रविवार, 5 अक्टूबर 2008

भावना

रामानुजाचार्य को उसके गुरु ने कई विद्या सिखाईं। ज्ञानदीक्षा सम्पन्न करते हुए उनके आचार्य ने कहा, ``रामानुज नीच जाति के लोगों को यह ज्ञान मत देना।´´ इस पर रामानुज बोले, ``गुरुदेव ! जिसका गिरे हुओं को उठाने में उपयोग न हो, वह क्षिक्षा मुझे नहीं चाहिए।`` शिष्य की विशाल भावना देखते हुए आचार्य ने स्वेच्छा से उसके उपयोग करने की स्वीकृति दे दी।


सोमवार, 29 सितंबर 2008

ध्या‍न और सेवा

एक बार ज्ञानेश्‍वर महाराज सुब‍‍ह-सुबह‍ नदी तट पर टहलने निकले। उनहोनें देखा कि एक लड़का नदी में गोते खा रहा है। नजदीक ही, एक सन्‍यासी ऑखें मूँदे बैठा था। ज्ञानेश्वर महाराज तुरंत नदी में कूदे, डूबते लड़के को बाहर निकाला और फिर सन्‍यासी को पुकारा। संन्‍यासी ने आँखें खोलीं तो ज्ञानेश्वर जी बोले- क्‍या आपका ध्‍यान लगता है ? संन्‍यासी ने उत्तर दिया- ध्‍यान तो नही लगता, मन इधर-उधर भागता है। ज्ञानेश्वर जी ने फिर पूछा लड़का डूब रहा था, क्‍या आपको दिखाई नही दिया ? उत्‍तर मिला- देखा तो था लेकिन मैं ध्‍यान कर रहा था। ज्ञानेश्वर समझाया- आप ध्‍यान में कैसे सफल हो सकते है ? प्रभु ने आपको किसी का सेवा करने का मौका दिया था, और यही आपका कर्तव्‍य भी था। यदि आप पालन करते तो ध्‍यान में भी मन लगता। प्रभु की सृष्टि, प्रभु का बगीचा बिगड़ रहा है1 बगीचे का आनन्‍द लेना है, तो बगीचे का संवारना सीखे।

यदि आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है और आप पूजा पाठ करने में मस्‍त है, तो यह मत सोचिये कि आपके द्वारा शुभ कार्य हो रहा है क्‍योकि भूखा व्‍यक्ति उसी की छवि है, जिसे पूजा-पाठ करके आप प्रसन्‍न करना या रिझाना चाहते है। क्‍या वह सर्व व्‍यापक नही है ? ईश्‍वर द्वारा सृजित किसी भी जीव व संरचना की उपेक्षा करके प्रभु भजन करने से प्रभु कभी प्रसन्‍न नही होगें।

जैसी दृष्टि

रामदास रामायण लिखते जाते और शिष्यों को सुनाते जाते थे | हनुमान जी भी उसे गुप्त रुप से सुनने के लिये आकर बैठते थे | समर्थरामदास ने लिखा, “हनुमान अशोक वन में गये, वहाँ उन्होंनें सफेद फूल देखे |”

यह सुनते ही हनुमान जी झट से प्रकट हो गये और बोले, “मैंने सफेद फूल नहीं देखे थे | तुमने गलत लिखा है, उसे सुधार दो|”

समर्थ ने कहा, “मैंने ठीक ही लिखा है| तुमने सफेद फूल ही देखे थे|”

हनुमान ने कहा, “कैसी बात करते हो! मैं स्वयं वहाँ गया और मैं ही झूठा!”

अन्त में झगडा श्री रामचंद्र्जी के पास पहुँचा| उन्होंने कहा की, “फूल तो सफेद ही थे, परन्तु हनुमान की आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं, इसलिए वे उन्हें लाल दिखाई दिये|” 

इस मधुर कथा का आशय यही है कि संसार की ओर देखने की जैसी हमारी दृष्टि होगी, संसार हमें वैसा ही दिखाई देगा|

सोमवार, 22 सितंबर 2008

शक्तिशाली कौन

एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी। उसने पूछा, ‘इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।’ शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, ‘नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है। 

लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।’ इस पर शिष्य बोला, ‘तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?’ बुद्ध मुस्कराए और बोले, ‘नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।’ उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, ‘मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।’

‘ नहीं।’ बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, ‘जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।’ शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है। शिष्य ने फिर सवाल किया, ‘आखिर जल पर किसका शासन है?’ बुद्ध ने उत्तर दिया, वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है। शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, ‘अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं, वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है। 

सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।’ यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

कर्म की महानता

एक बार बुद्ध एक गांव में अपने किसान भक्त के यहां गए। शाम को किसान ने उनके प्रवचन का आयोजन किया। बुद्ध का प्रवचन सुनने के लिए गांव के सभी लोग उपस्थित थे, लेकिन वह भक्त ही कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव के लोगों में कानाफूसी होने लगी कि कैसा भक्त है कि प्रवचन का आयोजन करके स्वयं गायब हो गया। प्रवचन खत्म होने के बाद सब लोग घर चले गए। रात में किसान घर लौटा। बुद्ध ने पूछा, कहां चले गए थे ? गांव के सभी लोग तुम्हें पूछ रहे थे।

किसान ने कहा, दरअसल प्रवचन की सारी व्यवस्था हो गई थी, पर तभी अचानक मेरा बैल बीमार हो गया। पहले तो मैंने घरेलू उपचार करके उसे ठीक करने की कोशिश की, लेकिन जब उसकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी तो मुझे उसे लेकर पशु चिकित्सक के पास जाना पड़ा। अगर नहीं ले जाता तो वह नहीं बचता। आपका प्रवचन तो मैं बाद में भी सुन लूंगा। अगले दिन सुबह जब गांव वाले पुन: बुद्ध के पास आए तो उन्होंने किसान की शिकायत करते हुए कहा, यह तो आपका भक्त होने का दिखावा करता है। प्रवचन का आयोजन कर स्वयं ही गायब हो जाता है।

बुद्ध ने उन्हें पूरी घटना सुनाई और फिर समझाया, उसने प्रवचन सुनने की जगह कर्म को महत्व देकर यह सिद्ध कर दिया कि मेरी शिक्षा को उसने बिल्कुल ठीक ढंग से समझा है। उसे अब मेरे प्रवचन की आवश्यकता नहीं है। मैं यही तो समझाता हूं कि अपने विवेक और बुद्धि से सोचो कि कौन सा काम पहले किया जाना जरूरी है। यदि किसान बीमार बैल को छोड़ कर मेरा प्रवचन सुनने को प्राथमिकता देता तो दवा के बगैर बैल के प्राण निकल जाते। उसके बाद तो मेरा प्रवचन देना ही व्यर्थ हो जाता। मेरे प्रवचन का सार यही है कि सब कुछ त्यागकर प्राणी मात्र की रक्षा करो। इस घटना के माध्यम से गांव वालों ने भी उनके प्रवचन का भाव समझ लिया।


रविवार, 21 सितंबर 2008

अहम्

राजा जनश्रुति को चिडिया की भाषा समझने की सामर्थ्य प्राप्त थी। हंसों की जोड़ी बात कर रही थी की जनश्रुति से तो बड़े मुनि रैक्य हैं, जो सदा परमार्थ में लगे रहते है। गाडीवान रैक्य के बड़ा होने की बात से उन्हें बड़ा कष्ट हुआ। दूसरे दिन उन्होंने उस गाडीवान की खोज कराई और बहुत-सा धन, अश्व और आभूषण लेकर मुनि रैक्य के पास गए और बोले- "आपकी कीर्ति सुनकर यहाँ आए हैं, हमें ब्रह्म विद्या का उपदेश दीजिये। "रैक्य मुनि ने उत्तर दिया- "राजन ! ब्रह्म-विद्या सीखनी है, तो अपना अन्तरंग पवित्र बनाओ। अंहकार को मिटाकर, श्रद्धा-विश्वास तथा नम्रता को धारण कर ही तुम सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त कर सकोगे।" जनश्रुति को अपनी भूल ज्ञात हुई और वे सिद्धि-संपादन का अहम् त्यागकर अन्दर से स्वयं को महान बनने में लग गए।

धर्मात्मा का बल

मरते समय बालि अंगद को भगवान् राम को सौंप गए थे। अंगद राम की सेना के वरिष्ठ सेनापतियों में से थे। उन्होंने रावण की सभा में अपने बल का प्रदर्शन करके रावण को भी चुनौती दी। छोटे से धर्मात्मा का बल अनीतिवान राज्याध्यक्ष से भी बड़ा होता हैं। वानर स्वल्प शक्तिवान थे, तो भी उन्होंने अधर्म का प्रतिरोध करने में अपना सर्वस्व झोंक दिया और मारे जाने की तनिक भी परवाह नहीं की। ऐसे शूरवीर धर्मात्मा का जीवन संसार में धन्य माना जाता हैं।

संगति

अजामिल अपनी दुष्टता एवं दुराचार के लिए विख्यात हुआ, पर आरंभ में वह एक सदाचारी ब्राह्मण था। किसी कारणवश विदेश गया तो वह कुलटा स्त्रियों और दुरात्मा लोगों की संगति में पड़ गया। कुसंग बड़े बड़ो का पतन कर देता हैं। बुरों का सुधरना कठिन हैं, पर अच्छों का बिगड़ जाना सरल हैं। कुसंग से अजामिल इतना पतित हुआ कि कसाई तक का काम करने लगा। कथा है कि वह पीछे सत्संग से सुधरा और भगवद्भक्त बना। कुसंग-सत्संग का मनुष्य पर भारी प्रभाव पड़ता है। इसलिऐ कुसंग से बचने और सत्संग खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।

शनिवार, 20 सितंबर 2008

धर्म

श्रावस्ती नरेश चन्द्रचूड़ को विभिन्न धर्मो और उनके प्रवक्ताओ से बड़ा लगाव था। राज-काज से बचा हुआ समय वे उन्हे ही पढ़ने और सुनने में लगाते थे। यह क्रम चलते बहुत दिन बीते थे कि राजा असमंजस में पड़ गये, जब धर्म शाश्वत हैं तो उनके बीच मतभेद और विग्रह क्यो ?

समाधान के लिए वे भगवान बुद्ध के पास गये और अपना असमंजस कह सुनाया। बुद्ध हंसें उन्हे सत्कारपूर्वक ठहराया और दूसरे दिन प्रात:काल उनके समाधान का वचन दिया।

दिनभर के प्रयास से एक हाथी और पॉँच जन्मांध जुटा लिये गये। प्रात:काल तथागत सम्राट को लेकर उस स्थान पर पहुँचें। किसी जन्मांध का इससे पूर्व कभी हाथी से संपर्क नहीं हुआ था। उनसे कहा गया कि वह सामने खड़ा है, उसे छुओ और उसका स्वरुप बतलाओ। अंधें ने उसे टटोला और जितना जिसने स्पष्ट किया, उसी अनुरुप उसे खंभे जैसा, रस्सी जैसा, सूप जैसा, टीले जैसा आदि बताया।

तथागत ने कहा, ‘‘राजन् ! संप्रदाय अपनी सीमित क्षमता के अनुरुप ही धर्म की एकांगी व्याख्या करते है। और अपनी मान्यता के प्रति हठी होकर झगड़ने लगते है।

जिस प्रकार हाथी एक है और उसका अंधविवेचन भिन्नतायुक्त। धर्म तो समता, सहिष्णुता, एकता, उदारता और सज्जनता में है। यही हाथी का समग्र रुप है। व्याख्या कोई कुछ भी करता रहे।’’

उपदेश की योग्यता

साधु आत्मानंद की कुटिया गाँव के पास ही थी। प्राय: प्रतिदिन सायंकाल ग्रामीण लोग उनके पास जाते और धर्म-चर्चा का लाभ प्राप्त करते। जब संध्या भजन का समय आता, गाँव के दो नटखट लड़के जा धमकते और कहते, महात्मन् ! आपसे ज्ञान प्राप्त करने आये है, फिर शुरु करते गप्पें। बीच-बीच में साधु को चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने वाली बातें भी करते जाते। उनका तो मनोरंजन होता, पर आत्मानंद का भजन-पूजन का समय निकल जाता। यह कर्म महीनों चलता रहा, पर साधु एक दिन भी गुस्सा नहीं हुए। बालकों के साथ बात करते हुए आप भी हँसते रहते।

बहुत दिन बाद भी जब वे नटखट लड़के उन्हें क्रुद्ध न कर सके, तो उन्हें अपने आप पर क्षोभ हुआ, उन्होंने क्षमा मांगते हुए पूछा, ‘‘महात्मन् ! हमने जान-बूझकर आपको चिढ़ाने का प्रयत्न किया, फिर भी आप न कभी खीझे, न क्रुद्ध हुए।’’ आत्मानंद ने हँसते हुए कहा, वत्स ! यदि मैं ही क्रुद्ध हो जाता, तो आप सबको सिखा क्या पाता ?

मौसेरा भाई

राजा के दरबार में एक वृद्ध पहुँचा और बोला, ‘‘भगवन् ! मैं आपका मौसेरा भाई हूँ । कभी आपकी तरह मैं भी था। ३२ नौकर थे, एक-एक करके चले गये। दो मित्र थे, वे भी साथ चलने से कतराने लगे। दो भाई है, सो बडी मुश्किल से थोडा-बहुत काम करते है। पत्नी भी उल्टे-सीधे जवाब देती है। मेरी मुसीबत देखते हुए यदि आप कुछ सहायता कर सकें तो कर दे।’’

राजा ने उसका आदर किया और रुपयों की एक थैली थमा दी। सभासदों ने साश्चर्य कहा, ‘‘ यह दरिद्री आपका मौसेरा भाई कैसे हो सकता है !’’

राजा ने कहा, ‘‘इसने मुझे मेरे कर्तव्यों का ज्ञान कराया है। इसके मुंह में मेरी ही तरह ३२ दांत थे, सो भी उखड गये। दो पैर मित्र थे, सो डगमगा गये। दो भाई हाथ है, जो अशक्त होने के कारण थोडा-बहुत ही काम करते है। बुद्धि इसकी पत्नी थी, सो वह भी अब सठिया गयी है, कुछ-का-कुछ जवाब देती है। मेरी माँ अमीरी और उसकी गरीबी है। ये दोनो बहने हैं, इसलिए हम दोनो मौसेरे भाई है। वृद्ध का कहना गलत नहीं है।’’

इन संकेतो ने राजा ने स्वयं के लिए एक संदेश पाया और अपना शेष समय सत्कार्यो में, प्रजाजनो के कल्याण हेतु नियोजित करने का संकल्प लिया।

गुरुवार, 18 सितंबर 2008

भामाशाह

मेवाड़ की रक्षा के लिये महाराणा प्रताप अंतिम प्रयत्न करते हुए निराश हो गए। महाराणा प्रताप ने दो-चार हजार सैनिकों को लेकर बड़ी बादशाही सेनाओं का मुंह मोड़ दिया। मुगल सल्तनत के साधन बहुत अधिक थें। अंत में ऐसा समय आया, जब प्रताप को अपने साथियों के लिए सूखी रोटी मिलना भी असंभव हो गया। अत: उन्होंने मेवाड़ छोड़कर सिंध की तरफ जाने का निश्चय किया। प्रताप देश त्याग कर अरावली पर्वत को पार कर जाने लगे, तो किसी ने पीछे से पुकारा- ओ मेवाड़पति ! राजपूती वीरता की शान दिखाने वाले ! हिन्दू धर्म के रक्षक ! ठहर जाओ। आगंतुक राज्य के पुराने मंत्री भामाशाह आँखों में आंसू लिए बोले- स्वामी, आप कहाँ जा रहे हैं ? एक बार आप फिर अपने घोड़े की बाग मेंवाड़ की तरफ मोड़िये और नए सिरे से तैयारी करके मातृभूमि का उद्धार करिए। आपके पूर्वजों की दी हुई पर्याप्त संपत्ति में आपके चरणों में भेंट करता हूँ. भामाशाह के भंडार में इतना धन था कि पच्चीस हजार की सेना का बारह वर्ष तक खर्चा चल सकता था। भामाशाह ने अपना सुख ठुकरा दिया और सारे देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना सब कुछ दान कर दिया।

कृतघ्नता

एक शिकारी हिरन का पीछा करता हुआ आ रहा था। जान बचाने के लिए हिरन अंगूर की लताओं में छिप गया। शिकारी को गया जानकर उसने अंगूर की सारी बेल चर ली, इस पर शिकारी ने उसे देख लिया और मार दिया। मरते समय हिरन कह रहा था कि जो आश्रय देने वाले के साथ कृतघ्नता करता है, उसकी मेरी जैसी ही दशा होती हैं। 

स्वार्थपरता

एक बालक की मृत्यु हो गई । अभिभावक उसे नदी तट वाले श्मशान में ले पहुंचे । वर्षा हो रही थी। विचार चल रहा था कि इस स्थिति में संस्कार कैसे किया जाए।

उनकी पारस्परिक वार्ता में निकट उपस्थित प्राणियों ने हस्तक्षेप किया और बिना पूछे ही अपनी-अपनी सम्मति भी बता दी।

सियार ने कहा, ‘‘ भूमि में दबा देने का बहुत महात्म्य है। धरती माता की गोद में समर्पित करना श्रेष्ठ हैं। ’’कछुये ने कहा, ‘‘गंगा से बढ़कर और कोई तरण-तारणी नहीं। आप लोग शव को प्रवाहित क्यों नहीं कर देते ?’’ गिद्ध की सम्मति थी, ‘‘सूर्य और पवन के सम्मुख उसे खुला छोड़ देना उत्तम है। पानी और मिट्टी में अपने स्नेही की काया को क्यो सड़ाया-गलाया जाए ?’’

अभिभावको को समझते देर न लगी कि तीनों के कथन परामर्श जैसे दीखते हुए भी कितनी स्वार्थपरता से सने हुए है। उनने तीनों परामर्शदाताओं को धन्यवाद देकर विदा कर दिया। बादल खुलते ही चिता में अग्नि संस्कार किया।

मनोबल

महाभारत युद्ध में प्रधान सेनापति कर्ण था। उसे हराना असम्भव ठहराया गया था। चतुरता से उसके बल का अपहरण किया गया। कर्ण का सारथी शल्य था। श्री कृष्ण के साथ तालमेल बिठाकर उसने एक योजना स्वीकार कर ली। जब कर्ण जीतने को होता तब शल्य चुपके से दो बाते कह देता, यह कि-तुम सूत पुत्र हो। द्रोणाचार्य ने विजयदायिनी विद्या राजकुमारो को सिखाई है। तुम राजकुमार कहाँ हो जो विजय प्राप्त कर सको। जीत के समय भी शल्य हार की आशंका बताता । इस प्रकार उसका मनोबल तोडता रहता। मनोबल टूटने पर वह जीती बाजी हार जाता। अन्तत: विजय के सारे सुयोग उस के हाथ से निकलते गये और पराजय का मुहँ देखने का परिणाम भी सामने आ खडा हुआ।

परिवारिक सहयोग-सहकार

ऋषि अंगिरा के शिष्य उदयन बड़े प्रतिभाशाली थे, पर अपनी प्रतिभा के स्वतंत्र प्रदर्शन की उमंग उनमें रहती थी। साथी-सहयोगियो से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास यदा-कदा किया करते थे। ऋषि ने सोचा, यह वृति इसे ले डूबेगी, समय रहते समझाना होगा।

सरदी का दिन था। बीच में रखी अंगीठी में कोयले दहक रहे थे। सत्संग चल रहा था। ऋषि बोले, कैसी सुन्दर अंगीठी दहक रही हैं। इसका श्रेय इसमें दहक रहे कोयलों को है न ? सभी ने स्वीकार किया।

ऋषि पुन: बोले, देखो अमुक कोयला सबसे बड़ा, सबसे तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो। ऐसे तेजस्वी का लाभ अधिक निकट से लूँगा।

चिमटे से पकड़कर वह बड़ा तेजस्वी अंगार ऋषि के समीप रख दिया, पर यह क्या , अंगार मुरझा-सा गया। उस पर राख की परतें आ गई और वह तेजस्वी अंगार काला कोयला भर रह गया।

ऋषि बोले, बच्चो, देखो तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, पर इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अंगीठी में सबके साथ रहता तो अन्त तक तेजस्वी रहता और सबके बाद तक गरमी देता, पर अब न इसका श्रेय रहा और न इसकी प्रतिभा का लाभ हम उठा सके।

शिष्यों को समझाया गया, परिवार वह अंगीठी है , जिसमें प्रतिभाएँ संयुक्त रुप से तपती है। व्यक्तगित प्रतिभा का अहंकार न टिकता है, न फलित होता है। परिवार के सहकार-सहयोग में वास्तविक बल है।

बचत

मधुमक्खी और तितली एक ही पेड़ पर रहती थीं। अक्सर वाटिका में फूलों के पास भी मिल जातीं। एक-दूसरे की कुशल पूछतीं और अपने काम पर लग जाती।

बरसात आ गई। लगातार झड़ी लगी थी। तितली उदास बैठी थी। मधुमक्खी ने पूछा, बहन क्या बात है ? ऐसे सुन्दर मौसम में उदासी कैसी ?

तितली बोली, मौसम की सुन्दरता से पेट की भूख अधिक प्रभावित कर रही है। कहीं भोजन लेने जा नहीं सकती, इसीलिए परेशान हूँ ।

मधुमक्खी बोली, बहन, ऐसे समय के लिए कुछ बचत क्यों नहीं की ? कल की बात न सोचने वाले यों ही परेशान होते है। ऐसा समझाकर मधुमक्खी ने अपने संचित कोष में से तितली की भी भूख शांत की।

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

धन लक्ष्मी और सौभाग्य लक्ष्मी

धन लक्ष्मी वहीं विराजती हैं, जहाँ दुरुपयोग न होता हो, जहाँ सदैव पुरुषार्थ में निरत रहने वाले व्यक्ति बसते हो।

बलि अपने समय के धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में सतयुग विराजता था। सौभाग्य लक्ष्मी बहुत समय तो उस क्षेत्र में रहीं, पर पीछे अनमनी होकर किसी अन्य लोक को चली गई । इन्द्र को असमंजस हुआ और इस स्थान-परिवर्तन का कारण पूछ ही बैठे। 

सौभाग्य लक्ष्मी ने कहा, मैं उद्योगलक्ष्मी से भिन्न हूँ। मात्र पराक्रमियों के यहाँ ही उसकी तरह नहीं रहती। मेरे निवास में चार आधार अपेक्षित होते है।- 
१- परिश्रम में रस, 
२- दूरदर्शी निर्धारण,
३- धैर्य और साहस तथा 
४- उदार सहकार।

बलि के राज्य में जब तक ये चारों आधार बने रहे, तब तक वहां रहने में मुझे प्रसन्नता थी। पर अब, जब सुसंपन्नों द्वारा उन गुणों की उपेक्षा होने लगी तो मेरे लिए अन्यत्र चले जाने के अतिरिक्त और कोई चारा न था।

महात्मा बनने के गुण

गाँधीजी के आश्रम में सफाई और व्यवस्था के कार्य हर व्यक्ति को अनिवार्य रुप से करने पड़ते थे। एक समाज को समर्पित श्रद्धावान बालक उनके आश्रम में आकर रहा। स्वच्छता- व्यवस्था के काम उसे भी दिए गए। उन्हें वह निष्ठापूर्वक करता भी रहा। जो बतलाया गया, उसे जीवन का अंग बना लिया।

जब आश्रम निवास की अवधि पूरी हुई तो गाँधी जी से भेंट की और कहा, ‘‘ बापू, मैं महात्मा बनने के गुण सीखने आया था, पर यहाँ तो सफाई व्यवस्था के सामान्य कार्य ही करने को मिले। महात्मा बनने के सूत्र न तो बतलाए गए, न उनका अभ्यास कराया गया।’’

बापू ने सिर पर हाथ फेरा, समझाया, कहा, ‘‘बेटे, तुम्हें यहाँ जो संस्कार मिले हैं, वे सब महात्मा बनने के सोपान है। जिस तन्मयता से सफाई तथा छोटी-छोटी बातों में व्यवस्था-बुद्धि का विकास कराया गया, वही बुद्धि मनुष्य को महामानव बनाती है।’’

गाँधी जी ने इसी प्रकार छोटे-छोटे सदगुणों के महात्म्य समझाते हुऐ अनेक लोकसेवियों के जीवनक्रम को ढाला, उन्हें सच्चे निरहंकारी स्वयंसेवक के रूप में विकसित किया।

हिम्मता मर्दे मददे खुदा

एक टिटहरी अपनी चोंच में मिट्टी भरती और समुद्र में डाल आती। उसका यह अनवरत श्रम देखकर महर्षि अगस्त्य को आश्चर्य हुआ। उन्होंने उससे इसका कारण पूछा, तो वह बोली-महाराज ! समुद्र मेरे अण्डों को बहा ले गया है। उसको सुखाने के लिए समुद्र में रेत डाल रही हूं। महर्षि अगस्त्य उस छोटे से पक्षी के प्रयत्न और साहस पर प्रसन्न होकर उसकी सहायता के लिए तत्पर हो गए । उन्होंने सारे समुद्र को अंजलि में भरकर पी लिया और टिटहरी को अपने अण्डे वापस मिल गए। 
ठीक ही कहा गया है कि साहसी की सहायता दूसरे लोग भी करते हैं।
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