रविवार, 11 दिसंबर 2011

खुदा के आदेशों का पालन

खलीफा उमर एक बार अपने धर्मस्थान पर बैठे हुए थे। उन्हें स्वर्ग में एक फरिश्ता उड़ता हुआ दिखाई दिया। उसके कंधे पर बहुत मोटी पुस्तक लदी हुई थी। खलीफा ने उसे पुकारा, वह नीचे उतरा तो उन्होंने उस पुस्तक के बारे में पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जो खुदा की इबादत करते हैं।’’

उन्होंने अपना नाम तलाश कराया तो फरिश्ते ने सारी पुस्तक ढूँढ़ डाली, उसका नाम कहीं न मिला। इस पर खलीफा बहुत दुखी हुए कि हमारा इतना परिश्रम बेकार ही चला गया।

कुछ दिन बाद एक और फरिश्ता छोटी-सी किताब लिए उधर से गुजरा। खलीफा ने उसे भी बुलाया और पूछा कि इसमें क्या हैं ? फरिश्ते ने कहा-‘‘इसमें उन लोगों के नाम लिखे हैं, जिसकी इबादत खुदाबंद करीम खुद करते हैं।’’

खलीफा ने पूछा-‘‘क्या ईश्वर भी किसी की इबादत करता हैं?’’फरिश्ते ने कहा-‘‘हाँ! जो लोग खुदा के आदेशों का पालन करते हैं, उन पर दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं, उन्हें खुदा बहुत आदर की दृष्टि से देखता है और उनकी इबादत वह खुदा करता है।’’

क्या इसमें मेरा भी नाम है ? खलीफा ने पूछा। फरिश्ता बोला कुछ नहीं, पुस्तक वहीं छोड़कर आगे अढ़ गया। खलिफा ने खोलकर देखा तो उनका नाम सबसे पहला था।

चमत्कार नहीं, चरित्र और ज्ञान...

एक बार एक व्यक्ति ने एक ऊँची बल्ली पर रत्नजडि़त कीमती कमंड़लु टाँग दिया और घोषणा की कि जो कोई साधु इस बल्ली पर सीधा चढ़कर कमंड़लु उतार लेगा उसे यह कीमती पात्र ही नहीं, बहुत दक्षिणा भी दूँगा। बहुत से त्यागी और विद्वान साधुओं ने भी प्रयत्न किया, पर किसी को सफलता न मिली। अंत में कष्यप नामक नट विद्या में बहुत-सा जीवन बिताकर साधु बने एक बौद्व भिक्षु ने उस बल्ली पर चढ़कर कमंडलु उतार लिया। उसकी बहुत प्रशंसा हुई और धन मिला।

जब यह समाचार भगवान बुद्व के पास पहुँचा तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा-‘‘भविष्य में तुम में से कोई भिक्षु इस प्रकार का चमत्कार न दिखाए और न उन लोगों से भिक्षा ग्रहण करे जो साधु का आचार नहीं, चमत्कार देखकर उसे बड़ा मानते हों।’’

चमत्कार नहीं, चरित्र और ज्ञान ही साधुता की कसौटी है।

उपयोगिता

एक धनपति था। वह नित्य ही एक घृतदीप जलाकर मंदिर में रख आता था। एक दूसरा निर्धन व्यक्ति था। वह सरसों के तेल का एक दीपक जलाकर नित्य अपनी गली में रख देता था। वह अँधेरी गली थी। दोनों मरकर जब यमलोक पहुँचे तो धनपति को निम्न स्थिति की सुविधाए दी गई और निर्धन व्यक्ति को उच्च श्रेणी की। यह व्यवस्था देखी तो धनपति ने धर्मराज से पूछा-‘‘यह भेद क्यों, जबकि मैं भगवान के मंदिर में दीपक जलाता था, वह भी घी का।’’

धर्मराज मुस्कराए और बोले-‘‘पुण्य की महत्ता मूल्यों के आधार पर नहीं, कार्य की उपयोगिता और भावना के आधार पर होती हैं। मंदिर तो पहले से ही प्रकाशमान था। उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया, जिससे हजारों व्यक्तियों ने लाभ उठाया। उसके दीपक की उपयोगिता अधिक थी।’’

नीति और न्याय

रावण ने एक और कूटनीतिक चाल फेंकी। बोला-अंगद ! जिस राम ने तेरे पिता को मारा, तू उन्हीं की सहायता कर कहा है ? मेरे मित्र का पुत्र होकर भी तू मुझ से बैर कर रहा है !

अंगद हँसा और बोला-रावण ! अन्यायी से लड़ना और उसे मारना ही सच्चा धर्म है। चाहे वह मेरा पिता हो अथवा आप ही क्यों न हों।

अंगद के ऐसे तेजस्वी शब्द सुनकर रावण को उतर देते न बना।

संबध नहीं, नीति और न्याय का पक्ष ही वरेण्य है।

सत्पात्र

आचार्य उपकौशल को अपनी पुत्री के लिए योग्य वर की खोज थी। उनके गुरूकुल में कई विद्वान ब्रह्मचारी थे, किंतु वे कन्यादान के लिए ऐसे सत्पात्र की खोज में थे, जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी आत्मा को प्रताडि़त न करे। परीक्षा के लिए उन्होंने सब ब्रह्मचारियों को गुप्त रूप से आभूषण लाने को कहा, जिसे माता-पिता क्या, कोई न जाने। सब छात्र चोरी से कुछ-न-कुछ आभूषण लेकर लौटे। आचार्य ने वे आभूषण सॅंभालकर रख लिए। अंत में वाराणसी के राजकुमार ब्रह्मदत खाली हाथ लौटे। आचार्य ने उनसे पूछा-क्या तुम्हें एकांत नहीं मिला ? ब्रह्मदत ने उत्तर दिया-निर्जनता तो उपलब्ध हुई, पर मेरी आत्मा और परमात्मा तो देखते ही थे चोरी को। बस, आचार्य को वह सत्पात्र मिल गया, जिसकी उन्हें खोज थी।

ईश्वर को सर्वत्र विद्यमान देखने वाला कभी अनुचित कार्य नहीं कर सकता।

माँ की शिक्षा

माँ कहा-बच्चे ? अब तुम समझदार हो गए हो। स्नान कर लिया करो और प्रतिदिन तुलसी के इस पौधे में जल भी चढ़ाया करो। तुलसी उपासना की हमारी परम्परा पुरखों से चली आ रही है।“


बच्चे ने तर्क किया-माँ ? तुम कितनी भोली हो, इतना भी नहीं जानतीं कि यह तो पेड़ है। पेड़ों की भी कहीं पूजा की जाती हैं ? इसमें समय व्यर्थ खोने से क्या लाभ ?

लाभ है मुन्ने ? श्रद्धा ही है। श्रद्धा छोटी उपासना से विकसित होती है और अंत में जीवन को महान बना देती है, इसलिए यह भाव भी निर्मूल नहीं।

तब से विनोबा भावे जी (बच्चे) ने प्रतिदिन तुलसी को जल देना शुरू कर दिया। माँ की शिक्षा कितनी सत्य निकली, इसका प्रमाण अब सबके सामने है।

आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार

पुजारी नियत समय पूजा करने आता और आरती करते-करते वह भाव विहल हो जाता, पर घर जाते ही वह अपने पत्नी-बच्चों के प्रति कर्कश व्यवहार करने लगता।

एक दिन उसका नन्हा बच्चा भी साथ लगा चला आया। पुजारी स्तुति कर रहा था-हे प्रभु ? तुम सबसे प्यार करने वाले, सब पर करूणा लुटाने वाले हो।

अभी वह इतना ही कह पाया था कि बच्चा बोल उठा-पिताजी ? जिस भगवान के पास इतने दिन रहने पर भी आप करूणा और प्यार करना न सीख सके, उस भगवान के पास रहने से क्या लाभ ? पुजारी को अपनी भूल मालूम पड़ गई, वह उस दिन से आत्मनिरीक्षण व आत्मसुधार में लग गया।

भगवान के गुणों का कीर्तन ही नहीं, उन्हों जीवन में उतारने का प्रयास भी करना चाहिए।

अपने दोष...

बिच्छू बोला-तुम मुझे पार पर पहुँचा दो, डंक नहीं मारूँगा। कछुए ने कहा-अच्छा ! और बिच्छू को पीठ पर बैठाकर पानी में तैर चला। अभी कुछ ही दूर चला था कि बिच्छू ने डंक मार दिया। कछुए ने पूछा-यह क्या किया ?

बिच्छू बोला- यह तो मेरा स्वभाव हैं। कछुए ने कहा- अच्छा हुआ मैंने अपने को सुरक्षित किया हुआ है, पर तेरे आततायीपन का दंड़ तो तुझे मिलना ही चाहिए।

यह कहकर उसने डुबकी मार ली और बिच्छू पानी में डूबकर मर गया।

अपने दोष ही अंततः विनाशकारी सिद्व होते हैं।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

Guruji-Mataji...

Revered Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharya 
(A seer-sage and a visionary of the New Golden Era)

Gurudev, Pandit Shriram Sharma Acharyas personality was a harmonious blend of a saint, spiritual scientist, yogi, philosopher, psychologist, writer, reformer, freedom fighter, researcher, eminent scholar and visionary. His life and work represent a marvelous synthesis of the noble thoughts and deeds of great personalities like Swami Vivekanand, Sri Aurobindo, Mahatma Gandhi, Socrates and Confucius.

He pioneered the revival of spirituality and creative integration of the modern and ancient sciences and religion, relevant in the challenging circumstances of the present times.

He successfully practiced and mastered the highest kinds of sadhanas of Gayatri and Savitri. He also practiced higher-level sadhanas on the arduous heights of Himalayas several times and had established enliven contact with Rishis (Sages) of Himalayas.

His volumes on Gayatri Mahavigyan (Super Science of Gayatri) stand as most authentic and comprehensive treatise on the philosophy and science of the great Gayatri Mantra.

He initiated programs of spiritual and intellectual refinement of millions of people without any discrimination of religion, caste, creed, sex, or social status.

Revered Mata Bhagwati Devi Sharma (Mataji)

Born on September 1926, in a famous priestly family, Mata Bhagwati Devi (Vandaniya Mataji), was extraordinary in her own way and unlike other children, was not interested in regular childhood activities such as playing, etc. Instead, she was more interested in worshiping God. She spent most of her time in singing devotional songs. Her favorite pastime was to make the offering of the Bilva tree leaves at the idol of Lord Shiva, and write OM NAMAH SHIVAYA.

During the early stages of her education, she studied Bhagwad Gita, and Ram Charit Manas. After her marriage to Pandit Shriram Sharma Acharya (Gurudev), Mataji took over the responsibility of looking after visitors and guests. She willingly donated all her personal jewelry, which she received at her wedding, to Gurudevs Yug Nirmaan Yojanaa (Movement for the Recreation of the Era) for establishment of Gayatri Tapobhoomi at Mathura.

In 1975, under the leadership of Mataji, Mahilaa Jaagaran Abhiyaan (Movement for Emancipation of Women) was initiated. Soon, about 4000 branches of Mahilaa Jaagaran Abhiyaan were established with more than one million active participants. Its work was not limited to mere slogan-raising, but also womens education, economic self-support, sacramental rites, acquiring self-respect, abolition of dowry and fight against the discrimination of women.

जब भी कोई आपके पैर छुए तो जरूर करें ये दो काम, क्योंकि...

हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है। जिन लोगों के पैर छुए जाते हैं उनके लिए शास्त्रों में कई नियम भी बनाए हैं। यदि कोई आपके पैर छुता है तो आपको क्या करना चाहिए, जानिए...

उम्र में बड़े लोगों के पैर छुने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छुने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं। जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए।

जब भी कोई आपके पैर छुता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छुने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है। आशीर्वाद देने से पैर छुने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र बढ़ती है।

किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए?
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

गायत्री स्तोत्र


सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं 
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां 
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां 
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं 
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां 
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

श्रीराम शर्मा आचार्य विरचित गायत्री महाविज्ञान से

चन्द्रायण व्रत क्या है ?

जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है।

इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है। इस व्रत में व्यक्ति अपनें खानें को १६ हिस्सों में विभाजित करतें है।

प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।

अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।

अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन की मात्रा में १६ वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
व्रत के साथ साथ गायत्री का अनुष्ठान भी चलता रहता है।

कौन कर सकता है या किसे करना चाहिये? 
उस व्यक्ति को जिसे अपना स्वास्थ्य ठीक करना हो, उस व्यक्ति को यह व्रत अवश्य करना चाहिये। 

कब व कहां कर सकते है? 
पूर्णमासी से पूर्णमासी तक किसी भी मौसम में कर सकतें है। अत्यधिक शारीरिक श्रम वाले दिनों इसे नही करना चाहिये।
स्थान घर का एक कमरा भी हो सकता है और कोई अन्य सुविधा युक्त स्थान । पर स्थान का चयन करने पर वातावरण की शान्ति और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। 

शारीरिक व आध्यात्मिक महत्व क्या है ? 
- शरीर की शुद्धि होती है।
- शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, रोग निवारक शक्ति बढ़ती है।
- आहार विहार शुद्ध होने से मन स्वच्छ बनता है।
- गायत्री अनुष्ठान का साथ होने से आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है और मानव सत्कार्यो की और प्रवृत्त होता है।

इस व्रत को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया ? 
हमारे पूज्य गुरूदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसका प्रयोग स्वयं पर तथा अपने रूग्ण शिष्यों पर किया और अनुभव किया कि यह व्रत मानसिक व शारीरिक स्वस्थता के लिये परम उपयोगी है। उन्होने पाया कि यह व्रत शरीर का कायाकल्प कर देता है।

केवल गायत्री परिवार ही नही स्वास्थ्य को महत्व देने वाले लगभग सभी आश्रमों ने इस व्रत को अपना रखा है। 

प्रज्ञा पुराण कथा क्या है ?

किसी भी अच्छी बात को सिखाने-बताने के लिये कथा-कहानियों का आश्रय लिया जाता है ।

हमारे पूर्वज ऋषियों ने १८ पुराण लिख कर वेद-उपनिषदों की शिक्षाओं को पुराणों के रूप में उतारा है ।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्री राम शर्मा आचार्य जी ने भी व्यास जी की तरह १९ वां पुराण लिख दिया है जिसमें समझाया है कि ईश्वर पुत्र होने पर भी मनुष्य क्यों दुःखी रहता है, उस दुःख को कैसे दूर कर सकता है। पुराण के अनुसार आचरण करने से मानव मे देवत्व एवं धरती पर स्वर्ग आयेगा।

कथा कराने में कितना समय लगता है ? 
कथा को यदि सार्वजनिक रूप से दृष्टान्त सहित समझाने का आयोजन किया जाय तो एक माह भी लग सकता है। किन्तु प्रायः सात - आठ दिनों में इसे निम्न प्रकार सम्पन्न कर लेते है।

लोक कल्याण(प्रथम) खण्ड - २ दिन
महामानव-देवमानव (द्वितीय) खण्ड - २ दिन
परिवार (तृतीय) खण्ड - २ दिन
देव संस्कृति (चतुर्थ) खण्ड - २ दिन 

प्रज्ञा पुराण कथा कौन करा सकता है ? कब और कहां करा सकता है ? कौन कह सकता है ?

यही प्रश्ननारद मुनि जी ने भगवान विष्णु से एक कथा में पूछा था।
प्रश्न के ऊत्तर में भगवान नें कहा कि - जिसमें श्रद्धा और विश्वास हों, जिस किसी को अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना हों और जो पाप मुक्त होना चाहता हो वह भक्त इस कथा को कहीं भी अवकाश (फुर्सत) के क्षणों में कथा करायें और सुने।

कोई भी विद्यावान - पढा लिखा व्यक्ति जो कथा को रोचक ढंग से, दृष्टान्तों के साथ सुना सकने में सक्षम हों और स्पष्ट वाणी वाला व्यक्ति कथा कह सकता हैं। 

प्रज्ञा पुराण कथा को गायत्री परिवार ने क्यों अपनाया है ?
गायत्री परिवार का एक उद्देश्य यह भी है- धर्म तंत्र से लोक शिक्षण, इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसे अपनाया हैं। 

गायत्री यज्ञ

यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं- १- देवपूजा, २-दान, ३-संगतिकरण । संगतिकरण का अर्थ है-संगठन । यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत्प्रयोजन के लिए संगठित करना भी है । इस युग में संघ शक्ति ही सबसे प्रमुख है । परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी पृथक्-पृथक् शक्तियों का एकीकरण करके संघ-शक्ति के रूप में दुर्गा शक्ति का प्रादुर्भाव किया था । उस माध्यम से उसके दिन फिरे और संकट दूर हुए । मानवजाति की समस्या का हल सामूहिक शक्ति एवं संघबद्धता पर निर्भर है, एकाकी-व्यक्तिवादी-असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते हैं । गायत्री यज्ञों का वास्तविक लाभ सार्वजनिक रूप से, जन सहयोग से सम्पन्न कराने पर ही उपलब्ध होता है ।

यज्ञ का तात्पर्य है- त्याग, बलिदान, शुभ कर्म । अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है । वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है । हवन हुए पदार्थ् वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं । यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है । इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयतन से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है ।

वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है । यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो । इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है । गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें ।

यदि यज्ञ भावना के साथ मनुष्य ने अपने को जोड़ा न होता, तो अपनी शारीरिक असमर्थता और दुर्बलता के कारण अन्य पशुओं की प्रतियोगिता में यह कब का अपना अस्तित्व खो बैठा होता । यह जितना भी अब तक बढ़ा है, उसमें उसकी यज्ञ भावना ही एक मात्र माध्यम है । आगे भी यदि प्रगति करनी हो, तो उसका आधार यही भावना होगी ।

प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परंपरा के अनुरूप है । समुद्र बादलों को उदारतापूर्वक जल देता है, बादल एक स्थान से दूसरे स्थान तक उसे ढोकर ले जाने और बरसाने का श्रम वहन करते हैं । नदी, नाले प्रवाहित होकर भूमि को सींचते और प्राणियों की प्यास बुझाते हैं । वृक्ष एवं वनस्पतियाँ अपने अस्तित्व का लाभ दूसरों को ही देते हैं । पुष्प और फल दूसरे के लिए ही जीते हैं । सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, वायु आदि की क्रियाशीलता उनके अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् दूसरों के लिए ही है । शरीर का प्रत्येक अवयव अपने निज के लिए नहीं, वरन् समस्त शरीर के लाभ के लिए ही अनवरत गति से कार्यरत रहता है । इस प्रकार जिधर भी दृष्टिपात किया जाए, यही प्रकट होता है कि इस संसार में जो कुछ स्थिर व्यवस्था है, वह यज्ञ वृत्ति पर ही अवलम्बित है । यदि इसे हटा दिया जाए, तो सारी सुन्दरता, कुरूपता में और सारी प्रगति, विनाश में परिणत हो जायेगी । ऋषियों ने कहा है- यज्ञ ही इस संसार चक्र का धुरा है । धुरा टूट जाने पर गाड़ी का आगे बढ़ सकना कठिन है । 

यज्ञीय विज्ञान 
मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्रोत दबे हैं । जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास ये युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग-रागनियाँ बजती हैं और उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है, उसी प्रकार मंत्रोच्चारण से भी एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं और उनका भारी प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत् पर तथा प्राणियों के स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों पर पड़ता है ।

यज्ञ के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलाये जाते हैं, उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोग कीटाणु सहज ही नष्ट होते हैं । डी.डी.टी., फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या सुइयाँ लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है । साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का यज्ञ एक सामूहिक उपाय है । दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है; पर यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है और प्रयतन न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है । मनुष्य की ही नहीं, पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी यज्ञ से रक्षा होती है ।

यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण पर देवत्व की छाप डालती है । जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों की छाप अपने अन्दर धारण कर लेता है और वहाँ जाने वालों पर दीर्घकाल तक प्रभाव डालता रहता है । प्राचीनकाल में तीर्थ वहीं बने हैं, जहाँ बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे । जिन घरों में, जिन स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है और वहाँ जिनका आगमन रहता है, उनकी मनोभूमि उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनती हैं । महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं । उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है ।

कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोभूमि में यज्ञ से भारी सुधार होता है । इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है । यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मनोभूमि का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्व्ार्गीय आनन्द से भर देता है, इसलिए यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है ।

यज्ञीय धर्म प्रक्रियाओं में भाग लेने से आत्मा पर चढ़े हुए मल-विक्षेप दूर होते हैं । फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश जगता है । यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मण तत्त्व, ऋषि तत्त्व की वृद्धि दिनानु-दिन होती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य बहुत सरल हो जाता है । आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है, जैसे लोहे के टूटे हुए टुकड़ों को बैल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है । ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा प्राप्त होता है । इसलिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिए अर्पित करना पड़ता है । लोगों के अंतःकरण में अन्त्यज वृत्ति घटे-ब्राह्मण वृत्ति बढ़े, इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव की शक्ति भरना आवश्यक है ।

विधिवत् किये गये यज्ञ इतने प्रभावशाली होते हैं, जिसके द्वारा मानसिक दोषों-र्दुगुणों का निष्कासन एवं सद्भावों का अभिवर्धन नितान्त संभव है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, कायरता, कामुकता, आलस्य, आवेश, संशय आदि मानसिक उद्वेगों की चिकित्सा के लिए यज्ञ एक विश्वस्त पद्धति है । शरीर के असाध्य रोगों तक का निवारण उससे हो सकता है ।

अग्निहोत्र के भौतिक लाभ भी हैं । वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कल-कारखानों के धुआँ आदि से गन्दा करते हैं । गन्दी वायु रोगों का कारण बनती है । वायु को जितना गन्दा करें, उतना ही उसे शुद्ध भी करना चाहिए । यज्ञों से वायु शुद्ध होती है । इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का एक बड़ा प्रयोजन सिद्ध होता है ।

यज्ञ का धूम्र आकाश में-बादलों में जाकर खाद बनकर मिल जाता है । वर्षा के जल के साथ जब वह पृथ्वी पर आता है, तो उससे परिपुष्ट अन्न, घास तथा वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जिनके सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं । यज्ञाग्नि के माध्यम से शक्तिशाली बने मन्त्रोच्चार के ध्वनि कम्पन, सुदूर क्षेत्र में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करते हैं, फलस्वरूप शरीरों की तरह मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता है ।

अनेक प्रयोजनों के लिए-अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, अनेक विधानों के साथ, अनेक विशिष्ट यज्ञ भी किये जा सकते हैं । दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार उत्कृष्ट सन्तानें प्राप्त की थीं, अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में ये रहस्य बहुत विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । विश्वामित्र आदि ऋषि प्राचीनकाल में असुरता निवारण के लिए बड़े-बड़े यज्ञ करते थे । राम-लक्ष्मण को ऐसे ही एक यज्ञ की रक्षा के लिए स्वयं जाना पड़ा था । लंका युद्ध के बाद राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे । महाभारत के पश्चात् कृष्ण ने भी पाण्डवों से एक महायज्ञ कराया था, उनका उद्देश्य युद्धजन्य विक्षोभ से क्षुब्ध वातावरण की असुरता का समाधान करना ही था । जब कभी आकाश के वातावरण में असुरता की मात्रा बढ़ जाए, तो उसका उपचार यज्ञ प्रयोजनों से बढ़कर और कुछ हो नहीं सकता । आज पिछले दो महायुद्धों के कारण जनसाधारण में स्वार्थपरता की मात्रा अधिक बढ़ जाने से वातावरण में वैसा ही विक्षोभ फिर उत्पन्न हो गया है । उसके समाधान के लिए यज्ञीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक हो गया है । 

यज्ञीय प्रेरणाएँ 
यज्ञ आयोजनों के पीछे जहाँ संसार की लौकिक सुख-समृद्धि को बढ़ाने की विज्ञान सम्मत परंपरा सन्निहित है-जहाँ देव शक्तियों के आह्वान-पूजन का मंगलमय समावेश है, वहाँ लोकशिक्षण की भी प्रचुर सामग्री भरी पड़ी है । जिस प्रकार 'बाल फ्रेम' में लगी हुई रंगीन लकड़ी की गोलियाँ दिखाकर छोटे विद्यार्थियों को गिनती सिखाई जाती है, उसी प्रकार यज्ञ का दृश्य दिखाकर लोगों को यह भी समझाया जाता है कि हमारे जीवन की प्रधान नीति 'यज्ञ' भाव से परिपूर्ण होनी चाहिए । हम यज्ञ आयोजनों में लगें-परमार्थ परायण बनें और जीवन को यज्ञ परंपरा में ढालें । हमारा जीवन यज्ञ के समान पवित्र, प्रखर और प्रकाशवान हो । गंगा स्नान से जिस प्रकार पवित्रता, शान्ति, शीतलता, आदरता को हृदयंगम करने की प्रेरणा ली जाती है, उसी प्रकार यज्ञ से तेजस्विता, प्रखरता, परमार्थ-परायणता एवं उत्कृष्टता का प्रशिक्षण मिलता है । यज्ञ की प्रक्रिया को जीवन यज्ञ का एक रिहर्सल कहा जा सकता है । अपने घी, शक्कर, मेवा, औषधियाँ आदि बहुमूल्य वस्तुएँ जिस प्रकार हम परमार्थ प्रयोजनों में होम करते हैं, उसी तरह अपनी प्रतिभा, विद्या, बुद्धि, समृद्धि, सार्मथ्य आदि को भी विश्व मानव के चरणों में समर्पित करना चाहिए । इस नीति को अपनाने वाले व्यक्ति न केवल समाज का, बल्कि अपना भी सच्चा कल्याण करते हैं । संसार में जितने भी महापुरुष, देवमानव हुए हैं, उन सभी को यही नीति अपनानी पड़ी है । जो उदारता, त्याग, सेवा और परोपकार के लिए कदम नहीं बढ़ा सकता, उसे जीवन की सार्थकता का श्रेय और आनन्द भी नहीं मिल सकता ।

यज्ञीय प्रेरणाओं का महत्त्व समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है । उसकी शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं । 

वे शिक्षाएँ इस प्रकार हैं-
१- जो कुछ हम बहुमूल्य पदार्थ अग्नि में हवन करते हैं, उसे वह अपने पास संग्रह करके नहीं रखती, वरन् उसे सर्वसाधारण के उपयोग के लिए वायुमण्डल में बिखेर देती है । ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का प्रयोग हम भी वैसा ही करें, जो हमारा यज्ञ पुरोहित अपने आचरण द्वारा सिखाता है । हमारी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा आदि विभूतियों का न्यूनतम उपयोग हमारे लिए और अधिकाधिक उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए ।

२- जो वस्तु अग्नि के सम्पर्क में आती है, उसे वह दुरदुराती नहीं, वरन् अपने में आत्मसात् करके अपने समान ही बना लेती है । जो पिछड़े या छोटे या बिछुड़े व्यक्ति अपने सम्पर्क में आएँ, उन्हें हम आत्मसात् करने और समान बनाने का आदर्श पूरा करें ।

३- अग्नि की लौ कितना ही दबाव पड़ने पर नीचे की ओर नहीं होती, वरन् ऊपर को ही रहती है । प्रलोभन, भय कितना ही सामने क्यों न हो, हम अपने विचारों और कार्यों की अधोगति न होने दें । विषम स्थितियों में अपना संकल्प और मनोबल अग्नि शिखा की तरह ऊँचा ही रखें ।

४- अग्नि जब तक जीवित है, उष्णता एवं प्रकाश की अपनी विशेषताएँ नहीं छोड़ती । उसी प्रकार हमें भी अपनी गतिशीलता की गर्मी और धर्म-परायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए । जीवन भर पुरुषार्थी और कर्त्तव्यनिष्ठ रहना चाहिए ।

५- यज्ञाग्नि का अवशेष भस्म मस्तक पर लगाते हुए हमें सीखना होता है कि मानव जीवन का अन्त मुट्ठी भर भस्म के रूप में शेष रह जाता है । इसलिए अपने अन्त को ध्यान में रखते हुए जीवन के सदुपयोग का प्रयत्न करना चाहिए ।

अपनी थोड़ी-सी वस्तु को वायुरूप में बनाकर उन्हें समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने-पराये, मित्र-शत्रु का भेद किये साँस द्वारा इस प्रकार गुप्तदान के रूप में खिला देना कि उन्हें पता भी न चले कि किस दानी ने हमें इतना पौष्टिक तत्त्व खिला दिया, सचमुच एक श्रेष्ठ ब्रह्मभोज का पुण्य प्राप्त करना है, कम खर्च में बहुत अधिक पुण्य प्राप्त करने का यज्ञ एक सर्वोत्तम उपाय है ।

यज्ञ सामूहिकता का प्रतीक है । अन्य उपासनाएँ या धर्म-प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई अकेला कर या करा सकता है; पर यज्ञ ऐसा कार्य है, जिसमें अधिक लोगों के सहयोग की आवश्यकता है । होली आदि बड़े यज्ञ तो सदा सामूहिक ही होते हैं । यज्ञ आयोजनों से सामूहिकता, सहकारिता और एकता की भावनाएँ विकसित होती हैं ।

प्रत्येक शुभ कार्य, प्रत्येक पर्व-त्यौहार, संस्कार यज्ञ के साथ सम्पन्न होता है । यज्ञ भारतीय संस्कृति का पिता है । यज्ञ भारत की एक मान्य एवं प्राचीनतम वैदिक उपासना है । धार्मिक एकता एवं भावनात्मक एकता को लाने के लिए ऐसे आयोजनों की सर्वमान्य साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है ।

गायत्री सद्बुद्धि की देवी और यज्ञ सत्कर्मों का पिता है । सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए गायत्री माता और यज्ञ पिता का युग्म हर दृष्टि से सफल एवं समर्थ सिद्ध हो सकता है । गायत्री यज्ञों की विधि-व्यवस्था बहुत ही सरल, लोकप्रिय एवं आकर्षक भी है । जगत् के दुर्बुद्धिग्रस्त जनमानस का संशोधन करने के लिए सद्बुद्धि की देवी गायत्री महामन्त्र की शक्ति एवं सार्मथ्य अद्भुत भी है और अद्वितीय भी ।

नगर, ग्राम अथवा क्षेत्र की जनता को धर्म प्रयोजनों के लिए एकत्रित करने के लिए जगह-जगह पर गायत्री यज्ञों के आयोजन करने चाहिए । गलत ढंग से करने पर वे महँगे भी होते हैं और शक्ति की बरबादी भी बहुत करते हैं । यदि उन्हें विवेक-बुद्धि से किया जाए, तो कम खर्च में अधिक आकर्षक भी बन सकते हैं और उपयोगी भी बहुत हो सकते हैं ।

अपने सभी कर्मकाण्डों, धर्मानुष्ठानों, संस्कारों, पर्वों में यज्ञ आयोजन मुख्य है । उसका विधि-विधान जान लेने एवं उनका प्रयोजन समझ लेने से उन सभी धर्म आयोजनों की अधिकांश आवश्यकता पूरी हो जाती है ।

लोकमंगल के लिए, जन-जागरण के लिए, वातावरण के परिशोधन के लिए स्वतंत्र रूप से भी यज्ञ आयोजन सम्पन्न किये जाते हैं । संस्कारों और पर्व-आयोजनों में भी उसी की प्रधानता है ।

प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी को यज्ञ प्रक्रिया से परिचित होना ही चाहिए । 

गायत्री उपासना और गायत्री महामंत्र

गायत्री महामंत्र और उसका अर्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

भावार्थ उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ।

गायत्री उपासना हम सबके लिए अनिवार्य 

गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है । वेदों से लेकर धर्मशास्त्रों तक समस्त दिव्य ज्ञान गायत्री के बीजाक्षरों का ही विस्तार है । माँ गायत्री का आँचल पकड़ने वाला साधक कभी निराश नहीं हुआ । इस मंत्र के चौबीस अक्षर चौबीस शक्तियों-सिद्धियों के प्रतीक हैं । गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसा ऋषिगणों का अभिमत है ।

गायत्री वेदमाता हैं एवं मानव मात्र का पाप नाश करने की शक्ति उनमें है । इससे अधिक पवित्र करने वाला और कोई मंत्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है । भौतिक लालसाओं से पीड़ित व्यक्ति के लिए भी और आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु के लिए भी एकमात्र आश्रय गायत्री ही है । गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं ।

भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को नित्य-नियमित गायत्री उपासना करनी चाहिए । विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विभिन्न विपत्तियों, आसन्न विभीषिकाओं से उसकी रक्षा करती है । प्रस्तुत समय संधिकाल का है । आगामी वर्षों में पूरे विश्व में तेजी से परिवर्तन होगा । इस विशिष्ट समय में की गयी गायत्री उपासना के प्रतिफल भी विशिष्ट होंगे । युगऋषि, वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री के तत्त्वदर्शन को जन-जन तक पहुँचाया व उसे जनसुलभ बनाया है । प्रत्यक्ष कामधेनु की तरह इसका हर कोई पयपान कर सकता है । जाति, मत, लिंग भेद से परे गायत्री सार्वजनीन है । सबके लिए उसकी साधना करने व लाभ उठाने का मार्ग खुला हुआ है । 

गायत्री उपासना का विधि-विधान 

गायत्री उपासना कभी भी, किसी भी स्थिति में की जा सकती है । हर स्थिति में यह लाभदायी है, परन्तु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकाण्डों के साथ की गयी उपासना अति फलदायी मानी गयी है । तीन माला गायत्री मंत्र का जप आवश्यक माना गया है । शौच-स्नान से निवृत्त होकर नियत स्थान, नियत समय पर, सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की जानी चाहिए ।

उपासना का विधि-विधान इस प्रकार है 

(१) ब्रह्म सन्ध्या - जो शरीर व मन को पवित्र बनाने के लिए की जाती है । इसके अंतर्गत पाँच कृत्य करने होते हैं ।

(अ) पवित्रीकरण - बाएँ हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढँक लें एवं मंत्रोच्चारण के बाद जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें । 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थांगतोऽपि वा । 
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ 
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।

(ब) आचमन - वाणी, मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से तीन बार जल का आचमन करें । हर मंत्र के साथ एक आचमन किया जाए । 
ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा । 
ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा । 
ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ।

(स) शिखा स्पर्श एवं वंदन - शिखा के स्थान को स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सद्विचार ही यहाँ स्थापित रहेंगे । निम्न मंत्र का उच्चारण करें । 
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते । 
तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

(द) प्राणायाम - श्वास को धीमी गति से गहरी खींचकर रोकना व बाहर निकालना प्राणायाम के क्रम में आता है । श्वास खींचने के साथ भावना करें कि प्राण शक्ति, श्रेष्ठता श्वास के द्वारा अंदर खींची जा रही है, छोड़ते समय यह भावना करें कि हमारे दुर्गुण, दुष्प्रवृत्तियाँ, बुरे विचार प्रश्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं । प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ किया जाए ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः, ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् । 
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । 
ॐ आपोज्योतीरसोऽमृतं, ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ ।

(य) न्यास - इसका प्रयोजन है-शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों में पवित्रता का समावेश तथा अंतः की चेतना को जगाना ताकि देव-पूजन जैसा श्रेष्ठ कृत्य किया जा सके । बाएँ हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों को उनमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोच्चार के साथ स्पर्श करें ।
ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु । (मुख को)
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु । (नासिका के दोनों छिद्रों को)
ॐ अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु । (दोनों नेत्रों को)
ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । (दोनों कानों को)
ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु । (दोनों भुजाओं को)
ॐ ऊर्वोमे ओजोऽस्तु । (दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानि मेऽङ्गानि, तनूस्तन्वा मे सह सन्तु । (समस्त शरीर पर)

आत्मशोधन की ब्रह्म संध्या के उपरोक्त पाँचों कृत्यों का भाव यह है कि साधक में पवित्रता एवं प्रखरता की अभिवृद्धि हो तथा मलिनता-अवांछनीयता की निवृत्ति हो । पवित्र-प्रखर व्यक्ति ही भगवान् के दरबार में प्रवेश के अधिकारी होते हैं ।

(२) देवपूजन - गायत्री उपासना का आधार केन्द्र महाप्रज्ञा-ऋतम्भरा गायत्री है । उनका प्रतीक चित्र सुसज्जित पूजा की वेदी पर स्थापित कर उनका निम्न मंत्र के माध्यम से आवाहन करें । भावना करें कि साधक की प्रार्थना के अनुरूप माँ गायत्री की शक्ति वहाँ अवतरित हो, स्थापित हो रही है ।
ॐ आयातु वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि । 
गायत्रिच्छन्दसां मातः! ब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥ 
ॐ श्री गायत्र्यै नमः । 
आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि, ततो नमस्कारं करोमि ।

(ख) गुरु - गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है । सद्गुरु के रूप में पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का अभिवंदन करते हुए उपासना की सफलता हेतु गुरु आवाहन निम्न मंत्रोच्चारण के साथ करें ।

ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः । 
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 

अखण्डमंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् । 
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 

ॐ श्रीगुरवे नमः, आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।

(ग) माँ गायत्री व गुरु सत्ता के आवाहन व नमन के पश्चात् देवपूजन में घनिष्ठता स्थापित करने हेतु पंचोपचार द्वारा पूजन किया जाता है । इन्हें विधिवत् संपन्न करें । जल, अक्षत, पुष्प, धूप-दीप तथा नैवेद्य प्रतीक के रूप में आराध्य के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं । एक-एक करके छोटी तश्तरी में इन पाँचों को समर्पित करते चलें । 
जल का अर्थ है - नम्रता-सहृदयता । 
अक्षत का अर्थ है - समयदान अंशदान । 
पुष्प का अर्थ है - प्रसन्नता-आंतरिक उल्लास । 
धूप-दीप का अर्थ है - सुगंध व प्रकाश का वितरण 
पुण्य-परमार्थ तथा नैवेद्य का अर्थ है - स्वभाव व व्यवहार में मधुरता-शालीनता का समावेश ।

ये पाँचों उपचार व्यक्तित्व को सत्प्रवृत्तियों से संपन्न करने के लिए किये जाते हैं । कर्मकाण्ड के पीछे भावना महत्त्वपूर्ण है । 

(३) जप - गायत्री मंत्र का जप न्यूनतम तीन माला अर्थात् घड़ी से प्रायः पंद्रह मिनट नियमित रूप से किया जाए । अधिक बन पड़े, तो अधिक उत्तम । होठ हिलते रहें, किन्तु आवाज इतनी मंद हो कि पास बैठे व्यक्ति भी सुन न सकें । जप प्रक्रिया कषाय-कल्मषों-कुसंस्कारों को धोने के लिए की जाती है ।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करते हुए माला की जाय एवं भावना की जाय कि हम निरन्तर पवित्र हो रहे हैं । दुर्बुद्धि की जगह सद्बुद्धि की स्थापना हो रही है । 

(४) ध्यान - जप तो अंग-अवयव करते हैं, मन को ध्यान में नियोजित करना होता है । साकार ध्यान में गायत्री माता के आँचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार अनवरत रूप से प्राप्त होने की भावना की जाती है । निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता की प्रभातकालीन स्वर्णिम किरणों को शरीर पर बरसने व शरीर में श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा रूपी अनुदान उतरने की भावना की जाती है, जप और ध्यान के समन्वय से ही चित्त एकाग्र होता है और आत्मसत्ता पर उस क्रिया का महत्त्वपूर्ण प्रभाव भी पड़ता है । 

(५) सूर्यार्ध्यदान - विसर्जन-जप समाप्ति के पश्चात् पूजा वेदी पर रखे छोटे कलश का जल सूर्य की दिशा में अर्ध्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाता है ।

ॐ सूर्यदेव! सहस्रांशो, तेजोराशे जगत्पते । 
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
ॐ सूर्याय नमः, 
आदित्याय नमः,
भास्कराय नमः॥

भावना यह करें कि जल आत्म सत्ता का प्रतीक है एवं सूर्य विराट् ब्रह्म का तथा हमारी सत्ता-सम्पदा समष्टि के लिए समर्पित-विसर्जित हो रही है ।

इतना सब करने के बाद पूजा स्थल पर देवताओं को करबद्ध नतमस्तक हो नमस्कार किया जाए व सब वस्तुओं को समेटकर यथास्थान रख दिया जाए । जप के लिए माला तुलसी या चंदन की ही लेनी चाहिए । सूर्योदय से दो घण्टे पूर्व से सूर्यास्त के एक घंटे बाद तक कभी भी गायत्री उपासना की जा सकती है । मौन-मानसिक जप चौबीस घण्टे किया जा सकता है । माला जपते समय तर्जनी उंगली का उपयोग न करें तथा सुमेरु का उल्लंघन न करें । 

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

THE GLORY SONG OF GAYATRI

SHREE GAYATRI CHALISHA

DOHA
Hreem shreem kleem medha prabha 
jeevan jyoti prachand
Shanti, kranti, jagruti, pragati, 
rachana shakti akhand

Jagat janani, mangal karani, 
Gayatri sukhdham
Pranvo savitri, svadha, 
swaha puran kam
Invocation
O mother Gayatri, you pervade everywhere, as Goddess Saraswati in the form of "HRIM" beeja, as Goddess Laxmi in the form of "SHRIM" beeja, as Goddess Mahakali in the form of "KLIM" beeja. You stand omnipotent as the embodiment of intellect, touch of life. O mother, assuming the forms of peace, revolution, enlightenment, progress and inexhaustible power, you are the creator of everything. O universal mother Gayatri, you are the dispenser of all auspicious things to all. You are the abode of bliss. O Savitri, embodied in "OMKARA" O supreme power in the form of "SWAHA" and "SWADHA" O Gayatri, you are the fulfiller of all desired things.

Boor Bhuvaha Swaha Om Yut Janani 
Gayatri Nit Kalimal Dahani 
Akshar Chouvis Param Punita 
Inmein Base Shastra Shruti Gita 
Shasvat Satoguni Sat Rupa 
Satya Sanatan Sudha Anupa 
Hansarudh Sitamber Dhari 
Swarn Kanti Shuchi Gagan-Bihari

O Gayatri, incorporated in "OMKAR" and "Bhoorbhuvah Swaha" (Pranava- Sat-Chit-Anand), you are the remover of all impurities, arising through the impact of Kali. The twenty-four letters of the "Gayatri Mantra" are supremely holy. In them are embodied all the scriptures, Shrutis, and the Geeta. Having a Swan as her carrier, Gayatri, is clad in spotless white. Her lustrous form dazzles like gold. Betaker of the heavenly route O Mother, you are the embodiment of everlasting "Satwa Guna" as well as truth-incarnate and the dispenser of a unique nectar-like bliss.

Pustak, Pushp, Kamandalu, Mala 
Shubhra Varna Tanu Nayan Vishala
Dhyan Dharat Pulakit Hiy Hoi 
Sukha Upajat, Dukh Durmati Khoi
Kamdhenu Tum Sur Taru Chhaya 
Nirakar Ki Adbhut Maya
Tumhari Sharan Gahey Jo Koi 
Tarei Sakala Sankat So Soi

The book of the vedas, a lotus, a gourd and a rosary adorn each of the four hands respectively of mother Gayatri. She has a fair complexion, and has big eyes. One who meditates upon such a form of mother Gayatri, experiences a rare thrill. He is filled with happiness and all his miseries and evil intentions cease. O mother, you are like the desire-yielding cow, and grant the desired objects and aspirations of a person. O mother, though you are formless, your 'Maya' is amazing. Anyone who surrenders himself to you, is freed from all his troubles.

Saraswati Lakshmi Tum Kali 
Depai Tumhari Joyti Nirali
Tumhari Mahima Par Na Pavai 
Jo Sharad Shatmukh Gun Gavai
Char Ved Ki Matu Punita 
Tum Brahmani Gauri Sita
Mahamantra Jitne Jaga Mahin 
Kou Gayatri Sam Nahin

O mother Gayatri, you, who are the embodiment of Laxmi, Saraswati and Mahakali, have a splendor which is uniquely resplendent. Your prowess is limitless. Even if Goddess Saraswati were to extol your qualities even with her humdred mouths, she would not be able to do so properly. O holy mother, you are the mother of the four vedas. Brahmani, Gauri, and Sita are your manifestations only. Of all the existing mantras in the universe, there is none that can be at par with the greatness of this great Gayatri Mantra.

Sumirat Hiya Mein Gyan Prakashey 
Aalas Pap Avidya Nashey
Srushti Beej Jag Janani Bhavani 
Kalratri Varda Kalyani
Brahma Vishnu Rudra Sur Jete 
Tumso Paven Surata Te Te
Tum Bhaktan Ki Bhakt Tumhare 
Janani Hin Putra Pran Te Pyara

Thus the chanting of this great Gayatri Mantra gives rise to a great enlightenment in the heart. At the same time, idleness, sins, and wickedness are dispelled. O universal mother Bhavani, you are the primary fountain spring of the whole universal existence. O mother, you are the dark night of destruction too. At the same time, you are the benevolent mother showering bliss on one and all. O pristinely sanctifying mother, the godliness that is there in the three chief Gods, Brahma, Vishnu, and Mahesh has been attained by them through your grace. You are the sole mother of the devotees who are truly your children, one and all. O mother of the vedas, to a mother her children are ever dearer than life.

Mahima Aparampar Tumhari 
Jai Jai Jai Tripada Bhayhari
Purita Shakala Gyan Vigyana 
Tum Sam Adhik Na Jag mein Ana
Tumahi Jani Kachhu Rahey Na Shesha 
Tumahi Pae Kachhu Rahey Na Klesha
Janat Tumahi Tumahi Hai Jai 
Paras Parsi Kudhatu Suhai

O mother (of the Vedas), limitless is your greatness, victory, victory be to you! O Tripada (Gayatri), the dispelled of all the fears you are the fountain spring of all knowledge and sciences. Nothing in the world is, O mother, greater than you. O blessed mother, nothing else, remains to be known by him who has known you. O mother, no grief or troubles exist for him who has been fortunate enough to have your sight. Just as base iron turns into gold, at the touch of the paras (philosopher's stone), in the same way one who knows you, becomes fully identified with you.

Tumhari Shakti Deepey Sab Thai 
Mata Tum Sab Thour Samai
Grah Nakshatra Brahmand Ghanere 
Sab Gativan Tumhare Prere
Sakala Srushti Ki Pran Vidhata 
Palak Poshak Nasak Trata
Mateswari Daya Vratdhari 
Tum San Tarain Pataki Bhari

O mother you are omnipresent and your sway pervades everywhere. All the heavenly bodies such as planets, stars - even this mighty universe - get their motivation when they are inspired through your grace. O mother, you are the creator and the sustainer of the whole creation. You maintain, nourish, and finally destroy all. Even the worst sinners committing the most heinous crimes are absolved through your grace. Thus being freed from all sins, they become sanctified.

Japar Krupa Tumhari Hoi 
Tapar Krupa Karey Saba Koi
Mand Buddhi Te Buddhi Bal Pavey 
Rogi Rog Rahit Ho Javein
Daridra Mitey, Katey Saba Pira 
Nashey Duhkh Harey Bhav Bhira
Gruh Klesha Chitt Chinta Bhari 
Nasai Gayatri Bhayahari

O mother Gayatri, a person lucky to be favored by your grace, becomes favored by all. Receiving your favor even the worst dullard becomes highly intelligent; similarly one afflicted with a disease is cured of his ailment, and an utter pauper gets rid of his poverty. Your grace protects one from terrible calamities. The worry of being caught in the cycle of birth and death ceases through your grace. O mother Gayatri, the redeemer from all the sins, frees a man from the terrible torments of domestic, strife, and other worries that eat away the very vitals of the heart.

Santati Heen Susantati Pavei 
Sukh Sampati Yut Moda Manavein
Bhoot Pishach Sabai Bhaya Khavein 
Yam Ke Dut Nikat Nahin Avein
Jo Sadhava Sumirein Chitta Lai 
Akshat Suhag Sada Sukhdai
Ghara Vara Sukhprada Lehein Kumari 
Vidhava Rahein Satyavratdhari

O Mother, childless persons, if they receive your favor through your remembrance get good issues and thus favored, they pass their days in a rich and blissful state. O fear dispelling mother, one gets rid of the fear from ghosts and evil spirits through your remembrance. The agents of the god of death, Yama, dare not come near one who worships you. Any woman with a husband living, enjoys the bliss of being in the unbroken conjugal state, if she remembers you sincerely. A virgin through your remembrance is endowed with a desirable husband of a good household, which makes her happy. A widow remembering you always, is able to remain constant in her vow of truth and good faith.

Jayati Jayati Jagdamba Bhavani 
Tum Sam Aur Dayalu Na Dani
Jo Sadguru So Deeksha Pavein 
So Sadguru Ko Safal Banavein
Sumiran Karein Suruchi Badbhagi 
Lahai Manorath Gruhi Viragi
Ashta Siddhi Nav Nidhi Ki Data 
Sab Samarth Gayatri Mata

O mother of the Universe, O Bhavani, victory be to you surely; there is none else so compassionate and the dispenser of all the desire. He who being initiated by a good guru with Gayatri, will have his aim of attaining accomplishment of his sadhana fully realized. Such a fortunate person, though he may be a householder or a renunciate, if he remembers mother Gayatri with love and devotion, will see all his desires are fulfilled by mother Gayatri. Eight types of accomplishments, and nine types of treasures are gifted to him by mother Gayatri, whose powers surpasses that of all other gods and goddesses.

Rishi, Muni, Yati, Tapasvi, Yogi 
Arat, Arthi, Chintit, Bhogi 
Jo Jo Sharan Tumhari Avein 
So So Mana Vanchhita Fala Pavein 
Bala, Buddhi, Vidya, Sheel Svabhau 
Dhan, Vaibhav, Yash, Tej, Uchhau 
Sakala Badhein Upajein Sukh Nana 
Jo Yah Path Karein Dhari Dhyana 

O merciful mother, you fulfill all the desires and grant all the expectations of all those who surrender themselves to you. Any one of these, be he a sage or a yati, an ascetic or a yogi, one performing penances or afflicted with a disease or one wishing to enjoy all the worldly pleasures or hankering for riddance from his anxieties, or longing for riches will have his wishes granted. If these forty verses are recited with a concentrated mind a person obtains strength, intellect, knowledge, good character, prosperity, wealth, and many other types of happiness.

Yeh Chalisha Bhaktiyut Path Kare Jo Koi
Tapar Krupa Prasannata Gayatri Ki Hoi

If these forty verses are recited with a concentrated mind, the person obtains strength, intellect, knowledge, good character, prosperity, wealth, and many other types of happiness.

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