बुधवार, 20 जुलाई 2011

आपका विवाह हम भगवान् से कराना चाहते हैं


आपका विवाह हम भगवान् से कराना चाहते हैं

(जनवरी १९६९ में गायत्री तपोभूमि में दिया गया प्रवचन)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ-
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

भगवान् की हताशा

देवियो, भाइयो! आपने केवल अपने बेटे के लिए कमाया है, भले ही वह दो कौड़ी का हो। आपने केवल उसी के लिए जीना सीखा है। मित्रो, हमारा जीवन किस काम के लिए खर्च हो गया ? केवल मुट्ठी भर पत्थरों के लिए! हमने कभी भी सोचा नहीं कि हमें किस प्रकार जीना चाहिए। तो गुरुजी हमारी कमाई का क्या होगा? आपकी कमाई बेटे को मिलने वाली है, साले को मिलने वाली है, जमाई को मिलने वाली है। आपने अपनी बीबी को तबाह कर डाला। अरे आप चाहते, तो उसको ऊँचा उठा सकते थे। भगवान् ने आपको मनुष्य का शरीर दिया था। जिस दिन उसने आपको बनाया था, उसके लम्बे-लम्बे ख्वाब थे, उम्मीदें थीं। आपने सब पर पानी फेर दिया।
मित्रो! भगवान् बहुत ज्यादा थक गया है। उसकी इच्छा है कि हमारे प्रिय बेटे मनुष्य, यदि इस दुनिया को सुन्दर बनाते, तो मजा आ जाता। भगवान् को सहभागी और सहयोगी की आवश्यकता थी। इसलिए भगवान् ने आपको बनाया था। उसने आपको अपने नक्शे के अनुसार बड़ी मेहनत से बनाया था। भगवान् के पास गीली मिट्टी थी। उसने कुम्हार के तरीके से उस मिट्टी को इस प्रकार लम्बा कर दिया कि साँप बन गया। गोल-मटोल कर दिया तो कछुआ बन गया, मेढक बन गये। परन्तु जिस दिन भगवान् ने आपको बनाया, तो उन्हें पसीना आ गया। उनका बहुत सारा समय बीत गया। इसके पीछे इस दुनिया को सुन्दर बनाने का उनका उद्देश्य था। एक-एक कण शरीर का, जिसमें मस्तिष्क, हृदय, आँखें आदि सभी अंग बने। आज तक ऐसी बेमिसाल चीज दुनिया में नहीं बनी है, जैसा कि मनुष्य का शरीर है। जब हम हिमालय गये, तो नन्दन वन का फोटो खींचकर लाये। लम्बाई-चौड़ाई थी, परन्तु गहराई का पता नहीं लग सका तथा जो फोटो खींचा था, वह पीले रंग का आया था। उसे देखकर मैंने सोचा कि यह कैसे हो सकता है! फोटो का रंग, तो इस प्रकार का नहीं होना चाहिए। वह तो मखमली था। मैंने उसे उठाकर फेंक दिया। यह सब लेंस का कमाल था। 

वरिष्ठ राजकुमार का यह व्यवहार

मित्रो, हमारी आँखें कितने सुंदर लेंस की बनी हैं, इसका जवाब इस दुनिया में नहीं है। यह वास्तविक फोटो खींच लेती है। इतना बेशकीमती शरीर तथा भगवान् का ऐसा अनुदान किसी प्राणी को नहीं मिला है। इतनी उदारता भगवान् ने क्यों बरती? यह प्रश्र आपके सामने है। आपको विचार करना चाहिए कि भगवान् ने ऐसा पक्षपात क्यों किया? अगर अन्य प्राणियों में सोचने का, विचार करने का माद्दा रहा होता, तो वे भगवान् के सामने उपस्थित हो जाते तथा अपनी फरियाद सुनाकर आपको जेल भिजवा देते। परन्तु उनमें यह माद्दा नहीं, अत: वे बेचारे क्या करें! परन्तु आपको तो विचार करना चाहिए। इस मामले में भगवान् को अगर कोर्ट में बुलाया जाता, तो वह काँपता हुआ आता। जब उससे इस बावत पूछा जाता, तो वह कहता कि मनुष्य को हमने विशेष चीजें इसलिए नहीं दीं कि वह फिजूलखर्ची करे तथा मौज-मस्ती उड़ाये। हमने तो इस दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए, उसे सजाने-सँवारने के लिए बनाया था। यह हमारा बड़ा बेटा है, राजकुमार है। हमने इस कारण से उसे राजगद्दी दे दी थी और सारी जिम्मेदारी सौंपी थी। यह इसलिए दिया था कि वह मेरा सहयोग करेगा। हमने बहुत बड़ा ख्वाब देखा था, इसके बारे में कि यह हमारा बड़ा बच्चा है, वरिष्ठ राजकुमार है, जो इस दुनिया को सुन्दर बनाता हुआ चला जाएगा। 
परन्तु उस अभागे को, बेहूदे को मैं क्या कहूँ, जो धूम्रपान कर वहीं आ गया, जहाँ से चला था। वह कुत्ते की योनि से, बन्दर की योनि से, सुअर की योनि से आया था और निम्रकोटि के चिन्तन, विचार होने के कारण फिर से उसी योनि में चला गया। उसे निम्र कोटि के प्राणियों की तरह ही अब भी पेट तथा प्रजनन की बात याद है, बाकी चीजें, तो वह भूल-सा ही गया। उस अभागे को यह समझ में नहीं आया कि जब भगवान् ने बन्दर के लिए, अन्य प्राणियों के लिए पेट भरने की व्यवस्था की है, तो क्या उसके प्रिय पुत्र मनुष्य को वह रोटी का प्रबन्ध नहीं करेगा? परन्तु हाय रे! अभागे मनुष्य-वह इसकी कीमत नहीं जान सका। वह अपने उद्देश्य को भूल गया तथा यह कहने लगा कि मैं अपनी अकल से कमाऊँगा, बहुत अर्जन करूँगा, मौज से रहूँगा। इसी में वह खपता रहा। 

अभागे मनुष्य की दुर्गति

मित्रो! उसका हीरे एवं मोती जैसा दिमाग इसी में घूमता रहा, आगे-पीछे होता रहा, उस अभागे ने बर्वाद कर लिया अपने आपको। साथियो, घोड़ा, हाथी, भैंस आदि जानवर मनुष्य से ज्यादा खाते हैं और उनका पेट भर जाता है। परन्तु इस अभागे मनुष्य का पेट भाई से, बाप से, बीबी से भी नहीं भरता है। हाय रे! अभागा यह मनुष्य, पेट की खातिर बर्वाद हो गया। भगवान् ने हमसे कहा कि क्या कहूँ आचार्य जी, हम तो बहुत चिन्तित हैं। हमने उन्हें पानी पिलाया और कहा कि आप जाइये एवं चिन्तित मत होइये। आपके पास तो चौरासी लाख योनि वाले प्राणियों की अनेकों शिकायतें आ चुकी हैं। आप जाइये, अब हम इन्हें ठीक करेंगे। मनुष्य के पास बुद्धिबल है, उसे हम ठीक करेंगे। इस दुनिया में खुशी, आनन्द, उल्लास का वातावरण पैदा करेंगे। अभी तो वह पेट-प्रजनन में लगा है। मैं पूछता हूँ कि तेरे पास धर्म, संस्कृ ति कहाँ है? तू कभी इसके बारे में सोचता है क्या? अरे तूने इतने सारे बच्चे पैदा कर लिए? इसे नासमझी के अतिरिक्त और क्या कहा जाय?

भगवान् ने कहा कि मैंने इसे बहुत प्यार से पैदा किया, पाला, बड़ा किया कि शायद यह मेरे काम आयेगा। मेरा सहयोगी बनेगा तथा इस संसार को सुन्दर बनायेगा, परन्तु इसने तो हमारी सारी-की-सारी इच्छाओं पर पानी फेर दिया है। यह वहीं जा पहुँचा है, जहाँ अन्य चौरासी लाख योनियों के प्राणी रहते हैं। इसने भगवान की नाक में दम कर रखा है। हमने भगवान् से कहा-हे प्रभु! इसे इस बार माफ कर दीजिये। अगर किसी को आगे इनसान बनाना, तो उसे ठोंक-बजाकर देख लेना। हमने भगवान् से प्रार्थना की कि भगवान्! पहले उससे पूछ लेना कि क्या वह कोई सेठ बनने जा रहा है या बच्चा पैदा करने जा रहा है? पहले यह पूछ लेना फिर उसे इनसान का जन्म देना। अगर मनुष्य का जन्म चाहिए, तो दो रुपये के कागज पर हस्ताक्षर करा लेना और बता देना कि अमुक-अमुक लक्ष्य हैं। अगर उसे मंजूर हो तो जीवन देना, वरन नहीं देना। अगर चाहिए तो जाओ, अन्यथा तुम बन्दर, कुत्ते की योनि में जाओ। तुम्हारे लिए मनुष्य का जीवन जीना तथा पाना संभव नहीं है। हमने भगवान् से कहा और उन्होंने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि हमें जिनका दिमाग, विचार, कार्य जानवरों जैसा दिखलाई पड़ेगा, उन्हें हम मनुष्य का जन्म नहीं देंगे।

जीवनक्रम बदलिए

मित्रो, यह सच्चाई नहीं है। आप भगवान् के बड़े बेटे हैं। आप उनके बेटे हैं, जो बड़ा उदार, दयालु, कृपा का सागर तथा सर्वसम्पन्न है। भगवान् अपने लिए क्या चाहता है? क्या खाता है? वह केवल दूसरों के लिए जिन्दा रहता है, आपको यह सोचना चाहिए तथा अपना जीवनक्रम बदलने का प्रयास करना चाहिए। आप तो केवल लक्ष्मी का मंत्र सीखना चाहते हैं। आप कहते हैं कि गुरुजी यह क्या कह रहे हैं? मित्रो, आप चौरासी लाख योनियों का शरीर देखिये। आप अच्छे कर्म नहीं करेंगे, तो आपको गधे की योनि स्वीकार करनी पड़ेगी। आप पर ईंट लादी जाएँगी। वजन के मारे पीछे का पैर जख्मी हो जाएगा। पैर लडख़ड़ाने लगेंगे। आप कहेंगे कि आचार्य जी हम तो मन्नूलाल सेठ हैं। हम इस योनि में कैसे जाएँगे? आपने अच्छा कर्म नहीं किया, तो आपको घुसना ही होगा। 

मित्रो! आपको अपनी मूर्खता पर विचार करना चाहिए। आप बेकार की समस्याओं-बेसिर-पैर की समस्याओं में उलझे हैं। आपका दिमाग इस उलझन में पड़ा रहता है। आपका जीवन बर्बाद हो रहा है और आप चुप बैठे रहते हैं। हम आपको धन्यवाद देने वाले थे, परन्तु अब नहीं देना चाहते। आपको अभी १२५ रुपये मिल रहे थे, पर आप ३५० रुपये की नौकरी चाहते हैं। यह बेकार की बातें हैं। आपको जब १२५ रुपये खर्च करना नहीं आता, तो ३५० रुपये कैसे खर्च करेंगे। बेकार की बातें बन्द कीजिए। अगर आप आचार्य जी का आशीर्वाद ले जाते तथा अपने जीवन को महान बना लेते, तो हम और आप दोनों धन्य हो जाते।

भगवान् को जवाब क्या देंगे?

मित्रो! हमने शानदार जिन्दगी जी है तथा प्रसन्नता के साथ विदा होने को बैठे हैं कि हम भगवान् को सही उत्तर देंगे। परन्तु आप भगवान् को क्या जवाब देंगे। आप तो अपनी जिन्दगी भर रोते रहे एवं मरने के बाद भी रोते रहेंगे। हमारा जीवन तालाब की तरह हो गया है। हमारा आधार कमजोर है। अगर अभी हमें लकवा हो जाये, तो हम कहीं के नहीं रह जाएँगे। हमारा तालाब सूख जाएगा, तो फिर क्या होगा? हमारी उन्नति का आधार समाप्त हो गया है। हमारे पास ज्ञान है, परन्तु हमारे मस्तिष्क का चिन्तन खराब है, तो वह किसी तरह उपयोगी नहीं है। हमारे पास सम्पत्ति है, परन्तु कुछ उलटा हो जाये, अकाल पड़ जाये, तो हमारी सारी सम्पत्ति स्वाहा हो सकती है। जिसके प्रति हमारा अहंकार है, लोभ है, मोह है, वह बेकार हो जाएगा। 
तालाब के ऊपर खेती का क्या भरोसा है। खेती कुंआ के पास के, बम्बे के ऊपर की ठीक होती है। जहाँ कुछ-न -कुछ अवश्य पैदा हो जाया करता है। वह हरा-भरा रहता है तथा पानी की चिन्ता उसे नहीं होती है। हमारा भी इस तरह का ही चिन्तन है कि हमें भी मजबूत सहारा पकडऩा चाहिए, जिससे कि हम भी हरे-भरे रह सकें। इस तरह का सहारा हमारे लिए भगवान् से बढ़कर और कोई नहीं है, जो हमें सदैव हरा-भरा रख सकता है। इसमें जिन्दगी की उन्नति का सारा-का-सारा मार्ग खुला हुआ है। यह एक अज्ञात शक्ति है, जिसके इशारे पर सारा संसार चल रहा है।

आप तो बेटे के नशे में हैं। हाय बेटा-हाय बेटा चिल्लाते रहते हैं। एक बार हमारे पास मध्यप्रदेश के एक सज्जन आये थे। उनके दूसरे नम्बर के बेटे की शादी तो हो गयी, पर नौकरी नहीं लगी थी। वह मक्कार था, श्रम करना नहीं चाहता था। उसने अपने बाप से कहा कि आपने पैदा किया है, तो खिलाइये, पैसा दीजिए, नहीं तो हम जान से मार देंगे। बेचारे डर के मारे भागकर हमारे पास आये एवं कहा कि हम दो-तीन माह तक नहीं जाएँगे। छुट्टी ले लेंगे एवं यहाँ छिपे रहेंगे। उन्होंने कहा कि गुरुजी अगर उसका कोई पत्र आ जाये, तो यह मत कहना कि हम यहाँ हैं। मित्रो,उनके मन में बेटे के प्रति जो ख्वाब था वह चूर-चूर हो गया था। आप भी बेटों के पीछे पागल रहते हैं। रात-दिन बेटा-बेटा करते रहते हैं। हमारा एक और दूसरा ख्वाब यह होता है कि हम यह बन जाएँगे, वह बन जाएँगे, परन्तु एक आँधी आती है और हमारे सब ख्वाब समाप्त हो जाते हैं। हमने इतना कमजोर आधार बना दिया है कि हमें दिन में हँसना पड़ेगा तथा रात में रोना पड़ेगा। इस प्रकार हम अपनी बहिरंग जिन्दगी इसी प्रकार रोते हुए खत्म कर देंगे।

भगवान् का सहारा लीजिए

लेकिन मित्रो! एक और सहारा है, अगर आप उसे पकड़ लेंगे, तो आपका जीवन कुछ बन सकता है। वह सहारा भगवान का है। आप कहेंगे कि हम तो रोज शंकरजी के मंदिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, परन्तु शंकरजी हमारी कोई मदद नहीं करते हैं। सावन के महीने में हमने बेलपत्र चढ़ाया, पानी का मटका लगाया, परन्तु भगवान् शंकर ने कोई मदद नहीं की। मित्रो, शंकर भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिए आपको बड़ा कदम उठाना होगा।

मित्रो! बड़े कार्यों के लिए बड़ा कदम, जोखिम भरा कदम उठाना पड़ता है, तब लाभ प्राप्त होता है। शंकर जी ने वरदान दिया था-रावण को, भस्मासुर को तथा शंकरजी ने वरदान दिया था परशुराम को, परन्तु उनके व्यवहार एवं कर्म करने के ढंग के कारण रावण एवं भस्मासुर को मरना पड़ा। अगर आपकी विचारधारा ठीक होगी और आप भगवान् का अनुदान-वरदान प्राप्त करके इस संसार का कुछ अच्छा करना चाहते हैं, तो आपको भगवान् का हर प्रकार का सहयोग मिलेगा। बल एवं धन के आधार पर मनुष्य बलवान नहीं हो सकता है। हमको अपने विकास के लिए मजबूत आधार ढूँढऩा होगा। वह मजबूत आधार केवल भगवान है। भगवान् का सहारा लेने के बाद हमारे पास क्या कमी रहेगी? हमें उनका प्यार-अनुदान प्राप्त करके अपना आध्यात्मिक विकास करने का प्रयास करना चाहिए। भगवान् के पास अनन्त सुख के भंडार भरे पड़े हैं। उनके एक मित्र थे सुदामा, वे गरीबी का जीवन जी रहे थे। लोगों ने कहा कि आपकी भगवान् से मुलाकात है। आप इस प्रकार क्यों हैं? सुदामा जी भगवान् के पास गये, भगवान् ने अपने मित्र को निहाल कर दिया। 

संबंध हो जाए तो!

गुरुनानक को उनके पिता ने नाराज होकर बीस रुपये व्यापार करने को दिये और कहा-जा व्यापार द्वारा अपना जीवन निर्वाह कर। गुरुनानक देव संत थे, उन्होंने बीस रुपये की हींग खरीदी और वहाँ आये, जहाँ पर संतो का एक भण्डारा चल रहा था। उस समय दाल बन रही थी। उसमें हींग का छोंक लगा दिया तथा सभी के आगे दाल परोस दी। सभी उपस्थित लोगों ने प्रेम से भोजन किया तथा प्रसन्न हुए। प्रात:काल जब नानक घर पहुँचे, तो उनके पिता काफी नाराज थे। उन्होंने पूछा कि पैसों का क्या किया? नानक जी ने सारी बात बता दी तथा यह कहा कि पिताजी! हमने ऐसा व्यापार किया है, जो भविष्य में हजार गुना होकर वापस होगा। आज वास्तव में गुरुनानक साहेब की याद में स्वर्णमन्दिर अमृतसर में विद्यमान है, जो करोड़ों-अरबों का है। मित्रो, यह भगवान् के साथ व्यापार करने का लाभ है। हमने विचार किया—वह कैसा मंदिर है। करोड़ों का कौन-सा मन्दिर है, जिसमें गुरुनानक सोये हुए हैं। मित्रो, यह महत्त्व है भगवान् के साथ जुडऩे का, उससे सम्बन्ध करने का। 

मित्रो, काश्मीर में हजरत मोहम्मद साहब का पवित्र बाल एक शीशी में रखा है। जहाँ हजारों-करोड़ों रुपयों की मस्जिद बनी है, जहाँ मोहम्मद साहब का बाल रखा है। अगर आज गुरुनानक देव, मोहम्मद साहब आ जायें तथा इतना बड़ा मूल्यवान मकान देख लें, तो उनको आश्चर्य होगा। मित्रो, यह आध्यात्मिकता का मूल्य है। भगवान् से सम्बन्ध बनाने के बाद आदमी कितना मूल्यवान हो जाता है, यह विचार करने का विषय है। वह बहुत कीमती हो जाता है। नानक, विवेकानंद, मोहम्मद साहब महान हो गये। भगवान् से सम्बन्ध हो जाने पर आदमी का वजन और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं। 

अगर एक औरत की शादी एक सेठजी के साथ होती है तथा दुर्भाग्य से उसके पति का देहान्त हो जाता है, तो दूसरे दिन से ही वह सेठानी, उसकी सारी जमीन-जायदाद की मालकिन बन जाती है। यही होता है—भक्त का भगवान् से सम्बन्ध जोडऩे पर। डॉक्टर की पत्नी डॉक्टरनी, वकील की पत्नी वकीलनी, पंडित की पत्नी पंडितानी बन जाती है, चाहे वह पाँचवीं क्लास ही क्यों न पास हो। जिस प्रकार धर्मपत्नी बनकर आत्मा से सम्बन्ध जोडऩे पर वह पति की सारी सम्पत्ति की मालकिन बन जाती है, उसी प्रकार भगवान् से सम्बन्ध जोडऩे पर होता है। आपको यहाँ हमने इसलिए बुलाया है कि आपका ब्याह भगवान् से करा दें। इसके लिए आपको हमने अनुष्ठान प्रारम्भ कराया है। यह अनुष्ठान आपके विवाह के समय हल्दी लगाने तथा बाल सँवारने, वस्त्र आदि से सजाने के बराबर है। हम आत्मा का परमात्मा से मिलन कराना चाहते हैं। यह बाजीगरी है। हम आपका संबंध भगवान् से कराना चाहते हैं, ताकि आपका सम्बन्ध मालदार आदमी से हो जाये। मालदार आदमी के साथ सम्बन्ध बना लेने से आदमी को हर समय फायदा रहता है। 

मित्रो, किसी का सम्बन्ध मालदार आदमी से होता है और वह उसके यहाँ काम करता है, तो उसे सेठजी कुछ लाने को भेजते हैं, तथा सौ रुपये देते हैं। वह अस्सी रुपये का सामान लाता है तथा बीस रुपये अपने पॉकेट में रख लेता है। सेठजी उससे पूछते भी नहीं हैं। इस प्रकार छोटे-छोटे कामों में वह पैसा इकट्ठा करता जाता है और मालदार के साथ मालदार हो जाता है। उसकी बीबी कहती है कि हमारे घर में बाबू की तनख्वाह से क्या होगा, अगर रोज न कमायें। यह है मालदार आदमी से जुडऩे पर भौतिक लाभ। भगवान् से जुडऩे पर हमें क्या-क्या लाभ मिलते हैं, यह आप जुड़कर स्वयं देखें।

भगवान् की गोद में

मित्रो! मालदार आदमी के पास नौकरी करने पर पैसों के लिए चालाकी, बेईमानी करनी पड़ती है, तो आप पैसा कमाते हैं, परन्तु हम ऐसे मालदार आदमी, जिसका नाम भगवान् है, उसके यहाँ आपकी नौकरी लगाना चाहते हैं, जिसके पास आपको सारी चीजें प्राप्त होती रहेंगी। उसके लिए आपको चालाकी या बेईमानी करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हम चाहते हैं कि आपको भगवान् की गोद में रख दें। गोद में रहने वाला व्यक्ति घाटे में नहीं रहता है। बाप कमाता रहता है। बेटा खाता रहता है। 

बेटे, हम भी आपको बाँटते रहते हैं, आशीर्वाद देते रहते हैं कि आपका कष्ट दूर हो जाये। आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाये। आज आप कमजोर हैं, हो सकता है कि कल आप मजबूत हो जायें तथा भगवान् का काम कर सकें। आप यह सोचते हैं कि दो साल के बाद गुरुजी चले जाएँगे तथा हमें तपोभूमि या फिर हरिद्वार जाने से क्या मिलेगा? आप इधर-उधर बगलें झाँकने लगते हैं तथा साँई बाबा के पास चले जाते हैं। वहाँ जाने के बाद हनुमान जी के पास, करौली वाली माँ के पास जाते हैं, इधर-उधर भटकते रहते हैं। जिन्दगी भर आप खाली हाथ रहते हैं। मित्रो, इधर-उधर आप भटकते न रहें, आप भगवान् का पल्ला पकड़ लीजिए तथा अपने जीवन को पार कर लीजिए।

मित्रो, हमारी मुलाकात किसी एम.पी., एम.एल.ए. या मिनिस्टर से होती है या उससे जान-पहचान, साँठ-गाँठ होती है, तो हमारी समस्या तथा हमारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं। अगर हमारा सम्बन्ध भगवान् से हो तो फिर क्या कहना? मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री हमारे पास आये और यह कहा कि गुरुजी हमें एक दिन के लिए ही मुख्यमंत्री बना दीजिए। वे दो ढाई घण्टे तक हमारे पास बैठे रहे। भगवान् की कृपा से तुक्का लग गया और वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये। मित्रो, यह क्या बात है? हमारी जान-पहचान किससे है? हमारी जान-पहचान भगवान् से है। 

जान पहचान का चमत्कार

आदमी की पहचान बड़े आदमी से होने पर काम बन जाता है। एक बार ऐसा ही हुआ कि एक पंडित जी थे। पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये। उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी, तो पैसा ले लेंगे। थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी, तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गये। उसने नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था। उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया है। पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये। थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा-कल हमारी सवारी निकलेगी, तुम उस लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना। राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने कहा-गुरुजी आप यहाँ कैसे, आप तो हमारे गुरु हैं? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये। लालाजी यह सब देख रहे थे। उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य।

उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है। कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दें। लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा-पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहे थे। मुनीम जी ने आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये। लालाजी ने प्रणाम किया और बोले-पंडितजी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा, तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है। पंडित जी दस साल में मय ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये। पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है। अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना। इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया।

मित्रो, यह हम क्या कह रहे थे? यह बतला रहे थे कि आप भी अगर इस दुनिया के राजा, जिसका नाम भगवान् है अगर अपना सम्बन्ध उससे जोड़ लें तो आपकी कोई समस्या, कठिनाई नहीं रहेगी। आपको कोई तंग भी नहीं करेगा। आपके साथ अन्याय भी कोई नहीं कर सकता। पाँच फुट वाला आदमी जब भगवान् से जुड़ गया, तो मित्रो, वही आदमी महात्मा बन गया। उस आदमी का नाम महात्मा गाँधी हो गया, जिसको देखकर अँग्रेज डरते थे और यह कहते थे कि यह जादूगर है। इससे बचकर रहो। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री उससे डरते थे और यह कहते थे कि यह 'बम' है। उनने अपने सभी मंत्रियों से गाँधीजी से नजर न मिलाने की हिदायत दे रखी थी। वह काला गाँधी नहीं, वरन् वह गाँधी था, जो भगवान् से जुड़ गया था और वह उसी का चमत्कार था। वह चालाकी या अक्ल वाला गाँधी नहीं था, बल्कि भगवान् का सहयोगी गाँधी था। इन शक्तियों को आप भी भगवान् के पास बैठकर पा सकते हैं। अपने को महान बना सकते हैं। अगर आप अपने आप को तैयार कर लें, तो सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं तथा संत, महामानव स्तर तक पहुँच सकते हैं।

अनुकम्पा की अनुभूति

मित्रो, सूर्य की रोशनी इस धरती पर पड़ती तो है, परन्तु है यह हमारी आँखों का चमत्कार। अगर आँखें न रहतीं, तो हम यह विभिन्न तरह के रंग कैसे देखते तथा आनन्द अनुभव कैसे करते? आँख का सूर्य अगर ठीक हो, तो यह आपको रामायण, भागवत पढ़ा सकता है। बगीचों का आनन्द आपको मिल सकता है। अगर आपको बुखार आ जाये तथा तबियत खराब हो जाए, तो आप ठीक से नहीं खा सकते हैं। यह बात आपको सोचनी चाहिए। एक महिला थी। उसके मरने का समय हो गया। उसे पकौड़ी, नीबू का अचार, रबड़ी दी गयी, परन्तु उसका मुँह कड़ुवा था। उसे सब चीजें मिट्टी के समान लगीं। अगर आपकी अक्ल खराब हो जाए, तो इस दुनिया की सारी सम्पत्ति आपको किसी काम की नहीं दिखायी पड़ेगी। यह क्या है? जिसके कारण आप दुनिया के सारे आनन्द ले रहे हैं? चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ राजकुमार की तरह रह रहे हैं। यह है भगवान् की अनुकम्पा, भगवान् की कृपा, जो निरन्तर आपके ऊपर बरस रही है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि भगवान् हमारे सारे अंग-अंग में, सारे रोम-रोम में समाया हुआ है तथा उसकी शक्ति हमारे अन्दर समायी हुई है। वह हमें महान बना रहा है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ा रहा है। हमारा कायाकल्प कर रहा है। अगर इतना आप कर सकें, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप धन्य हो जाएँगे।

साथियो! हमारी काया के भीतर ऐसे सेल्स भरे पड़े हैं, जिसमें हीरे-मोती, सोना-जवाहरात भरे पड़े हैं। अगर आप उसे जगा लें, तो मालामाल हो सकते हैं। आप पारस, कल्पवृक्ष हो सकते हैं। आपका सम्पर्क जिस किसी से होगा, उसको आप धन्य करते चले जायेंगे। आपका विकास होता चला जाएगा। हमें अपनी हर उँगुली प्यारी है। भगवान् को भी हर प्राणी प्यारा है। वह सबका बराबर ध्यान रखता है।भगवान् अपने हर अंग को सुन्दर और सुडौल देखना चाहता है। भगवान् के ऊपर पक्षपात का दोष नहीं लगाया जा सकता है। वह सबको बराबर देता है, परन्तु मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव, श्रम, आलस्य के कारण पिछड़ जाता है। अगर आपकी पात्रता हो, तो आप सारी चीजें प्राप्त कर सकते हैं। आप अपनी प्रगति के लिए न जाने कहाँ-कहाँ घूमते हैं, किस-किस को गुरु बनाते फिरते हैं। हम भी १३ ये १५ वर्ष की उम्र तक इसी चक्कर में पड़े रहे तथा तमाशा देखते रहे। हमने भी बहुत पैसा फेंका है, मात्र यह बाजीगरी देखने के लिए। 

नकली व असली गुरु

मित्रो! इन दो सालों में हमने हिन्दुस्तान के किसी भी सिद्ध पुरुष, महात्मा, योगी को नहीं छोड़ा, जो आज बाजीगर की तरह नाम बतलाते हैं तथा सोना बनाते हैं। अगर आप चाहें, तो हम उनका नाम आपको बतला सकते हैं। एक बार हमने एक सिद्ध पुरुष की बात सुनी तथा उसके लिए हमने बहुत बड़ा जोखिम उठाया, प्राणों की बाजी लगा दी। वो सिद्ध पुरुष घने जंगल की एक गुफा में रहते थे। लोगों ने बतलाया कि वे सबका नाम-पता तथा भूत-भविष्य, वर्तमान सबकुछ बता देते हैं। हम पहुँच गये उनके पास। बाबा ने सब बतलाया। हमें दाल में कुछ काला नजर आया। हम वहीं रुक गये तथा पैर में मोच का बहाना बना दिया। यह बात उनके चेले को बता दी और एक कोने में पड़े रहे। एक दिन एक अध्यापक आया। हमने उसे बतला दिया कि यह बेकार आदमी है। इसके चेले धंधा करते हैं। हमने अध्यापक से कहा कि आप सब नाम-पते आदि गलत-सलत बताना। उसने चेलों से अपना नाम-पता सब गलत बतला दिया। दूसरे दिन महात्माजी मिले, तो उन्होंने भी वैसा ही बतलाया। अध्यापक तथा हम दोनों यह सब देखकर मुस्कुरा पड़े। यह उन चेलों ने देख लिया था। हमने किसी प्रकार धोती-कुरता समेटा और तोलिया लपेटकर दीर्घशंका का बहाना बनाकर वहाँ से भाग लिये। जाना था पूरब की ओर और पश्चिम की ओर निकल गये। किसी तरह प्राण बचाकर तीन दिन तक जंगल में भटकने के बाद अपने स्थान पर पहुँचे। 

साथियो! हमने उस गुरु को भी देखा है, जो पंद्रह वर्ष की उम्र पूरी होने पर वसंत पंचमी के दिन हमारे पास आया था। उसने हमारे तीन जन्मों का दृश्य हमें दिखाया और हमें गायत्री उपासना में लगाया, जिसे हमने चौबीस साल तक विधि-विधान पूर्वक किया। हमने अपने गुरुदेव से एक प्रश्र पूछा कि पूज्यवर हमारी एक शंका है। आप बतलायें कि गुरुओं की खोज में लोग छुट्टी लेते हैं, मेडीकल लीव लेते हैं, घर-बार छोड़ते हैं, तब जाकर शायद किसी कोने में कोई सच्चा गुरु मिलता है, परन्तु आप तो स्वयं हमारे पास चले आये, यह क्या बात है? पूज्यवर ने बतलाया-बेटे! धरती क्या बादलों के पास जाती है या बादल स्वयं आते हैं धरती पर? हमने कहा बादल स्वयं आते हैं एवं धरती पर बरस जाते हैं। बादलों को चलना पड़ता है। बादल स्वयं बरसते रहते हैं। उन्होंने कहा कि आकाश में बादलों की तरह सिद्ध पुरुषों की भी कमी नहीं है, जो बादलों की तरह बरसने के लिए सुपात्र की खोज करते रहते हैं। दिव्य आत्माओं की वे तलाश करते रहते हैं। 

मित्रो! आपने देखा होगा कि जब इस धरती पर मरी हुई लाश, कुत्ते आदि पड़े रहते हैं, तो गीध, कौवे, चील स्वयं आ जाते हैं तथा उसे नोच-नोच कर खा जाते हैं। उसी प्रकार भगवान्, दिव्य पुरुष, संत भी ऊपर से तलाश करते हैं कि इस धरती पर कौन दिव्य पुरुष है, जिसे भगवान् गुरु, संत की कृपा, वरदान, आशीर्वाद की आवश्यकता है और वह वहाँ पर पहुँचकर सारा काम करते हैं। वे देखते हैं कि कौन दया के पात्र हैं। हम बद्रीनाथ, रामेश्वर जाते हैं, किन्तु वे भी हमारे पास आते हैं एवं हमारी परख करके चले जाते हैं। केवट की भक्ति, श्रद्धा महान थी। उसे देखकर भगवान् राम स्वयं उसके पास आये और दर्शन दिया। केवट रामचंद्र जी के पास नहीं गया था। शबरी के पास रामचंद्र स्वयं आये थे। शबरी नहीं गई थी। श्रीकृष्ण गोपियों के पास गये थे तथा उन्हें प्यार दिया था, गोपियाँ नहीं गईं थी। मित्रो! उसी प्रकार पात्रता देखकर गुरु शिष्य के पास आता है तथा उसे धन्य कर जाता है। अगर वास्तव में पात्रता हो, तो ऋद्धि-सिद्धियाँ पाई जा सकती हैं तथा निहाल हुआ जा सकता है। 

पात्रता ही है महान् तत्त्व

भगवान् के यहाँ अनंत वैभव, कृपा, अनुदान भरा पड़ा है। वह केवल ऐसे आदमी को मिलता है, जिनकी पात्रता है। एक बार हम पोरबंदर-गुजरात गये थे और वहाँ गाँधीजी का जन्म स्थान देखा था। वह बहुत छोटा था। तब वहाँ छोटा सा मकान था। परन्तु भगवान् तो मालदार हैं। उसने गाँधीजी को धन्य कर दिया। आज वहाँ करोड़ों का स्मारक बना हुआ है। भगवान् आते हैं, तो मनुष्य के सोचने का, विचार करने का, कार्य करने का ढंग बदल जाता है। उसकी अवाज बदल जाती है। उसे सारे लोगों के प्रति श्रद्धा-निष्ठा हो जाती है। वह दूसरों को प्यार देता है, दूसरों के दुखों को देखकर द्रवित होता है। गाँधी जी के अंदर भगवान् आये और जो भी आवाज उनने दी, उसे पूरा होते देखा गया। भगवान् की खुशामद करने से कोई काम नहीं चलेगा। पात्रता ही महान तत्व है। जिसमें पात्रता होती है, सरकार उसे फिर बुला लेती है। उसको काम देती है। प्रेम महाविद्यालय के प्रिंसीपल ९० वर्ष के होने को आये, परन्तु गवर्नमेन्ट ने उन्हें नहीं छोड़ा। हर साल उन्हें नया पद मिल जाता।

मित्रो! प्रतिभाओं की माँग, योग्यता की माँग, गुणों की माँग हर जगह होती है। हमारा भी यही उद्देश्य है कि आप आगे बढ़े। हम चाहते हैं कि आपके अंदर भी वे चीजें आ जाएँ, भगवान् आ जाएँ तथा आपका विकास हो जाये। इसीलिए हमने आपका ब्याह भगवान् से कराने का निश्चय किया है। परन्तु मित्रो, अगर कन्या अस्वस्थ हो, बीमार हो, कमजोर हो, तो उसका विवाह अच्छे लड़के के साथ कैसे हो सकता है। उसी तरह आपकी पात्रता कमजोर हो, तो भगवान कैसे आपको अपनायेगा? कैसे स्नेह, प्यार देगा? अगर राजकुमार से विवाह करना हो, तो लड़की भी ठीक होनी चाहिए। अगर आप कोढ़ी है, तो अच्छी लड़की आपको नहीं मिलेगी। आप अपाहिज हैं, तो भगवान् के साथ विवाह नहीं कर सकते हैं। स्वस्थ, निरोग शरीर, स्वच्छ-पवित्र मन की आवश्यकता है—भगवान् से विवाह करने के लिए। 

भगवान् से विवाह

स्वच्छ मन, स्वस्थ-निरोग शरीर बनाने के लिए आपको यहाँ बुलाया गया है, ताकि आप भगवान से जुड़ सकें। आपको हम गायत्री महापुरश्चरण करा रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि आप बहुत प्रात:काल ही उठकर पूजा, ध्यान, जप, प्राणायाम में लग जाते हैं। यह सब देखकर हमें खुशी होती है। अगर आप इन करने वाले कर्मकाण्डों से कुछ प्रेरणा ले सकें तथा अपनी पात्रता का विकास कर सकें, अपने को जीवंत बना सकें, तो आप यकीन रखें कि आपका विवाह भगवान से हो जायेगा। तथा आपके पास सारी ऋद्धि-सिद्धियाँ, वैभव स्वत: आ जायेंगे, जिसके लिए आप रातोंदिन परेशान रहते हैं।

मित्रों! एक लड़की थी। उसका रिश्ता तय हो गया। उसकी गोद में एक नारियल भी लड़के वालों ने दे दिया था। बाद में लड़के वालों ने मना कर दिया। लड़की ने कमर कसी और लाठी लेकर उस गाँव में पहुँच गई। उसने कहा कि अरे विवाह कर, नहीं तो लाठी के सामने आ जा। मामला पंचायत तक पहुँचा। लड़की ने कहा कि इसने ही शादी पक्की की, नारियल भी दिया और अब ना कर रहा है। पंचायत ने फैसला किया कि विवाह इसी लड़की के साथ होगा। 

मित्रो! हमने भी आपका विवाह भगवान् से कराने का निश्चय किया है। आप भी उस लड़की की तरह दृढ़ निश्चय करके अपनी पात्रता को विकसित करके भगवान को प्राप्त करें। आपकी परेशानी दूर हो जायेगी। हम भगवान के पास होकर आये हैं। उनके पास ढेरों हीरे की अंगूठी-जवाहरात, बाल-बच्चे हैं, जिसे चाहे उठाकर ले आओ। मित्रो! यह विवाह किसी प्रकार घाटे का सौदा नहीं है। आप इसे निभाना। इसमें हमें प्रसन्नता होगी। 

आज की बात समाप्त। 
ऊँ शान्ति:!
यह संकलन हमें श्री बृजेश वर्मा, शान्तिकुन्ज हरिद्वार से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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रविवार, 17 जुलाई 2011

Safalta


If one day.....


अध्यात्मवाद

वर्तमान की समस्त समस्याओं का एक सहज सरल निदान है- अध्यात्मवाद। यदि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक जैसे सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये, तो समस्त समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिकोण में वांछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेगें।

अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्परूप है, संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार-विहार और रहन-सहन को विचार परक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ्य समाप्त हो जाता है। विभिन्न शारीरिक समस्याओं का आसानी से हल निकल सकता है, यदि इस संदर्भ में दृष्टिकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। यदि शरीर को पूरी तरह पवित्र और स्वच्छ रखा जाय, आत्म संयम और नियमितता द्वारा शरीर धर्म का पालन करते रहा जाय, तो शरीर पूरी तरह स्वस्थ बना रहेगा तथा शारीरिक संकट की संभावना ही न रहेगी। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहेगा।

शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन् उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य में गिरावट के प्रधान कारण होते हैं। जो लोग अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, उसके नियमों का ठीक-ठीक पालन करते हैं, वे सुदृढ़ एवं निरोग बने रहते हैं।

मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निर्द्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है, किंतु यह खेद का विषय है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकारग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ एवं आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रखता है। यदि इस प्रचण्ड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मनःशांति का महत्त्व समझ लिया जाय और निःस्वार्थ निर्लोभ एवं निर्विकारिता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न कर लिया जाय, तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है।

सुदृढ़ स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह-सहयोग क्रिया-कौशल, समुचित धन, सुदृढ़ दाम्पत्य, ससुंस्कृत संतान, प्रगतिशील विकास क्रम, श्रद्धा, सम्मान, सुव्यवस्थित एवं संतुष्ट जीवन का एकमात्र सुदृढ़ आधार अध्यात्म ही है। आत्म-परिष्कार से संसार परिष्कृत होता चला जाता है। अपने को सुधारने से सारी समस्याओं का समाधान होता चला जाता है। अपने को ठीक कर लेने से आसपास के वातावरण के ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि जो अपना सुधार नहीं कर सका, अपनी गतिविधियों को सुव्यवस्थित नहीं कर सका, उसका भविष्य अंधकार मय ही बना रहेगा। इसीलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है। 

-डॉ. प्रणव पण्ड्या
(लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं।)


यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल, रूद्रपुर ( नैनीताल ) से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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जो कुछ चाहें, वह सब पायें

आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार सभी प्राणियों में एक ही चेतना का अस्तित्व विद्यमान है। शरीर की दृष्टि से वे भले ही अलग-अलग हों, पर वस्तुतः आत्मिक दृष्टि से सभी एक हैं। इस संदर्भ में परामनोविज्ञान की मान्यता है विश्व-मानस एक अथाह और असीम जल राशि की तरह है। व्यक्तिगत चेतना उसी विचार महासागर (यूनीवर्सल माइण्ड) की एक नगण्य -सी तरंग है, इसी के माध्यम से व्यक्ति अनेक विविध चेतनाएँ उपलब्ध करता है और अपनी विशेषताएँ सम्मिलित करके फिर उसे वापस उसी समुद्र को समर्पित कर देता है। 

इच्छा शक्ति द्वारा वस्तुओं को प्रभावित करना अब एक स्वतंत्र विज्ञान बन गया है, जिसे साइकोकिनस्रिस्य कहते हैं। इस विज्ञान पक्ष का प्रतिपादन है कि ठोस दिखने वाले पदार्थों के भीतर भी विद्युत अणुओं की तीव्रगामी हलचलें जारी रहती है। इन अणुओं के अंतर्गत जो चेतना तत्त्व विद्यमान है, उन्हें मनोबल की शक्ति-तरंगों द्वारा प्रभावित, नियंत्रित और परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार मौलिक जगत पर मनःशक्ति के नियंत्रण को एक तथ्य माना जा सकता है।

भारत ही नहीं, अपितु अन्य देशों में भी अभ्यास द्वारा इच्छाशक्ति बढ़ाने और उसे प्रखर बना लेने के रूप में ऐसी कई विचित्रताएँ देखने को मिल जाती हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कुछ विशेष परिस्थतियों में ही शान्त, सन्तुलित, सुखी और संतुष्ट भले ही रहता हो, परन्तु इच्छाशक्ति को बढ़ाया जाय तथा अभ्यास किया जाय, तो वह अपने को चाहे जिस रूप में बदल सकता है। इच्छा और संकल्पशक्ति के आधार पर असंभव लगने वाले दुष्कर कार्य भी किए जा सकते हैं। 

कुछ वर्ष पूर्व मैक्सिको (अमेरिका) में डॉ. राल्फ एलेक्जेंडर ने इच्छाशक्ति की प्रचण्ड क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों को किसी भी स्थान से किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसी भी शक्ल दी जा सकती है। इतना ही नहीं, बादलों को बुलाया और भगाया जा सकता है। एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऐलेन एप्रागेट ने साइकोलॉजी पत्रिका में उपरोक्त प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए बताया कि मनुष्य की इच्छा शक्ति अपने ढंग की एक सामर्थ्यवान विद्युत धारा है और उसके आधार पर प्रकृति की हलचलों को प्रभावित कर सकना पूर्णतया संभव है। अमेरिका के ही ओरीलिया शहर में डॉ. एलेग्जेंडर ने एक शोध संस्थान खोल रखा है, जहाँ वस्तुओं पर मनः शक्ति के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन विधिवत् किया जा रहा है। तद्नुसार एक व्यक्ति के विचार दूरवर्ती दूसरे व्यक्ति तक भी पहुँच सकते हैं और वस्तुओं को ही नहीं, व्यक्तियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। यह तथ्य अब असंदिग्ध हो चला है। अनायास घटने वाली घटनाएँ ही इसकी साक्षी नहीं है, वरन् प्रयोग करके यह भी संभव बनाया जा सकता है कि यदि इच्छा शक्ति आवश्यक परिमाण में विद्यमान हो या दो व्यक्तियों के बीच पर्याप्त घनिष्ठता हो तो विचारों के वायरलैस द्वारा एक दूसरे से सम्पर्क संबंध स्थापित किया जा सकता है और अपने मन की बात कही-सुनी जा सकती है। 

अभी तक ऐसी अनेक घटनाएँ घटी है और ऐसे कई प्रामाणिक तथ्य मिले हैं, जिसके आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि मनुष्य अपनी बढ़ी हुई इच्छाशक्ति को और बढ़ाकर इस संसार के सिरजनहार की तरह समर्थ और शक्तिमान बन सकता है, क्योंकि अलग-अलग एकाकी इकाई दिखाई पडऩे पर भी वह है तो उसी का अंश।

-शैल दीदी पण्ड्या




यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल, रूद्रपुर ( नैनीताल ) से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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मनुष्य महान् क्यों ?

यदि व्यक्ति द्वारा अपना अस्तित्व पहचाना जा सके, तो वस्तुस्थिति का ज्ञान सहज ही हो सकता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आत्म-ज्ञान हो जाने से व्यक्ति अकर्मण्य, निष्क्रिय होकर बैठ जायेगा। सत्य की प्राप्ति कभी किसी क्षेत्र में अनर्थ नहीं करती। सत्य का ढोंग ही अनर्थ करता है। जब यह अनुभव हो जाये कि वस्तुतः यह संसार एक क्रीडांगण है, जहाँ एक ही चेतन सत्ता खेल रही है। यह जगत् अभिनयमय है, जहाँ प्रत्येक जीवात्मा को अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए भेजा गया है, तो अधिक प्रखरता से साधना हो सकेगी। प्राचीनकाल में ऋषियों ने अपनी अंतर्दृष्टि से, साधना-उपासना से इस भ्रमजाल, मायामय संसार के सत्य को पहचाना था। विज्ञान भी अब उसी बिन्दु की ओर पहुँच रहा है। इसमें कोई संशय नहीं है कि सत्य को प्राप्त करने के लिए सच्ची लगन और जिज्ञासा से किसी क्षेत्र में प्रयास किया जाय, अंततः वह यात्रा एक ही गंतव्य में जाकर समाप्त होगी।

सृष्टि की सबसे विलक्षण, अद्भुत तथा सामर्थ्यवान संरचना है-मनुष्य। किसी भी वस्तु का सही स्वरूप और सामर्थ्य अविज्ञात हो, तो उससे समुचित लाभ उठाते नहीं बनता। प्रकृति की कितनी ही शक्ति धाराओं का ज्ञान मनुष्य को लाखों वर्ष तक न था। फलस्वरूप उनसे लाभ नहीं मिल सका। आज ही नहीं, लाखों वर्ष पूर्व भी वे गुण पदार्थ के गर्भ में विद्यमान थे, जिनसे परमाणु बम जैसे घातक हथियार बनते हैं। वस्तुएँ भी मौजूद थीं, जिनसे राकेटों, अंतरिक्ष उपग्रहों का निर्माण होता है। ऊर्जा के प्रचुर पेट्रोलियम भण्डार पृथ्वी के भीतर दबे पड़े थे, पर दीर्घकाल तक जानकारियों का अभाव बना रहा। फलतः उनसे मनुष्य जाति को प्रगति में विशेष सहयोग न मिल सका। जैसे-जैसे उनकी सामर्थ्य का पता प्राप्त करने की विधा हाथ लगी, द्रुतगति से प्रगति पथ पर बढ़ चलने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

अतिरिक्त उत्तरदायित्वों के आधार पर ही किसी को अतिरिक्त साधन दिये जा सकते हैं, अन्यथा ईश्वर को अन्यायियों और पक्षपातियों का सरताज कहा जाता। मनुष्य को मौज उड़ाने के लिए इतना साधन संपन्न बनाने के विरोध में सभी जीवधारी मिल जुलकर आवाज उठाते और नीति-न्याय की कचहरी में इन मिलीभगत वाले ईश्वर और मनुष्य की चैकड़ी को कड़ी सजा दिलाकर रहते। ईश्वर बड़ा है, पर बड़े का अर्थ यह तो नहीं कि वह अपनी ही बनाई मर्यादाओं को तहस-नहस कर दे और मात्र एक ही प्राणी पर स्वेच्छापूर्वक सुख-साधनों का अम्बार बरसा दे तथा दूसरे सभी उस सबके लिए तरसते भर रहें।

निश्चित रूप से मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों से अतिरिक्त मिला है, उसके दो ही प्रयोजन हैं। एक आत्म-कल्याण अर्थात् आदर्शों की दृष्टि से अपने को पूर्णता के स्तर तक पहुँचाना। दूसरा विश्व कल्याण-अर्थात् विश्व उद्यान को अधिक व्यवस्थित और समुन्नत बनाने में स्रष्टा का हाथ बँटाना, क्रिया कुशल माली की भावभरी भूमिका निभाना। इन दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही मनुष्य को युवराज जैसी वरिष्ठता दी गयी है। इसकी उपेक्षा करके यदि वह शरीरचर्या में निरत रहकर असंयम बरतता है, तो उसकी विलासिता, तृष्णा और अहंता द्वारा अपनाई गयी उद्दण्डता अपराध श्रेणी में गिनी जायेगी। महत्त्वपूर्ण पदों पर अवस्थित अधिकारी जब उत्तरदायित्वों की अवहेलना करते हैं, तो उन्हें भर्त्सना एवं प्रताडऩा भी उतनी ही बड़ी मिलती है।

जीवन को यदि सार्थक बनाना है, आत्मा को यदि जीवन में भागीदार मानना है, तो ईमानदारी इसी में है कि उसकी आवश्यकता समझी जाय, उपलब्धियों में हिस्सेदारी दी जाय। प्रगति और प्रसन्नता का लाभ शत-प्रतिशत शरीर को ही न मिलता रहे, उसकी हिस्सेदारी आत्मा के लिए भी होनी चाहिए।

-डॉ. प्रणव पण्ड्या
(लेखक- देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति हैं।)

यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल, रूद्रपुर ( नैनीताल ) से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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अपनी यथार्थता जानें

मानव जीवन एक प्रकार से देवत्व प्राप्ति का अवसर है। इस अवसर का सदुपयोग कर मानव से महामानव, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम तक बना जा सकता है। मानव शरीर की संरचना भगवान् की श्रेष्ठतम कृति है। इस सृष्टि में मनुष्य से बढक़र अन्य कोई प्राणी उसने इतना अद्भुत एवं प्रतिभावान नहीं बनाया। इस मानव जीवन में ही शिक्षा, कला, विज्ञान, आवास के सुंदर-सुंदर भवन, जल, थल एवं नभ में विचरण का अवसर प्राप्त हुआ है। नाना प्रकार के रंग-बिरंगे सपनों को साकार करने का अवसर इसी जीवन में उपलब्ध है। यह सुविधा तो देवयोनि में भी संभव नहीं है।

पूर्णता की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय आदर्श एवं पवित्रतम दैवी जीवन यापन किया जाय तथा अपनी उपार्जित शक्ति-सम्पदा का न्यूनतम अपने लिए तथा अधिकतम दूसरों के लिए खर्च किया जाय, इसी को मानव जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग माना गया है। राजा का बड़ा पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाता है, किन्तु उसका कर्तव्य है कि वह अपने अन्य छोटे भाई-बहिनों की देखरेख व सुरक्षा का समुचित प्रबंध करे। परम पिता का सर्वश्रेष्ठ युवराज होने के नाते मनुष्य का भी उत्तरदायित्व यही है कि अपने से अविकसित, पिछड़े प्राणियों को, जो हमारे छोटे भाई-बहिन के समान हैं, उनको विकसित करने, आगे बढ़ाने में उदारतापूर्वक सहयोग करे। उनको सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करे।

शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहियों के समान हैं। इन दोनों का अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। यह अन्तःकरण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप दोनों स्वामिभक्त सेवक के समान सदैव उसकी आज्ञा का पालन मात्र करते रहते हैं। शरीर द्वारा क्रिया मन द्वारा विचारणा उसी ओर घूमती एवं चलती है, जिधर अंतरात्मा की भावना प्रेरित करती है। भावनाएँ ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठा एवं मान्यता आदि नामों से जानी जाती हैं। इन्हीं सबके समन्वय से आकांक्षाएँ उभरती हैं और फिर उन्हीं के अनुरूप मन अपना तर्क, वितर्क, चिंतन एवं क्रिया प्रणाली निर्धारित करता है। तदुपरान्त गुलाम की तरह शारीरिक हलचलें क्रिया रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। ऐसे में शरीर और मन दोनों को निर्दोष ही माना जाएगा। भला या बुरा, उत्थान या पतन जिस भी मार्ग में बढ़ जाता है, उसका सारा दारोमदार अन्तःकरण पर ही जाता है।

आत्मज्ञान, आत्मबोध का अभिप्राय अंतराल के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं विश्वास उत्पन्न करते रहना कि हम सत्, चित्त, आनंद स्वरूप परमात्मा के ही अभिन्न अंग हैं। हमें यह भावना भी उत्पन्न करनी चाहिए कि संकीर्ण स्वार्थपरता त्याज्य है। व्यक्तिवादी आपाधापी अंततोगत्वा पतन के ही मार्ग में धकेलती है। अस्तु व्यक्ति से उठकर समष्टि पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भगवान बुद्ध को जब आत्मबोध प्राप्त हुआ था, तब वे संकीर्ण स्वार्थयुक्त राजपाट को त्यागकर समष्टिगत हित साधना में लग गए थे। स्वयं ही नहीं अपने अबोध बालक एवं पत्नी को भी लोकहित के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति की क्रिया पद्धति में आदर्शवादिता ही आदर्शवादिता उभरती, उछलती रहती है। ऐसे लोग स्वयं तो कृतकृत्य होते ही हैं, समाज के लाखों-करोड़ों सामान्यजनों के लिए मार्गदर्शन का भी कार्य कर जाते हैं।

-डॉ. प्रणव पण्ड्या)



यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल, रूद्रपुर ( नैनीताल ) से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान

गायत्री परिवार के जनक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार में दिये गये प्रवचनों में से एक है- 

मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ


ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते, तो उनका नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है-देने वाला। देने वाले से अगर माँगने वाला कुछ माँगता है, तो कोई बेजा बात नहीं है, पर विचार करना पड़ेगा कि आखिर देवता देते क्या चीज हैं? देवता वही चीज देते हैं, जो उनके पास है। जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पाएगा। देवता के पास सिर्फ एक चीज है और उसका नाम है-देवत्व। देवत्व कहते हैं- गुण, कर्म और स्वभाव-तीनों की अच्छाई को, श्रेष्ठता को। इतना देने के बाद में देवता निश्चिन्त हो जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि जो हम आपको दे सकते थे, हमने वह दे दिया। अब आपका काम है कि जो चीज हमने दी है, उसको जहाँ भी आप मुनासिब समझें, वहाँ इस्तेमाल करें और उसी किस्म की सफलता पाएँ।

दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है और वह है- आदमी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाए बिना, अपनी योग्यता का सबूत दिये बिना, परिश्रम के बिना, गुणों के अभाव में, कोई चीज प्राप्त कर ली है, तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं। शरीर में हजम करने की ताकत न हो, तो जो खुराक आपने खाई है, वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी तरह सम्पत्तियों को, सुविधाओं को हजम करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं होगा, तो वे आपको तंग करेंगी, परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं है, तो जैसे-जैसे दौलत बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे आपके अन्दर दोष-दुर्गुण बढ़ते जाएँगे, व्यसन बढ़ते जाएँगे, अहंकार बढ़ता जाएगा और आपकी जिन्दगी को तबाह कर देगा।

देवता क्या देते हैं? देवता हजम करने की ताकत देते हैं। जो दुनियाबी दौलत या जिन चीजों को आप माँगते हैं, जो आपकी खुशी का बायस मालूम पड़ती है, उन सारी चीजों को हजम करने के लिए विशेषता होनी चाहिए। इसी का नाम है-देवत्व। देवत्व अगर प्राप्त हो जाता है, तो फिर आप दुनिया की हर चीज से, थोड़ी से थीड़ी चीजों को लेकर फायदा उठा सकते हैं। अगर वे न भी हों, तो भी काम चल सकता है। ज्यादा चीजें हो जाएँ, तो भी अच्छा है, यदि न हो जाएँ, तो भी कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अगर आप इस बात के लिए उतावले हैं कि जैसे भी हम पिछड़े हैं, वैसे ही बने रहें, तो फिर कुछ कहना संभव नहीं है। मनुष्य के शरीर में ताकत होनी चाहिए, लेकिन समझदारी का नियंत्रण न होने से आग में घी डालने, ईंधन डालने के तरीके से वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतें पैदा करेंगी। देवता किसी को दौलत देने की गलती नहीं कर सकते। अगर देते हैं, तो इसका मतलब है कि तबाही कर रहे हैं। इनसानियत उस चीज का नाम है, जिसमें आदमी का चिंतन, दृष्टिकोण, महत्त्वाकांक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती हैं। इनसानियत एक बड़ी चीज है।

मनोकामनाएँ पूरी करना खराब बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि यह किस काम के लिए, किस चीज के लिए माँगी गई है? अगर सांसारिकता के लिए माँगी गयी है, तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हजम कैसे कर सकते हैं? उसे खर्च कैसे कर सकते हैं? मनुष्य भूल कर सकता है, पर देवता भूल नहीं कर सकते। देवता आपको वे चीजें नहीं दे सकते, जैसा कि आप चाहते हैं। देवताओं के सम्पर्क में आने वाले को भौतिक वस्तुएँ नहीं मिलीं। क्या मिला है? आदमी को गुण मिले हैं, देवत्व मिला है। सद्गुणों के आधार पर आदमी को विकास करने का मौका मिला है। गुणों के विकसित होने के पश्चात् उन्होंने वह काम किए हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि से काम करते हुए नहीं कर सकता। देवत्व के विकसित होने पर कोई भी उन्नति के शिखर पर जा - पहुँच सकता है, चाहे वह सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक। संसार और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर है। गुण अपने आप में शक्ति के पुंज हैं, कर्म अपने आप में शक्ति पुंज है और स्वभाव अपने आप में शक्ति के पुंज हैं। इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह आपकी इच्छा की बात है। जिससे इस कार्य में सफलता पा ली, मानों उसे सब कुछ मिल गया। उसका जीवन देवतुल्य बन गया और जहाँ देवता निवास करते हैं, वह स्थान स्वर्ग ही कहा जायेगा। वहाँ के रहने वालों का जीवन हँसी-खुशी से भरा-पुरा रहता है। 

-डॉ. प्रणव पण्ड्या


यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल, रूद्रपुर ( नैनीताल ) से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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तीर्थ यात्रा, महत्त्व और उद्देश्य

हमारा भारत देश तीर्थों का देश है। उसकी प्रत्यक्ष धार्मिकता का स्वरूप खुली आँखों से देखना हो, तो इन पुण्य क्षेत्रों के निर्माण में किये गये प्रयासों, लगाये हुए साधनों और पहुँचने वाले दर्शकों को देखकर लगाया जा सकता है। 

तीर्थ की पुण्य परंपरा एवं उसके महत्त्व पर गायत्री चेतना केन्द्र प्रमुख ने कहा कि तीर्थों के प्राचीन स्वरूप और कार्यक्रमों पर पैनी दृष्टि डालने से स्थिति को समझने में कठिनाई नहीं रहती और उनकी गरिमा बखानने में जो बात कहीं गई है। उनका आधारभूत कारण समझने में कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती और यह विश्वास करना सरल पड़ता है कि प्राचीन काल में तीर्थों की कार्य पद्धति और विधि व्यवस्था के सम्पर्क में आने वाले निश्चित रूप से वैसा ही लाभ पाते रहे होंगे, जैसा कि कहा गया है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को तीर्थों की आत्मा कह सकते हैं। उसकी विशिष्टता को गवाँ देने के कारण आज तीर्थों का स्वरूप पर्यटन केन्द्रों जैसा होता जा रहा है और उनकी महत्ता एवं पुण्य फल का जो वर्णन किया गया है, उस का कुछ परिणाम न होने से विश्वास करना कठिन पड़ता है।

प्राचीन काल में तीर्थ ऐसे साधना केन्द्रों के रूप में स्थापित एवं विकसित किए गये थे, जिनसे अंतराल की गहरी परतों का उपचार परिष्कार एवं उत्कर्ष संभव हो सके। इस प्रक्रिया को एक प्रकार से उपयोगी वातावरण में बने हुए साधन सम्पन्न तथा मूर्धन्य चिकित्सकों से भरे-पूरे सैनेटोरियम की उपमा दी जा सकती है। अंतर इतना ही है कि वे उपचार केन्द्र मात्र स्वास्थ्य लाभ भर दे सकते हैं, जबकि तीर्थों से न केवल चिन्तन को मोडऩे-मरोडऩे वाली स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्चा चलती है, वरन् मेजर ऑपरेशनों, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अन्तःकरण को, अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्रों को सुधारने सँभालने का कार्य तीर्थों में होता रहता है। उसकी कुछ-कुछ तुलना वैज्ञानिक उपचारों से किये जाने वाले ब्रेन वाशिं से की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं को उभारने वाले, व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बनाने वाले उपचार एवं अभ्यास केन्द्रों के रूप में महामनीषियों ने तीर्थों की स्थापना की थी और यह स्थापना अपने समय में पूर्ण तथा सफल भी रही।

आज की तरह तीर्थ यात्रा में भगदड़ के लिए गुंजाइश नहीं थी। जिस-तिस देवालय को भागते- दौड़ते देख भर लेना, पाई-पैसा चढ़ाकर देवता का अनुग्रह बटोर लेना, जलाशय में डुबकी मारकर पाप से पीछा छुड़ा लेना, देवी-देवताओं की प्रतिमा एवं मूर्तियों से मनोकामना की पूर्ति के लिए मनौती माँगते फिरना आज का शुगल है। छोटी बुद्धि इतना ही सोच सकती है और इतना ही उससे बन पडऩा सम्भव है। उच्च दृष्टि और तत्वान्वेषी बुद्धि ही कार्य-कारण की संगति बिठाती है। जिन दिनों लोगों में वस्तुस्थिति समझने की क्षमता न थी, उन दिनों भी लोग तीर्थों में जाते थे, पर उनका उद्देश्य और कार्यक्रम उतना उथला नहीं रहता था, जितना आज देखा जाता है। वे ठण्डक नहीं शान्ति पाने जाते थे। पुण्य नहीं प्रकाश की कामना लेकर पहुँचते थे। मानसिक आरोग्य की उपयोगिता शारीरिक स्वास्थ्य से भी बढ़ी-चढ़ी है।

अस्पतालों, मानसिक चिकित्सालयों, स्वास्थ्य केन्द्रों विश्राम गृहों की उपयोगिता तो इन दिनों समझी जाती है। प्राचीन काल में आरण्यकों की भूमिका इन सबके संयुक्त लाभों से भी बढ़ी-चढ़ी होती थी। शारीरिक, मानसिक और आंतरिक व्याधि-वेदनाओं का निराकरण करने और विक्षोभ के स्थान पर उल्लास भर देने में आरण्यक पूर्णतया समर्थ रहते थे। उन दिनों तीर्थों का स्वरूप भी आरण्यकों जैसा ही बना हुआ था। अतएव मात्र पुण्य लाभ के लिए ही नहीं, प्रत्यक्ष जीवन में उस विशिष्टता को प्राप्त करने हेतु लोग तीर्थों में पहुँचते थे।

-वीरेश्वर उपाध्याय

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आकर्षक व्यक्तित्व की कुंजी

व्यक्तित्व रूपी साँचे में ढलकर ही मनुष्य जीवन बनता है। अतः यदि जीवन को उच्च बनाना है, तो आवश्यक है कि हम पहले व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनायें। श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही दिव्य जीवन की निशानी है। गुण, कर्म, स्वभाव इन तीनों का परिष्कार लाने से ही सही रूप में व्यक्तित्व निखरता है और निखरा हुआ व्यक्तित्व ही आकर्षक प्रतीत होता है। पूर्ण व्यक्तित्व अंतर और बाह्य दोनों स्तरों के सम्मिश्रण से ही बनता है। जहाँ आंतरिक सुधार आवश्यक है, वहीं भौतिक जीवन के दैनिक कार्यक्रमों में भी उत्कृष्टता बनाये रखना जरूरी है।

जीवन सरसता लिए होना चाहिए। यह सरसता अपने अन्दर धारण करने से उत्पन्न होती है। प्रसन्न मुख रहने वाले व्यक्ति की ओर सभी आकर्षित होते हैं। जो रोनी सूरत बनाये रखता है, उसके पास कोई फटकना पसंद नहीं करता। नीरस व्यक्ति के मुख का सौन्दर्य भी विकृत हो उठता है। हँसना एक गुण है, जिसका व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं चरित्र पर प्रभाव पड़ता है। 

आकर्षक व्यक्तित्व की कुंजी तो बाह्य और आंतरिक सुन्दरता में निहित है। मनुष्य अपने अन्तःकरण का प्रतिबिम्ब है। प्रसन्नता से पता चलता है कि व्यक्ति का मानस स्वस्थ है। स्वाभाविक मुस्कान से मन का भार हलका हो जाता है। दुःख की स्थिति में भी मुस्कुराने वाला व्यक्ति अपने मन को शुभ भावनाओं एवं सद्विचारों से आच्छादित रखता है। सब जीवों में मनुष्य जाति की एक बड़ी विशेषता है-हँसना। यह ईश्वर द्वारा मनुष्य को इसलिए दी गयी है कि वह क्षण भर में अपने दुःख-दर्दों से मुक्ति पा सके। मुस्कान एक ऐसी औषधि है, जिससे व्यक्ति के शरीर में स्फूर्ति एवं शक्ति आती है। कार्य में उत्साह उत्पन्न होता है, जो हमारे व्यक्तित्व के गठन में सहायक है। गंभीरता व्यक्ति के लिए आवश्यक है, किन्तु इससे भी अधिक आवश्यकता प्रसन्नता की है। हँसी व्यक्ति में प्राण शक्ति का संचार करती है, जो व्यक्ति को गतिशील एवं उन्नतिशील बनाती है। आकर्षक व्यक्तित्व प्रसन्नता एवं गंभीरता के मिश्रण से ही पूर्ण मुखरित होता है।

गुणों का विकास ही व्यक्तित्व के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। हममें नम्रता और सौम्यता होनी चाहिए। इससे हम अनेक दुर्गुणों से बचते व दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि अनीति या गलत बात के सम्मुख भी हमें अपने स्वभावनुकूल झुक जाना चाहिए।

सोचने का ढंग भी मनुष्य के चरित्र विकास का महत्त्वपूर्ण अंग है। मनुष्य के प्रत्येक कार्य के पीछे उसके विचारों की ही प्रेरणा होती है। विचारों के अनुसार ही व्यक्ति के बोलने-चालने देखने का ढंग भी होता है। मनुष्य जीवन का प्रत्येक भाग उसके मस्तिष्क में उठने वाले विचारों से प्रभावित होता है। विचार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को विनिर्मित करते हैं। जैसे विचार होंगे, वैसा चरित्र बनेगा और जैसा चरित्र होगा, वैसा ही व्यक्तित्व बनेगा।

मानवीय विकास का अगला चरण है, अन्तःकरण को भाव संवेदनाओं से अभिपूरित करना। इसके लिए दूसरों की सहानुभूति मनुष्य की आंतरिक शक्तियों में से एक है। सहानुभूति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली वह कोमलता है, जिसका निर्माण संवेदना, दया, प्रेम और करुणा के सम्मिश्रण से होता है। वह आत्मा की निःस्वार्थ भाषा है, जिसकी वाणी मूक है, किन्तु हर हृदयवान उसे समझ लेता है। प्रेम, दया एवं करुणा ऐसे मानवीय गुण हैं, कि इनके अभाव में एक पल चलना भी भारी हो जाता है; किन्तु आज का विचारवान मनुष्य इन पर गहराई से ध्यान नहीं देता। प्रेम के अभाव में जीवन वीरान हो सकता है। करुणा, दया, सहयोग, के अभाव में समाज या परिवार का ढाँचा भी नहीं बन सकता। 

हर मनुष्य सहानुभूति का भूखा होता है। दुःख में संवेदना, दया किसी कीमती दवा से कम नहीं है। आपत्ति के समय प्रेम के, सांत्वना के दो शब्द शांति देते हैं। इसका अनुभव हर व्यक्ति को होगा। किसी की सहानुभूति मेरे साथ है, यह अनुभव मात्र मनुष्य को साहस प्रदान करता है। शारीरिक, आर्थिक या भौतिक रूप से उस सहानुभूति का हमारे स्वास्थ्य से गहरा संबंध है।

व्यक्तित्व की महानता का मूल्यांकन भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, जो व्यक्ति को आत्मिक सुख और आनन्द की अनुभूति कराते हैं। दुःख में हमारी भूख मर जाती है और खुशी में दो रोटी ज्यादा खा लेते हैं। यह तथ्य सिद्ध करता है कि महान विचारों और गुणों का शरीर व मन पर गहरा प्रभाव है। स्वस्थ शरीर तथा स्वच्छ मन का निर्माण सद्गुणों से ही होता है। अतः सद्गुण ही सच्ची सम्पत्ति है। 

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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शनिवार, 16 जुलाई 2011

vichar pariwartan


यज्ञ मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली अचूक औषधि

रोगों की जड़ शरीर में नहीं, मन में होती है। यह मानकर अपने मानसिक संतुलन को सुस्थिर रखा जाय, तो कोई शारीरिक रोग होने पर भी वह जीवन क्रम सामान्य ढंग से चलाया जा सकता है। मानसिक संतुलन साधने के लिए यह मान्यता बड़ी ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि उस तथ्य को सभी रोगों में एक समान लागू होते देखा जा सकता है। उनकी प्रतिक्रिया, लक्षण शरीर पर भले ही दिखाई दें, लेकिन उनकी जड़ मनुष्य के मन में होती है। वृक्ष की जड़ जिस प्रकार जमीन के भीतर होती है और उसका तना, शाखाएँ, पत्ते, फूल, फल और शिखर आकाश में होते हैं। इसी प्रकार रोगों का स्वरूप, उत्पात, प्रतिक्रिया शरीर के तल पर दिखाई देते हैं, लेकिन उनका मूल मन में होता है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए महर्षियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा है। प्रज्ञापराधं रोगस्य मूल कारणं अर्थात् प्रज्ञापराध, मानसिक अस्त-व्यस्त, असंतुलित मनःस्थिति, चिन्ता, क्षोभ और अन्यान्य मानसिक विकृतियाँ समस्त रोगों का मूल कारण है। यदि अपनी मानसिक स्थिति को सँभाला जाय, उसे शांत-संतुलित बनाया जाय, तो शरीर को पूर्ण स्वस्थ, निरोग और पुष्ट रखा जा सकता है। शरीर का निदान-परीक्षण बाद में, पहले मन को ही स्वस्थ बनाये रखने की बात सोचनी चाहिए। इसके लिए प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों से परे मन को हलका-फुलका बनाने वाली किसी भी विधि का सहारा लिया जा सकता है। इसमें वैदिक कर्मकाण्ड द्वारा संपादित यज्ञ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यज्ञोपैथी, ऐलौपैथी, नेचरोपैथी, होम्योपैथी, बायोकेमिकल चिकित्सा पद्धति आदि चिकित्सा प्रणालियों की तरह विभिन्न देशों में यज्ञों से भी रोगों के उपचार की विधि खोज ली गयी है और उसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जाने लगा है।

अब तो यज्ञ को मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली अचूक औषधि समझा जाने लगा है। कई देशों में यज्ञ-चिकित्सा दिनों-दिन लोकप्रिय होती जा रही है। इस चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत रोगियों को यज्ञ के वायु से निकलने वाली तरंगों को श्वास-प्रश्वास के माध्यम से ही देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। पागल और विक्षिप्त समझे जाने वाले व्यक्तियों की मस्तिष्कीय क्षमता पहले ही प्रयास में इस योग्य तो नहीं बन पाती कि वे बताई गयी विधि का अक्षरशः पालन कर लें; लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के श्वास-प्रश्वास करने की शैली को पहचानने लगते हैं और तथा उन श्वास-प्रश्वास (प्राणायाम) द्वारा ही उत्तर देने लगते हैं। प्राणायाम के माध्यम से रोगी का यह क्रम धीरे-धीरे शरीर के अंतःस्थल तक भी पहुँच जाता है और परिणामतः रोगी के रोगमुक्त होने में दिनों-दिन सफलता प्राप्त होने लगती है।

जिन व्यक्तियों को विक्षिप्त मान लिया जाता है और पागल समझकर समाज से अलग कर दिया जाता है, ऐसे व्यक्ति का दिमाग वास्तव में बेकार नहीं हो जाता है। वस्तुतः लोग भावनाओं पर अत्यधिक ठेस लगने के कारण मस्तिष्कीय संतुलन खो बैठते हैं। कभी-कभी यह असर इतना गहरा हो जाता है कि वह व्यक्ति समाज की धारा से पूरी तरह कट-पिटकर अपने आप में सिमट जाता है। यज्ञ में भावनाओं को जाग्रत करने और सम्बल देने को ही नहीं, उनके परिष्कृत बनाने तथा उनका संतुलन साधने की प्रभावशाली क्षमता है। शरीरशास्त्रियों की मान्यता है कि मस्तिष्क के कुछ भाग भावनाओं को उत्तेजित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यज्ञ से उत्पन्न तरंगों का उन अंगों पर बहुत अच्छा और अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यज्ञ द्वारा मस्तिष्क की उन सिकुड़ी हुई मांस-पेशियों को शक्ति मिलती है। फलतः व्यक्ति को भावनात्मक बल और आनन्द मिलता है। वे पेशियाँ जो कारणवश निष्क्रिय हो जाती हैं, पुनः सक्रिय हो उठती हैं। इसी नियम को एक विधि- व्यवस्था के साथ रोग चिकित्सा के लिए अपनाया जाता है और अब तो जटिल से जटिल रोगों का उपचार भी यज्ञोपैथी द्वारा किये जाने की विधियाँ खोज ली गयी हैं। 

यज्ञोपैथी के माध्यम से रोगोपचार की यह पद्धति तो कुछ वर्षों पूर्व ही आविष्कृत की गयी है। अब चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान इस दिशा में भी गया है। बाहरी उपकरण इतना प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं, तो स्वयं अपनी ही कर्म (यज्ञ करना) तो और अधिक प्रभाव उत्पन्न करते होंगे। इस विषय पर चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान भले ही अभी गया हो, परन्तु यह तो प्राचीनकाल से जान, समझ लिया गया है कि यज्ञ के द्वारा समस्त रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। यज्ञ मनुष्य को न केवल हलका-फुलका व प्रफुल्लित कर देता है, वरन् उसकी कई चिंताओं, दबावों और तनावों तथा समस्याओं के बोझ को भी बड़ी सीमा तक समाप्त कर देता है।

भारतीय मनीषियों ने यज्ञ की इस शक्ति को हजारों वर्ष पूर्व पहचान कर उसका उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयोग करना आरंभ कर दिया था। यज्ञ साधना का अपना एक स्वतंत्र विज्ञान है। कोई आश्चर्य नहीं कि यज्ञ का स्वास्थ्य प्रयोजन के लिए उपयोग करते-करते विज्ञान इस तथ्य को भी बहुत जल्दी स्वीकार करने की स्थिति में आ जाय कि यज्ञ मानव मात्र, प्राणिमात्र के लिए सर्वतोभावेन कल्याणकारी है। वर्तमान की अनेकानेक समस्याओं का समाधान उसमें सन्निहित है।

-गौरीशंकर शर्मा

यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल नैनीताल से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
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