रविवार, 17 अप्रैल 2011

उपहार

भारतीय संस्कृति संदेशो से भरी हैं। कोई भी वार-त्योंहार हो अथवा फिर रंग या सम्बन्ध.....वह कोई ना कोई संदेश देता हैं। यह संदेश ही हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं और संस्कृति तथा सम्बन्धों को जिंदा रखते हैं। ऐसा ही सम्बन्ध गुरू और शिष्य का हैं। गुरू-शिष्य परम्परा में भी न धर्म बीच में आता हैं न जाति। ऐसे ही एक सम्बन्ध में गुरू-शिष्य भले अलग-अलग धर्म से रहे, लेकिन होली और दीपावली हो या फिर ईद, वे हमेशा एक-दूसरे के साथ होते। कभी भौतिक रूप से कभी भेंट के माध्यम से, वर्ष पर वर्ष निकलते गए, लेकिन सिलसिला जारी रहा। दीपावली पर गुरू ने शिष्य को आशीर्वचन का जो पत्र लिखा व सम्पूर्ण समाज के लिए एक संदेश हैं। गुरू ने लिखा-‘‘दीपावली का सुन्दर उपहार मिला-शुक्रिया। खुदा आप सब को खुश रखे-आमीन- गुलाब अब तो हमारा सन्यास आश्रम हैं कुछ भेजा करो तो पौधा भेज दिया करो। अब चीजों की सार-संभाल नहीं होती। फिर आप लोगो का प्यार और अपनापन हमारे लिए अमूल्य हैं। संबल हैं। शक्ति हैं। खुदा आप सबको बनाए रखे, आमीन’’।

यूं देखे तो पत्र में बात कुछ नहीं हैं पर बात बहुत बड़ी हैं। एक उम्र तक सब चीजे काम आती हैं लेकिन जब वो चीज काम नहीं आए फिर उसके संचय से क्या लाभ ? तब हमें ऐसी चीजों के बारे में सोचना चाहिए जो सबके, पीढि़यों के काम आए। इसमें पेड़-पौधे से ज्यादा उपयोगी कुछ नहीं है। त्योहार ही नहीं, जन्मदिन-वर्षगांठों पर भी हमें मानव जगत को ऐसी भी भेंट देनी चाहिए। 

ढपोर शंख

शिव का एक परम भक्त था। शिव की पूजा अर्चना करता था। एक दिन शिवजी प्रकट हो गए और एक शंख भक्त को दे दिया और कहा उससे जो मांगो वही मिलेगा। भक्त शिव की पूजा करना तो भूल गया। रोज सुबह शंख की पूजा करने लगा। जैसे तुम जब तक तुम्हारे पास धन नहीं था, तो तुम धर्म की पूजा करते थे, लेकिन जिस दिन से धन आया, तुम धर्म को भूल गए और धन के पीछे पड़ गए। वह भक्त का नहीं, कमबख्त का लक्षण हैं। उस गांव से एक फकीर गुजर रहा था। शायद मुल्ला नसरूद्धीन रहा होगा। मुल्ला नसरूद्धीन रात को उसी भक्त के घर ठहरा। रात में जब वे दोने बैठे तो फकीर ने कहा, ‘मुझे पता हैं तुम्हारे पास शंख हैं, चमत्कारी शंख, लेकिन मेरे पास भी एक शंख हैं। शंख नहीं, महाशंख है।। उससे जितना मांगो, उससे भी दुगुना देता हैं। हजार मांगो तो वह लाख देता हैं। ’

भक्त तो आश्चर्य मे पड़ गया। उसने सोचा यह तो कमाल है। उसने फकीर से कहा, ‘आप अपना शंख मुझे दे दें और यह शंख आप ले लें, बड़ी कृपा होगी।’

फकीर ने कहा, ‘कोई बात नहीं, यह लो।’ और फकीर ने अपना शंख भक्त को दे दिया और भक्त का ले लिया। फकीर तो रात को चलता बना।

सुबह भक्त ने शंख की पूजा अर्चना की और कहा, ‘मुझे एक लाख रूपये चाहिए। तो शंख बोला, ‘बस, एक लाख, दो लाख मांगा लों’ भक्त ने कहा, ‘अच्छा, दो लाख रूपये चाहिए।’ तों शंख बोला, ‘मंहगाई का जमाना हैं दो से काम नहीं चलेगा, चार लाख मांग लो।’

शंख बस कहता था, देता कुछ नहीं था। वह ढपोर शंख था। ढपोर शंख देता नहीं हैं। वासना भी ढपोर शंख हैं। जरा स्वयं सोचो, वासना ने तुम्हें अब तक क्या दिया ? प्रलोभन तो देती हैं, पर हकीकत में क्या दिया ? दिया तो कुछ नहीं और तुम्हारा जो था वह लूट लिया। तो महावीर स्वामी कहते हैं, ‘संसार से मुक्त होना है तो वासना से मुक्त होना आवश्यक हैं। वासना से मुक्त और साधना से युक्त जीवन ही मुक्ति का आनंद उठा पाता हैं तृप्ति भोग में नहीं, योग में हैं, समाधि में है।

-मुनि तरूण सागर

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बुद्धिमान

राजा सन्यासी के पास गया उसने उस सन्यासी की बहुत ख्याति सुनी थी। पास जाकर उसने वंदना की। उसने बहुत निकटता से देखा कि सन्यासी बहुत बड़ा तपस्वी हैं, तेजस्वी हैं। हाथ जोड़कर राजा बोला, ‘धन्य हैं आप। धन्य हैं आपका संयम और त्याग। धन्य हैं आपकी तपस्या। कितना बड़ा त्याग हैं आपका। घर छोड़ दिया, परिवार का त्याग कर दिया, सारी संपदा को ठोकर मार दी, कितना महान् त्याग ! राजा स्तुति करता रहा। 

सन्यासी बोला, ‘महाराज ! व्यर्थ ही स्तुति मत करो। त्यागी मैं हूं या तुम ? त्याग मेरा बड़ा हैं या तुम्हारा ? तुम्हारा त्याग बड़ा हैं।’ राजा आश्चर्य में पड़ गया। बोला, ‘महाराज मैं कैसा त्यागी ? इतने वैभव, इतनी संपदा और सुख को मैं भोग कर रहा हूं। निरंतर भोग में बैठा हूं । कहां हैं मेरा त्याग ? कैसा हैं मेरा त्याग ?

सन्यासी ने कहा, ‘ मैने जो कहा वह सच हैं। तुम्हारा त्याग मेरे त्याग से बड़ा हैं मेरे सामने मोक्ष का सुख हैं सबसे महान् सुख हैं। इस सुख की प्राप्ति के लिए मैंने थोड़ा-सा धन का सुख छोड़ा, परिवार और संपदा का सुख छोड़ा हैं। किन्तु तुम बड़े त्यागी हो। उस महान मोक्ष और परमात्मा के सुख को छोड़कर पदार्थ के सुख में फंसे हो। अब बताओ, बड़े सुख को तुमने छोड़ा हैं या मैने ? बताओ बड़े त्यागी तुम हो या मैं ? थोड़ा रूककर सन्यासी ने कहा, ‘छोटे सुख के लिए बड़ा त्याग बुद्धिमानी नहीं हैं। इसलिए मैं बुद्धिमान हूं। 

वास्तव में वही व्यक्ति बुद्धिमान होता हैं, जो थोड़े के लिए बहुत को नहीं छोड़ता। 

-आचार्य महाप्रज्ञ

स्वर्ग-नरक

किसी ने पूछा, ‘स्वर्ग और नरक क्या हैं ? मैंने कहा, ‘हम स्वयं’। एक बार किसी शिष्य ने अपने गुरू से पूछा, ‘मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे है ?’ गुरू ने कहा, ‘आंखे बंद करों और देखों।’ उसने आंाखे बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरू ने कहा, ‘अब स्वर्ग देखो।’ और थोड़ी ही देर बाद कहा ‘अब नरक’ जब उस शिष्य ने आंखे खोली थी, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थी। उसके गुरू ने पूछा, ‘क्या देखा ?’ वह बोला, ‘स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थी और न ही स्वर्ण के भवन थे, वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीडि़तों का रूदन। इसका कारण क्या हैं ? क्या मैने स्वर्ग नरक देखे या नही देखेे ?

यह सुनकर उसका गुरू हँसने लगा और बोला, ‘निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखे हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रूदन तुम्हे स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो चीज या वस्तु हम अपने साथ ले जाते हैं, वहीं वहां हमें उपलब्ध हो जाती है। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।’

व्यक्ति जो अपने अंतस में होता हैं, उसे ही अपने बाहर भी पाता हैं। जो बाह्य हैं, वह आंतरिक का ही प्रक्षेपण हैं। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग हैं और भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा हैं। जो उसे जान लेता हैं, वह मृत्यु में भी जीवन को पा जाता हैं। उसका न आदि हैं और न अन्त।

-ओशो

अभय

शरीर को ही जो स्वयं का होना मान लेता हैं, मृत्यु उसे ही भयभीत करती हैं। स्वयं में थोड़ा ही गहरा प्रवेश, उस भूमि पर खड़ा कर देता हैं, जहां कि कोई भी मृत्यु नहीं हैं। उस अमृत-भूमि को जानकर ही जीवन का ज्ञान होता हैं। एक बार ऐसा हुआ कि एक युवा सन्यासी के शरीर पर कोई राजकुमारी मोहित हो गई। सम्राट ने उस भिक्षु को राजकुमारी से विवाह करने को कहा। भिक्षु बोला, मैं तो हूं ही नहीं, विवाह कौन करेगा ?

सम्राट ने इसे अपमान मान उसे तलवार से मार डालने का आदेश दिया। वह सन्यासी बोला, ‘मेरे प्रिय, शरीर से आरंभ से ही मेरा कोई संबंध नहीं रहा है। आप भ्रम में हैं। आपकी तलवार जो पहले से ही अलग हैं, उन्हें और क्या अलग करेगी ? मैं तैयार हूं और आपकी तलवार मेरे तथाकथित सिर को उसी प्रकार काटने के लिए आमंत्रित हैं, जैसे यह बसंत वायु पेड़ों से उनके फूलों को गिरा रही हैं। 

सच ही उस समय बसंत था और वृक्षों से फूल झर रहे थे। सम्राट ने उन झरते फूलों को देखा और उस युवा भिक्षु के सम्मुख उपस्थित मृत्यु को जानते हुए भी उसकी आनंदित आँखों को देखा। उसने एक क्षण सोचा और कहा, ‘जो मृत्यु से भयभीत नहीं हैं और जो मृत्यु को भी जीवन की भांति ही स्वीकार करता हैं, उसे मारना व्यर्थ हैं। उसे तो मृत्यु भी नहीं मार सकती।’ वह जीवन नहीं हैं, जिसका कि अंत आ जाता हैं। जो उसे जीवन मान लेते हैं, वे जीवन को जान ही नहीं पाते। वे तो मृत्यु में ही जीते हैं और इसलिए मृत्यु की भीति उन्हें सताती हैं जीवन को जानने और उपलब्ध होने का लक्षण ‘‘मृत्यु से अभय’’ हैं। 

-ओशो

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

रहस्य

‘‘मैं जगत में हूं और जगत में नहीं भी हूं’’ -ऐसा जब कोई अनुभव कर पाता हैं, तभी जीवन का रहस्य उसे ज्ञात होता हैं। एक सन्यासी ने सुना कि देश का सम्राट परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया है। उस सन्यासी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्या यह संभव हैं कि जिसने कुछ भी नहीं त्यागा हैं, वह परमात्मा को पा सके ? वह सन्यासी राजधानी पहुंचा और राजा का अतिथि बना। उसने राजा को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा, स्वर्ण पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करते देखा-रात्रि में संगीत और नृत्य का आनन्द लेते हुए भी। उसका संदेह अनंत होता जा रहा था। वह तो सर्वथा स्तब्ध ही हो गया था। सन्यासी संदेह और चिंता से सो भी नहीं सका। सुबह ही राजा ने नदी पर स्नान करने के लिए उसे आमंत्रित किया। राजा और सन्यासी नदी में उतरे। वे स्नान कर ही रहे थे कि अचानक उस शांत, निस्तब्ध वातावरण को एक तीव्र कोलाहल ने भर दिया। आग, आग, आग। नदी तट पर खड़ा राजमहल धू-धूकर जल रहा था और उसकी लपटें तेजी से घाट की ओर बढ़ रही थी। सन्यासी ने स्वयं को अपना कोपीन बचाने के लिए सीढि़यों की ओर भागते हुए पाया। लेकिन लौटकर देखा, तो पाया कि राजा जल में ही खड़े है और कह रहे हैं- ‘‘हे मुनि, यदि समस्त राज्य भी जल जाएं, तो भी मेरा कुछ भी नहीं जलता हैं।’

सम्राट थे जनक और मुनि थे शुकदेव।

लोग मुझसे पूछते हैं-योग क्या हैं ? मैं उनसे कहता हूं-अस्पर्श भाव। ऐसे जीओ कि जैसे तुम जहां हो, वहां नहीं हो। चेतना बाह्य से अस्पर्शित हो, तो स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

-ओशो

विनय

कठोरता तो सदा ही अल्पजीवी हुआ करती हैं और मृदुता को दीर्घ जीवन का वरदान मिला ही हैं। जो व्यक्ति नम्र नहीं होता, विनम्र नहीं होता उसे कोई भी पसन्द नहीं करता।

एक चीनी संत ने अंतिम समय अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, ‘तनिक मेरे मुंह में तो झांको और देखो कि कितने दांत शेष हैं ? प्रत्येक शिष्य ने देखा और कहा, ‘गुरूदेव, दांत तो कभी के टूट गए। मुख में तो एक भी दांत नहीं हैं।’ गुरू ने पूछा, ‘जिव्हा तो हैं ?’ शिष्यों ने कहा, हां।’ तब गुरू ने कहा, ‘दांत बाद में आए और पहले चले गए। जिव्हा जन्म से आई और मरने तक रही। आखिर ऐसा क्यों ? शिष्यों को मौन देखकर संत ने रहस्य खोलते हुए कहा, ‘कठोरता अल्पजीवी होती है।, दांत कठोर होते हैं, अतः जल्दी ही टूट जाते हैं। मृदुता दीर्घजीवी होती हैं। जिव्हा मृदु होती हैं, उसमें एक भी हड्डी नहीं होती इसलिए वह जीवन के अंतिम क्षणों तक बनी रहती हैं।’

हम भी मृदु बनें, विनम्र बनें। बुजुर्ग और गुरूजनों के सामने नम्रता से पेश आएं। दूसरों का सम्मान करना सीखें। विनयशील व्यक्ति जीवन में समस्त संपदाओं को सहज में ही प्राप्त कर लेता हैं। इसलिए कहा हैं कि विनय ही मोक्ष का द्वार हैं।(विणओ मोक्खं द्वार) विनय ही उन्नति का पहला सोपान हैं। विनय ही जीवन का धर्म हैं। विनयहीन दीन ही बना रहता हैं। परमात्मा की संपदा का एकमात्र अधिकारी विनयशील व्यक्ति हैं। विनय ही शून्य से पूर्ण होने की यात्रा हैं। विनयहीन व्यक्ति सदा रिक्त बना रहता हैं। 

-मुनि तरूणसागर

चापलूस

एक राजा था। वह हर समय चापलूसों से घिरा रहता था। एक दिन कुछ सियार चिल्ला रहे थे। राजा ने सभासदों से पूछा, ‘सियार क्यों रो रहे हैं ? चापलूसों ने कहा, महाराज ! यदि इनको कुछ खाने को दिया जाए, तो ये फिर नहीं रोएंगे।’ राजा ने कहा, ‘ इनके भोजन-पानी का प्रबन्ध कर दो।’ चापलूसों ने रूपये लिए, आपस में बांटा और अपने-अपने घर की ओर चले गए। दूसरे दिन देखा तो सियार फिर रो रहे थे। राजा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रहे है ? चापलूसों ने कहा, राजन् ! अब ये कह रहे हैं कि कुछ ओढ़ने के लिए चाहिए।’ राजा ने कहा कि जाओ और उन्हें एक-एक कम्बल बांट दो। चापलूसों ने रूपये लिए और आपस में बांट कर रवाना हो गए। तीसरे दिन फिर गीदड़ चिल्ला रहे थे। चिल्लाना तो उनका गुणधर्म स्वभाव है। राजा ने पूछा, ‘अब किस वस्तु की आवश्यकता हैं इन्हें ? चाटुकारों ने कहा, ‘ये कह रहे हैं कि हमें रहने के लिए घर उपलब्ध कराए जाए।’ राजा ने कहा, ‘इनके रहने की व्यवस्था कर दो। चापलूसों ने फिर वैसा ही किया।’

शाम को देखा तो सियार फिर चिल्ला रहे है। राजा ने सुना और पूछा-अब क्या मांग हैं इनकी ? चापलूस बोले अन्नदाता ! अब इनकी सारी जरूरतों की पूर्ति कर दी हैं। अतः ये आपकी कीर्ति का बखान कर हरे है। महाराज ! ये आपके अत्यन्त कृतज्ञ हैं अतः आज से रोज शाम को आपकी जय मनाएंगे।, आपके गुण गाएंगे। राजा चापलूसों की बात सुनकर खुश हो गया। चापलूस तो खुश थे ही क्योंकि उन्हें अच्छी-खासी रकम जो मिल गई थी। 

-मुनि तरूणसागर

चरित्र

एक बहुत बड़े योगी संत थे आनन्दघन जी। एक बार एक प्रदेश के राजा-रानी आनन्दघन जी के पास आए। वे बोले, ‘गुरूवर ! और सब कुछ हैं, पर पुत्र नहीं हैं। पुत्र के बिना सम्पदा और वैभव का प्रयोजन ही क्या हो सकता हैं ? आनन्दघन जी बोले, ‘मैं क्या पुत्र दूंगा ? जाओ, और किसी से याचना करो।’ राजा-रानी ने बहुत आग्रह किया। आनन्दघन जी ने एक पन्ने पर कुछ लिखा और कहा, ‘रानी के बाएं हाथ पर बांध देना। मेरी एक शर्त मानना, सदा सदाचार का पालन करना। अहिंसा, सत्य का पालन करना। मनोकामना पूरी होगी। गरीबों का ध्यान रखना, अन्याय मत करना, शोषण और उत्पीड़न से बचना। न्याय करना।’

राजा-रानी ने सभी व्रतों का पालन प्रारम्भ कर दिया। राजा न्याय करने लगा। जनता को शोषण और उत्पीड़न से बचाया। आचरण का पक्ष उज्ज्वल हुआ। क्षमता बढ़ी। भावनाओं में शक्ति आई, संकल्प-शक्ति का विकास हुआ। संयोग की बात पुत्र की प्राप्ति हो गई। वे दोनों आनन्दघन जी के पास आकर बोले, ‘महाराज ! आपका मन्त्र सफल हुआ। हम आपके अत्यन्त आभारी हैं। आनन्दघन जी ने कहा, ‘रानी के हाथ पर बंधा हुआ लाओ। उसे पढ़ो। उसमें लिखा था-रानी को पुत्र हो, तो आनन्दघन जी को क्या ? पुत्र न हो तो आनन्दघन को क्या ? वह न कोई यन्त्र था और न मन्त्र।

जब व्यक्ति का चरित्र शुद्ध होता हैं, तब उसका संकल्प अपने आप फलित होता हैं। चरित्र की शुद्धि के आधार पर संकल्प की क्षमता जागती है। जिसका संकल्प-बल जाग जाता हैं, उसकी कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती। 

-आचार्य महाप्रज्ञ

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

चारित्र

एक सेठ के घर तोता पला था, वह उसे पिंजड़े में नहीं रखता था ।
एक दिन सेठ ने अपने घर के आसपास एक बिल्ली देखी ।
सेठ ने तोते को बताया कि - बिल्ली आए, तो उड़ जाना ।
वह रोजाना उसे याद दिलाता था, तोता भी दिन भर बोलता रहता था – बिल्ली आए तो उड़ जाना – बिल्ली आए तो उड़ जाना
एक दिन सचमुच बिल्ली आ गयी ।
तोता बोलने लगा – बिल्ली आए तो उड़ जाना – बिल्ली आए तो उड़ जाना, पर उड़ा नहीं,
बिल्ली तोते को खा गयी ।

हम भी अच्छी बातें बोलते हैं, पर समय आने पर क्रियान्वित नहीं करते हैं ।
मुनि तरूणसागर

एक दिन ऐसा करके देखें, जीने का नजरिया बदल जाएगा

जीवन को यदि गरिमा से जीना है तो मृत्यु से परिचय होना आवश्यक है। मौत के नाम पर भय न खाएं बल्कि उसके बोध को पकड़ें। एक प्रयोग करें। बात थोड़ी अजीब लगेगी लेकिन किसी दिन सुबह से तय कर लीजिए कि आज का दिन जीवन का अंतिम दिन है, ऐसा सोचना भर है। अपने मन में इस भाव को दृढ़ कर लें कि यदि आज आपका अंतिम दिन हो तो आप क्या करेंगे। 

बस, मन में यह विचार करिए कि कल का सवेरा नहीं देख सकेंगे, तब क्या करना...? इसलिए आज सबके प्रति अतिरिक्त विनम्र हो जाएं। आज लुट जाएं सबके लिए। प्रेम की बारिश कर दें दूसरों पर। विचार करते रहें यह जीवन हमने अचानक पाया था। परमात्मा ने पैदा कर दिया, हम हो गए, इसमें हमारा कुछ भी नहीं था। जैसे जन्म घटा है उसकी मर्जी से, वैसे ही मृत्यु भी घटेगी उसकी मर्जी से। 

अचानक एक दिन वह उठाकर ले जाएगा, हम कुछ भी नहीं कर पाएंगे। हमारा सारा खेल इन दोनों के बीच है। सच तो यह है कि हम ही मान रहे हैं कि इस बीच की अवस्था में हम बहुत कुछ कर लेंगे। ध्यान दीजिए जन्म और मृत्यु के बीच जो घट रहा है वह सब भी अचानक उतना ही तय और उतना ही उस परमात्मा के हाथ में है जैसे हमारा पैदा होना और हमारा मर जाना। 

इसलिए आज ऐसा महसूस करें आज आखिरी दिन है। कल रहें न रहें तो क्यों न आज जिएं। प्रेम से जिएं उस परमात्मा की मर्जी से जिएं। हमारे कई संत-महात्मा अपने जीवन के हर दिन को मौत की मस्ती के साथ जीते थे। क्योंकि इन लोगों का मानना था कि जन्म परमपिता परमेश्वर ने दिया है तो समापन भी वे ही करेंगे और उनका यही बोध कि आज का दिन अंतिम हो सकता है, उनको अमर बना गया। इसका एक आसान तरीका है जरा मुस्कुराइए...।

अगर शांति चाहिए तो इससे दोस्ती कीजिए...

यदि आप शांति की तलाश में हैं तो अपनी दोस्ती मौन से भी कर ली जाए। पुरानी कहावत है मौन के वृक्ष पर शांति के फल लगते हैं। मौन और चुप्पी में फर्क है। चुप्पी बाहर होती है, मौन भीतर घटता है। चुप्पी यानी म्यूटनेस जो एक मजबूरी है। लेकिन मौन यानी साइलेंस जो एक मस्ती है। इन दोनों ही बातों का संबंध शब्दों से है। 

दोनों ही स्थितियों में हम अपने शब्द बचाते हैं लेकिन फर्क यह है कि चुप्पी में बचाए हुए शब्द भीतर ही भीतर खर्च कर दिए जाते हैं। चुप्पी को यूं भी समझा जा सकता है कि पति-पत्नी में खटपट हो तो यह तय हो जाता है कि एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे, लेकिन दूसरे बहुत से माध्यम से बात की जाती है। 

भीतर ही भीतर एक-दूसरे से सवाल खड़े किए जाते हैं और उत्तर भी दे दिए जाते हैं। यह चुप्पी है। इसमें इतने शब्द भीतर उछाल दिए गए कि उन शब्दों ने बेचैनी को जन्म दे दिया, अशांति को पैदा कर दिया। दबाए गए ये शब्द बीमारी बनकर उभरते हैं। इससे तो अच्छा है शब्दों को बाहर निकाल ही दिया जाए। 

मौन यानी भीतर भी बात नहीं करना, थोड़ी देर खुद से भी खामोश हो जाना। मौन से बचाए हुए शब्द समय आने पर पूरे प्रभाव और आकर्षण के साथ व्यक्त होते हैं। आज के व्यावसायिक युग में शब्दों का बड़ा खेल है। आप अपनी बात दूसरों तक कितनी ताकत से पहुंचाते हैं यह सब शब्दों पर टिका है। कुछ लोग तो सही होते हुए भी शब्दों के अभाव, कमजोरी में गलत साबित हो जाते हैं। 

कोई आपको क्यों सुनेगा यदि आपके पास सुनाने लायक प्रभावी शब्द नहीं होंगे। इसलिए यदि शब्द प्रभावी बनाना है तो जीवन में मौन घटित करना होगा। समझदारी से चुप्पी से बचते हुए मौन को साधें। चुप्पी चेहरे का रौब है और मौन मन की मुस्कान। जीवन में मौन उतारने का एक और तरीका है जरा मुस्कराइए...

2 मिनिट का ऐसा योग और गर्मी देगी छोड़

आज पूरी दुनिया में योग की धूम मची हुई है। वह समय चला गया जब योग को हिन्दू धर्म की उपासना पद्धति मानकर अन्य धर्मों के लोग इससे मुंह फेर लेते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। विज्ञान ने भी अब योग को एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मानकर इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगा दी है। गर्मियों की लगभग शुरुआत हो चुकी है। बारिश और ठंड की बजाय गर्मियों का सीजन सभी के लिये ज्यादा कठिन और पीड़ादायक होता 
है। 

योग में एक ऐसी क्रिया है, जिसे करने मात्र 5 से 7 मिनिट लगते हैं तथा इसके करने से गर्मी में भारी राहत मिलती है। यह क्रिया है-शीतली प्राणायाम। आइये देखें इस योगिक क्रिया को कैसे किया जाता है-

शीतली प्राणायाम: पद्मासन में बैठकर दोनों हाथों से ज्ञान मुद्रा लगाएं। होठों को गोलाकार करते हुए जीभ को पाइप की आकृति में गोल बनाएं। अब धीरे-धीरे गहरा लंबा सांस जीभ से खींचें। इसके बाद जीभ अंदर करके मुंह बंद करें और सांस को कुछ देर यथाशक्ति रोकें। फिर दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। इस क्रिया को 20 से 25 बार करें। प्रतिदिन शीतली प्राणायाम करने से अधिक गर्मीं के कारण पैदा होने वाली बीमारियां और समस्याएं नहीं होती। लू लगना, एसिडिटी, आंखों और त्वचा के रोगों में तत्काल आराम मिलता है।

विवेक जरूरी

गधे को गधा सिर्फ इसलिए कहते हैं कि वह गलत धारणा में जीता है। यदि तुम भी अपने मित्रों के प्रति, पड़ौसी के प्रति, पत्नी के प्रति गलत धारणा रखते हो तो तुम अपने बारे में सोचो कि तुम क्या हो ?

किसी शैतान को मजाक सूझी। एक गधा जहाँ खड़ा था, उसके दाएं-बाएं दोनों तरफ कुछ दूर पर उसने हरी घास के दो ढेर लगा दिए। गधे ने हरी-हरी घास देखी तो मुख में पानी आ गया। उसने विचार किया कि कौन सी घास खाऊं ? विचार किया, दाएं तरफ की खानी चाहिए। मन ने कहा, क्यों बाएं तरफ की क्यों नहीं ? बाएं तरफ में क्या दोष है ? तो मन ने कहा, ठीक हैं, बाएं तरफ की खानी चाहिए। तभी दूसरा विचार उठा, क्यों दाएं तरफ की क्यो न खाई जाए ? उसमें क्या कमी हैं ?

अब गधा खड़ा हैं, घास पड़ी हैं। विचार कर रहा है कि कौन सी खाऊ ? सुबह से शाम हो गई। घास पड़ी हैं, गधा खड़ा हैं, कौनसी खाऊं ? दाएं तरफ की खाऊं, नहीं-नहीं, बाएं तरफ की खाऊं। पूरी रात निकल गई। घास पड़ी हैं, गधा खड़ा हैं और कहते है कि दो दिन तक गधा भूखा-प्यासा खड़ा रहा, विचार करता रहा और भूख के कारण कमजोरी के कारण गिर पड़ा और मर गया। 

आप सब कहोगे कि कितना मूर्ख गधा था ? अरे खा लेता, किधर की भी लेकिन मैं तुमसे पूछता हूं कि यह किस्सा कहीं तुम्हारा ही किस्सा तो नहीं हैं ? तुम भी तो विचारों में जी रहे हो। तुम विवेक में कहां जीते हों, विवेक से निर्णय कहां करते हो।

-मुनि तरूणसागर

संघर्ष

जीवन में आने वाली परीक्षा की घडि़यां त्रासदी या जीत हो सकती हैं, यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि हम उनसे कैसे निपटते है। प्रयास के बिना विजय नहीं मिलती हैं। 

जीव विज्ञान का एक शिक्षक अपने छात्रों को पढ़ा रहा था कि कैसे इल्ली तितली में परिणत हो जाती है। उसने छात्रों से कहा कि अगले दो घण्टों में तितली, कोये (ककून) से बाहर निकलने के लिए जद्धोजहद करेगी, लेकिन इसमें किसी को तितली की मदद नहीं करनी चाहिए। उसके बाद शिक्षक चला गया। तितली कोये (ककून) से बाहर निकलने के लिए जद्धोजहद कर रही थी। एक छात्र को तितली पर दया आ गई और शिक्षक की सलाह के विपरीत उसने तितली की मदद करने का फैसला किया, ताकि उसे और ज्यादा संघर्ष न करना पड़े। लेकिन, थोड़ी देर बाद ही तितली मर गई। जब शिक्षक लौटा, तो उसे बताया गया कि क्या हुआ था। उसने छात्रों समझाया कि यह प्रकृति का नियम हैं कि कोये (ककून) से बाहर निकलने के लिए किया गया संघर्ष वास्तव में तितली के पंखों को विकसित और मजबूत बनाने में मदद करता हैं। तितली की सहायता कर लड़के ने तितली को उसके संघर्ष से वंचित कर दिया था और तितली मर गई। 

ठीक इसी सिद्धान्त को अपने जीवन में लागू करके देखें। जीवन में संघर्ष के बिना हासिल की गई कोई भी चीज मूल्यवान नहीं हैं। एक माता-पिता के रूप में हम उन्हें ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, क्योंकि हम उन्हें संघर्ष नहीं करने देते हैं, जिससे वे मजबूत नहीं बन पाते। 

-शिव खेड़ा

कौन जगाए

एक व्यक्ति को लगा कि वह मर गया हैं। वह जिन्दा था लेकिन मन में एक पागलपन सवार हो गया कि वह मर गया है। जब उसका कोई दोस्त रास्ते में मिल जाता, तब वह पूछ बैठता, ‘‘मित्र तुम्हें पता चला ? दोस्त पूछता ‘‘किस बात का ? वह कहता हैं कि मैं मर गया हूं।’’ शुरू-शुरू में तो दोस्तों ने उसे मजाक माना, फिर लगा कि मामला गम्भीर हैं। परिवार के लोग उसे एक मनोवैज्ञानिक के पास ले गए। मनोवैज्ञानिक ने पागल से पूछा, ‘‘अगर हम किसी मुर्दा व्यक्ति को चीरा लगाएं तो खून निकलेगा या नहीं ?’’ उसने कहा, ‘‘ डाक्टर साहब खून तो जिन्दा आदमी को चीरा लगाने पर ही निकलता हैं। ’’ मनोवैज्ञानिक अपनी इस तरकीब पर बड़ा खुश हुआ। उसको लगा कि अब समस्या का समाधान निश्चित हो जाएगा। उसने पागल व्यक्ति को पकड़ा और एक दर्पण के सामने खड़ा कर दिया और हाथ में चीरा लगा दिया। चीरा लगाते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा। मनोवैज्ञानिक ने पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम मरे हो या जिन्दा। पागल बोला, डाक्टर साहब ! गलतफहमी थी मुझे। अभी तक तो मैं यही मानता था कि मुर्दे में खून नहीं होता, पर आज मालूम पड़ गया कि मुर्दे में भी खून होता हैं।’’

जिसने तय कर लिया कि 4 और 5 दस होते हैं, उसे समझाना कठिन हैं। सोए हुए को जगाना बड़ा आसान हैं, लेकिन जो सो नहीं रहा हैं सिर्फ सोने का बहाना करके लेटा हैं उसे जगाना मुश्किल हैं, बड़ा कठिन हैं। 

-मुनि तरूणसागर

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

मिजाज में घेलिए मिठास

1. बच्चे भविष्य देखते हैं, युवक वर्तमान पर नजर रखते हैं और बूढ़े अतीत को झाँकते रहते हैं। यदि बूढ़े लोग अतीत की बजाय भविष्य देखना शुरू कर दें, तो उनका ढलता जीवन भी ऊर्जा, उत्साह और उमंग से भर जाए। 
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2. मन यदि स्वस्थ और अच्छी अवस्था में हो, तो दुख में भी दीवाली हैं, पर मन यदि क्रोध, चिन्ता, अवसाद से घिरा हैं, तो सुख में भी सुलगती होली हैं। अपने मन की दशा को ठीक कीजिए, मुस्कुराइए और मन को सकारात्मक बनाइए। आपके लिए अभी से दीवाली के दीये जलने शुरू जाएँगे। 

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3. हर महान जीवन की शुरूआत किसी छोटे-से सद्गुण से होती है। मकान कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका प्रवेश-द्वार छोटा ही होता हैं। प्रारम्भ में हर सद्गुण छोटा लगता हैं, पर जब उस सद्गुण का प्रकाश जीवन में फैलने लगता हैं, तो वही सद्गुण व्यक्ति की महानता का आधार बन जाता है। 

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4. पता नहीं, मन की यह कैसी विडंबना हैं कि हमें दूर रहने वालें के तो गुण ही गुण दिखाई देते हैं, पर पास में रहने वालों की सदा कमियाँ ही नजर आती हैं। यदि हम पास में रहने वालों के भी गुण देखना शुरू कर दे तो दूर रहने वालों की यादों में खोए रहने की जरूरत ही नहीं रहेगी। 

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5. क्रोध का जवाब क्रोध से देना प्रतिक्रिया हैं, पर क्रोध को जवाब प्रेम से देना समाधि का आनन्द हैं। प्रतिक्रिया अब तक खूब की हैं, चलो अब समाधि-भाव अपनाएँ। मन को समझाएँ- हे जीव ! तू कब तक यों ही क्रोध करता रहेगा। अब तो शान्त हो। 

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6. क्रोधी व्यक्ति घर वालों के द्वारा भी नापसंद किया जाता हैं, पर शान्त और स्नेहिल व्यक्ति घर के बाहर भी लोकप्रिय हो जाता हैं। क्रोध तो लुहार के हथौड़े जैसा होता हैं-एक ही चोट और दो टुकड़े। प्रेम सुनार की हथौड़ी जैसा होता हैं-हल्की ठोका-ठोकी और आभूषण तैयार। हथौड़ी बनिए, पर लुहार की नहीं, सुनार की। 

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7. कोई व्यक्ति कुआ खोदे, पर पानी निकले ही निकले यह कोई जरूरी नहीं है। पर यदि आप दूसरों पर प्रेम सरसराते हैं और उसका कोई शुभ परिणाम न निकले यह सम्भव नहीं है। प्रेम से बोलिए, प्रेम से मिलिए, प्रेमभरा उपहार दीजिए, आपके पास सौ गुना होकर लौटेगा। 

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8. वृक्ष की मुख्य चीज जड़ हैं, पंछी की मुख्य चीज पंख हैं, पशु की मुख्य चीज पेट है और मनुष्य-जीवन की मुख्य चीज विवेक हैं। यदि हम अपनी वृत्ति, वाणी और व्यवहार में विवेक नहीं रखते हैं तो फिर हम सींग मारने वाले साँड और फुफकारने वाले साँप नहीं हैं तो और क्या हैं ?

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9. किसी को बुरा मत बोलिए और किसी को अच्छा बोले बगैर मत रहिए। आलोचना एक ऐसा जहर हैं जिसे कोई पीना नहीं चाहता और प्रशंसा एक ऐसा माधुर्य हैं जिसे हर कोई पीना पसन्द करता हैं। जो लोग जिसे पसन्द करते हैं, उन्हें वही पिलाइये न्।

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10. जब फटे हुए दूध से रसगुल्ला बनाया जा सकता हैं, तो टूटे हुए रिश्तों को फिर से क्यों नहीं साँधा जा सकता। पहल यदि सकारात्मक हो, तो बंजर भूमि में भी फूल खिलाए जा सकते हैं। मोबाइल उठाइये और खुद आगे बढ़कर फोन कीजिए, आपसी तनाव कम होगा। 

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साभार-सम्बोधि टाइम्स, संतप्रवर श्री चन्द्रप्रभ जी। 

Trust these words

1- Anything that happens is 4 a good reason & Anything that doesnt happen is only 4 very good reason.
Trust these words. U'll love ur life! 
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2- rishta ?
"Aankh"or"Palak" sa hona chahiye,
Aankh me kuch gir jaaye to palak tadap uthti h.
or palak kuch der na jhapke to aankh ro deti h. 
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3- purush se nari adhik buddhimati hoti h, kyoki vah janati km h pr smjhti adhik h.
Jago Shkti swrupa nari, tum ho divya kranti chingari. 
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4- Chote-Chote Avsr ydi shi Disha pe jaye to dhara k Viprit b bhut bda kam kiya ja skta h. 
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5- Dont b disappointed if world refuse 2 accept u.
Remember d words of Einstein-
"I m thankful 2 all who said no, its bcoz of them i did it myself. 
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6- Difference b/w ordinary & extraordinary is just little EXTRA...
so make urself just little extra n win d race. 
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7- Dusaro Ko Dukhi Dekh Kr Hme Dukh Hota H To Hme Bhagwan Ne Insan Bna kr Koi Galti Nhi kri H. 
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8- Excellent SMS TO THINK ON:-
There R only 2 people who r failure in life:
Those who dont listen to anybody.
Those who listen to evrybody. 
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9- Future is not what v planned 4 tomorrow.
It is d result of what v do 2day..
Do d best in present & Enjoy d future..!! 
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10- GOD Upsets Our Plans Only To Set Up His Plan 4 Us.
While v c Our Present & Plan Our Future, 
He Sees Our Future & Gives Us Our Present. 
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11- Golden Rule of Life:~
"Be good enough to forgive someone.
But don't be a stupid to trust them again. . . ! !"
Think on it... 
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12- World's Most Beautiful Sentnce"But I M With U"World's Most Painful Sentnce"I M With U, But.."Words R Same But Where They R Placed Matters A LOT. 
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13- Gr8 motivational words written on d entrance of anuniversity:
"I KNOW I AM SOMETHING, BECAUSE NATURE DOESN'T CREATE GARBAGE." 
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14- Gusse Me Boli Gayi 1 kathor bat Itni ZAHREELI Ho Sakti H-
Jo Hamari Hazaro Methi Bato K Parbhav Ko 1 Minute Me Nashat Kr Sakti H. 
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15- HAAR Tb Nhi Hoti
Jb Hm Koi Mukabla Haar Jate H,
Balki Haar Tb Hoti H
Jb Hm Ldna Chhor Dete H. 
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16- When u pray for 0thers, God Listens u & Blesses Them. When u r Happy & Feel Blessed, Remember Someone has Prayed for u.! 
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17- Hate Bt lov more.
Argue Bt agree more.
Talk Bt listen more.
Punish Bt forgive more.
Then people wil love u more than u love them. 
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18- Hardwork is like a staircase n Luck is like a Lift. Lift may sometimes fail but Staircase always takes us to d top. 
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19- "d tree does not withdraw its shade from d woodcutter. So forgive d one who hurt you.They'll realize ur worth 1 day". 
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20- Life is like a three pages of book.
First page "birth".
Last page "death".
centre page "empty" So fill with smile & Enjoy d life. 
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21- Life is best 4 those who r enjoying it, Difficult 4 those who r analysing it & Worst 4 those who r criticise it. Our Attitude defines our lives! 
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22- Heart Surgery Free of cost for children (0 to 10 yr) call 08028411500
It might save someone's LIFE. 
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23- JUST FEEL THE LINES-
Bus k Conductor jaisi ho gayi h zindagi yaaro,
Safar b roz ka h or jana b kahi nahi.
.
..
... 
If this right, Change ur portfolio. 
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24- Jivan Milna Bhagya ki Baat H, Mot Hona Smy ki Bat h, Or Mot k bad b Logo k Mn me Jinda Rhna Apne Krmo ki Bat H.

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

दरिद्रता

दरिद्रता इच्छाओं की कोख से पैदा होती हैं। जिसकी इच्छाएँ जितनी अधिक हैं, उसे उतना ही दरिद्र होना पड़ेगा, उसे उतना ही याचना और दासता के चक्रव्यूह में फँसना पडे़गा। इसी के साथ उसका दुःख भी उतना ही बढ़ेगा। इसलिए जिसे दरिद्रता निवारण के लिए कदम आगे बढ़ाने हैं, उसे इच्छाओं की ओर से अपने पाँव उतने ही पीछे हटाने होंगे, क्योंकि जो जितना अपनी इच्छाओं को छोड़ पाता हैं, वह उतना ही स्वतंत्र, सुखी और समृद्ध होता हैं। जिसकी चाहत कुछ भी नहीं हैं, उसकी निश्चिन्तता एवं स्वतन्त्रता अनन्त हो जाती हैं। 

इस सम्बन्ध में सुफियों में एक कथा कही जाती हैं। फकीर बालशेम ने एक बार अपने एक शिष्य को कुछ धन देते हुए कहा-‘‘इसे किसी दरिद्र व्यक्ति को दान कर देना।’’ शिष्य अपने गुरू के पास से चलकर थोड़ा आगे बढ़ा और सोचने लगा कि उसके गुरू ने गरीब के स्थान पर दरिद्र व्यक्ति को यह धन देने के लिए कहा हैं। और जैसा कि उसने बालशेम के सत्संग में जाना था कि गरीब व गरीबी परिस्थितियोंवश होती हैं, लेकिन दरिद्र व दरिद्रता मनःस्थितिजन्य हैं। सो उसने किसी दरिद्र व्यक्ति की तलाश करनी शुरू की। 

अपनी इस तलाश में वह एक राजमहल के पास जाकर रूक गया। वहाँ कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि राजा ने अपनी इच्छाओं के पूरा करने के लिए प्रजा पर कितने कर लगाए हैं, कितने लोगो को लूटा हैं। इन बातों को सुनकर उसे लगा कि उसकी तलाश पूरी हुई। बस, उसने राजा के दरबार में हाजिर होकर उस राजा को अपने सारे रूपये सौंप दिए। एक फकीर के द्वारा इस तरह अचानक रूपये दिए जाने से वह राजा हैरान हुआ। इस पर बालशेम के शिष्य ने उसे अपने गुरू की बात कह सुनाई और कहा-‘‘राजन् ! इच्छाएँ हो तो दरिद्रता व दुःख बने ही रहेंगे। इसलिए जो इन इच्छाओं के सच को जान लेता हैं, वह दुःख से नहीं, अपनी चाहतो से मुक्ति खोजता हैं, क्योंकि जो अपनी इच्छाओं व चाहतों से छुटकारा पा लेता हैं, उसके जीवन से दरिद्रता, दुःख याचना व दासता स्वतः ही हट एवं मिट जाते हैं। 

अखण्ड ज्योति मार्च 2011

पाप क्या हैं ?

कुछ युवकों ने मुझसे पूछा, ‘पाप क्या हैं ?’ मैने कहा-‘मूर्च्छा’। वस्तुतः होशपूर्वक कोई भी पाप करना असंभव हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि जो परिपूर्ण होश में हो सके, वही पुण्य है। और जो मूर्च्छा के बिना न हो सके, वही पाप हैं। 

एक युवक ने साधु से जाकर कहा, ‘मैं आपका शिष्य होना चाहता हूं।’ साधु ने कहा, ‘स्वागत हैं, परमात्मा के द्वार पर सदा ही सबका स्वागत हैं।’ वह युवक कुछ हैरान हुआ और बोला, ‘लेकिन बहुत त्रुटियां हैं मुझमें- मैं बहुत पापी हूं।’ यह सुन साधु हँसने लगा और बोला, परमात्मा तुम्हें स्वीकार करता हैं, तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन हूं ? मैं भी सब पापों के साथ तुम्हें स्वीकार करता हूं।’ उस युवक ने कहा, ‘लेकिन मैं जुआ खेलता हूं, मैं शराब पीता हूं, मैं व्यभिचारी हूं।’

वह साधु बोला, ‘इन सबसे कोई भेद नहीं पड़ता, लेकिन देखों ! मैंने तुम्हें स्वीकार किया, क्या तुम मुझे स्वीकार करोगे ? क्या तुम जिन्हें पाप कह रहे हो, उन्हें करते समय कम से कम इतना ध्यान रखोगे कि मेरी उपस्थिति में उन्हें न करो। मैं इतनी तो आशा कर ही सकता हूं ? युवक ने आश्वासन दिया। गुरू का इतना आदर स्वाभाविक ही था। लेकिन कुछ दिनों बाद जब वह लौटा और उसके गुरू ने पूछा कि तुम्हारे पापों का क्या हाल हैं, तो वह हँसते हुए बोला, मैं जैसे ही उनकी मूर्च्छा में पड़ता हूं कि आपकी आँखे सामने आ जाती हैं और मैं जाग जाता हूं। आपकी उपस्थिति मुझे जगा देती हैं। जागते हुए तो गड्ढों में गिरना असंभव हैं।’’ मेरे देखे पाप और पुण्य मात्र कृत्य ही नहीं हैं। वस्तुतः तो वे हमारे अंतःकरण के सोये होने या जागे होने की सूचनाएं हैं। 
-ओशो

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