सोमवार, 9 अगस्त 2010

जन्म शताब्दी वर्ष २०११ के कार्यक्रमों का स्वरूप समझें-तैयारी करें


पूर्व समीक्षा 
युगऋषि से युगशिल्पियों का स्नेह सामयिक नहीं, जन्म-जन्मान्तरों से पल रहा है । इसलिए उनके लिए कुछ कर गुजरने की व्याकुलता मन-मस्तिष्क में सहज ही उभरती रहती है । उनकी जन्म शताब्दी को लेकर एक अनुपम उत्साह सभी के हृदयों में हिलोरें ले रहा है । इन कथनों में न कोई बनावट है और न कोई अतिशयोक्ति । 

उक्त सच्चाइयों के साथ ही हमें यह सच्चाई भी ध्यान में रखनी चाहिए कि उक्त सम्बन्धों के नाते युगऋषि-युगचेतना कुछ विशेष आशाएँ-उम्मीदें लगाये हुए हैं । समय सीमा में कुछ अनिवार्य कार्य करने, युग निर्माण के लिए अनुकूल एवं प्रभावपूर्ण वातावरण बनाने की चुनौतियाँ भी हमारे सामने खड़ी हैं । हम उन्हें नकार नहीं सकते । अपने जन्म-जन्मांतरों की प्रतिष्ठा की रक्षा और अपने नैतिक दायित्वों की पूर्ति करना हमारे अस्तित्वों को बनाये रखने के लिए जरूरी है ।

हमारे लिए यही उचित है कि हम अपनी-अपनी भूमिकाओं को समझदारी के साथ निर्धारित कर लें, ईमानदारी से उनकी पूर्ति के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का उपयुक्त अंश लगाते रहें, जिम्मेदारी के साथ परस्पर सहयोगपूर्वक आगे बढ़ें तथा बहादुरी के साथ मार्ग की बाधाओं-विषमताओं को चीरते हुए निर्धारित लक्ष्य तक आंदोलन को पहुँचायें । इन्हीं सब चरणों को पूरा करने के लिए 'उल्टी गिनती' के मुहावरे का प्रयोग पत्रिकाओं के पृष्ठों पर किया जाता रहा है । 

प्रसन्नता की बात है कि लगभग सभी क्षेत्रों के परिजनों ने प्रयाज वर्ष (२०१०-११) में जन्मशती तक के लिए कुछ सुनिश्चित लक्ष्य बना लिए हैं । कुछ बना रहे हैं अथवा लक्ष्यों का पुनर्निधारण कर रहे हैं । कार्यक्रम की तिथियाँ और उनका स्वरूप स्पष्ट हो जाने पर श्रेष्ठतर लक्ष्य निर्धारित करने और उन तक पहुँचने के उनके उत्साह में निश्चित रूप से बढ़ोत्तरी होगी । 

निर्धारित चार कार्यक्रम 
पूज्य गुरुदेव की जन्मशती के लिए वसंत पर्व २०११ से वसंत पर्व २०१२ तक का समय निश्चित किया गया है । इस अवधि में ४ कार्यक्रमों को प्राणवान ढंग से करने का निर्णय किया गया है । उनमें से दो कार्यक्रम केन्द्रीय स्तर पर होंगे तथा दो कार्यक्रम क्षेत्रीय स्तर पर विकेन्द्रित सुनियोजित रूप से किये जाएँगे । 

केन्द्रीय कार्यक्रमों के अंतर्गत पहला कार्यक्रम २० फरवरी को दिल्ली के किसी स्टेडियम में किया जायेगा । इस कार्यक्रम का प्रारूप महापूर्णाहुति के क्रम में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में हुए कार्यक्रम के ढंग का होगा । 

दूसरा कार्यक्रम ७ से ११ नवम्बर की तिथियों में हरिद्वार में किया जायेगा । इसका प्रारूप सन् २००० में युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के ढंग का होगा । 

उक्त दोनों कार्यक्रमों की तिथियाँ तो निश्चित कर ली गई हैं, उनके सुनिश्चित प्रारूप तथा उनमें क्षेत्रीय परिजनों की भागीदारी के विविध अनुशासन-आयाम समय रहते निश्चित करके प्रसारित कर दिये जायेंगे । इनसे संबंधित विविध व्यवस्थाओं की जिम्मेदारियाँ भी पहले की तरह क्षेत्र की प्रामाणिक-अनुशासित संगठित इकाइयों को समय रहते सौंप दी जायेगी । 

क्षेत्रीय कार्यक्रमों के प्रारूप गुरुवर की आकांक्षा के अनुरूप श्रद्धा साधनापरक बनाये गये हैं । गुरुदेव की हीरक जयंती के समय वे सूक्ष्मीकरण साधना में थे । वन्दनीया माताजी ने उनकी इच्छानुसार हीरक जयंती कार्यक्रम की रूपरेखा एक पुस्तिका के रूप में प्रसारित की थी । उसमें उसे सृजनशील साधनामय बनाने का आग्रह था । 

क्षेत्रीय दोनों कार्यक्रमों के प्रारूप इस प्रकार हैं- 
१- जन्मशती उत्सव- पूज्य गुरुदेव वसंत पंचमी को ही अपना जन्मदिन मनाते रहे हैं, इसलिए इस उत्सव का आरंभिक कार्यक्रम २०११ के वसंत पर्व ८ फरवरी को होगा । सामान्य रूप से यह तीन दिन चलेगा । इसे अपने संगठन की सभी छोटी-बड़ी इकाइयाँ एक साथ, एक अनुशासन के साथ सम्पन्न करेंगी । विकेन्दि्रत कार्यक्रम का लाभ यह होगा कि हर क्षेत्र के परिजन और श्रद्धालु इनमें सहजता से भाग ले सकेंगे । 

* प्रभात फेरियाँ - दिनांक ६ फरवरी रविवार को सभी जगह-प्रभात फेरियाँ अथवा शोभा यात्राएँ, कलश यात्राएँ निकाली जायेंगी । नगरों में प्रातः अनेक प्रभात फेरियाँ मोहल्ले-मोहल्ले में निकाली जा सकती हैं । दोपहर बाद एक शोभायात्रा-कलशयात्रा, झाँकियों सहित संयुक्त रूप से निकाली जानी चाहिए । 

* अखण्ड जप - दिनांक ७ को प्रातःकाल ६ बजे से ८ तारीख को प्रातः ६ बजे तक के लिए अखण्ड जप रखा जायेगा । इसे नगरों, ग्रामों में अपनी संगठित इकाइयों के स्तर पर जगह-जगह चलाया जाना चाहिए । साधना स्थल पर कलश, दीपक, मशाल, ऋषियुग्म सहित देव मंच स्थापित हो । बाहर द्वार पर 'युगऋषि जन्मशती उत्सव' का तथा देवमंच पर 'सबके लिए सद्बुद्धि-सबके लिए उज्ज्वल भविष्य' का बैनर रहे । गायत्री परिजनों के अतिरिक्त अन्य श्रद्धालुओं को भी इस हेतु सामूहिक जप के लिए आमंत्रित किया जाय । वे गायत्री मंत्र जपें, तो सबसे उत्तम अन्यथा उन्हें बैनर में अंकित भावना के साथ अपने इच्छित मंत्र या नाम के जप की छूट दी जा सकती है । जप के लिए परिजनों की टोलियाँ सुनिश्चित रहें । अन्य श्रद्धालु सुविधानुसार समय पर आते-जाते रह सकते हैं । 

* नवयुग स्वागत दीपदान- दिनांक ७ को ही शाम को सूर्यास्त के बाद नगर-ग्राम के सभी घरों में नवयुग स्वागत के भाव से कम से कम ५-५ दीपक प्रज्वलित किए जाएँ । इसके लिए पहले से ही जन-जन को प्रेरित-संकल्पित कराया जाय । 

* यज्ञ-श्रद्धांजलि - दिनांक ८ को प्रातः ६ बजे जप समाप्त कर दिया जाय । वहीं ७ बजे से सामूहिक यज्ञ-श्रद्धांजलि का क्रम चलाया जाय । यह क्रम सभी जगह प्रातः ७ से १० बजे के बीच होगा । यज्ञकुण्ड अथवा वेदियों की संख्या भागीदारों की संख्या के अनुसार १ से ९ तक रखी जा सकती है । 

देवपूजन के बाद अग्नि स्थापन के पहले गुरुसत्ता को व्यक्तिगत एवं सामूहिक श्रद्धांजलियाँ अर्पित की जायें । सामूहिक रूप से प्रयाज वर्ष में जो विभिन्न लक्ष्य बनाये गये थे, उनमें सफलता की रिपोर्ट पढ़ी जाय । हर साधक-परिजन ने प्रयाज वर्ष में अपनी ईश उपासना, जीवन साधना तथा लोक आराधना में क्या प्रगति की तथा अनुयाज वर्ष के लिए क्या निर्धारण किया? इसे पहले से नोट करके रखें । एक प्रति स्मृति पत्र के रूप में अपनी पूजा स्थली पर रखें तथा एक प्रति श्रद्धांजलि रूप अर्पित करें । 

इसके बाद अग्नि स्थापन करके यज्ञ किया जाय । साधकों की संख्या के अनुसार एक या अधिक पारियाँ चलाई जायें । बाद में आरती-पुष्पांजलि करके यज्ञ का समापन करें । 

प्रसाद में युगऋषि की इच्छा के अनुरूप अमृताशन की ही व्यवस्था रखी जाय । 

* युग निर्माण सम्मेलन दीपयज्ञ - उसी दिन शाम को ५ से ७ या ६ से ८ बजे के बीच ग्राम, नगर के अथवा शक्तिपीठों के स्तर पर युग निर्माण सम्मेलन एवं दीपयज्ञ का आयोजन किया जाय । नगर के तमाम श्रद्धालुओं, प्रबुद्धों, विभिन्न संगठनों के सूत्र पुरुषों को उसमें आमंत्रित किया जाय । 

मंच से युग संगीत के बाद गुरुसत्ता के क्रांतिदर्शी-युगऋषि वाले स्वरूप को खोला जाय । विभिन्न संगठनों-सम्प्रदायों के प्रगतिशील विचार के प्रतिनिधियों को भी वक्ता के रूप में बुलाया जाय । उन्हें युग निर्माण योजना तथा सत्संकल्प के सूत्र विभिन्न भाषाओं में पहले से दे दिये जायें तथा उस संदर्भ में उन्हें विचार व्यक्त करने को कहा जाय । 

अंत में युग निर्माण के सूत्रों को जीवन में धारण करने की अपील के साथ प्रतीकात्मक दीपयज्ञ कराया जाय । जिन अन्य संगठनों के साथ विभिन्न आन्दोलनों को गति देने की सहमति बने, उसकी घोषणा की जाय तथा आभार प्रदर्शन के साथ आरती करके कार्यक्रम सम्पन्न किया जाय । 

२ सृजन साधना महापुरश्चरण की पूर्णाहुति - युगऋषि की जन्म शताब्दी के दो वर्ष पूर्व से परिजनों को 'सृजन साधना महापुरश्चरण' चलाने के लिए संकल्पित कराया जा चुका है । उसके अंदर जप और व्रत के अनुशासन इस प्रकार रहे हैं - 

जप - प्रातः ६ से ६.३०, दोपहर १.३० से २.०० तथा शाम ६.०० से ६.३० बजे तक कम से कम किसी एक अवधि में सामूहिक सृजन चेतना जागरण के भाव से सामूहिक जप में भाग लेना । 

व्रत - सामान्य साधक युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्रों को कसौटी मानकर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत-उन्नत बनाने के सुनिश्चित व्रत लें । व्रतधारी साधक युग निर्माण सत्संकल्प के साथ 'अपने अंग-अवयवों से' नामक पत्रक के र्निदेशों को भी अपनी जीवन साधना की कसौटी मानें । दोनों ही वर्ग गहन आत्म समीक्षा करते हुए आत्म शोधन, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास की उच्चतर सीढ़ियों पर आगे बढ़ें ।

निर्धारित नियमों के अनुसार नैष्ठिक परिजनों ने जगह-जगह सामूहिक साधना का क्रम चलाया भी है । इस साधना में भाग लेने वाले सभी साधक साधना की पूर्णाहुति चैत्र नवरात्रि की पूर्णाहुति के साथ (रामनवमी १२ अप्रैल) को करेंगे । यह पूर्णाहुति भी सभी छोटी-बड़ी संगठित इकाइयों में एक साथ प्रातः ७ से १० तक सम्पन्न की जायेगी ।

सृजन साधना महापुरश्चरण के जो साधक नवरात्रि साधना में शामिल होंगे, वे तो सहज ही पूर्णाहुति में भाग ले लेंगे । जो किसी कारण नवरात्रि साधना में भाग न ले सकें, वे साधना स्थल पर निर्धारित समयों में से किसी एक अवधि में आधा घंटे के जप में शामिल रहें तथा अंतिम दिन पूर्णाहुति में भागीदार बनें । 

प्रयाज को प्राणवान बनायें 
युगऋषि की जन्म शताब्दी पर उन्हें प्रसन्न करने के प्रयाज के लक्ष्यों को श्रेष्ठतर तथा प्रयासों को प्राणवान बनाने के लिए प्राणपण से पुरुषार्थ किये जायें । उन सूत्रों को पुनः स्मरण करके उन्हें निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचाने की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए । मुख्य सूत्र इस प्रकार हैं- 

-जो उन्होंने मुँह खोलकर माँगा, वह हम दिल खोलकर कर दें ।

- प्रज्ञा परिजन कम से कम दो करोड़ (क्षेत्र की कुल आबादी का दो प्रतिशत) 

- प्रज्ञापुत्र-अग्रदूत कम से कम दो लाख । 

- युग निर्माण के लिए हमारे (युगऋषि के) विचारों को जन-जन तक पहुँचायें । युग निर्माण सभी के लिए है, सभी सृजनशील संगठनों और सृजनशील प्रतिभाओं की उसमें सुनिश्चित भागीदारी हो । 

उक्त प्रयोजनों की पूर्ति के लिए दो जेबी पुस्तिकाएँ- 'दीक्षित-नैष्ठिक परिजन चढ़ायें एक सार्थक श्रद्धांजलि' तथा 'युगऋषि एवं उनकी योजना को समझें-समझाएँ, लाभ उठायें' । यह दोनों पुस्तिकाओं के आधार पर उक्त आन्दोलनों को व्यापक बनाया जा सकता है । 

दो छोटे व्यापक कार्यक्रम - 

१- गायत्री महामंत्र सद्बुद्धि दाता है । सभी लोग उसे अपना सकते हैं । घर-घर पूजा स्थल पर गायत्री मंत्र तथा घर के मुख्य कक्ष में गायत्री मंत्र के भावार्थ की स्थापना कराई जाय । इसके लिए प्रेरणा पत्र पाक्षिक प्रज्ञा अभियान के १६ जून २०१० के अंक में संपादकीय पृष्ठ पर छपा है । शांतिकुन्ज में गायत्री जयंती तथा गुरु पूर्णिमा पर वितरित भी किया गया है ।

२- उज्ज्वल भविष्य तक पहुँचाने वाले युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्र तथा युगशक्ति की प्रतीक मशाल का व्याख्या वाला चित्र युगऋषि की ऐसी सार्वभौम कृतियाँ हैं, जिन्हें कोई नकार नहीं सकता । इनकी स्थापना घर-घर, कार्यालयों, विद्यालयों, सार्वजनिक स्थलों पर कराने का प्रखर अभियान चलाया जाय । 

- संगठन को समर्थ बनाकर उसके माध्यम से सप्त आन्दोलनों को गतिशील बनाना, नये क्षेत्रों में युग संदेश पहुँचाना, तपःपूत प्रशिक्षण द्वारा परिजनों के व्यक्तित्वों को ऊँचा उठाने का क्रम बनाना; इन सभी को यथाशक्ति सुनिश्चित बनाने की अपील समय-समय पर की जाती रही है । परिजन शताब्दी समारोह तक इनको बेहतर-श्रेष्ठतर लक्ष्य तक पहुँचाएँ, ऐसी अपेक्षा है ।

रविवार, 8 अगस्त 2010

विचार-परिवर्तन


आज मनुष्य एक ऐसा जानवर हो गया है, जिसको समझदारी सिखाई जानी चाहिए ।

उसके लिए दूसरी चीजें, जिनको हम शारीरिक आवश्यकताएँ कहते हैं और जिनको हम आर्थिक आवश्यकताएँ कहते हैं, अगर पहाड़ के बराबर भी जुटा करके रख दी जाएँ, तो आदमी का रत्ती भर भी भला नहीं हो सकता । हम देखते हैं कि गरीब आदमी दुखी हैं । अमीर आदमी उससे भी ज्यादा हजार गुनी परेशानी में, उलझनों में, क्लेशों में पड़े हुए हैं, क्योंकि उनके पास विचार करने की कोई शैली नहीं है । अगर उनके पास कोई विचार रहा होता तो इतना अपार धन उनके पास पड़ा हुआ है, जिसके द्वारा समाज में न जाने क्या व्यवस्था उत्पन्न हो गई होती । न जाने समाज का कैसा कायाकल्प हुआ होता । लेकिन नहीं, वही धन बेटे में, पोते में, जमीन और जेवर-सब में ऐसे ही तबाह होता चला जाता है । 

पैसा है तो इसका क्या करें ? समाज के सामने ढेर लगी समस्याओं का हल किस तरीके से करें, कुछ समझ में नहीं आता । ऐसी बेअक्ली की अवस्था को दूर करने के लिए यह आवश्यकता अनुभव की गई कि लोगों को समझदारी सिखाई जाए । समझदारी केवल ज्योमेट्री, इतिहास, भूगोल को नहीं कहते । समझदारी उसे कहते हैं, जिसके द्वारा सही चिंतन करने के बाद में आदमी व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं, समाज की समस्याओं और अपने युग की समस्याओं का समाधान कर सके । ऐसी जानकारियों का नाम ज्ञान है । आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की समझी गई है कि हजार वर्ष की गुलामी के बाद आदमी के विचार करने का ढंग भ्रष्ट हो गया है, उसका कण-कण दूषित और विकृत हो गया है । इसको उखाड़ करके फेंक दिया जाए और सोचने के नए तरीके लोगों के दिमागों में स्थापित किए जाएँ । यह शिक्षण करना मानव जाति की, समाज की सबसे बड़ी सेवा है । 

पिछले हजारों वर्ष ऐसे भयंकर समय में गये हैं, जिसमें सामंतवाद से लेकर के पंडावाद तक छाया रहा । राजसत्ता जिन लोगों के हाथ में रही, उनको हम सामंत कहते हैं, उनको हम राजा कहते हैं और उनको हम डाकू कहते हैं । उन लोगों ने सिर्फ अपने महल, अपनी अय्याशी और विलासिता के लिए समाज का शोषण किया और बराबर ये कोशिश की कि कहीं ऐसा न हो जाए कि विचारशीलता फैल जाए और लोगों में अनीति के विरुद्ध बगावत का भाव पैदा हो जाए, न्याय की भावना पैदा हो जाए । फिर हमारा क्यों करेंगे ये लोग समर्थन? यही कोशिश पंडावाद ने भी की कि लोग समझदार न होने पाएँ । समझदार हो जाएँगे तो हमारे शिकार हमारे हाथ से निकल जायेंगे । 

सामाजिक कुरीतियों को देखिये न; कोई तुक है इसमें? कोई बात है? कोई चीज है इसमें? हमारी कुलदेवी पर हमारे बच्चे का मुंडन होगा । कुलदेवी कहाँ रहती है तुम्हारी? २००० मील दूर रहती है । वहाँ क्या करोगे? बच्चे का मुंडन कराने ले जाएँगे । फिर क्या हो जाएगा? देवी को बालों का चढ़ावा देंगे । क्या करेगी देवी? बालों को खाएगी । रोटी नहीं खाती? नहीं, बाल खाती है । बाल नहीं खिलाये तो? ये देवी बीमार कर देगी और बच्चे को मार डालेगी । देवी है कि चुड़ैल है । इस तरह की चुड़ैलों को देवियाँ बना दिया गया, कुलदेवी बना दिया गया । पागल आदमी कलकत्ता से रवाना होता है और कुलदेवी उसकी जैसलमेर में रहती है । दो हजार रुपया फूँककर के आ जाता है और बच्चे का मुंडन करा के आता है और समझता है कि मैंने देवी के ऊपर अहसान कर दिया या देवी ने उसके ऊपर अहसान कर दिया । हमारी सामाजिक कुरीतियाँ कैसी बेहूदा हैं! ये कुरीतियाँ हमारा सारा का सारा पैसा खा जाती हैं, अक्ल खा जाती हैं । जाने क्या से क्या खा जाती हैं? 

जन्म पत्रियों की बात को ले लीजिए न । जन्मपत्री का जंजाल ऐसा खड़ा हो गया है कि लाखों आदमी उसी से उल्लू बने फिरते हैं । मंगल आ गया, राहू आ गया, चन्द्रमा आ गया, शुक्र आ गया । चन्द्रमा इन्हीं के ऊपर आ गया है और यहीं राजा साहब बैठे हुए हैं । चन्द्रमा भी इन्हीं के पीछे-पीछे फिरेगा । चन्द्रमा के पास काम ही नहीं है । इन्हीं को मारेंगे, इन्हीं की पूजा करेंगे, इन्हीं पर लक्ष्मी बरसाएँगें, इन्हीं को हानि पहुँचाएँगे । बस यही रह गये हैं नवाब के तरीके से । चन्द्रमा इन्हीं के पीछे पड़ेगा । बेवकूफ कहीं के । इस तरीके से बे अक्ली और बेवकूफी का कोई अन्त है क्या? 

आदमी के जी में न जाने कैसे यह विश्वास जम गया है कि हम अगर बेईमान होकर के जिएँगे तो और मालदार हो जाएँगे । कामचोरी करेंगे तो हमारी तरक्की हो जाएगी । ये करेंगे, तो हमारा ये हो जाएगा । भ्रष्ट आदमी का मन ऐसा घटिया हो गया है कि मेरे मन में ऐसा आता है कि सारी की सारी विचार करने की शैली को मैं बदल दूँ । एक और भी जमाना ऐसा आया था कि जिस जमाने में हर आदमी के विचार करने का ढंग बहुत ही घटिया और बहुत ही नीच हो गया था । फिर क्या हुआ? भगवान ने अवतार लिया था और वह परशुराम जी का अवतार था । 

परशुराम जी के अवतार ने हाथ में एक कुल्हाड़ा लिया और उस कुल्हाड़े से आदमियों के सिर काट डाले । सिर काट डालने का क्या मतलब है? परशुराम भगवान का अवतार इसी उद्देश्य के लिए हुआ था कि दुर्गुणों को, लोगों की अक्ल और समझ को हम बदल दें, तो आदमी की निन्यानवें फीसदी समस्या अपने आप हल हो जाएगी । 

मनुष्य की जितनी भी समस्याएँ हैं, सब उसकी बेअक्ली की पैदा की हुई समस्याएँ हैं । संतान नहीं होती है, तो बहुत ही अच्छी बात है । इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? संतान नहीं है, तो आप अकेले हैं । मियाँ-बीबी दो आदमी रहिए और अपना बचा हुआ पैसा समाज के लिए लगाइए । खुशहाली से रहिए, सैर कीजिए । बच्चे के पालन करने की जिम्मेदारी नहीं है, रोने-चिल्लाने की जिम्मेदारी नहीं है । दवा-दारू की जिम्मेदारी नहीं है । बताइए, इसमें क्या बात है? नहीं साहब! हमारे बच्चा नहीं होता, हम तो दुखी हैं । हमारी मनोकामना पूर्ण हो जाए तो अच्छा है । हमारे बच्चा हो जाए, तो अच्छा है । बेवकूफ कहीं का! बेअक्ली और बेवकूफी हमारे रोम-रोम में इस बुरी तरीके से छा गई है कि मनुष्यों को मैं क्या कहूँ? मैं उसको जानवर ही कह सकता हूँ । 

साथियो! अपनी युगनिर्माण योजना के युग परिवर्तन के कार्यक्रम में पहला स्थान विचार परिवर्तन को दिया गया है । हमने ये कोशिश की है कि इस तरह के विचारों की एक धारा और उसकी पद्धति और संहिता का निर्माण किया जाए, जो मनुष्यों के गलत सोचने के स्थान पर सही सोचने का मार्गदर्शन कर सके । मैंने ढेरों पुस्तकें पढ़ी है, लेकिन ऐसा साहित्य कहीं नहीं है, जो आदमी को और उलझन में डालने के बजाय उसको सही सोचने का तरीका सिखाए । सही सोचने का तरीका सिखाने के लिए युगनिर्माण योजना ने ऐसा साहित्य, ऐसी विज्ञप्तियाँ, ऐसे ट्रैक्ट कम-से-कम मूल्य पर छापे हैं, जिसको पढ़ने के बाद आदमी को स्वतंत्र चिंतन की दिशा मिले । आदमी को यह प्रकाश मिले कि हमारे सोचने का सही तरीका क्या है, व्यक्ति की उलझनों का वास्तविक कारण क्या है, उनका समाधान किस तरीके से किया जा सकता है? अगर गलत सोचने की बात को आदमी जान ले और सही सोचना शुरू कर दे, तो मजा आ जाए

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 7 अगस्त 2010

जीवन में 'कमाल' पैदा करना है? तो जीवन में कबीर को जाग्रत् करें

इसके लिए उनकी सराहना काफी नहीं, उनकी जीवन साधना अपनानी होगी 

[कबीर और युगऋषि में अभेद की बात नैष्ठिक परिजन भली प्रकार जानते है । कबीर जयंती (२६ जून) के संदर्भ में उन्हीं (युगऋषि) की प्रेरणा से उभरे कुछ भाव-सुमन उन्हीं के श्री चरणों में अर्पित हैं । इनकी सुगंध श्रद्धालु पाठकों, परिजनों के मन-मानस में भी उभरे, सारे वातावरण को सुवास से भर दे, ऐसी मंगल कामना सहित निवेदित ।] 

कबीर का कमाल 

सभी को पता है कि कबीर के पुत्र का नाम रखा गया 'कमाल' । इस शारीरिक संयोग के परे भी कबीर के जीवन में 'कमाल' ही होता रहा । कमाल से कम कुछ करने का जैसे उनका स्वभाव ही नहीं रहा ।

जो लोग जीवन के विकास के लिए परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना रोते रहते हैं, उनके लिए कबीर का जीवन संजीवनी बूटी से किसी प्रकार कम नहीं । माता-पिता का पता नहीं, हिन्दू-मुसलमान दोनों से उपेक्षित, कोई कहे म्लेच्छ-कोई कहे काफिर, लिखना-पढ़ना सीख नहीं सके, जुलाहे का छोटा समझा जाने वाला काम करके किसी प्रकार जीवन बिताया । लौकिक रूप से उनका जीवन प्रतिकूलताओं-विसंगतियों से भरा रहा । 

लेकिन वाह रे कबीर! उन प्रतिकूलताओं-विसंगतियों की कोई शिकायत नहीं । मालिक ने जो नहीं दिया, उसे महत्त्व नहीं दिया । मालिक द्वारा मनुष्य को दी गई अद्भुत संभावनाओं को देखा-समझा और साकार कर दिखाया । कुरूप और दुर्गंधयुक्त कीचड़ जैसी परिस्थितियों में वे कमल की तरह दिव्य सौन्दर्य और सुगंध लेकर विकसित हुए । 

उनकी आँखों को स्वार्थी समाज ने कागज पर लिखा ज्ञान पढ़ने की कला भले ही नहीं सिखाई, किंतु उन्होंने अन्तःचेतना के निदेर्शों के सहारे प्रकृति तथा जीवन के गूढ़-सनातन सत्यों-रहस्यों को पढ़ने-समझने में कमाल हासिल कर लिया । इसीलिए किताबी ज्ञान के सहारे उन्हें चुनौती देने वाले कथित पंडितों को उन्होंने बड़े सहज, प्रौढ़ और आत्मीयता भरे अंदाज में यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि 'तू कहता कागद के लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी ।' 

आजीविका के लिए हाथ से चलने वाले करघे पर कपड़ा बुनने से अधिक और कोई कौशल भले ही उन्हें नहीं सिखाया गया, किंतु उन्होंने कपड़े के ताने-बाने के सहारे जीवन के ताने-बाने का रहस्य जरूर समझ लिया । उन्होंने जीवन की चादर बुनने, इच्छित रंग में रंगने तथा उपयोग करते हुए भी उसे बेदाग रखने की अद्भुत महारत जरूर हासिल कर ली । सहज भाव से जीवन की चादर बुनने का मर्म 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' लिखकर बता गये । 

लोग कहते रहते हैं 'चादर' ओढ़ने से मैली तो होगी ही, लेकिन जीवन साधना के ममर्ज्ञ के रूप में उन्होंने सहज अभिव्यक्ति दी कि जीवन जीना एक कला है । जीवन की चादर को यदि सावधानीपूर्वक प्रयोग में लाया जाय, तो उसे बेदाग भी रखा जा सकता है । 'दास कबीर जतन तें ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया'- है न कमाल ? 

ऐसा व्यक्ति जिसने 'मसि कागज छुओ नहिं, कलम गही नहिं हाथ' लेकिन कविता में सहज बोधगम्य पदों से लेकर 'गूढ़तम उलटबासियों' तक उनकी काव्य क्षमता में कितने प्रकार के मनोरम रंग दिखाई देते हैं? 

सामाजिक कुरीतियों पर उनके प्रहारों से लेकर ब्रह्मज्ञान की गूढ़ताओं पर काव्यमय अभिव्यक्तियाँ अपने आप में अनोखी दिखाई देती हैं । उनके जीवन के किसी पन्ने को खोलो तो उसे पढ़-समझ कर यही भाव मन से निकलते हैं कि वाकई उन्होंने हर क्षेत्र में 'कमाल' पैदा किया । 

कहत कबीर सुनो भई साधो 

जीवन में कमाल हासिल करने की कामना सभी के मन में उभरती है । कबीर अपने कमाल पैदा करने के करिश्मे छिपाना नहीं चाहते, इसीलिए वे खुला आमंत्रण देते रहते हैं - 

कबीर ने जो पाया-समझा, उसे वे सबको हस्तांतरित करने को तैयार हैं, लेकिन उसके उपयोग की आवश्यक शर्ते भी अपनी सहज भाषा में स्पष्ट करते रहते हैं । कबीर जो कह रहे हैं उसे साधु स्वभाव के, सज्जनों द्वारा ही व्यवहार में लाया जा सकता है, छल-प्रपंच करने वाले असाधु स्वभाव वालों के लिए उनके जीवन सूत्र साध्य नहीं हैं । 

यह सनातन नियम है कि आदर्श सिद्धांतों को जीवन में धारण करने के लिए पात्रता बढ़ानी पड़ती है । संगीत के राग सभी को उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें गा वही सकता है, जिनका गले का स्तर शुद्ध है । प्रकृति के रहस्य उसी की आँखों के सामने खुलते हैं, जिसकी दृष्टि शुद्ध है । इसी तरह जीवन के उच्च आदर्शों का पालन वही कर सकता है, जिसका जीवन पवित्र, साधुतामय है । इसीलिए कबीर अपने जीवन सूत्रों को प्राप्त करने के लिए साधु स्वभाव वालों को प्रेरित करते हैं । 

उनके इस कथन का एक भाव और निकलता है । वे कहते हैं कि हमारी बात सुनो, लेकिन केवल सुनकर ही न रह जाओ, उसे जीवन में 'साधो' । जिन्हें उनके जीवन-सूत्रों का लाभ उठाना है, उनसे वे प्यार भरा आग्रह करते हैं कि कबीर अपने अनुभव बता सकता है, सो बता रहा है; अरे भाई! उसे सुनो भी और साधो भी । 

युगऋषि के रूप में भी उनका यही आग्रह रहा है कि हमारे जीवन सूत्रों की सराहना करो या न करो, साधना जरूर करो । 

यदि हमसे अनुराग है, तो हमारी प्रशंसा के राग अलापो या न अलापो, अनुगमन के प्रयास ईमानदारी से आत्म-समीक्षा पूर्वक करो । 

यदि कबीर के थोड़े से जीवन सूत्रों को समझकर जीवन में उतारा जाय तो आज के जीवन की चकाचौंध और भटकावों से बचकर उत्कृष्ट व्यक्तित्व और श्रेष्ठ समाज के लक्ष्यों को सहज ही पाया जा सकता है । 

कबीर का नाम स्मरण 

कबीर साहब ने प्रभु नाम स्मरण को बहुत महत्त्व दिया है । युगऋषि का कथन है कि ''मनुष्य महान है, किन्तु उससे भी महान है उसका सृजेता ।'' सृजेता का, उसके अनुशासन का स्मरण जिसे है वह लौकिक मायावी भटकावों से बच जाता है । सृजेता के अनुशासन में लौकिक जीवन को सफलतापूर्वक जीता हुआ पारलौकिक जीवन की परमगति की ओर वह बढ़ता रह सकता है । जप, पाठ आदि इसीलिए किए-कराये जाते हैं । अधिकांश लोग नाम स्मरण के उद्देश्य को भूलकर कर्मकाण्ड में उलझकर रह जाते हैं । कबीर कहते हैं- 

कर में तो माला फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं, 
मनुआ तो चहुँदिश फिरे, यह तो सुमरिन नाहिं॥ 

कबीर समझाने का प्रयास करते हैं कि मुख्य बात है प्रभु स्मरण । सुमिरन-स्मरण तो मन का विषय है । हाथ की माला और मुँह में जीभ का फिरना मन के स्मरण में सहायक तो हो सकता है, किन्तु मन से सुमिरन न हो, तो कमर्काण्ड काहे के लिए? 

उनका 'प्रभु स्मरण' नाम रूप के भेद से परे है । वे तो नाम स्मरण के माध्यम से मन को परम चेतना के स्पंदनों का अनुभव कराना चाहते हैं । इसी नाम-भेद से ऊपर उठकर परम तत्त्व के स्मरण की वे बात कहते हैं- 

हिन्दु कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमाना । 
आपस में दोऊ लड़ि-लड़ि मूए, मरम न कोई जाना॥ 

वे नाम-रूप से परे परमात्म तत्त्व का स्मरण कराना चाहते हैं । प्रभु स्मरण से, प्रभु उपासना से मन निर्मल होने लगता है । युगऋषि ने कहा कि जब साधक का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तो जैसे खिले हुए फूल के चारों ओर मधुमक्खियाँ मँडराने लगती हैं, वैसे ही दिव्य ईश्वरीय शक्तियाँ साधक की ओर आकषिर्त होने लगती हैं । कबीर उसे अपने ढंग से कहते हैं - 

कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर । 
पाछे-पाछे हरि फिरै, कहत कबीर-कबीर॥ 

नाम स्मरण, जप, उपासना के प्रभाव का कैसा सुन्दर-सटीक वर्णन किया है! उनका जप मुख-वाणी से शुरू तो होता है, पर वह अंतःकरण की गहराइयों में उतर जाता है । मुख-जीभ चले न चले, पर अंतःकरण से उभरा स्मरण साधक के रोम-रोम को पुलकित कर देता है । तब वे कहते हैं - मन मस्त हुआ तब क्यों बोले? इसीलिए उनकी सलाह है कि- 

कर का मनका डार दे, मनका मनका फेर । 

युगऋषि ने कहा है- साधक में स्नेह-स्मरण की तरंगें उठती हैं, तो आवाज की अनुगूँज की तरह ईश्वरीय स्नेह की तरंगों का उसे अनुभव होता है । उस स्थिति में पहुँचकर कबीर कहते हैं- 

कबीरा माला ना जपी, मुख से कह्यो न राम । 
सुमरन मेरा हरि करे, मैं पाऊँ विश्राम॥ 

यदि कबीर के सूत्रों के अनुसार जप-स्मरण साधना करें, तो उपासना में कमाल तो होगा ही । 

कबीर की प्रेम साधना 

ईश्वर प्रेम रूप है । वह तो प्रेम उडे़लता ही रहता है । जो उसके प्रेम को ग्रहण कर पाता है, वह दिव्य सम्पदा का अधिकारी बनकर प्रेम बाँटने लगता है । वह प्रेम जितना बाँटा जाता है, दिया जाता है, उतना ही बढ़ता जाता है । ऐसा प्रेम कहाँ से मिले? कबीर अपने बेबाक अंदाज में कहते हैं- 

प्रेम न बाडी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय । 
राजा परजा जेहि रुचे, शीष देय लै जाय । 

यह बड़ी कठोर लगने वाली, परंतु बड़ी मनोरम और अनिर्वाय शर्त है । 'शीष देय' का अर्थ है अपना अहं, कत्तार्पन का अभिमान देना होगा । इससे कम में प्रेम सधता नहीं । वे प्रेम को समझना ही पाण्डित्य की, ज्ञान की साथर्कता मानते हैं । कहते हैं- 

पोथी पढि-पढि जग मुआ, पण्डित भया न कोय । 
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय । 

प्रेम के ढाई अक्षर का पहला अक्षर 'प' आधा है । दो अक्षर 'रे' और 'म' पूरे हैं । 'प' साधक की पहचान है । साधक का अस्तित्व है तभी तो प्रेम है, किन्तु अहं हो तो प्रेम कैसा होगा? इसलिए पहचान का पहला अक्षर प आधा है । अस्तित्व है-अहं नहीं । 

अगला अक्षर 'र' है । 'र' संस्कृत में प्रकाश का, चेतना का पयार्य है । र के साथ ए की मात्रा । यह र के विस्तार का भाव है । विस्तार वहाँ तक, जहाँ तक प्रकाश-चेतना के मायाकृत भेद समाप्त हो जायें-वह एक ही रह जाये । 

दूसरा अक्षर है 'म'- यह (अ+उ+म) या राम (र+आ+म) में विलय का प्रतीक है । अहंकार रहित अस्तित्व आधा प-रे के संयोग से स्वयं को चेतना का ही रूप मानें । उस भाव का विस्तार हो और वह परम चेतन के साथ एकरूप, विलय की स्थिति में पहुँचे, तब बने प्रेम ।

कबीर प्रभु स्मरण में प्रेम को मुख्य तत्त्व मानते हैं । सभी कर्मकाण्ड उसके सहयोगी भर है । साधना के विभिन्न आयामों का उन्होंने उल्लेख किया है । ध्यान में साधक मन को शून्य में स्थिर करने का प्रयास करते हैं । मन को विषय मुक्त बनाने का प्रयत्न करते हैं । कुछ साधक जप को अजपा जप, सहज जप में बदल लेते हैं । श्वास-प्रश्वास के साथ जप घुलने लगता है । कुछ साधक नादयोग की, अनहद नाद की साधना करके उसमें मन को लय करने का प्रयास करते हैं । 

कबीर के अनुसार यह सब साधन प्रभु के सान्निध्य में रस की अनुभूति के लिए हैं । ये सब रास्ते में ही रुक जाते हैं, अंत में तो केवल प्रेम-स्नेह ही रह जाता है । वे लिखते हैं- 

शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद ह मर जाय । 
राम सनेही ना मरे, कहै कबीर समझाय॥ 

उनके अनुसार यह ढाई अक्षर वाला 'प् रे म' या स्नेह ही अमृत तत्त्व है । यह ढाई अक्षर समझ में आ जाय, आभास में उतर जाय, तो कमाल तो होगा ही । 

कबीर की वैराग्य साधना 

कबीर गृहस्थ वैरागी हैं । सम्पन्नता में उन्हें हृदयहीनता का खतरा दिखता है । इसलिए वे गाते हैं 

'मन लागो मेरो यार फकीरी में ।' 

सम्पन्नता के क्रम में हृदयहीनता आई तो प्रेम साधना खण्डित होगी । यह खतरा वे मोल नहीं लेना चाहते हैं । फकीरी-गरीबी भली । 

युगऋषि ने भी कहा है- 'गरीबी हमारी शान है ।' 

लेकिन वे अव्यावहारिक सिद्धांतवादी अतिवादी नहीं हैं । धन-साधन की भी एक सीमा तक जरूरत स्वीकार करते हैं, किन्तु उसे मर्यादित रखने के लिए प्रभु से निवेदन करते हैं- 

साई इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय । 
मैं भी भूखा ना रहूँ, अतिथि न भूखा जाय॥ 

यह एक ऐसा अद्भुत सूत्र है, जिसका पालन समाज के हर वर्ग के व्यक्ति कर सकते हैं । संसारी को उतना तो चाहिए ही और इससे अधिक की जरूरत नहीं है । यह सूत्र समझ में आ जाये, तो वतर्मान समय में मनुष्य के लिए तमाम मुसीबतें पैदा करने वाली धन की अनगढ़ होड़ सहज ही समाप्त हो जाय । जितने धन साधन है, उन्हीं में सब स्नेह-सुख शांति के साथ रहने में समर्थ हो जाएँ ।

परिजनों में सुसंस्कार जगाएँ, यज्ञीयभाव से अनुप्राणित अन्न खायें-खिलायें ।

समस्या व्यक्ति निर्माण की 

उज्ज्वल भविष्य की कामना सभी करते हैं, किन्तु उसके लिए उज्ज्वल चरित्र सम्पन्न व्यक्ति चाहिए । जिनके मन-मस्तिष्क में हीन भाव और ओछे विचार भरे हैं, उनसे उज्ज्वल भविष्य के निर्माण की आशा कैसे की जा सकती है? अच्छे व्यक्ति सबको चाहिए, परन्तु उन्हें गढ़ा, खरादा कहाँ जाय? 

युगऋषि ने इस समस्या का समाधान दिया है । इसीलिए उन्होंने व्यक्ति निर्माण के साथ परिवार निर्माण की जरूरत बताई है । परिवार को उन्होंने व्यक्ति निर्माण की टकसाल, चरित्र निर्माण की प्रयोग शाला-व्यायामशाला तथा समाज निर्माण की सक्रिय, मजबूत इकाई कहा है । जो लोग युग निर्माण की ईश्वरीय योजना में सार्थक, सुनिश्चित, टिकाऊ योगदान करना चाहते हैं, उन्हें परिवारों को युगऋषि द्वारा बतलाई गई उक्त परिभाषाओं के अनुरूप बनाना चाहिए । 

सृजनकार्य कामनाओं के ख्वाब देखने से नहीं सधते, उसके लिए तो तप और कौशल का विकास और प्रयोग करना होता है । परिवार में ऐसा वातावरण बनाना होता है, जो जाने-अनजाने सभी के मन-अंतःकरण पर धीरे-धीरे अपना प्रभाव छोड़ता रहें । 

ऐसा वातावरण घर-परिवार में बनाने के लिए ऋषि ने पाँच सूत्र दिए हैं - १. पूजा स्थल पर नमन-वन्दन २. सामूहिक प्रार्थना का क्रम ३. पारिवारिक सत्संग ४. नित्य प्रणाम-अभिनन्दन का क्रम तथा ५. बलिवैश्व प्रक्रिया का पालन । 

इनके उद्देश्य और स्वरूप निम्नानुसार हैं - 

१. नमन-वन्दन - घर के किसी उपयुक्त स्थल पर पूजा का छोटा-बड़ा स्थान हो । वहाँ गायत्री माता का चित्र रहे अथवा परम्परागत पूजागृहों में कम से कम गायत्री महामंत्र की स्थापना हो । जो सदस्य नियमित उपासना करते हों, वे उपासना क्रम में गायत्री मंत्र का जप अवश्य करें । मंत्र जप अथवा इष्ट नाम जप के साथ भावना करें ''हे परमात्मा! हम सबको सद्बुद्धि दें, उज्ज्वल भविष्य के मार्ग पर आगे बढ़ाएँ ।'' परिवार के बाकी सदस्य अपने मुख्य कार्य पर जाने के पहले या भोजन के पहले वहाँ मस्तक झुकाकर अपने लिए और सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करके जायें । पू. गुरुदेव ने कहा है ''मनुष्य महान है, और उससे भी महान है उसका सृजेता ।'' उसके साथ भावभरा सम्पर्क बनाये रहने से व्यक्ति के अंदर महानता के बीज विकसित होने लगते हैं । 

२. सामूहिक प्रार्थना - अनुभवी संतों का मत है कि जो एक साथ प्रार्थना करते हैं, वे आपस में प्यार-सहकार पूर्वक साथ-साथ बने रहते हैं । हो सके तो रोज शाम को, नहीं तो कम से कम सप्ताह में एक बार साथ-साथ प्रार्थना, आरती, भजन करें । पाँच या एक दीपक जलाकर दीपयज्ञ के साथ यह क्रम सरसता एवं सरलता से चल जाता है । क्रम पूरा होने पर सब अपने से बड़ों को प्रणाम करें, बड़े छोटों को स्नेह-आशीष दें । 

३. पारिवारिक सत्संग -इसे भी नित्य या साप्ताहिक सत्संग के साथ जोड़ा जाना उपयोगी रहता है । स्थिति के अनुसार अलग से भी इसका क्रम चलाया जा सकता है । आजकल फिल्म, टीवी, विभिन्न घटनाक्रमों आदि से हीन विचारों का आक्रमण तो होता ही रहता है । उनसे बचने का उपाय यही है कि घर-परिवार में सत्संग, कथाओं, उदाहरणों के माध्यम से मन-मस्तिष्क में अच्छे विचारों, भावों का संचार किया जाता रहे । 

४. नित्य प्रणाम-अभिनन्दन -सबेरे उठकर अथवा स्नान या पूजा के बाद अपने से सभी बड़ों को झुककर प्रणाम करें । बड़े छोटों को स्नेह-आशीष देते हुए उनके द्वारा किए गये अच्छे कामों की सराहना करें या वैसी प्रेरणा दें । 

५. बलिवैश्वदेव प्रक्रिया -यह यज्ञ का ऐसा सुगम स्वरूप है, जिसे हर कोई सहजता से कर सकता है । इसी के साथ इसका महत्त्व असाधारण है! इसके अन्तर्गत पकाए गये भोजन का एक अंश यज्ञ भगवान को अर्पित करने के बाद ही भोजन किया/कराया जाता है! 

असाधारण महत्त्व 

एक प्रसिद्ध कहावत है 'जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन ।' अन्न के स्थूल गुणों से शरीर का पोषण होता है तथा उसके अन्दर सन्निहित सूक्ष्म भावों-संस्कारों के अनुरूप मन का विकास होता है । अन्न में यज्ञीय भावना और यज्ञीय प्रक्रिया से श्रेष्ठ मन बनाने योग्य संस्कार स्थापित किए जा सकते हैं । 

गीता ३/१० में कहा गया है-''प्रजापति ने यज्ञ और प्रजा को साथ-साथ रचा और प्रजा से कहा कि तुम यज्ञ की आराधना करो, यह तुम्हारी इष्ट अवश्यकताएँ पूरी करेगा ।'' स्पष्ट है कि प्रजा को अपने वाञ्छित विकास के लिए यज्ञ का सहारा लेना जरूरी है । 

परमार्थ, त्याग, सहकार युक्त श्रेष्ठ कर्म को यज्ञ कहते है । अन्न में यज्ञीय संस्कार होगा, तो उसे खाने वाले का मन श्रेष्ठ बनेगा । यदि यज्ञीय भाव की उपेक्षा की गई, तो भोजन में केवल अपने संकीर्ण स्वार्थ और सुख के हीन संस्कार बस जायेंगे । उससे विकसित मन कभी श्रेष्ठ कर्मों में रस नहीं लेता । 

गीताकार ने कहा है - 

यज्ञ से शेष बचे अन्न को खाने वाले सज्ज्ान सभी पाप कर्मों से मुक्त हो जाते हैं । जो केवल अपने लिए ही पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं । (गीता ३/१३३) 

इसीलिए पूज्य गुरुदेव ने वांङ्मय (२६/६.५) में लिखा है -''दैनिक उपासना में केवल गायत्री जप ही पर्याप्त नहीं है, अग्निहोत्र भी उसके साथ चलना चाहिए । यज्ञ करने में जन सामान्य को जो कठिनाइयाँ (समय, अधिक खर्च, संसाधन, कठिन विधान)आती हैं, इन सबका निवारण बलिवैश्व में हो जाता है । इस सर्वसुलभ प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए । 

सुगम विधि-विधान 

बलिवैश्व की महत्ता बहुत बड़ी है और विधि-विधान बहुत सुगम है । इसे घर में गृहणियाँ बड़ी सहजता से कर सकती हैं । प्रक्रिया इस प्रकार है - 

- इष्टदेव को भोग लगाने के भाव से सफाई एवं पवित्र भावना के साथ भोजन पकाया जाय । 

-पकाए हुए भोजन में से नमक, मिर्च-मसाले वाले पदार्थ छोड़कर, फीके या मीठे पदार्थों में से थोड़ा-सा अंश एक साफ तश्तरी में निकाल लें । उसमें थोड़ा-सा घी, शक्कर अथवा हवन सामग्री मिलाकर उसकी बड़े चने के आकार की ५ गोलियाँ बना लें । 

-यदि चूल्हे में ईंधन जलाकर भोजन बनाया गया है, तो उसमें से कुछ अंगारे किसी मिट्टी के सकोरे या धातु के चौड़े पात्र में रख लें । फिर नीचे लिखे क्रम से पाँच आहुतियाँ भावनापूर्वक दें । 

गायत्री मंत्र बोलकर स्वाहा के साथ पहली आहुति होमें तथा कहें-इदं ब्रह्मणे इदं न मम । दूसरी आहुति इसी प्रकार होमकर कहें-इदं देवेभ्यः इदं न मम । तीसरी आहुति के बाद कहें-इदं ऋषिभ्यः इदं न मम । चौथी आहुति के बाद कहें-इदं नरेभ्यः इदं न मम । पाँचवी आहुति के बाद कहें-इदम् भूतेभ्यः इदं न मम । 

पाँचों आहुतियों के बाद अग्नि के चारों और जल फेर कर हवन पात्र को एक ओर रख दें । अन्न भस्म हो जाने, अग्नि शांत हो जाने पर उस भस्म को तुलसी के गमले या किसी पवित्र स्थल पर वृक्ष की जड़ में डाल दें । 

यदि स्टोव पर या गैस के बर्नर पर भोजन पकाया जाता हो, तो भी यह आहुतियाँ सहजता से दी जा सकती हैं । लोहे की मजबूत जाली वाली छन्नी को लौ के ऊपर करके आहुतियाँ डाली जा सकती हैं । कोई धातु का कम गहरा पात्र सड़ासी से पकड़ कर लौ पर करे अथवा सब्जी चलाने के धातु के चमचे, जिसमें बघार आदि लगाए जाते हैं, उसे लौ पर रखकर आहुतियाँ दी जा सकती हैं । शान्तिकुंज में तांबे का एक ऐसा पात्र भी तैयार किया गया है, जिसे गैस पर रख कर उसमें आहुतियाँ समर्पित की जा सकती हैं । सभी प्रयोग करके देखे गये हैं और सफल हैं । अपनी सुविधानुसार किसी को भी अपनाया जा सकता है । 

पंच महायज्ञ 

बलिवैश्व की ५ आहुतियों को पंच महायज्ञ कहा गया है । यों तो किन्ही बहुत बड़े यज्ञों को महायज्ञ कहा जाता है, किन्तु इस छोटे से सुगम क्रम को महायज्ञ क्यों कहा गया? यह बात अजीब सी लगती है । ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यहाँ यज्ञीय कर्मकाण्ड के प्रतीक को नहीं, उसके पीछे के तत्त्वदर्शन को महत्व दिया गया है । 

उक्त पाँच आहुतियाँ क्रमशः ब्रह्म, देव, ऋषि, नर (मनुष्य) एवं भूत (लघु जीवों) के निमित्त दी गई हैं । इन्हें क्रमशः १ ब्रह्मयज्ञ, २. देवयज्ञ, ३. ऋषियज्ञ ४. नरयज्ञ तथा ५. भूतयज्ञ कहा गया है । इस प्रसंग में पूज्य गुरुदेव वांङ्मय क्र. २६/६.३ में लिखते हैं - 

पंच महायज्ञों में जिन ब्रह्म, देव, ऋषि आदि का उल्लेख है, उनके निमित्त आहुति देने का अर्थ इन्हें अदृश्य व्यक्ति मानकर भोजन कराना नहीं, वरन् यह है कि इन शब्दों के पीछे जिन देव वृत्तियों का, सत्प्रवृत्तियों का संकेत है, उनके अभिवर्धन के लिए अंशदान करने की तत्परता अपनाई जाय । 

१. ब्रह्मयज्ञ का अर्थ है ब्रह्मज्ञान-आत्मज्ञान की प्रेरणा । ईश्वर और जीव के बीच चलने वाला पारस्परिक आदान-प्रदान । 

२. देवयज्ञ का उद्देश्य है-पशु से मनुष्य तक पहुँचाने वाले प्रगतिक्रम को आगे बढ़ाना । देवत्व के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का विकास-विस्तार । पवित्रता और उदारता का अधिकाधिक संवर्धन । 

३. ऋषियज्ञ का तात्पर्य है-पिछड़ों को अपने में संलग्न करुणार्द्र जीवन-नीति, सदाशयता संवर्धन की तपश्चर्या । मानवी गरिमा के अनुरूप वातावरण एवं समाज व्यवस्था का निर्माण । मानवी गरिमा का संरक्षण । नीति और व्यवस्था का परिपालन, नर में नारायण का उत्पादन । विश्वमानव का श्रेय साधन । 

५. भूतयज्ञ की भावना है-प्राणिमात्र तक आत्मीयता का विस्तार । अन्यान्य जीवधारियों के प्रति सद्भावना पूर्ण व्यवहार । वृक्ष-वनस्पतियों तक के विकास का प्रयास । 

इन पाँचों प्रवृत्तियों में व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति पवित्रता और सुव्यवस्था के सिद्धांत जुड़े हुए हैं । उन्हें उदात्त जीवन नीति के सूत्र कह सकते हें । जीवनचर्या और समाज व्यवस्था में इन सिद्धांतों का जिस अनुपात में समावेश होता जाएगा, उसी क्रम से सुखद परिस्थितियों का निर्माण निर्धारित होता चला जाएगा । बीज छोटा होता है, किन्तु उसका फलितार्थ विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है । चिनगारी छोटी होती है, अनुकूल अवसर मिलने पर वही दावानल का रूप धारण कर लेती है । गणित के सूत्र छोटे होते हैं, पर उनसे जटिलताएँ सरल होती चली जाती हैं । अणु-जीवाणु-शुक्राणु तनिक से होते हैं, पर जब भी उन्हें अपना पराक्रम दिखाने का अवसर मिलता है, चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं । 

मोटी दृष्टि से देखने में बलिवैश्व यज्ञ का बहुत अधिक महत्त्व दिखाई नहीं देता । उसे करने में न कोई बड़ा लाभ होता है और न करने पर किसी हानि की संभावना दिखाई नहीं पड़ती । पर यदि बारीकी से देखा जाय, तो प्रतीक तुच्छ होते हुए भी उसके पीछे काम करने वाली प्रेरणा अति महान है । प्रश्न आस्था की प्रतिष्ठापना का है । धर्मकृत्य तो उसके प्रतीक भर होते हैं । इसलिए उसका नाम भी प्रतीक पूजा ही है । प्रतीक अर्थात् प्रतिनिधि देवताओं की आकृतियाँ एवं प्रतिमाएँ आँख से देखने पर कौतुक-कौतूहल जैसी लगती हैं, पर उनके पीछे श्रद्धा को बढ़ाने और जगाने वाले जो तत्व जुड़े हुए हैं, उन्हीं को शास्त्रकारों ने प्राण-प्रतिष्ठा कहा है । प्राण-प्रतिष्ठा न होने से प्रतिमाएँ खिलौना भर रह जाती हैं । देवत्व तो श्रद्धा में ही सन्निहित है । बलिवैश्व को देव प्रतिमा और उसके क्रिया कृत्य को देवाराधन माना जाय, तो निश्चित ही उससे वही उद्देश्य पूरा होगा, जो विशालकाय धर्मानुष्ठानों होता है । 

वर्तमान युग में आस्था संकट ही समस्त विपत्तियों का तात्विक कारण है । अनास्था ने ही उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता की मान्यताओं और परम्पराओं को उलट दिया है, फलतः मनुष्य जाति के सामने अगणित विभीषिकाएँ उठ खड़ी हुई हैं । उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए आस्था संकट से जूझना ही प्रमुख कार्य है । उसी दिशा में एक रचनात्मक कदम बलिवैश्व परम्परा का पुनर्जीवन है ।

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

ये तो सच है के भगवान है


ये तो सच है के भगवान है है मगर फिर भी अन्जान है
धरती पे रूप माँ बाप का उस विधाता की पहचान है
ये तो सच है के ...

जन्मदाता हैं जो नाम जिनसे मिला
थामकर जिनकी उंगली है बचपन चला
ओ कांधे पर बैठके जिनके देखा जहां
ज्ञान जिनसे मिला क्या बुरा क्या भला
इतने उपकार हैं क्या कहें ये बताना न आसान है
धरती पे रूप ...

जन्म देती है जो माँ जिसे जग कहे
अपनी संतान में प्राण जिसके रहें
ओ लोरियां होंठों पर सपने बुनती नज़र
नींद जो वार दे हँस के हर दुख सहे
ममता के रूप में है प्रभू आपसे पाया वरदान है
धरती पे रूप ...

आपके ख्वाब हम आज होकर जवां
उस परम शक्ति से करते हैं प्रार्थना
ओ इनकी छाया रहे रहती दुनिया तलक
एक पल रह सकें हम न जिनके बिना
आप दोनों सलामत रहें सबके दिल में ये अरमान है
धरती पे रूप ...
आप भी जनमानस परिष्कार मंच के सदस्य बन कर युग निर्माण योजना को सफल बनायें।

बच्चे मन के सच्चे

बच्चे मन के सच्चे 
सारी जग के आँख के तारे
ये वो नन्हे फूल हैं जो 
भगवान को लगते प्यारे 

खुद रूठे, खुद मन जाये, फिर हमजोली बन जाये 
झगड़ा जिसके साथ करें, अगले ही पल फिर बात करें 
इनकी किसी से बैर नहीं, इनके लिये कोई ग़ैर नहीं 
इनका भोलापन मिलता है, सबको बाँह पसारे 
बच्चे मन के सच्चे ... 

इन्ससान जब तक बच्चा है, तब तक समझ का कच्चा है 
ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ क मैल चढ़े 
क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे 
बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे
 बच्चे मन के सच्चे ... 

तन कोमल मन सुन्दर हैं बच्चे बड़ों से बेहतर 
इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं 
भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं 
इनकी नज़रों में एक हैं, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे 
बच्चे मन के सच्चे ... 

'मैं' की मृत्यु

एक संन्यासी ने मुझ से कहा, 'मैं प्रभु के लिए सब छोड़ आया हूं और अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।'

मैं देखता हूं कि सच ही उनके पास कुछ भी नहीं है, पर उनसे कहता हूं कि वह जो छोड़ना था- और वही अकेला था, जो कि छोड़ा जा सकता था- वह अब भी उनके पास है!

वे अपने चारों ओर देखते हैं। सच ही उनके पास कुछ नहीं है, जो है, उनके भीतर है। वह उनकी आंखों में है। वह उनके त्याग में है। वह उनके संन्यास में है। वह 'मैं' है। उसे छोड़ना ही अकेला छोड़ना है। क्योंकि शेष सब छीना जा सकता है और अंतत: मृत्यु सब छीन ही लेती है। 'मैं' को कोई नहीं छीन सकता, उसे तो केवल छोड़ा ही जा सकता है, उसका त्याग ही केवल त्याग है।

इसलिए प्रभु को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ और घनीभूत हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी प्रभु को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।

'मैं' एकमात्र अपरिग्रह है। 'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है, वही अपरिग्रही है, वही संन्यासी है।

'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।

'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं' नहीं वरन् सर्व का 'मैं' है।

सिमोन वेल का कथन मुझे बहुत प्रिय है, जिसमें उसने कहा है कि प्रभु के अतिरिक्त किसी को भी 'मैं' कहने का कोई अधिकार नहीं है।'

सच ही 'मैं' कहने का अधिकार केवल उसे ही है, जो कि समस्त सत्ता का केंद्र है। पर उसे 'मैं' कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके लिए सब 'मैं' ही है। जिसे अधिकार है, उसे कहने का कारण नहीं है, और जिसे कहने का कारण है, उसे कोई अधिकार नहीं है।

पर मनुष्य अपने अनाधिकार को खोकर, अधिकार को पा सकता है। वह 'मैं' होना छोड़ कर 'मैं' हो सकता है। वह अपने केंद्र के आभास को छोड़कर, सत्य केंद्र को पा सकता है। वह जिस क्षण अपने केंद्र को विकेंद्रित कर देता है, उसी क्षण केंद्र को उपलब्ध हो जाता है।

मनुष्य का 'मैं' सत्य नहीं है। वह संघात है। उसकी कोई सत्ता नहीं है। वह संग्रह है। इस संग्रह से सत्य का जो भ्रम पैदा होता है, वही अज्ञान है। पर जो इस संग्रह में झांकता है, देखता है और सत्य को खोजता है, उसके समक्ष आभास टूट जाता है। और 'मैं' की माला के फूल बिखर जाते हैं। और तब वह सूत्र उपलब्ध होता है, जो कि सत्य है और जिस पर कि 'मैं' के फूल टंगे थे और जिसे कि उन फूलों ने ढांक लिया था।

फूलों के हटाने पर- उनके आच्छादन के टूटने पर पाया जाता है कि जो उनका आधार था, वह मेरा ही नहीं है, वह मुझ में और सब में भी है। वह समस्त सत्ता में पिरोया हुआ है।

जो 'मैं' की इस मृत्यु से नहीं गुजरता है, वह परमात्मा के जीवन से वंचित रह जाता है। 'मैं' की मृत्यु - परमात्मा से, सत्य से, सत्ता से, हमारे भेद और अंतर की मृत्यु है। उसके गिरते ही वह फासला गिर जाता है, जो कि हमें स्वयं हमसे ही तोड़े हुए था। और वह व्यक्ति धन्यभागी है, जो शरीर की मृत्यु के पूर्व इस मृत्यु को उपलब्ध होता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

कौन अमीर और कौन गरीब?

एक बहुत धनी व्यक्ति अपने छोटे से लड़के को एक बार गाँव दिखाने ले गया ताकि उसका बेटा जान सके कि गरीब लोग कैसे रहते हैं. उन्होंने शहर से कुछ दूर अपने फार्म हाउस में दो दिन बिताये. फार्म हाउस के सामने ही एक गरीब परिवार रहता था. यात्रा से वापस लौटते समय पिता ने अपने पुत्र से पूछा – “बेटा, यात्रा कैसी रही?”

“बहुत अच्छी, पापा” – बेटे ने कहा.

“तो तुमने देखा कि गरीब लोग कैसे रहते हैं?”

“हाँ”.

“तो तुमने यात्रा से क्या सीखा?”

बेटे ने जवाब दिया – 
“मैंने देखा कि हमारे पास तो एक ही कुत्ता है जबकि उनके पास चार हैं. हमारा स्वीमिंग पूल तो बहुत छोटा है लेकिन वे बहुत बड़ी नहर में नहाते हैं. हमारे बगीचे में मंहगे लालटेन लगे हैं जबकि वे तारों भरे आकाश को देख सकते हैं. हमारे घर से तो दूर तक नहीं दिखता जबकि वे दूर-दूर की पहाडियां और घाटियाँ देख सकते हैं. हमारे नौकर हमारी देखभाल करते हैं लेकिन वे सभी का ख़याल रखते हैं. हम अपना खाना खरीदते हैं लेकिन वे अपना खाना खुद उगाते हैं. हमारे घर की रक्षा के लिए चारदीवारी है लेकिन उनके दोस्त उनकी रक्षा करते हैं”.

लड़के का पिता निरुत्तर हो गया.

मुल्ला नसरुद्दीन की बीवी का नाम

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन और उसका एक दोस्त साथ में टहलते हुए अपनी-अपनी बीवी के बारे में बातचीत कर रहे थे. मुल्ला के दोस्त का ध्यान इस बात की और गया कि मुल्ला ने कभी भी अपनी बीवी का नाम नहीं लिया.

“तुम्हारी बीवी का नाम क्या है, मुल्ला?” – दोस्त ने पूछा.

“मुझे उसका नाम नहीं मालूम” – मुल्ला ने कहा.

“क्या!?” – दोस्त अचम्भे से बोला – “तुम्हारी शादी को कितने साल हो गए?”

“अट्ठाईस साल” – मुल्ला ने जवाब दिया, फिर कहा – “मुझे शुरुआत से ही ये लगता रहा कि हमारी शादी ज्यादा नहीं टिकेगी इसलिए मैंने उसका नाम जानने की कभी ज़हमत नहीं उठाई”.

बहुत से रिश्ते पूरी जिंदगी साथ चलते हैं लेकिन एक दूसरे को समझ नहीं पाते … 

और रिश्ते को खींचते चले जाते हैं ….

परंपरा

कई लोगों की भीड़ में मुल्ला नसरुद्दीन नमाज़ अदा करने के दौरान आगे झुका. उस दिन उसने कुछ ऊंचा कुरता पहना हुआ था. आगे झुकने पर उसका कुरता ऊपर चढ़ गया और उसकी कमर का निचला हिस्सा झलकने लगा.

मुल्ला के पीछे बैठे आदमी को यह देखकर अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने मुल्ला के कुरते को थोड़ा नीचे खींच दिया.

मुल्ला ने फ़ौरन अपने आगे बैठे आदमी का कुरता नीचे खींच दिया.

आगेवाले आदमी ने पलटकर मुल्ला से हैरत से पूछा – “ये क्या करते हो मुल्ला?”

“मुझसे नहीं, पीछेवालों से पूछो” – मुल्ला ने कहा – “शुरुआत वहां से हुई है”.

किसी परंपरा को बिना सोचे समझे ढोने वालों के लिए 

शुरुआत कहीं से हुई हो … 

बुद्धिमत्ता तो उसकी विवेकशील परिणति मे ही है

निराला का दान

एक बार निराला को उनके एक प्रकाशक ने उनकी किताब की रायल्टी के एक हज़ार रुपये दिए। ध्यान दें, उन दिनों जब मशहूर फिल्मी सितारे भी दिहाडी पर काम किया करते थे, एक हज़ार रुपये बहुत बड़ी रकम थी। रुपयों की थैली लेकर निराला इक्के में बैठे हुए इलाहाबाद की एक सड़क से गुज़र रहे थे। राह में उनकी नज़र सड़क किनारे बैठी एक बूढी भिखारन पर पड़ी। ढलती उमर में भी बेचारी हाथ फैलाये भीख मांग रही थी। निराला ने इक्केवाले से रुकने को कहा और भिखारन के पास गए।

“अम्मा, आज कितनी भीख मिली?” – निराला ने पूछा।

“सुबह से कुछ नहीं मिला, बेटा”।

इस उत्तर को सुनकर निराला सोच में पड़ गए। बेटे के रहते माँ भला भीख कैसे मांग सकती है?

बूढी भिखारन के हाथ में एक रुपया रखते हुए निराला बोले – “माँ, अब कितने दिन भीख नहीं मांगोगी?”

“तीन दिन बेटा”।

“दस रुपये दे दूँ तो?”

“बीस दिन, बेटा”।

“सौ रुपये दे दूँ तो?

“छः महीने भीख नहीं मांगूंगी, बेटा”।

तपती दुपहरी में सड़क किनारे बैठी माँ मांगती रही और बेटा देता रहा। इक्केवाला समझ नहीं पा रहा था की आख़िर हो क्या रहा है! बेटे की थैली हलकी होती जा रही थी और माँ के भीख न मांगने की अवधि बढती जा रही थी। जब निराला ने रुपयों की आखिरी ढेरी बुढ़िया की झोली में उडेल दी तो बुढ़िया ख़ुशी से चीख पड़ी – 

“अब कभी भीख नहीं मांगूंगी बेटा, कभी नहीं!”

निराला ने संतोष की साँस ली, बुढ़िया के चरण छुए और इक्के में बैठकर घर को चले गए।

क्या यह बुढ़िया को दिया गया दान था या एक बेटे का अपनी दुखियारी माँ के कष्टों का निरूपण, या कुछ और?

प्रेमचंद का कोट

हिंदी के महानतम कथाकार प्रेमचंद का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. उनके पास एक पुराना कोट था जो फट गया था लेकिन वे उसी को पहने रहते थे.

उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने कई बार उनसे नया कोट बनवाने के लिए कहा लेकिन प्रेमचंद ने हर बार पैसों की कमी बताकर बात टाल दी. एक दिन शिवरानी देवी ने उन्हें कुछ रुपये निकालकर दिए और कहा – “बाजा़र जाकर कोट के लिए अच्छा कपड़ा ले आइये.”

प्रेमचंद ने रुपये ले लिए और कहा – “ठीक है. आज कोट का कपड़ा आ जाएगा.”

शाम को उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर शिवरानी देवी ने पूछा – “कोट का कपड़ा क्यों नहीं लाए?”

प्रेमचंद कुछ क्षणों के लिए चुप रहे, फिर बोले – “मैं कपड़ा लेने के लिए निकला ही था कि प्रैस का एक कर्मचारी आ गया. उसकी लड़की की शादी के लिए पैसों की कमी पड़ गई थी. उसने मुझे वह सब इतनी लाचारी और उदासी से बताया कि मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कोट के रुपये उसे दे दिए. कोट तो फिर कभी बन सकता है लेकिन लड़की की शादी नहीं टल सकती.”

शिवरानी देवी मन मसोस कर धीरे से बोलीं – “वो नहीं तो तुम्हें कोई और मिल जाता. मैं पहले ही जानती थी कि तुम्हारे हाथों में पैसे देकर कोट कभी नहीं आ सकता.”

प्रेमचंद के चेहरे पर संतोष की मुस्कान खिली हुई थी.

यूनान का विख्यात दार्शनिक सुकरात

सुकरात को सूफियों की भाँति मौलिक शिक्षा और आचार द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। वस्तुत: उसके समसामयिक भी उसे सूफी समझते थे। सूफियों की भाँति साधारण शिक्षा तथा मानव सदाचार पर वह जोर देता था और उन्हीं की तरह पुरानी रूढ़ियों पर प्रहार करता था। वह कहता था, 

"सच्चा ज्ञान संभव है बशर्ते उसके लिए ठीक तौर पर प्रयत्न किया जाए; जो बातें हमारी समझ में आती हैं या हमारे सामने आई हैं, उन्हें तत्संबंधी घटनाओं पर हम परखें, इस तरह अनेक परखों के बाद हम एक सचाई पर पहुँच सकते हैं। ज्ञान के समान पवित्रतम कोई वस्तु नहीं हैं।'

बुद्ध की भाँति सुकरात ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। बुद्ध के शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उपदेशों को कंठस्थ करना शुरु किया था जिससे हम उनके उपदेशों को बहुत कुछ सीधे तौर पर जान सकते हैं; किंतु सुकरात के उपदेशों के बारे में यह भी सुविधा नहीं। सुकरात का क्या जीवनदर्शन था यह उसके आचरण से ही मालूम होता है, लेकिन उसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न लेखक भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। कुछ लेखक सुक्रात की प्रसन्नमुखता और मर्यादित जीवनयोपभोग को दिखलाकर कहते हैं कि वह भोगी था। दूसरे लेखक शारीरिक कष्टों की ओर से उसकी बेपर्वाही तथा आवश्यकता पड़ने पर जीवनसुख को भी छोड़ने के लिए तैयार रहने को दिखलाकर उसे सादा जीवन का पक्षपाती बतलाते हैं। सुकरात को हवाई बहस पसंद न थी। वह अथेन्स के बहुत ही गरीब घर में पैदा हुआ था। गंभीर विद्वान् और ख्यातिप्राप्त हो जाने पर भी उसने वैवाहिक जीवन की लालसा नहीं रखी। ज्ञान का संग्रह और प्रसार, ये ही उसके जीवन के मुख्य लक्ष्य थे। उसके अधूरे कार्य को उसके शिष्य अफलातून और अरस्तू ने पूरा किया। इसके दर्शन को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला सुक्रात का गुरु-शिष्य-यथार्थवाद और दूसरा अरस्तू का प्रयोगवाद।

तरुणों को बिगाड़ने, देवनिंदा और नास्तिक होने का झूठा दोष उसपर लगाया गया था और उसके लिए उसे जहर देकर मारने का दंड मिला था।

सुकरात ने जहर का प्याला खुशी-खुशी पिया और जान दे दी। उसे कारागार से भाग जाने का आग्रह उसे शिष्यों तथा स्नेहियों ने किया किंतु उसने कहा-

भाइयो, तुम्हारे इस प्रस्ताव का मैं आदर करता हूँ कि मैं यहाँ से भाग जाऊँ। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और प्राण के प्रति मोह होता है। भला प्राण देना कौन चाहता है? किंतु यह उन साधारण लोगों के लिए है जो लोग इस नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानते हैं। आत्मा अमर है फिर इस शरीर से क्या डरना? हमारे शरीर में जो निवास करता है क्या उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता है? आत्मा ऐसे शरीर को बार बार धारण करती है अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था-विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस् के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें। हमें यह बात मानकर ही आगे बढ़ना है कि शरीर नश्वर है। अच्छा है, नश्वर शरीर अपनी सीमा समाप्त कर चुका। टहलते-टहलते थक चुका हूँ। अब संसार रूपी रात्रि में लेटकर आराम कर रहा हूँ। सोने के बाद मेरे ऊपर चादर उड़ देना।

बच्चे मन के सच्चे

फ़्रायड एक बड़ा मनोवैज्ञानिक हुआ। अपनी पत्नी और अपने बच्चे के साथ एक दिन बगीचे में घूमने गया था। जब सांझ को वापस लौटने लगा, अंधेरा घिर गया, तो देखा दोनों ने कि बच्चा कहीं नदारद है। फ़्रायड की पत्नी घबड़ाई,उसने कहा कि बच्चा तो साथ नहीं है, कहां गया? बड़ा बगीचा था मीलों लंबा, अब रात को उसे कहां खोजेंगे? 

फ़्रायड ने क्या कहा? 

उसने कहा, तुमने उसे कहीं जाने को वर्जित तो नहीं किया था? कहीं जाने को मना तो नहीं किया था? 

उसकी स्त्री ने कहा, हां, मैंने मना किया था, फव्वारे पर मत जाना! 

तो उसने कहा, सबसे पहले फव्वारे पर चल कर देख लें। सौ में निन्यानबे मौके तो ये हैं कि वह वहीं मिल जाए, एक ही मौका है कि कहीं और हो। 

उसकी पत्नी चुप रही। जाकर देखा, वह फव्वारे पर पैर लटकाए हुए बैठा हुआ था। उसकी पत्नी ने पूछा कि यह आपने कैसे जाना?

उसने कहा, यह तो सीधा गणित है। मां-बाप जिन बातों की तरफ जाने से रोकते हैं, वे बातें आकर्षक हो जाती हैं। बच्चा उन बातों को जानने के लिए उत्सुकता से भर जाता है कि जाने। जिन बातों की तरफ मां-बाप ले जाना चाहते हैं, बच्चे की उत्सुकता समाप्त हो जाती है, उसका अहंकार जग जाता है, वह रुकावट डालता है, वह जाना नहीं चाहता। आप यह बात जान कर हैरान होंगी कि इस तथ्य ने आज तक मनुष्य के समाज को जितना नुकसान पहुंचाया है,किसी और ने नहीं। क्योंकि मां-बाप अच्छी बातों की तरफ ले जाना चाहते हैं, बच्चे का अहंकार अच्छी बातों के विरोध में हो जाता है। मां-बाप बुरी बातों से रोकते हैं, बच्चे की जिज्ञासा बुरी बातों की तरफ बढ़ जाती है। मां-बाप इस भांति अपने ही हाथों अपने बच्चों के शत्रु सिद्ध होते हैं।

इसलिए शायद कभी आपको यह खयाल न आया हो कि बहुत अच्छे घरों में बहुत अच्छे बच्चे पैदा नहीं होते। कभी नहीं होते। बहुत बड़े-बड़े लोगों के बच्चे तो बहुत निकम्मे साबित होते हैं। गांधी जैसे बड़े व्यक्ति का एक लड़का शराब पीया, मांस खाया, धर्म परिवर्तित किया। आश्चर्यजनक है! क्या हुआ यह? गांधी ने बहुत कोशिश की उसको अच्छा बनाने की, वह कोशिश दुश्मन बन गई।

तो एक बात तो यह समझ लें कि जिसको भी परिवर्तित करने का खयाल उठे, पहले तो स्वयं का जीवन उस दिशा में परिवर्तित हो जाना चाहिए। तो आपके जीवन की छाया, आपके जीवन का प्रभाव, बहुत अनजान रूप से बच्चे को प्रभावित करता है। आपकी बातें नहीं, आपके उपदेश नहीं। आपके जीवन की छाया बच्चे को परोक्ष रूप से प्रभावित करती है और उसके जीवन में परिवर्तन की बुनियाद बन जाती है।

और दूसरी बात, बच्चे को कभी भी दबाव डाल कर, आग्रह करके किसी अच्छी दिशा में ले जाने की कोशिश मत करना। वही बात अच्छी दिशा में जाने के लिए सबसे बड़ी दीवाल हो जाएगी। और हो भी सकता है, जब तक वह छोटा रहे, आपकी बात मान ले; क्योंकि कमजोर है और आप ताकतवर हैं, आप डरा सकते हैं, धमका सकते हैं, आप हिंसा कर सकते हैं उसके साथ। और यह मत सोचना कभी कि मां-बाप अपने बच्चों के साथ कैसे हिंसा करेंगे! मां-बाप ने इतनी हिंसा की है बच्चों के साथ जिसका कोई हिसाब नहीं है। दिखाई नहीं पड़ती। जब भी हम किसी को दबाते हैं तब हम हिंसा करते हैं। बच्चे के अहंकार को चोट लगती है। लेकिन वह कमजोर है, सहता है। 

आज नहीं कल जब वह बड़ा हो जाएगा और ताकत उसके हाथ में आएगी, तब तक आप बूढ़े हो जाएंगे, तब आप कमजोर हो जाएंगे, तब वह बदला लेगा। बूढ़े मां-बाप के साथ बच्चों का जो दुर्व्यवहार है उसका कारण मां-बाप ही हैं। बचपन में उन्होंने बच्चों के साथ जो किया है, बुढ़ापे में बच्चे उनके साथ करेंगे।

(सौजन्‍य से – ओशो न्‍यूज लेटर)


आत्मा कालातीत है

कोई पूछता था, 'आत्मा को कैसे पाया जाए? ब्रह्मं-उपलब्धि कैसे हो सकती है?'

आत्मा को पाने की बात ही मेरे देखे गलत है। वह प्राप्तव्य नहीं है। वह तो नित्य प्राप्त है। वह कोई वस्तु नहीं, जिसे लाना है। वह कोई लक्ष्य नहीं, जिसको साधना है। वह भविष्य में नहीं है कि उस तक पहुंचना है। वह है। 'है' का ही वह नाम है। वह वर्तमान है-नित्य वर्तमान। उसमें अतीत और भविष्य नहीं है। उसमें 'होना' नहीं है। वह शुद्ध नित्य अस्तित्व है।

फिर खोना किस स्तर पर हो गया है या खोने के आभास और पाने की प्यास कहां आ गयी है?

मैं को समझ लें तो जो आत्मा खोई नहीं जा सकती है, उसका खोना समझना आ सकता है। 'मैं' आत्मा नहीं है। न 'स्व' आत्मा है, न 'पर' आत्मा है। यह द्वैत वैचारिक है। यह द्वैत मन में है। मन आभास सत्ता है। वह कभी वर्तमान में नहीं होता है। वह या तो अतीत में होता है, या भविष्य में। न अतीत की सत्ता है, न भविष्य की। एक न हो गया है, एक अभी हुआ नहीं है। एक स्मृति में है, एक कल्पना में है। सत्ता में दोनों नहीं हैं। इस असत्ता से 'मैं' का जन्म होता है। 'मैं' विचार की उत्पत्ति है। काल भी विचार की उत्पत्ति है। विचार के कारण, 'मैं' के कारण, आत्मा आवरण में है। वह है, पर खोयी मालूम होती है। फिर यही 'मैं' यही विचार-प्रवाह इस तथाकथित खोयी आत्मा को खोजने चलता है। यह खोज असंभव है, क्योंकि इस खोज से 'मैं' और पुष्ट होता है- सशक्त होता है।

'मैं' के द्वारा आत्मा को खोजना, स्वप्न के द्वारा जागृति को खोजने जैसा है। 'मैं' के द्वारा नहीं, 'मैं' के विसर्जन से उसको पाना है। स्वप्न के जाते ही जागृति है, 'मैं' के जाते ही आत्मा है। आत्मा शून्यता है, क्योंकि पूर्णता है। उसमें 'स्व', 'पर' नहीं है। वह अद्वैत है। वह कालातीत है। विचार के, मन के जाते ही जाना जाता है कि उसे कभी खोया नहीं था।

इसलिए उसे खोजना नहीं है। खोज छोड़नी है और खोजने वाले को छोड़ना है। खोज और खोजी के मिटते ही खोज पूरी हो जाती है। 'मैं' को खोकर उसे पा लिया जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

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