सोमवार, 26 अप्रैल 2010

आस्था का प्रश्न

एक राजा हर समय ईश्वर की भक्ति में डूबा रहता था। उसकी इकलौती लड़की भी उसी की तरह धर्मानुरागी थी। राजा की इच्छा थी कि वह अपनी पुत्री का विवाह ऐसे युवक के साथ करे ,जो उसी की तरह धार्मिक प्रवृत्ति का हो। एक दिन राजा को एक ध्यानमग्न युवक मिला। राजा ने उससे पूछा, ‘तुम्हारा घर कहां है?’ युवक ने उत्तर दिया, ‘ईश्वर जहां रखता है, वहीं मेरा घर है।’ राजा ने प्रश्न किया, ‘तुम्हारे पास कुछ सामान है?’ युवक ने कहा, ‘प्रभु की कृपा के अलावा मेरे पास कुछ नहीं है।’ उससे प्रभावित होकर राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। विवाह के बाद राजा की बेटी पति के साथ जंगल में गई और एक पेड़ के नीचे डेरा डाला। उसने देखा कि पेड़ के कोटर में रोटी का टुकड़ा रखा है। उसने पति से पूछा , ‘यह क्या है?’ पति ने जवाब दिया, ‘आज रात इससे काम चलेगा, इसलिए इसे कल बचाकर छोड़ा था।’

यह सुनकर राजकन्या रोने लगी और अपने पिता के घर लौटने की तैयारी करने लग गई। पति ने कहा, ‘मैं जानता था कि यही होगा। तुम्हारा लालन-पालन महल में हुआ है, तुम मुझ जैसे गरीब के साथ निभा नहीं सकोगी।’ राजा की बेटी ने उत्तर दिया, ‘मैं गरीबी से नहीं डरती। मुझे दुख इस बात का है कि ईश्वर के प्रति आपका पूर्ण विश्वास नहीं है। इसी से आपने सोचा कि कल क्या खाएंगे और रोटी का टुकड़ा बचाकर रख लिया।

ईश्वर को देना होगा तो वह स्वयं देगा, हम इसकी चिंता क्यों करें। मैंने सोचा था कि मुझे ऐसा पति मिले जिसकी प्रभु भक्ति में कोई कमी न हो। इसी से मैंने आपका वरण किया पर मैं संभवत: गलत हूं।’ युवक बहुत पछताने लगा। राजकन्या ने कहा, ‘आप कान खोलकर सुन लीजिए कि आपके साथ रोटी का यह टुकड़ा रहेगा या मैं।’ यह सुनकर युवक की आंखें खुल गईं। उसने रोटी का टुकड़ा फेंक दिया।

और दो जलेबियां उठाकर भाग गई वह बालिका

शाम से ही मंदिर में भीड़ लगी हुई थी। मंदिर के बाहर जनसमुदाय उमड़ पड़ा था। भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए तथा जनता के जानमाल की रक्षा के लिए कई पुलिस कांस्टेबल भाग-दौड़ रहे थे। एक कांस्टेबल जो मंदिर की सीढ़ियों के ठीक नीचे तैनात था, अत्यंत ही तत्परता से आने-जाने वालों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उनकी सहायता भी कर रहा था। मंदिर के बाहर कुछ मिठाई की दुकानें लगी थीं।

जहां पर एक छोटी-सी बालिका बहुत देर से भीख के लिए गिड़गिड़ा रही थी। वह बहुत भूखी थी किंतु कोई उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था। तभी उस बालिका ने देखा कि जलेबी की एक दुकान से दुकानदार उठकर कहीं गया है। भूख से व्याकुल उस बालिका ने धीरे-धीरे दुकान की ओर कदम बढ़ाए और फिर इधर-उधर देखकर जल्दी से दो जलेबियां अपनी मुट्ठी में भर लीं, तभी दुकानदार आ पहुंचा। उसने उसे पकड़ लिया और मार लगाई।

बालिका जोरों से रोने लगी। वहां तैनात कांस्टेबल यह सब देख रहा था। इधर उसका साथी कांस्टेबल मंदिर से वापस आकर बोला- जाओ दर्शन कर आओ। पहले कांस्टेबल ने कहा- मैं यहीं से दर्शन कर रहा हूं। फिर वह बालिका के पास आया और उसे दुकान पर ले गया। उसे जलेबी दिलवाई और कहा- खा ले बेटा!

अब चोरी मत करना। चोरी करना बुरी बात है। बालिका ने जीभरकर जलेबियां खाईं। उसे खाते देखकर जो तृप्ति और संतोष उसकी आंखों में था, वह दर्शन कर लौटने वालों की आंखों में भी नहीं था। जो व्यक्ति निर्धन, दुर्बल व दुखी प्राणियों में भगवान के दर्शन करे, वही सच्चा उपासक है। केवल मूर्ति में भगवान को देखना मात्र एक छलना है।

आखिरकार चींटी का मुंह खारा का खारा ही रहा

दो चींटियां आपस में बातें कर रही थीं। एक ने कहा- बस मुझे एक ही कष्ट है कि मेरा मुंह हर समय खारा ही रहता है। यह सुन दूसरी चींटी ने उसे मीठा पदार्थ खाने को दिया, लेकिन फिर भी उसका कष्ट दूर नहीं हुआ।

एक चींटी पेड़ के ऊपर चढ़ रही थी। ऊपर से दूसरी चींटी नीचे की ओर आ रही थी। पहली चींटी ने दूसरी चींटी से पूछा-कहो बहन, कुशल मंगल तो है? दूसरी चींटी ने कहा- क्या बताऊं बहन! और सब तो ठीक है किंतु एक कष्ट है। पहली चींटी ने कहा- बताओ बहन क्या कष्ट है? दूसरी चींटी ने कहा- मुंह का स्वाद बिगड़ा रहता है। हर समय मुंह खारा ही रहता है।

क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता। पहली चींटी ने समझ-बूझ से काम लेते हुए कहा- तुम समुद्र के किनारे रहती हो न, इसलिए ऐसा होता है। आओ मेरे साथ, मैं मीठे फल के पेड़ पर रहती हूं। तुम्हारा मुंह भी मीठा कराती हूं। पहली चींटी उसे अपने घर ले गई, जो पेड़ के तने के कोटर में था। वहां कई प्रकार के मीठे पदार्थो के छोटे-छोटे टुकड़े पड़े थे। उसने अतिथि चींटी को प्यार से कई मीठे व्यंजन खिलाए।

दूसरी चींटी ने डटकर मीठा खाया। जब वह खूब खा चुकी तो पहली चींटी ने उससे पूछा कहो बहन, अब तो तुम्हारा मुंह खारा नहीं है? किंतु दूसरी चींटी ने कहा- मेरा मुंह तो अब तक खारा है। इस पर पहली चींटी हैरानी से बोली- ऐसा कैसे हो सकता है? कहीं तुम्हारे मुंह में नमक की डली तो नहीं है? दूसरी चींटी ने कहा- सो तो है। समुद्र के किनारे रहती हूं इसलिए नमक तो मुंह में रखती ही हूं। तब पहली चींटी बोली- फिर मुंह का खारापन कैसे दूर होगा? मुंह मीठा करना है तो पहले नमक की डली बाहर थूको।

सार यह है कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य है किंतु अज्ञानतावश स्वयं को निर्बल समझकर वह दुखी रहता है। जरूरत है अपनी आंखों पर से पर्दा हटाने की। बुद्धि व परिश्रम से अपना भाग्य मनुष्य स्वयं बदल सकता है।

जब गुलाम ने बादशाह को किया लाजवाब


तैमूरलंग गुलामों को बेचने का सौदा करता था। उसने गुलाम अहमदी से अपनी स्वयं की कीमत पूछी। अहमदी ने तर्कपूर्ण जवाब दिया- दो अशर्फी। अहमदी की स्पष्टवादिता से बादशाह बेहद प्रभावित हुआ।

एक बार बादशाह तैमूरलंग ने बड़ी संख्या में गुलाम पकड़े। उसका सिद्धांत था कि पकड़े हुए गुलामों को बेचने का सौदा वह स्वयं ही मोल-भाव करके करता था। उसने अपने विश्वस्त सेवकों को आदेश दिया कि सभी गुलामों को विक्रय स्थल पर एकत्रित कर दें। जब सेवकों ने यह कार्य कर दिया, तब वह बड़ी शान से वहां पहुंचा और बैठ गया।

उसने सभी गुलामों पर एक विजयी दृष्टि डाली और फिर एक गुलाम को अपने पास बुलाया। वह गुलाम और कोई नहीं, बल्कि तुर्किस्तान के दार्शनिक अहमदी थे। तैमूरलंग ने अहमदी से प्रश्न किया- बताओ, तुम्हारे पास खड़े इन दो गुलामों की कीमत कितनी होनी चाहिए? अहमदी ने कहा- ये समझदार और मेहनती दिखाई देते हैं। अत: इनकी कीमत चार-चार हजार अशर्फियों से कम तो नहीं होनी चाहिए।

तैमूरलंग ने फिर पूछा- मेरी कीमत क्या हो सकती है? कुछ सोचकर अहमदी बोले- दो अशर्फी। विस्मित तैमूरलंग गुस्से से गरजा- मेरा इतना अपमान? इतने पैसों की तो मेरी चादर है। निर्भयता के साथ दार्शनिक अहमदी ने तैमूरलंग के तमतमाते चेहरे को देखकर कहा- यह कीमत तो मैंने तुम्हारी चादर देखकर ही बताई है। तुम्हारे जैसे अत्याचारी और अकर्मण्य बादशाह की कीमत तो एक छदाम भी नहीं हो सकती। अहमदी की निर्भीकता व स्पष्टवादिता ने तैमूरलंग का गुस्सा ठंडा कर दिया और उसने उन्हें मुक्त कर दिया।

दरअसल किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी योग्यता व कार्यक्षमता के आधार पर ही होता है। यदि व्यक्ति योग्य है और कर्मठ भी, तो वह लाख का है। इसके विपरीत अयोग्यता व अकर्मण्यता व्यक्ति को खाक का दर्जा देते हैं।

आत्मा-परमात्मा का संबंध बताया कन्फ्यूशियस ने

दार्शनिक कन्फ्यूशियस के एक शिष्य को ध्यान लगाने और मन पर संयम स्थापित करने में कठिनाई होती थी। तब उन्होंने समझाया कि अपने को पूरी तरह से आत्मा में डुबो दो, तभी तुममें संयम आएगा।

कन्फ्यूशियस अपने समय के महान दार्शनिक और धर्म मर्मज्ञ थे। उनके शिष्य उन्हें रात-दिन घेरे रहते थे। उनके एक शिष्य येनहुई को ध्यान लगाने तथा मन पर संयम रखने में बहुत कठिनाई हो रही थी।

वह कन्फ्यूशियस के पास जाकर बोला- मन पर संयम रखने के लिए क्या करना चाहिए? कन्फ्यूशियस ने कहा- मन व आत्मा में एकता स्थापित करो, जो सोचो, सुनो और देखो उसका आभास करो। येनहुई गुरु की बात बिल्कुल भी नहीं समझा।

वे फिर बोले- तुम कान से नहीं सुनते, अपने मन और आत्मा से सुनते हो। तुम्हें कोई कुछ कह रहा है, लेकिन तुम्हारा ध्यान कहीं और है तो तुम नहीं सुन सकोगे। अत: केवल कान से सुनने वाली बात गलत है। कान के साथ जब तक आत्मा नहीं होगी, मन नहीं होगा, तब तक सुनकर भी नहीं सुन सकते। यही स्थिति आंखों की भी है और मस्तिष्क की भी।

अपने को पूर्णत: आत्मा में डुबो दो, तभी संयम आएगा और ज्यों ही संयम आया, तुम धर्म का आभास कर सकोगे। तब येनहुई ने पूछा- पर गुरुदेव इसके लिए तो स्वयं का पूरा व्यक्तित्व ही खो देना पड़ेगा। फिर हमारी पहचान क्या रह जाएगी? तब कन्फ्यूशियस ने समझाया- तुम परमतत्व को पाने के लिए मन पर संयम प्राप्त करना चाहते हो और अपना व्यक्तित्व भी खोना नहीं चाहते। सागर बनने की इच्छा रखने वाली बूंद को सागर के अथाह जल में खोना ही पड़ेगा।

कथा का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर से मिलने की इच्छा रखने वाले को यह सत्य स्वीकारना होगा कि वह उसी का एक अंश है। कुल मिलाकर गूढ़ार्थ यह है कि अहं का विसर्जन ही परमात्मा की उपलब्धि का द्वार है।

गुरू का सम्मान

गुरू धौम्य का बहुत बडा आश्रम था।आश्रम में कई शिष्य थे। उनमें अरूणि गुरू का सबसे प्रिय शिष्य था। आश्रम के पास खेती की बहुत ज़मीन थी। खेतों में फसल लहलहा रही थी। एक दिन शाम को एकाएक घनघोर घटा घिर आई और थोडी देर में तेज वर्षा होने लगी। उस समय ज्यादातर शिष्य उठ कर चले गए थे। अरूणि गुरूदेव के पास बैठा था। गुरू धौम्य ने कहा, अरूणि तुम खेतों की तरफ चले जाओ और मेडों की जाँच कर लो। जहाँ कहीं से पानी बह रहा हो और मेड कमजोर हो तो वहाँ मिट्टी डाल कर ठीक कर देना। अरूणि चला गया। कई जगह मेड के ऊपर से पानी बह रहा था। उसने मिट्टी डाल कर ठीक किया। एक जगह मेड में बडा छेद हो गया था। उससे पानी तजी से बह रहा था। वह उस छेद को बंद करने के लिये मिट्टी का लौदां उठा-उठा कर भरने लगा, लेकिन ज्योंही एक लौंदा रखकर दुसरा लेने आता, पहले वाला लौंदा भी बह जाता। उसका बार-बार के प्रयास बेकार जा रहा था कि उसे एक उपाय सूझा। उसने मिट्टी का एक लौंदा उठाया और छेद को बंद करके स्वयं मेड के सहारे वहीं लेट गया, जिससे पानी बहना बंद हो गया। रात होने लगी थी। अरूणि लौट कर आश्रम नहीं आया था, जिसकी वजह से गुरू को चिंता हो रही थी। वे कुछ शिष्यों को लेकर खेत की तरफ गये। खेत के पास पहुँच कर पुकारा, अरूणि तुम कहाँ हो। वह बोला, गुरूवर मैं यहाँ हूँ। गुरूवर उस जगह गए। उन्होंने देखा कि अरूणि मेड से चिपटा हुआ है। गुरूदेव बोले, वत्स तुम्हें इस तरह यहाँ पडे रहने की जरूरत क्या थी| तुम्हें कुछ हो जाता तो …।

अरूणि बोले, गुरूवर, यदि मैं अपना कर्तव्य अधूरा छोड कर चला आता तो वह गुरू का अपमान होता। जहाँ तक कुछ होने की बात है तो जब तक गुरू का आशीर्वाद शिष्य के सिर पर है तब तक शिष्य को कुछ नहीं होगा। गुरू का दर्जा तो भगवान से बडा है। इस पर महर्षि बोले, वत्स, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने आज गुरू-शिष्य के संबधों की अनूठी मिसाल कायम की है जो हमेशा के लिये जनमानस में एक मिसाल बनी रहेगी। तुमने अंतिम परीक्षा पास कर ली है।

क्रोध का कलंक

विश्वामित्र अत्यंत क्रोधी स्वभाव के थे। उन्हें इस बात का दुख सताता रहता था कि ऋषि वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि नहीं मानते। एक दिन उन्होंने सोचा, ‘आज मैं वशिष्ठ को मारकर ही रहूंगा। तब फिर कोई मुझे ब्रह्मर्षि की जगह राजर्षि कहने वाला नहीं रहेगा।’ वह एक तलवार लेकर उस वृक्ष पर जा बैठे जिसके नीचे महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। थोड़ी देर के बाद वशिष्ठ अपने शिष्यों के साथ उस वृक्ष के नीचे आ बैठे। पूर्णिमा का चांद निकल आया। विश्वामित्र ने सोचा कि छात्रों के जाते ही वह वशिष्ठ को मार डालेंगे। तभी एक छात्र बोल उठा, ‘कितना सलोना चांद है। कितनी सुंदरता है उसके भीतर।’ वशिष्ठ बोले, ‘यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चांद को भूल जाओगे। यह चांद सुंदर अवश्य है, पर ऋषि विश्वामित्र इससे भी ज्यादा सुंदर हैं। यदि उनके भीतर क्रोध न हो तो वह सूर्य की भांति चमक उठें।’

छात्र बोला, ‘गुरुदेव ऐसा आप कह रहे हैं, पर वह तो आपके शत्रु हैं। सदैव आपकी निंदा करते रहते हैं।’ वशिष्ठ ने कहा, ‘जानता हूं, मगर मैं इन बातों पर ध्यान नहीं देता। सच तो यह है कि वह मुझसे ज्यादा विद्वान हैं। उन्होंने मुझसे ज्यादा तप किया है। तुम्हें नहीं मालूम मैं उनका कितना सम्मान करता हूं।’

पेड़ पर बैठे विश्वामित्र यह सुनकर हैरान रह गए। वह पश्चाताप से भर उठे। वह वशिष्ठ को मारना चाहते थे पर वशिष्ठ तो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। वह उसी समय पेड़ से कूदे। उन्होंने तलवार फेंकी और वशिष्ठ के चरणों में गिरकर बोले, ‘मुझे क्षमा करें ऋषिवर।’ वशिष्ठ ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘उठिए ब्रह्मर्षि।’ विश्वामित्र ने आश्चर्य से कहा, ‘ब्रह्मर्षि! आपने मुझे ब्रह्मर्षि कहा? पर आप तो मुझे ब्रह्मर्षि का दर्जा देते नहीं। आप तो सदैव मुझे राजर्षि कहते हैं।’ वशिष्ठ ने कहा, ‘आज से आप ब्रह्मर्षि हुए। आप ने अपने क्रोध पर विजय पा ली है। आप में एकमात्र दोष यही था, अब उसे भी आपने दूर कर लिया।’ यह कहकर वशिष्ठ ने विश्वामित्र को गले लगा लिया।

वृद्धावस्था का मूल्य

एक राजकुमार को वृद्धों से घृणा थी। वह कहा करता था, ‘बूढ़ों की बुद्धि कुंठित हो जाती है। वे सदा बेतुकी बातें किया करते हैं। वे किसी काम के नहीं होते।’ उसके दरबारी भी उसकी हां में हां मिलाते रहते थे। एक बार राजकुमार अपने कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने गया। युवराज का स्पष्ट निर्देश था कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को साथ न ले जाया जाए।

राजकुमार ने जंगल में एक जगह पड़ाव डाला। सभी लोग शिविर में ठहरे। उन्हें आशा थी कि पास में ही कहीं पानी मिलेगा लेकिन बहुत ढूंढने पर भी कहीं पानी नहीं मिला। राजकुमार प्यास से व्याकुल हो गया। सैनिकों का भी गला सूख रहा था। समस्या का कोई हल न निकलता देख एक सैनिक ने कहा, ‘काश, कोई वृद्ध अभी हमारे साथ होता। वह जरूर कोई न कोई रास्ता निकालता।’ राजकुमार ने भी महसूस किया कि इससे कोई लाभ हो सकता है। उसने किसी बुजुर्ग को खोज लाने का आदेश दिया। तभी एक शिविर से एक युवक अपने वृद्ध पिता को लेकर सामने आया और बोला, ‘युवराज, घर पर मेरे पिता की सेवा करने वाला कोई नहीं था। इसलिए पितृभक्ति ने मुझे विवश किया कि मैं इन्हें अपने साथ लेकर चलूं। वैसे तो यह आपके आदेश का उल्लंघन था पर क्या करता और कोई रास्ता न था।’

यह कहकर उस युवक ने अपने पिता से निवेदन किया, ‘पिताजी कृपया हमारी समस्या का हल सुझाएं।’ वृद्ध ने कहा, ‘चरते हुए गधे जिस भूमि को सूंघें वहां थोड़ी ही गहराई पर पानी अवश्य मिलेगा।’ सैनिकों ने खोज की। जंगल में घास चरते हुए गधों को जहां की भूमि सूंघते हुए देखा, वहां की खुदाई की गई। खोदते ही जल निकला। लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। सब पानी पीकर तृप्त हुए। उस वृद्ध ने राजकुमार से कहा, ‘युवराज, क्षमा करें। हर आयु के व्यक्ति की अपनी भूमिका है। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। किसी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।’ राजकुमार लज्जित हो गया।

हार और जीत

किसी शहर में बहुत दूर से एक विद्वान पहुंचा। उसने लोगों से कहा कि वह यहां के विद्वानों से शास्त्रार्थ करना चाहता है। कुछ लोग उसे शहर के प्रमुख विद्वानों के पास ले गए जिन्होंने कहा, ‘हमारे यहां तो सनातन गोस्वामी और उनके भतीजे जीव गोस्वामी ही श्रेष्ठ ज्ञानी हैं। अगर वे आपको विजेता के रूप में स्वीकार कर मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर देंगे तो हम भी आपको विजेता मान लेंगे।’ दूर से आया वह विद्वान सनातन गोस्वामी के पास पहुंचा और बोला, ‘स्वामी जी, या तो आप मुझसे शास्त्रार्थ कीजिए या मुझे मान्यता पत्र प्रदान कीजिए।’ इस पर सनातन गोस्वामी बोले, ‘भाई! अभी हमने शास्त्रों का मर्म ही कहां समझा है। हम तो विद्वानों के सेवक हैं।’ यह कहते हुए उन्होंने मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया। विद्वान मान्यता पत्र लेकर प्रसन्नतापूर्वक चला जा रहा था कि जीव गोस्वामी मिल गए। विद्वान ने उनसे भी कहा, ‘आप इस मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे या मुझसे शास्त्रार्थ करेंगे?’ जीव गोस्वामी बोले, ‘मैं शास्त्रार्थ के लिए तैयार हूं।’ दोनों में शास्त्रार्थ शुरू हो गया। शहर के लोग उत्सुकतापूर्वक यह देख रहे थे। लंबे शास्त्रार्थ में जीव गोस्वामी ने उस विद्वान को पराजित कर दिया। वह विद्वान दुखी होकर नगर से चला गया। जीव गोस्वामी ने सनातन गोस्वामी को अपनी विजय के बारे में बताया पर सनातन गोस्वामी प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘एक विद्वान को अपमानित करके तुम्हें थोड़ा यश अवश्य मिल गया लेकिन क्या करोगे यश लेकर? यह केवल तुम्हारे अहंकार को बढ़ाएगा और तुम्हारे जैसा अहंकारी ज्ञान की साधना कैसे कर पाएगा। आखिर उस विद्वान को विजयी मान लेने में तुम्हारा क्या बिगड़ता था। हमारे लिए यश-अपयश, जीवन-मरण, सुख-दुख, मित्र-शत्रु सभी एक समान होते हैं। हमें हार और जीत के फेर में पड़ना ही नहीं चाहिए।’ जीव गोस्वामी को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा मांगी।

जब युवा संन्यासी ने वृद्ध संन्यासी को जाना

जीवन दर्शनः एक युवा संन्यासी एक वृद्ध संन्यासी के सान्निध्य में रहकर ज्ञान प्राप्ति के लिए उनके आश्रम में आया। वह लगातार वृद्ध संन्यासी के निकट बना रहता, किंतु दो-चार दिन के प्रवास में ही उसे ऐसा महसूस हुआ कि यह वृद्ध संन्यासी विशेष ज्ञानी नहीं है। उसने सोचा कि इस आश्रम को छोड़ देना चाहिए और अन्यत्र चलकर किसी ज्ञानी गुरु की खोज करनी चाहिए किंतु उसी दिन एक और संन्यासी का उस आश्रम में आना हुआ। युवा संन्यासी एक रात और रुक गया।

रात को आश्रम में सभी संन्यासी एकत्रित हुए और उनके मध्य परस्पर बातचीत हुई। नए संन्यासी ने इतनी ज्ञानपूर्ण चर्चा की कि छोड़कर जाने की इच्छा रखने वाले युवा संन्यासी को लगा कि गुरु हो तो ऐसा हो। दो घंटे के वार्तालाप में ही वह उससे प्रभावित हो गया। जब चर्चा समाप्त हुई तो नए संन्यासी ने वृद्ध संन्यासी गुरु से पूछा- आपको मेरी बातें कैसी लगीं? गुरु बोले- तुम्हारी बातें? बातें तो तुम कर रहे थे किंतु वे तुम्हारी नहीं थीं। तुम कुछ बोल ही नहीं रहे थे।

जो तुमने इकट्ठा कर लिया है, उसी को बाहर निकालते रहे। बाहर से जो भीतर ले जाया जाए और फिर बाहर निकाल दिया जाए, उसमें तो वमन की दरुगध ही आती है। तुम्हारे भीतर की किताबें बोल रही थीं, शास्त्र बोल रहे थे किंतु तुम जरा भी नहीं बोल पाए। युवा संन्यासी जो आश्रम छोड़ने का विचार कर रहा था, रुक गया। गुरु की बातों ने उसे आत्मज्ञान करा दिया।

वस्तुत: जानने-जानने में बहुत फर्क है। असली जानना वह है जिसका जन्म भीतर से होता है। बाहर से जो एकत्रित किया जाता है, वह तो बंधन हो जाता है, उससे जीवन में परिवर्तन संभव नहीं।

प्रेम को जानो

एक बार संत राबिया एक धार्मिक पुस्तक पढ़ रही थीं। पुस्तक में एक जगह लिखा था, शैतान से घृणा करो, प्रेम नहीं। राबिया ने वह लाइन काट दी। कुछ दिन बाद उससे मिलने एक संत आए। वह उस पुस्तक को पढ़ने लगे। उन्होंने कटा हुआ वाक्य देख कर सोचा कि किसी नासमझ ने उसे काटा होगा। उसे धर्म का ज्ञान नहीं होगा। उन्होंने राबिया को वह पंक्ति दिखा कर कहा, जिसने यह पंक्ति काटी है वह जरूर नास्तिक होगा।

राबिया ने कहा, इसे तो मैंने ही काटा है। संत ने अधीरता से कहा, तुम इतनी महान संत होकर यह कैसे कह सकती हो कि शैतान से घृणा मत करो। शैतान तो इंसान का दुश्मन होता है। इस पर राबिया ने कहा, पहले मैं भी यही सोचती थी कि शैतान से घृणा करो। लेकिन उस समय मैं प्रेम को समझ नहीं सकी थी। लेकिन जब से मैं प्रेम को समझी, तब से बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं कि घृणा किससे करूं। मेरी नजर में घृणा लायक कोई नहीं है।

संत ने पूछा, क्या तुम यह कहना चाहती हो कि जो हमसे घृणा करते हैं, हम उनसे प्रेम करें। राबिया बोली, प्रेम किया नहीं जाता। प्रेम तो मन के भीतर अपने आप अंकुरित होने वाली भावना है। प्रेम के अंकुरित होने पर मन के अंदर घृणा के लिए कोई जगह नहीं होगी। हम सबकी एक ही तकलीफ है। हम सोचते हैं कि हमसे कोई प्रेम नहीं करता। यह कोई नहीं सोचता कि प्रेम दूसरों से लेने की चीज नहीं है, यह देने की चीज है। हम प्रेम देते हैं। यदि शैतान से प्रेम करोगे तो वह भी प्रेम का हाथ बढ़ाएगा।

संत ने कहा, अब समझा, राबिया! तुमने उस पंक्ति को काट कर ठीक ही किया है। दरअसल हमारे ही मन के अंदर प्रेम करने का अहंकार भरा है। इसलिए हम प्रेम नहीं करते, प्रेम करने का नाटक करते हैं। यही कारण है कि संसार में नफरत और द्वेष फैलता नजर आता है।

जब बादशाह को अदालत में तलब किया गया

दिल्ली का बादशाह गयासुद्दीन तीरंदाजी का अभ्यास कर रहा था। अचानक गयासुद्दीन का तीर चला, जो एक बालक को लगा। तत्क्षण उसकी मृत्यु हो गई। बालक के माता-पिता बेहद दुखी हुए। थोड़े दिनों बाद उस बालक की दुखी मां न्याय मांगने काजी सिराजुद्दीन के पास पहुंची। उसने काजी से कहा कि अपराधी भले ही सम्राट क्यों न हो, दंड अवश्य मिलना चाहिए। काजी ने उसे न्याय दिलाने के प्रति आश्वस्त किया। अगले दिन काजी ने बादशाह को अदालत में तलब किया।

नियत समय पर बादशाह अपना राजसी वस्त्र त्यागकर साधारण वस्त्रों में अदालत में हाजिर हुआ। वहां उपस्थित सभी लोगों ने नियमानुसार उसे बादशाह के रूप में सम्मान नहीं दिया क्योंकि उस वक्त वह दोषी के रूप में आया था। मुकदमा चला, बादशाह ने अपना अपराध स्वीकार किया और भारी जुर्माना भरना कबूल किया। अदालत की कार्रवाई समाप्त होने के बाद काजी उठा और उसने बादशाह को सलाम किया। बादशाह ने अपने कपड़ों में छिपी तलवार दिखाते हुए कहा- अगर आप मेरे डर से विचलित होकर सही न्याय नहीं करते तो मैं आपकी गर्दन इस तलवार से उड़ा देता।

काजी ने भी न्यायासन के पास रखी छड़ी की ओर संकेत कर कहा- जहांपनाह! अच्छा हुआ आपने अदालत का सम्मान किया, वरना मैं इस छड़ी से आपकी चमड़ी उधेड़ देता। तब बादशाह खुश होकर बोले- मुझे आप पर गर्व है। वही सच्चा न्यायाधीश है जिसकी नजर में राजा व प्रजा बराबर हैं। कथा का संदेश यह है कि न्याय की तुला पक्षपातरहित होनी चाहिए। जब न्याय निष्पक्ष होता है तभी दोषी सजा पाता है।

फकीर ने चिता की राख सूंघकर दिया गूढ़ संदेश

एक फकीर श्मशान में बैठा था। थोड़ी देर बाद वहां दो अलग-अलग समूहों में कुछ लोग मृत देह लेकर आए और चिता सजाकर उन्हें अग्नि को समर्पित कर दिया। जब चिताएं ठंडी हो गईं तो लोग वहां से चले गए। तब वह फकीर उठा और अपने हाथों में दोनों चिताओं की राख लेकर बारी-बारी से उन्हें सूंघने लगा। लोगों ने आश्चर्य से उसके इस कृत्य को देखा और उसे विक्षिप्त समझा। एक व्यक्ति से रहा नहीं गया।

वह फकीर के निकट गया और उससे पूछा- बाबा! ये चिता की राख मुट्ठियों में भरकर और इसे सूंघकर क्या पता लगा रहे हो? उस फकीर ने कहा- मैं गहरी छानबीन में लगा हूं। व्यक्ति ने प्रश्नवाचक मुद्रा में उसकी ओर देखा तो वह अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी खोलकर उसकी राख को दिखाते हुए बोला- यह एक अमीर व्यक्ति की राख है जिसने जीवनभर बड़े सुख भोगे, दूध-घी, मेवे-मिष्ठान्न खाए।

फिर दूसरी मुट्ठी की राख दिखाते हुए फकीर ने कहा- यह एक ऐसे गरीब आदमी की राख है जो आजीवन कठोर परिश्रम करके भी रूखी-सूखी ही खा पाया। मैं इस छानबीन में हूं कि अमीर व गरीब की राख में बुनियादी फर्क क्या है, जिससे अमीरों को सम्मान और गरीबों को उपेक्षा मिलती है, पर मुझे तो दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा। साथ ही फकीर ने एक शेर पढ़ा- लाखों मुफलिस हो गए, लाखों तवंगर हो गए। खाक में जब मिल गए, दोनों बराबर हो गए।

सार यह है कि मृत्यु अटल सत्य है और उस वक्त सभी भौतिक वस्तुएं यहीं छूट जाती हैं। अत: अपने जीवनकाल में अमीर-गरीब के मध्य पक्षपातपूर्ण रवैया न अपनाते हुए समान रूप से स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

सावरकर ने निकाली ‘जहां चाह वहां राह’ की युक्ति

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सावरकर जब अंडमान जेल में थे, तब उनके पास न कलम थी और न कागज। उनके सृजनशील मानस में कई विचार उठते किंतु उन्हें लिपिबद्ध कैसे करें? एक दिन ऐसे ही वे एकांत कोठरी में बैठे सोच में डूबे थे कि उन्हें इस समस्या का समाधान सूझ गया।

उन्हीं के शब्दों में ‘कागज-पेंसिल के अभाव में प्रश्न उठा कि मैं टिप्पणियां किस पर लिखूं? मैं इस पहलू पर विचारमग्न था कि मेरी दृष्टि सामने की दीवार पर पड़ी। बंदीगृह की ये सफेद, लंबी-चौड़ी दीवारें ही तो कागज हैं और सन के कांटें लेखनी।’ वीर सावरकर सन के कांटों से दीवार पर लिखते या फिर एक कील अपने पास रखते और उससे अपने विचार उकेरते। कोठरी का दरवाजा बंद होते ही उनका लेखन आरंभ हो जाता।

जेल की एक-एक दीवार, एक-एक ग्रंथ बन गई थी। उन्होंने स्पेंसर की अज्ञेय मीमांसा को युक्तिवाद क्रम से अंकित किया था। कमला महाकाव्य की रचना उन्हीं सात दीवारों पर अंकित हुई थी। एक दीवार पर अर्थशास्त्र की महत्वपूर्ण परिभाषाएं लिखी थीं। अलग-अलग कमरों की दीवारों पर उन्हें अंकित करने का उद्देश्य यह था कि प्रत्येक माह जब बंदी अदला-बदली के अंतर्गत अपना कमरा बदलें तो नई-नई जानकारियां प्राप्त कर लें। इन दीवार ग्रंथों की आयु मात्र एक वर्ष होती थी क्योंकि प्रतिवर्ष जेल की पुताई होती थी। इस अवधि में सावरकर अपनी तमाम अंकित सामग्री को कंठस्थ कर लेते थे।

कथा का सार यह है कि जहां चाह होती है, वहीं राह बन जाती है। साधनों के अभाव का रोना रोने वालों के लिए सावरकर प्रेरणास्पद हैं।

यमराज ने डाकू को साधु की सेवा करने को कहा

मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे। यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा। 

डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें।

यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली। यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा।

यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।

कथा का संदेश यह है कि वही तपस्या प्रतिफलित होती है, जो निरहंकार होकर की जाए। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में ईश उपलब्धि का आधार बनता है।

प्रभु को भी प्रिय है सरलता

सतपुड़ा के वन प्रांत में अनेक प्रकार के वृक्ष में दो वृक्ष सन्निकट थे। एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था। पलाश पर फूल थे। उसकी शोभा से वन भी शोभित था। चंदन का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार सरल तथा पलाश का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार वक्र और कुटिल था, पर थे दोनों पड़ोसी व मित्र। यद्यपि दोनों भिन्न स्वभाव के थे। परंतु दोनों का जन्म एक ही स्थान पर साथ ही हुआ था। अत: दोनों सखा थे।

कुठार लेकर एक बार लकड़हारे वन में घुस आए। चंदन का वृक्ष सहम गया। पलाश उसे भयभीत करते हुए बोला - 'सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है। ज्यादा सीधे व सरल रहने का जमाना नहीं है। टेढ़ी उँगली से घी निकलता है। देखो सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया। मुझसे सब दूर ही रहते हैं।'

चंदन का वृक्ष धीरे से बोला - 'भाई संसार में जन्म लेने वाले सभी का अंतिम समय आता ही है। परंतु दुख है कि तुमसे जाने कब मिलना होगा। अब चलते हैं। मुझे भूलना मत ईश्वर चाहेगा तो पुन: मिलेंगे। मेरे न रहने का दुख मत करना। आशा करता हूँ सभी वृक्षों के साथ तुम भी फलते-फूलते रहोगे।'

लकड़हारों ने आठ-दस प्रहार किए चंदन उनके कुल्हाड़े को सुगंधित करता हुआ सद्‍गति को प्राप्त हुआ। उसकी लकड़ी ऊँचे दाम में बेची गई। भगवान की काष्ठ प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बाँके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी। मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। बड़ा उत्सव होने वाला था।

यज्ञीय समिधा (लकड़ी) की आवश्यकता थी। लकड़हारे उसी वन प्रांत में प्रवेश कर उस पलाश को देखने लगा जो काँप रहा था। यमदूत आ पहुँचे। अपने पड़ोसी चंदन के वृक्ष की अंतिम बातें याद करते हुए पलाश परलोक सिधार गया। उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुँचे।

यज्ञ मण्डप अच्छा सजा था। तोरण द्वार बना था। वेदज्ञ पंडितजन मंत्रोच्चार कर रहे थे। समिधा को पहचान कर काष्ट मूर्ति बन चंदन बोला - 'आओ मित्र! ईश्वर की इच्‍छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया। अपने वन के वृक्षों का कुशल मंगल सुनाओ। मुझे वन की बहुत याद आती है। मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ते हैं और मन में जंगल को याद करता हुआ रहता हूँ।

पलाश बोला - 'देखो, यज्ञ मंडप में यज्ञाग्नि प्रज्जवलित हो चुकी है। लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊँगा। अब नहीं मिल सकेंगे। मुझे भय लग रहा है। ‍अब बिछड़ना ही पड़ेगा।'

चंदन ने कहा - 'भाई मैं सरल व सीधा था मुझे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर‍ दिया तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो। अन्यथा दावानल में जल मरते। सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले तो सरलता, सीधापन मत छोड़ना। सज्जन कठिनता में भी सरलता नहीं छोड़ते जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं। सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एक मात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।'

बाबा तुलसीदास के रामचरितमानस में भगवान ने स्वयं ही कहा है -
निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

अचानक पलाश का मुख एक आध्‍यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।

अंत तक सत्य का साथ नहीं छोड़ा सुकरात ने

सुकरात को जहर दिए जाने के एक दिन पहले उनके मित्र व शिष्य उनसे मिलने पहुंचे। उनके शिष्य क्रेटो ने कहा कि हम आपको यहां से भगाने आए हैं। पर सुकरात किसी कीमत पर भी भागने को तैयार नहीं हुए।

सुकरात को मृत्युदंड दिया जाना था। उन्हें जहर दिए जाने के एक दिन पूर्व उनके कुछ मित्र व शिष्य उनसे मिलने जेल पहुंचे। उनके परम शिष्य क्रेटो ने उनसे कहा- गुरुवर! हमने आपके यहां से भाग निकलने का पूरा प्रबंध कर लिया है। आप तैयार हो जाइए। सुकरात हंसकर बोले- केट्रो! आज तक मैंने तुम्हें सत्य का पाठ पढ़ाया है और आज तुम मेरे शिष्य होकर मुझे असत्य, भय और अनास्था का पाठ पढ़ा रहे हो! क्यों? क्रेटो ने समझाते हुए कहा- यह समय तर्क करने का नहीं है गुरुदेव! अभी प्रश्न सत्य-असत्य का नहीं, प्राणरक्षा का है।

सुकरात ने उसी दृढ़ता से कहा- मेरे प्राणों के मोह में तुम यह भी भूल गए कि सत्य मुझे प्राणों से भी प्यारा है। मुझे मृत्युदंड सुनाया गया है और अब मैं उससे भागकर सत्य से मुंह कैसे मोड़ लूं! क्रेटो ने तर्क दिया-आपको दिया जाने वाला मृत्युदंड भी तो असत्य है। उसका कोई कारण नहीं है। सुकरात ने भी वितर्क किया- तो मृत्युदंड देने वालों के असत्य को काटने के लिए मैं भी सत्य का मार्ग छोड़ दूं? नहीं क्रेटो, मेरे भाग निकलने पर भगवान भले ही मुझे क्षमा कर दें पर इतिहास मुझे क्षमा नहीं करेगा और देश का इतिहास ही मेरा भगवान है।

तुम जाओ। क्रेटो ने बहुत प्रयत्न किया, तर्क दिए, लेकिन सुकरात नहीं माने और अंत में बोले- क्रेटो, तुम पागल हो। मैं सत्य हूं और सत्य कभी मर नहीं सकता। तुम मर जाओगे, लेकिन मैं कभी नहीं मरूंगा। वर्षो बीत गए, लोग सुकरात को जानते हैं किंतु क्रेटो को नहीं के बराबर जानते हैं।

वस्तुत: सत्य को अपने आचरण में जीने वाले लोग धरती पर न सही, किंतु इतिहास में अंत तक जीवित रहते हैं।

नेहरू बिजली का महत्व समझते थे


पंडित नेहरू को कई दशक पहले से ही बिजली के महत्व का अंदाजा हो गया था और यही कारण था कि उन्हें न केवल बिजली बल्कि किसी भी चीज का दुरूपयोग कतई पसंद नहीं था। हर रोज रात में खाना खाने के बाद डायनिंग हाल से निकलते हुए वह कर्मचारियों को बत्तियां बुझाने को कहते थे।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नौ साल तक निजी सुरक्षाकर्मी रहे और दिल्ली पुलिस से बतौर वरिष्ठ सब इंस्पेक्टर सेवानिवृत 80 वर्षीय बलबीर सिंह ने पंडित जी के साथ बिताए दिनों की याद ताजा करते हुए यह जानकारी दी।

बलबीर सिंह ने बातचीत में अपने संस्मरणों को इस प्रकार बांटा 'पंडित जी कार्यालय से लौटने के बाद तीन मूर्ति स्थित आवास के अपने कार्यालय में रात दो बजे तक काम करते थे और बिना मतलब लाइट जलाना या पंखा चलाना उन्हें सख्त नापसंद था।' उन्होंने एक रोचक किस्सा सुनाया 'एक बार विजयलक्ष्मी पंडित और पद्मजा नायडू के साथ वह तीन मूर्ति के बगीचे में टहल रहे थे। मैं उनके पीछे था। एक पेड़ को लेकर तीनों में बहस हो गई। पंडित जी ने कहा, आम का पेड़ है। पद्मजा नायडू ने कहा कि आम का नहीं है, आखिर में वह बोले कि मेरे आदमी बता देंगे कि यह किस चीज का पेड़ है।

बलबीर सिंह बोले 'इस बहस में मुझे अंदाजा हो गया था कि पेड़ के बारे में मुझसे पूछा जा सकता है और यही हुआ भी। जब उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि यह आम का पेड़ नहीं है क्योंकि आम के पेड़ की शाख पर नीचे तक पत्ते नहीं होते। इसकी नमेड़ [छोटा फल] देखने से पता चलता है कि यह लीची का पेड़ है। पंडित जी इस पर बहुत हंसे।

26 जनवरी के संबंध में उन्होंने बताया कि हर बार गणतंत्र दिवस परेड समारोह के बाद पंडित जी तीन मूर्ति निवास पर एनसीसी कैडेटों से मिलते थे और टोपी पहन कर उनके साथ नाचते थे। बलबीर सिंह 15 अगस्त का एक वाक्या सुनाया कि पंडित जी लालकिले की प्राचीर से भाषण दे रहे थे कि उसी समय बारिश शुरू हो गई। अपने शीर्ष अधिकारियों के आदेश पर वह छतरी लेकर पंडित जी के पास खड़े हो गए। पंडित जी ने अपना भाषण बीच में ही रोक कर धीरे से कहा 'इतने लोग बैठे हैं, इनके ऊपर भी छतरी क्यों नहीं लगा देते।' उनका इतना कहना ही डांटने के बराबर था लेकिन इससे यह पता चलता है कि आम आदमी के प्रति उनके दिल में कितनी मुहब्बत थी।

एक बार बलबीर सिंह का तबादला हौजकाजी पुलिस स्टेशन में हो गया। वह जाने से पहले पंडित जी से मिलने आए और उन्हें उनका प्रिय गुलाब का फूल भेंटकर अभिवादन करते हुए इसकी जानकारी दी। उस दिन पंडित जी लंदन यात्रा पर जाने से पहले जनता से मिलने बाहर आए थे।

इस पर नेहरूजी ने छूटते ही कहा 'यहां अच्छा नहीं है क्या।' इसके बाद पता नहीं क्या हुआ कि बलबीर सिंह का तबादला रद्द हो गया और उन्होंने पंडित जी के साथ नौ साल बिताए उनके निधन के बाद ही बलबीर सिंह की भी तीन मूर्ति से विदाई हो गई।

1964 में पंडित जी के निधन के बाद सुरक्षा अधिकारियों ने बलबीर सिंह को भी अंतिम समय का ब्यौरा देने को कहा था जिस पर उन्होंने करीब पांच छह पन्नों में अपनी बात लिखकर अधिकारियों को सौंपी थी।

'पुरुष बली नहि होता है, समय होत बलवान'


जीवन में समय का महत्व स्थान होता है. बीता समय कभी लौट कर नहीं आता. अतः मनुष्य को चाहिए कि जो समय उसे मिलता है उसका सदुपयोग करे. समय ही सबसे बडा बलवान है.

'पुरुष बली नहि होता है, समय होत बलवान'

जो व्यक्ति समय का सदुपयोग नही करता उसका जीवन नष्ट हो जाता है. मानव की उन्नति में समय सहयोग महत्वपूर्ण होता है. अपने लक्ष्य की प्राप्ती के लिए मनुष्य को समय के महत्व को जानकर उसका सदुपयोग करना चाहिए. समय अपनी गति से बड़ता जाता है. वह किसी के लिए रुकता नही. उसे रोकने की शक्ति भी किसी में नही है. वास्तव में समयानुसार आवश्यक तथा उचित कार्यों को संपन्न करना ही समय का सदुपयोग है.

विद्यार्थी जीवन में ही मनुष्य अपने भावी जीवन की तैयारी करता है. मानसिक तथा शारीरिक पुष्टता से अपने को सक्षम बनाता है. जो व्यक्ति इस काल का सदुपयोग न करके अन्य कार्यों में व्यस्त होता है वह अपने गृहस्थ जीवन में असफल हो जाता है. उसका भावी जीवन कठिनाइयों का शिकार हो जाता है. वह शारीरिक दृष्टि से कमजोर पड़ जाता है. जो व्यक्ति इस काल में समय का सदुपयोग करता है, उसका भावी जीवन संटक हीन बनाता है. वह उन्नति के मार्ग पर निरंतर बड़ते जाता है. विजय उसके चरण चूमने लगती है.

समय के सदुपयोग से कई लाभ है. जीवन उन्नत मार्ग पर अग्रसर होता है. जीवन में उन्नति की कुंजी समय का सदुपयोग ही है. वे ही लोग जीवन में सफल बनते है जो समय का ठीक उपयोग करते है. इनके जीवन में समन्वय होता है. उनका पारिवारिक जीवन सुख-शान्ति से विकसित होता है. उन्हें जीवन में शान्ति मिलती है. समाज में उनका आदर होता है. जो व्यक्ति विद्यार्थी जीवन में पढाई-लिखाई में मन नही लगाता, यौवन में धन न कमाता, वह बुदापे में कर ही क्या सकता है? 

समय के सदुपयोग न करने से मन चंचल हो जाता है. ऐसा व्यक्ति कोई भी काम ठीक प्रकार नही कर सकता. उससे सफलता दूर भागेगी. ऐसा व्यक्ति बर्बर और उद्दंड होगा. उसमे उचित कार्य क्षमता की भावना का अभाव होता है. वह न ज्ञानार्जन कर सकेगा न धनार्जन. वह केवल अशांति का शिकारी बनकर रह जाएगा. उसका जीवन अभावों से भरा रहता है. वह निंदा का पात्र बनेगा और जीवन के अंतिम क्षणों में उसे पछ्लता पडेगा, पछताने से भी उसके हाथ कुछ नही आयेगा. मनुष्य को चाहिए कि वह अपने समय का सदुपयोग करके जीवन को मार्ग पर ले चले. वह अपने भावी जीवन को भी सुखमय बनावे.

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

सफलता के मंत्र


किसी कार्य मे असफल होने पर भाग्य को दोषी न मानकर पूरा शक्ति व निष्ठा के साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति मे जुट जाइये। अपनी आंख अर्जुन   की भांति सिर्फ अपने लक्ष्य की ओर केन्द्रित रखिये।

सफलता प्राप्त करने के लिए एकाकीपन, भय, संकोच, भावुकता तथा हीनभावना जैसे अवगुणो को अपने पास फटकने भी ना दे। 
अपनी लगन , इच्छा व परिश्रम पर निराशा व आलस्य की छाया ना पडने दे। सफलता पाने के लिये समय का महत्व समझे । उसका एक.एक पल उपयोग मे लाये।

हर इंसान के जीवन मे एक बार सुअवसर दस्तक देता है उस क्षण को पहचान कर पकडने का प्रयत्न करे।  यदि एक बार सफल न हो पाए तो पछताकर या रो कर समय बर्बाद न करे। नये अवसर आपकी राह मे रहेगे। बस आपकी मेहनत, लगन व एकाग्रता आवश्यक होगी।

अपना लक्ष्य निर्धारित करके ही उस सफलता की ओर बढे । ऐसा न हो कि आपकी नीति के ढुल-मुल हो जाने से असफलता ही हाथ लगे।

एक से अधिक लक्ष्य होने पर उनको प्राथमिकता के अनुसार निश्चित करे और निष्ठा व लग्न पूर्वक हर लक्ष्य की ओर बढे ताकि सफलता मिले।

कुछ पाने के लिये कुछ खोना पडता है। वह भी किसी सीमा तक ही, जैसे एक गुहणी जब लेखिका बनती है तो उसे अपनी नींद और गप्पबाजी को त्यागना पडता है। नींद, आलस्य को त्यागकर ही अपने लक्ष्य की ओर कदम बढाये।

जीवन मे हर काम सोच समझकर अपनी शक्ति अनुसार और योग्यता के अनुसार चुने और उसे पूर्ण कर के ही दम ले। चाहे वह कितना ही मुश्किल क्यो न हो।

लक्ष्य निर्धारण मे दिग्भ्रमित न हो, जीवन मे सफलता तभी मिलती है जब कार्य योजना बद्ध तरीके से हो।

बहाने बाजी या टालते रहने की प्रवृति मनुष्य को अकर्मण्य बना देती है।समस्या का समाधान करे। घबराये नही। असफलता ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। निरंतर प्रयास करते रहे।

सदैव सकारात्मक विचार अपनाये, आशावादी बने, क्योकि निराशावादी विचारधारा ही व्यक्ति को कुंठित कर असफलता का ओर धकेलती जाती है।

मनोवैज्ञानिक ने सिद्ध किया है कि अपनी किसी भी प्रिय हॉबी को निखारकर सफलता प्राप्त करने के साथ साथ जीवन की उबकाई , नीरसता व असंतुष्टि से बचा जा सकता है।

मूड नही बना है , इस बीमारी से बचे अच्छा समय मूड के कारण रूकता नही है। इस प्रकार अच्छा अवसर हाथ से निकल जाता है और पीछे रह जाता है केवल पछतावा।

अपनी सफलता को भाग्य, भ्रष्टाचार व धन की कमी जैसे कुंठित विचार लाकर अवसर को मत टालिये जुट जाये सफलता पाने की चेष्टा मे। इस प्रकार आप आत्मसम्मान से इस समाज मे जी सकते है। 

जुट जाइये सपूंर्ण शक्ति के साथ और पहनाये अपनी मेहनत को सफलता का जामा।

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