रविवार, 5 जुलाई 2009

वो महाराणा प्रताप कठे ?

हळदीघाटी में समर में लड़यो, 
वो चेतक रो असवार कठे ?
मायड़ थारो वो पुत कठे ?, 
वो एकलिंग दीवान कठे ?
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे ?, 
वो महाराणा प्रताप कठे ?

मैं बाचों है इतिहासां में, मायड़ थे एड़ा पुत जण्या,
अन-बान लजायो नी थारो, रणधीरा वी सरदार बण्या,
बेरीया रा वरसु बादिळा सारा पड ग्या ऊण रे आगे,
वो झुक्यो नही नर नाहरियो, हिन्दवा सुरज मेवाड़ रतन
वो महाराणा प्रताप कठे ? 

मायड़ थारो वो पुत कठे ?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

ये माटी हळदीघाटी री लागे केसर और चंदन है,
माथा पर तिलक करो इण रो इण माटी ने निज वंदन है.
या रणभूमि तीरथ भूमि, दर्शन करवा मन ललचावे.
उण वीर-सुरमा री यादा हिवड़ा में जोश जगा जावे.
उण स्वामी भक्त चेतक री टापा, टप-टप री आवाज कठे?

मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

संकट रा दन देख्या जतरा, वे आज कुण देख पावेला,
राणा रा बेटा-बेटी न, रोटी घास री खावेला
ले संकट ने वरदान समझ, वो आजादी को रखवारो,
मेवाड़ भौम री पति राखण ने, कदै भले झुकवारो,
चरणा में धन रो ढेर कियो, दानी भामाशाह आज कठे?

मायड़ थारो वो पुत कठे? 
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

भाई शक्ति बेरिया सूं मिल, भाई सूं लड़वा ने आयो,
राणा रो भायड़ प्रेम देख, शक्ति सिंग भी हे शरमायों,
औ नीला घोड़ा रा असवार, थे रुक जावो-थे रुक जावो
चरणा में आई प़डियो शक्ति, बोल्यो मैं होकर पछतायो.
वो गळे मिल्या भाई-भाई, जूं राम-भरत रो मिलन अठे.
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 

वो महाराणा प्रताप कठे?, 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे?

वट-वृक्ष पुराणॊं बोल्यो यो, सुण लो जावा वारा भाई
राणा रा किमज धरया तन पे, झाला मन्ना री नरवारी
भाळो राणा रो काहे चमक्यो, आँखां में बिजली कड़काई,
ई रगत-खळगता नाळा सूं, या धरती रगत री कहळाई
यो दरश देख अभिमानी रो जगती में अस्यों मनख कठे?
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

हळदीघाटी रे किला सूं शिव-पार्वती रण देख रिया
मेवाड़ी वीरा री ताकत, अपनी निजरिया में तौल रिया.
बोल्या शिवजी-सुण पार्वती मेवाड़ भौम री बलिहारी
जो आछा करम करे जग में, वो अठे जनम ले नर-नारी.
मूं श्याम एकलिंग रूप धरी सदियां सूं बैठो भला अठे.
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

मानवता रो धरम निभायो है, भैदभाव नी जाण्यो है
सेनानायक सूरी हकीम यू राणा रो...चुकायो हे
अरे जात-पात और ऊंच-नीच री बात अया ने नी भायी ही
अणी वास्ते राणा री प्रभुता जग ने दरशाई ही
वो सम्प्रदाय सदभाव री मिले है मिसाल आज अठे.
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

कुम्भलगढ़, गोगुन्दा, चावण्ड, हळदीघाटी ओर कोल्यारी
मेवाड़ भौम रा तीरथ है, राणा प्रताप री बलिहारी,
हे हरिद्वार, काशी, मथुरा, पुष्कर, गलता में स्नान करा,
सब तीरथा रा फल मिल जावे मेवाड़ भौम में जद विचरां.
कवि “माधव" नमन करे शत-शत, मोती मगरी पर आज अठे.
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

अरे आज देश री सीमा पर संकट रा बादळ मंडराया,
ये पाकिस्तानी घुसपेठीया, भारत सीमा में घुस आया,
भारत रा वीर जवाना थे, याने यो सबक सिखा दिजो,
थे हो प्रताप रा ही वंशज, याने यो आज बता दिजो,
यो काशमीर भारत रो है, कुण आज आंख दिखावे आज अठे.
मायड़ थारो वो पुत कठे?
वो एकलिंग दीवान कठे? 
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? 
वो महाराणा प्रताप कठे?

कवि माधव दरक, कुम्भलगढ़, राजस्थान

शनिवार, 4 जुलाई 2009

युग परिर्वतन के अग्रदूत

परमपूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा अपने प्रवचन में कहा करते थे-``मै धरती का भाग्य-भविष्य बदलने आया हूँ। मै आना नही चाहता था, पर मुझे धकेला गया है । और विशिष्ट कार्यो के लिए भेजा गया है । लोग मुझे मनोकामना पूरी करने की मशीन मानते है । मै उनकी थोड़ी मानकर उन्हें बदलने का प्रयास करता हूँ । जो बदल जाते हैं, वे ही मेरे सैनिक-युग परिर्वतन के अग्रदूत बन जाते है ।

अपनी और दृष्टि

योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-``जैसे पानी में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इंद्रियों में से मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इंद्रिय इस अयुक्त पुरूष की बुद्धि को हर लेती है । इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य को बहुत सावधान रहना चाहिए । एक ही इंद्रिय काफी है, जो मनुष्य को पतन की ओर ले जा सकती है । द्वापर में एक असुर था। शंबरासुर नाम था । उसने प्रद्युम्न (श्रीकृष्ण के बड़े पुत्र-कामदेव के अवतार) का हरण कर लिया था । रति भी उसी के यहाँ कैद थी । शंबरासुर पाककला मे निपुर्ण स्त्रियों का ही अधिकतर हरण करता था । उसकी पाकशाला सदैव सजी रहती थी । उसे खाने का बड़ा शौक था । वह चाहता था कि पाकशाला मे बढ़िया से बढ़िया खाना बने और उसे खिलाया जाए । वह किसी स्त्री की खूबसूरती को नही देखता था, न ही उन्हे हाथ लगाता था , मात्र उसका पाक कला में पारंगत होना जरुरी होता था प्रद्युम्न ने उस असुर को मार कर अगणित स्त्रियों को मुक्त किया । मात्र एक इंद्रिय ही उस असुर के पतन का कारण बनी- सुस्वादु आहार का सेवन । दिन-रात उसी का चिंतन । हम भी अपनी और दृष्टि डालकर देखें।
              आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

जाग्रत लोकमानस

पत्रिका के प्रेस में जाते समय एक ऐसा घटनाक्रम घट गया है, जिसने सारे राष्ट्र की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई पर पड़ोसी देश पाकिस्तान के दुर्दांत आतंकवादियो ने मानो युद्ध छेड़ दिया है। जिस तरह से यह सुनियोजित हमला 26 नवंबर की रात्रि को हुआ, सारा देश सकते मे आ गया है । लगभग 150 से अधिक व्यक्ति मुंबइ के विभिन्न इलाको मे आतंकवादियों के हाथों मारे गए हैं एवं अगणित घायल बताए गए है। पूरी मुबंई के नगरवासियो ने पूरे धैर्य के साथ संकट का मुकाबला किया है,

पर यह कब तक चलेगा ? क्यों इस युद्ध जैसी घटना पर राजनीति की जा रही है ?

सांप्रदायिक उन्माद के नाम पर इन हमलों से कब तक भारतवासी आतंक में जिएँगें ?

क्या हमारा पूरा देश इस समय एक नही हो सकता ?

ऐसे घटनाक्रम फिर न हों, इसका आश्वासन हमें कौन देगा ?

संभवत: जाग्रत लोकमानस
, जो उन सभी को कड़ा जवाब दे, जो क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद , जातिवाद व वोट की राजनीति की रोटी खाते हे। `अखण्ड़ ज्योति´ एक आध्यात्मिक सामाजिक पत्रिका है, पर सबसे एक अपील करती हैं कि यह समय साहस रखने का है, सबकी एकजुटता का है । विश्वशांति के लिए हम सभी मिलकर प्रार्थना करे तो निश्चित ही भारतवासियों की पुकार भगवान सुनेंगें । हम राजनीति से परे चलें एवं एक अखंड राष्ट्र के लिए चिंतन करें । अधिक जागरुक बनें एवं महाकाल की सत्ता पर- दंड-विधान पर विश्वास रखे। सभी मृतात्माओ के लिए हम सभी की ओर से शांति की प्रार्थना ! सभी को शक्ति मिले , बल मिले , यही परमात्मा से प्रार्थना ।

           
आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

संघर्ष का सत्पथ

वर्ष 2009 के नवीन सूर्योदय ने संघर्ष का नया सत्पथ प्रकाशित किया है। जिन्हें महात्मा ईसा की याद है, उन्हे बरबस यह भी स्मरण हो आएगा कि महात्मा यीशु ने अपनी संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन यात्रा में पल-पल कठिन संघर्ष किए, क्षण-क्षण दारुण यातनाएँ सहीं । जीवन के अंतिम समय के अंतिम संघर्ष में उन्हाने शूली की महायातना को लोकहित मे स्वीकारा । उनकी उपस्थिति एवं उनके अस्तित्व को बीते हुए आज 2009 वाँ वर्ष आ चुका है , परंतु उनका आध्यात्मिक संदेश आज भी शाश्वत है। लोकहित से ही आत्महित सधता है और आत्महित से ही पवित्रता, सत्यता, व्यापकता एवं उदारता में ही लोकहित के समिन्वत आध्यात्मिक यात्रा के प्रत्येक शिखर पर आरोहण संघर्ष के नए सत्पथ पर चलकर ही किया जाता है ।

वर्ष 2009 के प्रथम सूर्योदय की नई किरण के नवीन उजास में इसी सत्य का प्रकाश है। इस नव वर्ष की सूर्य-किरणों में आत्महित व लोकहित के समिन्वत अध्यात्म मार्ग पर चल पड़ने की प्रेरणा है, संघर्ष के सत्पथ पर निकल पड़ने का आह्वान है । इस नव वर्ष का प्रत्येक मास, प्रत्येक दिवस ,यहाँ तक कि प्रत्येक घड़ी ,क्षण पल अपने कोष में अनेक बहुमूल्य उपहार लिए हैं, किंतु ये उपहार पाने के लिए हममें से हर एक को संपूर्ण वर्ष सचेत,सचेष्ट रहना होगा, संघर्षों की नई-नई चुनौतियाँ स्वीकारनी होगी( शारीरिक-मानसिक यातनाओ का सामना हँसते-खिलखिलाते -मुस्काराते करना होगा । जो भी ऐसा कर पायेगा , उसके लिए यह वर्ष नई सफलताओं, नवीन समृद्धि का वरदान देगा । उसके पावँ जहा भी पड़ेंगे, वही स्थान आध्यात्मिक प्रकाश से पूर्ण हो जायेगा ।

संघर्ष का सत्पथ ही हमारे लिए विजय का द्वार है। वह श्रेय मार्ग है, जिसकी चर्चा वेदवाणी करती है, जिसे ऋषियों ने अपने द्वारा उच्चरित मंत्रो मे गाया है। अतीत व वर्तमान के सभी महामानवों ने इसी की प्रेरणा दी है । यही इस वर्ष का और हमारे अपने जीवन का सदा आध्यात्मिक सत्य है।


महापुरुष की वाणी


दन्तिदन्तसमानं हि नि:सृतं महतां वच: ।
कूर्मग्रीवेण नीचानां पुनरायाति याति च ।।

महापुरुष की वाणी हाथी के दाँत के समान एक बार निकलती है । जबकि दुर्जनों की वाणी कछुए की गरदन की तरह बार-बार अंदर-बाहर आती-जाती रहती है। (अर्थात् सज्जन जो एक बार कह देते हैं, उस पर आरुढ़ रहते हैं और दुर्जन जो कहते हैं, उसे बार-बार बदलते रहते हैं) ।

पीरो से परदा ?

परदा प्रथा एक ऐसी सड़ी-गली परंपरा है, जो न्यूनाधिक रुप से समाज में चारों ओर व्याप्त है। इसके उन्मूलन हेतु इस सदी के प्रारंभ से ही प्रयास चलते आए हैं। महात्मा गांधी के जीवन की एक घटना है, जो बताती है इस प्रथा के प्रति आक्रोश महिलाओं की ओर से कैसे उभरकर आया ?


इलाहाबाद में एक सभा में मौलाना आजाद व गांधी जी दोनो को ही भाषण देना था। मुसलिम बहुल समाज था। महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की गई थी। उनके सामने चिक डाल दी गई , ताकि उनकी निगाह वक्ता व श्रोतागणों पर तथा श्रोताओं की निगाह उन पर न पड़े । बुरके और चिक के बाद भी सभा आयोजकों में असमंजस था कि कहीं महिलाओ का मुँह खुला न दीखे । वे बोले-``मौलाना आजाद व गांधी जी तब बोलें तो आँख पर पट्टी बाँध लें । इस हास्यास्पद सुझाव पर मौलाना ने कहा-``मैं महिलाओं की ओर पीठ कर लूँगा ´। गांधी जी बाले-``मैं नीचे निगाह करके बोलूँगा ।´´ मौलाना का भाषण तो समाप्त हुआ, पर जब गाँधी जी ने बोलना प्रारम्भ किया तो सारी मुसलिम महिलाएँ बुरका खोल, चिक हटाकर मंच के सामने बैठ गई । अग्रगामी स्त्रियों का कहना था-``पीरों से भी कोई परदा किया जाता है। ´´

यह अपने आप में एक क्रांतिकारी आरंभ था, जो बाद में आंदोलन रुप लेकर बड़ा बना । बाद में राजर्षि टंड़न ने कहा-`` यदि सभी महिलाएँ पुरुषों को पीर (महात्मा) व पुरूष स्त्रियों को देवी स्वरुप मानने लगे। तो इस प्रथा को आमूलचूल नष्ट हाने में काई देर न लगे।´´
                                                                                                                                                                आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम

एक बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई । दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपये की बिकती, पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य केवल आठ-दस आने से अधिक न मिलता । हाट से लौटने पर बेटे को पास बैठाकर बाप, उसकी मूर्तियों में रही त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए कहता । यह क्रम वर्षों चलता रहा । लड़का समझदार था। उसने पिता की बातें ध्यान से सुनीं और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा ।

कुछ समय बाद लड़के की मूर्तिया भी डेढ़ रुपये की बिकने लगीं । बाप भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता । बेटे ने और अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी । मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपये की बिकने लगी। सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप ने तब भी बंद न किया । एक दिन बेटे ने झुँझलाकर कहा - ``आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नही करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे मूर्ति के पाँच रुपये मिलते है जबकि आप को दो ही रुपये।´´

बाप ने कहाँ-``पुत्र ! जब मै तुम्हारी उम्र का था, तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया । तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपये से अधिक की मूर्तियाँ न बना सका । मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो । अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो, ताकि बहुमुल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रंणी में पहुँच सको।´´



श्रद्धापूर्वक

समुद्र से जल भरकर लौट रहे मरुत्गणों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया । मरुत् विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुए और युद्ध ठानने को तैयार हो गए।

विंध्याचल ने बडे़ सौम्य भाव से कहा-`` महाभाग ! हम आपसे युद्ध करना नहीं चाहते, हमारी तो एक ही अभिलाषा है कि आप यह जो जल लिए जा रहे हैं, वह आपको जिस उदारता के साथ दिया गया हैं। आप भी इसे उसी उदारता के साथ प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो ? ´´ मरुत्गणों को अपने अपमान की पड़ी थी, सो वे शिखर से भिड़ गए, पर जितना युद्ध उन्होनें किया , उतना ही उनका बल क्षीण होता गया और धरती को अपने आप जल मिल गया । मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर अपना काम करा ही लेता है , पर श्रद्धापूर्वक करने का तो आनंद ही कुछ और है।




कबीर

कबीर की ख्याति चारों ओर सिद्ध पुरूष की थी । दूर-दूर से जिज्ञासु आते, तब भी वे पहले की तरह कपड़ा बनाते और सत्संग चलाते । एक शिष्य ने पूछा-``आप जब साधारण थे तब कपड़ा बुनना ठीक था, पर अब आप एक सिद्ध पुरूष है और निर्वाह की भी कमी नहीं, फिर कपड़ा क्यों बुनते हैं ?

कबीर ने सरल भाव से कहा-``पहले मैं पेट पालने के लिए बुनता था, पर अब मैं जनसमाज में समाए भगवान का तन ढकने और अपना मनोयोग साधने के लिए बुनता हूँ । ´´ कार्य वही हो, पर दृष्टिकोण भिन्न हो तो सकता है ! यह जानकर शिष्य का समाधान हो गया ।
           आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

विवेक रहित अंधानुकरण

विवेक रहित अंधानुकरण सदैव हानिकारक ही सिद्ध होता है। जनमानस अज्ञानवश सुधरना तो दूर, बहिरंगी स्वरुप को देखकर जो चला आ रहा है, उसे ही श्रेयस्कर मानता व तदनुसार चलता रहता है। यहाँ तक तीर्थ-स्नान आदि पुण्य प्रयोजनों का बाहृ आडम्बर वाला स्वरुप भी शाश्वत चला आ रहा है।

मणियार ईश्वरभक्त था, किंतु उनका वैयक्तिक जीवन कुविचार और बुरे आचरणों में ग्रस्त होने के कारण अशांत था। उनकी धर्मपत्नी अबुर्द ने कहा-``स्वामी दु:ख और अशांति का कारण अस्वच्छ मन है। आप ज्ञान के प्रकाश से पहले अंतरतम को धो लें, तभी शांति मिलेगी।´´ मणियार ने कहा-``नहीं ! हम लोग तीर्थ-स्नान करने चलेंगे । तीर्थ-स्नान से मन पवित्र हो जाता है।´´

अबुर्द स्त्री थी, झुकना पड़ा । तीर्थयात्रा पर चलने से पूर्व उसने एक पोटली में कुछ आलू बाँध लिए । जहाँ-जहाँ मणियार ने स्नान किया, उसने इन आलूओं को भी स्नान कराया । घर लौटते-लौटेत आलू सड़ गए । अबुर्द ने उस दिन भोजन की थाली में वह आलू भी रख दिए, उनकी दुर्गंध पाकर मणियार चिल्लाया - `` यह दुर्गंध कहा से आ रही है ? ´´ अबुर्द ने हँसकर कहा - `` ये आलू तो तीर्थ-स्नान करने आए हैं, फिर भी दुर्गंध है क्या ?´
      आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

सेवा

1) यदि कोई आपको सफल होने में सहयोग देता हैं तो यह आपका भी कर्तव्य बन जाता हैं कि आप उसकी सच्ची सेवा करे।
-------------
2) घर वालो की सेवा करने का पुण्य नही होता, क्योंकि पुण्य को ममता खा जाती है।
-------------
3) इस युग को बदलेंगे कौन, जो कर सकते सेवा मौन।
-------------
4) महत्व इसका नहीं हैं कि हमारे कितने सेवक हैं ? महत्व इसका हैं कि हममें कितना सेवाभाव हैं।
-------------
5) जिसकी अंतरात्मा में विश्वमानव की सेवा करने, इस संसार को अधिक सुन्दर-सुव्यवस्थित एवं सुखी बनाने की भावनाएं उठती रहती हैं और इस मार्ग में चलने की प्रबल प्रेरणायें होती हैं, वस्तुत: सच्चा परमार्थी और ईश्वरभक्त वही है।
-------------
6) जिसका स्वभाव बडो को प्रणाम करने, वृद्ध जनों की सेवा करने का हैं, ऐसे मनुष्य के चार पदार्थ बढते हैं-आयु, विद्या, यश और बल।
-------------
7) नि:स्वार्थ सेवा से अहंकार टूटता हैं, व्यक्ति के अन्दर पवित्र भावना जन्म लेती है।
-------------
8) निस्वार्थ सेवा करने में जिसे स्वयं की भी सुध न रहे उसके हितो की रक्षा स्वयं भगवान को करनी पडती है।
-------------
9) हमें मनुष्य शरीर में आकर दो काम करने है-सेवा करना और भगवान् को याद रखना है।
-------------
10) प्रसन्न रहना ईश्वर की सबसे बडी सेवा है।
-------------
11) संसार में सबसे बडे अधिकार सेवा और त्याग से ही मिलते हैं।
-------------
12) सेवा करके भूल जाओ।
-------------
13) सेवा ही वह सीमेंट हैं जो लोगों को जीवन पर्यन्त स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकती हैं।
-------------
14) सेवा भाव से सन्तोष बढता हैं और अहसान के भाव से अहंकार पनपता है।
-------------
15) सन्यासी के लिये सेवा कार्य छोडने की जरुरत नहीं हैं, अहंकार और आसक्ति छोडने की जरुरत है।
-------------
16) उदारता, सेवा, सहानुभूति और मधुरता का व्यवहार ही परमार्थ का सार है।
-------------
17) वृद्धों की सेवा से दिव्य ज्ञान होता है।
-------------
18) तुम्हे दया और सेवा करने के लिये भेजा गया हैं, सताने और छीनने के लिये नहीं।
-------------
19) जो हाथ सेवा के लिये आगे बढते हैं वे प्रार्थना करने वाले ओंठो से अधिक पवित्र है।
-------------
20) जो सेवा करते नहीं, प्रत्युत सेवा लेते हैं, उनके लिये जमाना खराब आया है। सेवा करने वाले के लिये तो बहुत बिढया जमाना आया है।
-------------
21) जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।
-------------
22) जो लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश का इच्छुक हैं उसे साधक पहले बनना चाहिये।
-------------
23) अहंकार को गलाने के लिये निष्काम सेवाभाव एकमात्र उपाय है।
-------------
24) अपना सुधार संसार की सबसे बडी सेवा है।
-------------

सत्य

1) यदि कुछ बोलने की इच्छा हो तो सदा सत्य और मधुर तथा हितकारी वचन बोलो।
----------------
2) यह एक अनुभूत सत्य हैं कि सफलताएं हमेशा ही तप व पुण्य का परिणाम होती है।
----------------
3) सिक्के से वस्तु, वस्तु से व्यक्ति, व्यक्ति से विवेक तथा विवेक से सत्य को अधिक महत्त्व देना चाहिये।
----------------
4) जिसके साथ सत्य हैं वह अकेला होते हुए भी बहुमत में है।
----------------
5) निर्मल अन्त:करण को जो प्रतीत हो, वही सत्य है।
----------------
6) शान्ति से क्रोध को, भलाई से बुराई को, शार्य से दुष्टता को और असत्य को सत्य से जीते।
----------------
7) सोते रहना ही कलियुग हैं, उंघते रहना ही द्वापर हैं, उठ बैठना त्रेता हैं और कार्य में लग जाना सतयुग है। इसलिये काम करो, काम करो।

----------------
8) सच्चाई और इमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थायी प्रगति का आधार है। अकेला संघर्ष ही कॉफी नहीं, उसमें सत्य का समन्वय होगा, तो ही भीतरी शक्ति का आशीर्वाद मिलेगा।

----------------
9) सत्य की प्राप्ति के लिये सत्यभाषण की बडी आवश्यकता है।

----------------
10) सत्य की चेष्टा कभी व्यर्थ नहीं जाती।

----------------
11) सत्य का सर्वश्रेष्ठ अभिनन्दन यह हैं कि हम उसको आचरण में लायें।

----------------
12) सत्य के लिए सहना ही तप है।

----------------
13) सत्य के सूर्य को कभी असत्य के बादल नहीं ढक सकते।

----------------
14) सत्य परायण मनुष्य किसी से घृणा नहीं करता है।

----------------
15) सत्य सरल और असत्य कठिन होता है।

----------------
16) सत्य तक वे लोग पहुंचते हैं, जो सरल हैं, निश्छल हैं और शुद्ध भाव से प्रयत्न करते है।

----------------
17) सत्य, प्रिय, मधुर, अल्प और हितकर भाषण कीजिये।

----------------
18) सतयुग अब आयेगा कब, बहुमत जब चाहेगा तब।

----------------
19) सत्-मार्ग के पथिक बनो।

----------------
20) सत्कर्म की प्रेरणा देने से बढकर और कोई पुण्य हो ही नहीं सकता।

----------------
21) सत्कर्म, सत्चर्चा, सिच्चन्तन और सत्संग- ये चार उत्तरोत्तर श्रेष्ठ साधन है।

----------------
22) सतसंग का मतलब हैं-सत्य से गहरा सानिध्य।

----------------
23) सन्देह में सज्जन के अन्त:करण की प्रवर्ति ही सत्य का निर्देशन करती है।

----------------
24) दर्शन विश्वास हैं , परन्तु अनुभव नग्न सत्य है।

----------------

प्रेम प्यार

1) मिलता हैं उसको प्रभु प्यार, जो करता हैं आत्म सुधार।
-------------
2) हम प्यार करना सीखें,हममें,अपने आप में,अपनी आत्मा और जीवन में,परिवार में, समाज में और ईश्वर में,दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती प्रतिध्वनि का भाव-भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना,यही जीवन की सफलता हैं।
-------------
3) प्यार, प्यार और प्यार यही हमारा मन्त्र हैं। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है।
-------------
4) सबको प्यार बॉटो, आत्मीयता दो।
-------------
5) सत्कर्मों में डूबे रहना ही सही अर्थों में जिंदगी से प्यार करते रहना है।
-------------
6) अधिकारों का वह हकदार, जिसको कर्तव्यों से प्यार।
-------------
7) लोग प्यार करना सीखे। हममें, अपने आप में, अपनी आत्मा और जीवन में , परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में दसों दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुयी प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
-------------
8) यदि पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास की प्रगाढता हैं तो परिवार में सर्वत्र प्रेम, स्नेह, श्रद्धा व सेवा की भावना बनी रहेगी।
-------------
9) हृदय में प्रेम रहे, बुद्धि में विवेक रहे और शरीर उपकार में लगा रहे।
-------------
10) इच्छा में सरलता और प्रेम में पवित्रता का विकास जितना अधिक होगा, उतनी ही अधिक श्रद्धा बलवान होगी। सरलता द्वारा परमात्मा की भावानुभूति होती हैं और पवित्र प्रेम के माध्यम से उसकी रसानुभूति । श्रद्धा दोनो का ही सम्मिलित स्वरुप हैं, उसमें भावना भी हैं और रस भी।
-------------
11) मनुष्य की एक विशेशता हैं-मलिनता से घृणा और स्वच्छता से प्रेम।
-------------
12) विपित्त तुम्हारे प्रेम की कसौटी है।
-------------
13) विश्व प्रेम ही लोकतन्त्र हैं, अन्तर क्रान्ति महान् मन्त्र है।
-------------
14) जिस प्रकार शरीर के क्रिया-कलाप में प्राणतत्व की महत्ता हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्रेम-तत्त्व का आधिपत्य है।
-------------
15) जिसमें प्रेम-भावना नहीं, वह न तो आस्तिक हैं और न ईश्वर भक्त, न भजन जानता हैं न पूजन। निष्ठुर, नीरस , निर्दय , सूखे , तीखे, स्वार्थी, संकीर्ण, कडुए, कर्कश, निन्दक प्रवृत्ति के मनुष्यों को आत्मिक दृष्टि से नास्तिक एवं अनात्मवादी ही कहा जायेगा, भले ही वे घण्टो पूजा-पाठ करते हो अथवा व्रत-उपासना, स्नान-ध्यान, तीर्थ-पूजन, कथा-कीर्तन करने में घण्टो लगाते रहे हो।
-------------
16) जिसने प्रेम का विरह न जाना हो, जो प्रेम में रोया न हो, उसे तो प्रार्थना की तरफ इंगित भी नहीं किया जा सकता। इसलिये मैं प्रेम का पक्षपाती हूं, प्रेम का उपदेष्टा हू। कहता हूं खूब प्रेम करो। क्योकि प्रेम का निचोड एक दिन प्रार्थना बनेगा। प्रेम के हजार फूलो को निचोडोगे, तब कहीं प्रार्थना की एक बूंद, एक इत्र की बूंद बनेगा। ओशो।
-------------
17) भगवान की भाषा प्रेम की हैं।
-------------
18) पवित्र बनने के लिए प्रेम की ऑंख चाहिए। पुण्यवान बनने के लिए श्रद्धा की ऑंख चाहिए। प्रसन्न रहने के लिए आशा की ऑंख चाहिए। प्रभु दर्शन पाने के लिए प्रतीक्षा की ऑंख चाहिए।
-------------
19) परमात्मा पूजा से नही, प्रेम से मिलता है।
-------------
20) प्रेम की ही पराकाष्ठा प्रार्थना बन जाती है।
-------------
21) प्रेम को जगाओ। और मै जानता हूँ कि तुम परमात्मा के प्रेम में एकदम नहीं पड सकते। तुमने अभी पृथ्वी का प्रेम भी नहीं जाना, तुम स्वर्ग का प्रेम कैसे जान पाओगे ? इसलिये मैं निरन्तर कह रहा हूँ कि मेरा संदेश प्रेम का हैं। पृथ्वी के प्रेम को तो जानो, तो फिर वही प्रेम तुम्हे परमात्मा के प्रेम की तरफ ले चलेगा। ओशो।।
-------------
22) प्रेम के बिना ज्ञान बिना मल्लाह की नौका है।
-------------
23) प्रेम में मनुष्य सब कुछ देकर भी यह सोचता हैं कि अभी कम दिया है।
-------------
24) प्रेम में स्थिरता और दीर्घता लाने के लिए मनुष्य के पास विशाल मस्तिष्क भी होना चाहिये।
-------------

मनुष्य

1) चिन्ताशील व्यक्ति खाली और खोखले होते हैं, तथा चिन्तनशील व्यक्ति खरे और स्वस्थ होते है।
-----------------------
2) चिन्तन की उत्कृष्टता-निकृष्टता के आधार पर ही व्यक्ति देव और असुर बनता है।
-----------------------
3) जिसे सीखने की भूख हैं वह प्रत्येक व्यक्ति और घटना से सीख लेता है।
-----------------------
4) निखरा व्यक्तित्व अनायास ही आवश्यक साधन-सुविधा एवं सहायता दबोच लेता है।
-----------------------
5) हर महान् व्यक्तित्व को प्रकृति ने आपदाओ और विषमताओं की छेनी-हथौडी से उन्हे गढा-निखारा और संवारा है।
-----------------------
6) हर व्यक्ति की विशेषताओं को देखे और अपनी कमजोरियों को दूर करे।
-----------------------
7) भूले वे हैं जो अपराध की श्रेणी में नहीं आती, पर व्यक्ति के विकास में बाधक है।
-----------------------
8) पूर्णत: भले व्यक्ति सिर्फ दो हैं, एक वह जो मर गया और दूसरा वह जो अभी पैदा नहीं हुआ।
-----------------------
9) प्राचीन समय में जब धरती का वातावरण सतयुगी था तो प्रत्येक व्यक्ति उत्कृष्ट चिन्तन और श्रेष्ठ आचरण वाला ऋषि पैदा हुआ करता था। तब उनकी जनसंख्या तैतीस करोड थी। इसी कारण कर्मकाण्डो में तैंतीस कोटि देवताओं के रुप में आज भी उनका आवाहन और स्थापन किया जाता हैं।

-----------------------
10) प्रसन्नचित्त व्यक्ति अधिक जीते है।

-----------------------
11) शब्द व्यक्ति की दरिद्रता को दर्शाते हैं, जबकि नि:शब्द अवस्था उसके अन्त:करण की महानता का द्योतक है।
-----------------------
12) संसार में किसी भी व्यक्ति की बाहरी क्रिया को देखकर कृपया निर्णय मत करना वरना तुम उस व्यक्ति के अपराधी बन जाओगे।
-----------------------
13) सद्भावना रखने वाला व्यक्ति सबसे भाग्यवान है।
-----------------------
14) उत्तम व्यक्ति की यह खासियत होती हैं कि वे किसी कार्य को अधुरा नहीं छोड़ते।
-----------------------
15) दूषित अन्त:करण का व्यक्ति चिन्ता की कालिमा से कलंकित रहता है।
-----------------------
16) व्यक्ति की तीन तस्वीरे हैं (1)लोग उसे किस रुप में समझते हैं।(2)वह किस रुप में जीता हैं।(3)वह किस रुप में अपने आपको प्रस्तुत करता हैं। तीना चित्रों में से पहला मान्यता का हैं, दूसरा यथार्थ का हैं और तीसरा अयथार्थ का है।
-----------------------
17) व्यक्ति के व्यवहार के यथार्थ कारण उसकी आंतरिक गहराइयों में छिपे होते है। व्यवहार की यदि जडें ढूंढनी हो तो निश्चित ही व्यक्ति के चरित्र एवं चिंतन की मिट्टी की परतों को खोदना होगा। चरित्र एवं चिंतन को सही ढंग से जाने बगैर व्यवहार की समग्र व्याख्या असंभव हैं।
-----------------------
18) व्यक्तित्व की गरिमा आत्मिक महानता पर निर्भर है।
-----------------------
19) व्यक्तित्व का प्रचार मत करो।
-----------------------
20) जो व्यक्ति दूसरों का भला चाहता हैं उसने अपना भला पहले ही कर लिया।
-----------------------
21) जो व्यक्ति अपने रहस्य को छिपाये रखता हैं, वह अपनी कुशलता अपने हाथ तें रखता है।
-----------------------
22) अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को बुधवार व शुक्रवार के अतिरिक्त अन्य दिनो में क्षौर कर्म नहीं करना चाहिए।
-----------------------
23) आस्थाहीनता व्यक्ति को अपराध की ओर ले जाती है।
-----------------------
24) आदमी वह ठीक हैं जिसका इरादा ठीक है।

LinkWithin

Blog Widget by LinkWithin