मंगलवार, 16 जून 2009

रोगोपचार

एक रोगी राजवैद्य शार्गंधर के समक्ष अपनी गाथा सुना रहा था। अपच, बेचैनी, अनिद्रा, दुर्बलता जैसे अनेक कष्ट व उपचार में ढेरों राशि नष्ट कर कोई लाभ न मिलने के कारण की वह राजवैद्य शार्गंधर के पास आया था। वैद्यराज ने उसे संयमयुक्त जीवन जीने व आहार-विहार के नियमों का पालन करने को कहा। रोगी बोला, `` यह सब तो मैं कर चुका हूँ । आप तो मुझे कोई औषधि दीजिए, ताकि मैं कमजोरी पर नियंत्रण पा सकूँ । पौष्टिक आहार आदि भी बना सकें तो ले लूंगा, पर आप मुझे फिर वैसा ही समर्थ बना दीजिए।´´ वैद्यराज बोले, `` वत्स ! तुमने संयम अपनाया होता तो मेरे पास आने की स्थिति ही नहीं आती। तुमने जीवनरस ही नहीं, जीने की सामर्थ्य एवं धन-संपदा भी इसी कारण खोई है। बाह्योपचारों से, पौष्टिक आहार आदि से ही स्वस्थ बना जा सका होता तो विलासी-समर्थों में कोई भी मधुमेह-अपच आदि का रोगी न होता । मूल कारण तुम्हारे अंदर है, बाहर नहीं। पहले अपने छिद्र बंद करो, अमृत का संचय करो और फिर देखो वह शरीर निर्माण में किस प्रकार जुट जाएगा।´´ रोगी ने सही दृष्टि पाई और जीवन को नए सॉंचे में ढाला। अपने बहिरंग व अंतरंग की अपव्ययी वृतियों पर रोक-थाम की और कुछ ही माह में स्वस्थ समर्थ हो गया।

क्रिया की प्रतिक्रिया

एक लड़का जंगल में गया हुआ था। चारों ओर सुनसान, उस बियाबान जंगल में हवाओं और पेड़ों के झूमने की ही आवाज आती थी। वह लड़का डरा और चिल्लाया, ` भूत।´ तो उसकी आवाज पहाड़ियों से टकराकर लौट आई और उसे सुनाई दिया, `भूत।´ लड़का समझा सचमुच भूत है। अब की बार उसने मुटि्ठयॉं कसीं और जोर से चिल्लाया, `` तू मुझे खायेगा।´´ पहाड़ो से टकराकर उसकी आवाज फिर लौट आई और उसने यही समझा कि भूत मुझसे पूछ रहा है। तब वह बोला, `` हॉं मैं तुझे खाउंगा।´´ यही आवाज जब फिर उस तक लौटी तो लड़का डरकर अपने घर चला गया और उसने अपनी मॉं से सारी बात कह दी। मॉं ने वस्तुस्थिति समझकर कहा, `` बेटा अब की बार तुम जंगल में जाओ तो उस भूत से कहना मेरे प्यारे दोस्त मैं तुझे प्रेम करता हूं। दोबारा जब वह जंगल में गया तो चिल्लाया,`` मेरे अजीज दोस्त।´´ पहाड़ों से उन्ही शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई दी और लड़के ने समझा, इस बार भूत उसे डरा नहीं रहा है। फिर वह बोला `` मैं तुझे प्यार करता हूँ।´´ पहाड़ो से यही बात फिर टकराकर लौटी तो लड़का खुशी से नाच उठा। क्रिया की प्रतिक्रिया प्रकृति का एक शाष्वत नियम है।

आपका अनन्य भक्त

देवता वरदान बॉंटने धरती पर आए, तो लोगों की अपार भीड़ अपनी-अपनी मनोकानाएं लेकर आ जुटी। किसी ने यष माँगा, किसी ने धन, किसी ने पद तो किसी ने कुछ और। देवता सबकी वांछित मनोकामनाएं पूरी करते चले गए। एक विद्रुप सा व्यक्ति हाथ जोड़े कोने में खड़ा था। देवता ने पास बुलाकर कहा-``तात् ! तुम्हें भी जो कुछ माँगना हो, माँग लो।उसने कहा-`` मेरी याचना तो छोटी सी है। जिन लोगों ने धन माँगा हैं, उनके पते मुझे बताने की कृपा करें। फिर मैं अपनी मनोकामना स्वयं ही पूरी कर लूँगा।´´

देवता ने आश्चर्य से पूछा-`` आखिर तुम हो कौन ? ´´ उस व्यक्ति ने कहा-`` व्यसन, अनावश्यक धन को विकेंद्रित करने में संलग्न आपका अनन्य भक्त।´´

चोकर की उपयोगिता

गेहूँ के आटे को छानकर जो चोकर अलग किया जाता है, वह कितना गुणकारी है, यह जानना जरूरी है। यह कब्ज की अद्धितीय प्राकृतिक औषधि है। यह आँतों में उत्तेजना पैदा नही करता तथा कैन्सर से दू र रखता है ( यह प्रयोग द्वारा प्रमाणित होगया है। अमाशय के घाव (पेप्टिक अल्सर),आँतों के विभिन्न रोग, उच्च कोलेस्टेरॉल से भी यह बचाता है। चोकर खाने वालों को कभी पाइल्स, भगंदर या मलाशय का कैन्सर नही होता है। मोटापा घटाने के लिए चोकर एक नीरापद औषधि है। मधुमेह निवारण में भी चोकर मदद करता है। चोकर मिश्रित आटा रोटी को और भी स्वादिष्ट बना देता है । गेहू का चोकर एक आदर्श रेशा (फाइबर डाइट) है। हम आज कि जीवन शैली में मैदे वाली रोटी खाते हैं एवं चोकर के इतने लाभों को पाने के लिए बच सकते है। 

जड़े मजबूत रखना

एक रात भयंकर तूफान आया । सैकड़ों विशालकाय पुराने वृक्ष धराशायी हो गए। अनेक किशोर वृक्ष भी थे, जो बच गए थे, पर बुरी तरह सकपकाए खड़े थे।

प्रात:काल आया, सूर्य ने अपनी किरणें धरती पर फैलाई । ड़रे हुए वृक्षों को देखकर किरणों ने पूछा-``तात! तुम इतना सहमे हुए क्यों हो ? ´´ किशोर वृक्षों ने कहा-``देवियो! ऊपर देखो ,हमारे कितने पुरखे धराशायी पड़े हैं ।रात के तूफान ने उन्हें उखाड़ फेंका । न जाने कब यही स्थिति हमारी भी आ बने।´´ किरणें हँसी और बोलीं-``तात! आओ, इधर देखो ! यह वृक्ष तूफान के कारण नही, जड़े खोखली हो जाने के कारण गिरे। तुम अपनी जड़े मजबूत रखना तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा।´´ 

सोमवार, 15 जून 2009

परदा प्रथा

परदा प्रथा एक ऐसी सड़ी-गली परंपरा है, जो न्यूनाधिक रुप में समाज में चारों ओर व्याप्त है। उसके उन्मूलन हेतु इस सदी के प्रारंभ से ही प्रयास चलते आए हैं। महात्मा गांधी के जीवन की एक घटना है, जो बताती है इस प्रथा के प्रति आक्रोश महिलाओं की ओर से कैसे उभरकर आया ?

इलाहाबाद में एक सभा में मौलाना आजाद व गांधी जी दोनो को ही भाषण देना था। मुसलिम बहुल समाज था। महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की गई थी। उनके सामने चिक डाल दी गई , ताकि उनकी निगाह वक्ता व श्रोतागणों पर तथा श्रोताओं की निगाह उन पर न पड़े । बुरके और चिक के बाद भी सभा आयोजकों में असमंजस था कि कहीं महिलाओ का मुँह खुला न दीखे । वे बोले-``मौलाना आजाद व गांधी जी तब बोलें तो आँख पर पट्टी बाँध लें । इस हास्यास्पद सुझाव पर मौलाना ने कहा-``मैं महिलाओं की ओर पीठ कर लूँगा। गांधी जी बाले-``मैं नीचे निगाह करके बोलूँगा ।´´ मौलाना का भाषण तो समाप्त हुआ, पर जब गांधी जी ने बोलना चालु किया तो सारी मुसलिम महिलाएँ बुरका खोल, चिक हटाकर मंच के सामने बैठ गई । अग्रगामी स्त्रियों का कहना था-``पीरों से भी कोई परदा किया जाता है। ´´ यह अपने आप में एक क्रांतिकारी आरंभ था, जो बाद में आंदोलन रुप लेकर बड़ा बना । बाद में राजर्षि टंड़न ने कहा-`` यदि सभी महिलाएँ पुरुषों को पीर (महात्मा) व पुरूष स्त्रियों को देवी स्वरुप मानने लगे। तो इस प्रथा को आमूलचूल नष्ट हाने में काई देर न लगे।´´

सुधार

एक बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई । दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपये की बिकती, पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य केवल आठ-दस आने से अधिक न मिलता । हाट से लौटने पर बेटे को पास बैठाकर बाप, उसकी मूर्तियों में रही त्रुटियों को समझता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए कहता । यह क्रम वर्षों चलता रहा । लड़का समझदार था। उसने पिता की बातें ध्यान से सुनीं और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा ।

कुछ समय बाद लड़के की मूर्तिया भी डेढ़ रुपये की बिकने लगीं । बाप भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता । बेटे ने और अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी । मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपये की बिकने लगी। सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप ने तब भी बंद न किया । एक दिन बेटे ने झुँझलाकर कहा - ``आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नही करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे मूर्ति के पाँच रुपये मिलते है जबकि आप को दो ही रुपये।´´

बाप ने कहाँ-``पुत्र ! जब मै तुम्हारी उम्र का था, तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया । तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपये से अधिक की मूर्तियाँ न बना सका । मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो । अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो , ताकि बहुमुल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको।´´ 

श्रद्धा

समुद्र से जल भरकर लौट रहे मरुत्गणों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया । मरुत् विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुए और युद्ध करने को तैयार हो गए।
विंध्याचल ने बडे़ सौम्य भाव से कहा-`` महाभाग ! हम आपसे युद्ध करना नहीं चाहते, हमारी तो एक ही अभीलाषा है कि आप यह जो जल लिए जा रहे हैं, वह आपको जिस उदारता के साथ दिया गया हैं, उसी उदारता के साथ आप भी इसे प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो ? ´´ मरुत्गणों को अपने अपमान की पड़ी थी, सो वे शिखर से भिड़ गए, पर जितना युद्ध उन्होनें किया , उतना ही उनका बल क्षीण होता गया और धरती को अपने आप जल मिल गया । मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर अपना काम करा ही लेता है , पर श्रद्धापूर्वक करने का तो आनंद ही कुछ और है।

ईश्वरचंद विद्यासागर

ईश्वरचंद विद्यासागर एक दिन अपने मित्र के साथ अनिवार्य कार्य से जा रहे थे। रास्तें में हैजे से पीड़ित एक दीन-हीन व्यक्ति मुर्छित अवस्था में पड़ा मिला । विद्यासागर उनकी सफाई करके पास के अस्पताल मे पहुँचाने का उपक्रम करने लगे । साथी मित्र ने कहा- ``हम लोग आवश्यक काम से जा रहे है, यह काम तो काई भी कर लेगा, हम लोग अपना कार्य क्यों छोडें ? विद्यासागर ने कहा-``मानवता की सेवा से बढकर और कोई काम बड़ा हो ही नहीं सकता । इस निस्सहाय पीड़ित की उपेक्षा करके हम अपनी निष्ठुरता का प्रदर्शन ही करेंगे। निष्ठुर का कोई कार्य भला नहीं कहा जा सकता ।´´

महर्षि रमण

महर्षि रमण एक सिद्ध पुरूष थे । मौन ही उनकी भाषा थी । उनके सान्निध्य में सत्संग के माध्यम से सबको एक जैसे ही संदेश मिलते थे, मानों वे वाणी से प्रवचन देकर उठे हों। सत्संग के स्थान पर उस प्रदेश के निवासी कितने ही प्राणी नियत स्थान और नियत समय पर , उनका संदेश सुनने आया करते थे । बंदर, तोते, साँप, कौए सभी को ऐसा अभ्यास हो गया कि आगंतुको की भीड़ से बिना डरे-झिझके अपने नियत स्थान पर आ बेठते थै । मौन सत्संग समाप्त होते ही अपने घोंसलो व स्थानों को चल दिया करते थे । महापुरुष का सान्निध्य होता ही ऐसा विलक्षण है।

ठक्कर बापा

मुंबई कार्पोरेशन में एक इंजिनियर की नौकरी पाने के बाद वह युवा निरंतर भ्रमण करता । उसे स्वच्छता और प्रकाश की व्यवस्था सौंपी गई । उसे मेहतरों की बस्तियों में जाने के बाद, उनकी दुरवस्था देखने का अवसर मिला । बच्चे असहाय, अशिक्षित, गंदे थे । पुरूष शराब पीते-लड़ते व पत्नियाँ दिन भर बच्चों से मार-पीट करतीं। जुए-शराब ने सभी को कर्जदार बना दिया था। इस प्रत्यक्ष नरक को देखकर उस इंजीनियर ने अपनी आधिकारिक स्थिति के मुताबिक कुछ प्रयास किए, पर कही से कोई सहयोग न मिलने पर नौकरी छोड़ दी और `भारत सेवक समाज´ का आजीवन सदस्य बन गया । उसने सारा जीवन गंदी बस्तियों में अछूतो के उद्धार, उन्हे शिक्षा देने , गंदी आदतें छुड़वाने, उन्हे साफ रखने के प्रयासों में लगा दिया । वही युवक `ठक्कर बापा ´ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । आज के शहरीकृत भारत को, जो और भी गंदा है, हजारो ठक्कर बापा चाहिए।

राजा राममोहन राय

सती प्रथा के विरुद्ध मोरचा खड़ा करने वाले एवं विधवा विवाह के प्रचंड समर्थक राजा राममोहन राय को इस दिशा मे लाने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है । उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई । परिवार के लोगो ने उनकी भोली स्त्री को आवेश दिला के नशीली चीजें खिला चिता पर बैठा दिया । कोई उनकी चीत्कार न सुन सके, इसलिए जोर-जोर से बाजे बजाने की व्यवस्था कर दी गई । धर्म के नाम पर चलने वाली इस नृशंसता को देख कर , राजाराम मोहन राय का दिल चीत्कार कर उठा । वे भाभी को बचा तो नही सके, पर उनने एक प्रचंड आंदोलन इसके विरुद्ध आरंभ किया । अँगरेजी सरकार ने कानून बनाकर सती प्रथा को रोक दिया । `विधवा विवाह मीमांसा´ नामक एक ग्रंथ उनने सारे पुरातन ग्रंथो का अध्ययन कर लिखा । उन्हे विचारशीलो का समर्थन मिलता चला गया । उनने एक हिंदू कॉलेज की भी स्थापना की । फैलती ईसाइयत से लड़ने मे इस विद्यालय ने बड़ी भूमिका निभाई

गुरुवार, 11 जून 2009

शहीद खुदीराम

खुदीराम को फाँसी हो गई । थोड़ी आयु में, जो थोड़ा-सा समय था, वह भी संघर्ष गुजरा कि देश, धर्म और समाज का पुनरुद्धार हो तो वे अंतिम समय में अपने अभीष्ट से कैसे हट जाते। फांसी के समय वे वेसी ही सजावट के साथ गए, जैसा बरात में सजा होता है। दिन भर उनकी कोठरी राष्ट्रीय गीतों से गूजँती रही, पर वे सदैव गहरी नींद में सोए । जेल अवधि में इनका वजन भी आश्चर्यजनक रुप से बढ गया । नित्य वे दंड-बैठक भी लगाते। जिस दिन उन्हें फाँसी होनी थी, प्रात: काल जल्दी उठे । उपासना की, व्यायाम किया । शरीर सँवारा, जैसे वरयात्रा में जाना हो। हँसते हुए गए। वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए , फाँसी के तख्ते पर झूल गए। 
धन्य है यह भूमि , जिसने ऐसे शहीदों को जन्म दिया ।

महान योगी चांगदेव

ऐसा कहा जाता है कि चांगदेव 1400 वर्षों से योग-साधना कर रहे थे । उन्हे भारत का महान योगी माना जाता था। ज्ञानेश्वर सहित तीनों अन्य भाई-बहनो की प्रशंसा सुन उनके मन में आया कि इनसे सत्यासत्य की जानकारी लूँ । प्रश्न रुप में एक सादा कागज भेज दिया । मुक्ताबाई के हाथ में पत्र आया तो वे हँस पड़ी । बोलीं-हमारे योगीराज वर्षों की तप-साधना के बावजूद कोरे ही रह गए। निवृतिनाथ ने इस व्यंग्य पर मुक्ताबाई को लताड़ा एवं पत्रवाहक से कहा- ``योगीराज को हमारी कुटिया पर आने का आमंत्रण दें। ´´योग का प्रभाव देखने के लिए, हाथ मे सर्प का चाबुक लिए, सिंह पर सवार, सभी शिष्यों के साथ, वे मिलने गए। आलिंदी में विराजमान ज्ञानेश्वर, जिस दिवार पर भाई-बहन सहित बैठे थे, उसी को सक्रिय कर स्वागत हेतु चल पड़े। चांगदेव ने यह चमत्कार देखा और श्रद्धावनत् हो, ज्ञानदेव से दीक्षित हुए । यह दीवार आज भी आलिंदी (महाराष्ट्र) में देखी जा सकती है।

लौहपुरुष सरदार पटेल

आज देश के सामने कोई समस्या आती है तो बरबस मुँह से निकल पड़ता है-`काश ! आज सरदार पटेल जीवित होते ।´ जर्मनी के एकीकरण में जो भूमिका विस्मार्क ने और जापान के एकीकरण में जो कार्य मिकाडो ने किया , उनसे बढकर सरदार पटेल का कार्य कहा जायेगा, जिनने भारत जैसे उपमहाद्वीप को, विभाजन की आँधी में टुकड़े-टुकड़े होने से रोका । किस प्रकार देशी राज्यों का एकीकरण संभव हो सका । इस पर विचार करते है तो आश्चर्य होता है । एक-दो नहीं, सैकड़ो राजा भारतवर्ष में विद्यमान थे। उनका एकीकरण सरदार पटेल जैसा कुशल नीतिज्ञ ही कर सकता था। इसी कारण उन्हें लौहपुरुष कहा जाता है। आज राष्ट्र वैसी ही परिस्थिति से गुजर रहा है। हमें फिर वैसी ही , उसी स्तर की जिजीविशा वाली शक्तियो की जरुरत है।

गुरु-शिष्य

चैत्र शुक्ल नवमी, रविवार, संवत् 1530 को जन्मे नारायण बालक को भगवान श्री राम का दास होने के कारण रामदास नाम मिला । बाद मे उनके शिष्यों ने उनकी शक्ति को देख, उन्हें समर्थ की उपाधि दी । देश की दशा को ठीक करना, लोकमत को जगाना और परमात्मा के प्रति विश्वास पैदा करना ही, उनका लक्ष्य होता था। शिवाजी को उनने अपने कार्य का निमित्त बनाया । वैशाख शुक्ल नवमी, संवत् 1571 को उनने अपने प्रिय शिष्य शिवा को शिष्य बनाया- गुरुमंत्र दिया और प्रसाद रुप में एक नारियल, मुट्ठी भर मिट्टी दो मुट्टी लीद और चार मुट्टी पत्थर दिये, जो क्रमश: दृढ़ता, पार्थिवता, ऐश्वर्य एवं दुर्ग विजय के प्रतीक थे । महाराज शिवाजी राव ने गुरु का यह प्रसाद ग्रहण किया और साधु जीवन बिताने की अनुमति माँगी । 

समर्थ ने उन्हे समझाया- ``पीड़ितो की रक्षा तथा धर्म का उद्धार तुम्हारा कर्तव्य है। साधु वही है, जो कि अपनी वासना-तृष्णा, संकीर्ण स्वार्थपरता को त्यागकर ,निस्वार्थ भाव से देश-घर्म की रक्षा करे।´´ शिवाजी ने अपनी सैन्यशक्ति से हिंदू पद पादशाही के प्रवर्तक बनने, छत्रपति कहलाने का श्रेय प्राप्त किया । हजारो महावीर मठ ,जो समर्थ द्वारा स्थापित किए गए, वे प्रेरणा एवं जनसहयोग के स्त्रोत बने । परिणामस्वरुप मुगल साम्रज्य की जड़े खोखली हो गई, वह गिरकर ढेर हो गया । सारा श्रेय गुरु-शिष्य की इस जोड़ी को जाता है

रफी अहमद किदवई साहब

रफी अहमद किदवई साहब के एक मित्र की पुत्री का विवाह था। उनसे किदवई साहब का राजनीतिक विरोध था। बोल-चाल तक नही थी । यहाँ तक कि उनने किदवई साहब को विवाह में आमंत्रित तक न किया, किन्तु वे स्वयं वहाँ पहुँचे ओर कन्या को आशीर्वाद दिया ।

उन सज्जन ने जब अपने प्रतिद्वंदी रफी साहब को वहाँ देखा तो पश्चाताप, आत्मग्लानि और स्नेह का प्रवाह उमड़ा कि वे रफी साहब के गले लिपठ गए और क्षमा-याचना करने लगे। रफी साहब विनम्र स्वर में , इतना ही बोले-``आपका -हमारा राजनीतिक मतभेद हो सकता सदा के लिए, किंतु यह तो घर का मामला है । आपकी बेटी, मेरी बेटी है।´´ इस घटना से आपसी मनमुटाव समाप्त हो गया ।

ब्रह्म दर्शन

ब्रह्म दर्शन से मनुष्य चुप हो जाता है। जब तक दर्शन न हों तभी तक विचार होता है । घी जब तक पक न जाए, तभी तक आवाज करता है । पके घी से शब्द नहीं निकलता, पर पके घी में कच्ची पूरी छोड़ते ही फिर वैसा ही शब्द निकलता है । जब कच्ची पूरी को पका डाला, तब चुप हो जाती है। वैसे ही समाधिस्थपुरुश लोक-शिक्षण हेतु नीचे उतरता है, फिर बोलता है ।

-श्री रामकृष्ण परमहंस

संत रैदास

रैदास की एक बार इच्छा हुई कि वे चितौड़ की रानी झाली के यहाँ जाएँ , जिसने काशीवास में आमंत्रण दिया था। संत के आने पर एक भंडारा हुआ। सभी विद्वज्जनो को आमंत्रण गया। एक अछूत चमड़ा गाँठने वाले का इतना सम्मान देख ब्राह्मणो ने यह निर्णय लिया कि आवश्वक खाद्य सामग्री लेकर वे स्वयं भोजन बनाएँगे। जब वे अलग से भोजन करने बैठे तो देखा कि हर ब्राह्मण पंड़ित की बगल में एक रैदास बैठे हैं। सभी रैदास के चरणो में गिर पड़े और क्षमा माँगी ।

बुधवार, 10 जून 2009

महापुरूष रामतीर्थ

22 अक्टूम्बर, 1873 को गुजरांवाला में एक बालक जन्मा । नाम रखा गया - तीर्थराम। पढने-लिखने में कुशल तीर्थराम ने पंजाब भर में प्रथम स्थान प्राप्त एंट्रेंस परीक्षा उत्तीर्ण की। लाहौर जैसे शहर में छात्रवृति एवं ट्यूशन द्वारा खरच निकालकर वे पढते रहे । बीए. में फिर वे प्रथम आए । एम.ए. का फार्म भर रहे थे तो अँगरेज प्रिंसिपल ने बडे़ स्नेह से पूछा-``क्या मैं तुम्हारा नाम इंडियन सिविल सर्विसेज (आई.सी.एस.) के लिए भेज दूँ । तुम योग्य हो।´´ तीर्थराम बोले -``मेने यह ज्ञान का खजाना धन या उच्च पद पाने के लिए नहीं पाया । मै इस दौलत को बाँटना चाहता हूँ । मै सारा जीवन प्रभु की इस मानव जाति की सेवा करुँगा। तीर्थराम पर स्वामी विवेकानंद, जो उनसे दस वर्ष बडे थे, का बड़ा प्रभाव था । एक दिन वे उत्तराखंड के जंगलो की और निकल गए। नारायण स्वामी से उनका साक्षात्कार हुआ, यहीं वे रामतीर्थ बने। टेहरी नरेश के आग्रह पर, वे टोकियो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेललन में गए। जापान, अमेरिका, यूरोप, तथा मिस्र में उनने व्यावहारिक वेदांत की शिक्षा दी । सन् 1906 की दीपावली पर उनकी लिखी `मौत का आह्वान´ नामक रचना अपने शिष्य को सौपने के बाद तैतीस वर्ष आयु में ही भागीरथी में जल समाधि ले ली ।

धन्य है वह देश , जहाँ ऐसे महापुरूष जन्मे।

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