आध्यात्मिक महत्व क्या है ? 
- शरीर की शुद्धि होती है।
- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, रोग निवारक शक्ति बढ़ती है।
- आहार विहार शुद्ध होने से मन स्वच्छ बनता है।
- गायत्री अनुष्ठान का साथ होने से आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है और मानव सत्कार्यो की और प्रवृत्त होता है।

इस व्रत को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया ? 
हमारे पूज्य गुरूदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसका प्रयोग स्वयं पर तथा अपने रूग्ण शिष्यों पर किया और अनुभव किया कि यह व्रत मानसिक व शारीरिक स्वस्थता के लिये परम उपयोगी है। उन्होने पाया कि यह व्रत शरीर का कायाकल्प कर देता है।

केवल गायत्री परिवार ही नही स्वास्थ्य को महत्व देने वाले लगभग सभी आश्रमों ने इस व्रत को अपना रखा है। 

प्रज्ञा पुराण कथा क्या है ?

किसी भी अच्छी बात को सिखाने-बताने के लिये कथा-कहानियों का आश्रय लिया जाता है ।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने १८ पुराण लिख कर वेद-उपनिषदों की शिक्षाओं को पुराणों के रूप में उतारा है ।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्री राम शर्मा आचार्य जी ने भी व्यास जी की तरह १९ वां पुराण लिख दिया है जिसमें समझाया है कि ईश्वर पुत्र होने पर भी मनुष्य क्यों दुःखी रहता है, उस दुःख को कैसे दूर कर सकता है। पुराण के अनुसार आचरण करने से मानव मे देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग आयेगा।

कथा कराने में कितना समय लगता है ? 
कथा को यदि सार्वजनिक रूप से दृष्टान्त सहित समझाने का आयोजन किया जाय तो एक माह भी लग सकता है। किन्तु प्रायः सात - आठ दिनों में इसे निम्न प्रकार सम्पन्न कर लेते है।

लोक कल्याण(प्रथम) खण्ड - २ दिन
महामानव-देवमानव (द्वितीय) खण्ड - २ दिन
परिवार (तृतीय) खण्ड - २ दिन
देव संस्कृति (चतुर्थ) खण्ड - २ दिन 

प्रज्ञा पुराण कथा कौन करा सकता है ? कब और कहां करा सकता है ? कौन कह सकता है ?

यही प्रश्ननारद मुनि जी ने भगवान विष्णु से एक कथा में पूछा था।
प्रश्न के ऊत्तर में भगवान नें कहा कि - जिसमें श्रद्धा और विश्वास हों, जिस किसी को अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना हों और जो पाप मुक्त होना चाहता हो वह भक्त इस कथा को कहीं भी अवकाश (फुर्सत) के क्षणों में कथा करायें और सुने।

कोई भी विद्यावान - पढा लिखा व्यक्ति जो कथा को रोचक ढंग से, दृष्टान्तों के साथ सुना सकने में सक्षम हों और स्पष्ट वाणी वाला व्यक्ति कथा कह सकता हैं। 

प्रज्ञा पुराण कथा को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया है ?
गायत्री परिवार का एक उद्देश्य यह भी है- धर्म तंत्र से लोक शिक्षण, इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसे अपनाया हैं। 

गायत्री यज्ञ

यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं- १- देवपूजा, २-दान, ३-संगतिकरण । संगतिकरण का अर्थ है-संगठन । यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत्प्रयोजन के लिए संगठित करना भी है । इस युग में संघ शक्ति ही सबसे प्रमुख है । परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी पृथक्-पृथक् शक्तियों का एकीकरण करके संघ-शक्ति के रूप में दुर्गा शक्ति का प्रादुर्भाव किया था । उस माध्यम से उसके दिन फिरे और संकट दूर हुए । मानवजाति की समस्या का हल सामूहिक शक्ति एवं संघबद्धता पर निर्भर है, एकाकी-व्यक्तिवादी-असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते हैं । गायत्री यज्ञों का वास्तविक लाभ सार्वजनिक रूप से, जन सहयोग से सम्पन्न कराने पर ही उपलब्ध होता है ।

यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म । अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है । वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है । हवन हुए पदार्थ् वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं । यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है । इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयतन से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है ।

वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है । यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो । इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है । गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें ।

यदि यज्ञ भावना के साथ मनुष्य ने अपने को जोड़ा न होता, तो अपनी शारीरिक असमर्थता और दुर्बलता के कारण अन्य पशुओं की प्रतियोगिता में यह कब का अपना अस्तित्व खो बैठा होता । यह जितना भी अब तक बढ़ा है, उसमें उसकी यज्ञ भावना ही एक मात्र माध्यम है । आगे भी यदि प्रगति करनी हो, तो उसका आधार यही भावना होगी ।

प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परंपरा के अनुरूप है । समुद्र बादलों को उदारतापूर्वक जल देता है, बादल एक स्थान से दूसरे स्थान तक उसे ढोकर ले जाने और बरसाने का श्रम वहन करते हैं । नदी, नाले प्रवाहित होकर भूमि को सींचते और प्राणियों की प्यास बुझाते हैं । वृक्ष एवं वनस्पतियाँ अपने अस्तित्व का लाभ दूसरों को ही देते हैं । पुष्प और फल दूसरे के लिए ही जीते हैं । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदि की क्रियाशीलता उनके अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् दूसरों के लिए ही है । शरीर का प्रत्येक अवयव अपने निज के लिए नहीं, वरन् समस्त शरीर के लाभ के लिए ही अनवरत गति से कार्यरत रहता है । इस प्रकार जिधर भी दृष्टिपात किया जाए, यही प्रकट होता है कि इस संसार में जो कुछ स्थिर व्यवस्था है, वह यज्ञ वृत्ति पर ही अवलम्बित है । यदि इसे हटा दिया जाए, तो सारी सुन्दरता, कुरूपता में और सारी प्रगति, विनाश में परिणत हो जायेगी । ऋषियों ने कहा है- यज्ञ ही इस संसार चक्र का धुरा है । धुरा टूट जाने पर गाड़ी का आगे बढ़ सकना कठिन है । 

यज्ञीय विज्ञान 
मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्रोत दबे हैं । जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास ये युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग-रागनियाँ बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मंत्रोच्चारण से भी एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत् पर तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है ।

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं । डी.डी.टी., फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है । साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है । दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयतन न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है । मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है ।

यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण पर देवत्व की छाप डालती है । जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालता रहता है । प्राचीनकाल में तीर्थ वहीं बने हैं, जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे । जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है, उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती हैं । महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं । उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है ।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है । इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है । यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्व्ार्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है ।

यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल-विक्षेप दूर होते हैं । फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश जगता है । यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्त्व, ऋषि तत्त्व की वृद्धि दिनानु-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य बहुत सरल हो जाता है । आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है, जैसे लोहे के टूटे हुए टुकड़ों को बैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है । ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा प्राप्त होता है । इसलिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिए अर्पित करना पड़ता है । लोगों के अंतःकरण में अन्त्यज वृत्ति घटे-ब्राह्मण वृत्ति बढ़े, इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव की शक्ति भरना आवश्यक है ।

विधिवत् किये गये यज्ञ इतने प्रभावशाली होते हैं, जिसके द्वारा मानसिक दोषों-र्दुगुणों का निष्कासन एवं सद्भावों का अभिवर्धन नितान्त संभव है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, कायरता, कामुकता, आलस्य, आवेश, संशय आदि मानसिक उद्वेगों की चिकित्सा के लिए यज्ञ एक विश्वस्त पद्धति है । शरीर के असाध्य रोगों तक का निवारण उससे हो सकता है ।

अग्निहोत्र के भौतिक लाभ भी हैं । वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कल-कारखानों के धुआँ आदि से गन्दा करते हैं । गन्दी वायु रोगों का कारण बनती है । वायु को जितना गन्दा करें, उतना ही उसे शुद्ध भी करना चाहिए । यज्ञों से वायु शुद्ध होती है । इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक बड़ा प्रयोजन सिद्ध होता है ।

यज्ञ का धूम्र आकाश में-बादलों में जाकर खाद बनकर मिल जाता है । वर्षा के जल के साथ जब वह पृथ्वी पर आता है, तो उससे परिपुष्ट अन्न, घास तथा वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं । यज्ञाग्नि के माध्यम से शक्तिशाली बने मन्त्रोच्चार के ध्वनि कम्पन, सुदूर क्षेत्र में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करते हैं, फलस्वरूप शरीरों की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता है ।

अनेक प्रयोजनों के लिए-अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, अनेक विधानों के साथ, अनेक विशिष्ट यज्ञ भी किये जा सकते हैं । दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार उत्कृष्ट सन्तानें प्राप्त की थीं, अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में ये रहस्य बहुत विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । विश्वामित्र आदि ऋषि प्राचीनकाल में असुरता निवारण के लिए बड़े-बड़े यज्ञ करते थे । राम-लक्ष्मण को ऐसे ही एक यज्ञ की रक्षा के लिए स्वयं जाना पड़ा था । लंका युद्ध के बाद राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे । महाभारत के पश्चात् कृष्ण ने भी पाण्डवों से एक महायज्ञ कराया था, उनका उद्देश्य युद्धजन्य विक्षोभ से क्षुब्ध वातावरण की असुरता का समाधान करना ही था । जब कभी आकाश के वातावरण में असुरता की मात्रा बढ़ जाए, तो उसका उपचार यज्ञ प्रयोजनों से बढ़कर और कुछ हो नहीं सकता । आज पिछले दो महायुद्धों के कारण जनसाधारण में स्वार्थपरता की मात्रा अधिक बढ़ जाने से वातावरण में वैसा ही विक्षोभ फिर उत्पन्न हो गया है । उसके समाधान के लिए यज्ञीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक हो गया है । 

यज्ञीय प्रेरणाएँ 
यज्ञ आयोजनों के पीछे जहाँ संसार की लौकिक सुख-समृद्धि को बढ़ाने की विज्ञान सम्मत परंपरा सन्निहित है-जहाँ देव शक्तियों के आह्वान-पूजन का मंगलमय समावेश है, वहाँ लोकशिक्षण की भी प्रचुर सामग्री भरी पड़ी है । जिस प्रकार 'बाल फ्रेम' में लगी हुई रंगीन लकड़ी की गोलियाँ दिखाकर छोटे विद्यार्थियों को गिनती सिखाई जाती है, उसी प्रकार यज्ञ का दृश्य दिखाकर लोगों को यह भी समझाया जाता है कि हमारे जीवन की प्रधान नीति 'यज्ञ' भाव से परिपूर्ण होनी चाहिए । हम यज्ञ आयोजनों में लगें-परमार्थ परायण बनें और जीवन को यज्ञ परंपरा में ढालें । हमारा जीवन यज्ञ के समान पवित्र, प्रखर और प्रकाशवान हो । गंगा स्नान से जिस प्रकार पवित्रता, शान्ति, शीतलता, आदरता को हृदयंगम करने की प्रेरणा ली जाती है, उसी प्रकार यज्ञ से तेजस्विता, प्रखरता, परमार्थ-परायणता एवं उत्कृष्टता का प्रशिक्षण मिलता है । यज्ञ की प्रक्रिया को जीवन यज्ञ का एक रिहर्सल कहा जा सकता है । अपने घी, शक्कर, मेवा, औषधियाँ आदि बहुमूल्य वस्तुएँ जिस प्रकार हम परमार्थ प्रयोजनों में होम करते हैं, उसी तरह अपनी प्रतिभा, विद्या, बुद्धि, समृद्धि, सार्मथ्य आदि को भी विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए । इस नीति को अपनाने वाले व्यक्ति न केवल समाज का, बल्कि अपना भी सच्चा कल्याण करते हैं । संसार में जितने भी महापुरुष, देवमानव हुए हैं, उन सभी को यही नीति अपनानी पड़ी है । जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढ़ा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता ।

यज्ञीय प्रेरणाओं का महत्त्व समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है । उसकी शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं । 

वे शिक्षाएँ इस प्रकार हैं-
१- जो कुछ हम बहुमूल्य पदार्थ अग्नि में हवन करते हैं, उसे वह अपने पास संग्रह करके नहीं रखती, वरन् उसे सर्वसाधारण के उपयोग के लिए वायुमण्डल में बिखेर देती है । ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का प्रयोग हम भी वैसा ही करें, जो हमारा यज्ञ पुरोहित अपने आचरण द्वारा सिखाता है । हमारी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा आदि विभूतियों का न्यूनतम उपयोग हमारे लिए और अधिकाधिक उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए ।

२- जो वस्तु अग्नि के सम्पर्क में आती है, उसे वह दुरदुराती नहीं, वरन् अपने में आत्मसात् करके अपने समान ही बना लेती है । जो पिछड़े या छोटे या बिछुड़े व्यक्ति अपने सम्पर्क में आएँ, उन्हें हम आत्मसात् करने और समान बनाने का आदर्श पूरा करें ।

३- अग्नि की लौ कितना ही दबाव पड़ने पर नीचे की ओर नहीं होती, वरन् ऊपर को ही रहती है । प्रलोभन, भय कितना ही सामने क्यों न हो, हम अपने विचारों और कार्यों की अधोगति न होने दें । विषम स्थितियों में अपना संकल्प और मनोबल अग्नि शिखा की तरह ऊँचा ही रखें ।

४- अग्नि जब तक जीवित है, उष्णता एवं प्रकाश की अपनी विशेषताएँ नहीं छोड़ती । उसी प्रकार हमें भी अपनी गतिशीलता की गर्मी और धर्म-परायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए । जीवन भर पुरुषार्थी और कर्त्तव्यनिष्ठ रहना चाहिए ।

५- यज्ञाग्नि का अवशेष भस्म मस्तक पर लगाते हुए हमें सीखना होता है कि मानव जीवन का अन्त मुट्ठी भर भस्म के रूप में शेष रह जाता है । इसलिए अपने अन्त को ध्यान में रखते हुए जीवन के सदुपयोग का प्रयत्न करना चाहिए ।

अपनी थोड़ी-सी वस्तु को वायुरूप में बनाकर उन्हें समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने-पराये, मित्र-शत्रु का भेद किये साँस द्वारा इस प्रकार गुप्तदान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्त्व खिला दिया, सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है, कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है ।

यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है । अन्य उपासनाएँ या धर्म-प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई अकेला कर या करा सकता है; पर यज्ञ ऐसा कार्य है, जिसमें अधिक लोगों के सहयोग की आवश्यकता है । होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं । यज्ञ आयोजनों से सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएँ विकसित होती हैं ।

प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व-त्यौहार, संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है । यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है । यज्ञ भारत की एक मान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है । धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिए ऐसे आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है ।

गायत्री सद्बुद्धि की देवी और यज्ञ सत्कर्मों का पिता है । सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए गायत्री माता और यज्ञ पिता का युग्म हर दृष्टि से सफल एवं समर्थ सिद्ध हो सकता है । गायत्री यज्ञों की विधि-व्यवस्था बहुत ही सरल, लोकप्रिय एवं आकर्षक भी है । जगत् के दुर्बुद्धिग्रस्त जनमानस का संशोधन करने के लिए सद्बुद्धि की देवी गायत्री महामन्त्र की शक्ति एवं सार्मथ्य अद्भुत भी है और अद्वितीय भी ।

नगर, ग्राम अथवा क्षेत्र की जनता को धर्म प्रयोजनों के लिए एकत्रित करने के लिए जगह-जगह पर गायत्री यज्ञों के आयोजन करने चाहिए । गलत ढंग से करने पर वे महँगे भी होते हैं और शक्ति की बरबादी भी बहुत करते हैं । यदि उन्हें विवेक-बुद्धि से किया जाए, तो कम खर्च में अधिक आकर्षक भी बन सकते हैं और उपयोगी भी बहुत हो सकते हैं ।

अपने सभी कर्मकाण्डों, धर्मानुष्ठानों, संस्कारों, पर्वों में यज्ञ आयोजन मुख्य है । उसका विधि-विधान जान लेने एवं उनका प्रयोजन समझ लेने से उन सभी धर्म आयोजनों की अधिकांश आवश्यकता पूरी हो जाती है ।

लोकमंगल के लिए, जन-जागरण के लिए, वातावरण के परिशोधन के लिए स्वतंत्र रूप से भी यज्ञ आयोजन सम्पन्न किये जाते हैं । संस्कारों और पर्व-आयोजनों में भी उसी की प्रधानता है ।

प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को यज्ञ प्रक्रिया से परिचित होना ही चाहिए । 

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