बुधवार, 24 जून 2009

ईश्वर

1) व्यक्ति का अन्त:करण ईश्वर की वाणी है।
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2) वही मनुष्य ईश्वर के दर्शन कर सकता हैं, जिसका अन्त:करण निर्मल और पवित्र है।
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3) जो ईश्वर को पा लेता हैं वह मूक और शान्त हो जाता है।
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4) जो ईश्वर पर विश्वास रखतते हैं वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते है।
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5) जो मन को अपने वश में नहीं करते, हृदय को शुद्ध नही बनाते, ईश्वर के प्रति उनकी सब प्रार्थना व्यर्थ है।
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6) जो वक्ता श्रोता को अज्ञानी समझकर बोलता हैं वह वक्ता स्वयं अज्ञानी हैं। क्योंकि यहॉं सबमें परमात्मा बैठा हैं। कौन यहॉं अज्ञानी हैं। `` ईश्वर अंस जीव अबिनासी। ´´
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7) जो वास्तविक मौन को साध लेता हैं , वह भौतिक जीवन में गम्भीर, शान्त, सम्माननीय और वजनदार प्रतीत होता हैं, और आध्यात्मिक जीवन में ईश्वरोन्मुख बनता चला जाता है।
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8) जो आलस्य और कुकर्म से जितना बचना चाहता हैं, वह ईश्वर का सबसे बडा भक्त हैं।
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9) नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नही, आदर्शों की अवहेलना को कहते है।
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10) अपनी सभी आशाओं को ईश्वर पर केंद्रित कर दो तो कोई व्यक्ति निराश या निरस्त नहीं कर सकता ।
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11) अन्धकार में भटकों को ज्ञान का प्रकाश देना ही सच्ची ईश्वराधना है।
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12) अन्त:करण में ईश्वरीय प्रकाश जाग्रत करना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है।
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13) ऐसे ईश्वर को खोज निकाले। जो चरित्र बन कर साथ-साथ रह सके।
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14) यह संसार एक दिव्य ईश्वरीय योजना हैं और उन्ही प्रभु की इच्छा से नियिन्त्रत है। इस सत्य की अवहेलना करने वाले व्यक्ति को ईश्वर के प्रति समर्पित होने की कला नहीं आती है। परिणामत: मन में चिन्ता, उद्वेग एवं अनेक तरह की उलझने उत्पन्न हो जाती है।
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15) ईश्वर एक हैं, उसकी इतनी आकृतियॉ। नहीं हो सकती जितनी की भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में गढी गयी हैं। उपयोग मन की एकाग्रता का अभ्यास करने तक ही सीमित रखा जाना चाहिये। प्रतिमा पूजन के पीछे आद्योपान्त प्रतिपादन इतना ही हैं कि दृश्य प्रतीक के माध्यम से अदृश्य-दर्शन और प्रतिपादन को समझने, हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाये।
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16) ईश्वर साधारण दिखने वाले लोगों को पसन्द करता हैं इसलिये उसने ऐसे लोग अधिक संख्या में बनाये है।
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17) ईश्वर उनकी मदद करता हैं, जो अपनी मदद आप करता है।
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18) ईसा का एक प्रेमपूर्ण वचन :- भयभीत न हो, निराश न हो, क्योंकि मैं तुम्हारा भगवान, तुम्हारा ईश्वर सदा तुम्हारे साथ हूँ । जहॉ-जहॉ भी तुम जाओगे, मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।
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19) निराशा आम तौर पर हमारे अपने एजेण्डा की असफलता के कारण होती हैं न कि ईश्वर द्वारा हमारे लिये सोचे गये उद्धेश्यों से। निराशा से उपजे तनाव और संघर्ष हमारी आध्यात्मिक मॉस-पेशीयों को बलिष्ठ बनाते है।-लूसी शॉ
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20) अपने आपको जानना हैं, दूसरों की सेवा करना हैं और ईश्वर को मानना हैं। ये तीनो क्रमश: ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग है। साथ में योग (समता) का होना आवश्यक है।
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21) एक दूसरे को भगवान् की याद कराते रहें, भगवान् की चर्चा करते रहे। दीपक तले अंधेरा रहता हैं, पर दो दीपक आमने-सामने रख दे तो अंधेरा नहीं रहता।
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22) यदि आप भगवान के समीप जाना चाहते हों तो उसी के समान निरहंकारी बन जाओ।
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23) यह तथ्य हैं कि जिन्होने भगवान का आमन्त्रण सुना हैं, वह कभी घाटे में नहीं रहे।
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24) इन्सानी पुरुषार्थ एवं भगवान की कृपा मिलकर असंभव को सम्भव बनाती है।

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