शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

नैतिकता एक गरिमापूर्ण जीवन शैली है...

1) जगत् में कुछ भी मुश्कित नहीं, केवल संकल्प की दृढता चाहिये।
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2) न इतने कठोर बनो कि लोग तुमसे डरने लगे और न इतने को कि लोग सिर चढे।
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3) न अशुभ सोचें, न दोष ढूँढे, न अन्धकार में भटके।
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4) न्यायसंगत बात कहने के लिये हर समय उपयुक्त है।
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5) नशा (व्यसन) उज्ज्वल मन का भयानक अन्धकार है।
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6) नकारात्मक विचार व्यक्ति की शक्ति क्षीण करते है।
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7) नम्र बनेंगे तो लोग नमन करते हुए सहयोग देगे।
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8) नम्रता, भक्ति, श्रद्धा और विश्वास के बगैर कोई धर्म नहीं रह सकता है।
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9) नम्रता, प्रेमपूर्ण व्यवहार तथा सहनशीलता से मनुष्य तो क्या देवता भी वश में हो जाते है।
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10) नहीं विरोधी से भी द्वेष, यह अपना सिद्धान्त विशेष।
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11) नहीं वस्तु कोई बेकार, दृष्टि चाहिये परखनहार।
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12) नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की ओर निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है।
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13) नरक और कहीं नहीं, महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले जीवन में है।
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14) नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नही, आदर्शो की अवहेलना को कहते है।
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15) नेतृत्व जीवन के क्रिया-कलापों द्वारा किया जाता हैं, बातों से नही।
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16) नारी का सम्मान जहाँ, संस्कृति का उत्थान वहाँ।
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17) नारी का असली श्रंगार, सादा जीवन उच्च विचार।
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18) नारी के बिना पुरुष की बाल्यावस्था असहाय, युवावस्था आनन्दरहित और वृद्धावस्था सांत्वना शून्य हो जाती है।
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19) नारी के प्रति भोग्या भाव, यह हैं पशुओं का बर्ताव।
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20) नारी पवित्रता की धुरी है।
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21) नाशवान् में मोह होता हैं, अविनाशी में प्रेम होता है।
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22) नवयुग यदि आयेगा तो विचार-शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नहीं, विचारों की विचारों से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद्विचारों की प्रतिष्ठापना द्वारा ही सम्भव होगा।
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23) नैतिक बल के विकास के समानुपातिक आत्मबल का विकास होता है।
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24) नैतिकता एक गरिमापूर्ण जीवन शैली है।

आत्मा की जिज्ञासा...

जो आत्मा की जिज्ञासा नहीं करता और उसे मुक्त करने के प्रयत्नो की ओर से विमुख हैं, वह जन्म-जन्मान्तरो तक इस प्रकार ही दुःख भोगता रहेगा, जिस प्रकार वर्तमान में भोग रहा हैं। ज्ञान के अतिरिक्त इस भ्रामक भव-रोग की अन्य कोई ओषधि नहीं, जिसकी प्राप्ति विद्या बल पर ही की जा सकती हैं।

जागरुकता की स्थिति...

जागरुकता की स्थिति में हम अपनी शक्तियों को पहचानते हैं, संभावनाओं से अवगत होते हैं। मनःस्थिति की सही पहचान एवं परिस्थितियों का सार्थक सदुपयोग इसी स्थिति में होता है। साथ ही हम यह भी जान पाते हैं कि मनःस्थिति एवं परिस्थिति के वे अवरोध कौन से है, जिनकी वजह से हम आज तक अपनी संभावनाओं को साकार नहीं कर पाए, स्वयं की शक्तियों को सही अभिव्यक्ति नहीं दे सके, अपनी जिंदगी में सार्थकता की अनुभूति नहीं सँजो सके। इन अवरोधों का निराकरण भी जागरुक होने पर ही बन पडता है।

जागरुकता का अभाव ही लापरवाही है...

1) जो अपनी जरुरत के समय मदद माँगने में नहीं हिचके वास्तव में वही सबसे मजबूत है।
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2) जो अपनी जीवन शैली को नहीं बदल सकते हैं, उनमें हमारी तप-शक्ति भी विशेष काम नहीं कर पाती। परमपूज्यगुरुदेव।
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3) जो अपने को छोटा मानता हैं, वही वास्तव में बडा होता है।
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4) जो अपने को सबसे बडा ज्ञानी समझता हैं वह सामान्यतः सबसे बडा मूर्ख होता है।
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5) जो अपने हिस्से का काम किये बिना ही भोजन पाते हैं वे चोर है।
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6) जो अपने लिये नहीं ओरो के लिये जीते हैं वे जीवन मुक्त है।
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7) जो अपने प्रति वैरभाव रखता हो, उसकी प्रतिदिन सुबह-शाम मन-ही-मन परिक्रमा करके उसे दण्डवत प्रणाम करना चाहिये ऐसा करने से कुछ ही दिनों में वैरभाव मिट जाता है।
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8) जो अपने सेवक को अपना भेद देता हैं, वह अपने सेवक को अपना स्वामी बनाता है।
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9) जे आसानी से वायदा नहीं करता, वह उसे बेहद ईमानदारी से निभाता है।
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10) जो आदर्शो की पराकाष्ठा पर पहुँचने हेतु परमार्थ करता हैं, उसे धर्मराज कहते है।
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11) जो आदमी संकल्प कर सकता हैं, उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।
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12) जननी और जन्मभूमि-दोनो स्वर्ग से कहीं बढकर है।
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13) जो आलस्य और कुकर्म से जितना बचना चाहता हैं, वह ईश्वर का सबसे बडा भक्त हैं।
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14) जो टूटे को बनाना और रुठे को मनाना जानता हैं, वही बुद्धिमान है।
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15) जो लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश का इच्छुक हैं उसे साधक पहले बनना चाहिये।
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16) जो-जो भी विभूतियुक्त, एश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु हैं, उस-उस को प्रभु के तेज के अंश की अभिव्यक्ति मानना चाहिये।
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17) जानना वही सार्थक हैं, जो करके जान लिया जाये।
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18) जैसे विज्ञान में यन्त्र होते हैं वैसे ही अध्यात्म में मन्त्र होते है।
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19) जागरुकता का अभाव ही लापरवाही है।
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20) जागकर जीना सीखो, त्याग कर पाना सीखो।
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21) जागरण के बीज निद्रा में रहते है।
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22) जागो शक्ति स्वरुपा नारी, तुम हो दिव्य कान्ति चिन्गारी।
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23) जुबान की अपेक्षा, जीवन से शिक्षा देना कहीं अधिक प्रभावशाली है।
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24) जैसा अन्न खाते हैं, मन बुद्धि का निर्माण भी वैसा ही होता है।

Patrata.....

1) जो दूसरों से कहना और करना हैं, उसे कार्यान्वित करने के लिये शुभारम्भ अपने आप से करना चाहिये।
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2) जो व्यक्ति योग्य अतिथि का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत करता हैं, लक्ष्मी को उसके घर में वास करने से प्रसन्नता होती है।
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3) जो व्यक्ति रात्रि साढे ग्यारह से साढे बारह बजे तक अथवा ग्यारह से एक बजे तक जगकर भजन-स्मरण, नाम-जप करता हैं, उसको अन्त समय में मूर्च्छा नही आती और भगवान् की स्मृति बनी रहती है।
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4) जो व्यक्ति समाज में आत्म प्रदर्शन के लिये जितना उत्सुक हैं, वह उतना ही दुःखी है।
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5) जो व्यक्ति सागर के समान गम्भीर हैं, धैर्य उनका स्वाभाविक गुण होता है।
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6) जो व्यक्ति सत्य के साथ कर्तव्य-परायणता में लीन हैं, उसके मार्ग में बाधक होना कोई सरल कार्य नहीं है।
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7) जो व्यक्ति दूसरों का भला चाहता हैं उसने अपना भला पहले ही कर लिया।
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8) जो व्यक्ति वृक्ष लगाते हैं, अगले जन्म में वे उनके पुत्रों के रुप में जन्म लेते है।
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9) जो व्यक्ति अपने रहस्य को छिपाये रखता हैं, वह अपनी कुशलता अपने हाथ में रखता है।
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10) जो व्यक्ति आपको समय दे रहा हैं, समझिये वह आपको सबसे कीमती उपहार दे रहा है।
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11) जो वक्ता श्रोता को अज्ञानी समझकर बोलता हैं वह वक्ता स्वयं अज्ञानी हैं। क्योंकि यहाँ सबमें परमात्मा बैठा हैं। कौन यहाँ अज्ञानी हैं। ‘‘ईश्वर अंस जीव अबिनासी।’’
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12) जो वीरता से भरा हैं जिसका नाम लोग बडे गौरव से लेते हैं, शत्रु भी जिसके गुणों की प्रशंसा करते है, वही आदर्श पुरुष है।
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13) जो वास्तविक मौन को साध लेता हैं , वह भौतिक जीवन में गम्भीर, शान्त, सम्माननीय और वजनदार प्रतीत होता हैं, और आध्यात्मिक जीवन में ईश्वरोन्मुख बनता चला जाता है।
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14) जो चुनौतियों से डरता हैं उसका जीवन के संघर्ष में असफल होना तय है।
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15) जो फूल सूरज-मुख रहता हैं वह बादल-भरे दिनों में भी वैसा ही रहता है।
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16) जो तर्क करता हैं, मूर्ख हैं। जो तर्क सुनता नहीं, तानाशाह हैं। जो तर्क करने की हिम्मत नही रखता, गुलाम है।
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17) जो तुम दूसरों से चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो।
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18) जो जीवन साधना की डगर पर चलने के लिये उत्सुक एवं इच्छुक हैं, उन्हे अपने पहनावे के प्रति जागरुक होना चाहिये।
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19) जो जैसा सोचेगा वह वैसा हीं बनेगा।
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20) जो न पूर्ति अपनी कर पाते, वे मानव नर पशु कहाते।
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21) जो नर्म दिल हैं, विनम्र हैं, वही सबसे बडा सन्त है।
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22) जो अभिभावक अपनी सन्तान के लिये धन, वस्तु, सुख, आमोद-प्रमोद के साधन ही न छोडकर उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड जाते हैं, वे बहुत बडी सम्पति छोडते है।
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23) जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सका, वह परिस्थिति को क्या सुधारेगा।
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24) जो अपनी प्रसुप्त सुसंस्कारिता को जगाकर अपनी पात्रता विकसित कर लेता हैं, स्वयं भगवान उसे ढूँढने पहुँचते है।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

1) जो पाप का पश्चाताप करता हैं वह साधु हैं और जो पाप का अभिमान करता हैं वह शैतान है।
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2) जो पुरुष कार्य पूर्ण होने तक कार्यरत रहते है, उन्हे ही विजयश्री मिलती है।
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3) जो दूसरों के अवगुणो की चर्चा करता हैं वह अपने अवगुण प्रकट करता है।
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4) जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने की लिए विवश करती हैं, वे हमारी सबसे अधिक सहायक होती है।
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5) जो प्रतिशोध लेने का विचार करता हैं, वह अपने ही घाव को हरा रखता हैं, जो अब तक कभी का अच्छा हो गया होता।
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6) जो प्राप्त करना चाहते हो वह देना शुरु करो।
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7) जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी-नाराज होता हैं, वह हाड-माँस का भक्त है, भगवान् का नहीं।
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8) जो संकटो का भविष्यदृष्टा होता हैं, वह दो बार संकट उठाता है।
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9) जो सद्गुण अपने में नहीं है, उनकी अपने में कल्पना करो और उन्हे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना डालो।
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10) जो स्वयं भीतर की निर्बलता से लडे, वह साहस है।
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11) जो स्वर चल रहा हों उसी कदम को घर से निकालते हुए आगे बढो।
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12) जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अपना स्वामी, अपना प्रिय मानते हैं, उनके संकल्प में आने वाली बाधाएँ भी प्रकारान्तर से उनकी सहायक ही बनती है।
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13) जो सच हैं उसको मानना ही आस्था है।
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14) जो सफलता बिना धोखे या बेईमानी के प्राप्त होती हैं, वही सच्ची सफलता है।
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15) जो सेवा करते नहीं, प्रत्युत सेवा लेते हैं, उनके लिये जमाना खराब आया है। सेवा करने वाले के लिये तो बहुत बढिया जमाना आया है।
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16) जो उपहास विरोध पचाते, वही नया कार्य कर पाते।
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17) जो उपहास और व्यंग्य विरोध से नहीं डरता, वही बडे परिवर्तन ला सकता है।
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18) जो उपदेश आत्मा से निकलता हैं, वही आत्मा पर सबसे ज्यादा कारगर होता है।
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19) जो उपलब्ध हैं उसकी श्रेष्ठता न समझी जाए, तो अभावों के अतिरिक्त और कुछ दिखेगा ही नहीं।
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20) जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता।
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21) जो दीपक की तरह प्रकाश उत्पन्न करने के लिये तैयार हैं, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी में होगा।
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22) जो दुनिया का गुरु बनता हैं, वह दुनिया का गुलाम हो जाता हैं। जो अपना गुरु बनता हैं, वह दुनिया का गुरु हो जाता है।
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23) जो दूसरो के लिये अनुपयोगी हैं, उसका मूल्य शुन्य होता है।
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24) जो दूसरों के दुःख से दुःखी होता हैं, उसको अपने दुःख से दुःखी नहीं होना पडता।

पंडित और संत

जो शास्त्रों के पीछे दौडता हैं, वह पंडित है। और जो सत्य के पीछे दौडता, वह संत हैं। पंडित शास्त्रो के पीछे दौडता है। जबकि संत के पीछे शास्त्र दौडतें है। शास्त्र पढकर जो बोले वह पंडित और सत्य पाकर जो बोले वह संत है। पंडित जीभ से बोलता है, संत जीवन से बोलता हैं, जिसका जीवन बोलने लगे, वह जीवित भगवान है।

जो झिझकता हैं वह हारता है...

1) जो बुद्धिमान हैं वह जानता हैं कि मनुष्य जैसा दिखता हैं उसे कहीं अधिक महान् हैं, और जो प्राणी मात्र में छुपे उस तत्व को जानते हैं वे स्वयं परमात्मा को ही जानते है।
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2) जो कहलाते छोटे लोग, बहुत बडा उनका सहयोग।
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3) जो कार्य तुम आज कर सकते हों उसे कल पर कदापि मत छोडे।
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4) जो मन को अपने वश में नहीं करते, हृदय को शुद्ध नही बनाते, ईश्वर के प्रति उनकी सब प्रार्थना व्यर्थ है।
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5) जो मन से संचालित नहीं होता अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे मनीषी एवं ऐसी प्रज्ञा को मनीषा कहा जाता है।
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6) जो मन अज्ञान के कारण रात्रि हैं वही मन प्रज्ञा के प्रकाश से दिवस भी बन जाता हैं।
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7) जो मनचाहा बोलता हैं, उसे अनचाहा सुनना पडता है।
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8) जो मनुष्य एक पाठशाला खोलता हैं वह संसार का एक जेलखाना बन्द कर देता है।
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9) जो मनुष्य जितनी अपने स्वार्थ की आहुति करता हैं, उसकी शक्ति उतनी ही बढती है।
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10) जो मनुष्य निश्चित को छोडकर अनिश्चित के पीछे भागता हैं उसका निश्चित कार्य नष्ट हो जाता हैं और अनिश्चित तो नष्ट हैं ही।
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11) जो मनुष्य समय पर अपने कार्य कर लेता हैं , वह पीछे पछताता नहीं।
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12) जो झिझकता हैं वह हारता है।
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13) जो किसी को कष्ट नहीं देता वही सुखी रहता है।
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14) जो किसी को दुःख नहीं देता, उसको देखने से पुण्य होता है।
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15) जो विद्या तुम्हे अहंकार, आलस्य और अनीति की ओर धकेले, उसे प्राप्त करने की अपेक्षा अशिक्षित रहना अच्छा।
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16) जो विभिन्न महापुरुषों के चिन्तन के साथ रहते हैं, वे समझों कि उन्ही के साथ रहते है।
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17) जो विपत्ति से डरते हैं, वह उन्ही पर ज्यादा आती है।
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18) जो जिम्मेदारी मिले, उसे ही सम्मान पूर्वक निबाहना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्तव्य है।
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19) जो हम बच्चों को सिखलाते, उसे स्वयं कितना अपनाते।
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20) जो हाथ सेवा के लिये आगे बढते हैं वे प्रार्थना करने वाले ओंठो से अधिक पवित्र है।
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21) जो भी अपने कर्तव्य का पालन करेगा, वह श्रेष्ठ हो जायेगा।
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22) जो भोगी होता हैं, उसी की दृष्टि में परिस्थिति सुखदायी और दुःखदायी-दो तरह की होती है। योगी की दृष्टि में परिस्थिति दो तरह की होती ही नही।
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23) जो परिवर्तनशील हैं वह सत्य नहीं हो सकता।
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24) जो पवित्र नहीं, उदार नही, उसका जप-तप निरर्थक है।

जीवन संवेदना का पर्याय हैं...

1) जीवन कितना ही बड़ा हो, पर वह समय की बरबादी से बहुत छोटा रह जाता है।
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2) जीवन संवेदना का पर्याय हैं। संवेदना के अंकुरण, प्रस्फुटन एवं अभिवर्द्धन के अनुरुप ही इसका विकास होता है। जीवन विद्या के मर्मज्ञ-नारद।
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3) जीवन संगीत संयम के साज पर बजता हैं। संयम अतियों से उबरने एवं मध्यम में ठहरने का नाम है।
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4) जीवन साधना का अर्थ हैं- अपने समय, श्रम और साधनों का कण-कण उपयोग करना।
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5) जीवन साधना नकद धर्म हैं। इसके प्रतिफल के लिये लम्बी प्रतीक्षा नहीं करनी पडती।
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6) जीवन दरद का झरना हैं, जो भी जीते हैं, दरद भोगते हैं, लेकिन हमें दरद भोगते हुए जागना हैं, यही वो जीवन की सत्य साधना हैं। दरद नियति के आँगन में पडी निहाई है, दरद भगवान के हाथों का हथोडा हैं, भगवान हम पर चोटें देकर, हमें सवाँरता और गढता हैं, यह बात सुनिश्चित हैं कि आदमी दरद में विकसित होता, खूबसूरत बनता और बढता है।
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7) जीवन देने के लिये में अपने पिता का ऋणी हूँ, लेकिन अच्छे जीवन के लिये अपने शिक्षक ऋणी हूँ ।
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8) जीवन वृक्ष केवल प्रसन्न रहने वालों के लिए ही विकसित होता है।
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9) जीवन अवसर हैं जिसे गॅवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम हो जाता है।
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10) जीवन अन्त तक लडते रहने, प्रभावशाली युद्ध नीति और विजयी परियोजनाओं से असफलता को सफलता में बदल देने का खेल है। असफल लोग तय करले तो संघर्ष का दूसरा मौका सामने होगा।
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11) जो बचपन और जवानी में भजन नहीं करते, वे बुढापे में भजन नहीं कर सकते।
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12) जीवन-साधना का अर्थ हैं- अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साध लेना।
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13) जीने की इच्छा और मरने का भय अविवेकी में ही होता हैं, विवेकी में नहीं। जो चिन्ता करते हैं वे भी अविवेकी है।
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14) जर्रो में रहगुजर के चमक छोड़ जाउँगा, 
आवाज अपनी दूर तलक छोड़ जाउँगा, 
खामोशियों की मौत गवारा नहीं मुझे, 
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाउँगा।
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15) जामाता (दामाद), जठर (उदर) जाया (पत्नी) जातवेदा (अग्नि) और जलाशय ये पाँच जकार पूरित होने पर भी पूरित नहीं होते।
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16) जाति वर्ग का नहीं महत्व, मानवता हैं असली तत्व।
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17) जो धैर्यवान होते हैं वे जानते हैं कि प्रत्येक कार्य के सम्पन्न होने का निश्चित समय होता है।
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18) जो धूर्त हैं वे अध्ययन की भर्त्सना करते है, मूर्ख उसकी प्रशंसा भर करके सन्तुष्ट हो जाते है और जो चतुर होते हैं वे पुस्तकों के अध्ययन द्वारा प्राप्त ज्ञान का लाभ जीवन व्यवहार में उठाते है।
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19) जो खतरों से डरते हैं, जिन्हे कष्ट सहने में भय लगता हैं, कठोर परिश्रम करना जिन्हे नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करना चाहिए
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20) जो ईश्वर को पा लेता हैं वह मूक और शान्त हो जाता है।
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21) जो ईश्वर पर विश्वास रखते हैं वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते है
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22) जो बाहरी वस्तुओं के अधीन हैं, वह सब दुःख हैं और जो अधिकार में हैं, वह सुख है।
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23) जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बडे खुद अमल करे तो यह संसार स्वर्ग बन जाये।
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24) जो बात सिद्धान्त से गलत हैं, वह व्यवहार में कभी उचित नहीं हो सकती।

जीवन जीने की कला...

जीवन जीने की कला- यदि जीवन में गंतव्य का बोध न हो तो भला गति सही कैसे हो सकती हैं। और यदि कहीं पहुँचना ही न हो तो संतुष्टी कैसे पायी जा सकती हैं। जो जीवन जीने की कला से वंचित हैं समझना चाहिए कि उनके जीवन में न तो दिशा हैं और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती हैं। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती।जीवन में यदि आनन्द पाना हैं तो जीवन को फूलो की माला बनाना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नही जानते है, वे सदा के लिए जिंदगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते है।

चरित्र का श्रंगार...

जीवन पद्धति को आध्यात्मिक मोड दिए बिना आत्मा के विकास की सम्भावनाऐं उज्ज्वल नहीं हो सकती। जीवन में आध्यात्मिक गुणों को-उदारता, त्याग, सदिच्छा, सहानुभूति, न्यायपरता, दयाशीलता आदि को जागृत करने का काम शिक्षा द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। शिक्षा मनुष्य को ज्ञानवान ही नहीं शीलवान बनाकर निरामय मानवता के अलंकरणो द्वारा उसके चरित्र का श्रंगार कर देती है। शिक्षा सम्पन्न व्यक्ति ही वह विवेक-शिल्प सिद्ध कर सकता हैं, जिसके द्वारा गुण, कर्म व स्वभाव को वांछित रुप में गढ सकना सम्भव हो सकता है।

सबसे बडी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना...

1) जहाँ विचारों का सम्मान न हो और सत्य अप्रिय लगे, वहाँ मौन साध लो।
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2) जहाँ प्रेम हैं, वहाँ सत्ययुग हैं। जहाँ कलह हैं, वहाँ कलियुग है।
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3) जहाँ शासक चरित्र विहीन, वहाँ आपदा नित्य नवीन।
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4) जहाँ स्थूल जीवन का स्वार्थ समाप्त होता हैं, वहीं मनुष्यता प्रारम्भ होती है।
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5) जहाँ सच्चा प्रेम हैं- वहाँ त्याग, उत्सर्ग और बलिदान की भावना होना अनिवार्य है।
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6) जहाँ से विनम्रता हटती हैं, सहज ही वहाँ से प्रभु की अनुकम्पा समाप्त हो जाती है।
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7) जहाँ व्यक्ति का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता हैं, वहीं उसकी गरिमा आरम्भ होती है।
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8) जहाँ व्याख्यानदाता बहुत हो वहाँ जहाँ तक हो व्याख्यान न दो।
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9) जहाँ नहीं हैं सत्य विचार, वहाँ व्यर्थ धन का भण्डार।
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10) जहाँ नदी गहरी होती हैं, वहाँ जल प्रवाह शान्त और गम्भीर होता है। 
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11) जीवन एक पुष्प हैं और प्रेम उसका मधु।
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12) जीवन एक नाटक हैं, यदि हम इसके कथानक को समझ ले तो सदैव प्रसन्न रह सकते है।
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13) जीवन बहुमूल्य हैं, उसे निरर्थक प्रयोजनों के लिये खर्च मत करो।
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14) जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूति से ही बदल जाता है।
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15) जीवन की मंजिल पर रो-रो कर चलना पौरुष का अपमान है।
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16) जीवन की हार और जीत को भी खेल समझ कर खेले।
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17) जीवन की सबसे बडी सफलता सद्बुद्धि को प्राप्त करना है।
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18) जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिये परमात्मा पर्याप्त है।
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19) जीवन का सच्चा सदुपयोग ही जीवन का महामन्त्र है।
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20) जीवन को नियम के अधीन कर देना आलस्य पर विजय पाना है।
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21) जीवन को वही समझता हैं जो प्रेम करता हैं और दान करता है।
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22) जीवन के क्रियाकलाप बाहरी अनुशासन के बजाय आत्मानुशासन द्वारा संचालित होने चाहिये।
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23) जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं , एक वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं। दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं।
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24) जीवन में नींद न हो तो मनुष्य रोता-रोता मर जाए। मनुष्य के सोने से उसकी पीड़ा भी कुछ देर को सो जाती है।

Be a Hero. Always say, " I have no fear."

1- When it rains All birds fly 4 shelter. But d eagle avoids d rain by flying above d clouds. PROBLEM is common 2all, But attitude makes difference! 
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2- When u truly believe that u deserve success, your mind will automatically generate ways to achive it. Think wat u want. 
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3- Ur talent determines what u can do.
Ur motivation determines how much u r willing to do.
Ur attitude determines how well u do it. 
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4- Unka vishwas mt kro jinki feelings waqt k sath chang ho jaye.
Vishwas unka kro jinki feelings wesi he rhe jb aapka waqt chang ho jaye. 
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5- Jeet aapki-
Achhai ko dusro me
or Burai ko khud me
talash karo...
.
.
.
Definately
Jeet Aapki 
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6- My favourite & very rich thought-
Don't pray when u c a temple.
.
.
.
Pray when u c an AMBULANCE.
Read again.... 
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7- Thanda pani or Garam Pres kapdo ki salvate mita dete h, Vaise hi thanda dimag or tejsvi Hriday Jivan ki samsyaon ko mita dete h. 
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8- Vivekanand g-
'Talk to urself atleast once in a Day. Otherwise u may miss a meeting with an EXCELLENT person in this World. 
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9- Kisi ko sad ghyan se jod kr san marg pr la dena sbse bda puny ka kam h. so plz join ur fends-
4 join this grp send msg-
JOIN MOTIVATIONS
to 09870807070 
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10- Your Prestige is on d Tip of ur Tongue so use it carefully. 
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11- "Atma Se Parmatma Ka Milan Hi Sachcha Yogabhyas H." 
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12- "An organized lifestyle and a purified hearts are the foundations of spiritual seeking" 
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13- Be a Hero. Always say, " I have no fear." 
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14- "Acche logo ki sangati muskil rah ko aasan bana deti h jabki buri sangti aasan rah ko bhi muskil bana deti h"~KABIRDAS G. 
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15- Always keeps on laughing so that even God thinks twice before giving u pain. Let even God think ur face is d best place where smiles catch. 
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16- To b d subject of jealousy is d sign of Failure in life To b d object of jealousy is d sign of success in life. 
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17- Wen u dont have faith in urself, then u cannot hv faith in othrs also. to cross a bridge, u hv to trust ur legs first then d bridge. 
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18- Jo parijan SHANTIKUNJ Haridwar k direction me "Kundlini Jagran" sadhna karna chahte h ve apna nam. address 09415799890 pr sms kare. u r welcome 
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19- What is Richness-
"Richness is not Earning More, Spendin More or Saving More.
Richness is when u need "NO MORE." -Vivekanand ji 
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20- Insan b ajeeb prani h. Usko apne ghyan ka ABHIMAN to hota h pr apne abhiman ka GHYAN nahi hata. 
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21- Prabhu k samne jo jhukta h, vo sabko accha lagta h. Lekin jo sabke samne jhuke vo PRABHU ko accha lagta h. 
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22- "Ishwar Ek Vigyan Hai Aur Upasana Use Prapt Karne Ka Vaigyanik Madhyam Hai." -Gurudev 
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23- "Think big, There are Unseen forces ready to support your dreams" - Dr Pranav Pandya sa 
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24- "If you are not using your smile, Then you are a person with million dollars in the bank having no cheque book."

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