शनिवार, 16 जुलाई 2011

गायत्री की असंख्य शक्तियाँ

संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्त किया जाता है, वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें, जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही सफल होता है और उतना ही वैभव उपार्जित कर लेता है। जीवन में शक्ति का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनंद नहीं उठाया जा सकता, यहाँ तक कि अनायास उपलब्ध हुए भोगों को भी नहीं भोगा जा सकता। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही विषय भोगों का सुख प्राप्त किया जा सकता है। यदि ये किसी प्रकार अशक्त हो जाएँ, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रिया-कलाप भी ठीक तरह नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक लगने लगता है। आत्म-बल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्म-बल से रहित व्यक्ति के लिए सर्वथा असंभव ही है।

अतएव शक्ति का संपादन भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने के लिए नितांत आवश्यक है। इसके साथ यह भी जान ही लेना चाहिए कि भौतिक जगत् में पंचभूतों को प्रभावित करने तथा आध्यात्मिक जगत में विचारात्मक, भावात्मक तथा संकल्पात्मक जितनी भी शक्तियाँ हैं, उन सब का मूल उद्गम एवं असीम भाण्डागार वह महत्तत्त्व ही है, जिसे गायत्री के नाम से संबोधित किया जाता है।

भारतीय मनीषियों ने विभिन्न शक्तियों को देवनामों से संबोधित किया है। ये समस्त देव-शक्तियाँ उस परम शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्तत्त्व के अंतर्गत ही है। विद्यमान सभी देव शक्तियाँ उस महत्तत्त्व के ही स्फुलिंग हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहकर पुकराते हैं। जैसे जलते हुए अग्रिकुण्ड में से चिनगारियाँ उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान् शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखने में आती हैं। संपूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाय, तो यह उचित होगा।

इतिहास पर दृष्टिपात करें, तो प्रतीत होगा कि हमारे पूर्वजों ने चरित्र को उज्ज्वल तथा विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त अपने व्यक्तित्व को महानता के शिखर तक पहुँचाने के लिए उपासना का मोहात्मक संबल गायत्री महामंत्र को पकड़ा था और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु ब्राह्मणो, सिद्ध पुरुषों की ही नहीं, साधारण सद्गृहस्थों की उपास्य भी गायत्री ही रही है और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्म-कल्याण का श्रेय साधन किया है, वरन भौतिक सुख-संपदाओं की सांसारिक आवश्कताओ को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है।

गायत्री का महत्त्व बताते हुए महर्षियों ने एक स्वर से गाया है-

गायत्री वेद मातरम

अर्थात- गायत्री वेदों की माता, ज्ञान का आदि कारण है।

इस उक्ति में ही गायत्री को समस्त ज्ञान-विज्ञान का, शक्ति-साधनों का, व्यक्तित्व और समाज- संस्कृति को ऊँचा उठाने के जो उपाय हैं, उन सबकी गंगोत्री बना दिया गया है।

अत स्पष्ट है कि संसार में कुछ भी प्राप्त करने की एकमेव महाशक्ति ने इस निखिल ब्रह्माण्ड में अपनी अनंत शक्तियाँ बिखेर रखी हैं। उनमें से जिनकी आवश्यकता होती है, उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर सकता है। विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेकों शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में कर लिया है। विद्युत्ज, ताप, प्रकाश, चुम्बक, शब्द, अणु- शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य और अविज्ञात शक्तियों को उसने ढूँढ़ा और करतलगत किया है; पर ब्रह्म की चेतनात्मक शक्तियाँ भी कितनी ही हैं, उन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा करतलगत किया जा सकता है। मनुष्य का अपना चुम्बकत्व असाधारण है। वह उसी क्षमता के सहारे भौतिक जीवन में अनेकों को प्रभावित एवं आकर्षित करता है। उसी आधार पर वह साधन जुटाता, सम्पन्न बनता और सफलताएँ उपलब्ध करता है। इसी चुम्बक शक्ति के सहारे वह व्यापक ब्रह्म-चेतना के महासमुद्र में से उपयोगी चेतन तत्त्वों को आकर्षित एवं करतलगत कर सकता है।

इन सभी शक्तियों में सर्वप्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली प्रज्ञा-शक्ति है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा विद्यमान हो, तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती, जो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके। श्रम और मनोयोग तो आत्मिक प्रगति में भी उतना ही लगाना पर्याप्त होता है, जितना की भौतिक समस्याएँ हल करने में आये दिन लगाना पड़ता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते, जितने कि सामान्य जीवन में आये दिन हर किसी को सहने पड़ते हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ और साहस करना पड़ता है, उससे कम में ही उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन का निर्माण-निर्धारण किया जा सकता है। मूल कठिनाई एक ही है- प्रज्ञा प्रखरता की। वह प्राप्त हो सके, तो समझना चाहिए कि जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाने वाली, ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाओं को प्राप्त कर सकने में अब कोई कठिनाई शेष नहीं रह गई।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

यह संकलन हमें श्री अंकित अग्रवाल नैनीताल से प्राप्त हुआ हैं। धन्यवाद। यदि आपके पास भी जनमानस का परिष्कार करने के लिए संकलन हो तो आप भी  हमें मेल द्वारा प्रेषित करें। उसे अपने इस ब्लाग में प्रकाशित किया जायेगा। आपका यह प्रयास ‘‘युग निर्माण योजना’’ के लिए महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
vedmatram@gmail.com

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

guru purnima


पानी हैं तब तक, जंगल हैं जब तक।

1) परमात्मा पूजा से नही, प्रेम से मिलता है।
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2) परमेश्वर को खो देना ही विपत्ति हैं और उसे पा लेना ही सम्पत्ति है।
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3) परहित के लिये थोडा सा कार्य करने से भीतर की शक्तियाँ जाग्रत होती है।
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4) परहित में स्वहित निहित हैं। दूसरे के अपकार या उत्पीडन में भले ही वह मानसिक ही क्यों न हो, स्वहित का दिखायी देना मृगमरीचिका है।
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5) परीक्षा की घडी ही मनुष्य को महान् बनाती हैं, विजय की घडी नही।
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6) परपीडा से छलक उठे मन, यह छलकन ही गंगाजल है। 
दुःख हरने को पुलक उठे मन, यह पुलकन ही तुलसीदल हैं।। 
जो अभाव में भाव भर सके, वाणी से रसदार झर सके। 
जनहिताय अर्पित जो जीवन, यह अर्पण ही आराधन है।।
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7) परोपकार का प्रत्येक कार्य स्वर्ग की ओर एक कदम है।
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8) परोपकार मूर्खता नहीं बुद्धिमानी हैं, क्योकि इसका कई गुना लाभ हमें भी मिलता है।
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9) परचर्चा-परनिंदा में नहीं , स्व सृजन में हैं सार्थकता।
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10) पाण्डव पाँच हमें स्वीकार, कौरव सौ धरती का भार।
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11) पात्रता का दूसरा नाम परिश्रम है।
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12) पात्रताः- पात्रता यदि हो, तो अनुकम्पा कहीं से भी प्राप्त हो जाती हैं। क्षेत्र भौतिक हो या आध्यात्मिक, सर्वत्र याग्यता की ही परख होती हैं। जो योग्य होते हैं उन्हे पद, प्रतिष्ठा, सहायता, सम्मान सब कुछ प्राप्त होते है। अयोग्यो और अपात्रो की तो हर रोज उपेक्षा ही होती है। हम पात्रता विकसित करें, सहायता स्वयमेव खिंची चली आयेगी।
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13) पारिवारिक आनन्द के लिए गहन अन्तस्तल से निकलने वाले सद्भाव की आवश्यकता हैं और इसे केवल वे ही उपलब्ध कर सकते हैं जो स्वयं उदार, सहृदय और सेवा भावनाओ से परिपूर्ण हो। परिवार में स्वर्गीय वातावरण का सृजन केवल जीवन विद्या के आदर्श ही कर सकते है।
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14) पाप की कौडी पुण्य का सोना भी खींच ले जाती है।
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15) पाप की अवहेलना मत करो।
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16) पाप का निश्चित परिणाम दुःख है।
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17) पाप का आरम्भ लालच से होता है।
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18) पाप सभी बीमारियों से बुरा हैं, क्योकि वह आत्मा पर चोट करता है।
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19) पानी जितना गहरा होता हैं, उतना ही शांत रहता है।
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20) पानी हैं तब तक, जंगल हैं जब तक।
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21) पाँच अंगो ( दो हाथ, दो पैर और मुँह ) को गीला कर पूर्व की ओर मुँह कर मौन हो भोजन करे।
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22) पद और धन सुनहरी बेडि़या है।
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23) पदार्थ विज्ञान में प्रयोग करना पडता हैं, अध्यात्म विज्ञान में प्रयोग की आवश्यकता नही।
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24) पुरुष अपने ही क्रिया-कलापो से बना हैं। वह जैसा सोचता हैं वैसा ही हो जाता है।

परिवर्तन से डरोगे तो तरक्की कैसे करोगे ?

1) पढिबे को फल गुनब हैं, गुनबे को फल ज्ञान। ज्ञान को फल हरिनाम हैं, कहि श्रुति संत पुराण।
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2) परिस्थिति ही महापुरुषो का विद्यालय है।
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3) परिस्थिति सदा अनुकूल ही रहें, ऐसी आशा न करों। संसार केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बना है।
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4) परिश्रम ही सफलता की कुन्जी है। यदि आपने वाकई परिश्रम किया हैं तो यकीन मानिये सफलता आपकी ही राह देख रहीं है।
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5) परिवार-नियोजन कार्यक्रम से आयु और कम होंगी तथा रोग बढेंगे। स्वामी रामसुखदास जी महाराज।
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6) परिवारों में सुसंस्कारिता बोये, सर्वतोन्मुखी प्रगति के दृश्य देखे।
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7) परिवर्तन से डरोगे तो तरक्की कैसे करोगे ?
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8) परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतराना मनुष्य की सबसे बडी कायरता है।
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9) पडित/संत-जो शास्त्रों के पीछे दौडता हैं, वह पंडित है। और जो सत्य के पीछे दौडता है, वह संत है। पंडित शास्त्रो के पीछे दौडता है। जबकि संत के पीछे शास्त्र दौडतें हैं। शास्त्र पढकर जो बोले वह पंडित और सत्य पाकर जो बोले वह संत हैं। पंडित जीभ से बोलता है, संत जीवन से बोलता हैं, जिसका जीवन बोलने लगे, वह जीवित भगवान है।
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10) पवित्र बनने के लिए प्रेम की आँख चाहिए। पुण्यवान बनने के लिए श्रद्धा की आँख चाहिए। प्रसन्न रहने के लिए आशा की आँख चाहिए। प्रभु दर्शन पाने के लिए प्रतीक्षा की आँख चाहिए।
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11) पवित्र विचारों से ओत-प्रोत व्यक्ति की ईश्वर व प्रकृति भी सहायता करने लगते है।
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12) पतिव्रता नारी गरीब-से-गरीब घर को स्वर्ग बना देती है।
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13) पीढियों को सुसंस्कृत बनाना हैं तो महिलाओ को सुयोग्य बनाओ।
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14) पीपल को अति प्राचीन, पवित्र एवं दिव्य वृक्ष माना हैं, जो अपने चारो ओर वातावरण में सतोगुणी विचार एवं भाव घोलता रहता है।
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15) पीपल के मूल में शनिवार के दिन काले तिल, दूध और जल या गंगाजल मिलाकर डालने से पाप-तापों का शमन होता हैं । शनिवार की शाम या रात को सरसों तेल का दीपक जलाने का भी विधान है।
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16) पीतल और सोने में, काँच और रत्न में जो अन्तर हैं वही अन्तर सांसारिक सम्पत्ति और आध्यात्मिक सम्पदा के बीच में भी है।
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17) पर दोष दर्शन एवं अपने गुण दर्शन का त्याग करना चाहिये।
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18) परमपिता परमेश्वर आपकी जीवन-साधना को परिपक्व और प्रखर करे। आपकी अंतर्निहित शक्तिया जाग्रत हो। जीवन सफलता और समृद्धि की ओर अग्रसर होता रहे। यश एवं कीर्ति के गान जिंदगी के आंगन में गूँजते रहे। उल्लास और उमंगो की नई तरंगो का स्पर्श मिलता रहे। आंतरिक प्रसन्नता व संतोष से अंतःकरण का हर कोना सुवासित होता रहे। ऐसी मंगलकामना।
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19) परम्पराओ की तुलना में विवेक को महत्व दीजिये।
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20) परमपूज्य गुरुदेव ने पाठक मनोविज्ञान को पढने का प्रयास किया था। देखा कि आत्मज्ञान घुट्टी कडवी हैं व इसे सुगर कोटेड गोली के रुप में देना हैं तो जिज्ञासा को जिन्दा बनाये रखकर धीरे-धीरे इन सभी विषयों के प्रति आकर्षण को प्रगतिशील मोड देना होगा। यही विचार-परिवर्तन हैं, ब्रेनवाशिंग हैं। वस्तुतः यह बडी धीमी प्रक्रिया होती है।
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21) परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि अपने अन्तःकरण के अतिरिक्त और कोई भी अपनी गतिविधियों की समीक्षा कर सकने लायक नहीं है।
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22) परमार्थ की साहसिकता अपनाने वाले पर सम्मान बरसता है।
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23) परमात्मा की उपासना के साथ कामनाए जोडना ओछापन है।
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24) परमात्मा का ज्ञान परमात्मा से अभिन्न होने पर ही होता हैं और संसार का ज्ञान संसार से अलग होने पर ही होता है-यह बात आप याद कर ले।

अखण्ड ज्योति जनवरी 1988


























अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1987































अखण्ड ज्योति नवम्बर 1987


































अखण्ड ज्योति सितम्बर 1987






























Sajal Shraddha-Prakhar Praghya


अखण्ड ज्योति अगस्त 1987






























अखण्ड ज्योति जुलाई 1987































31. अपनो से अपनी बात-गुरूतत्व की गरिमा जाने व जुड़ने का प्रयास करें

अखण्ड ज्योति जून 1987






























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