बुधवार, 3 अगस्त 2011

श्रेष्ठ कार्यो के प्रति लगाव ही श्रद्धा है।

1) राज तन्त्र ही नहीं प्रधान, धर्म तन्त्र पर भी दो ध्यान।
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2) राजा ययाति सशरीर स्वर्ग गये थे पर जब उन्होन वहा अपने पुण्यों की बहुत प्रशंसा करनी आरम्भ की, तो उनके पुण्य क्षीण हो गये और उन्हे स्वर्ग से नीचे ढकेल दिया गया।
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3) राग-द्वेष को अपने में न मानना अर्थात् आने-जाने वाला मानना हैं।
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4) राग-द्वेष उत्पन्न होने पर भी उनके वश में होकर कार्य न करना बल्कि शास्त्र, भगवान तथा सन्तो के आज्ञानुसार ही कार्य करना चाहिये।
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5) राग-द्वेष अज्ञानियों की पूँजी हैं, ज्ञानवान इस पूँजी का संचय करने में अपना मूल्यवान समय नष्ट नहीं करते।
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6) श्रवण और कथन से दिशा तो मिलती हैं, पर आत्मकल्याण के मार्ग पर पर्वतो जैसी चढाई चढनी पडती है।
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7) श्रेष्ठ कार्यो के प्रति लगाव ही श्रद्धा है।
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8) श्रेष्ठ विचारों के चिन्तन-मनन की साधना वस्तुतः मस्तिष्कीय क्षैत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रर्वतियों को निरस्त करने के लिये लड़ा जाने वाला महाभारत हैं।जो इसमें सफल होते हैं,वे ही सच्चे अर्थो में जीवन का आनन्द उठाते हुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
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9) श्रेष्ठ चिन्तन की सार्थकता तभी हैं, जब उससे श्रेष्ठ चरित्र बने और श्रेष्ठ चरित्र तभी सार्थक हैं, जब हव श्रेष्ठ व्यवहार बन कर प्रकट हो।
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10) श्रेष्ठ चिन्तन का अभाव एवं उत्कृष्टता के प्रति अनास्था अंततः उदण्डता को जन्म देते है।
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11) श्रेष्ठ साधक ही श्रेष्ठ कार्यकर्ता होता हैं। प.पू.गुरुदेव।
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12) श्रेष्ठ आदतो में सर्वसुलभ है-नियमितता की आदत।
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13) श्रेष्ठता धन से नही, श्रेष्ठ कार्यो से मिलती है।
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14) श्रेष्ठता का समुच्चय ही देवता है।
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15) श्रेय और प्रेय दोनो दिशायें एक दूसरे के प्रतिकूल जाती है। संसार में दोनो में से एक ही अपनायी जा सकती है। संसार प्रसन्न होगा तो आत्मा रुठेगी। आत्मा को सन्तुष्ठ किया जायेगा तो संसार के निकटस्थों की नाराजगी सहन करनी पडेगी। आमतोर से यही होता रहेगा। कदाचित ही कभी कहीं ऐसे सौभाग्य बने हैं जब सम्बन्धियों ने आदर्शवादिता अपनाने का अनुमोदन दिया हो।
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16) श्रेष्ठ स्मृतियों का बटन आपके हाथ में हो, तो जीवन आनन्दमय बन जाएगा।
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17) शत्रु पण्डित, मुर्ख हितैषी से अच्छा है।
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18) शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
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19) शब्द व्यक्ति की दरिद्रता को दर्शाते हैं, जबकि निःशब्द अवस्था उसके अन्तःकरण की महानता का द्योतक है।
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20) शक्ति आनन्द के साथ रहती हैं, यह विश्व शक्तिशाली का ही है।
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21) शरीर की समीपता की सान्निध्य का आधार नहीं होती। ईश्वर भक्ति का आनन्द उसके अदृश्य रहने से सम्भव होता हैं, यदि वह अपने साथ भाई-भतीजे की तरह रहने लगे तो शायद उसकी उपेक्षा-अवज्ञा होने लगे।
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22) शरीर को भगवान का मन्दिर समझ कर आत्म-संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करनी चाहिये।
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23) शरीर भूखा मरे तो भी आत्मा के स्तर को आँच नहीं आती। किन्तु यदि सद्ज्ञान की वर्षा बन्द हो जाये तो मनुष्य की आत्मा ही मरती है। अतः सद्ज्ञान प्राप्ति के प्रयास जारी रहने चाहिए।
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24) शरीर रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नही।
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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

Take things differently...

1- Dushmano se pyaar hota chala jayega Bas Dosto ko Aazmatey Jaiye. 
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2- DREAM & AIM r both Sensational Words. make a Dream as Aim, but don't make Aim as a Dream. 

"Write ur Sad Time On Water,While.Gud time on stone"
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3- Defination of "TODAY"
T-This is an
O-Opportunity to 
D-Do
A-A work, better than 
Y-Yesterday.
So enjoy today...... 
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4- Dark is not D Opposite of Light.
Its just D Absence of Light.
Similarly,
A Problem is D Absence of an Idea,
Not d Absence of a Solution. 
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5- Company of good people is like walking in a shop of perfume. Whether U buy the perfume or not, U R bound to receive the Fragrance. 
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6- Navyug ka arunoday nikat h. 2020 tk navyug apna swroop prastut kr dega. is important time me sanskarwan jan purn tatparta prastut karenge. 
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7- Har "INSAN" Ko
"GULAB" Ke Us "PHOOL" Ki Tarah Hona Chahiy
Jo Un Haatho Me Bhi "KHUSHBU" Deta Hai, Jo Use "MASAL Kar
Fenk deta h. 
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8- Hamesha apni choti choti galtiyon se bachne ki koshish karo, Q ki Insaan pahado se nahi chhote chhote pathron se thokar khata h. 
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9- JALTA HUA EK DIPAK HAZAARO BUJHE DIPAK JALA DEGA, PAR BUJHE HUE HAZAARO DIPAK MILKAR BHI EK DIPAK NA JALA SAKENGE ! 
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10- Life is the art of drawing without an eraser. So be careful while taking any small decisions about the valuable pages of life. 
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11- If U Salute ur Duty, u Need Not Salute anyone. But If U Do Not Salute ur Duty, U Need to Salute Everyone... 
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12- Some one love u so u alive. Such person u'll find a light. That light r called Mother, Father & Frnds. 
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13- God upsets our plans only to setup his plan for us.
Bcoz, v c our present & plan our future. But He sees our future & plans our present. 
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14- Ghar k Bahar SUBH-LABH likhte h.
Iska matlab kya h ? pehle SUBH kaam karo fir LABH hoga.
Radhe-Radhe. 
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15- Flowers r very soft, do not Touch them with hard hands Similarly Feelings r like soft flowers, do not Touch them with hard words. 
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16- Jin logo ki aap "Tarif" karte ho unk "Guno" ko apnao tum khud "Tarif" k yogy ho jaoge. 
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17- Information-
Check ur PNR railway Status by msg.
Type ur 10 digit pnr no. and send it to
9793300000
enjoy journey 
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18- Jeevan ka Sabse bada Rog..
'' KYA KAHENGE LOG.." 
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19- Jab Jindgi Hasaye Tab Samjna K Achhe Karmo Ka Fal Hai Aur Jab Jindgi Rulaye Tab Samjna K Acche Karm Kar Ne Ka Time Aa Gaya. 
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20- is Duniya Me Achchhe Insan Ki Talas Na Karo Balki Swam Ek Achchhe Insan Ban Jao Kya Pata Hamare Is Prayas Se Kisi Dusre Ki Talash Puri Ho 
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21- INSE SIKHO-
Seva-Shravan
Love-Krishna
Maryada-Ram
Tyag-Buddha
Daan-Karna
Lakshya-Eklavya
Ahinsa-Mahavir
Bhakti-hanuman 
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22- If you try to impress, you'll be changed, But if you try to express, others will change. Always try to express, not to impress. 
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23- Whenever u feel heat. Think of our BSF Jawans Patrolling our Borders in THAR Desert. Struggling from 60 Degree Temp. 
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24- If someone pointout ur mistake...
Be happy that at least someone is interested in what you have done..
Take things differently...

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

सूर्यकिरण चिकित्सा

वेदों में सूर्यकिरण चिकित्सा का विवरण बड़े विस्तार से आता है। मत्स्यपुराण कहता हैं कि नीरोगिता की इच्छा हैं तो सूर्य की शरण में जाओ। वेदों में उदित होते सूर्य की किरणों का बड़ा महत्व बताया गया है। अथर्ववेद 17/1/30 में वर्णन आया हैं कि उदित होता सूर्य मृत्यु के सभी कारणों, सभी रोगों को नष्ट कर देता है। इस समय की इन्फ्रारेड किरणों में प्रचुर जीवनीशक्ति होती है। ऋग्वेद 1/50/11 में उल्लेख हैं कि रक्ताल्पता की सर्वश्रेष्ठ औषधि हैं उदित होते सूर्य के दर्शन, ध्यान। हृदय की सभी बीमारियाँ नित्य उगते सूर्य के दर्शन, ध्यान एवं अर्घ से दूर हो सकती है। (अथर्व.1/22/1)

सच्चा तीर्थ कौनसा हैं ?

सच्चा तीर्थ कौनसा हैं ? तीर्थसेवन से आशय क्या है, यह स्कंदपुराण से समझें-

‘‘सत्य तीर्थ हैं, क्षमा, इंद्रिय नियंत्रण भी तीर्थ हैं। सरलता भरा स्वभाव एवं जीव दया भी तीर्थ है। दान, मन का संयम, संतोष, ब्रह्मचर्य, प्रियवचन बोलना भी तीर्थ है। ज्ञान, धैर्य, तप को भी तीर्थ कहा गया है। तीर्थों में सबसे श्रेष्ठ तीर्थ हैं-अंतःकरण की पवित्रता।’’

अंत में स्कंदपुराण इस विषय में कहता हैं-‘‘जल में शरीर को डुबो लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिसने दमरूपी तीर्थ में स्नान कर मन के मैल को धो डाला, वही शुद्ध है, सच्चा तीर्थ सेवन करने वाला है।’’ चार धाम की यात्रा पर इन दिनों बेतहाशा भीड़ स्नान-दर्शन यात्रा पर निकली हैं। क्या वे इस मर्म से परिचित हैं ?

पीड़ा और प्रार्थना

पीड़ा और प्रार्थना में गहरा संबंध है। पीड़ा का अनुभव सकारात्मक हो, दृष्टिकोण रचनात्मक हो तो पीड़ा स्वतः ही प्रार्थना बन जाती है। ऐसा न हो तो हर पीड़ा निषेध व नकारात्मक दृष्टिकोण के जाल में उलझ-फँसकर कभी वैर बनती हैं तो कभी द्वेष बन जाती है। इतना ही नहीं, ज्यादातर दशाओं में यह वैर-द्वेष के साथ मन को संताप देना वाला विषम विषाद बन जाती है। जीवन को अवसन्न करने वाला अवसाद बन जाती हैं।

पीड़ा का अनुभव सकारात्मक होने का मतलब हैं अंतर्मन में प्रभु प्रेम उपस्थित होना, भगवान के मंगलमय विधान में गहरी आस्था होना। ऐसा हो तो जीवन की पीड़ाएँ दरद का उन्माद जगाने के बजाय प्रार्थना को जन्म देती है। ऐसी स्थिति में पीड़ा जितनी गरही होती हैं, प्रार्थना उतनी ही घनीभूत होती जाती है। पीड़ा के क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से भगवान के समीप सरकने लगता है। सच तो यह हैं कि यदि पीड़ा दरद हैं तो प्रार्थना उसकी दवा है।

पीड़ा और प्रार्थना का यही मिलन तप है। तपश्चर्या का अर्थ धूप में खड़ा हो जाना नहीं हैं, न भूखे रहकर उपवास करना है। तपश्चर्या का सही अर्थ जीवन के पीड़ादायक क्षणों में भगवान के भावभरे स्मरण, सर्वस्व समर्पण व उनमें ही लीन होना है। यथार्थ तप है- जीवन के खालीपन को पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करना, जीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव करना। जीवन की यह बेकार भाग-दौड़, जिसको अभी बड़ी उपयोगी समझते हैं, यदि अचानक यह निरर्थक लगने लगे तो बड़ी घबराहट होगी। गहरी पीड़ा पनपेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम, इसे भगवान के प्रेम व स्मरण तथा समर्पण में भीग कर सहने का नाम हैं तपश्चर्या। पीड़ा व प्रार्थना का अद्भुत मिलन जिसके भी जीवन में आता हैं, उसका जीवन स्वाभाविक ही रूपांतरित हो जाता है।

अखण्ड ज्योति जुलाई 2011

बुधवार, 27 जुलाई 2011

हमारा स्मारक

किसी को हमारा स्मारक बनाना हो तो वह वृक्ष लगाकर बना सकता है  वृक्ष जैसा उदार, सहिष्णु और शांत जीवन जीने की शिक्षा हमने पाई उन्हीं जैसा जीवनक्रम लोग अपना सकें तो बहुत हैं हमारी प्रवृति, जीवन विद्या और मनोभूमि का परिचय वृक्षों से अधिक और कोई नहीं दे सकता अतएव वे ही हमारे स्मारक हो सकते हैं

-पं. श्री राम शर्मा आचार्य

जनमानस का परिष्कार

"हमारे गुरु की आवश्यकता थी, इसलिए हम उनके इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते रहे | उनका इशारा हमें स्पष्ट ध्यान में है | आज युग देवता का, महाकाल का इशारा यही है की हमको जनजाग्रति के लिए काम करना होगा | विचार-क्रांति अभियान आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है; क्योंकि इस युग की सभी समस्याएँ इसलिए पैदा हुई है की आदमी की अक्ल ख़राब ही गई है | न पैसा कम है, न कोई और चीज | बस, अक्ल ख़राब है | अक्ल को ठीक करने के लिए हमें विचार-क्रांति में हिस्सा लेना चाहिए | क्रियाकलापों में आदर्शवादिता का समन्वय यही है हमारा विचार-क्रांति अभियान | ऋषि और ब्राह्मण सदा से एक ही काम करते रहे हैं- जनमानस का परिष्कार | इसी के लिए युग देवता ने, महाकाल ने पुकार लगाईं है |"

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी

रामायण जीना सिखाती हैं, महाभारत मरना सिखाती है।

1) प्रेम तन्दरुस्त इन्सान का स्वभाव हैं और काम और मोह बीमार व्यक्ति का स्वभाव है।
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2) प्रेम आध्यात्मिक प्रगति का प्रधान अवलम्बन है।
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3) प्रेम आदान नहीं प्रदान चाहता है।
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4) प्रेम-तत्त्व अन्तःकरण में जितना होगा, उसी अनुपात में सद्गुणों का विकास होगा और इसी विकास से आत्मबल की मात्रा नापी जा सकती है। कहना न होगा कि आत्म-बल ही मनुष्य की गरिमा का सार हैं और उसी के बल पर बाह्म और आन्तरिक ऋद्धि-सिद्धिया उपलब्ध की जाती है।
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5) प्रेमी को प्रभु त्याग नहीं सकते।
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6) प्रेरणा जहा खतम होती हैं, नियति का आरम्भ वहीं से होता है।
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7) प्रजापति ने देव, दानव और मानवों का मार्गदर्शन करते हुए उन्हे एक शब्द का उपदेश किया था ‘ द ’। तीनो चतुर थे, उन्होने संकेत का सही अर्थ अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरुप निकाल लिया। कहा गया था ‘ द ’। देवताओं ने दमन (संयम), दैत्यों ने ‘दया’, मानवों ने ‘ दान ’ के रुप में उस संकेत का भाष्य किया, जो सर्वथा उचित था।
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8) श्रद्धा का परिचय प्रत्यक्ष करुणा के रुप में मिलता है।
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9) श्रद्धा का अर्थ हैं परिपूर्ण विश्वास। ऐसा विश्वास जिसमें शंका-कुशंका का, तर्क-विर्तक आदि की कोई गुजाईश न हो।
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10) श्रद्धा का अर्थ हैं-श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था।
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11) श्रद्धा के अभिसिंचन से पत्थर में देवता का उदय किया जा सकता है।
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12) श्रद्धा ही जननी है।
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13) श्रद्धा स्वयं में एक सशक्त मान्यता प्राप्त विज्ञान है।
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14) श्रद्धा वह अलौकिक तत्व हैं, जिससे पल-पल चमत्कार घटित होते है।
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15) श्रद्धा तत्परता की जननी हैं।
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16) श्रद्धा आविर्भाव सरलता और पवित्रता के संयोग से होता है।
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17) श्रद्धा और भक्ति के शिकंजे में परमात्मा को जकडा जा सकता है।
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18) श्रद्धा, विश्वास, साहस, धैर्य, एकाग्रता, स्थिरता, दृढता और संकल्प ही वे तत्व हैं, जिनके आधार पर साधनाए सफल होती है।
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19) श्रम ईश्वर की सबसे बडी उपासना है।
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20) श्रम करने में ही मानव की मानवता है।
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21) श्रम का अर्थ हैं-आनन्द और अर्कमण्यता का अर्थ हैं-दुःख।
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22) श्रम स्वर्ण का एक ढेला हैं, उसे जिस साचे में ढाल दीजिए, वैसा ही आभूषण बन जाएगा।
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23) श्री कृष्ण को प्रणाम करके यदि यात्रा प्रारम्भ की जाये तो विजय प्राप्त होती है।
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24) रामायण जीना सिखाती हैं, महाभारत मरना सिखाती है।

प्रसन्नता सब सद्गुणों की जननी है।

1) प्रामाणिकता मानव जीवन की सबसे बडी उपलब्धि है। वह उत्तरदायित्व निबाहने, मर्यादाओ का पालन करने और कर्तव्य पालन में सतत् जागरुक रहने वालो को ही मिलती है।
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2) प्रामाणिकता ही प्रतिष्ठा की आधारशिला है।
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3) प्रार्थना प्रातःकाल की चाबी और सांयकाल की सांकल है।
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4) प्रार्थना से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती हैं।
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5) प्रार्थना वही कर सकता हैं जिसकी आत्मा उच्च हो।
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6) प्रारम्भ सुंदर अंत भयंकर यह हैं-भोग, 
प्रारम्भ कष्टदायक, अंत आनन्ददायक यह हैं-त्याग।
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7) प्रज्ञा का अर्थ हैं-स्वविवेक। इतना दृढ जिसमें अपना संकल्प ही मूर्तिमान हो सके। किसी से पूछने की कोई गुंजाइश ही न रहे।
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8) प्राचीन महापुरुषों के जीवन से अपरिचित रहना जीवन भर निरन्तर बाल्य अवस्था में रहना है।
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9) प्राचीन समय में जब धरती का वातावरण सतयुगी था तो प्रत्येक व्यक्ति उत्कृष्ट चिन्तन और श्रेष्ठ आचरण वाला ऋषि पैदा हुआ करता था। तब उनकी जनसंख्या तैतीस करोड थी। इसी कारण कर्मकाण्डो में तैंतीस कोटि देवताओं के रुप में आज भी उनका आवाहन और स्थापन किया जाता हैं।
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10) प्रातः धर्म सेवन, मध्यान्ह अर्थ सेवन और रात्रि काम सेवन करना चाहिये।
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11) प्रसन्न रहना ईश्वर की सबसे बडी सेवा है।
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12) प्रसन्न रहने के दो ही उपाय हैं - आवश्यकतायें कम करे और परिस्थितियों से तालमेल बिठाये।
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13) प्रसन्नचित्त व्यक्ति अधिक जीते है।
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14) प्रसन्नता सब सद्गुणों की जननी है।
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15) प्रत्येक का उपदेश सुनो पर अपना उपदेश कुछ ही व्यक्तियों को दो।
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16) प्रत्येक पापी का भविष्य हैं, जैसे हर संत का एक भूत था।
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17) प्रत्येक व्यक्ति जिससे में मिलता हू, किसी न किसी बात में मुझसे बढकर हैं और वही में उससे सीखता हूँ।
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18) प्रेम की ही पराकाष्ठा प्रार्थना बन जाती है।
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19) प्रेम को जगाओ। और मै जानता हूँ कि तुम परमात्मा के प्रेम में एकदम नहीं पड सकते। तुमने अभी पृथ्वी का प्रेम भी नहीं जाना, तुम स्वर्ग का प्रेम कैसे जान पाओगे ? इसलिये मैं निरन्तर कह रहा हूँ कि मेरा संदेश प्रेम का हैं। पृथ्वी के प्रेम को तो जानो, तो फिर वही प्रेम तुम्हे परमात्मा के प्रेम की तरफ ले चलेगा। ओशो।।
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20) प्रेम के बिना ज्ञान बिना मल्लाह की नौका है।
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21) प्रेम में मनुष्य सब कुछ देकर भी यह सोचता हैं कि अभी कम दिया है।
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22) प्रेम में स्थिरता और दीर्घता लाने के लिए मनुष्य के पास विशाल मस्तिष्क भी होना चाहिये।
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23) प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है, जो इस प्रकाश मे जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं उसके संसार में शूल नहीं फूल नजर आता है।
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24) प्रेम सबसे करो, विश्वास कुछ पर करों, बुरा किसी का मत करो।

अखण्ड ज्योति फरवरी 1968
















मंगलवार, 26 जुलाई 2011

अखण्ड ज्योति मार्च 1988
































अखण्ड ज्योति फरवरी 1988



































सोमवार, 25 जुलाई 2011

never come back-Time, Words & Opportunity.

1- A relation is like a lovly bird,
If u catch tightly it dies,
If u catch it losely it flies,
Bt if u catch Affectionately it remains with u whole life. 
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2- Night is longer than day for those who dream & Day is longer than nights for those who MAKE their DREAMS come true. . 
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3- You can See Many Lips Smiles for you. But its Difficult to get an Eyes Which Cries Only for you. Ever you Miss That Lips But Never Miss That Eye. 
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4- Good times become good memories, bad times become good lessons. You never lose, you only gain from life "Keep Smiling". 
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5- Thought about 'Success & Failure'... For both you have to pay the price. For success, you pay BEFORE & for failure, you pay AFTERWARDS. 
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6- Three things of life that once gone, never come back:
Time, Words & Opportunity. 
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7- "If everything is under control, you are going too slow." ---- Mario Andretti . 
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8- Life is short, so follow sum rules, forgive quickly, believe slowly, love truly, laugh loudly n never avoid anything that makes u smile. 
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9- Treat everyone with politeness even those who are rude to you... Not because they are not nice, but because you ARE NICE....! . 
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10- Apply This Attitude 4 Life-
"Log Mere Bare Me Kya Sochte Hai,
Agar Ye Me Sochu To Phir Log Kya Sochege..!"
blv on ur self. 
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11- Chehre ki hsi se hr gm ko mita do,
Bhut km bolo pr sb kuch bta do
Khud na rutho pr subko mna lo,
Yahi RAAZ h zindgi ka,
jeo esa k Jina sikha do. 
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12- Best relations dont need any promises, terms or conditions.They just need 2 wonderful people "one who can trust n one who can understand" 
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13- Respect d old wen u r young, Help d weak wen u r strong, Confess d fault wen u r wrong.
Bcoz 1day in life, u wil b Old, Weak & Wrong 
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14- Best lines i've read: 
"HONESTY is a very expensive gift dont expect it from CHEAP people." 
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15- Best attitude Message: " I'm responsible 4 what i say... not 4 what u understand..." 
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16- Zindagi me sukh dukh aate hi rhte h magar inke karn hm apne kartvay ko na bhule, nhi to hmari zindgi murjhaye phool ki trh ho jayegi. 
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17- BeautifuL Thought:
"Living alone is a special enjoyment when chosen by ourself
But hard to digest when gifted by others" 
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18- Beautiful lins frm shakspeare:
"Close ur eyes & think abt ur lovable persn & momnts spnt with them.Then watch ur lips wil automticaly SMILE" 
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19- Beautiful lines-
"RIVERS" Never go "REVERSE" So try to Live like a RIVER, Don't look back. Focus on your TARGET ahead. 
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20- "When My absence doesn't alters someone's life, then My presence has no meaning in their life". 
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21- Fantastic Quote About Life:
Nothing is "Prewritten" and nothing Cannot Be "Re-Written!" 
So Live d Best and Leave d worst.. 
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22- Fact Of Life-
Don't Be Upset If We Choose d Wrong Person Sometimes Coz Otherwise How Would We Know d True Value Of d Right Ones..!! 
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23- Dusro par "Atention" doge to khud ko "tention" hoga.
Radhe-Radhe... 
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24- EK SACH:
Bolne Se Pehle,
Lafz Insaan Ke Ghulam Hote Hain...
AUR
Bolne Ke Baad Insaan Apne Lafzau Ke Ghulam Ban Jata Hain.
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प्रशंसा अज्ञान की बेटी हैं।

1) प्रबल इच्छा शक्ति से ही व्यसन मुक्ति सम्भव है।
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2) प्रकृति की अपेक्षा अध्ययन से अधिक मनुष्य श्रेष्ठ बने है।
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3) प्रकृति का नियम स्वास्थ्य हैं, बीमारी नही।
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4) प्रकृति का अनुसरण करो - धैर्य उसका रहस्य है।
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5) प्रकृति कोई कार्य व्यर्थ नही करती है।
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6) प्रकृति के नियमों का पालन कीजिये।
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7) प्रमादपूर्ण जीवन संसार की सारी बुराइयों और व्यसनों का जन्मदाता है।
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8) प्रसिद्ध विचारक टेलहार्ड द कारडियन ने मनुष्य के अस्तित्व और अनुभूति के सम्बन्ध में लिखा हैं, हम कोई मनुष्य नहीं है।, जिसे आध्यात्मिक अनुभव हो रहे हों, बल्कि हमारा स्वरुप ही अध्यात्म है, अध्यात्म चेतना जो मनुष्य होने के अनुभव से गुजर रही है।
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9) प्रतिकूलता, शत्रुता, अभाव, भय, आशंका, उपेक्षा आदि का अनुभव होते ही सब कुछ नीरस हो जाता हैं। इतना ही नही भयानक दीखने लगता है। यही हैं - अपने मन का चोर, जो चारों ओर प्रेत पिशाच बन कर नाचता हैं और जीवन का सुख-शान्ति को निगल जाता हैं। भीतर विक्षोभ पडे हो तो बाहर विदु्रपता रहेगी ही। भीतर शान्ति और सन्तोष हो तो बाहर स्नेह, सौजन्य भरा वातावरण दीखेगा ही।
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10) प्रतिदिन सुबह और शाम मन लगाकर भगवान का स्मरण अवश्य किया करो, इससे चैबीसो घन्टे शान्ति रहेगी और मन बुरे संस्कारों से बचेगा।
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11) प्रतिभा के मायने हैं बुद्धि में नई-नई कोंपले फूटते रहना। नई कल्पना, नया उत्साह, नई खोज, नई स्फूर्ति ये सब प्रतिभा के लक्षण है।
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12) प्रतिभा में जो सबसे अच्छी बात होती हैं, उसे वह सबसे पहले दे देती हैं और दूरदर्शिता सबसे बाद में देती है।
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13) प्रतिभावान वह हैं जिसमें समझदारी और कार्य शक्ति विशेष हो।
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14) प्रभु को पाने का प्रयास करेंगे तो प्रभुता अपने आप ही दासी हो जाएगी।
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15) प्रभु ने दो-दो कर दिये करो कमाई आप, पराधीनता सम नहीं और दूसरा पाप।
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16) प्राणी नित्य जैसा अन्न खाता हैं, उसकी वैसी ही सन्तति होती है।
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17) प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखना तथा सदैव ईमानदार बने रहना परम धर्म है।
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18) प्राणीमात्र में आत्मीयता व दया ही धर्म है।
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19) प्राणवान संकल्प साधनहीन परिस्थितियों में भी उगते-बढतें और फलते-फूलते है।
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20) प्रशंसको पर ही प्रसन्न न हो। महत्व उन्हे भी दो जो सही आलोचना कर सकते है।
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21) प्रशंसा कर्तव्य परायणता के लिये बाध्य करती हैं, और चापलूसी कर्तव्य विमुखता की ओर ले जाती है।
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22) प्रशंसा वहा आरम्भ होती हैं, जहा परिचय समाप्त होता है।
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23) प्रशंसा अज्ञान की बेटी हैं।
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24) प्रशंसा और चापलूसी में वही अन्तर है जो अमृत और विष में। प्रशंसा से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता हैं और वह अपना उत्कर्ष करने की ओर बढ़ने लगता हैं जबकि चापलूसी व्यक्ति में मिथ्याभिमान जगा देती हैं और उसे पतन के गर्त में धकेल देती हैं और दिग्भ्रमित कर देती है।

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