शनिवार, 7 अगस्त 2010

जीवन में 'कमाल' पैदा करना है? तो जीवन में कबीर को जाग्रत् करें

इसके लिए उनकी सराहना काफी नहीं, उनकी जीवन साधना अपनानी होगी 

[कबीर और युगऋषि में अभेद की बात नैष्ठिक परिजन भली प्रकार जानते है । कबीर जयंती (२६ जून) के संदर्भ में उन्हीं (युगऋषि) की प्रेरणा से उभरे कुछ भाव-सुमन उन्हीं के श्री चरणों में अर्पित हैं । इनकी सुगंध श्रद्धालु पाठकों, परिजनों के मन-मानस में भी उभरे, सारे वातावरण को सुवास से भर दे, ऐसी मंगल कामना सहित निवेदित ।] 

कबीर का कमाल 

सभी को पता है कि कबीर के पुत्र का नाम रखा गया 'कमाल' । इस शारीरिक संयोग के परे भी कबीर के जीवन में 'कमाल' ही होता रहा । कमाल से कम कुछ करने का जैसे उनका स्वभाव ही नहीं रहा ।

जो लोग जीवन के विकास के लिए परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना रोते रहते हैं, उनके लिए कबीर का जीवन संजीवनी बूटी से किसी प्रकार कम नहीं । माता-पिता का पता नहीं, हिन्दू-मुसलमान दोनों से उपेक्षित, कोई कहे म्लेच्छ-कोई कहे काफिर, लिखना-पढ़ना सीख नहीं सके, जुलाहे का छोटा समझा जाने वाला काम करके किसी प्रकार जीवन बिताया । लौकिक रूप से उनका जीवन प्रतिकूलताओं-विसंगतियों से भरा रहा । 

लेकिन वाह रे कबीर! उन प्रतिकूलताओं-विसंगतियों की कोई शिकायत नहीं । मालिक ने जो नहीं दिया, उसे महत्त्व नहीं दिया । मालिक द्वारा मनुष्य को दी गई अद्भुत संभावनाओं को देखा-समझा और साकार कर दिखाया । कुरूप और दुर्गंधयुक्त कीचड़ जैसी परिस्थितियों में वे कमल की तरह दिव्य सौन्दर्य और सुगंध लेकर विकसित हुए । 

उनकी आँखों को स्वार्थी समाज ने कागज पर लिखा ज्ञान पढ़ने की कला भले ही नहीं सिखाई, किंतु उन्होंने अन्तःचेतना के निदेर्शों के सहारे प्रकृति तथा जीवन के गूढ़-सनातन सत्यों-रहस्यों को पढ़ने-समझने में कमाल हासिल कर लिया । इसीलिए किताबी ज्ञान के सहारे उन्हें चुनौती देने वाले कथित पंडितों को उन्होंने बड़े सहज, प्रौढ़ और आत्मीयता भरे अंदाज में यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि 'तू कहता कागद के लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी ।' 

आजीविका के लिए हाथ से चलने वाले करघे पर कपड़ा बुनने से अधिक और कोई कौशल भले ही उन्हें नहीं सिखाया गया, किंतु उन्होंने कपड़े के ताने-बाने के सहारे जीवन के ताने-बाने का रहस्य जरूर समझ लिया । उन्होंने जीवन की चादर बुनने, इच्छित रंग में रंगने तथा उपयोग करते हुए भी उसे बेदाग रखने की अद्भुत महारत जरूर हासिल कर ली । सहज भाव से जीवन की चादर बुनने का मर्म 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' लिखकर बता गये । 

लोग कहते रहते हैं 'चादर' ओढ़ने से मैली तो होगी ही, लेकिन जीवन साधना के ममर्ज्ञ के रूप में उन्होंने सहज अभिव्यक्ति दी कि जीवन जीना एक कला है । जीवन की चादर को यदि सावधानीपूर्वक प्रयोग में लाया जाय, तो उसे बेदाग भी रखा जा सकता है । 'दास कबीर जतन तें ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया'- है न कमाल ? 

ऐसा व्यक्ति जिसने 'मसि कागज छुओ नहिं, कलम गही नहिं हाथ' लेकिन कविता में सहज बोधगम्य पदों से लेकर 'गूढ़तम उलटबासियों' तक उनकी काव्य क्षमता में कितने प्रकार के मनोरम रंग दिखाई देते हैं? 

सामाजिक कुरीतियों पर उनके प्रहारों से लेकर ब्रह्मज्ञान की गूढ़ताओं पर काव्यमय अभिव्यक्तियाँ अपने आप में अनोखी दिखाई देती हैं । उनके जीवन के किसी पन्ने को खोलो तो उसे पढ़-समझ कर यही भाव मन से निकलते हैं कि वाकई उन्होंने हर क्षेत्र में 'कमाल' पैदा किया । 

कहत कबीर सुनो भई साधो 

जीवन में कमाल हासिल करने की कामना सभी के मन में उभरती है । कबीर अपने कमाल पैदा करने के करिश्मे छिपाना नहीं चाहते, इसीलिए वे खुला आमंत्रण देते रहते हैं - 

कबीर ने जो पाया-समझा, उसे वे सबको हस्तांतरित करने को तैयार हैं, लेकिन उसके उपयोग की आवश्यक शर्ते भी अपनी सहज भाषा में स्पष्ट करते रहते हैं । कबीर जो कह रहे हैं उसे साधु स्वभाव के, सज्जनों द्वारा ही व्यवहार में लाया जा सकता है, छल-प्रपंच करने वाले असाधु स्वभाव वालों के लिए उनके जीवन सूत्र साध्य नहीं हैं । 

यह सनातन नियम है कि आदर्श सिद्धांतों को जीवन में धारण करने के लिए पात्रता बढ़ानी पड़ती है । संगीत के राग सभी को उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें गा वही सकता है, जिनका गले का स्तर शुद्ध है । प्रकृति के रहस्य उसी की आँखों के सामने खुलते हैं, जिसकी दृष्टि शुद्ध है । इसी तरह जीवन के उच्च आदर्शों का पालन वही कर सकता है, जिसका जीवन पवित्र, साधुतामय है । इसीलिए कबीर अपने जीवन सूत्रों को प्राप्त करने के लिए साधु स्वभाव वालों को प्रेरित करते हैं । 

उनके इस कथन का एक भाव और निकलता है । वे कहते हैं कि हमारी बात सुनो, लेकिन केवल सुनकर ही न रह जाओ, उसे जीवन में 'साधो' । जिन्हें उनके जीवन-सूत्रों का लाभ उठाना है, उनसे वे प्यार भरा आग्रह करते हैं कि कबीर अपने अनुभव बता सकता है, सो बता रहा है; अरे भाई! उसे सुनो भी और साधो भी । 

युगऋषि के रूप में भी उनका यही आग्रह रहा है कि हमारे जीवन सूत्रों की सराहना करो या न करो, साधना जरूर करो । 

यदि हमसे अनुराग है, तो हमारी प्रशंसा के राग अलापो या न अलापो, अनुगमन के प्रयास ईमानदारी से आत्म-समीक्षा पूर्वक करो । 

यदि कबीर के थोड़े से जीवन सूत्रों को समझकर जीवन में उतारा जाय तो आज के जीवन की चकाचौंध और भटकावों से बचकर उत्कृष्ट व्यक्तित्व और श्रेष्ठ समाज के लक्ष्यों को सहज ही पाया जा सकता है । 

कबीर का नाम स्मरण 

कबीर साहब ने प्रभु नाम स्मरण को बहुत महत्त्व दिया है । युगऋषि का कथन है कि ''मनुष्य महान है, किन्तु उससे भी महान है उसका सृजेता ।'' सृजेता का, उसके अनुशासन का स्मरण जिसे है वह लौकिक मायावी भटकावों से बच जाता है । सृजेता के अनुशासन में लौकिक जीवन को सफलतापूर्वक जीता हुआ पारलौकिक जीवन की परमगति की ओर वह बढ़ता रह सकता है । जप, पाठ आदि इसीलिए किए-कराये जाते हैं । अधिकांश लोग नाम स्मरण के उद्देश्य को भूलकर कर्मकाण्ड में उलझकर रह जाते हैं । कबीर कहते हैं- 

कर में तो माला फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं, 
मनुआ तो चहुँदिश फिरे, यह तो सुमरिन नाहिं॥ 

कबीर समझाने का प्रयास करते हैं कि मुख्य बात है प्रभु स्मरण । सुमिरन-स्मरण तो मन का विषय है । हाथ की माला और मुँह में जीभ का फिरना मन के स्मरण में सहायक तो हो सकता है, किन्तु मन से सुमिरन न हो, तो कमर्काण्ड काहे के लिए? 

उनका 'प्रभु स्मरण' नाम रूप के भेद से परे है । वे तो नाम स्मरण के माध्यम से मन को परम चेतना के स्पंदनों का अनुभव कराना चाहते हैं । इसी नाम-भेद से ऊपर उठकर परम तत्त्व के स्मरण की वे बात कहते हैं- 

हिन्दु कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमाना । 
आपस में दोऊ लड़ि-लड़ि मूए, मरम न कोई जाना॥ 

वे नाम-रूप से परे परमात्म तत्त्व का स्मरण कराना चाहते हैं । प्रभु स्मरण से, प्रभु उपासना से मन निर्मल होने लगता है । युगऋषि ने कहा कि जब साधक का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तो जैसे खिले हुए फूल के चारों ओर मधुमक्खियाँ मँडराने लगती हैं, वैसे ही दिव्य ईश्वरीय शक्तियाँ साधक की ओर आकषिर्त होने लगती हैं । कबीर उसे अपने ढंग से कहते हैं - 

कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर । 
पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर॥ 

नाम स्मरण, जप, उपासना के प्रभाव का कैसा सुन्दर-सटीक वर्णन किया है! उनका जप मुख-वाणी से शुरू तो होता है, पर वह अंतःकरण की गहराइयों में उतर जाता है । मुख-जीभ चले न चले, पर अंतःकरण से उभरा स्मरण साधक के रोम-रोम को पुलकित कर देता है । तब वे कहते हैं - मन मस्त हुआ तब क्यों बोले? इसीलिए उनकी सलाह है कि- 

कर का मनका डार दे, मनका मनका फेर । 

युगऋषि ने कहा है- साधक में स्नेह-स्मरण की तरंगें उठती हैं, तो आवाज की अनुगूँज की तरह ईश्वरीय स्नेह की तरंगों का उसे अनुभव होता है । उस स्थिति में पहुँचकर कबीर कहते हैं- 

कबीरा माला ना जपी, मुख से कह्यो न राम । 
सुमरन मेरा हरि करे, मैं पाऊँ विश्राम॥ 

यदि कबीर के सूत्रों के अनुसार जप-स्मरण साधना करें, तो उपासना में कमाल तो होगा ही । 

कबीर की प्रेम साधना 

ईश्वर प्रेम रूप है । वह तो प्रेम उडे़लता ही रहता है । जो उसके प्रेम को ग्रहण कर पाता है, वह दिव्य सम्पदा का अधिकारी बनकर प्रेम बाँटने लगता है । वह प्रेम जितना बाँटा जाता है, दिया जाता है, उतना ही बढ़ता जाता है । ऐसा प्रेम कहाँ से मिले? कबीर अपने बेबाक अंदाज में कहते हैं- 

प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय । 
राजा परजा जेहि रुचे, शीष देय लै जाय । 

यह बड़ी कठोर लगने वाली, परंतु बड़ी मनोरम और अनिर्वाय शर्त है । 'शीष देय' का अर्थ है अपना अहं, कत्तार्पन का अभिमान देना होगा । इससे कम में प्रेम सधता नहीं । वे प्रेम को समझना ही पाण्डित्य की, ज्ञान की साथर्कता मानते हैं । कहते हैं- 

पोथी पढि-पढि जग मुआ, पण्डित भया न कोय । 
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय । 

प्रेम के ढाई अक्षर का पहला अक्षर 'प' आधा है । दो अक्षर 'रे' और 'म' पूरे हैं । 'प' साधक की पहचान है । साधक का अस्तित्व है तभी तो प्रेम है, किन्तु अहं हो तो प्रेम कैसा होगा? इसलिए पहचान का पहला अक्षर प आधा है । अस्तित्व है-अहं नहीं । 

अगला अक्षर 'र' है । 'र' संस्कृत में प्रकाश का, चेतना का पयार्य है । र के साथ ए की मात्रा । यह र के विस्तार का भाव है । विस्तार वहाँ तक, जहाँ तक प्रकाश-चेतना के मायाकृत भेद समाप्त हो जायें-वह एक ही रह जाये । 

दूसरा अक्षर है 'म'- यह (अ+उ+म) या राम (र+आ+म) में विलय का प्रतीक है । अहंकार रहित अस्तित्व आधा प-रे के संयोग से स्वयं को चेतना का ही रूप मानें । उस भाव का विस्तार हो और वह परम चेतन के साथ एकरूप, विलय की स्थिति में पहुँचे, तब बने प्रेम ।

कबीर प्रभु स्मरण में प्रेम को मुख्य तत्त्व मानते हैं । सभी कर्मकाण्ड उसके सहयोगी भर है । साधना के विभिन्न आयामों का उन्होंने उल्लेख किया है । ध्यान में साधक मन को शून्य में स्थिर करने का प्रयास करते हैं । मन को विषय मुक्त बनाने का प्रयत्न करते हैं । कुछ साधक जप को अजपा जप, सहज जप में बदल लेते हैं । श्वास-प्रश्वास के साथ जप घुलने लगता है । कुछ साधक नादयोग की, अनहद नाद की साधना करके उसमें मन को लय करने का प्रयास करते हैं । 

कबीर के अनुसार यह सब साधन प्रभु के सान्निध्य में रस की अनुभूति के लिए हैं । ये सब रास्ते में ही रुक जाते हैं, अंत में तो केवल प्रेम-स्नेह ही रह जाता है । वे लिखते हैं- 

शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद ह मर जाय । 
राम सनेही ना मरे, कहै कबीर समझाय॥ 

उनके अनुसार यह ढाई अक्षर वाला 'प् रे म' या स्नेह ही अमृत तत्त्व है । यह ढाई अक्षर समझ में आ जाय, आभास में उतर जाय, तो कमाल तो होगा ही । 

कबीर की वैराग्य साधना 

कबीर गृहस्थ वैरागी हैं । सम्पन्नता में उन्हें हृदयहीनता का खतरा दिखता है । इसलिए वे गाते हैं 

'मन लागो मेरो यार फकीरी में ।' 

सम्पन्नता के क्रम में हृदयहीनता आई तो प्रेम साधना खण्डित होगी । यह खतरा वे मोल नहीं लेना चाहते हैं । फकीरी-गरीबी भली । 

युगऋषि ने भी कहा है- 'गरीबी हमारी शान है ।' 

लेकिन वे अव्यावहारिक सिद्धांतवादी अतिवादी नहीं हैं । धन-साधन की भी एक सीमा तक जरूरत स्वीकार करते हैं, किन्तु उसे मर्यादित रखने के लिए प्रभु से निवेदन करते हैं- 

साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय । 
मैं भी भूखा ना रहूँ, अतिथि न भूखा जाय॥ 

यह एक ऐसा अद्भुत सूत्र है, जिसका पालन समाज के हर वर्ग के व्यक्ति कर सकते हैं । संसारी को उतना तो चाहिए ही और इससे अधिक की जरूरत नहीं है । यह सूत्र समझ में आ जाये, तो वतर्मान समय में मनुष्य के लिए तमाम मुसीबतें पैदा करने वाली धन की अनगढ़ होड़ सहज ही समाप्त हो जाय । जितने धन साधन है, उन्हीं में सब स्नेह-सुख शांति के साथ रहने में समर्थ हो जाएँ ।

परिजनों में सुसंस्कार जगाएँ, यज्ञीयभाव से अनुप्राणित अन्न खायें-खिलायें ।

समस्या व्यक्ति निर्माण की 

उज्ज्वल भविष्य की कामना सभी करते हैं, किन्तु उसके लिए उज्ज्वल चरित्र सम्पन्न व्यक्ति चाहिए । जिनके मन-मस्तिष्क में हीन भाव और ओछे विचार भरे हैं, उनसे उज्ज्वल भविष्य के निर्माण की आशा कैसे की जा सकती है? अच्छे व्यक्ति सबको चाहिए, परन्तु उन्हें गढ़ा, खरादा कहाँ जाय? 

युगऋषि ने इस समस्या का समाधान दिया है । इसीलिए उन्होंने व्यक्ति निर्माण के साथ परिवार निर्माण की जरूरत बताई है । परिवार को उन्होंने व्यक्ति निर्माण की टकसाल, चरित्र निर्माण की प्रयोग शाला-व्यायामशाला तथा समाज निर्माण की सक्रिय, मजबूत इकाई कहा है । जो लोग युग निर्माण की ईश्वरीय योजना में सार्थक, सुनिश्चित, टिकाऊ योगदान करना चाहते हैं, उन्हें परिवारों को युगऋषि द्वारा बतलाई गई उक्त परिभाषाओं के अनुरूप बनाना चाहिए । 

सृजनकार्य कामनाओं के ख्वाब देखने से नहीं सधते, उसके लिए तो तप और कौशल का विकास और प्रयोग करना होता है । परिवार में ऐसा वातावरण बनाना होता है, जो जाने-अनजाने सभी के मन-अंतःकरण पर धीरे-धीरे अपना प्रभाव छोड़ता रहें । 

ऐसा वातावरण घर-परिवार में बनाने के लिए ऋषि ने पाँच सूत्र दिए हैं - १. पूजा स्थल पर नमन-वन्दन २. सामूहिक प्रार्थना का क्रम ३. पारिवारिक सत्संग ४. नित्य प्रणाम-अभिनन्दन का क्रम तथा ५. बलिवैश्व प्रक्रिया का पालन । 

इनके उद्देश्य और स्वरूप निम्नानुसार हैं - 

१. नमन-वन्दन - घर के किसी उपयुक्त स्थल पर पूजा का छोटा-बड़ा स्थान हो । वहाँ गायत्री माता का चित्र रहे अथवा परम्परागत पूजागृहों में कम से कम गायत्री महामंत्र की स्थापना हो । जो सदस्य नियमित उपासना करते हों, वे उपासना क्रम में गायत्री मंत्र का जप अवश्य करें । मंत्र जप अथवा इष्ट नाम जप के साथ भावना करें ''हे परमात्मा! हम सबको सद्बुद्धि दें, उज्ज्वल भविष्य के मार्ग पर आगे बढ़ाएँ ।'' परिवार के बाकी सदस्य अपने मुख्य कार्य पर जाने के पहले या भोजन के पहले वहाँ मस्तक झुकाकर अपने लिए और सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करके जायें । पू. गुरुदेव ने कहा है ''मनुष्य महान है, और उससे भी महान है उसका सृजेता ।'' उसके साथ भावभरा सम्पर्क बनाये रहने से व्यक्ति के अंदर महानता के बीज विकसित होने लगते हैं । 

२. सामूहिक प्रार्थना - अनुभवी संतों का मत है कि जो एक साथ प्रार्थना करते हैं, वे आपस में प्यार-सहकार पूर्वक साथ-साथ बने रहते हैं । हो सके तो रोज शाम को, नहीं तो कम से कम सप्ताह में एक बार साथ-साथ प्रार्थना, आरती, भजन करें । पाँच या एक दीपक जलाकर दीपयज्ञ के साथ यह क्रम सरसता एवं सरलता से चल जाता है । क्रम पूरा होने पर सब अपने से बड़ों को प्रणाम करें, बड़े छोटों को स्नेह-आशीष दें । 

३. पारिवारिक सत्संग -इसे भी नित्य या साप्ताहिक सत्संग के साथ जोड़ा जाना उपयोगी रहता है । स्थिति के अनुसार अलग से भी इसका क्रम चलाया जा सकता है । आजकल फिल्म, टीवी, विभिन्न घटनाक्रमों आदि से हीन विचारों का आक्रमण तो होता ही रहता है । उनसे बचने का उपाय यही है कि घर-परिवार में सत्संग, कथाओं, उदाहरणों के माध्यम से मन-मस्तिष्क में अच्छे विचारों, भावों का संचार किया जाता रहे । 

४. नित्य प्रणाम-अभिनन्दन -सबेरे उठकर अथवा स्नान या पूजा के बाद अपने से सभी बड़ों को झुककर प्रणाम करें । बड़े छोटों को स्नेह-आशीष देते हुए उनके द्वारा किए गये अच्छे कामों की सराहना करें या वैसी प्रेरणा दें । 

५. बलिवैश्वदेव प्रक्रिया -यह यज्ञ का ऐसा सुगम स्वरूप है, जिसे हर कोई सहजता से कर सकता है । इसी के साथ इसका महत्त्व असाधारण है! इसके अन्तर्गत पकाए गये भोजन का एक अंश यज्ञ भगवान को अर्पित करने के बाद ही भोजन किया/कराया जाता है! 

असाधारण महत्त्व 

एक प्रसिद्ध कहावत है 'जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन ।' अन्न के स्थूल गुणों से शरीर का पोषण होता है तथा उसके अन्दर सन्निहित सूक्ष्म भावों-संस्कारों के अनुरूप मन का विकास होता है । अन्न में यज्ञीय भावना और यज्ञीय प्रक्रिया से श्रेष्ठ मन बनाने योग्य संस्कार स्थापित किए जा सकते हैं । 

गीता ३/१० में कहा गया है-''प्रजापति ने यज्ञ और प्रजा को साथ-साथ रचा और प्रजा से कहा कि तुम यज्ञ की आराधना करो, यह तुम्हारी इष्ट अवश्यकताएँ पूरी करेगा ।'' स्पष्ट है कि प्रजा को अपने वाञ्छित विकास के लिए यज्ञ का सहारा लेना जरूरी है । 

परमार्थ, त्याग, सहकार युक्त श्रेष्ठ कर्म को यज्ञ कहते है । अन्न में यज्ञीय संस्कार होगा, तो उसे खाने वाले का मन श्रेष्ठ बनेगा । यदि यज्ञीय भाव की उपेक्षा की गई, तो भोजन में केवल अपने संकीर्ण स्वार्थ और सुख के हीन संस्कार बस जायेंगे । उससे विकसित मन कभी श्रेष्ठ कर्मों में रस नहीं लेता । 

गीताकार ने कहा है - 

यज्ञ से शेष बचे अन्न को खाने वाले सज्ज्ान सभी पाप कर्मों से मुक्त हो जाते हैं । जो केवल अपने लिए ही पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं । (गीता ३/१३३) 

इसीलिए पूज्य गुरुदेव ने वांङ्मय (२६/६.५) में लिखा है -''दैनिक उपासना में केवल गायत्री जप ही पर्याप्त नहीं है, अग्निहोत्र भी उसके साथ चलना चाहिए । यज्ञ करने में जन सामान्य को जो कठिनाइयाँ (समय, अधिक खर्च, संसाधन, कठिन विधान)आती हैं, इन सबका निवारण बलिवैश्व में हो जाता है । इस सर्वसुलभ प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए । 

सुगम विधि-विधान 

बलिवैश्व की महत्ता बहुत बड़ी है और विधि-विधान बहुत सुगम है । इसे घर में गृहणियाँ बड़ी सहजता से कर सकती हैं । प्रक्रिया इस प्रकार है - 

- इष्टदेव को भोग लगाने के भाव से सफाई एवं पवित्र भावना के साथ भोजन पकाया जाय । 

-पकाए हुए भोजन में से नमक, मिर्च-मसाले वाले पदार्थ छोड़कर, फीके या मीठे पदार्थों में से थोड़ा-सा अंश एक साफ तश्तरी में निकाल लें । उसमें थोड़ा-सा घी, शक्कर अथवा हवन सामग्री मिलाकर उसकी बड़े चने के आकार की ५ गोलियाँ बना लें । 

-यदि चूल्हे में ईंधन जलाकर भोजन बनाया गया है, तो उसमें से कुछ अंगारे किसी मिट्टी के सकोरे या धातु के चौड़े पात्र में रख लें । फिर नीचे लिखे क्रम से पाँच आहुतियाँ भावनापूर्वक दें । 

गायत्री मंत्र बोलकर स्वाहा के साथ पहली आहुति होमें तथा कहें-इदं ब्रह्मणे इदं न मम । दूसरी आहुति इसी प्रकार होमकर कहें-इदं देवेभ्यः इदं न मम । तीसरी आहुति के बाद कहें-इदं ऋषिभ्यः इदं न मम । चौथी आहुति के बाद कहें-इदं नरेभ्यः इदं न मम । पाँचवी आहुति के बाद कहें-इदम् भूतेभ्यः इदं न मम । 

पाँचों आहुतियों के बाद अग्नि के चारों और जल फेर कर हवन पात्र को एक ओर रख दें । अन्न भस्म हो जाने, अग्नि शांत हो जाने पर उस भस्म को तुलसी के गमले या किसी पवित्र स्थल पर वृक्ष की जड़ में डाल दें । 

यदि स्टोव पर या गैस के बर्नर पर भोजन पकाया जाता हो, तो भी यह आहुतियाँ सहजता से दी जा सकती हैं । लोहे की मजबूत जाली वाली छन्नी को लौ के ऊपर करके आहुतियाँ डाली जा सकती हैं । कोई धातु का कम गहरा पात्र सड़ासी से पकड़ कर लौ पर करे अथवा सब्जी चलाने के धातु के चमचे, जिसमें बघार आदि लगाए जाते हैं, उसे लौ पर रखकर आहुतियाँ दी जा सकती हैं । शान्तिकुंज में तांबे का एक ऐसा पात्र भी तैयार किया गया है, जिसे गैस पर रख कर उसमें आहुतियाँ समर्पित की जा सकती हैं । सभी प्रयोग करके देखे गये हैं और सफल हैं । अपनी सुविधानुसार किसी को भी अपनाया जा सकता है । 

पंच महायज्ञ 

बलिवैश्व की ५ आहुतियों को पंच महायज्ञ कहा गया है । यों तो किन्ही बहुत बड़े यज्ञों को महायज्ञ कहा जाता है, किन्तु इस छोटे से सुगम क्रम को महायज्ञ क्यों कहा गया? यह बात अजीब सी लगती है । ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ यज्ञीय कर्मकाण्ड के प्रतीक को नहीं, उसके पीछे के तत्त्वदर्शन को महत्व दिया गया है । 

उक्त पाँच आहुतियाँ क्रमशः ब्रह्म, देव, ऋषि, नर (मनुष्य) एवं भूत (लघु जीवों) के निमित्त दी गई हैं । इन्हें क्रमशः १ ब्रह्मयज्ञ, २. देवयज्ञ, ३. ऋषियज्ञ ४. नरयज्ञ तथा ५. भूतयज्ञ कहा गया है । इस प्रसंग में पूज्य गुरुदेव वांङ्मय क्र. २६/६.३ में लिखते हैं - 

पंच महायज्ञों में जिन ब्रह्म, देव, ऋषि आदि का उल्लेख है, उनके निमित्त आहुति देने का अर्थ इन्हें अदृश्य व्यक्ति मानकर भोजन कराना नहीं, वरन् यह है कि इन शब्दों के पीछे जिन देव वृत्तियों का, सत्प्रवृत्तियों का संकेत है, उनके अभिवर्धन के लिए अंशदान करने की तत्परता अपनाई जाय । 

१. ब्रह्मयज्ञ का अर्थ है ब्रह्मज्ञान-आत्मज्ञान की प्रेरणा । ईश्वर और जीव के बीच चलने वाला पारस्परिक आदान-प्रदान । 

२. देवयज्ञ का उद्देश्य है-पशु से मनुष्य तक पहुँचाने वाले प्रगतिक्रम को आगे बढ़ाना । देवत्व के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का विकास-विस्तार । पवित्रता और उदारता का अधिकाधिक संवर्धन । 

३. ऋषियज्ञ का तात्पर्य है-पिछड़ों को अपने में संलग्न करुणार्द्र जीवन-नीति, सदाशयता संवर्धन की तपश्चर्या । मानवी गरिमा के अनुरूप वातावरण एवं समाज व्यवस्था का निर्माण । मानवी गरिमा का संरक्षण । नीति और व्यवस्था का परिपालन, नर में नारायण का उत्पादन । विश्वमानव का श्रेय साधन । 

५. भूतयज्ञ की भावना है-प्राणिमात्र तक आत्मीयता का विस्तार । अन्यान्य जीवधारियों के प्रति सद्भावना पूर्ण व्यवहार । वृक्ष-वनस्पतियों तक के विकास का प्रयास । 

इन पाँचों प्रवृत्तियों में व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति पवित्रता और सुव्यवस्था के सिद्धांत जुड़े हुए हैं । उन्हें उदात्त जीवन नीति के सूत्र कह सकते हें । जीवनचर्या और समाज व्यवस्था में इन सिद्धांतों का जिस अनुपात में समावेश होता जाएगा, उसी क्रम से सुखद परिस्थितियों का निर्माण निर्धारित होता चला जाएगा । बीज छोटा होता है, किन्तु उसका फलितार्थ विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है । चिनगारी छोटी होती है, अनुकूल अवसर मिलने पर वही दावानल का रूप धारण कर लेती है । गणित के सूत्र छोटे होते हैं, पर उनसे जटिलताएँ सरल होती चली जाती हैं । अणु-जीवाणु-शुक्राणु तनिक से होते हैं, पर जब भी उन्हें अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिलता है, चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं । 

मोटी दृष्टि से देखने में बलिवैश्व यज्ञ का बहुत अधिक महत्त्व दिखाई नहीं देता । उसे करने में न कोई बड़ा लाभ होता है और न करने पर किसी हानि की संभावना दिखाई नहीं पड़ती । पर यदि बारीकी से देखा जाय, तो प्रतीक तुच्छ होते हुए भी उसके पीछे काम करने वाली प्रेरणा अति महान है । प्रश्न आस्था की प्रतिष्ठापना का है । धर्मकृत्य तो उसके प्रतीक भर होते हैं । इसलिए उसका नाम भी प्रतीक पूजा ही है । प्रतीक अर्थात् प्रतिनिधि देवताओं की आकृतियाँ एवं प्रतिमाएँ आँख से देखने पर कौतुक-कौतूहल जैसी लगती हैं, पर उनके पीछे श्रद्धा को बढ़ाने और जगाने वाले जो तत्व जुड़े हुए हैं, उन्हीं को शास्त्रकारों ने प्राण-प्रतिष्ठा कहा है । प्राण-प्रतिष्ठा न होने से प्रतिमाएँ खिलौना भर रह जाती हैं । देवत्व तो श्रद्धा में ही सन्निहित है । बलिवैश्व को देव प्रतिमा और उसके क्रिया कृत्य को देवाराधन माना जाय, तो निश्चित ही उससे वही उद्देश्य पूरा होगा, जो विशालकाय धर्मानुष्ठानों होता है । 

वर्तमान युग में आस्था संकट ही समस्त विपत्तियों का तात्विक कारण है । अनास्था ने ही उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की मान्यताओं और परम्पराओं को उलट दिया है, फलतः मनुष्य जाति के सामने अगणित विभीषिकाएँ उठ खड़ी हुई हैं । उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए आस्था संकट से जूझना ही प्रमुख कार्य है । उसी दिशा में एक रचनात्मक कदम बलिवैश्व परम्परा का पुनर्जीवन है ।

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

ये तो सच है के भगवान है


ये तो सच है के भगवान है है मगर फिर भी अन्जान है
धरती पे रूप माँ बाप का उस विधाता की पहचान है
ये तो सच है के ...

जन्मदाता हैं जो नाम जिनसे मिला
थामकर जिनकी उंगली है बचपन चला
ओ कांधे पर बैठके जिनके देखा जहां
ज्ञान जिनसे मिला क्या बुरा क्या भला
इतने उपकार हैं क्या कहें ये बताना न आसान है
धरती पे रूप ...

जन्म देती है जो माँ जिसे जग कहे
अपनी संतान में प्राण जिसके रहें
ओ लोरियां होंठों पर सपने बुनती नज़र
नींद जो वार दे हँस के हर दुख सहे
ममता के रूप में है प्रभू आपसे पाया वरदान है
धरती पे रूप ...

आपके ख्वाब हम आज होकर जवां
उस परम शक्ति से करते हैं प्रार्थना
ओ इनकी छाया रहे रहती दुनिया तलक
एक पल रह सकें हम न जिनके बिना
आप दोनों सलामत रहें सबके दिल में ये अरमान है
धरती पे रूप ...
आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

बच्चे मन के सच्चे

बच्चे मन के सच्चे 
सारी जग के आँख के तारे
ये वो नन्हे फूल हैं जो 
भगवान को लगते प्यारे 

खुद रूठे, खुद मन जाये, फिर हमजोली बन जाये 
झगड़ा जिसके साथ करें, अगले ही पल फिर बात करें 
इनकी किसी से बैर नहीं, इनके लिये कोई ग़ैर नहीं 
इनका भोलापन मिलता है, सबको बाँह पसारे 
बच्चे मन के सच्चे ... 

इन्ससान जब तक बच्चा है, तब तक समझ का कच्चा है 
ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ क मैल चढ़े 
क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे 
बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे
 बच्चे मन के सच्चे ... 

तन कोमल मन सुन्दर हैं बच्चे बड़ों से बेहतर 
इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं 
भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं 
इनकी नज़रों में एक हैं, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे 
बच्चे मन के सच्चे ... 

'मैं' की मृत्यु

एक संन्यासी ने मुझ से कहा, 'मैं प्रभु के लिए सब छोड़ आया हूं और अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।'

मैं देखता हूं कि सच ही उनके पास कुछ भी नहीं है, पर उनसे कहता हूं कि वह जो छोड़ना था- और वही अकेला था, जो कि छोड़ा जा सकता था- वह अब भी उनके पास है!

वे अपने चारों ओर देखते हैं। सच ही उनके पास कुछ नहीं है, जो है, उनके भीतर है। वह उनकी आंखों में है। वह उनके त्याग में है। वह उनके संन्यास में है। वह 'मैं' है। उसे छोड़ना ही अकेला छोड़ना है। क्योंकि शेष सब छीना जा सकता है और अंतत: मृत्यु सब छीन ही लेती है। 'मैं' को कोई नहीं छीन सकता, उसे तो केवल छोड़ा ही जा सकता है, उसका त्याग ही केवल त्याग है।

इसलिए प्रभु को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ और घनीभूत हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी प्रभु को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।

'मैं' एकमात्र अपरिग्रह है। 'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है, वही अपरिग्रही है, वही संन्यासी है।

'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।

'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं' नहीं वरन् सर्व का 'मैं' है।

सिमोन वेल का कथन मुझे बहुत प्रिय है, जिसमें उसने कहा है कि प्रभु के अतिरिक्त किसी को भी 'मैं' कहने का कोई अधिकार नहीं है।'

सच ही 'मैं' कहने का अधिकार केवल उसे ही है, जो कि समस्त सत्ता का केंद्र है। पर उसे 'मैं' कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके लिए सब 'मैं' ही है। जिसे अधिकार है, उसे कहने का कारण नहीं है, और जिसे कहने का कारण है, उसे कोई अधिकार नहीं है।

पर मनुष्य अपने अनाधिकार को खोकर, अधिकार को पा सकता है। वह 'मैं' होना छोड़ कर 'मैं' हो सकता है। वह अपने केंद्र के आभास को छोड़कर, सत्य केंद्र को पा सकता है। वह जिस क्षण अपने केंद्र को विकेंद्रित कर देता है, उसी क्षण केंद्र को उपलब्ध हो जाता है।

मनुष्य का 'मैं' सत्य नहीं है। वह संघात है। उसकी कोई सत्ता नहीं है। वह संग्रह है। इस संग्रह से सत्य का जो भ्रम पैदा होता है, वही अज्ञान है। पर जो इस संग्रह में झांकता है, देखता है और सत्य को खोजता है, उसके समक्ष आभास टूट जाता है। और 'मैं' की माला के फूल बिखर जाते हैं। और तब वह सूत्र उपलब्ध होता है, जो कि सत्य है और जिस पर कि 'मैं' के फूल टंगे थे और जिसे कि उन फूलों ने ढांक लिया था।

फूलों के हटाने पर- उनके आच्छादन के टूटने पर पाया जाता है कि जो उनका आधार था, वह मेरा ही नहीं है, वह मुझ में और सब में भी है। वह समस्त सत्ता में पिरोया हुआ है।

जो 'मैं' की इस मृत्यु से नहीं गुजरता है, वह परमात्मा के जीवन से वंचित रह जाता है। 'मैं' की मृत्यु - परमात्मा से, सत्य से, सत्ता से, हमारे भेद और अंतर की मृत्यु है। उसके गिरते ही वह फासला गिर जाता है, जो कि हमें स्वयं हमसे ही तोड़े हुए था। और वह व्यक्ति धन्यभागी है, जो शरीर की मृत्यु के पूर्व इस मृत्यु को उपलब्ध होता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

कौन अमीर और कौन गरीब?

एक बहुत धनी व्यक्ति अपने छोटे से लड़के को एक बार गाँव दिखाने ले गया ताकि उसका बेटा जान सके कि गरीब लोग कैसे रहते हैं. उन्होंने शहर से कुछ दूर अपने फार्म हाउस में दो दिन बिताये. फार्म हाउस के सामने ही एक गरीब परिवार रहता था. यात्रा से वापस लौटते समय पिता ने अपने पुत्र से पूछा – “बेटा, यात्रा कैसी रही?”

“बहुत अच्छी, पापा” – बेटे ने कहा.

“तो तुमने देखा कि गरीब लोग कैसे रहते हैं?”

“हाँ”.

“तो तुमने यात्रा से क्या सीखा?”

बेटे ने जवाब दिया – 
“मैंने देखा कि हमारे पास तो एक ही कुत्ता है जबकि उनके पास चार हैं. हमारा स्वीमिंग पूल तो बहुत छोटा है लेकिन वे बहुत बड़ी नहर में नहाते हैं. हमारे बगीचे में मंहगे लालटेन लगे हैं जबकि वे तारों भरे आकाश को देख सकते हैं. हमारे घर से तो दूर तक नहीं दिखता जबकि वे दूर-दूर की पहाडियां और घाटियाँ देख सकते हैं. हमारे नौकर हमारी देखभाल करते हैं लेकिन वे सभी का ख़याल रखते हैं. हम अपना खाना खरीदते हैं लेकिन वे अपना खाना खुद उगाते हैं. हमारे घर की रक्षा के लिए चारदीवारी है लेकिन उनके दोस्त उनकी रक्षा करते हैं”.

लड़के का पिता निरुत्तर हो गया.

मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी का नाम

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन और उसका एक दोस्त साथ में टहलते हुए अपनी-अपनी बीवी के बारे में बातचीत कर रहे थे. मुल्ला के दोस्त का ध्यान इस बात की और गया कि मुल्ला ने कभी भी अपनी बीवी का नाम नहीं लिया.

“तुम्हारी बीवी का नाम क्या है, मुल्ला?” – दोस्त ने पूछा.

“मुझे उसका नाम नहीं मालूम” – मुल्ला ने कहा.

“क्या!?” – दोस्त अचम्भे से बोला – “तुम्हारी शादी को कितने साल हो गए?”

“अट्ठाईस साल” – मुल्ला ने जवाब दिया, फिर कहा – “मुझे शुरुआत से ही ये लगता रहा कि हमारी शादी ज्यादा नहीं टिकेगी इसलिए मैंने उसका नाम जानने की कभी ज़हमत नहीं उठाई”.

बहुत से रिश्ते पूरी जिंदगी साथ चलते हैं लेकिन एक दूसरे को समझ नहीं पाते … 

और रिश्ते को खींचते चले जाते हैं ….

परंपरा

कई लोगों की भीड़ में मुल्ला नसरुद्दीन नमाज़ अदा करने के दौरान आगे झुका. उस दिन उसने कुछ ऊंचा कुरता पहना हुआ था. आगे झुकने पर उसका कुरता ऊपर चढ़ गया और उसकी कमर का निचला हिस्सा झलकने लगा.

मुल्ला के पीछे बैठे आदमी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने मुल्ला के कुरते को थोड़ा नीचे खींच दिया.

मुल्ला ने फ़ौरन अपने आगे बैठे आदमी का कुरता नीचे खींच दिया.

आगेवाले आदमी ने पलटकर मुल्ला से हैरत से पूछा – “ये क्या करते हो मुल्ला?”

“मुझसे नहीं, पीछेवालों से पूछो” – मुल्ला ने कहा – “शुरुआत वहां से हुई है”.

किसी परंपरा को बिना सोचे समझे ढोने वालों के लिए 

शुरुआत कहीं से हुई हो … 

बुद्धिमत्ता तो उसकी विवेकशील परिणति मे ही है

निराला का दान

एक बार निराला को उनके एक प्रकाशक ने उनकी किताब की रायल्टी के एक हज़ार रुपये दिए। ध्यान दें, उन दिनों जब मशहूर फिल्मी सितारे भी दिहाडी पर काम किया करते थे, एक हज़ार रुपये बहुत बड़ी रकम थी। रुपयों की थैली लेकर निराला इक्के में बैठे हुए इलाहाबाद की एक सड़क से गुज़र रहे थे। राह में उनकी नज़र सड़क किनारे बैठी एक बूढी भिखारन पर पड़ी। ढलती उमर में भी बेचारी हाथ फैलाये भीख मांग रही थी। निराला ने इक्केवाले से रुकने को कहा और भिखारन के पास गए।

“अम्मा, आज कितनी भीख मिली?” – निराला ने पूछा।

“सुबह से कुछ नहीं मिला, बेटा”।

इस उत्तर को सुनकर निराला सोच में पड़ गए। बेटे के रहते माँ भला भीख कैसे मांग सकती है?

बूढी भिखारन के हाथ में एक रुपया रखते हुए निराला बोले – “माँ, अब कितने दिन भीख नहीं मांगोगी?”

“तीन दिन बेटा”।

“दस रुपये दे दूँ तो?”

“बीस दिन, बेटा”।

“सौ रुपये दे दूँ तो?

“छः महीने भीख नहीं मांगूंगी, बेटा”।

तपती दुपहरी में सड़क किनारे बैठी माँ मांगती रही और बेटा देता रहा। इक्केवाला समझ नहीं पा रहा था की आख़िर हो क्या रहा है! बेटे की थैली हलकी होती जा रही थी और माँ के भीख न मांगने की अवधि बढती जा रही थी। जब निराला ने रुपयों की आखिरी ढेरी बुढ़िया की झोली में उडेल दी तो बुढ़िया ख़ुशी से चीख पड़ी – 

“अब कभी भीख नहीं मांगूंगी बेटा, कभी नहीं!”

निराला ने संतोष की साँस ली, बुढ़िया के चरण छुए और इक्के में बैठकर घर को चले गए।

क्या यह बुढ़िया को दिया गया दान था या एक बेटे का अपनी दुखियारी माँ के कष्टों का निरूपण, या कुछ और?

प्रेमचंद का कोट

हिंदी के महानतम कथाकार प्रेमचंद का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. उनके पास एक पुराना कोट था जो फट गया था लेकिन वे उसी को पहने रहते थे.

उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने कई बार उनसे नया कोट बनवाने के लिए कहा लेकिन प्रेमचंद ने हर बार पैसों की कमी बताकर बात टाल दी. एक दिन शिवरानी देवी ने उन्हें कुछ रुपये निकालकर दिए और कहा – “बाजा़र जाकर कोट के लिए अच्छा कपड़ा ले आइये.”

प्रेमचंद ने रुपये ले लिए और कहा – “ठीक है. आज कोट का कपड़ा आ जाएगा.”

शाम को उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर शिवरानी देवी ने पूछा – “कोट का कपड़ा क्यों नहीं लाए?”

प्रेमचंद कुछ क्षणों के लिए चुप रहे, फिर बोले – “मैं कपड़ा लेने के लिए निकला ही था कि प्रैस का एक कर्मचारी आ गया. उसकी लड़की की शादी के लिए पैसों की कमी पड़ गई थी. उसने मुझे वह सब इतनी लाचारी और उदासी से बताया कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कोट के रुपये उसे दे दिए. कोट तो फिर कभी बन सकता है लेकिन लड़की की शादी नहीं टल सकती.”

शिवरानी देवी मन मसोस कर धीरे से बोलीं – “वो नहीं तो तुम्हें कोई और मिल जाता. मैं पहले ही जानती थी कि तुम्हारे हाथों में पैसे देकर कोट कभी नहीं आ सकता.”

प्रेमचंद के चेहरे पर संतोष की मुस्कान खिली हुई थी.

यूनान का विख्यात दार्शनिक सुकरात

सुकरात को सूफियों की भाँति मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। वस्तुत: उसके समसामयिक भी उसे सूफी समझते थे। सूफियों की भाँति साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, 

"सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।'

बुद्ध की भाँति सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं; किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुक्रात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपर्वाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह अथेन्स के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुक्रात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद।

तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उसपर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था।

सुकरात ने जहर का प्याला खुशी-खुशी पिया और जान दे दी। उसे कारागार से भाग जाने का आग्रह उसे शिष्यों तथा स्नेहियों ने किया किंतु उसने कहा-

भाइयो, तुम्हारे इस प्रस्ताव का मैं आदर करता हूँ कि मैं यहाँ से भाग जाऊँ। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और प्राण के प्रति मोह होता है। भला प्राण देना कौन चाहता है? किंतु यह उन साधारण लोगों के लिए है जो लोग इस नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानते हैं। आत्मा अमर है फिर इस शरीर से क्या डरना? हमारे शरीर में जो निवास करता है क्या उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता है? आत्मा ऐसे शरीर को बार बार धारण करती है अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था-विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस् के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें। हमें यह बात मानकर ही आगे बढ़ना है कि शरीर नश्वर है। अच्छा है, नश्वर शरीर अपनी सीमा समाप्त कर चुका। टहलते-टहलते थक चुका हूँ। अब संसार रूपी रात्रि में लेटकर आराम कर रहा हूँ। सोने के बाद मेरे ऊपर चादर उड़ देना।

बच्चे मन के सच्चे

फ़्रायड एक बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ। अपनी पत्नी और अपने बच्चे के साथ एक दिन बगीचे में घूमने गया था। जब सांझ को वापस लौटने लगा, अंधेरा घिर गया, तो देखा दोनों ने कि बच्चा कहीं नदारद है। फ़्रायड की पत्नी घबड़ाई,उसने कहा कि बच्चा तो साथ नहीं है, कहां गया? बड़ा बगीचा था मीलों लंबा, अब रात को उसे कहां खोजेंगे? 

फ़्रायड ने क्या कहा? 

उसने कहा, तुमने उसे कहीं जाने को वर्जित तो नहीं किया था? कहीं जाने को मना तो नहीं किया था? 

उसकी स्त्री ने कहा, हां, मैंने मना किया था, फव्वारे पर मत जाना! 

तो उसने कहा, सबसे पहले फव्वारे पर चल कर देख लें। सौ में निन्यानबे मौके तो ये हैं कि वह वहीं मिल जाए, एक ही मौका है कि कहीं और हो। 

उसकी पत्नी चुप रही। जाकर देखा, वह फव्वारे पर पैर लटकाए हुए बैठा हुआ था। उसकी पत्नी ने पूछा कि यह आपने कैसे जाना?

उसने कहा, यह तो सीधा गणित है। मां-बाप जिन बातों की तरफ जाने से रोकते हैं, वे बातें आकर्षक हो जाती हैं। बच्चा उन बातों को जानने के लिए उत्सुकता से भर जाता है कि जाने। जिन बातों की तरफ मां-बाप ले जाना चाहते हैं, बच्चे की उत्सुकता समाप्त हो जाती है, उसका अहंकार जग जाता है, वह रुकावट डालता है, वह जाना नहीं चाहता। आप यह बात जान कर हैरान होंगी कि इस तथ्य ने आज तक मनुष्य के समाज को जितना नुकसान पहुंचाया है,किसी और ने नहीं। क्योंकि मां-बाप अच्छी बातों की तरफ ले जाना चाहते हैं, बच्चे का अहंकार अच्छी बातों के विरोध में हो जाता है। मां-बाप बुरी बातों से रोकते हैं, बच्चे की जिज्ञासा बुरी बातों की तरफ बढ़ जाती है। मां-बाप इस भांति अपने ही हाथों अपने बच्चों के शत्रु सिद्ध होते हैं।

इसलिए शायद कभी आपको यह खयाल न आया हो कि बहुत अच्छे घरों में बहुत अच्छे बच्चे पैदा नहीं होते। कभी नहीं होते। बहुत बड़े-बड़े लोगों के बच्चे तो बहुत निकम्मे साबित होते हैं। गांधी जैसे बड़े व्यक्ति का एक लड़का शराब पीया, मांस खाया, धर्म परिवर्तित किया। आश्चर्यजनक है! क्या हुआ यह? गांधी ने बहुत कोशिश की उसको अच्छा बनाने की, वह कोशिश दुश्मन बन गई।

तो एक बात तो यह समझ लें कि जिसको भी परिवर्तित करने का खयाल उठे, पहले तो स्वयं का जीवन उस दिशा में परिवर्तित हो जाना चाहिए। तो आपके जीवन की छाया, आपके जीवन का प्रभाव, बहुत अनजान रूप से बच्चे को प्रभावित करता है। आपकी बातें नहीं, आपके उपदेश नहीं। आपके जीवन की छाया बच्चे को परोक्ष रूप से प्रभावित करती है और उसके जीवन में परिवर्तन की बुनियाद बन जाती है।

और दूसरी बात, बच्चे को कभी भी दबाव डाल कर, आग्रह करके किसी अच्छी दिशा में ले जाने की कोशिश मत करना। वही बात अच्छी दिशा में जाने के लिए सबसे बड़ी दीवाल हो जाएगी। और हो भी सकता है, जब तक वह छोटा रहे, आपकी बात मान ले; क्योंकि कमजोर है और आप ताकतवर हैं, आप डरा सकते हैं, धमका सकते हैं, आप हिंसा कर सकते हैं उसके साथ। और यह मत सोचना कभी कि मां-बाप अपने बच्चों के साथ कैसे हिंसा करेंगे! मां-बाप ने इतनी हिंसा की है बच्चों के साथ जिसका कोई हिसाब नहीं है। दिखाई नहीं पड़ती। जब भी हम किसी को दबाते हैं तब हम हिंसा करते हैं। बच्चे के अहंकार को चोट लगती है। लेकिन वह कमजोर है, सहता है। 

आज नहीं कल जब वह बड़ा हो जाएगा और ताकत उसके हाथ में आएगी, तब तक आप बूढ़े हो जाएंगे, तब आप कमजोर हो जाएंगे, तब वह बदला लेगा। बूढ़े मां-बाप के साथ बच्चों का जो दुर्व्यवहार है उसका कारण मां-बाप ही हैं। बचपन में उन्होंने बच्चों के साथ जो किया है, बुढ़ापे में बच्चे उनके साथ करेंगे।

(सौजन्‍य से – ओशो न्‍यूज लेटर)


आत्मा कालातीत है

कोई पूछता था, 'आत्मा को कैसे पाया जाए? ब्रह्मं-उपलब्धि कैसे हो सकती है?'

आत्मा को पाने की बात ही मेरे देखे गलत है। वह प्राप्तव्य नहीं है। वह तो नित्य प्राप्त है। वह कोई वस्तु नहीं, जिसे लाना है। वह कोई लक्ष्य नहीं, जिसको साधना है। वह भविष्य में नहीं है कि उस तक पहुंचना है। वह है। 'है' का ही वह नाम है। वह वर्तमान है-नित्य वर्तमान। उसमें अतीत और भविष्य नहीं है। उसमें 'होना' नहीं है। वह शुद्ध नित्य अस्तित्व है।

फिर खोना किस स्तर पर हो गया है या खोने के आभास और पाने की प्यास कहां आ गयी है?

मैं को समझ लें तो जो आत्मा खोई नहीं जा सकती है, उसका खोना समझना आ सकता है। 'मैं' आत्मा नहीं है। न 'स्व' आत्मा है, न 'पर' आत्मा है। यह द्वैत वैचारिक है। यह द्वैत मन में है। मन आभास सत्ता है। वह कभी वर्तमान में नहीं होता है। वह या तो अतीत में होता है, या भविष्य में। न अतीत की सत्ता है, न भविष्य की। एक न हो गया है, एक अभी हुआ नहीं है। एक स्मृति में है, एक कल्पना में है। सत्ता में दोनों नहीं हैं। इस असत्ता से 'मैं' का जन्म होता है। 'मैं' विचार की उत्पत्ति है। काल भी विचार की उत्पत्ति है। विचार के कारण, 'मैं' के कारण, आत्मा आवरण में है। वह है, पर खोयी मालूम होती है। फिर यही 'मैं' यही विचार-प्रवाह इस तथाकथित खोयी आत्मा को खोजने चलता है। यह खोज असंभव है, क्योंकि इस खोज से 'मैं' और पुष्ट होता है- सशक्त होता है।

'मैं' के द्वारा आत्मा को खोजना, स्वप्न के द्वारा जागृति को खोजने जैसा है। 'मैं' के द्वारा नहीं, 'मैं' के विसर्जन से उसको पाना है। स्वप्न के जाते ही जागृति है, 'मैं' के जाते ही आत्मा है। आत्मा शून्यता है, क्योंकि पूर्णता है। उसमें 'स्व', 'पर' नहीं है। वह अद्वैत है। वह कालातीत है। विचार के, मन के जाते ही जाना जाता है कि उसे कभी खोया नहीं था।

इसलिए उसे खोजना नहीं है। खोज छोड़नी है और खोजने वाले को छोड़ना है। खोज और खोजी के मिटते ही खोज पूरी हो जाती है। 'मैं' को खोकर उसे पा लिया जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

लिंकन की नम्रता

अमेरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एक बार अपने मित्र की घोडाबग्गी में बैठकर घूमने निकले। अभी कुछ दूर निकले ही थे कि मार्ग में एक श्रमिक ने उन्हें झुककर प्रणाम किया।

प्रत्युतर मे लिंकन ने उससे भी अधिक झुककर प्रणाम किया। लिंकन को ऐसा करते देख उनके मित्र ने पूछा, आपने उस श्रमिक को इतना झुककर प्रणाम क्यो किया?

तब लिंकन ने कहा कि मै अपने से अधिक नम्र किसी को नही देख सकता।



धन का अभिमान

यूनान में आल्सिबाएदीस नामक एक बहुत बड़ा संपन्न जमींदार था । उसकी जमींदारी बहुत बड़ी थी । उसे अपने धन-वैभव एवम जागीर पर बहुत अधिक गर्व था । वह इसका वर्णन करते हुए थकता नहीं था ।

एक दिन वह प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के पास जा पहुँचा और अपने ऐश्वर्य का वर्णन करने लगा । सुकरात उसकी बातें कुछ देर तक सुनते रहे । फिर उन्होंने पृथ्वी का एक नक्शा मँगवाया । नक्शा फैला कर उन्होंने आल्सिबएदिस से पूछा- "अपना यूनान देश इस नक्शे में कहाँ है ?"

जमींदार कुछ देर तक नक्शा देखने के बाद एक जगह अंगुली रख कर बोला- "अपना यूनान देश यह रहा ।"

सुकरात ने पुनः पूछा - "और अपना एटिका राज्य कहाँ है ?"बड़ी कठिनाई के बाद जमींदार एटिका राज्य को ढूंढ सका । अच्छा, इसमें आपकी जागीर की भूमिका कहाँ है ?" सुकरात ने एक बार फिर पूछा । अब जमींदार कुछ सकपका गया । वह बोला- "आप भी खूब हैं, इस नक्शे में इतनी छोटी-सी जागीर कैसे बताई जा सकती है ?"

तब सुकरात ने कहा - "भाई ! इतने बड़े नक्शे में जिस भूमि के लिए एक बिन्दु भी नहीं रखा जा सकता उस नन्ही -सी भूमि पर आप गर्व करते हैं ? इस पूरे ब्रह्माण्ड में आपकी भूमि और आप कहाँ कितने हैं, जरा यह भी तो सोचिये ।"

सुकरात के मुंह से यह सुनते ही आल्सिबएदिस का अपनी जागीर और सम्पति पर जो गर्व था चकनाचूर हो गया ।

व्यक्ति को अपनी धन-संपदा का बखान तथा उस पर गर्व नहीं करना चाहिए ।

आत्मा की भूख

स्वामी विवेकानंद उन दिनों अमेरिका प्रवास में थे. वे अपना भोजन अधिकतर स्वयं ही पकाते थे. एक दिन उन्होंने अपना भोजन बनाकर तैयार किया. इतने में ही कुछ भूखे बालक उधर आ निकले . स्वामी जी ने सारा भोजन उन बालकों में बांट दिया और इससे उन्हें बडी प्रसन्नता हुई.

उनके समीप ही एक अमेरिकन महिला खडी थी. उसने पूछा,”स्वामी जी! आपने बिना कुछ खाए ही सारा भोजन इन बालकों में क्यों बांट दिया ?” 

विवेकानंद बोले,”माता जी ! आत्मा की भूख पेट की भूख से बडी होती है और आत्मा के तृप्त होने पर जीवन की समस्त क्षुधाएं एक बार में ही शांत हो जाती हैं . मैंने अपनी आत्मिक भूख को शांत करने के लिए ही भोजन बच्चों में बांट दिया ।”

बुधवार, 4 अगस्त 2010

गाँधी जी की पसंदीदा 'फरडीनैंड की कहानी'

बहुत पहले की बात है। स्पेन में एक नन्हा बैल रहता था, नाम था फरडीनैंड। फरडीनैंड के हमउम्र बैल तरह-तरह की शैतानियाँ करते रहते थे। उछलते-कूदते और एक-दूसरे से सिर टकराते फिरते। फरडीनैंड की रुचि इन सारे कामों में नहीं थी। उसे तो आराम से बैठकर फूलों की खुशबू लेना ज्यादा पसंद था। चरागाह में कॉर्क के वृक्ष के नीचे वाली जगह उसे खूब सुहाती थी और वह अक्सर वहीं बैठता था। यह उसका पसंदीदा पेड़ था और इसकी छाया में बैठकर वह पूरा दिन फूलों की सुगंध लिया करता था।

फरडीनैंड के भविष्य को लेकर दूसरी माँओ की तरह उसकी माँ को भी चिंता होती थी। माँ को डर था कि इस तरह तो यह अलग-थलग रह जाएगा। तुम दूसरों की तरह उछल-कूद और सिर लड़ाने का खेल क्यों नहीं करते? माँ ने फरडीनैंड से पूछा। 'इसके बजाय मुझे आराम से बैठकर फूलों की खुशबू लेना ज्यादा पसंद है।' 

फरडीनैंड ने जवाब दिया। फरडीनैंड की माँ समझदार थीं और जब उन्होंने देखा कि फरडीनैंड एकदम अकेला भी नहीं है बल्कि उसके आसपास तो बहुत सारी चीजें हैं तो उन्होंने फरडीनैंड की बात पर आपत्ति लेना बंद कर दिया। 

समय बीतता गया फिर फरडीनैंड बड़ा हो गया। अब वह एक ताकतवर और हष्ट-पुष्ट साँड़ था। वहीं के चरागाह पर उसके साथियों का बचपन भी बीता था। फरडीनैंड के साथियों का बचपन सारा दिन एक दूसरे को सींगों से धकेलने और सिर लड़ाने में बीता था। साथियों की कोशिश यही थी कि उन्हें राजधानी मैड्रिड में होने वाली बुल फाइट के लिए चुन लिया जाए। फरडीनैंड को इस तरह की लड़ाई में जाने की कोई इच्छा नहीं थी। उसे तो फूलों की खुशबू लेना ही ज्यादा रुचिकर काम लगता था। 

एक दिन रंगबिरंगी टोपियाँ पहने पाँच आदमी गाँव आए। वे मैड्रिड की लड़ाई के लिए साँड़ के चुनाव के लिए आए थे। उन्हें देखकर साँड़ उछल-कूद मचाने लगे। एक दूसरे से जोर आजमाइश करने लगे। सभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे, जिससे वे बुलफाइट के लिए चुन लिए जाएँ। फरडीनैंड नहीं चाहता था कि उसका चयन हो और वह जानता था कि उसे चुना नहीं जाएगा। 

इसलिए वह अपने पसंदीदा कॉर्क के पेड़ के नीचे जाकर आराम से बैठ गया। वह जहाँ बैठा उस जगह पर उसने गौर नहीं किया और नरम घास पर बैठने के बजाय वह एक मधुमक्खी पर बैठ गया। अगर तुम मधुमक्खी हो और कोई साँड़ तुम्हारे ऊपर बैठ जाए तो तुम क्या करोगे? डंक ही मारोगे न? मधुमक्खी ने भी वही किया। जैसे ही मधुमक्खी ने डंक मारा फरडीनैंड जोर से उछला। वह भागने लगा। जमीन पर अपने पैर पटकने लगा। ऐसा लगने लगा मानो फरडीनैंड पागल हो गया हो। 

जब उन पाँच आदमियों की नजर फरडीनैंड पर पड़ी तो वे खुशी से चिल्लाए - ' हमें सबसे ताकतवर साँड़ मिल गया, बुल फाइट के लिए एकदम उपयुक्त।' तो उन्होंने फरडीनैंड को एक गाड़ी में चढ़ाया और मैड्रिड ले गए।

क्या दिन था वह! झंडियाँ लहरा रही थीं। बैंड बज रहा था। खूबसूरत औरतें अपने जूड़े में महकने वाले फूल लगाकर साँड़ों की लड़ाई देखने आई थीं। रिंग के गोले में पहले एक परेड हुई। सबसे आगे बैंडरीलो सिपाहियों का दस्ता आया। इनके हाथ में वह डंडी थी‍ जिसमें लाल रिबन लगी थी और उसके एक सिरे पर नुकील पिन थी जिसे चुभोकर साँड़ को लड़ने के लिए उकसाया जाता था। इसके बाद घोड़े पर सवार जवान आए जिनके हाथों में भाले थे, जो साँड़ को क्रोधित करने के लिए थे। इसके पीछे इठलाता एक युवक आया जो खुद को बहुत सुंदर समझ रहा था। इस सुंदर युवक ने महिलाओं की तरफ गर्दन झुकाई। उसके सिर पर एक लाल टोपी थी और हाथ में एक तलवार थी। अगर सुई और भाले से भी साँड़ लड़ने को तैयार नहीं हो तो यह तलवार चुभोई जानी थी। और इनके पीछे-पीछे आया लड़ने वाला साँड़। जिसे तुम जानते हो। हमारा फरडीनैंड। 

फरडीनैंड सबसे ताकतवर साँड़, कहकर फरडीनैंड का परिचय करवाया गया। उसे देखकर परेड में मौजूद हर किसी की साँसें थमी रह गई। फरडीनैंड दौड़कर रिंग के बीच में पहुँच गया और तालियाँ बजने लगी। सभी सोचने लगे कि अब भयंकर लड़ाई देखने को मिलेगी, फरडीनैंड योद्धाओं को अधमरा कर देगा। इससे दर्शकों में शोरशराबा बढ़ गया। फरडीनैंड जब रिंग के बीच में पहुँचा तो उसने देखा कि सारी खूबसूरत महिलाओं के जूड़े में लगे फूलों में खुशबू आ रही है। बस फरडीनैंड रिंग के बीचोंबीच बैठ गया और खुशबू सूँघने लगा। 

रिंग के अंदर उसे उकसाने की बहुत कोशिशें हुई, पर फरडीनैंड बैठा रहा और खुशबू सूँघता रहा। फरडीनैंड ने अपने मन में निश्चय कर लिया था कि ये लोग चाहे जो कर लें मैं ना तो किसी को मारूँगा और न ही लड़ूँगा। उसे लड़ाने के लिए उकसाने वाली सारी कोशिशें करके हार गए। सारे योद्धाओं ने सिर पीट लिया। और फिर फरडीनैंड को उसके घर पहुँचा दिया गया। और अपने घर पहुँचने के बाद फरडीनैंड फिर से अपने पसंदीदा कॉर्क के पेड़ के नीचे बैठ गया और फूलों की खुशबू लेने लगा। वह बहुत खुश था।

गाँधीजी को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। मुनरो लीफ की यह कहानी उनकी पसंदीदा कहानियों में से एक है। मुनरो ने उक्त कहानी मात्र एक घंटे में लिखी थी। उन्होंने यह कहानी अपने मित्र रिचर्ड लॉसन की मदद से लिखी थी ता‍कि इस कहानी पर चित्र बनाकर उसे कुछ पैसे मिल जाएँ। 1938 में इसी कहानी पर वाल्ट डिज्नी ने एक फिल्म भी बनाई है। 'फरडीनैंड द बुल' के नाम से यह फिल्म यू-ट्‍यूब पर भी देखी जा सकती है।

शक्तियाँ

प्रकाश नारायण नाटाणी

हर काम के लिए व्यक्ति के अंदर शक्ति का होना आवश्यक है। शक्ति दो प्रकार की होती है। शारीरिक तथा मानसिक। जो व्यक्ति जीवन में सफल होना चाहता है उसके शरीर और मन दोनों में शक्ति होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति आती है शरीर को स्वस्थ रखने से और मन की शक्ति आती है सत्य के आचरण से। शरीर और मन दोनों की शक्तियाँ जब तक व्यक्ति में हों तभी तक वह सच्चे अर्थों में शक्तिशाली कहलाने का दावा कर सकता है। दोनों में से केवल एक ही शक्ति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता।

कर्ज से अच्छे खजूर

एक स्कूल के छात्रों ने एक बार पिकनिक का प्रोग्राम बनाया। सभी बच्चे इसके लिए अपने घर से कुछ न कुछ खास खाने की चीज बनवाकर लाने वाले थे। स्कूल के स्टूडेंट्‍स में एक गरीब छात्र भी था। उसने घर आकर माँ को सारी बात बताई। माँ ने बताया कि घर में बनाने के लिए कोई खास चीज नहीं है। बालक दुखी हो गया।

तभी माँ ने कहा कि घर में कुछ खजूर रखे हैं तू उन्हें ले जा। कुछ देर बाद माँ को लगा कि पिकनिक पर बाकी सभी बच्चे खाने-पीने की अच्छी चीजें लेकर आएँगे, ऐसे में बेटा खजूर ले जाएगा तो ठीक नहीं लगेगा।

माँ ने तुरंत बेटे से कहा कि तुम्हारे पिताजी आने वाले हैं। जैसे ही वे आएँगे, मैं बाजार से अच्‍छी चीज मँगवा लूँगी। बच्चा निराश होकर एक तरफ बैठ गया। थोड़ी देर बाद पिता घर आए। बेटे को उदास बैठा देखकर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा - क्या हुआ? और पत्नी ने उन्हें सारी बात बताई। पति-पत्नी देर तक आपस में विचार कर रहे थे।

आँगन में बैठा बालक उन्हें देखता रहा उसे दुख था कि उसके कारण उसके माता-पिता परेशानी में हैं। कुछ देर बाद बालक ने देखा कि उसके पिता चप्पल पहनकर बाहर जा रहे हैं। बालक ने पूछा - 'पिताजी क्या जान सकता हूँ कि आप कहाँ जा रहे हैं। बेटा तेरी उदासी मुझसे देखी नहीं जाती, मैं अपने मित्र से कुछ पैसे उधार लेने जा रहा हूँ जिससे तू भी पिकनिक पर ‍अच्छी चीजें ले जा सकेगा।

बालक ने जवाब दिया - नहीं पिताजी उधार माँगना अच्‍छी बात नहीं है। मैं पिकनिक पर ये खजूर ही ले जाऊँगा। कर्ज लेकर शान दिखाना बुरी बात है। पिता ने पुत्र को सीने से लगा लिया। 

यह बालक पंजाब के लाला लाजपतराय के नाम से विख्‍यात हुए ।





अतिथि सत्कार का प्रभाव

महाभारत काल की बात है। कुरुक्षेत्र में मुद्‍गल नाम के एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे। वे सत्यनिष्ठ, धर्मात्मा और जितेंद्रिय थे। क्रोध व अहंकार उनमें बिल्कुल नहीं था। जब खेत से किसान अनाज काट लेते और खेत में गिरा अन्न भी चुन लेते, तब उन खेतों में बचे-खुचे दाने मुद्‍गल ऋषि अपने लिए एकत्र कर लेते थे।

कबूतर की भाँति वे थोड़ा सा अन्न एकत्र करते और उसी से अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। पधारे हुए अतिथि का सत्कार भी उसी अन्न से करते, यहाँ तक कि पूर्णमासी तथा अमावस्या के श्राद्ध तथा आवश्यक हवन भी वे संपन्न करते थे। महात्मा मुद्‍गल एक पक्ष (पंद्रह दिन) में एक दोने भर अन्न एकत्र कर लाते थे। उतने से ही देवता, पितर और अतिथि आदि की पूजा-सेवा करने के बाद जो कुछ बचता था, उससे परिवार का काम चलाते थे।

महर्षि मुद्‍गल के दान की महिमा सुनकर महामुनि दुर्वासाजी ने उनकी परीक्षा करने का निश्चय किया। उन्होंने पहले सिर घुटाया, फिर फटे वस्त्रों के साथ पागलों-जैसा वेश बनाए हुए, कठोर वचन बोलते मुद्‍गल जी के आश्रम में पहुँचकर भोजन माँगने लगे। महर्षि मुद्‍गल ने अत्यंत श्रद्धा के साथ दुर्वासाजी का स्वागत किया। उनके चरण धोए, पूजन किया और फिर उन्हें भोजन कराया। दुर्वासाजी ने मुद्‍गल के पास जितना अन्न था, वह सब खा लिया तथा बचा हुआ जूठा अन्न अपने शरीर में पोत लिया। फिर वहाँ से उठकर चले आए। 

इधर महर्षि मुद्‍गल के पास भोजन को अन्न नहीं रहा। वे पूरे एक पक्ष में दोने भर अन्न एकत्र करने को जुट गए। जब भोजन के समय देवता और पितरों का भाग देकर जैसे ही वे निवृत्त हुए, महामुनि दुर्वासा पूर्व की तरह कुटी में आ पहुँचे और फिर भोजन करके चले गए। मुद्‍गल जी पुन: परिवार सहित भूखे रह गए। 

एक-दो बार नहीं पूरे छह माह तक इसी प्रकार दुर्वासा जी आते रहे। प्रत्येक बार वे मुनि मुद्‍गलजी का सारा अन्न खाते रहे। मुद्‍गल जी भी उन्हें भोजन कराकर फिर अन्न के दाने चुनने में लग जाते थे। उनके मन में क्रोध, खीज, घबराहट आदि का स्पर्श भी नहीं हुआ। दुर्वासा जी के प्रति भी उनका आदर भाव पहले की भाँ‍ति ही बना रहा। 

महामुनि दुर्वासा आखिर में प्रसन्न होकर कहने लगे- महर्षि! विश्व में तुम्हारे समान ईर्ष्या व अहंकार रहित अतिथि सेवा कोई नहीं है। क्षुधा इतनी बुरी होती है कि वह मनुष्य के धर्म-ज्ञान व धैर्य को नष्ट कर देती है, लेकिन वह तुम पर अपना प्रभाव तनिक भी नहीं दिखा सकी। तुम वैसे ही सदाचारी और धार्मिक बने रहे। विप्रश्रेष्ठ! तुम अपने इसी शुद्ध शरीर से देवलोक में जाओ।'

महामुनि दुर्वासाजी के इतना कहते ही देवदूत स्वर्ग से विमान लेकर वहाँ आए और उन्होंने मुद्‍गलजी से उसमें बैठने की प्रार्थना की। महर्षि मुद्‍गल ने देवदूतों से स्वर्ग के गुण-दोष पूछे और उनकी बातें सुनकर बोले - 'जहाँ परस्पर स्पर्धा है, जहाँ पूर्ण तृप्ति नहीं और जहाँ असुरों के आक्रमण तथा पुण्य क्षीण होने से पतन का भय सदैव लगा रहता है, वह देवलोक स्वर्ग में मैं नहीं जाना चाहता।' 

आखिर में देवदूतों को विमान लेकर लौट जाना पड़ा। महर्षि मुद्‍गलजी ने कुछ ही दिनों में अपने त्यागमय जीवन तथा भगवद्‍ भजन के प्रभाव से प्रभु धाम को प्राप्त किया।

सौजन्य से - देवपुत्र

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