शनिवार, 8 सितंबर 2012

वैराग्य की प्राप्ति

एक साधू नदी किनारे टहल रहे थे , उन्होंने देखा की एक मछुवारा नदी के तट पर बैठा लोहे के काटे में आटे की गोलिया फसा रहा हैं , उत्सुकता से उन्होंने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो वो बोला कि :- "महाराज ! मैं ये काटा नदी में डालूँगा और आटे की लालच में मछलिया गोलिया खाएगी तो कटे में फस जाएगी, तब में उन्हें पकड़ लूँगा ".. 

साधू ने उससे फिर सवाल किया यदि - यदि मछलिया गोलिया गटककर फिर मुह हटा ले तो क्या होगा ?? "

मछुवारा बोला - "महाराज ! रस की चीजों से चिपकना जादा आसान हैं उनसे दूर जाना उतना ही कठिन हैं " ... यह सुन कर साधू को शास्त्र वचन याद आया कि विषयों मैं मन का लगना स्वभाविक हैं , पर वैराग्य की प्राप्ति के लिए निरंतर अभ्यास कि आवश्यकता हैं .... 

शनिवार, 1 सितंबर 2012

1 chup 100 sukh.

1- "Just a movement is not a Life
But every movement is a turning point of ur Life..."
Think sLowLy, U wiLL get actuaL meaning of Life

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2- "Ek Behtreen Insaan Apni Jubaan Se Hi Pahchana Jata Hai...
Warna Achhi Baatein To Deewaro Par Bhi Likhi Hoti H.

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3- All d Right Things r Not Possible Always,
All d Possible Things r Not Right Always..
so just be True to ur Heart, u'll NEVER Go Wrong.

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4- The Most
Important
TIME
to
Hold
Your
Temper
is
when the
Other Person
has Lost it''....

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5- Zindgi se ap jo bhi behtar-se-behtar le sakte ho, le lo !
Qki...
Zindgi jab lena shuru karti h to "SAANSE" bhi nhi chhodti.

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6- "Imagination is d ability of using mental energy 4 superficial accomplishment. Have a clear mental picture of who u r, who u will be…
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7- "No one in this world is pure and perfect.If u avoid people 4 their mistakes,u will always be alone in this world.So judge less n love more.''
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8- "Jeet aur Haar"
Mission ke pehle Apni Soch par depend karti hai.
'MAAN LO' to HAAR hogi.
aur
'THAAN LO' to JEET hogi.

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9- Plan to develop your strengths,reduce your weaknesses and move forward...success will surely be yours..."
EVERYTHING IS EASY IF YOU FOCUS !

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10- "The most valuable 'currency' of any organization is the initiative and creativity of its members." 
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11- A tongue has no bones,but it can break a Heart...& also that a tongue has no glue but it can heal a broken Heart
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12- 1 chup 100 sukh.
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13- "Forgiveness is the Economy of the Heart."
It Saves the Expense of Anger,
the Cost of Hatred and the Wastage of Peaceful Moments. 
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14- Aanandit Man, Madhur Vani aur Vivek se yukt Vyavhar  "jivan ko safal banate hai.."
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15- Radhe krishan
Rah De krishan

Radhika Krishan
Rah Dikha Krishan

Meera Krishan
Mera Krishan

Hare Keishan
Hr Ek Ka Krishan

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16- "Solve simple mistakes early before it leads to big problem.
Because we always slip from small stones, not from a mountain.."

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17- Rs.10 Ka NOTE Bahot ZYADA Lagta Hai Jab GARIB Ko Dena Ho, Magar HOTEL Mein TIP Dena Ho To Bahot KAM Lagta Hai.
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18- "Anything that happens is for a good reason and Anything that doesnt happen is only for very good reason" Trust these words & u'll love ur life.
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19-"Waqt" Aur "Haalat" Dono insaan Ki zindgi Me Kbhi 1 jaise Nhi Hote,

Waqt insan Ki Zindgi Bdal Deta h, Aur Haalat Badalne Me Waqt Nhi Lagta..
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20- "Jo vyast h whi Hamare liye SAMAYDAAN kr skte h,
niththallo ka samay to niththallepan aur bekar ki bato me hi chala jata h"
-Parm pujya gurudev

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21- "Do Not Store Dreams In ur Eyes"
dey May Roll Down With Tears.
Store dem In ur Heart,
Each Heart Beat Will Inspire u To Fulfill dem.

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22- "Every thing u want in ur life is waiting for u.
An inch Outside ur comfort zone n n inch inside ur effort zone."
JUST MAKE A MOVE.

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23- "Kavita Ho Ya Kalakriti
Pustak Ho Ya Natak
Hr Kalakar Apna Hi Nam Dete H
Pr
MAA Jaisa Koi Nhi h jo
Santan Ko khud JaNam Dekar Nam Pita Ka Deti h

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24- God's Grace is like a Torch Light in a Dark cave.
It doesn't show us everything at once,
but gives us Enough Light 4 d Next Step to b Safe.

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बुधवार, 8 अगस्त 2012

|| कर्म - विवेचन ||

कर्म कई प्रकार के है , जिनको हम तीन भागों में बाँट सकते हैं -

[ १ ] निषिद्ध कर्म - चोरी , व्यभिचार , हिंसा , असत्य , कपट , छल , जबरदस्ती , अभक्ष्य - भक्षण , प्रमाद आदि |

[ २ ] काम्य कर्म - स्त्री , पुत्र , धन आदि प्रिय... वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग संकट आदि की निवृति के लिए किये जाने वाले कर्म |

[ ३ ] कर्तव्य  कर्म - ईश्वर की भक्ति , देवतावों का पूजन , यज्ञ , दान ,तप , माता - पिता और गुरुजनों की सेवा , वर्णाश्रम धर्म के अनुसार शास्त्र विहित शुभ कर्म , शरीर संबंधी खान - पान के कर्म आदि - आदि |

कर्तव्य - कर्म भी कामनायुक्त होने से काम्य - कर्मों में समझे जा सकते हैं | कर्तव्य - कर्मों के दो भेद होते हैं -

[ १ ] सकाम कर्म - जो केवल कामना व फल की इच्छा को लेकर ही किये जाते हैं | यदि धन के लिए कर्म किया जाता है तो उसे [ कर्ता को ] पल पल में धन की ही स्मृति होती है | धन मिलने पर [ सिद्धि में ] वह हर्षित होता है , न मिलने पर [ असिद्धि में ] वह दु:खीराम होता है | लोभ के कारण उसका पतन भी हो सकता है और वह निषिद्ध कर्मों में प्रवृत हो जाता है |

[ २ ] निष्काम - कर्म - इसमें उसके मन में किसी प्रकार की कामना नहीं रहती , वह फल की इच्छा को छोड़कर , आसक्ति रहित होकर कर्म करता है , जैसे एक पिता अपनी पुत्री का पालन - पोषण , विवाह आदि करता है |

निष्काम कर्म करने वाले का लक्ष्य / उद्देश्य केवल " परमात्मा की प्राप्ति " ही रहता है | तथा सिद्धि - असिद्धि में उसे हर्ष - शोक , विकार नहीं होते | निष्काम कर्म में बीज का नाश नहीं होता और न ही इसका उल्टा फल होता है | अर्थात इसके थोड़े से अनुष्ठान से भी जन्म - मरण के भय से मुक्ति मिल जाती है |

शनिवार, 4 अगस्त 2012

नवयुवक सज्जनता और शालीनता सीखें

कहना न होगा कि समस्त समृद्धि, प्रगति और शान्ति का सद्भाव मनुष्य के सद्गुणों पर अवलम्बित है। दुर्गुणी व्यक्ति हाथ में आई हुई, उत्तराधिकार में मिली हुई समृद्धियों को गवाँ बैठते हैं और सद्गुणी गई-गुजरी परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रगति के हजार मार्ग प्राप्त कर लेते हैं । सद्गुणी की विभूतियॉं ही व्यक्तित्व को प्रतिभावान बनाती हैं और प्रखर व्यक्तित्व ही हर क्षेत्र में सफलताएँ वरण करते चले जाते हैं ।

उठती आयु में सबसे अधिक उपार्जन सद्गुणों का ही किया जाना चाहिए । विद्या पढ़ी जाये सो ठीक है, खेल-कूद, व्यायाम आदि के द्वारा स्वास्थ्य बढ़ाया जाये, सो भी अच्छी बात है, विभिन्न कला-कौशल और चातुर्य सीखे जायें, वह भी सन्तोष की बात है पर सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि इस आयु में जितनी अधिक सतर्कता और तत्परतापूर्वक सद्गुणो का अभ्यास किया जा सके, करना चाहिए । एक तराजू में एक और शिक्षा, बुद्धि, बल और धन आदि की सम्पत्तियाँ रखी जायें और दूसरी पलड़े में सद्गुण तो निश्चय ही यह दूसरा पलड़ा अधिक भारी और अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगा । दुर्गुणी व्यक्ति साक्षात संकट स्वरूप है । वह अपने लिए पग-पग पर काँटे खड़े करेगा, अपने परिवार को त्रास देगा और समाज में अगणित उलझनें पैदा करेगा । उसका उपार्जन चाहे कितना ही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो, कुकर्म बढ़ाने और विक्षोभ उत्पन्न करने वाले मार्ग में ही खर्च होगा । ऐसे मनुष्य अपयश, घृणा, द्वेष, निन्दा और भर्त्सना से तिरस्कृत होते हुए अन्तत: नारकीय यन्त्रणाएँ सहते हैं।

आज अभिभावक रुष्ट, अध्यापक दु:खी, साथी क्षुब्ध, स्वयं में उद्विग्नता हैं । इन सबका एक ही कारण है - दुर्गुणों की मात्रा बढ़ जाना । बुखार बढऩे की तरह मर्यादाओं का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति का बढऩा भी खतरनाक है । कहने का सार यह है कि जो भी हों अपने बच्चों को समझाने और सिखाने का हर कडुआ-मीठा उपाय हमें करना चाहिए कि वे सज्जन, शालीन, परिश्रमी और सत्पथगामी बनें, इसी में उनका और हम सबका कल्याण है ।

युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१०१)

प्रधानता वातावरण की


प्रतिभाएँ वातावरण विनिर्मित भी करती हैं, पर उनकी संख्या थोड़ी सी ही होती है। हीरे भी जहाँ-तहाँ कभी-कभी ही निकलते हैं, पर काँच के नगीने ढेरों कारखानों में नित्य ढलते रहते हैं। अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो वातावरण के दबाव से भले या बुरे ढाँचे में ढलते है। ऐसे लोग अपवाद ही हैं, जो बुरे लोगों के संपर्क में रह कर भी अपनी गरिमा बनाये रहते हैं। साथ ही अपने प्रभाव से क्षुद्रों को महान बनाते, बिगडों को सुधारने में समर्थ होते हैं।

प्रधानता वातावरण की है। सामान्यजन प्रवाह के साथ बहते और हवा के रुख पर उड़ते देखे जाते हैं। पारस के उदाहरण कम ही मिलते हैं। सूरज चाँद जैसी आभा किन्हीं विरलों में ही होती है जो अँधेरे में उजाला कर सकें।

आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य लेकर चलने वालों को तो विशेष रूप से इस आवश्यकता को अनुभव करना चाहिए। उसे जुटाने के लिए प्रयत्नशील भी रहना चाहिए। इसके दो उपाय हैं, एक यह कि जहाँ इस प्रकार का वातावरण हो, वहाँ जाकर रहा जाये। दूसरा यह कि जहाँ अपना निवास है वहीं प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति उत्पन्न की जाय। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि अपने निज के लिये कुछ समय के लिए वैसी स्थिति उत्पन्न कर ली जाये जिनके आधार पर अच्छे वातावरण का लाभ उठाया जा सके। एकांत, स्वाध्याय, मनन, चिंतन ऐसे ही आधार हैं।

जीवन देवता की साधना-आराधना 2:1.46"

उपार्जन ही नहीं सदुपयोग भी

उपार्जन एक बात है और सदुपयोग दूसरी। शारीरिक और मानसिक क्षमता के आधार पर किसी भी प्रकार उपार्जन किया जा सकता है, किन्तु उसका सदुपयोग दूरदर्शी विवेक के बिना नीति निष्ठा के बिना बन नहीं पड़ता। उस स्तर की क्षमता का होना भी सुसंतुलन बनाये रखने के लिए आवश्यक है।

पदार्थ विज्ञान प्रदत्त संसाधनों, अनेकानेक उपकरण, उपलब्धियों का अगर यदि सदुपयोग बन पड़े तो निःसंदेह मनुष्य इतना सुखी, संतुष्ट, प्रसन्न एवं समुन्नत बन सकता है, जितना की स्वर्गलोकवासियों के सम्बन्ध में सोचते और वैसा सुयोग प्राप्त करने के लिए हम ललचाते रहते हैं।

जीवन देवता की साधना-आराधना (२)- १.१०"

रविवार, 29 जुलाई 2012

पहली रोटी गाय को खिलाएं, क्योंकि..

गाय हिंदु धर्म में पवित्र और पूजनीय मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार गौसेवा के पुण्य का प्रभाव कई जन्मों तक बना रहता है। इसीलिए गाय की सेवा करने की बात कही जाती है।

पुराने समय से ही गौसेवा को धर्म के साथ ...ही जोड़ा गया है। गौसेवा भी धर्म का ही अंग है। गाय को हमारी माता बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि गाय में हमारे सभी देवी-देवता निवास करते हैं। इसी वजह से मात्र गाय की सेवा से ही भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही गौमाता की भी पूजा की जाती है। भागवत में श्रीकृष्ण ने भी इंद्र पूजा बंद करवाकर गौमाता की पूजा प्रारंभ करवाई है। इसी बात से स्पष्ट होता है कि गाय की सेवा कितना पुण्य का अर्जित करवाती है। गाय के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए कई घरों में यह परंपरा होती है कि जब भी खाना बनता है पहली रोटी गाय को खिलाई जाती है। यह पुण्य कर्म बिल्कुल वैसा ही जैसे भगवान को भोग लगाना। गाय को पहली रोटी खिला देने से सभी देवी-देवताओं को भोग लग जाता है।

सभी जीवों के भोजन का ध्यान रखना भी हमारा ही कर्तव्य बताया गया है। इसी वजह से यह परंपरा शुरू की गई है। पुराने समय में गाय को घास खिलाई जाती थी लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी है। जंगलों कटाई करके वहां हमारे रहने के लिए शहर बसा दिए गए हैं। जिससे गौमाता के लिए घास आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती है और आम आदमी के लिए गाय के लिए हरी घास लेकर आना काफी मुश्किल कार्य हो गया है। इसी कारण के चलते गाय को रोटी खिलाई जाने लगी है।

प्रभावशाली व्यक्तित्व

प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी को कभी भी असफलता का मुख नहीं देखना पड़ता, वे आसानी के साथ दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं तथा उन्हें अपना मित्र बना लेते हैं..मनुष्य की पहचान उसके व्यक्तित्व से ही होती है..नीचे कुछ बातें हैं जिनकी सहायता से हम अपने व्यक्तित्व का विकास करके स्वयं को प्रभावशाली बना सकते हैं !!

(1) दूसरों के प्रति स्वयं का व्यवहार- 
दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करें। याद रखें कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है।

दूसरों में जो भी अच्छे गुण हैं उनकी ईमानदारी के साथ दिल खोल कर प्रशंसा करें। झूठी प्रशंसा कदापि न करें। यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें। किसी की निन्दा करके आपको कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता उल्ट आप उसकी नजरों गिर सकते हैं।

अपने सद्भाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करें।

सभी को पसंद आने वाला व्यक्तित्व

दूसरों में वास्विक रुचि लें। यदि आप दूसरों में रुचि लेंगे तो दूसरे भी अवश्य ही आप में रुचि लेंगे।

दूसरों को सच्ची मुस्कान प्रदान करें।

प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसका नाम सर्वाधिक मधुर, प्रिय और महत्वपूर्ण होता है। यदि आप दूसरों का नाम बढ़ायेंगे तो वे भी आपका नाम अवश्य ही बढ़ायेंगे। व्यर्थ किसी को बदनाम करने का प्रयास कदापि न करें।

अच्छे श्रोता बनें और दूसरों को उनके विषय में बताने के लिये प्रोत्साहित करें।

दूसरों की रुचि को महत्व दें तथा उनकी रुचि की बातें करें। सिर्फ अपनी रुचि की बातें करने का स्वभाव त्याग दें।

दूसरों के महत्व को स्वीकारें तथा उनकी भावनाओं का आदर करें।

(2) अपने सद्विचारों से दूसरों को जीतें
तर्क का अंत नहीं होता। बहस करने की अपेक्षा बहस से बचना अधिक उपयुक्त है।

दूसरों की राय को सम्मान दें। ‘आप गलत हैं’ कभी भी न कहें।

यदि आप गलत हैं तो अपनी गलती को स्वीकारें।

सदैव मित्रतापूर्ण तरीके से पेश आयें।

दूसरों को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दें।

दूसरों को अनुभव करने दें कि आपकी नजर में उनकी बातों का पूरा पूरा महत्व है।

घटनाक्रम को दूसरों की दृष्टि से देखने का ईमानदारी से प्रयास करें।

दूसरों की इच्छाओं तथा विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।

दूसरों को चुनौती देने का प्रयास न करें।

(3) अग्रणी बनें: बिना किसी नाराजगी के दूसरों में परिवर्तन लायें
दूसरों का सच्चा मूल्यांकन करें तथा उन्हें सच्ची प्रशंसा दें।

दूसरों की गलती को अप्रत्यक्ष रूप से बतायें।

आपकी निन्दा करने वाले के समक्ष अपनी गलतियों के विषय में बातें करें।

किसी को सीधे आदेश देने के बदले प्रश्नोत्तर तथा सुझाव वाले रास्ते का सहारा लें।

दूसरों के किये छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें।

आपके अनुसार कार्य करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करें।

अपना और पराया

मनोहर वन में एक बार बहुत जोरों का तूफान आया | वैसा पहले न किसी ने देखा न सुना था | मूसलाधार पानी बरस रहा था, रह-रहकर बिजली कड़क रही थी कि सभी को उड़ाए ले जा रही थी | वृक्षों के कोटरों में रहने वाले नन्हें नन्हें पक्षियों के दिल काँप उठे | उस भयंकर तूफान में वृक्ष भी न खड़े रह पाए और एक-एक करके वे गिरने लगे |

जैसे-जैसे तूफान खत्म हुआ | पक्षी डरते-डरते अपने-अपने घोसलों से निकले | पूरे वन में दस पक्षी ही जीवित थे | शेष सभी उस तूफान की भेंट चढ़ चुके थे | अपने-अपने संबंधियों के शोक में वे सभी रोने लगे | दो दिन तक उन्होंने खाने की ओर मुँह तक भी न उठाया |

पूरे के पूरे वन में बस एक बरगद दादा ही बचे थे और सारे वृक्ष तूफान में गिर चुके थे | बरगद दादा से पक्षियों का दु:ख देखा न गया | उन्होंने प्यार से सभी को अपने पास इकट्ठा किया और बोले - "बच्चों ! जैसी स्थिति है उसका धैर्य से सामना करो | सोचो ! भगवान की इस लीला के आगे अब किया भी क्या जा सकता है ? सुख और दु:ख यह तो जीवन में निश्चित रूप से आते ही हैं ? उठो ! साहस से स्थिति का सामना करो | दु:ख को भी भगवान के प्रसाद के रूप में ले लो और नए सिरे से निर्माण में जुट जाओ | तुम्हारा जीवन अदभुत रूप से जगमगा उठेगा | "

-वृक्ष गंगा अभियान

नादिरशाह फकीर के पास गया। वहाँ उसने देखा कि परिंदे भी हैं, पानी भी हैं, अन्न भी हैं, फल भी है। फकीर ने उसके मन को पढ़ा और कहा कि परिंदों के कारण यहाँ अन्न-जल है। तुम इनसान जिंदा हो तो मात्र परिंदो के कारण। तुम्हारी क्रूरता ने, जल्लादी व्यवहार ने तो परिंदो को भी खतम कर दिया और वृक्ष भी समाप्त हो गए। 

आज पेड़ कट रहे है। परिंदे हमारे लिए पुण्य एकत्र करते हैं, वृक्षों की छाया में मात्र निवास चाहते है। पर हम उनका बसेरा उजाड़ रहे है। पथिकों को छाया, परिंदो को बसेरा, हमें फल-भोजन जंगलों से ही मिलते है। क्या हम समझेंगे कि वृक्षारोपण करने से ही हमारी भविष्य की पीढ़ी सुरक्षित रहेगी। इनसान व प्रकृति के बीच बड़ा सूक्ष्म आध्यात्मिक संबंध है। वह हमें जिंदा रखना है तो जंगल बचाने का-वृक्षों को लगाने का अभियान-वृक्ष गंगा अभियान लोकप्रिय बनाना होगा। 

अखण्ड ज्योति जुलाई 2011

बच्चों को उत्तराधिकार में धन नहीं, गुण दें


(प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश )

सुख का निवास सदगुणों में है, धन-दौलत में नहीं | जो धनी है और साथ में दुर्गुणी भी, उसका जीवन दुःखों का आगार बन जाता है | दुर्गुण एक तो यों ही दुःख के स्रोत होते हैं फिर उनको धन-दौलत का सहारा मिल जाये तब तो वह आग जैसी तेजी से भड़क उठते हैं जैसे हवा का सहारा पाकर दावानल| मानवीय व्यक्तित्व का पूरा विकास सदगुणों से ही होता है | निम्नकोटि के व्यक्तित्व वाला मनुष्य उत्तराधिकार में पाई हुई सम्पत्ति को शीघ्र ही नष्ट कर डालता है और उसके परिणाम में न जाने कितना दुःख, दर्द, पीड़ा, वेदना, ग्लानी, पश्चाताप और रोगपाल लेता है |

जो अभिभावक अपने बच्चों में गुणों का विकास करने की ओर से उदासीन रहकर उन्हें केवल, उत्तराधिकार में धनदौलत दे जाने के प्रयत्न तथा चिंता में लगे रहते हैं वे भूल करते हैं | उन्हें बच्चों का सच्चा हितैषी भी कहा जा सकना कठिन है | गुणहीन बच्चों को उत्तराधिकार में धन-दौलत दे जाना पागल को तलवार दे जाने के समान है | इससे वह न केवल अपना ही अहित करेगा बल्कि समाज को भी कष्ट पहुँचायेगा | यदि बच्चों में सदगुणों का समुचित विकास न करके धन-दौलत का अधिकारी बना दिया गया और यह आशा की गई की वे इसके सहारे जीवन में सुखी रहेंगे तो किसी प्रकार उचित न होगा | ऐसी प्रतिकूल स्थिति में वह सम्पत्ति सुख देने में तो दूर उलटे दुर्गुणों तथा दुःखों को ही बढ़ा देगी |

यही कारण तो है कि गरीबों के बच्चे अमीरों की अपेक्षा कम बिगड़े हुए दीखते हैं | गरीब आदमियों को तो रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना होता है | शराबखोरी, व्याभिचार अथवा अन्य खुराफातों के लिए उनके पास न तो समय होता है और न फालतू पैसा | निदान वे संसार के बहुत से दोषों से आप ही बच जाते हैं | इसके विपरीत अमीरों के बच्चों के पास काम तो कम और फालतू पैसा व समय ज्यादा होता है जिससे वे जल्दी ही गलत रास्तों पर चलते हैं | इसलिए आवश्यक है कि अपने बच्चों का जीवन सफल तथा सुखी बनाने के इच्छुक अभिभावक उनको उत्तराधिकार में धन-दौलत देने की अपेक्षा सदगुणी बनाने की अधिक चिंता करें | यदि बच्चे सदगुणी हों तो उत्तराधिकार में न भी कुछ दिया जाये तब भी वे अपने बल पर सारी सुख-सुविधाएँ इक्ट्ठी कर लेंगे | गुणी व्यक्ति को धन-सम्पती के लिए किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती |

१ बच्चों को उत्तराधिकार में धन नहीं गुण दें 
२ शिशु निर्माण में अभिभावकों का उत्तरदायित्व 
३ संतान पालन की शिक्षा भी चाहिए 
४ बच्चे घर की पाठशाला में 
५ शांति स्नेह और सौम्यता के प्यासे बालक 
६ बालकों का समुचित विकास आवश्यक 
७ बच्चों का पालन पोषण कैसे करें ? 
८ बालकों का विकास इस तरह होगा 
९ बालकों के निर्माण में माता का हाथ 
१० बच्चों को डराया न करें 
११ बच्चों में अच्छी आदतें पैदा कीजिये 
१२ बच्चों को सभ्य और सामाजिक बनाइए 
१३ बच्चे झगडालू क्यों हो जाते हैं ? 
१४ बच्चों को हठी न होने दीजिए 
१५ बच्चों को अनुशासन कैसे सिखाया जाए ? 
१६ बच्चों के मित्र बनकर उन्हें व्यवहार कुशल बनाएँ 
१७ बच्चों को व्यवहार कुशल बनाइये 
१८ बालकों के निर्माण का आधार 
१९ बालकों के निर्माण का आधार 
२० बालकों की शिक्षा में चरित्र निर्माण का स्थान 
२१ किशोरों के निर्माण में सावधानी बरती जाए 
२२ बच्चों की उपेक्षा न कीजिए 
२३ बाल अपराध की चिंता जनक स्थिति 
२४ बाल अपराध बढे तो राष्ट्र गिर जाएगा 
२५ बच्चे अपराधी क्यों बनते है ? 
२६ बालकों को अपराधी बनाने वाला अपराधी समाज 
२७ क्या दंड से बच्चे सुधरते हैं ? 
२८ बच्चों को दंड नहीं दिशाएँ दें

दुख क्या हैं ?

इच्छाएं दरिद्र बनाती हैं। उनसे ही याचना और दासता पैदा होती हैं। फिर, उनका कोई अंत भी नहीं हैं। जितना उन्हे छोड़ो, उतना ही व्यक्ति स्वतंत्र और समृद्ध होता हैं। जो कुछ भी नहीं चाहता हैं, उसके स्वतंत्रता अनंत हो जाती है। 


एक सन्यासी के पास कुछ रूपये थे। उसने कहा कि वह उन्हें किसी गरीब आदमी को देना चाहता हैं। बहुत से गरीब लोगों ने उसे घेर लिया और उससे रूपयों की याचना की। उसने कहा, मैं अभी देता हूँ - मैं अभी उसे रूपये दिए देता हूं जो इस जगत मे सबसे ज्यादा गरीब और भूखा हैं। यह कहकर सन्यासी भीतर गया। तभी लोगों ने देखा कि राजा की सवारी आ रही है। वे उसे देखने में लग गए। इसी बीच सन्यासी बाहर आया और उसने अपने रूपये हाथी पर बैठे राजा के पास फेंक दिए। राजा ने चकित हो, इसका कारण पूछा, फिर लोगो ने भी कहा कि आप तो कहते थे कि मैं रूपये सर्वाधिक दरिद्र व्यक्ति को दूंगा। सन्यासी ने हँसते हुए कहा-मैंने उन्हे दरिद्रतम व्यक्ति को ही दिया हैं। वह जो धन की भूख में सबसे आगे हैं, क्या सर्वाधिक गरीब नही हैं ?

दुख क्या हैं ? कुछ पाने की और कुछ होने की आकांक्षा ही दुःख हैं। दुख कोई नहीं चाहता, लेकिन आकांक्षाएं हो तो दुख बना ही रहेगा। किंतु, जों आकांक्षाओं के स्वरूप को समझ लेता हैं, वह दुख से नहीं, आकांक्षाओ से ही मुक्ति खोजता हैं। जब हम इच्छाओं और आकांक्षाओं के घेरे से बाहर आ जाते हैं तो दुख अपने आप दूर हो जाते हैं। और दुख के आगमन का द्वार अपने आप ही बंद हो जाता है। 

-ओशो

आत्मिक तृप्ति का आधार

संसार के प्रमुख दार्शनिकों का मत है कि जीव की स्वाभाविक इच्छा और अभिलाषा आत्मिक उन्नति की है। भौतिक सुविधाओं को लोग इकट्ठा करते हैं, इन्द्रियों के विष भोगते हैं, पर बारीक दृष्टि से देखने पर पता चलता है कि ये सब कार्य भी आत्मिक तृप्ति के लिये किये जाते है। यह दूसरी बात है कि धुँधली दृष्टि होने के कारण लोग नकल को ही असल समझ बैठें। आपने बड़े परिश्रम से धन इकट्ठा किया है, किन्तु विवाह मे उसे बड़ी उदारता के साथ खर्च कर देते है। उस दिन एक पैसे के लिये प्राण दिये मरते थे, आज आप अशर्फिया क्यों लूटा रहे है? इसलिये कि आज आप धन संचित रखने की अपेक्षा उसे खर्च कर डालने में अधिक सुख का अनुभव करते हैं। डाकू जिस धन का जान हथेली पर रखकर लाया था, उसे मदीरा पीनें में इस तरह क्यों उड़ा रहा है? इसलिये कि वह मदीरा पीने के आंनद को धन जोड़ने की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। बीमारी में धर्म कार्यो मे, या अन्य बातों पर काफी पैसा खर्च हो जाता है, किन्तु मनुष्य कुछ भी रंज नही करता है। यही पैसा यदि चोरी मे चला जाता है तो उसे बड़ा दुख होता है। इन उदाहरणों से आप देखते है कि जिनका अमूल्य धन-संचय में खर्च हुआ जा रहा है। वे अपने उस जीवन रस को भी एक समय बड़ी लापरवाही के साथ उड़ा देते है। ऐसा इसलिये होता है कि उन खर्चीले कामों में आदमी अधिक आंनद का अनुभव करता है।

अखण्ड ज्योति जून 1980 पृष्ठ 16

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को

मनुष्य, शरीर को ‘‘मैं’’ समझता है। उसने एक जनश्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न होती है, परन्तु इस पर उसका विश्वास नही होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा नही मानते होते, तो यह भारत भूमि दुराचारों का केन्द्र न बन गई होती। गीता मे भगवान श्री कृष्ण पे अपना उपदेश आरम्भ करते हुये अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है, ‘‘तू देह नहीं है।’’ आत्मस्वरूप को जिस प्रकार विस्मरण कर दिया है, उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया है।

हमारे चारो और जो घोर अज्ञानांधकार छाया हुआ है, उसके तम में कुछ और ही वस्तुये हमारे हाथ लगी है, और उन्हें ईश्वर मान लिया। रस्सी को सांप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ-कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरें के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है। और उसी को हम लोग पूजते हैं। आत्मा पंच तत्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्व के रसों को इन्हीं तत्वो से बना हुआ शरीर ही भोग कर सकता है।

आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नही पहॅूचता। यह तो केवल इंद्रियों की तृप्ति-अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानना भर है।

अखण्ड ज्योति मई 1980 पृष्ठ 06

उद्धेश्य ऊँचा रखें

मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते है, उतनी आसानी से सोना नही मिलता है। पापों की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत करनें मे काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किन्त अगर ऊँचे स्थान चढ़ाना हो तो पंप आदि लगाने का प्रयास किया जाता है।

बुरे विचार, तामसी संकल्प, ऐसे पदार्थ हैं जो बड़ा मनोरंजन करते हुये मन मे धंस जाते हैं ओर साथ ही अपनी मारक शक्ति को भी ले आते है। स्वार्थमयी नीच भावनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करके जाना गया है कि वे काले रंग छुरियों के समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती है। उन्हें जहाँ थोड़ा सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश्य और भी बहुत सी सामग्री खींच लेती है। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्वों की भांति खिचनें की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़-उड़ कर वही एकत्रित होने लगतें है।

यही बात भले विचारों के सम्बन्ध में भी है। वे भी अपने सजातियों को अपने साथ इकठ्ठे करकें बहुकुटुम्बी बनने में पीछे नही रहतें । जिन्होने बहुत समय तक बुरे विचारों को अपने मन मे स्थान दिया है। उन्हें चिन्ता, भय और निराशा का शिकार होना पड़ेगा।

अखण्ड ज्योति अप्रेल 1980 पृष्ठ 10

संयम

परमात्मा के मार्ग पर चलने के लिये जो उत्सुक होते है, वे प्रायः आत्मपीड़न को साधना समझ लेते हैं। उनकी यही भूल उनके जीवन को विषाक्त कर देती है। प्रभुप्राप्ति संसार के निषेध का रूप ले लेती है। इस निषेध के कारण आत्मा की साधना शरीर को नष्ट करने का संरजाम जूटाने लगती है। इस नकार-दृष्टि से उनका जीवन नष्ट होने लगता है। और उन्हें होश भी नहीं आ पाता कि जीवन का विरोध परमात्मा के साक्षात्कार का पर्यायवाची नही हैं

सच्चाई तो यह है कि देह के उत्पीड़क भी देहवादी होते है। उन्हें आत्मचिंतन सूझता ही नहीं है। संसार के विरोधी कहीं न कहीं सूक्ष्मरूप से संसार से ही बंधे होते है। अनुभव यही कहता है कि संसार के प्रति भोग-दृष्टि जितना संसार से बांधती है, संसार के विरोध-दृष्टि भी उससे कुछ कम नही, बल्कि उससे कहीं ज्यादा बंधती है।

साधना संसार व शरीर का विरोध नही, बल्कि इनका अतिक्रमण एवं उत्क्रान्ति है। यह दिशा न तो भोग की है और नही दमन की है। यह तो इन दोनों दिशाओं से भिन्न एक तीसरी ही दिशा है। यह दिशा आत्मसंयम की है। दोनों बिन्दुओं के बीच मध्यबिन्दु खोज लेना संयम है। पूरी तरह से जो मध्य मे हैं, वही अतिक्रमण या उपरामता है। इन दोनो के पार चले जाना है।

भोग या दमन की अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है। भोग हो या दमन, दोनों ही जीवन को नष्ट कर देते है। अति ही अज्ञान है, यही अंधकार है, यही विनाश है। जो इस सच को जान जाता है, वह भोग और दमन, दोनों को ही छोड़ देता है। ऐसा करते ही उसके सब तनाव स्वाभाविक ही विलीन हो जाते हैं । उसे ही अनायास ही मिल जाता है।- स्वाभाविक, सहज एवं स्वस्थ्य जीवन। संयम को उपलब्ध होते ही जीवन शांत व निर्भर हो जाता है। उसकी मुस्कराहट कभी मुरझाती नहीं। जिसनें स्वयं में संयम की समझ पैदा कर ली, वह खुशियों की खिलखिलाहट से भर उठता है।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

मन की स्थिरता...

मन का स्वभाव है कि वह किसी बात पर अधिक समय स्थिर नहीं रहता और उचटकर बार-बार इधर-उधर उड़ता है । आप किसी बात को सोचना चाहते हैं, किंतु मन उस पर नहीं जमता । ऐसी दशा में उस चिंतनीय विषय का कोई ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकेगा । इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने पर उत्तम मस्तिष्क वाले भी उतना काम नहीं कर सकते जितना कि साधारण मस्तिष्क के किंतु स्थिर चित्त वाले कर सकते हैं । कोई मनुष्य कितना ही चतुर क्यों न हो, यदि उसके मन को उचटने की आदत है और इच्छित विषय में एकाग्र नहीं होता, तो उसकी चतुरता किसी काम न आवेगी और उसके निर्णय अपूर्ण एवं असंतोषजनक होंगे ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

"Mental Stability

It is the nature of mind that it does not stay on one topic for a long time and keeps wandering off aimlessly. This restless tendency gets in the way of critical thinking and is a huge obstacle in the way of thoughtful, well reasoned decision making. A brilliant and highly distracted mind performs poorly compared to an average yet calm mind. No matter how smart we are, if our minds wander and are continuously distracted, our intelligence will be of little use and our decisions will be incomplete and unsatisfactory.

-Pt. Shriram Sharma Acharya 

कर्म-फल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा...

यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें । कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा । कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्तव्य-धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं । जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया ।

लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता । भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो । अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं ? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता । आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा । देर हो सकती है अन्धेर नहीं । ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 14 जुलाई 2012

महामना मालवीय जी

एक बार एक सेठ जी स्वयं महामना मालवीय जी के पास अपने एक प्रीतिभोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे। 

महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया-

‘यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास स्वयं निमंत्रण देने पधारें, किंतु जब तक मेरे इस देश में मेरे हजारों-लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े-बड़े भोजों मे कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ- ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं।’’

महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रीतिभोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याण हेतु दान दे दिया। बाद में उनका हृदय इस सत्कार्य से आनन्दमग्न हो उठा।

शिक्षा:-"अन्य लोगों के कष्टपीड़ित और अभावग्रस्त रहते स्वयं मौज- मस्ती में रहना मानवीय अपराध हैं।" 

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

It’s time to go to Blood Donation Camp.


1. It’s time to go to Blood Donation Camp.
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2. Donating Blood is a social responsibility.
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3. The blood is red gold in time of saving a life.
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4. Blessed are the young who can give back life with their blood — Donate Blood, save a life.
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5. To the young and healthy it’s no loss. To sick it’s hope of life. Donate Blood to give back life.
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6. Donate blood to save the dying.
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7 Care, share and live by donating Blood.
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8. Among flowers — the Rose. The blood donor.
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9. Share the joy of life, give the life of a child by donating Blood.
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10. I am proud, there is blood donor in my family.
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11. The Blood Donor of today may be recipient of tomorrow.
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12. Voluntary Blood Donors are the key to safe blood.
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13. Many people pray for mountains to be moved when all they need is to climb. Donate Blood for your near and dear one.
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14. Excuses never save a life. Blood donation does.
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15. Smile and give, some one will smile and live.
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16. Someone lives when someone gives. There is no substitute of human Blood.
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17. The finest gesture one can make is to save life by donating Blood.
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18. Drive carefully — otherwise you might need me — I am a Blood Donor.
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19. Share the happiness of glory. There is a feeling of joy when you give the gift of Blood.
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20. It will cost you nothing-it will save a life!
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21. Don't be Blood thirsty: share some of it with others.
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22. When anyone signs a blood donor form, he is signing a lease of life for someone else.
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23. Your Blood is worth bottling!
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24. You take holidays-the Blood Bank doesn't.
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