शुक्रवार, 11 मार्च 2011

नैतिक और अनैतिक आकांक्षाएँ

जहाँ एक ओर नैतिक भावनाओं का उन्नयन मन को अत्यन्त सबल एवं उत्पादक बना देता है और ऐसे आनन्द, सन्तोष से भर देता है जिसकी तुलना में कामवासना सरीखी पशुप्रवत्तियों का तुष्टिकरण तुच्छ्तम ही प्रतीत हो सकता है ।

वहीं दूसरी ओर अनैतिक आकांक्षाएँ और कुछ नहीं नैतिक भावनाओं के उत्थान के अभाव में बनी रहने वाली अंधकार भरी रिक्तता ही है ।

जैसे धूप जहाँ नहीं पहुँचती वहाँ सीलन रहती है, प्रकाश जहाँ नहीं होता वहाँ अँधेरा छाया रहता है ।

फ्राइड सरीखे मनोविज्ञानी इसी अभाव को मनुष्य की प्रवृत्ति मान बैठे हैं ।वे यह नहीं सोच सके कि उनके निष्कर्ष मानवी महानता को पतनोन्मुख बनाने का कितना घातक परिणाम प्रस्तुत करेंगे ।
- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
वांग्मय ५३ - धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म - पृष्ठ - २.२२

Effect of moral and immoral intentions

On analyzing the effects of moral and immoral intentions on our being, we observe that stirring up of moral, virtuous, honorable intentions in our psyche uplifts us and makes us more productive. It has an extremely positive and stimulating impact on our being. Where as even an attempt to pacify a lustful intention seems to be most vile to us.

Immoral desires are nothing but the gloomy, bleak void created by an absence of moral values.

Much like the musty, damp areas where sunlight never reaches, or the dark places where light does not shine.

Psychologists such as Freud, claim this human limitation, his uncontrollable sway under the impulse of immoral desires, vile intentions to be his one true nature, his true personality.

What they fail to realize is that conclusions like these, presented by them, will produce a grave outcome of severely undermining human greatness, glory and dignity.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
From the Complete Works of
Pandit Shriram Sharma Acharya Vol. 53
(Essence of Dharma and Its Significance)
page 2.22

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