शुक्रवार, 11 मार्च 2011

तत्त्वज्ञान का अर्थ

तत्त्वज्ञान का अर्थ भगवान के सम्बन्ध में अपनी मान्यता का स्पष्ट होना और प्राणिमात्र में उसकी ज्योति का दर्शन होना ।

सर राधाकृष्णन - बौद्धिक तर्क क्षमता ऐसी है जिसके सहारे हम अनैतिक और अवास्तविक बातों को भी प्रमाणिक जैसे ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं । तर्कों के आधार पर असत्य को भी सिद्ध किया जा सकता है ।

जिस प्रकार मोटा पहलवान साधारण स्वास्थ्य वाले को दबोच लेता है, उसी प्रकार मस्तिष्कीय बलिष्ठता के सहारे अनुपयुक्त को भी उपयुक्त सिद्ध किया जा सकता है । इसलिए बुद्धि को तत्त्वज्ञान में मान्यता नहीं दी गई।

इस क्षेत्र में अनुभूति और संवेदना ही प्रामाणिक मानी जाती है और यह दोनों उस अन्त:करण में उत्पन्न होती हैं, जिसे संयम और साधना द्वारा परिष्कृत किया गया हो, आत्मा की वाणी इसी को कहते हैं ।

यह देश और धर्म की सीमाओं का उल्लंघन करके सर्वत्र एक जैसी ही उदभाषित होती है ।

इसमें बुद्धि की अवज्ञा नहीं की जा रही है, वरन यह कहा जा रहा है कि श्रद्धा और सदाशयता का पुट लगा -लगाकर पवित्रतम बनाया जाय।

अन्तर्दृष्टि या विवेकशील प्रज्ञा ही हमें हमारे वास्तविक स्वरूप को बताती है और उन कर्तव्यों का बोध कराती है जिनमे कोई सम्प्रदाय या दर्शन अवरोध उत्पन्न नहीं करता ।

आत्मीयता और करुणा के आधार पर ही वह कोई निर्णय करती है, तो उसमें पक्षपात या अनुपयुक्तता जैसी कहीं कोई गुंजाइश नहीं रहती है ।

सत्य और धर्म दोनों एक ही हैं, इसलिए उनमें मतभेद की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है ।

- पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
वांग्मय ५३ - धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म
पृष्ठ - २.२७

Supreme knowledge is to realize without a doubt the concept of God [in our personal context] and to see His light [subtle presence] in every living being.

Sir Radhakrishnan says – Intellectual [human] logic is very capable of dressing up fallacies and fictitious things in the garb of truth, making them seem authentic. Just on the basis of logic we can even prove a lie (to be the truth). Like a strong wrestler can overpower a normal human being, on the basis of intellectual might, we can establish the worthiness of a completely useless thing.

Therefore, intellect is not recognized in [as a method of obtaining] supreme knowledge.

In this context, only experience, feelings, and emotions are considered authentic. These can be found in that soul which has been perfected through self-restraint, conditioning and preparations [preparations - to control ones abilities and then channelize them in a desired direction]. These authentic qualities are the voice of the soul. This voice of the soul transcends all boundaries of religion or place and is articulated everywhere in the same exact way.

When one experiences divinity either at a single point in time or in individuals, the experience is always the same despite the religious belief or the surroundings. Feelings and emotions appear the same in every human being irrespective of the religion or the surroundings.

Here, we are not trying to undermine the importance of intellect, but rather proposing that by augmenting it with faith and compassion it can be refined and purified. It is only by insight or by discriminating wisdom can we realize our true self and understand our fundamental duties. These duties never contradict any philosophy or beliefs of a particular sect.

Based on insight and discriminating wisdom, decisions are solely based on empathy and compassion so there is no possibility for being inappropriate or capricious.

Truth and Dharma speak of the same, therefore they cannot disagree with each other.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
From the Complete Works of
Pandit Shriram Sharma Acharya Vol. 53
(Essence of Dharma and Its Significance)
page 2.27

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