सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

शरीर की विभिन्न देव-शक्तियों का जागरण

विराट ब्रह्म की कल्पना में-विश्वपुरुष के शरीर में जहाँ-तहाँ विभिन्न देवताओं की उपस्थिति बताई गई है । गौ माता के शरीर में विभिन्न देवताओं के निवास का चित्र देखने को मिलता है । मनुष्य-शरीर भी एक ऐसा आत्मसत्ता का दिव्य मंदिर है, जिसमें विभिन्न स्थानों पर विभिन्न देवताओं की स्थिति मानी गई है । धार्मिक कर्मकाण्डों में स्थापना भाव भक्ति के आधार पर की जाती है । न्यासविधान इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए है । सामान्यतः ये सभी देवता प्रसुप्त स्थिति में रहते हैं, अनायास ही नहीं जाग पड़ते । अनेक साधनाएँ, तपश्चर्याएं इसी जागरण के हेतू हैं, सोता सिंह या सोता सर्प निर्जीव की तरह पड़े रहते हैं, पर जब वे जाग्रत होते हैं, तो अपना पूरा पराक्रम दिखाने लगते हैं । यही प्रक्रिया मंत्र-साधना द्वारा भी पूरी की जाती है । इस तथ्य को इस रूप में समझा जा सकता है कि मंत्र-साधना, विशेषतः गायत्री-उपासना से एक प्रकार का लुज-पुंज व्यक्ति जाग्रत, सजीव एवं सशक्त हो उठता है । उसी उभरी विशेषता को मंत्र की प्रतिक्रिया या फलित हुई सिद्धि कह सकते हैं । 
गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों में सभी विभूतियों के जागरण की क्षमता है, साथ ही हर अक्षर एक ऐसे सद्गुण की ओर इंगित करता है, जो अपने आप में इतना सशक्त है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का हर पक्ष ऊँचाई की ओर उभारता है और उसकी सत्ता अपने आप ही अपना काम करने लगती है । फिर उन सफलताओं का उपलब्ध कर सकना सम्भव हो जाता है, जिनकी कि किसी देवी-देवता अथवा मंत्राराधन से आशा की जाती है । ओजस्, तेजस्, वर्चस् इन्हीं हो कहते हैं । प्रथम चरण में सूर्य जैसी तेजस्विता, ऊर्जा और गतिशीलता मनुष्य में उभरे तो समझना चाहिए कि उसने वह बलिष्ठता प्राप्त कर ली, जिसकी सहायता से ऊँची छलांग लगाना और कठिनाइयों से लड़ना सम्भव होता है । इसी प्रकार दूसरे चरण में देवत्व के वरण की बात है । मनुष्यों में ही पशु, पिशाच और देवता होते हैं। उसमें शालीनता, सज्जनता, विशिष्टता व भलमनसाहत देवत्व की विशेषताओं का ही प्रतिनिधित्व करती है । तीसरे चरण में सामुदायिक सद्बुद्घि के अभिवर्द्घन का निर्देशन है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, इसलिए कहा जाता है कि एकाकी स्तर के चिंतन तक सीमित न रहा जाए, सामूहिकता, सामाजिकता को भी उतना ही महत्त्व दिया जाए-सद्बुद्घि से अपने समेत सबको सुसज्जित किया जाए। यह भूल न जाया जाए कि र्दुबुद्घि ही दुष्टता और भ्रष्टता की दिशा उत्तेजना देती है और यही दुर्गति का निमित्त कारण बनती है । 
दर्शन और प्रक्रिया मिलकर ही अधूरापन दूर करते हैं । गायत्री मंत्र का उपासनात्मक कर्मकांड भी फलप्रद हैं, क्योंकि शब्द-गुम्फन अंतः की सभी रहस्यमयी शक्तियों को उत्तेजित करता है, पर यह भी भूला न जाए कि स्वच्छ, शुद्घ, परिष्कृत व्यक्तित्व जब गुण-कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता से परिष्कृत-अनुप्राणित होता है, तभी वह समग्र परिस्थिति बनती है, जिसमें साधना से सिद्घि की आशा की जा सकती है । घिनौने, पिछड़े, अनगढ़ और कुकर्मी व्यक्ति यदि पूजा-पाठ करते भी रहें तो उसका कोई उपयुक्त प्रतिफल नहीं देखा जाता । ऐसे ही एकांगी प्रयोग जब निष्फल रहते हैं तो लोग समूची उपासना तथा आध्यात्मिकता को व्यर्थ बताते हुए देखे जाते हैं । बिजली के दोनों तार मिलने पर ही करेंट चालू होता है अन्यथा वे सभी उपकरण बेकार हो जाते हैं, जो विभिन्न प्रयोजनों से लाभान्वित करने के लिए बनाए गए हैं । 

इसीलिए उपासना के साथ जीवनसाधना और लोकमंगल की आराधना को भी संयुक्त रखने का र्निदेश है । पूजा उन्हीं की सफल होती है, जो व्यक्तित्व और प्रतिभा को परिष्कृत करने में तत्पर रहते हैं, साथ ही सेवा-साधना एवं पुण्य परमार्थ को सींचने, खाद लगाने में भी उपेक्षा नहीं बरतते । त्रिपदा गायत्री में जहाँ शब्द-गठन की दृष्टि से तीन चरण हैं, वहीं साथ में यह भी अनुशासन है कि धर्म-धारणा और सेवा-साधना का खाद-पानी भी उस वट-वृक्ष को फलित होने की स्थिति तक पहुँचाने के लिए ठीक तरह सँजोया जाता रहे । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

शक्ति-केंन्द्र का उद्दीपन- शब्दशक्ति द्वारा

एक विलक्षणता गायत्री महामंत्र में यह है कि इसके अक्षर, शरीर एवं मनः तंत्र के मर्म केन्द्रों पर ऐसा प्रभाव छोड़ते हैं कि कठिनाइयों का निराकरण एवं समृद्घ-सुविधाओं का सहज संवर्द्घन बन पड़े । टाइपराइटर पर एक जगह कुंजी दबाई जाती है और दूसरी जगह संबद्घ अक्षर छप जाता है । बहिर्मन पर, विभिन्न स्थानों पर पड़ने वाला दबाव एवं कंठ के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न शब्दों का उच्चारण अपना प्रभाव छोड़ता है और इन स्थानों पर पड़ा दबाव सूक्ष्म-शरीर के विभिन्न शक्ति-केंन्द्रों को उद्वेलित-उत्तेजित करता है । योगशास्त्रों में षटचक्रों, पंचकोशों, चौबीस ग्रंथियों, उपत्यिकाओं और सूक्ष्म नाड़ियों का विस्तापूर्वक वर्णन है, उनके स्थान, स्वरूप के प्रतिफल आदि का भी विवेचन मिलता हैं, साथ ही यह भी बताया गया है कि इन शक्ति-केंन्द्रों को जागृत कर लेने पर साधक उन विशेषताओं-विभूतियों से संपन्न हो जाता है । इनकी अपनी-अपनी समर्थता, विशेषता एवं प्रतिक्रिया है । गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों का इनमें एक-एक से संबंध है । उच्चारण से मुख, तालु, ओष्ठ कंठ आदि पर जो दबाव पड़ता है, उसके कारण ये केंन्द्र अपने -अपने तारतम्य के अनुरूप वीणा के तारों की तरह, झंकृत हो उठते हैं- सितार के तारों की तरह, वायलिन-गिटार की तरह, बैंजो-हारमरेनियम की तरह झंकृत हो उठते और एक ऐसी स्वरलहरी निस्सृत करते हैं, जिससे प्रभावित होकर शरीर मे विद्यमान दिव्यग्रंथियाँ जाग्रत होकर अपने भीतर उपस्थित विशिष्ट शक्तियों के जाग्रत एवं फलित होने का परिचय देने लगती हैं । संपर्क साधने के मंत्र का उच्चारण टेलेक्स का काम करता है । रेडियो या दूरदर्शन -प्रसारण की तरह शक्तिधाराएं यों सब ओर निःसृत होती हैं, पर उस केन्द्र का विशेषतः स्पर्श करती हैं, जो प्रयुक्त अक्षरों के साथ शक्ति-केन्द्रों को जोड़ता है । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

त्रिपदा गायत्री- तीन धाराओं का संगम

गायत्री को त्रिपदा कहा गया है । उसके तीन चरण हैं । उद्गम एक होते हुए भी एक साथ तीन दिशाधाराएँ जुड़ती हैं । 
(१) सविता के भर्ग-तेजस् का वरण अर्थात् जीवन में ऊर्जा एवं आभा का बाहुल्य । आवंछनीयताओं से अंतःऊर्जा का टकराव । परिष्कृत प्रतिभा एवं शौर्य-साहस इसी का नाम है । गायत्री के नैष्ठिक साधक में यह प्रखर प्रतिभा इस स्तर की होनी चाहिए कि अनीति के आगे न सिर झुकाए और न झुककर कायरता के दबाव में कोई समझौता करे । 
(२) दूसरा चरण है-देवत्व का वरण अर्थात् शालीनता को अपनाते हुए उदारचेता बने रहना, लेने की अपेक्षा देने की प्रकृति का परिपोषण करना, उस स्तर के व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव-गरिमा की अंतराल में अवधारणा करना । यही है देवत्व धीमहि । 
(३) तीसरा सोपना है- 'धियो यो नः प्रचोदयात् मात्र अपनी ही नहीं, अपने समूह, समाज व संसार में सद्बुद्घि की प्रेरणा उभारना-मेधा, प्रज्ञा, दूरदर्शी विवेकशीलता, नीर-क्षीर विवेक में निरत बुद्घिमत्ता । 
यही है आध्यात्मिक त्रिवेणी-संगम, जिसमें अवगाहन करने पर मनुष्य असीम पुण्यफल का भागी बनता है । कौए से कोयल एवं बगुले से हंस बन जाने की उपमा जिस त्रिवेणी संगम के स्नान से दी जाती है, वह वस्तुतः आदर्शवादी साहसिकता, देवत्व की पक्षधर शालीनता एवं आदर्शवादिता को प्रमुखता देने वाली महाप्रज्ञा है । गायत्री का तत्वज्ञान समझने और स्वीकारने वाले में ये तीनों ही विशेषताएँ न केवल पाई जानी चाहिए वरन् उनका अनुपात निरंतर बढ़ते रहना चाहिए । इस आस्था को स्वीकारने के उपरांत संकीर्णता प कृपणता से अनुबंधित ऐसी स्वार्थपरता के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि उससे प्रभावित होकर कोई दूसरों के अधिकारों का हनन करके अपने लिए अनुचित स्तर का लाभ बटोर सके-अपराधी या आततायी कहलाने के पतन-पराभव को अपना सके । 
नैतिक, बौद्घिक, सामाजिक, भौतिक और आत्मिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक, संवद्घंन एवं उन्मूलनपरक-सभी विषयों पर गायत्री के चौबीस अक्षरों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है और न सभी तथ्यों तथा रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, जिनके सहारे संकटों से उबरा और सुख-शन्ति के सरल मार्ग को उपलब्ध हुआ जा सकता है । जिन्हें इस संबंध में रूचि है, वे अक्षरों के वाक्यों के विवेचनात्मक प्रतिपादनों को ध्यानपूर्वक पढ़ लें और देखें कि इस छोटे से शब्द-समुच्चय में प्रगतिशीलता के अतिमहत्वपूर्ण तथ्यों का किस प्रकार समावेश किया गया है । इस आधार पर इसे ईश्वरीय निर्देश, शास्त्र-वचन एवं आप्तजन-कथन के रूप में अपनाया जा सकता है । गायत्री के विषय में गीता का वाक्य है- 'गायत्री 'छंदसामहम्' । भगवान् कृष्ण ने कहा है कि 'छंदों में गायत्री मैं स्वयं हूँ,' जो विद्या-विभूति के रूप में गायत्री की व्याख्या करते हुए विभूति योग में प्रकट हुई हैं । 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

गायत्री और साविता का उद्भव

पौराणिक कथा-प्रसंग में चर्चा आती है कि सृष्टि के आरंभकाल में सर्वत्र मात्र जलसंपदा ही थी । उसी के मध्य में विष्णु भगवान् शयन कर रहे थे । विष्णु की नाभि में कमल उपजा । कमल पुष्प पर ब्रह्माजी अवतरित हुए । वे एकाकी थे, अतः असमंजसपूर्वक अनुरोध लगे कि मुझे क्यों उत्पन्न किया गया है ? क्या करूँ ? कुछ करने के लिए साधन कहाँ से पाऊँ ? इन जिज्ञासाओं का सामाधान आकावाणी ने किया और कहा- 'गायत्री के माध्यम से तप करें, आवश्यक मार्गदर्शन भीतर से ही उभरेगा ।' उनने वैसा ही किया और आकाशवाणी द्वारा बताए गए गायत्री मंत्र की तपपूर्वक साधना करने लगे । पूर्णता की स्थिति प्राप्त हुई । गायत्री दो खंड बनकर दर्शन देने एवं वरदान-मार्गदर्शन से निहाले करने उतरी । उन दो पक्षों में से एक को गायत्री, दूसरे को सावित्री नाम दिया गया । गायत्री अर्थात् तत्वज्ञान से संबंधित पक्ष । सावित्री अर्थात् भौतिक प्रयोजनों में उसका जो उपयोग हो सकता है, उसका प्रकटीकरण । जड़-सृष्टि-पदार्थ-संरचना सावित्री शक्ति के माध्यम से और विचारणा से संबंधित भाव-संवेदना, आस्था, आकांक्षा, क्रियाशीलता जैसी विभूतियों का उद्भव गायत्री के माध्यम से प्रकट हुआ । यह संसार जड़ और चेतना के-प्रकृति और परब्रह्म के समन्वय से ही दृष्टिगोचर एवं क्रियारत दीख पड़ता है । 
इस कथन का सारतत्व यह है कि गायत्री-दर्शन में सामूहिक सद्बुद्घि को प्रमुखता मिली है । इसी आधार को जिस-तिस प्रकार से अपनाकर मनुष्य मेधावी प्राणवान् बनता है । भौतिक पदार्थो को परिष्कृत करने एवं उनका सदुपयोग कर सकने वाला भौतिक विज्ञान सावित्री विद्या का ही एक पक्ष है । दोनों को मिला देने पर समग्र अभ्युदय बन पड़ता है । पूर्णता के लिए दो हाथ, दो पैर आवश्यक हैं । दो फेफड़े, दो गुरदे भी अभीष्ट हैं । गाड़ी दो पहियों के सहारे ही चल पाती हैं, अस्तु, यदि गायत्री महाशक्ति का समग्र लाभ हो तो उसके दोनों ही पक्षों को समझना एवं अपनाना आवश्यक है । 
तत्वज्ञान मान्यताओं एवं भावनाओं को प्रभावित करता है । इन्हीं का मोटा स्वरूप चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार है । गायत्री का तत्वज्ञान इस स्तर की उत्कृष्टता अपनाने के लिए सद्विषयक विश्वासों को अपनाने के लिए प्रेरणा देता है । उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, मर्यादा एवं र्कत्तव्यपरायणता जैसी मानवीय गरिमा को अक्षुण बनाए रहने वाली आस्थाओं को गायत्री का तत्वज्ञान कहना चाहिए । 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना

भारतीय संस्कृति के बहूमूल्य निर्धारणों और अनुशासनों का सारतत्व खोजना हो तो उसे चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र का मंथन करके जाना जा सकता है । भारतीय संस्कृति का इतिहास खोजने से पता लग सकता है कि प्राचीनकाल में इस समुद्र मंथन से कितने बहुमूल्य रत्न निकले थे तथा भारमभूमि को 'स्वार्गादपि गरीयसी' बनाने में उस मंथन से निकले नवनीत ने कितने बड़ी भूमिका निबाही थी । मनुष्य में देवत्व का उदय कम-से कम भारतभूमि का कमलपुष्प तो कहा ही जा सकता है । जब वह फलित हुआ तो उसका अमरफल इस भारतभूमि को 'स्वार्गादपि गरीयसी' बना सकने में समर्थ हुआ । 
भारत को जगद्गुरू, चक्रवती व्यवस्थापक और दिव्यसंपदाओं का उद्गम कहा जाता है । समस्त विश्व में इसी देश के अजस्त्र अनुदान अनेक रूपों में बिखरे हैं । यह कहने में कोई अत्युक्ति प्रतीत नहीं होती कि संपदा, सभ्यता और सुसंस्कारिता की प्रगतिशीलता इसी नर्सरी में जमी और उसने विश्व को अनेकानेक विशेषताओं और विभूतियों से सुसंपन्न किया । 
भारतीय संस्कृति का तत्वदर्शन गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों की व्याख्या-विवेचना करते हुए सहज ही खोज और पाया जा सकता है । गायत्रीगीता, गायत्रीस्मृति, गायत्रीसंहिता, गायत्रीरामयण, गायत्री-लहरी आदि संरचनाओं को कुरेदने से अंगारे का वह मध्य भाग प्रकट होता है, जो मुद्दतों से राख की मोटी परत जम जाने के कारण अदृश्य- अविज्ञात स्थिति में दबा हुआ पड़ा था। 
कहना न होगा कि गरिमामय व्यक्तित्व ही इस संसार की अगणित विशेषताओं, संपदाओं एवं विभूतियों का मूलभूत कारण है । वह उभरे तो मनुष्य देवत्व का अधिष्ठाता और नर से नारायण बनने की संभावनाओं से भरा-पूरा है । गौरव-गरिमा मानवता के साथ किस प्रकार अविच्छिन्न रूप से जुड़ी इसका सारतत्व गायत्री के अक्षरों को महासमुद्र मानकर उसमें डुबकी लगाकर खोजा, देखा और पाया जा सकता है । 
मात्र अक्षर दोहरा लेने से तो स्कूली बच्चे प्रथम कक्षा में ही बने रहते हैं । उन्हें प्रशिक्षित बनने के लिए वर्णमाला, गिनती जैसे प्रथम चरणों से आगे बढ़ाना पड़ता हैं । इसी प्रकार गायत्री मंत्र के साथ जो विभूतियाँ अविच्छिन्न रूप से आबद्घ हैं, मात्र थोड़े से अक्षरों को याद कर लेने या दोहरा देने से उसमें वर्णित विशेषताओं को उपलब्ध करना नहीं माना जा सकता । उनमें सन्निहित तत्वज्ञान पर भी गहरी दृष्टि डालनी होगी । इतना ही नहीं, उसे हृदयंगम भी करना होगा और जीवनचर्या में नवनीत को इस प्रकार समाविष्ट करना होगा कि मलीनता का निराकरण तथा शालीनता का अनुभव संभव बन सके । 
संसार में अनेक धर्म-संप्रदाय हैं । उनके अपने-अपने धर्मशास्त्र हैं । उनमें मनुष्य को उत्कृष्टता का मार्ग अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है और समय के अनुरूप अनुशासन का विधान किया गया है । भारतीय धर्म में भी वेदों की प्रमुखता है । वेद चार हैं । गायत्री मंत्र के तीन चरण और एक शीर्ष मिलने से चार विभाग ही बनते हैं । एक-एक विभाग में एक वेद का सारतत्व है । आकार और विवेचना की दृष्टि से अन्यान्य धर्मकाव्यों की तुलना में वेद ही भारी पड़ते हैं । उनका सारतत्व गायत्री के चार चरणों में है, इसलिए उसे संसार का सबसे छोटा धर्मशास्त्र भी कह सकते हैं । हाथी के पैर में अन्य सब प्राणियों के पदचिन्ह समा जाते हैं वाली उक्ति यहाँ भली प्रकार लागू होती है । 
 -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

गायत्री महामंत्र

चौबीस अक्षरों का गायत्री महामंत्र भारतीय संस्कृति के वाड्मय का नाभि कमल कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी । यह संसार का सबसे छोटा एवं एक समग्र धर्मशास्त्र है । यदि कभी भारत जगद्गुरु-चक्रवर्ती रहा है तो उसके मूल में इसी की भूमिका रही है। गायत्री मंत्र का तत्वदर्शन कुछ ऐसी उत्कृष्टता अपने अंदर समाए है कि उसे हृदयंगम कर जीवनचर्या में समाविष्ट कर लेने से जीवन परिष्कृत होता चला जाता है । वेद, जो हमारे आदिग्रंथ हैं, उनका सारतत्व गायत्री मंत्र की व्याख्या में पाया जा सकता है । 
गायत्री त्रिपदा है । उद्गम एक होते हुए भी उसके साथ तीन दिशाधाराएँ जुड़ती हैं- 
(१) सविता के भर्ग-तेजस का वरण, परिष्कृत प्रतिभा-शौर्य व साहस । 
(२) देवत्व का वरण, देव व्यक्तित्व से जुड़ने वाली गौरव-गरिमा को अंतराल में धारण करना । 
(३) मात्र अपनी ही नहीं, सारे समूह, समाज व संसार में वृद्धि की प्रेरणा उभरना । 
गायत्री की पूजा-उपासना और जीवन-साधना यदि सच्चे अर्थों में की गई हो तो उसकी ऋद्धि-सिद्धियाँ स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरंतर साधक के अंतराल में उभरती रहती हैं । ऐसा साधक जहाँ भी रहता है, वहाँ अपनी विशिष्टताओं के बलबूते स्वर्गीय वातावरण बना लेता है । जहाँ शिखा-सूत्र का गायत्री से अविच्छिन्न संबंध है, वहीं गायत्री का पूरक है- यज्ञ । दोनों ही संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं । अपौरुषेय स्तर पर अवतरित गायत्री मंत्र नूतन सृष्टि निर्माण में सक्षम है ।
 -युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

Some very Good and Very bad things ..


The most destructive habit.......Worry 

The greatest Joy.......Giving 

The greatest loss.......Loss of self-respect

The most satisfying work.......Helping others

The ugliest personality trait.......Selfishness 

The most endangered species.......Dedicated leaders 

Our greatest natural resource.......Our youth 

The greatest 'shot in the arm'.......Encouragement 

The greatest problem to overcome.......Fear 

The most effective sleeping pill.......Peace of mind 

The most crippling failure disease.......Excuses 

The most powerful force in life.......Love 

The most dangerous act.......A gossip

The world's most incredible computer.......The brain 

The worst thing to be without.......Hope 

The deadliest weapon.......The tongue 

The two most power-filled words.......'I Can' 

The greatest asset.......Faith 

The most worthless emotion.......Self- pity 

The most beautiful attire.......SMILE! 

The most prized possession.......Integrity 

The most powerful channel of communication.......Prayer 

The most contagious spirit.......Enthusiasm 

Life ends; when you stop Dreaming, 
Hope ends; when you stop Believing, 
Love ends; when you stop Caring, 
And Friendship ends; when you stop Sharing...!!! 


साभार . श्री बृजेश कुमार जी, शान्ति कुन्ज, हरिद्वार

BALANCE SHEET OF LIFE


Our Birth is our Opening Balance! 
Our Death is our Closing Balance! 
Our Prejudiced Views are our Liabilities 
Our Creative Ideas are our Assets 

Heart is our Current Asset 
Soul is our Fixed Asset 
Brain is our Fixed Deposit 
Thinking is our Current Account 

Achievements are our Capital 
Character & Morals, our Stock-in-Trade 
Friends are our General Reserves 
Values & Behaviour are our Goodwill 

Patience is our Interest Earned 
Love is our Dividend 
Children are our Bonus Issues 
Education is Brands / Patents 

Knowledge is our Investment 
Experience is our Premium Account 
The Aim is to Tally the Balance Sheet Accurately. 
The Goal is to get the Best Presented Accounts Award. 
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साभार . श्री बृजेश कुमार जी, शान्ति कुन्ज, हरिद्वार

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

बुढ़ापे को दीजिए सार्थक दिशा.....


1. बुढ़ापा जीवन का अभिशाप नहीं, अनुभवों की कुंजी हैं। इसे विषाद नहीं, प्रभु का प्रसाद बनाइए।
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2. बचपन में ज्ञानार्जन कीजिए और जवानी में धनार्जन, पर बुढ़ापे को पुण्यार्जन के लिए समर्पित कर दीजिऐ। बचपन माँ को दिया, जवानी पत्नी को दी और बुढ़ापा पोते-पोतियों को दे देंगे तो सोचिए अपनी सद्गति की व्यवस्था कब करेंगे। 
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3. आसक्ति की जड़ों को थोड़ा ढीला कीजिये। राजा दशरथ सिर के एक सफेद बाल को देखकर वैराग्य वासित हो गए और हमारे सारे बाल ही सफेद हो गए है, फिर हम इतने आसक्त क्यों बने हुए है।
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4. घर के बेटे और बहुओं को सलाह दूंगा कि अगर घर में कोई वृद्ध हैं तो उन्हें भार मानने की बजाय भाग्य मानिऐ। याद रखें, बूढ़ा पेड़ फल नहीं देता, पर छाया तो देता ही हैं। 
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5. अपने माता-पिता को भाग्य भरोसे मत छोड़िए। उनके बुढ़ापे को सुखमय बनाने की कोशिश कीजिए। जब उन्होंने हमें प्रेम से पाला तो हम उन्हें विवशता में क्यों पाल रहे हैं। उनकी दुआएँ लीजिए और आने वाली पीढ़ी को संस्कार दीजिए।
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6. अनाथालय और अस्पताल में जाकर सेवा करना सरल हैं, पर घर के बुढ़े लोंगों की सेवा करना मुश्किल हैं आप पहले अपने घर की आग बुझाइए फिर औरों के घर पर पानी छिड़किए, इसी में आपकी भलाई हैं। 
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7. बुढ़ापे को बेकार मत समझिए। इसे सार्थक दिशा दीजिए। तन में बुढ़ापा भले ही आ जाए, पर मन में इसे मत आने दीजिए। आप जब 21 के हुए थे तब आपने शादी की तैयारी की थी, अब अगर आप 51 के हो गए हैं तो शान्ति की तैयारी करना शुरू कर दीजिए। 
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8. सुखी बुढ़ापे का एक ही मन्त्र हैं - दादा बन जाओ तो दादागिरी छोड़ दो और परदादा बन जाओ तो दुनियादारी करना छोड़ दो। अगर आप जवान हैं तो गुस्से को मन्द रखो, नही तो केरियर बेकार हो जाएगा और बूढ़े हैं तो गुस्से को बंद रखो नहीं तो बुढ़ापा बिगड़ जाएगा। 
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9. बुढ़ापे को स्वस्थ, सक्रिय और सुरक्षित रखिए। स्वस्थ बुढ़ापे के लिए खानपान को सात्त्विक और संयमित कीजिए, सक्रिय बुढ़ापे के लिए घर के छोटे-मोटे काम करते रहिए और सुरक्षित बुढ़ापे के लिए सारा धन बेटों में बाँटने के बजाय एक हिस्सा खुद व खुद की पत्नी के नाम भी रखिए। 
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10. दवाओं पर ज्यादा भरोसा मत कीजिए। भोजन में हल्दी, मैथी और अजवायन का उचित मात्रा में सेवन करते रहिए, हल्के-फुल्के व्यायाम अवश्य कीजिए अथवा आधा घण्टा टहल लीजिए। घरवालों पर हम भार न लगे और शरीर भी भारी न लगे इसलिए कुछ-न-कुछ करते रहिए। 
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11. समय-समय पर स्वास्थ्य की जाँच भी करवा लीजिए ताकि कोई बड़ी बीमारी हम पर अचानक हमला न कर बैठे और पचास की उम्र में ही शेष बुढ़ापे की आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ कर लीजिए ताकि बच्चों के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आए। 
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12. घर में ज्यादा दखलंदाजी न करे क्योंकि बार-बार की गई टोकाटोकी बेटे-बहुओं को अलग घर बसाने के लिए मजबूर कर देगी।
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13. कमल के फूल की तरह घर में रहते हुए भी अनासक्त रहिए, थोड़ा समय प्रभु भक्ति, सत्संग, स्वाध्याय और ध्यान में बिताइये। हो सके तो साल में कम से कम एक बार संबोधि सक्रिय योग शिविर में अवश्य भाग लीजिए, इससे आपको मिलेगी जीवन की नई ऊर्जा, नया विश्वास और अद्भुत आनन्द।
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संतप्रवर श्री ललितप्रभ जी

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

Simple wrds gr8 meaning

1- apne mitro ko fwd kare.
anmol vichar NISHULK prapt karne k liye-
msg write kare-
JOIN(space)MOTIVATIONS
ise 09870807070 pr bheje.
thanks 
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2- "Do not worry if others do not understand you."
"Worry only if you can't understand urself."
Live in your passion & Love your Life. 

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3- "You Will NEVER Get a SECOND Chance 2 Make a 1st Impression Remember, The 1st Impression CAN Only GIVE You
The 2nd CHANCE" 

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4- 2 rules 2 follow 4 peaceful lyf-
'Failure' should nvr go 2 HEART 'Success' should nvr go 2 HEAD. Simple wrds grt meaning. 

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5- When Iron Gets Hot U Can Mold It In Any Shape ..... Never Loose Ur Temper Or Else People 'll Mold U d Way Dey Want .. 

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6- If d whole world against u What will you do? Simple! Just turn ur direction, U'll be the Leader of the whole World. 

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7- Every problem in a life carries a gift inside it.
So whenever U loose something dont get upset bcoz somethng may wait 4 U more than U lost. 

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8- Ek or raat chali gyi zindagi se, Ek aur din aa raha h zindagi me, ye mat socho k kitne lamhe h zindagi me, ye socho k kitni zindagi h har lamhe me. 

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9- Krodh k Dwara kisi ko Jeet lena tumhari Jeet nhi Balki wo tumhaare krodh ki jeet hai. 

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10- Amzaing True-
When u Talk, u r only repeating what u already knw bt if u listen, u may hear sumting new. 

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11- Always Try to Prove that "U ARE RIGHT" But Nvr Attempt to Prove that  "OTHERS R WRONG." 
That's d ART of being positive. 

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12- Jo apni zindgi me kuch karne me Asafal rah jaate hai, Praay ve he Log zindgi me Aalochak ban jaate hai. 

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13- A very meaningful thought on humanity-
"You can hurt a heart only till it loves you,
not after it.".. 

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14- A thoughT by gandhi.. 
"waves r my inspiration , not because they rise nd fall but each time they fall They Rise Again..." 

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15- Dusro ko Itni jaldi Maaf kar diya karo Jitni jaldi aap Uparwale se apne liye Maafi ki umeed rakhte ho. 

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16- A person who walks with his legs, reaches his destination, But A person who walks with his brain, reaches his destiny. 

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17- A nice thought read it ..
"Those who are most slow in making a promise, Are the most faithful in fulfilling it". 

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18- Santosh ka matlab y nahi ki aap kuch kaam nhi kare, Balki Santosh ka matlab y he ki karm karke apko jo kuch mile aap usme khush rahe. 
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19- "Zindagi ki aadhi pareshaniya aise hi dur ho jaye, Agar hm 'Ek-dusre k' bare me bolne k bjaye 'Ek-dusre se' bolna sikh le.

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20- Nice Lines By Chetan Bhagat-
Work hard, but make time for your love, and family. Nobody remembers Power point presentations on ur dying day.... 

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21- Life is like a Vehicle That running is Slow when you Are in it. But it runs Faster when you Are chasing it.! 

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22- Luck is not in your hands, but decision is in your hands. "Your decision can make luck, but luck can't make your decision".So always trust yourself. 

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23- The greatest gift in life is 2 find sum1 who knows all ur faults, differences, mistakes n many more wrongs about u bt still sees the best ln u.. 

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24- Success Does Not Depend on making Important Decisions Quickly It Depends on Your Quick Action on Important Decisions !! 

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रश्क

How You See YOUR SELF

दान-सुभाषितावली


1. सर्वेषामप्यपुपायानां  दानं श्रेष्ठतमं मतम्।
सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित्।।

दान सभी उपयों में सर्वश्रेष्ठ हैं। यथोचित रीति से दान देने से मनुष्य दोनों लोकों को जीत लेता है।

2. यदैव जायते श्रद्धा पात्रं सम्प्राप्यते यदा।
स एव पुण्यकालः स्याद्यतः सम्पत्तिरस्थिरा।।

जब कभी भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाय और जब भी दान के लिए सुपात्र प्राप्त हो जाय, वही समय दान के लिए पुण्यकाल हैं, क्योंकि सम्पत्ति अस्थिर है।

3. गृहादर्था निवर्तन्ते श्मशानात्सर्वबान्धवाः।
शुभाशुभं कृतं कर्म गच्छन्तमनुगच्छति।।

धन-सम्पत्ति घर में ही छूट जाती हैं। सभी बन्धु-बान्धव श्मशान में छूट जाते हैं, किन्तु प्राणी के द्वारा किया हुआ शुभाशुभ कर्म परलोक में उसके पीछे-पीछे जाता हैं।

4. पितुः शतगुणं पुण्यं सहस्त्रं मातुरेव च।
भगिनी दशसाहस्त्रं सोदरे दत्तमक्षयम्।।

पिता के उद्धेश्य से किए गये दान से सौ गुना, माता के उद्धेश्य से किए गये दान से हजार गुना, बहन के उद्धेश्य से किए गये दान से दस हजार गुना और सहोदर भाई के निमित्त किये गये दान से अनन्त गुना पुण्य प्राप्त होता हैं।

5. न दानादधिकं किन्चित् दृश्यते भुवनत्रये।
दानेन प्राप्यते स्वर्गः श्रीर्दानेनैव लभ्यते।।

तीनों लोकों में दान से बढ़कर कुछ दिखाई नहीं देता। दान से दिव्य लोक की प्राप्ति होती हैं, लक्ष्मी दान के द्वारा ही प्राप्त होती है।

6. धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं परमं स्मृतम्।
दान को धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इस चतुवर्ग की प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन बताया गया हैं।

7. दानं कामफला वृक्षा दानं चिन्तामणिर्नृणाम्।
दानं पुत्रकलत्राद्यं दानं माता पिता तथा।।

दान अभिलाषित फल देने वाले वृक्षों के समान हैं, दान मनुष्यों के लिए चिन्तामणि के समान हैं अर्थातृ जिस वस्तु का चिन्तन किया जाय, वह (दान से) तत्काल सुलभ हो जाती हैं। दान पुत्र, स्त्री आदि हैं तथा दान ही माता-पिता हैं।

8. पापकर्मसमायुक्तं पतन्तं नरके नरम्।
त्रायते दानमेकं तु पात्रभूते द्विजे कृतम्।।

नरक में पड़े हुए पापी व्यक्ति को एकमात्र दान ही बचा सकता हैं, बशर्ते कि वह दान सत्पात्र ब्राह्मण को दिया गया हो।

9. न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम्।।
सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठयते।।

सभी शास्त्रों को पढ़कर यही देखा गया है। कि न्यायपूर्वक धन का अर्जन करना चाहिये, सत्प्रयत्न से उसकी वृद्धि करनी चाहिये और उसकी रक्षा भी इसीलिय करनी चाहिये ताकि सत्पात्र में उसका विनियोग किया जा सके। 

10. यस्य वित्तं न दानाय नोपभोगाय देहिनाम्।
नपि कीत्र्यै न धर्माय तस्य वित्तं निरर्थकम्।।

जिसका धन न तो दान में प्रयुक्त होता हैं, न लोगों के उपयोग में आता हैं, न यश के लिये होता हैं और न धर्मार्जन में विनियुक्त होता हैं, उसका धन निरर्थक हैं, निष्प्रयोजन हैं। 

11. गौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य सन्चयात्।
स्थितिरूच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः।।

गौरव की प्राप्ति दान से होती हैं, वित्त के संचय से नहीं। निरन्तर वर्षा आदि का दान करने से बादलों की स्थिति ऊपर होती हैं और जल का संग्रह करने वाले सागरों की स्थिति नीचे रहती है।

12. द्वारं द्वारमटन्तीह भिक्षुकाः पात्रपाणयः।
दर्शयन्त्येव लोकानामदातुः फलमीदृशम्।।

भिक्षा का पात्र हाथ में लिए हुए भिक्षुक लोग दरवाजे-दरवाजे घूमते हुए लोगों को यही दिखाते हैं कि दान न देने का ही यह फल है। यदि पहले दान दिया होता तो आज घर-घर भटकते हुए भीख न माँगनी पड़ती, अतः जिसे भीख न माँगनी हो, उसे दान अवश्य देना चाहिये। 

13. यथा वेदाः स्वधीताश्चयथा चेन्द्रियसंयमः।
सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम्।।

जैसे वेदों का स्वाध्याय, इन्द्रियों का संयम और सर्वस्व का त्याग उत्तम हैं, उसी प्रकार इस संसार में दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है।


साभार - कल्याण (दानमहिमा अंक-जनवरी 2011)

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

दान की महिमा

(पं0 श्री देवेन्द्र कुमार जी पाठक ‘अचल’)

दान ही को मान होत, दान ही महान होत,
दान ही से नम्रता, विनम्रता फरत हैं। 
दान से अभाव जात, वैरी दुर्भाव जात,
दान की सुबेलि ही से सुमन झरत है।।

दान ही से ज्ञान होत दान ही से ध्यान होत,
दान ही से द्वेष दम्भ जियत जरत है।
दान ही से हारे देव दान से विजय स्वमेव,
दान द्वारे भोर होत ध्वजा फहरत हैं।।1।।

राखी दान मरजाद डोम के बिकानो हाथ,
मृत पुत्र देख हरीचंद नहीं गीलो है।
कर्र कर्र चीरो अरकसिया चला के पुत्र,
मोरध्वज दृढ़, दान हित गर्वीलो है।।

साढे़ तीन पग भूमि बलि दियो बामन को,
शेष पै नपायो तन अलग हठीलो हैं।
दान-दानी मारग को कहाँ लौं बखान करौं,
सुनत में सूदो चलिबे मे पथरीलो हैं।।2।।

साभार - कल्याण (दानमहिमा अंक-जनवरी 2011)

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

दान तेरे अनेक रूप

कुछ ऐसे दान जिनके लिए किसी प्रकार का धन खर्च नहीं करना पड़ता, इस प्रकार के दानों का भी कम महत्व नहीं है। जैसे -

1. मधुर वचनों का दान - यदि कोई व्यक्ति कष्ट में हैं, तो उसे मधुर वचनों के द्वारा सान्तवना प्रदान की जा सकती हैं। कभी-कभी कठोर वचनों से आन्तरिक पीड़ा हो जाती हैं, परन्तु मधुर वचन सबको प्रिय लगते हैं। मधुर वचनों से स्वयं को भी प्रसन्नता मिलती हैं।

2. प्रेम का दान - वास्तविक प्रेम तो त्याग में समाहित हैं। जब हम दूसरों के प्रति प्रेम का भाव रखते हैं तो मौके पर उनके लिए त्याग हेतु तत्पर रहना पड़ता हैं। सबके प्रति प्रेम रखना एक प्रकार से परमात्म प्रभु के प्रति प्रेम करना हैं।

3. आश्वासन दान - किसी संकटग्रस्त व्यक्ति के जीवन में आश्वासन का बड़ा महत्व हैं। कभी-कभी लोग अपने जीवन से निराश होकर आत्महत्या तक करने को तैयार हो जाते है। ऐसी स्थिति में सहायता का आश्वासन देकर अथवा सत्प्रेरणा देकर हम उन्हें बचा सकते हैं। किसी की विपरीत परिस्थितियों में सहायता का आश्वासन देकर उसका मनोबल बढ़ाया जा सकता हैं।

4. आजीविका दान - जीवनयापन एवं परिवार पालन के लिए आजीविका की आवश्यकता होनी स्वाभाविक हैं। जो व्यक्ति किसी के लिए आजीविका की व्यवस्था कर देते हैं, उनके द्वारा प्रदत्त दान आजीविका दान हैं। 

5. छाया दान - छायादार एवं फलदार वृक्ष लगाकर राहगीरों को छायादान किया जा सकता हैं। 

6. श्रम दान - अपनी सामथ्र्य के अनुसार मौके पर दूसरों के लिए श्रमदान करने से स्वयं को आनन्द की अनुभूति होती हैं-यह आनन्द ही हमारी आध्यात्मिक उन्नति की अनुभूति का द्योतक हैं। कोई वृद्ध या अशक्त व्यक्ति अपना सामान नहीं उठा पा रहा हैं तो उसका सामान उठा दे-इस प्रकार के कितने ही छोटे-मोटे कार्य हैं, जो श्रमदान के अन्तर्गत आ सकते हैं। 

7. शरीर के अंगो का दान - कहा गया हैं-‘‘शरीरं व्याधिमन्दिरम्’। यह शरीर व्यादि (रोगों)- का मन्दिर हैं। मानव-शरीर कभी भी रोगों से ग्रस्त हो सकता हैं। आजकल कई असाध्य रोग हैं, जिनके कारण व्यक्ति मृत्यु शय्या पर आ जाता हैं, ऐसे समय में कभी-कभी उसे रक्त की आवश्यकता होती हैं। रक्त का कोई विकल्प नहीं होता और न यह कृत्रिम रूप से तैयार हो सकता हैं। मनुष्य को अपने जीवनकाल में रक्तदान जैसा महान् कार्य अवश्य करना चाहिए। इसी प्रकार गुर्दा, यकृत आदि का दान भी उत्तम कोटि का दान है।

8. समय दान - निःस्वार्थ भाव से किसी सेवाकार्य में अपने समय का विनियोग करना समयदान हैं। 

9. क्षमा दान - कोई शक्तिशाली एवं सामथ्र्य सम्पन्न व्यक्ति अपराध होने पर अपराधी को दण्ड न देकर क्षमा करे तो उसे क्षमादान कहते हैं। यह कोई सहनशील और उत्तम चरित्र का व्यक्ति ही कर सकता हैं। क्षमा ही धर्म हैं, क्षमा ही सत्य हैं और क्षमा ही दान, यश और स्वर्ग की सीढ़ी हैं। क्षमा का विरोधी भाव क्रोध हैं। यह दूसरे की कम अपनी अधिक हानि करता हैं। क्रोध पर विजयी होने पर ही क्षमा की प्रतिष्ठा होती हैं। 

10. सम्मान दान - किसी व्यक्ति को सम्मान देने से उसकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो जाती हैं। अतः दूसरों को सम्मान देने का स्वभाव बना लेना चाहिए। 
गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन दान।
तुलसी कहत पुकार के बड़ो दान सम्मान।।

11. विद्या दान - विद्या ही मनुष्य का सर्वोत्तम धन हैं। विद्या मूलतः दो प्रकार की होती हैं- पारलौकिकी और लौकिकी। पारलौकिकी विद्या अध्यात्म विद्या हैं। वस्तुतः विद्या वही हैं, जिससे मुक्ति (मोक्ष) मिले (सा विद्या या विमुक्तये)। लौकिकी विद्या का भी कम महत्व नहीं है। चैरादि से नहीं चुराये जाने से, कभी क्षय न होने से तथा सब पदार्थों से अनमोल होने से विद्या को ही सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ कहा गया हैं। विद्यादान अनेक प्रकार से किया जा सकता हैं। अध्यापन के द्वारा, पुस्तकदान द्वारा, छात्रवृति, आवास तथा अन्यान्य सामग्री देकर भी विद्यादान किया जा सकता हैं। विद्यालय-महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और शौध संस्थान की स्थापना करना भी विद्यादान का प्रमुख अंग है। 

12. पुण्य दान - किसी भी अपने स्वजन व्यक्ति की मृत्यु के समय या मृत्यु के बाद उसे सद्गति मिले, शान्ति मिले, उसका उद्धार हो-इस निमित्त दयावश, करूणावश अपपे पुण्य का दान किया जाता हैं। अपने जीवन के पुण्यवाहक कर्म-व्रत, तीर्थसेवा, सन्तसेवा, अन्नदान आदि के पुण्यफल को किसी के निमित्त संकल्प कर देना पुण्यदान हैं। 

13. जप दान - पुण्यदान का ही दूसरा रूप हैं जपदान। कई लोग अपने माता-पिता तथा अपनी सन्तान आदि की सुख-शान्ति एवं आरोग्यता के लिए जप करते है। यह भी एक प्रकार का अप्रत्यक्ष दान हैं। किसी दूसरे के भले के लिए जपदान करना एक महत्वपूर्ण कार्य हैं। इस निमित्त नाम-जप आदि भी किए जा सकते है। जिसका दोहरा लाभ हैं। ऐसे व्यक्ति परोपकारी एवं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। 

14. भक्ति दान - भगवद्भक्ति का मार्ग बताकर उसे पथ पर आरूढ़ करा देना भक्तिदान हैं। 

15. आशिष् दान - किसी साधु-सन्यासी, संत तथा कर्मनिष्ठ ब्राह्मण द्वारा अथवा सती-साध्वी, प्रौढ़ महिला द्वारा उन्हें प्रणाम, अभिवादन किये जाने पर वे जो आशीर्वाद प्रदान करते हैं, उसे आशिष् दान की संज्ञा दी जाती है।

कुछ ऐसे दान जो द्रव्य पर आधारित हैं, उनका भी महत्व कम नहीं है -

1. आश्रय दान - जो व्यक्ति सम्पन्न और उदार होते हैं, वे धर्मशालायें आदि बनवाकर यात्रियों के लिए रात्रिविश्राम का आश्रय देते है। कई अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम-जैसी संस्थायें निराश्रितों को आश्रय देती हैं। जहाँ भोजन, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओं को भी प्राप्त करने की सुविधा रहती हैं। इसके साथ ही किसी अभ्यागत, अतिथि को कुछ समय के लिए आश्रय देना भी पुण्यप्रद है। 

2. भूमि दान - सम्पत्तिशाली व्यक्ति किसी गरीब ब्राह्मण को अथवा अपने अधीनस्थ सेवक को भूमिदान करते हैं तथा मन्दिर, विद्यालय, धर्मशाला, गोशाला इत्यादि के लिए भूमिदान दिया जाता हैं। भूमिदान का बड़ा महत्व हैं। स्वतन्त्र भारत में संत विनोबा भावे ने गरीब भूमिहीनों के लिए बड़े लोगों से भूमि लेकर भूमिदान कराया था, जो भूदान-आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है। 

3. स्वर्ण दान - दान में स्वर्णदान की विशेष महिमा हैं। स्वर्णदान से ऐश्वर्य और आयु की वृद्धि शास्त्रों में बतायी गई है। किसी भी वस्तु के अभाव में उस वस्तु के निष्क्रय के रूप में स्वर्णदान करने की विधि है। 

4. कन्या दान - भारतीय संस्कृति में कन्यादान की बड़ी महिमा है। शास्त्रों में कन्या को लक्ष्मी स्वरूप मानकर विष्णुस्वरूप वर को प्रदान करने की विधि है। 

5. आरोग्य दान - बीमार व्यक्ति को चिकित्सा उपलब्ध कराना तथा गरीण असहाय व्यक्ति की औषध, फल, दूध से सहायता कर और उसके रोग के शमन की व्यवस्था कर उसे स्वस्थ कर देना-यह आरोग्यदान है। 

6. वस्त्र दान - शरीर की रक्षा के लिए वस्त्र की आवश्यकता होती है। कुछ निर्धन और असहाय व्यक्तियों के पास वस्त्र का अभाव होने पर उनकी शारीरिक रक्षा के लिए वस्त्र का दान महत्वपूर्ण है।। शीतकाल में कम्बल आदि ऊनी वस्त्रों का भी गरीब छात्रों, साधु-सन्तों, निर्धन, असहाय लोगों को दान दिया जाता हैं। 

7. ग्रह दान - मनुष्य के जीवन में ग्रहों की दशा बदलती रहती हैं। ग्रहदशा के अनुसार जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता की अनुभूति होती है। प्रायः प्रतिकूल परिस्थितियों में ग्रहशान्ति के निमित्त उस ग्रह से सम्बन्धित वस्तु का दान ब्राह्मण को करते हैं। 

8. तुला दान - यह जीवन का महत्वपूण दान हैं। प्राचीनकाल में तो राजा लोग स्वर्ण से अपना तुलादान करते थे। शास्त्रों में विभिन्न द्रव्यों से तुलादान करने की विधि लिखी हैं। 

9. पिण्ड दान - मुत्यु के बाद मृत प्राणी की सुख-शान्ति के लिए शास्त्रों में पिण्डदान की प्रक्रिया दी गई है। मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारी बेटे-पोतों को यह कर्तव्य होता हैं कि वे मृत्यु के उपरान्त शास्त्रानुसार पिण्डदान आदि की प्रक्रिया पूरी करें। गया आदि तीर्थों में भी पिण्डदान करने की विधि है। पितृऋण से मुक्त होने के लिए यह परम आवश्यक हैं। 

10. गो दान - शास्त्रों में गोदान की बड़ी महिमा है। प्राचीनकाल में तो गो को ही सर्वोपरि धन माना जाता था। लौकिक एवं पारलौकिक सभी प्रकार के फलों की प्राप्ति के लिए गोदान सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है।। अन्तिम समय में मृत्यु के पूर्व प्रायः गोदान करने का लोग प्रयास करते हैं। मृत्यु के उपरान्त श्राद्ध आदि में भी गोदान करने का विशेष महत्व है। इसके साथ ही जो गायें कसाई के हाथ में चली जाती हैं, उन्हें यदि कसाई से मुक्त कराकर उनकी सेवा-शुश्रूषा की जाय तो यह भी एक महत्वपूर्ण सत्कर्म हैं। 

साभार - कल्याण (दानमहिमा अंक-जनवरी 2011)

Maa-26

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