गुरुवार, 6 जनवरी 2011

दान

एक नगर में एक सेठ रहता था, गरीबों और असहायों के लिए उसके यहाँ सदावर्त बँटता रहता था। वह माँगने वालों की नीची दृष्टि से देता रहता था। एक दिन एक व्यक्ति ने उनसे नीची दृष्टि रखने का कारण पूछा तो उसने उत्तर दिया-‘‘देने वाला तो दूसरा हैं भाई ! वह दिन-रात देता हैं। मैं उसी की दी हुई संपत्ति दान करता हूँ, परंतु लोग मुझे ही दानी कहते हैं। इससे मुझे लज्जा आती हैं। ’’

निरहंकार भाव से किया गया दान ही सच्चा दान हैं। क्योंकि हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं हैं, जिसे हम अपना कह सकें। 

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