मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

अखण्ड ज्योति नवम्बर 1940


















अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1940



















अखण्ड ज्योति सितम्बर 1940





















अखण्ड ज्योति अगस्त 1940

















अखण्ड ज्योति जुलाई 1940




















अखण्ड ज्योति जून 1940


















अखण्ड ज्योति मई 1940


















अखण्ड ज्योति अप्रेल 1940

















अखण्ड ज्योति फरवरी 1940

अखण्ड ज्योति जनवरी 1940

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

The World Will Follow you.

1- Jb Apne MAA-BAAP Ko Koi CHIZ Do To Is Trh Do Jaise Koi GULAAM Apne AAQA K Samne Paish Krta H.
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2- If U Want To Gain Knowledge,
Add Something Everyday 2 Ur Mind.
But If U Want To Gain Wisdom, Remove ill thing Everyday
From Ur Mind. 
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3- If u Focus on Changing The World U Will B Just A Follower But If U Focus On Changing Yourself,The World Will Follow you. 
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4- If Everyone is Happy with u Den Surely u have Made many Compromise in ur Life.
If u r Happy wid Everyone den
Surly u have ignored many Faults of others. 
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5- Do all d best u can, By all d ways u can, In all d manners u can, In all d occasions u can, At all d opportunity u can. 
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6- "Working Towards Success Wil make you a Master Of It,
But Working Towards Satisfaction Makes u a Legend Of It"
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7- You will find the key to success under d alarm clock. 
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8- When U Want More Time To Take a Correct Decision..
Just Remember.,
''Even a Correct Decision Becomes Wrong When It Is Taken To Late.'' 
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9- Most of d People Refuse to Understand d Secret Code of Success, which is very Simple-
"Just TRY 1 More Time in a DIFFERENT Way." 
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10- MAA ka AanchaL
Dhup me BaDaL 

Maa Ki BaaHe
Neend Ki RaHe 

MAA Ka DamaN
Hansta SawaN 

MAA Ka GussA
Pyar Ka HissA 

MAa Ki DuA
JaNNat Ki Hawa. 
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11- 'A person who can explain d meaning of Colour to a BLIND That Person can explain anything in LIFE.' 
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12- Lots of things go unquestioned, lots of questions go unanswered. Few words go unsaid few go unheard,sum dreams r buried alive,we call it "LIFe" 
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13- Logo k liye aap tab tk achche ho Jb tk aap unki UMEDO ko Pura Karo.
Or
Sabhi Log jb tk achchhe h,  Jb tk aap unse koi UMEED Na Rakho. 
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14- Like all
Trust few
Follow none bt learn 4rm every1
Practice like a Devil & play like an angel
True saying always. 
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15- People may doubt what u say, but they will always belive what u do. 
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16- Parents don't expect much from us!
They expect dat d Loan of love which we borrowed from them in our childhood 2 be returned in their old hood! 
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17- 23 march 1931 Martyrs day Indian Freedom Fighters
-Bhagat Singh
-Raj Guru
-Sukhdev
Hanged to Death about 7 pm in Lahore.
Koti Koti Naman....... 
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18- Best Ever Quote At A Petrol Pump-
"Krpya yaha dhumrapan na kare.
Aapki zindagi ki koi keemat ho na ho,
PETROL ki keemat bahut hai
No Smoking Plz 
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19- Jivan ki Sachchi Haqikat-
"SHAK" karke Barbad Hone Se to "VISHWAS" karke Lut Jana Jyada Behtar Hai. 
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20- Never Wait For Ur Second Opportunity Because, It May Be Harder Than The First One.
-ABDUL KALAAM Sa 
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21- Jo aadmi aapke pas aakr dusro ki buri bat krta h.
ykin janiye dusro k pas baith kr aapki buri baat krta hoga. 
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22- Man to God:-Can i smoke while i pray?
God got ANGRY
Another man:-Can i pray while i smoke?
God AGREED
Response depends on how u propose. 
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23- Jindagi "BEHTAR" Hoti H Jb Aap khush Hote h, Lekin Jindgi OR "BEHTRIN" Hoti H Jb Dusre Log Aap ki Vajah Se khush Hote h. 
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24- Never 'TRY' or 'BEG' for support from others.
Stand 'ALONE' & Face d life as a RACE!
Then everyone will follow 'YOU'.

रविवार, 17 अप्रैल 2011

उपहार

भारतीय संस्कृति संदेशो से भरी हैं। कोई भी वार-त्योंहार हो अथवा फिर रंग या सम्बन्ध.....वह कोई ना कोई संदेश देता हैं। यह संदेश ही हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं और संस्कृति तथा सम्बन्धों को जिंदा रखते हैं। ऐसा ही सम्बन्ध गुरू और शिष्य का हैं। गुरू-शिष्य परम्परा में भी न धर्म बीच में आता हैं न जाति। ऐसे ही एक सम्बन्ध में गुरू-शिष्य भले अलग-अलग धर्म से रहे, लेकिन होली और दीपावली हो या फिर ईद, वे हमेशा एक-दूसरे के साथ होते। कभी भौतिक रूप से कभी भेंट के माध्यम से, वर्ष पर वर्ष निकलते गए, लेकिन सिलसिला जारी रहा। दीपावली पर गुरू ने शिष्य को आशीर्वचन का जो पत्र लिखा व सम्पूर्ण समाज के लिए एक संदेश हैं। गुरू ने लिखा-‘‘दीपावली का सुन्दर उपहार मिला-शुक्रिया। खुदा आप सब को खुश रखे-आमीन- गुलाब अब तो हमारा सन्यास आश्रम हैं कुछ भेजा करो तो पौधा भेज दिया करो। अब चीजों की सार-संभाल नहीं होती। फिर आप लोगो का प्यार और अपनापन हमारे लिए अमूल्य हैं। संबल हैं। शक्ति हैं। खुदा आप सबको बनाए रखे, आमीन’’।

यूं देखे तो पत्र में बात कुछ नहीं हैं पर बात बहुत बड़ी हैं। एक उम्र तक सब चीजे काम आती हैं लेकिन जब वो चीज काम नहीं आए फिर उसके संचय से क्या लाभ ? तब हमें ऐसी चीजों के बारे में सोचना चाहिए जो सबके, पीढि़यों के काम आए। इसमें पेड़-पौधे से ज्यादा उपयोगी कुछ नहीं है। त्योहार ही नहीं, जन्मदिन-वर्षगांठों पर भी हमें मानव जगत को ऐसी भी भेंट देनी चाहिए। 

ढपोर शंख

शिव का एक परम भक्त था। शिव की पूजा अर्चना करता था। एक दिन शिवजी प्रकट हो गए और एक शंख भक्त को दे दिया और कहा उससे जो मांगो वही मिलेगा। भक्त शिव की पूजा करना तो भूल गया। रोज सुबह शंख की पूजा करने लगा। जैसे तुम जब तक तुम्हारे पास धन नहीं था, तो तुम धर्म की पूजा करते थे, लेकिन जिस दिन से धन आया, तुम धर्म को भूल गए और धन के पीछे पड़ गए। वह भक्त का नहीं, कमबख्त का लक्षण हैं। उस गांव से एक फकीर गुजर रहा था। शायद मुल्ला नसरूद्धीन रहा होगा। मुल्ला नसरूद्धीन रात को उसी भक्त के घर ठहरा। रात में जब वे दोने बैठे तो फकीर ने कहा, ‘मुझे पता हैं तुम्हारे पास शंख हैं, चमत्कारी शंख, लेकिन मेरे पास भी एक शंख हैं। शंख नहीं, महाशंख है।। उससे जितना मांगो, उससे भी दुगुना देता हैं। हजार मांगो तो वह लाख देता हैं। ’

भक्त तो आश्चर्य मे पड़ गया। उसने सोचा यह तो कमाल है। उसने फकीर से कहा, ‘आप अपना शंख मुझे दे दें और यह शंख आप ले लें, बड़ी कृपा होगी।’

फकीर ने कहा, ‘कोई बात नहीं, यह लो।’ और फकीर ने अपना शंख भक्त को दे दिया और भक्त का ले लिया। फकीर तो रात को चलता बना।

सुबह भक्त ने शंख की पूजा अर्चना की और कहा, ‘मुझे एक लाख रूपये चाहिए। तो शंख बोला, ‘बस, एक लाख, दो लाख मांगा लों’ भक्त ने कहा, ‘अच्छा, दो लाख रूपये चाहिए।’ तों शंख बोला, ‘मंहगाई का जमाना हैं दो से काम नहीं चलेगा, चार लाख मांग लो।’

शंख बस कहता था, देता कुछ नहीं था। वह ढपोर शंख था। ढपोर शंख देता नहीं हैं। वासना भी ढपोर शंख हैं। जरा स्वयं सोचो, वासना ने तुम्हें अब तक क्या दिया ? प्रलोभन तो देती हैं, पर हकीकत में क्या दिया ? दिया तो कुछ नहीं और तुम्हारा जो था वह लूट लिया। तो महावीर स्वामी कहते हैं, ‘संसार से मुक्त होना है तो वासना से मुक्त होना आवश्यक हैं। वासना से मुक्त और साधना से युक्त जीवन ही मुक्ति का आनंद उठा पाता हैं तृप्ति भोग में नहीं, योग में हैं, समाधि में है।

-मुनि तरूण सागर

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बुद्धिमान

राजा सन्यासी के पास गया उसने उस सन्यासी की बहुत ख्याति सुनी थी। पास जाकर उसने वंदना की। उसने बहुत निकटता से देखा कि सन्यासी बहुत बड़ा तपस्वी हैं, तेजस्वी हैं। हाथ जोड़कर राजा बोला, ‘धन्य हैं आप। धन्य हैं आपका संयम और त्याग। धन्य हैं आपकी तपस्या। कितना बड़ा त्याग हैं आपका। घर छोड़ दिया, परिवार का त्याग कर दिया, सारी संपदा को ठोकर मार दी, कितना महान् त्याग ! राजा स्तुति करता रहा। 

सन्यासी बोला, ‘महाराज ! व्यर्थ ही स्तुति मत करो। त्यागी मैं हूं या तुम ? त्याग मेरा बड़ा हैं या तुम्हारा ? तुम्हारा त्याग बड़ा हैं।’ राजा आश्चर्य में पड़ गया। बोला, ‘महाराज मैं कैसा त्यागी ? इतने वैभव, इतनी संपदा और सुख को मैं भोग कर रहा हूं। निरंतर भोग में बैठा हूं । कहां हैं मेरा त्याग ? कैसा हैं मेरा त्याग ?

सन्यासी ने कहा, ‘ मैने जो कहा वह सच हैं। तुम्हारा त्याग मेरे त्याग से बड़ा हैं मेरे सामने मोक्ष का सुख हैं सबसे महान् सुख हैं। इस सुख की प्राप्ति के लिए मैंने थोड़ा-सा धन का सुख छोड़ा, परिवार और संपदा का सुख छोड़ा हैं। किन्तु तुम बड़े त्यागी हो। उस महान मोक्ष और परमात्मा के सुख को छोड़कर पदार्थ के सुख में फंसे हो। अब बताओ, बड़े सुख को तुमने छोड़ा हैं या मैने ? बताओ बड़े त्यागी तुम हो या मैं ? थोड़ा रूककर सन्यासी ने कहा, ‘छोटे सुख के लिए बड़ा त्याग बुद्धिमानी नहीं हैं। इसलिए मैं बुद्धिमान हूं। 

वास्तव में वही व्यक्ति बुद्धिमान होता हैं, जो थोड़े के लिए बहुत को नहीं छोड़ता। 

-आचार्य महाप्रज्ञ

स्वर्ग-नरक

किसी ने पूछा, ‘स्वर्ग और नरक क्या हैं ? मैंने कहा, ‘हम स्वयं’। एक बार किसी शिष्य ने अपने गुरू से पूछा, ‘मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे है ?’ गुरू ने कहा, ‘आंखे बंद करों और देखों।’ उसने आंाखे बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरू ने कहा, ‘अब स्वर्ग देखो।’ और थोड़ी ही देर बाद कहा ‘अब नरक’ जब उस शिष्य ने आंखे खोली थी, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थी। उसके गुरू ने पूछा, ‘क्या देखा ?’ वह बोला, ‘स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थी और न ही स्वर्ण के भवन थे, वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीडि़तों का रूदन। इसका कारण क्या हैं ? क्या मैने स्वर्ग नरक देखे या नही देखेे ?

यह सुनकर उसका गुरू हँसने लगा और बोला, ‘निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखे हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रूदन तुम्हे स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो चीज या वस्तु हम अपने साथ ले जाते हैं, वहीं वहां हमें उपलब्ध हो जाती है। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।’

व्यक्ति जो अपने अंतस में होता हैं, उसे ही अपने बाहर भी पाता हैं। जो बाह्य हैं, वह आंतरिक का ही प्रक्षेपण हैं। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग हैं और भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा हैं। जो उसे जान लेता हैं, वह मृत्यु में भी जीवन को पा जाता हैं। उसका न आदि हैं और न अन्त।

-ओशो

अभय

शरीर को ही जो स्वयं का होना मान लेता हैं, मृत्यु उसे ही भयभीत करती हैं। स्वयं में थोड़ा ही गहरा प्रवेश, उस भूमि पर खड़ा कर देता हैं, जहां कि कोई भी मृत्यु नहीं हैं। उस अमृत-भूमि को जानकर ही जीवन का ज्ञान होता हैं। एक बार ऐसा हुआ कि एक युवा सन्यासी के शरीर पर कोई राजकुमारी मोहित हो गई। सम्राट ने उस भिक्षु को राजकुमारी से विवाह करने को कहा। भिक्षु बोला, मैं तो हूं ही नहीं, विवाह कौन करेगा ?

सम्राट ने इसे अपमान मान उसे तलवार से मार डालने का आदेश दिया। वह सन्यासी बोला, ‘मेरे प्रिय, शरीर से आरंभ से ही मेरा कोई संबंध नहीं रहा है। आप भ्रम में हैं। आपकी तलवार जो पहले से ही अलग हैं, उन्हें और क्या अलग करेगी ? मैं तैयार हूं और आपकी तलवार मेरे तथाकथित सिर को उसी प्रकार काटने के लिए आमंत्रित हैं, जैसे यह बसंत वायु पेड़ों से उनके फूलों को गिरा रही हैं। 

सच ही उस समय बसंत था और वृक्षों से फूल झर रहे थे। सम्राट ने उन झरते फूलों को देखा और उस युवा भिक्षु के सम्मुख उपस्थित मृत्यु को जानते हुए भी उसकी आनंदित आँखों को देखा। उसने एक क्षण सोचा और कहा, ‘जो मृत्यु से भयभीत नहीं हैं और जो मृत्यु को भी जीवन की भांति ही स्वीकार करता हैं, उसे मारना व्यर्थ हैं। उसे तो मृत्यु भी नहीं मार सकती।’ वह जीवन नहीं हैं, जिसका कि अंत आ जाता हैं। जो उसे जीवन मान लेते हैं, वे जीवन को जान ही नहीं पाते। वे तो मृत्यु में ही जीते हैं और इसलिए मृत्यु की भीति उन्हें सताती हैं जीवन को जानने और उपलब्ध होने का लक्षण ‘‘मृत्यु से अभय’’ हैं। 

-ओशो

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

रहस्य

‘‘मैं जगत में हूं और जगत में नहीं भी हूं’’ -ऐसा जब कोई अनुभव कर पाता हैं, तभी जीवन का रहस्य उसे ज्ञात होता हैं। एक सन्यासी ने सुना कि देश का सम्राट परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया है। उस सन्यासी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्या यह संभव हैं कि जिसने कुछ भी नहीं त्यागा हैं, वह परमात्मा को पा सके ? वह सन्यासी राजधानी पहुंचा और राजा का अतिथि बना। उसने राजा को बहुमूल्य वस्त्र पहने देखा, स्वर्ण पात्रों में स्वादिष्ट भोजन करते देखा-रात्रि में संगीत और नृत्य का आनन्द लेते हुए भी। उसका संदेह अनंत होता जा रहा था। वह तो सर्वथा स्तब्ध ही हो गया था। सन्यासी संदेह और चिंता से सो भी नहीं सका। सुबह ही राजा ने नदी पर स्नान करने के लिए उसे आमंत्रित किया। राजा और सन्यासी नदी में उतरे। वे स्नान कर ही रहे थे कि अचानक उस शांत, निस्तब्ध वातावरण को एक तीव्र कोलाहल ने भर दिया। आग, आग, आग। नदी तट पर खड़ा राजमहल धू-धूकर जल रहा था और उसकी लपटें तेजी से घाट की ओर बढ़ रही थी। सन्यासी ने स्वयं को अपना कोपीन बचाने के लिए सीढि़यों की ओर भागते हुए पाया। लेकिन लौटकर देखा, तो पाया कि राजा जल में ही खड़े है और कह रहे हैं- ‘‘हे मुनि, यदि समस्त राज्य भी जल जाएं, तो भी मेरा कुछ भी नहीं जलता हैं।’

सम्राट थे जनक और मुनि थे शुकदेव।

लोग मुझसे पूछते हैं-योग क्या हैं ? मैं उनसे कहता हूं-अस्पर्श भाव। ऐसे जीओ कि जैसे तुम जहां हो, वहां नहीं हो। चेतना बाह्य से अस्पर्शित हो, तो स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

-ओशो

विनय

कठोरता तो सदा ही अल्पजीवी हुआ करती हैं और मृदुता को दीर्घ जीवन का वरदान मिला ही हैं। जो व्यक्ति नम्र नहीं होता, विनम्र नहीं होता उसे कोई भी पसन्द नहीं करता।

एक चीनी संत ने अंतिम समय अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, ‘तनिक मेरे मुंह में तो झांको और देखो कि कितने दांत शेष हैं ? प्रत्येक शिष्य ने देखा और कहा, ‘गुरूदेव, दांत तो कभी के टूट गए। मुख में तो एक भी दांत नहीं हैं।’ गुरू ने पूछा, ‘जिव्हा तो हैं ?’ शिष्यों ने कहा, हां।’ तब गुरू ने कहा, ‘दांत बाद में आए और पहले चले गए। जिव्हा जन्म से आई और मरने तक रही। आखिर ऐसा क्यों ? शिष्यों को मौन देखकर संत ने रहस्य खोलते हुए कहा, ‘कठोरता अल्पजीवी होती है।, दांत कठोर होते हैं, अतः जल्दी ही टूट जाते हैं। मृदुता दीर्घजीवी होती हैं। जिव्हा मृदु होती हैं, उसमें एक भी हड्डी नहीं होती इसलिए वह जीवन के अंतिम क्षणों तक बनी रहती हैं।’

हम भी मृदु बनें, विनम्र बनें। बुजुर्ग और गुरूजनों के सामने नम्रता से पेश आएं। दूसरों का सम्मान करना सीखें। विनयशील व्यक्ति जीवन में समस्त संपदाओं को सहज में ही प्राप्त कर लेता हैं। इसलिए कहा हैं कि विनय ही मोक्ष का द्वार हैं।(विणओ मोक्खं द्वार) विनय ही उन्नति का पहला सोपान हैं। विनय ही जीवन का धर्म हैं। विनयहीन दीन ही बना रहता हैं। परमात्मा की संपदा का एकमात्र अधिकारी विनयशील व्यक्ति हैं। विनय ही शून्य से पूर्ण होने की यात्रा हैं। विनयहीन व्यक्ति सदा रिक्त बना रहता हैं। 

-मुनि तरूणसागर

चापलूस

एक राजा था। वह हर समय चापलूसों से घिरा रहता था। एक दिन कुछ सियार चिल्ला रहे थे। राजा ने सभासदों से पूछा, ‘सियार क्यों रो रहे हैं ? चापलूसों ने कहा, महाराज ! यदि इनको कुछ खाने को दिया जाए, तो ये फिर नहीं रोएंगे।’ राजा ने कहा, ‘ इनके भोजन-पानी का प्रबन्ध कर दो।’ चापलूसों ने रूपये लिए, आपस में बांटा और अपने-अपने घर की ओर चले गए। दूसरे दिन देखा तो सियार फिर रो रहे थे। राजा ने पूछा, ‘अब क्यों रो रहे है ? चापलूसों ने कहा, राजन् ! अब ये कह रहे हैं कि कुछ ओढ़ने के लिए चाहिए।’ राजा ने कहा कि जाओ और उन्हें एक-एक कम्बल बांट दो। चापलूसों ने रूपये लिए और आपस में बांट कर रवाना हो गए। तीसरे दिन फिर गीदड़ चिल्ला रहे थे। चिल्लाना तो उनका गुणधर्म स्वभाव है। राजा ने पूछा, ‘अब किस वस्तु की आवश्यकता हैं इन्हें ? चाटुकारों ने कहा, ‘ये कह रहे हैं कि हमें रहने के लिए घर उपलब्ध कराए जाए।’ राजा ने कहा, ‘इनके रहने की व्यवस्था कर दो। चापलूसों ने फिर वैसा ही किया।’

शाम को देखा तो सियार फिर चिल्ला रहे है। राजा ने सुना और पूछा-अब क्या मांग हैं इनकी ? चापलूस बोले अन्नदाता ! अब इनकी सारी जरूरतों की पूर्ति कर दी हैं। अतः ये आपकी कीर्ति का बखान कर हरे है। महाराज ! ये आपके अत्यन्त कृतज्ञ हैं अतः आज से रोज शाम को आपकी जय मनाएंगे।, आपके गुण गाएंगे। राजा चापलूसों की बात सुनकर खुश हो गया। चापलूस तो खुश थे ही क्योंकि उन्हें अच्छी-खासी रकम जो मिल गई थी। 

-मुनि तरूणसागर

चरित्र

एक बहुत बड़े योगी संत थे आनन्दघन जी। एक बार एक प्रदेश के राजा-रानी आनन्दघन जी के पास आए। वे बोले, ‘गुरूवर ! और सब कुछ हैं, पर पुत्र नहीं हैं। पुत्र के बिना सम्पदा और वैभव का प्रयोजन ही क्या हो सकता हैं ? आनन्दघन जी बोले, ‘मैं क्या पुत्र दूंगा ? जाओ, और किसी से याचना करो।’ राजा-रानी ने बहुत आग्रह किया। आनन्दघन जी ने एक पन्ने पर कुछ लिखा और कहा, ‘रानी के बाएं हाथ पर बांध देना। मेरी एक शर्त मानना, सदा सदाचार का पालन करना। अहिंसा, सत्य का पालन करना। मनोकामना पूरी होगी। गरीबों का ध्यान रखना, अन्याय मत करना, शोषण और उत्पीड़न से बचना। न्याय करना।’

राजा-रानी ने सभी व्रतों का पालन प्रारम्भ कर दिया। राजा न्याय करने लगा। जनता को शोषण और उत्पीड़न से बचाया। आचरण का पक्ष उज्ज्वल हुआ। क्षमता बढ़ी। भावनाओं में शक्ति आई, संकल्प-शक्ति का विकास हुआ। संयोग की बात पुत्र की प्राप्ति हो गई। वे दोनों आनन्दघन जी के पास आकर बोले, ‘महाराज ! आपका मन्त्र सफल हुआ। हम आपके अत्यन्त आभारी हैं। आनन्दघन जी ने कहा, ‘रानी के हाथ पर बंधा हुआ लाओ। उसे पढ़ो। उसमें लिखा था-रानी को पुत्र हो, तो आनन्दघन जी को क्या ? पुत्र न हो तो आनन्दघन को क्या ? वह न कोई यन्त्र था और न मन्त्र।

जब व्यक्ति का चरित्र शुद्ध होता हैं, तब उसका संकल्प अपने आप फलित होता हैं। चरित्र की शुद्धि के आधार पर संकल्प की क्षमता जागती है। जिसका संकल्प-बल जाग जाता हैं, उसकी कोई भी कामना अधूरी नहीं रहती। 

-आचार्य महाप्रज्ञ

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