मंगलवार, 26 मई 2009

संत का सान्निध्य

संत का सान्निध्य अनुठा है। इसके रहस्य गहरे है। संत के सान्निध्य में जो दृश्य घटित होता है, वह थोड़ा है, लेकिन जो अदृश्य में घटता है, वह ज्यादा है। उसका महत्त्व और मोल अनमोल है । संत का सान्निध्य नियमित होता रहे, इसमें निरंतरता बनी रहे तो अपने आप ही जीवनक्रम बदलने लगता है । मन में जड़ जमाए बैठीं उलटी आस्थाएँ, मान्यताएँ, आग्रह फिर से उलटकर सीधे होने लगते है । संत के सान्निध्य में विचार परिवर्तन के क्रांति स्फुलिंग यों ही उड़ने रहते है । इसेक बाद दाहक स्पर्श से जीवन की अवांछनीयताओं का दहन हुए बिना नहीं रहता ।

संत के सान्निध्य में सत् का सत्य बोध अनायास हो जाता है, पर यह हो पाता है-संत के चित् के कारण, उसके चैतन्य-प्रवाह की वजह से। इस संबंध में बड़ा पावन प्रसंग है- संत फरीद के जीवन का । बिलाल नाम के एक व्यक्ति को कुछ षड्यंत्रकारी लोगों ने उसके पास भेजा । उसने संत फरीद को कई तरह से परेशान करने की कोशिश की, पर वह संत रहे । संत की इस अचरजभरी शांति ने, बिलाल के मन को छू लिया और वह उन्ही के साथ रहने लगा। उसे संत के साथ रहते हुए कई वर्ष बीत गए। इन वर्षों मे उसमें कई आध्यात्मिक परिवर्तन हुए । हालाँकि उसने इसके लिए कोई साधना नही की थी । संत फरीद के एक शिष्य ने थोड़ा हैरान होते हुए इसका रहस्य जानना चाहा । संत फरीद ने हँसते हुए कहा- संत का सान्निध्य स्वयं मे साधना है । संत के सान्निध्यमें अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह उमड़ता रहता है और अपने आप ही संत के सान्निध्य में, आध्यात्मिक व्यक्तित्व जन्म पा जाता है।

Friendship

1- "Friends are born, not made."
-Henry Adams
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2- "The lion and the calf shall lie down together, but the calf won't get much sleep."
-Woody Allen
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3- "No man is the whole of himself. His friends are the rest of him."
-Good Life Almanac
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4- "A friend to all is a friend to none."
-Aristotle
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5- "Friendship is a single soul dwelling in two bodies."
-Aristotle
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6- "Friendship is a thing most necessary to life, since without friends no one would choose to live, though possessed of all other advantages."
-Aristotle
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7- "The easiest kind of friendship for me is with ten thousand people. The hardest is with one."
-Joan Baez
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8- "Those that want friends to open themselves unto are cannibals of their own hearts."
-Francis Bacon
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9- "Friendship without self-interest is one of the rare and beautiful things in life."
-James Francis Byrnes
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10- "We make our friends; we make our enemies; but God makes our next-door neighbour."
-G.K. Chesterton
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11- "Friendship is the only thing in the world concerning the usefulness of which all mankind are agreed."
-Cicero
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12- "Friendship is not possible between two women one of whom is very well dressed."
-Laurie Colwin
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13- "Real friendships among men are so rare that when they occur they are famous."
-Clarence Day
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14- "Chance makes our parents, but choice makes our friends."
-Jacques Delille
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15- "It is the friends you can call up at 4 A.M. that matter."
-Marlene Dietrich
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16- "A friend may well be reckoned the masterpiece of nature."
-Ralph Waldo Emerson
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17- "Better to be a nettle in the side of your friend than his echo."
-Ralph Waldo Emerson
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18- "A friend is one before whome I can think aloud."
-Ralph Waldo Emerson
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19- "One loyal friend is worth ten thousand relatives."
-Euripides
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20- "Friendship is always a sweet responsibility, never an opportunity."
-Kahlil Gibran
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21- "Life is partly what we make it, and partly what it is made by the friends whom we choose."
-Tehyi Hsieh
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22- "Your friend is the man who knows all about you, and still likes you."
-Elbert Hubbard
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23- "When my friends are one-eyed, I look at their profile."
-Joseph Joubert
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24- "Friends are God's apology for relations."
-Hugh Kingsmille

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

कन्हाई की याद

कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई ।
फिर से श्याम घटा घिर आई ।।1।।

भोगवाद की सघन-घटायें।
भादों के घन-सी मंडराएँ॥
कैसी अन्धियारी घिर आई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।2।।

क्रूर-कंस से बौराए।
देवसंस्कृति पर मँडराए॥
देखो ! दानवता इतराई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।3।।

पतन-पाप-पूतना विषैली
दुष्प्रवृत्तियों हैं जहरीली।।
मानवता सहमी, सकुचाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।4।।

उगल रहा विष काम-कालिया।
कब नाथोगे रे ! सॉंवलिया।।
जन-जीवन-जमना अकुलाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।5।।

हैं धृतराष्ट्र -मोह के अन्धे।
दुयॉधन के धोखे-धन्धे।।
दु:शासन के बेशरामाई
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।6।।

बढ़ते हैं कुकृत्य, कौरव से।
पाण्डव वंचित हैं गौरव से।।
भीष्म, द्रोण पर जड़ता छाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।7।।

पान्चजन्य में फिर स्वर फूँको
कहो पार्थ से अरे न चूको।।
गीता की फूँको तरूणाई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।8।।

देवसंस्कृति बुला रही हैं।
करो दिग्विजय, समय यही हैं।।
परिवर्तन की वेला आई।
कब आओगे ? कृष्ण कन्हाई।।9।।

मंगल विजय `विजयवर्गीय`
अखण्ड ज्योति जनवरी १९९८

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

प्रकाश

प्रकाश
हमें ले जाता है
अंतहीन यात्राओं पर
अपने साथ
दिग् से दिगंत तक.

असंख्य लय और ताल और रागों में
व्यक्त करता है प्रकाश अपनी भंगिमाएँ.

उन्ही में से कुछ रहती हैं हमारे साथ
जब हम
निकलते हैं
जीवन की अंतर्यात्राओं पर.

अंधेरे के ख़िलाफ़
हमारे संघर्ष में
सबसे विश्वसनीय
साथी होता है प्रकाश.

वह हमसे संवाद करता है,
हमें हमारी अर्थवत्ता और
इयत्ता के अनसुलझे रहस्य
समझाने के लिए.

वह हमे निष्कलुष संसार में जीने योग्य
बनाने की कोशिश करता है.

हे दीप मालिके !
हमें प्रकाश को समझने की शक्ति प्रदान कर !!

-देवराज (नजीबाबाद)

दीप पर्व 2008
हार्दिक मंगलकामनाए...

जनमानस परिष्कार मंच

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

एक निवेदन


श्रद्धेय सेठजी श्री जयदयाल जी गोयन्दका
सर्वसाधारण से नम्रतापूर्वक निवेदन किया जाता है कि यदि उचित समझा जाय, तो प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन परमात्मा के और अपने से बडे जितने लोग घर में हो, उन सबके चरणों में प्रणाम करे, हो सके तो बिछौने से उठते ही कर लें, नहीं तो स्नान-पूजादि के बाद करे। गुरु, माता, पिता, ताऊ, चाचा, बडे भाई, ताई, काकी, भौजाई आदि वय, पद और सम्बन्ध के भेद से सभी गुरुजन है।

स्त्री अपने पति के तथा घर में अपने से सब बडी स्त्रियों के चरणों में प्रणाम करे। बडे पुरुषों को दूर से प्रणाम करे, घर में कोई बडा न हो तो स्त्री-पुरुष सभी परमात्मा को ही प्रणाम करे।

इससे धर्म की वृद्धि होगी, आत्मकल्याण में बडी सहायता मिलेगी, परमेश्वर प्रसन्न होगे। इस सूचना के मिलते ही जो लोग इसके अनुसार कार्य आरम्भ कर देंगे, उनकी बडी कृपा होगी।



दीप पर्व 2008
हार्दिक मंगलकामनाए...
जनमानस परिष्कार मंच

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

अन्तिम परीक्षा

गुरुकुल दीक्षांत समारोह भी हो गया किंतु तीनों विद्यार्थियों को घर जाने की आज्ञा न मिली। वे सोचने लगे अब क्या बाकी है। सब कुछ तो पढ़ सीख लिया। वर्षो से घर नहीं गये उन्हें याद सता रही थी। सांयकाल होते ही गुरु ने कहा ``तुम तीनों चाहो तो आज जा सकते हो।´´ जाने का नाम सुनकर विद्यार्थी बिना इन्तजार किये शाम को ही चल पड़े। रास्ता पैदल का था। पगडंडी पकड़कर जंगल के रास्ते से जा रहे थे। किंतु गुरु ने पहले ही मार्ग में कॉंटेदार झाड़ियॉं बिछवादी थीं। उनमें से एक विद्यार्थी ने पगडंडी का मार्ग छोड़कर रास्ता पार कर लिया। दूसरे ने छलॉंग लगाकर कॉंटेदार मार्ग पार कर लिया। तीसरा झाड़ियॉं हटाकर रास्ता साफ करने लग गया। सोचा अन्धेरे में दूसरे आगंतुक यात्री उलझेंगे बेचारों को बड़ा कष्ट होगा। साथी जिन्होने रास्ता पार कर लिया था वे बोले छोड़ो भी जल्दी चलो अन्धेरा होने वाला हैं। तीसरा विद्यार्थी जो कॉटा साफ करने में लगा था बोला-``इसीलिए और जरुरी हैं कॉंटा साफ करना कि कोई बेचारा अन्धेरे में उलझ न गिरे। तुम चलो मैं पीछे से आता हूं।"

अचानक झाड़ी में से गुरु प्रकट हुए वे बोले जो दो आगे चले गये हैं वे अंतिम परीक्षा में असफल रहें हैं अभी उन्हें कुछ दिन गुरुकुल में और ठहरना होगा। जिसने कॉंटे बीने थे उस की पीठ थपथपा कर कहा तुम अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए तुम जा सकते हो। गुरु ने कहा अंतिम परीक्षा शब्द की नहीं प्रेम की थी। पांडित्य की नहीं औरो के लिए करुणा की थी।


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

परम्परा और विवेक


एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रुई की गॉठ लादे जा रहा था। रास्ते में एक नदी मिली। पानी में घुसते ही घोड़े ने पानी में डुबकी लगाई तो काफी नमक पानी में घुल गया। गधे ने घोड़े से पूछा, यह क्या कर रहे हो ? घोड़े ने कहा, वनज हलका कर रहा हूँ। यह सुनकर गधे न भी दो डुबकी लगाई, पर उससे गॉंठ भीगकर इतनी भारी हो गई कि उसे ढोने में गधे की जान आफत में पड़ गई।

कुरीतियों, कुप्रचलनों की बिना समझे-बूझे की गई नकल कठिनाइयॉं बढ़ाती हैं, सुविधा नहीं।




मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008

श्रद्धा से ही विद्या मिलती हैं


हाथ में समिधायें लेकर दिलीप गुरु वशिष्ठ के पास गये, प्रणाम किया और विनीत भाव से पूछा, ``गुरुदेव ! विद्या प्राप्ति के लिये कौन-सी वस्तु सबसे अधिक आवश्यक है ?

´´वशिष्ठ ने कहा`` ``दिलीप ! जो छात्र श्रद्धा और अनुशासन से रह कर अध्ययन करते हैं विद्या केवल उन्हें ही प्राप्त होती हैं।´´


शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

शिक्षक का कर्तव्य

महर्षि आश्वल्यायन को गौरव प्राप्त था कि उनका पढ़ाया हुआ हर छात्र राष्ट्र का प्रतिभाशाली और यशस्वी व्यक्ति है। प्रधानमन्त्री, सेनापति से लेकर कुरुपद का कृषि-पण्डित भी उन्ही का छात्र था। तभी एक दिन उन्होने सुना, उन्हीं का एक छात्र देवदत्त दस्यु हो गया है। उसके क्रूर कर्मो के कारण समस्त कुरुपद में त्राहि-त्राहि मच गई है। कोई भी सेना और सेनापति उसे वश में नहीं कर सका। महर्षि के लिए यह सन्देश वज्राघात के समान था। भीषण रात, आकाश में बादल घिरे हुए, महर्षि को रोका भी गया, पर वे नहीं रुके सीधे वहॉं पहुंचे जहाँ देवदत्त दस्यु कर्म किया करता था। अन्धेरे में एक छाया देखते ही देवदत्त ने ललकारा, रुक जाओ नही तो खड्ग प्रहार करता हूँ, किन्तु आगन्तुक रुका नहीं। देवदत्त का खड्ग छूटा और आगन्तुक के माथे में जा धँसा। रक्त के फव्वारे के साथ आकाश में बिजली चमकी, देवदत्त महर्षि के चरणों में गिर गया। गुरुदेव यह क्या हुआ तीव्र वेदना में देवदत्त चिल्लाया। महर्षि ने कहा- ``वत्स ! मेरे शिक्षण में कुछ कमी रह गयी थी, उसका दण्ड मुझे मिलना ही था।´´ देवदत्त गुरु का आशय समझ गया फिर उसने कभी भी डकेती नहीं डाली।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

दु:ख भुलाना और सुख को याद रखना

दो दोस्त एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे। बीच रास्ते में उनके बीच बहस छिड गयी और पहले दोस्त ने दूसरे को थप्पड लगा दिया। जिसे थप्पड पडा उसने बिना कुछ कहे, रेत पर लिखा। ``आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड मारा।´´ ऐसा लिखकर वे दोनो साथ चल दिये। रास्ते में नदी आयी। दूसरा दोस्त उसमें नहाने के लिये उतरा और डूबने लगा। पहले दोस्त ने तुरन्त नदी में कूद कर उसकी जान बचायी। इस बार उस दोस्त ने पत्थर पर लिखा। ``आज मेंरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचायी। पहले ने उससे रेत और पत्थर पर लिखने का कारण पूंछा तो उसने जवाब दिया। `` 

जब कोई तकलीफ पहुंचाये तो उसे रेत पर लिखना चाहिये ताकि क्षमा की हवा उसे मिटा सके। लेकिन यदि कोई अच्छा करे तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिये, जिससे कोई भी उसे भुला न सके। ``दु:ख भुलाना और सुख को याद रखना खुद अपने हाथ में है।


रविवार, 12 अक्टूबर 2008

महत्वाकांक्षा

एक बूढ़ा घास खोदने में सबेरे से लगा हुआ था। दिन ढलने तक वह इतनी खोद सका था, जिसे सिर पर लाद कर घोड़े वाले की हाट में बेचने ले जा सके।

एक सुशिक्षित देर से उस बुड्ढ़े के प्रयास को देख रहा था। सो उसने पूछा, क्यों जी, दिन भर परिश्रम से जो कमा सकोगे, उससे किस प्रकार तुम्हारा खर्च चलेगा ? घर में तुम अकेले ही हो क्या ?

बूढे ने मुस्कराते हुए कहा, कई व्यक्तियों का मेरा परिवार है। जितने की घास बिकती है, उतने से ही हम लोग व्यवस्था बनाते है और काम चला लेते है।

युवक को आश्चर्यचकित देख कर बूढे ने पूछा, मालुम पड़ता है, तुमने अपनी कमाई से बढ़-चढ़ कर महत्वाकांक्षाएं संजो रखी है, इसी से तुम्हे गरीबी पर गुजारे से आश्चर्य होता हैं।

युवक से ओर तो कुछ कहते न बन पड़ा, पर अपनी झेंप मिटाने के लिए कहने लगा। गुजारा ही तो सब कुछ नहीं है, दान-पुण्य के लिए भी तो पैसा चाहिए।

बुड्ढा हँस पड़ा। उसने कहा, मेरी घास में तो बच्चों का पेट ही भर पाता है, पर मैंने पड़ोसियो से मॉंग-मॉंग कर एक कुआ बनवा दिया है, जिससे सारा गॉंव लाभ उठाता है। क्या दान-पुण्य के लिए अपने पास कुछ न होने पर दूसरे समर्थों से सहयोग माँग कर कुछ भलाई का काम कर सकना बुरा है।

युवक चला गया। रात भर सोचता रहा कि महत्वाकांक्षाएं संजोने ओर उन्ही की पूर्ति में जीवन लगा देना ही क्या एकमात्र तरीका जीवन जीने का है।


रविवार, 5 अक्टूबर 2008

भावना

रामानुजाचार्य को उसके गुरु ने कई विद्या सिखाईं। ज्ञानदीक्षा सम्पन्न करते हुए उनके आचार्य ने कहा, ``रामानुज नीच जाति के लोगों को यह ज्ञान मत देना।´´ इस पर रामानुज बोले, ``गुरुदेव ! जिसका गिरे हुओं को उठाने में उपयोग न हो, वह क्षिक्षा मुझे नहीं चाहिए।`` शिष्य की विशाल भावना देखते हुए आचार्य ने स्वेच्छा से उसके उपयोग करने की स्वीकृति दे दी।


सोमवार, 29 सितंबर 2008

ध्या‍न और सेवा

एक बार ज्ञानेश्‍वर महाराज सुब‍‍ह-सुबह‍ नदी तट पर टहलने निकले। उनहोनें देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है। नजदीक ही, एक सन्‍यासी ऑखें मूँदे बैठा था। ज्ञानेश्वर महाराज तुरंत नदी में कूदे, डूबते लड़के को बाहर निकाला और फिर सन्‍यासी को पुकारा। संन्‍यासी ने आँखें खोलीं तो ज्ञानेश्वर जी बोले- क्‍या आपका ध्‍यान लगता है ? संन्‍यासी ने उत्तर दिया- ध्‍यान तो नही लगता, मन इधर-उधर भागता है। ज्ञानेश्वर जी ने फिर पूछा लड़का डूब रहा था, क्‍या आपको दिखाई नही दिया ? उत्‍तर मिला- देखा तो था लेकिन मैं ध्‍यान कर रहा था। ज्ञानेश्वर समझाया- आप ध्‍यान में कैसे सफल हो सकते है ? प्रभु ने आपको किसी का सेवा करने का मौका दिया था, और यही आपका कर्तव्‍य भी था। यदि आप पालन करते तो ध्‍यान में भी मन लगता। प्रभु की सृष्टि, प्रभु का बगीचा बिगड़ रहा है1 बगीचे का आनन्‍द लेना है, तो बगीचे का संवारना सीखे।

यदि आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है और आप पूजा पाठ करने में मस्‍त है, तो यह मत सोचिये कि आपके द्वारा शुभ कार्य हो रहा है क्‍योकि भूखा व्‍यक्ति उसी की छवि है, जिसे पूजा-पाठ करके आप प्रसन्‍न करना या रिझाना चाहते है। क्‍या वह सर्व व्‍यापक नही है ? ईश्‍वर द्वारा सृजित किसी भी जीव व संरचना की उपेक्षा करके प्रभु भजन करने से प्रभु कभी प्रसन्‍न नही होगें।

जैसी दृष्टि

रामदास रामायण लिखते जाते और शिष्यों को सुनाते जाते थे | हनुमान जी भी उसे गुप्त रुप से सुनने के लिये आकर बैठते थे | समर्थरामदास ने लिखा, “हनुमान अशोक वन में गये, वहाँ उन्होंनें सफेद फूल देखे |”

यह सुनते ही हनुमान जी झट से प्रकट हो गये और बोले, “मैंने सफेद फूल नहीं देखे थे | तुमने गलत लिखा है, उसे सुधार दो|”

समर्थ ने कहा, “मैंने ठीक ही लिखा है| तुमने सफेद फूल ही देखे थे|”

हनुमान ने कहा, “कैसी बात करते हो! मैं स्वयं वहाँ गया और मैं ही झूठा!”

अन्त में झगडा श्री रामचंद्र्जी के पास पहुँचा| उन्होंने कहा की, “फूल तो सफेद ही थे, परन्तु हनुमान की आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं, इसलिए वे उन्हें लाल दिखाई दिये|” 

इस मधुर कथा का आशय यही है कि संसार की ओर देखने की जैसी हमारी दृष्टि होगी, संसार हमें वैसा ही दिखाई देगा|

सोमवार, 22 सितंबर 2008

शक्तिशाली कौन

एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी। उसने पूछा, ‘इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।’ शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, ‘नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है। 

लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।’ इस पर शिष्य बोला, ‘तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?’ बुद्ध मुस्कराए और बोले, ‘नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।’ उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, ‘मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।’

‘ नहीं।’ बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, ‘जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।’ शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है। शिष्य ने फिर सवाल किया, ‘आखिर जल पर किसका शासन है?’ बुद्ध ने उत्तर दिया, वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है। शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, ‘अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं, वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है। 

सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।’ यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

कर्म की महानता

एक बार बुद्ध एक गांव में अपने किसान भक्त के यहां गए। शाम को किसान ने उनके प्रवचन का आयोजन किया। बुद्ध का प्रवचन सुनने के लिए गांव के सभी लोग उपस्थित थे, लेकिन वह भक्त ही कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव के लोगों में कानाफूसी होने लगी कि कैसा भक्त है कि प्रवचन का आयोजन करके स्वयं गायब हो गया। प्रवचन खत्म होने के बाद सब लोग घर चले गए। रात में किसान घर लौटा। बुद्ध ने पूछा, कहां चले गए थे ? गांव के सभी लोग तुम्हें पूछ रहे थे।

किसान ने कहा, दरअसल प्रवचन की सारी व्यवस्था हो गई थी, पर तभी अचानक मेरा बैल बीमार हो गया। पहले तो मैंने घरेलू उपचार करके उसे ठीक करने की कोशिश की, लेकिन जब उसकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी तो मुझे उसे लेकर पशु चिकित्सक के पास जाना पड़ा। अगर नहीं ले जाता तो वह नहीं बचता। आपका प्रवचन तो मैं बाद में भी सुन लूंगा। अगले दिन सुबह जब गांव वाले पुन: बुद्ध के पास आए तो उन्होंने किसान की शिकायत करते हुए कहा, यह तो आपका भक्त होने का दिखावा करता है। प्रवचन का आयोजन कर स्वयं ही गायब हो जाता है।

बुद्ध ने उन्हें पूरी घटना सुनाई और फिर समझाया, उसने प्रवचन सुनने की जगह कर्म को महत्व देकर यह सिद्ध कर दिया कि मेरी शिक्षा को उसने बिल्कुल ठीक ढंग से समझा है। उसे अब मेरे प्रवचन की आवश्यकता नहीं है। मैं यही तो समझाता हूं कि अपने विवेक और बुद्धि से सोचो कि कौन सा काम पहले किया जाना जरूरी है। यदि किसान बीमार बैल को छोड़ कर मेरा प्रवचन सुनने को प्राथमिकता देता तो दवा के बगैर बैल के प्राण निकल जाते। उसके बाद तो मेरा प्रवचन देना ही व्यर्थ हो जाता। मेरे प्रवचन का सार यही है कि सब कुछ त्यागकर प्राणी मात्र की रक्षा करो। इस घटना के माध्यम से गांव वालों ने भी उनके प्रवचन का भाव समझ लिया।


रविवार, 21 सितंबर 2008

अहम्

राजा जनश्रुति को चिडिया की भाषा समझने की सामर्थ्य प्राप्त थी। हंसों की जोड़ी बात कर रही थी की जनश्रुति से तो बड़े मुनि रैक्य हैं, जो सदा परमार्थ में लगे रहते है। गाडीवान रैक्य के बड़ा होने की बात से उन्हें बड़ा कष्ट हुआ। दूसरे दिन उन्होंने उस गाडीवान की खोज कराई और बहुत-सा धन, अश्व और आभूषण लेकर मुनि रैक्य के पास गए और बोले- "आपकी कीर्ति सुनकर यहाँ आए हैं, हमें ब्रह्म विद्या का उपदेश दीजिये। "रैक्य मुनि ने उत्तर दिया- "राजन ! ब्रह्म-विद्या सीखनी है, तो अपना अन्तरंग पवित्र बनाओ। अंहकार को मिटाकर, श्रद्धा-विश्वास तथा नम्रता को धारण कर ही तुम सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त कर सकोगे।" जनश्रुति को अपनी भूल ज्ञात हुई और वे सिद्धि-संपादन का अहम् त्यागकर अन्दर से स्वयं को महान बनने में लग गए।

धर्मात्मा का बल

मरते समय बालि अंगद को भगवान् राम को सौंप गए थे। अंगद राम की सेना के वरिष्ठ सेनापतियों में से थे। उन्होंने रावण की सभा में अपने बल का प्रदर्शन करके रावण को भी चुनौती दी। छोटे से धर्मात्मा का बल अनीतिवान राज्याध्यक्ष से भी बड़ा होता हैं। वानर स्वल्प शक्तिवान थे, तो भी उन्होंने अधर्म का प्रतिरोध करने में अपना सर्वस्व झोंक दिया और मारे जाने की तनिक भी परवाह नहीं की। ऐसे शूरवीर धर्मात्मा का जीवन संसार में धन्य माना जाता हैं।

संगति

अजामिल अपनी दुष्टता एवं दुराचार के लिए विख्यात हुआ, पर आरंभ में वह एक सदाचारी ब्राह्मण था। किसी कारणवश विदेश गया तो वह कुलटा स्त्रियों और दुरात्मा लोगों की संगति में पड़ गया। कुसंग बड़े बड़ो का पतन कर देता हैं। बुरों का सुधरना कठिन हैं, पर अच्छों का बिगड़ जाना सरल हैं। कुसंग से अजामिल इतना पतित हुआ कि कसाई तक का काम करने लगा। कथा है कि वह पीछे सत्संग से सुधरा और भगवद्भक्त बना। कुसंग-सत्संग का मनुष्य पर भारी प्रभाव पड़ता है। इसलिऐ कुसंग से बचने और सत्संग खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।

शनिवार, 20 सितंबर 2008

धर्म

श्रावस्ती नरेश चन्द्रचूड़ को विभिन्न धर्मो और उनके प्रवक्ताओ से बड़ा लगाव था। राज-काज से बचा हुआ समय वे उन्हे ही पढ़ने और सुनने में लगाते थे। यह क्रम चलते बहुत दिन बीते थे कि राजा असमंजस में पड़ गये, जब धर्म शाश्वत हैं तो उनके बीच मतभेद और विग्रह क्यो ?

समाधान के लिए वे भगवान बुद्ध के पास गये और अपना असमंजस कह सुनाया। बुद्ध हंसें उन्हे सत्कारपूर्वक ठहराया और दूसरे दिन प्रात:काल उनके समाधान का वचन दिया।

दिनभर के प्रयास से एक हाथी और पॉँच जन्मांध जुटा लिये गये। प्रात:काल तथागत सम्राट को लेकर उस स्थान पर पहुँचें। किसी जन्मांध का इससे पूर्व कभी हाथी से संपर्क नहीं हुआ था। उनसे कहा गया कि वह सामने खड़ा है, उसे छुओ और उसका स्वरुप बतलाओ। अंधें ने उसे टटोला और जितना जिसने स्पष्ट किया, उसी अनुरुप उसे खंभे जैसा, रस्सी जैसा, सूप जैसा, टीले जैसा आदि बताया।

तथागत ने कहा, ‘‘राजन् ! संप्रदाय अपनी सीमित क्षमता के अनुरुप ही धर्म की एकांगी व्याख्या करते है। और अपनी मान्यता के प्रति हठी होकर झगड़ने लगते है।

जिस प्रकार हाथी एक है और उसका अंधविवेचन भिन्नतायुक्त। धर्म तो समता, सहिष्णुता, एकता, उदारता और सज्जनता में है। यही हाथी का समग्र रुप है। व्याख्या कोई कुछ भी करता रहे।’’

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