मंगलवार, 3 अगस्त 2010

सम्राट अशोक

विश्व इतिहास में कई महानायक हुए हैं जिनकी कीर्ति विश्व में फैली। एक इतिहासकार के अनुसार 'किसी व्यक्ति के यश और प्रसिद्धि को मापने का मापदंड असंख्‍य लोगों का हृदय है - जो उसकी पवित्र स्मृति को सजीव रखता है और जो अगणित मनुष्यों की वह जिह्वा है जो उसकी कीर्ति का गान करती है।

उन्हें विश्व इतिहास में 'महान' की उपाधि से विभूषित किया है। आज भी इतिहास ग्रंथों में उनका नाम इसी उपाधि के साथ प्रत्यय के साथ मिलता है। 'महान' कही जाने वाली ये तीन‍ विभूतियाँ हैं अशोक महान, सिकंदर महान और अकबर महान। यहाँ प्रस्तुत है अशोक महान के प्रेरक चरित्र एवं आदर्शों की संक्षिप्त झाँकी।

सम्राट अशोक मौर्यवंश का तीसरा राजा था। उसके पिता का नाम बिंदुसार और माता का जनपद कल्याणी था। अशोक का जन्म लगभग 297 ई. पूर्व माना गया है। अशोक का साम्राज्य प्राय: संपूर्ण भारत और पश्चिमोत्तर में हिंदुकुश एवं ईरान की सीमा तक था।

कलिंग के भीषण युद्ध ने अशोक के हृदय पर बड़ा आघात पहुँचाया और उसने अपनी हिंसा आधारित दिग्विजय की नीति छोड़कर, धर्म विजय की नीति को अपनाया। लगभग इसी समय अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। अब सम्राट अशोक शासक और संत-दोनों का मिश्रित चरित्र था। उसने अपने साम्राज्य के सभी साधकों को लोकमंगल के कार्यों में लगा दिया था। अशोक की राजनीति धर्म और नीति से पूर्णत: प्रभावित थी। अशोक का आदर्श था - 'लोकहित से बढ़कर दूसरा और कोई कर्म नहीं है जो कुछ मैं पुरुषार्थ करता हूँ, वह लोगों पर उपकार नहीं, अपितु इसलिए कि मैं उनमें उऋण हो जाऊँ और उनको इहलौकिक सुख और परमार्थ प्राप्त कराऊँ।' 

अशोक जनता में अत्यधिक लोकप्रिय था। वह जनता को अपनी संतान के समान स्नेह करता था। जनता का सुख-दुख जानने के लिए वह वेश बदलकर भ्रमण किया करता था जिसे वह जनता के संपर्क में आकर उसके सुख को समझने का अवसर पाता था। अशोक अपनी प्रजा की भौतिक एवं नैतिक दोनों प्रकार की उन्नति चाहता था। इस कारण वह अपने शासन में नैतिकता को अधिक बल देता था।

अशोक को धर्म प्रचार के लिए, इतिहास में अधिक जाना जाता है। वह अपने धर्म प्रचार में नैतिक सिद्धांतों पर ही जोर देता था - इससे सभी धर्मों के बीच संतुलन बनाने में सरलता होती थी। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए, नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था जो पर्वत शिखाओं, पत्‍थर के खंभों और गुफाओं में अंकित किए गए गए। अशोक ने तीन वर्ष की अवधि में चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण कराया। इनमें सारनाथ (वाराणसी के निकट) में उसके द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

अशोक ने देश के विभिन्न भागों में, प्रमुख राजपथों और मार्गों पर धर्म स्तंभ स्थापित किए। इनमें सारनाथ का सिंह शीर्ष स्तंभ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। यह धर्मचक्र की घटना का स्मारक था। सारनाथ की सिंह मुद्रा को भारत सरकार का राज्य चिह्न स्वीकार किया गया है। अशोक संसार के उन सम्राटों में था जिसने धर्म-विजय के द्वारा संपूर्ण देश एवं पड़ोसी देशों में अहिंसा, शांति, मानव कल्याण एवं मानव प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुँचाया।

इसी के साथ अशोक की धर्म विजय में लोकोपकारी कार्यों का समावेश भी हुआ। सड़कों का निर्माण, उसके किनारे वृक्षों का आरोपण, विश्राम शालाओं और प्याऊ निर्माण, सुरक्षा आदि का समुचित प्रबंध था। जनता सुखी एवं धर्मपरायण थी। 

अशोक ने पूरे विश्व में बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ शांति, अहिंसा एवं प्रेम का जो व्यापक प्रचार किया, उससे उसे सर्वत्र प्रशंसा मिली। अशोक के समय में पूरे विश्व में युद्ध, रक्तपात, हिंसा और अराजकता का साम्राज्य था। अशोक ने ऐसे उथलपुथल वाले सागर में अमृत बिंदु का काम किया और विश्व में शांति स्थापित की, नैतिक मूल्यों की स्थापना की और सबको विश्वबंधुत्व एवं प्रेम का संदेश दिया। इस तरह अशोक पूरे विश्व में यशस्वी बना - उसे 'अशोक महान' कहा गया।

महान ऋषि अष्टावक्र

अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है। अष्टावक्र ने जो कहा वह 'अष्टावक्र गीता' नाम से प्रसिद्ध है।

ओशो कहते हैं, 'अष्टावक्र समन्वयवादी नहीं हैं, सत्यवादी हैं। सत्य जैसा है वैसा कहा है, बिना किसी लाग-लपेट के। सुनने वाले की चिंता नहीं है। सुनने वाला समझेगा, नहीं समझेगा इसकी भी चिंता नहीं। सत्य का ऐसा शुद्धतम वक्तव्य न पहले कहीं हुआ, न फिर बाद में कभी हो सका।'

अष्टावक्र पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनकी श्रेणी में सुकरात, मंसूर और जे. कृष्‍णमूर्ति को रखा जा सकता है। इन्हें हम धर्म के विरुद्ध वक्तव्य नहीं कहेंगे बल्कि ये ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने धर्म के मर्म और सत्य को अपने तरीके से जाना। यह किसी परम्परा के कभी हिस्से नहीं रहे। यही कारण रहा कि दुनिया में इनकी चर्चा कम ही हुई है। आओ जानते हैं कि कौन थे अष्टावक्र।

पहली कहानी :
अष्टावक्र की माता का नाम सुजाता था। उनके पिता कहोड़ वेदपाठी और प्रकांड पंडित थे तथा उद्दालक ऋषि के शिष्य और दामाद थे। राज्य में उनसे कोई शास्त्रार्थ में जीत नहीं सकता था। अष्टावक्र जब गर्भ में थे तब रोज उनके पिता से वेद सुनते थे। एक दिन उनसे रहा नहीं गया और गर्भ से ही कह बैठे- 'रुको यह सब बकवास, शास्त्रों में ज्ञान कहाँ ? ज्ञान तो स्वयं के भीतर है। सत्य शास्त्रों में नहीं स्वयं में है। शास्त्र तो शब्दों का संग्रह मात्र है।'

यह सुनते ही उनके पिता क्रोधित हो गए। पंडित का अहंकार जाग उठा, जो अभी गर्भ में ही है उसने उनके ज्ञान पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। पिता तिलमिला गए। उन्हीं का वह पुत्र उन्हें उपदेश दे रहा था जो अभी पैदा भी नहीं हुआ। क्रोध में अभिशाप दे दिया- 'जा...जब पैदा होगा तो आठ अंगों से टेढ़ा होगा।' इसीलिए उनका नाम अष्टावक्र पड़ा।

पिता ने क्रोध में शरीर को विक्षप्त कर दिया। उन्हें जरा भी दया नहीं आई। ऐसे पिता के होने का क्या मूल्य, जो अपने पुत्र को शाप दे। अष्टावक्र का कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं था। उन्होंने तो अपना विचार ही प्रकट किया था, लेकिन इससे यह सिद्ध होता है कि लोग अपने-अपने शास्त्रों के प्रति कितने कट्टर होते हैं।

पिता के इस शाप के बावजूद अष्टावक्र पिताभक्त थे। जब वे बारह वर्ष के थे तब राज्य के राजा जनक ने विशाल शास्त्रार्थ सम्मेलन का आयोजन किया। सारे देश के प्रकांड पंडितों को निमंत्रण दिया गया, चूँकि अष्टावक्र के पिता भी प्रकांड पंडित और शास्त्रज्ञ थे तो उन्हें भी विशेष आमंत्रित किया गया। जनक ने आयोजन स्थल के समक्ष 1000 गायें बाँध ‍दीं। गायों के सींगों पर सोना मढ़ दिया और गले में हीरे-जवाहरात लटका दिए और कह दिया कि जो भी विवाद में विजेता होगा वह ये गायें हाँककर ले जाए। 

संध्या होते-होते खबर आई कि अष्टावक्र के पिता हार रहे हैं। सबसे तो जीत चुके थे ‍लेकिन वंदनि (बंदी) नामक एक पंडित से हारने की स्थिति में पहुँच गए थे। पिता के हारने की स्थिति तय हो चुकी थी कि अब हारे या तब हारे। यह खबर सुनकर अष्टावक्र खेल-क्रीड़ा छोड़कर राजमहल पहुँच गए। अष्टावक्र भरी सभा में जाकर खड़े हो गए। उनका आठ जगहों से टेढ़ा-मेढ़ा शरीर और अजीब चाल देखकर सारी सभा हँसने लगी। अष्टावक्र यह नजारा देखकर सभाजनों से भी ज्यादा जोर से खिलखिलाकर हँसे।

जनक ने पूछा, 'सब हँसते हैं, वह तो मैं समझ सकता हूँ, लेकिन बेटे, तेरे हँसने का कारण बता?

अष्टावक्र ने कहा, 'मैं इसलिए हँस रहा हूँ कि इन चमारों की सभा में सत्य का निर्णय हो रहा है, आश्चर्य! ये चमार यहाँ क्या कर रहे हैं।'

सारी सभा में सन्नाटा छा गया। सब अवाक् रह गए। राजा जनक खुद भी सन्न रह गए। उन्होंने बड़े संयत भाव से पूछा, 'चमार!!! तेरा मतलब क्या?'

अष्टाव्रक ने कहा, 'सीधी-सी बात है। इनको चमड़ी ही दिखाई पड़ती है, मैं नहीं दिखाई पड़ता। ये चमार हैं। चमड़ी के पारखी हैं। इन्हें मेरे जैसा सीधा-सादा आदमी दिखाई नहीं पड़ता, इनको मेरा आड़ा-तिरछा शरीर ही दिखाई देता है। राजन, मंदिर के टेढ़े होने से आकाश कहीं टेढ़ा होता है? घड़े के फूटे होने से आकाश कहीं फूटता है? आकाश तो निर्विकार है। मेरा शरीर टेढ़ा-मेढ़ा है लेकिन मैं तो नहीं। यह जो भीतर बसा है, इसकी तरफ तो देखो। मेरे शरीर को देखकर जो हँसते हैं, वे चमार नहीं तो क्या हैं? 

यह सुनकर मिथिला देश के नरेश एवं भगवान राम के श्‍वसुर राजा जनक सन्न रह गए। जनक को अपराधबोध हुआ कि सब हँसे तो ठीक, लेकिन मैं भी इस बालक के शरीर को देखकर हँस दिया। राजा जनक के जीवन की सबसे बड़ी घटना थी। देश का सबसे बड़ा ताम-झाम। सबसे सुंदर गायें। सबसे महँगे हीरे-जवाहरात। सबसे विद्वान पंडित और सारे संसार में इस कार्यक्रम का समाचार और सिर्फ एक ही झटके में सब कुछ खत्म। जनक को बहुत पश्चाताप हुआ। सभा भंग हो गई।

रातभर राजा जनक सो न सके। दूसरे दिन सम्राट जब घूमने निकले तो उन्हें वही बालक अष्टावक्र खेलते हुए नजर आया। वे अपने घोड़े से उतरे और उस बालक के चरणों में गिर पड़े। कहा- 'आपने मेरी नींद तोड़ दी। आपमें जरूर कुछ बात है। आत्मज्ञान की चर्चा करने वाले शरीर पर हँसते हैं तो वे कैसे ज्ञानी हो सकते हैं। प्रभु आप मुझे ज्ञान दो।'

दूसरी कहानी : 
इसके अलावा भी किंवदंती है कि वंदनि से हार जाने के परिणामस्वरूप उनके पिता को जल में डुबो दिया गया था। पिता के न होने के कारण अष्टावक्र अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्‍वेतकेतु को अपना भाई समझते थे। माता सुजाता द्वारा उन्हें उनके पिता का सच बताए जाने के बाद वे अपने मामा श्‍वेतकेतु के साथ वंदनि से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक की सभा में पहुँचे और उन्होंने वंदनि को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा।

राजा जनक ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे कई प्रश्न पूछे। जब अष्टावक्र ने सभी का उत्तर दे दिया तब उन्होंने वंदनि से शास्त्रार्थ की आज्ञा दी और उन्होंने वंदनि को हरा दिया। शास्त्रार्थ में वंदनि के हारने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी मेरे पिता की तरह जल में डुबो दिया जाए।

तब वंदनि कहने लगे कि राजन! मैं वरुण का पुत्र हूँ। मैंने सारे हारे हुए ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं तत्क्षण ही उन सभी को आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। वंदनि के इतना कहते ही जल में डुबोए गए सभी ब्राह्मण जनक की सभा में पुन: प्रकट हो गए, जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।

अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किए। कहोड़ ने प्रसन्न होकर अपने पुत्र को गले लगाकर कहा कि तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो, उक्त स्नान से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे।

लेकिन पहली कहानी ज्यादा सच लगती है दूसरी तो कतिपय ब्राह्मणों द्वारा लीपापोती करके बनाई गई ही ज्यादा नजर आती है।

अंधविश्वासी न बनो : स्वामी विवेकानंद

यह विलक्षण बालक काफी कम उम्र से ही भय अथवा अंधविश्वास न मानता था। उनके बचपन का एक अन्य खेल था, पड़ोसी के घर चम्पा के पेड़ पर चढ़कर फूल तोड़ना और ऊधम मचाना। पेड़ के मालिक ने अपनी डाँट-फटकार से कोई लाभ न होता देख, एक दिन नरेन के साथियों से अत्यंत गंभीरतापूर्वक कहा कि उस पेड़ पर एक ब्रह्मदैत्य निवास करता है और उस पर सभी बच्चे भयभीत हो गए और उस पेड़ से दूर-दूर रहने लगे। परंतु नरेन उन्हें समझा-बुझाकर पुन: वहीं ले आए और पहले के समान ही पेड़ पर चढ़कर खेलने लगे और शैतानीपूर्वक वृक्ष की कुछ डालियाँ भी तोड़ डालीं। फिर वे अपने साथियों की ओर उन्मुख होकर बोले - 'तुम लोग भी कैसे गधे हो। देखो मेरी गरदन कैसी सही सलामत है। बूढ़े बाबा की बात बिल्कुल झूठी है। दूसरे लोग जो कुछ भी कहते हैं, उसकी जाँच किए बिना कभी भी विश्वास न करना।' 

सत्य की स्वयं ही उपलब्धि करो

ये सरल तथा स्पष्ट शब्द जगत के प्रति उनके भावी संदेश का संकेत देते हैं। परवर्ती काल में अपने व्याख्‍यानों में वे प्राय: ही कहा करते थे - 'किसी बात पर सिर्फ इसी कारण विश्वास न कर लो कि वह किसी ग्रंथ में लिखी है। किसी चीज पर इसलिए विश्वास न कर लो कि किसी व्यक्ति ने उसे सत्य कहा है। किसी बात पर सिर्फ इस कारण भी विश्वास न करना कि वे परंपरा से चली आ रही है। अपने लिए सत्य की स्वयं ही उपलब्धि करो। उसे तर्क की कसौटी पर कसो। इसी को अनुभ‍ूति कहते हैं।

नीचे लिखी घटना उनके साहस एवं प्रत्युत्पन्नमति का एक अच्‍छा उदाहरण है। व्यायामशाला में एक दिन वे एक भारी झूला खड़ा करना चाहते थे। उन्होंने आसपास उपस्थित कुछ लोगों से इसमें सहायता करने का अनुरोध किया। हाथ बटाने वालों में एक अँगरेज नाविक भी थे। झूला खड़ा करते समय उसका एक भाग नाविक के सिर पर गिर पड़ा और वे चोट खाकर अचेत हो गए। 

बाकी सभी लोग उन्हें मृत समझकर पुलिस के भय से रफूचक्कर हो गए परंतु नरेन ने अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़कर नाविक के चोट पर पट्‍टी बाँधी, उनके चेहरे पर पानी के छींटे दिए और धीरे-धीरे उन्हें होश में ले आए। तत्पश्चात घायल नाविक को अपने पड़ोस के विद्यालय भवन में लाकर एक सप्ताह तक उनकी सेवा की। उनके स्वस्थ हो जाने के पश्चात नरेन ने अपने मित्रों से थोड़ा धन संग्रह किया और नाविक को सौंपकर उन्हें विदाई दी।

बचपन के इन क्रीड़ा-कौतुकपूर्ण जीवन के बीच भी नरेन के हृदय में परिव्राजक संन्यासी जीवन के प्रति आकर्षण बना रहा था। अपने हथेली पर की एक रेखा विशेष की ओर संकेत करते हुए वे अपने मित्रों से कहा करते - 'मैं अवश्य ही संन्यासी बनूँगा, एक हस्तरेखाविद्‍ ने बताया है।'

किशोरावस्था में प्रवेश करते हुए नरेन के स्वभाव में अब कुछ विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे थे। बौद्धिक जीवन की ओर उनका झुकाव बढ़ गया। अब वे इतिहास एवं साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों का अध्ययन करने लगे, समाचार पत्र पढ़ने लगे और सार्वजनिक सभाओं में जाने लगे। संगीत उनके दिल बहलाव का प्रमुख साधन बन गया। उनका मत था कि संगीत के माध्यम से उदात्त भावों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए और जिससे गायक की भी भावनाएँ जाग्रत हो उठें।

पंद्रह वर्ष की आयु में उन्हें प्रथम आध्यात्मिक अनुभूति हुई। वे अपने परिवार के साथ मध्यप्रदेश के रायपुर नगर को जा रहे थे। यात्रा का कुछ भाग बैलगाड़ी में तय किया जा रहा था। उस दिन शीतल और मंद वायु प्रवाहित हो रही थी, वृक्ष और लताएँ रंग-बिरंगे पत्र-पुष्पों से झुकी जा रही थीं, तरह-तरह के पक्षी कलरव कर रहे थे। चलते-चलते बैलगाड़ी एक ऐसी सँकरी घाटी के समीप पहुँची, जहाँ दो ऊँचे पर्वत शिखर मानो एक दूसरे को चूम रहे थे। मुग्ध होकर इन पर्वतों की ओर निहालते हुए नरेन ने देखा कि पर्वत के एक दरार से धरती तक एक विशाल मधुचक्र लटक रहा है। यह अद्‍भुत अपूर्व दृश्य देखकर उनका मन ईश्वर विभोर हो उठा और वे बाह्यसंज्ञाशून्य होकर काफी देर तक गाड़ी में ही पड़े रहे। बाह्य चेतना लौटने के पश्चात भी उनके मन में आनंद की हिलोरें उठ रही थीं।

यहाँ पर नरेन के मन की एक दूसरी रोचक विशेषता का उल्लेख किया जा सकता है। बचपन से ही प्राय: ही किसी-किसी व्यक्ति या स्थान को देखकर उन्हें लगता कि उन्होंने पहले भी कहीं उन्हें देखा है परंतु कब और कहाँ देखा है, इसका वे स्मरण न कर पाते। एक बार वे अपने कुछ मित्रों के साथ एक मित्र के मकान के एक कमरे में बैठकर किन्हीं विषयों पर चर्चा कर रहे थे। उनमें किसी एक के कुछ कहने पर नरेन को सहसा ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होंने पहले भी कभी उसी मकान में, उन्हीं लोगों के साथ उसी विषय पर चर्चा की है। उन्होंने उस मकान को कभी अंदर से देखा न था तथापि उसके चप्पे-चप्पे का सविस्तार वर्णन किया। 

पहले तो उन्होंने यह सोचकर कि शायद पिछले किसी जन्म में वे इस भवन में रह चुके हैं, पुनर्जन्म के सिद्धांत से इसकी व्याख्‍या करने का प्रयास किया, पर बाद में इस व्याख्या को असंभव कहकर त्याग दिया गया। अंत में उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस जन्म में उनके संपर्क में आने वाले व्यक्तियों, स्थानों तथा घटनाओं का उन्हें पहले से अवलोकन करा दिया गया था। इसी कारण उनके सामने आते ही वे उन्हें पहचान लेते हैं। 

रायपुर में नरेन के पिताजी उन्हें प्रसिद्ध विद्वानों से मिलाते तथा उनके साथ विविध विषयों पर चर्चा करने को प्रोत्साहन देते। ऐसे दुरूह विषयों पर चर्चा करते समय इस बालक की तीव्र मेधाशक्ति व्यक्त हो उठती थी। नरेन ने अपने पिता से प्रत्येक विषय का सार ग्रहण करने की पद्धति, सत्य को उसके सभी दृष्टिकोणों से संपूर्ण रूप से देखने का तरीका तथा चर्चा के मुख्‍य विषय को बनाए रखने की कला सीख ली थी। 

1879 ई. में उनका परिवार पुन: लौटकर कलकत्ता आ गया। हाई स्कूल की परीक्षा को काफी कम समय बच रहा था, फिर भी नरेन प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। इस बीच वे अँगरेजी तथा बंगला साहित्य की अनेक उच्च स्तरीय पुस्तकें पढ़ चुके थे। इतिहास उनका प्रिय विषय था। इन्हीं दिनों उन्होंने पुस्तकें पढ़ने तथा विषय को आयत्त कर लेने का एक अभिनव उपाय खोज निकाला था। उन्हीं के शब्दों में - 'ऐसा अभ्यास हो गया था कि लेखक का पूरा अभिप्राय समझने के लिए मुझे पुस्तक की प्रत्येक पंक्ति पढ़ने की आवश्यकता न होती थी। अनुच्छेद की प्रथम एवं अंतिम पंक्ति पढ़कर ही मैं उसका पूरा तात्पर्य समझ लेता था। 

फिर बाद में मैंने पाया कि मैं किसी पृष्ठ की प्रथम एवं अंतिम पंक्ति पढ़कर ही उसकी पूरी विषयवस्तु समझ जाता हूँ। फिर कुछ और काल बाद जहाँ लेखक पाँच-छ: पृष्ठों में अपना विषय समझाने का प्रयास करता, वहाँ मैं प्रारंभ की पंक्तियाँ पढ़कर ही लेखक की सारी युक्तियाँ समझ लेता था।'

बचपन के उल्लासपूर्ण दिन समाप्त हुए। उच्च शिक्षा के लिए 1879 ई. में नरेंद्रनाथ ने कलकत्ते के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया। फिर एक वर्ष बाद उन्होंने स्कॉटिश जनरल मिशनरी बोर्ड द्वारा स्थापित जनरल एसेम्बलीज इन्स्टीट्‍यूशन में दाखिला लिया। यही संस्था बाद में स्काटिश चर्च कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसी कॉलज के प्राचार्य तथा अँगरेजी साहित्य के प्राध्यापक हेस्टी साहब के ही मुख से उन्होंने सर्वप्रथम श्रीरामकृष्ण का नाम सुना था। नरेंद्र अब एक बलिष्ठ, फुर्तीले, हृष्ट-पुष्ट तथा आकर्षक नवयुवक के रूप में परिणत हो चुके थे तथा अध्ययन में गंभीरतापूर्वक रूचि लेने लगे थे। प्रथम दो वर्ष उन्होंने पाश्चात्य तर्कशास्त्र का अध्ययन किया। 

फिर वे पाश्चात्य दर्शन तथा यूरोप के प्राचीन एवं अर्वाचीन इतिहास का गहन अध्ययन करने लगे। उनकी स्मरणशक्ति अद्‍भुत थी। ग्रीन द्वारा लिखित अँगरेजों का इतिहास आयत्त करने में उन्हें सिर्फ तीन दिन लगे थे। परीक्षा की पूर्व संध्या को बहुधा वे कड़ी चाय कॉफी लेकर सारी रात पढ़ाई करते थे। 

प्राय: इन्हीं दिनों वे श्रीरामकृष्ण देव के संपर्क में आए और हम आगे देखेंगे कि इस घटना ने उनके जीवन को एक विशेष दिशा प्रदान की। श्रीरामकृष्ण के संस्पर्श में आने के फलस्वरूप उनकी अंतर्निहित आध्यात्मिक पिपासा जाग्रत हो उठी। वे जगत की क्षणभंगुरता तथा बौद्धिक शिक्षा की व्यर्थता का बोध करने लगे। अपनी बीए की परीक्षा के पहले दिन ही उन्हें सहसा ईश्वर के प्रति सर्वग्रासी प्रेम की अनुभूति हुई और वे अपने एक सहपाठी के कमरे के द्वार पर खड़े होकर भावुकतापूर्वक गाने लगे। भावार्थ इस प्रकार है - 

हे पर्वतो! बादलो! हवाओ! 
सब मिलकर उनकी महिमा गाओ! 
हे सूर्य! हे चंद्र! हे तारकाओ! 
आनंदपूर्वक प्रभु की महिमा गाओ।

मित्र ने विस्मित होकर नरेंद्र को अगले दिन होने वाली परीक्षा की याद दिलाई तो भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया। आसन्न संन्यास-जीवन की छाया उन्हें तेजी से आवृत्त किए जा रही थी। फिर भी वे परीक्षा में बैठे एवं आसानी से सफल हुए। 

उनकी प्रशंसा करते हुए एक बार प्रो. हेस्टी ने कहा था - 

'नरेंद्र एक वास्तविक प्रतिभाशाली युवक है। मैंने दूर-दूर की यात्रा की है परंतु ऐसी प्रतिभा एवं संभावनाओं वाला लड़का कभी भी नहीं मिला, यहाँ तक कि जर्मन विश्वविद्यालय के दर्शन के छात्रों में भी कोई नहीं दिखा। वह जीवन में निश्चय ही कुछ कर दिखाएगा।'

नरेंद्र की बहुमुखी प्रतिभा संगीत के माध्यम से भी अभिव्यक्त थी। उन्होंने संगीत विशारदों से वाद्य एवं स्वरसंगीत दोनों ही सीखे थे। वे कई तरह के वाद्य में पारंगत थे, परंतु गायन में तो वे सानी न रखते थे। उन्होंने एक मुसलमान शिक्षक से हिन्दी, उर्दू तथा फारसी के अनेक भक्तिमूलक गाने सीखे।

उस काल के सबसे महत्वपूर्ण धर्म-आंदोलन ब्रह्मसमाज के साथ भी वे जुड़े थे और इसका उनके प्रारंभिक जीवन पर काफी प्रभाव पड़ा था। 

ब्रिटिश साम्राज्य से पराभूत हो जाने के पश्चात भारत में अँगरेजी शिक्षा का सूत्रपात हुआ। इसके फलस्वरूप हिन्दू समाज बौद्धिक एवं आक्रामक यूरोपीय संस्कृ‍ति के संपर्क में आया। अभिनव तथा सक्रिय जीवनधारा के सम्मोहन में आकर हिन्दू युवकों को अपने समाज में अनेक दोष ‍दिख पड़े। अँगरेज लोगों के आगमन के पूर्व मुस्लिम शासनकाल में ही हिन्दू समाज की गति अवरुद्ध हो गई थी, जा‍ति प्रथा में ऊँच-नीच का भेद बढ़ गया था तथा पुरोहितगण अपने‍ निजी स्वार्थ के लिए आम जनता का धार्मिक जीवन नियंत्रित करने लगे थे। 

उपनिषद एवं भगवद्‍गीता के शक्तिदायी दार्शनिक विचारों के साथ निरर्थक अंधविश्वास तथा निर्जीव रीतिरिवाज घुलमिल गए थे। जमींदार जनसाधारण का शोषण करने लगे थे तथा महिलाओं की दशा दयनीय हो गई थी। मुस्लिम शासन के पतन के बाद से भारतीय जनजीवन के सामाजिक, राजनीतिक धार्मिक तथा आर्थिक - प्रत्येक क्षेत्र में विश्रृंखला फल गई थी। नवोदित पाश्चात्य शिक्षा ने समाज के अनेक दोषों को तीव्र आलोक में ला दिया। अब राष्ट्रीय जीवन को एक बार पुन: नवजीवन के मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से अनेक पुरातनपंथी तथा उदारवादी सुधार आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ। 

ब्रह्मसमाज इन उदारवादी आंदोलनों में एक था जिसने बंगाल के शिक्षित नवयुवकों को आकृष्ट किया। इसके संस्थापक राजा राममोहन राय (1774-1833 ई.) ने परंपरागत हिन्दू धर्म के कर्मकांड, मूर्तिपूजा और पुरोहिती प्रथा का बहिष्कार किया और अपने अनुयाइयों को आह्वान किया कि वे 'इस विश्व-ब्रह्माण्ड के सृष्टि एवं पालनकर्ता - अनंत, अगोचर तथा अक्षर परमात्मा की पूजा-आराधना' करें।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

ऐसे आई समझ

एक था बूढ़ा पाला - बड़ा समझदार और अनुभवी! उसका नौजवान बेटा जाड़ा एकदम नासमझ और बड़बोला था, एक दिन उसने पिता से डींग मारी - 'मैं जिसे चाहूँ, मिनटों में ठंड से अकड़ा सकता हूँ।'

'ऐसा समझना कोरा भ्रम है बेटा'' बूढ़े पाला ने समझाया।

मैं अभी प्रमाण देता हूँ। नौजवान जाड़ा ने उत्तेजित होकर कहा और चारों तरफ निगाह दौड़ाई... सामने एक मोटा-ताजा सेठ दिखा गरम कपड़ों और कीमती शाल से लदा-फदा! जाड़े ने उसे जा घेरा। सेठ देखते-देखते ठंड से काँपने लगा। देख लीजिए पिताजी! जाड़े ने शेखी बघारी 'पहलवान जैसे सेठ पर मैंने कैसी बुरी गुजार दी। अब तो मान गए न मेरी बात?'

नहीं, बूढ़ा पाला हँसा, फिर बैलगाड़ी लेकर जंगल की तरफ जाते एक फटेहाल किसान को दिखाकर बोला - 'बेटा, तेरी बात मैं तब मान सकता हूँ, जब तू उसे छका दे।' 

जाड़े ने बाप की तरफ देखा और बड़े घमंड से कहा - 'अभी चित करता हूँ। वह तुरंत उड़कर किसान के पास पहुँच गया और उसे दबोचना शुरू किया। उसने कमजोर बैल के जूए से कंधा भिड़ाया और बैलगाड़ी खींचने में मदद देने लगा। 

जाड़ा उसकी कन‍पटियाँ, हाथ-पैर, और गर्दन पर चुटकियाँ काटता रहा, लेकिन किसान पर असर नहीं पड़ रहा था। क्योंकि गाड़ी में जोर लगाने से उसके शरीर से गरमी छिटक रही थी। जाड़ा हैरान था - कितना मजबूत है यह पिद्दी भर का आदमी! मगर उसने हिम्मत न हारी, किसान के पीछे पड़ा रहा। मन में सोच रहा था, यहाँ न सही, जंगल में तो अकड़ा ही दूँगा। कितनी देर झेल पाएगा मुझे? जंगल पहुँच कर किसान ने बैलगाड़ी रोक दी।

अब वह कुल्हाड़ी उठाकर सूखी लकड़ियाँ काटने लगा। जाड़ा जैसे-जैसे उस पर हमला करता, उसकी कुल्हाड़ी चलाने की गति बढ़ती गई। देखते-देखते उसने गाडी भर लकडी काट डाली। देह में ऐसी गर्मी आई कि पसीना चूने लगा। उसने सिर की पगड़ी उतारकर जमीन पर रख दी। 

जाड़े का कोई वश न चला, तो पगड़ी में जा बैठा। लकड़ी लाद चुकने के बाद किसान ने पगड़ी उठाई। उसे बरफ सा ठंडा पाकर वह गरम हथेलियों से मसल-मसल कर पगड़ी को गरमाने लगा। जाड़ा ज्यादा समय तक किसान के हाथों की रगड़ न झेल पाया। वह पिटा सा मुँह लेकर पिता के पास लौट आया। बूढ़ा पाला उसकी दशा देखकर हँस पड़ा। बोला 'बेटा! आरामतलब लोगों को तुम छका सकते हो। 

मगर मेहनती लोगों के आगे तुम्हारी तो क्या, किसी भी मुसीबत की नहीं चल पाती।'

रविवार, 1 अगस्त 2010

थैली से जुड़ा हमारा पर्यावरण

कुछ दिनों पहले मैंने टीवी पर पॉलीथिन की समस्या पर एक छोटी-सी फिल्म देखी। इसमें मैंने देखा कि किस तरह समंदर के तट पर एक मरा हुआ कछुआ मिला। इस दृश्य ने मुझे फिल्म देखने के लिए रोक लिया, क्योंकि मुझे कछुए अच्छे लगते हैं। मैंने देखा कि डॉक्टर कछुए की मौत का कारण पता लगा रहे हैं। जल्द ही कारण उनके हाथ में था। कछुए के पेट से निकली पॉलीथिन की थैली ही उसकी मौत की वजह थी। 

इस फिल्म को देखकर मुझे समझ आया कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली पॉलीथिन थैलियाँ किस तरह जल में रहने वाले जीवों के लिए मौत का कारण बन रही हैं। फिल्म में आगे बताया गया कि बड़ी व्हेल मछली हो या छोटी मछलियाँ पॉलीथिन के कारण सभी मारी जा रही हैं। फिल्म में भारत के भी कुछ दृश्य थे जिनमें हर कूड़े के ढेर पर पॉलीथिन का कचरा दिखाया गया था और गौमाता उनमें मुँह मार रही थी। 

भारत में लोग अब सब्जियों का कचरा भी पॉलीथिन में बंद करके फेंकते हैं जिसे खाने के चक्कर में पॉलीथिन भी गाय के पेट में चली जाती है और फिर लगातार पेट में पॉलीथिन के इकट्ठा होने से गाय की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। गौमाता को पूजने वाले देश में गायें इस तरह पॉ‍लीथिन का कचरा खाकर मारी जा रही हैं यह सोचकर मुझे दुख हुआ।

फिल्म में दूसरे देशों में पॉलीथिन प्रदूषण का जिक्र भी था। इसमें बताया गया कि २००२ में जब ऑस्ट्रेलिया दिवस मनाया गया था तो इस दौरान इस देश में स्वच्छता अभियान चलाया गया था। तब पूरे ऑस्ट्रेलिया से करीब ५ लाख पॉलीथिन थैलियों का कचरा इकट्ठा किया गया था। सोचिए हर साल इतनी मात्रा में पन्नी की थैलियों का कचरा पर्यावरण का कितना नुकसान करता है।

इसके बाद ऑस्ट्रेलिया में पॉलीथिन थैलियों पर प्रतिबंध लगाने की बात भी उठी, पर इसे जनता के विवेक पर छोड़ दिया गया। ऑस्ट्रेलिया छोटा देश है, पर साउथ अफ्रीका जैसे देश में हर साल करीब ८ अरब पॉलीथिन थैलियाँ उपयोग में लाई जाती हैं और उपयोग के बाद ये कचरे में जाती हैं। सिंगापुर, थाईलैंड और आयरलैंड जैसे देशों में पॉलीथिन बैग का उपयोग कम करने के लिए इनके उपयोग पर भारी टैक्स लगाया गया है। लोग इन देशों में पॉलीथिन की थैलियों का बार-बार उपयोग करते हैं। फिल्म बनाने वाले का कहना था कि टैक्स लगाने से ज्यादा जरूरी है लोगों की सोच कि वे इन थैलियों का उपयोग करके दूसरों के जीवन को कितना मुश्किल में डाल रहे हैं। 

फिल्म में यह बताने वाले अनेक दृश्य थे कि किस तरह कचरे में फेंक दी गई पॉलीथिन मिट्टी और जलस्रोतों को प्रदूषित करती है। फिल्म से मैंने जाना कि एक प्लास्टिक बैग को मिट्टी में मिलने में २० से १००० साल तक लगते हैं। यह बहुत लंबा समय है और इतने समय तक एक बहुत छोटी प्लास्टिक की थैली कचरे के रूप में यहाँ-वहाँ प्रदूषण फैलाती रहती है। वह मिट्‍टी की उपजाऊ क्षमता को भी कम करती है। आपने भारत के हर बड़े शहर में पन्नी बीनने वाले बच्चे देखे होंगे। ये बच्चे कचरे के ढेर से पॉलीथिन निकालकर उसे रिसाइकलिंग सेंटर तक पहुँचाते हैं पर क्या हमें ही यह काम नहीं करना चाहिए?

घर में सब्जी, फल, धूल-मिट्‍टी और इस तरह का कचरा अलग फेंकना चाहिए, क्योंकि यह जल्दी ही मिट्‍टी में घुल-मिल जाता है जबकि पॉलिथीन जैसा कचरा जो सड़ने में बहुत लंबा समय लगाता है, अलग करके एक जगह रखना चाहिए जहाँ से वह कबाड़ी वाले के जरिए रिसाइकल होने के लिए पहुँच सके। इस तरह या पॉलिथिन थैलियों का उपयोग बंद करके और एक ही थैली का बार-बार उपयोग करके भी हम पर्यावरण की बेहतरी के लिए कुछ कर सकते हैं।

इस फिल्म को देखते हुए मुझे अपने दादाजी की याद भी आई, जो बाजार जाते हुए हमेशा एक कपड़े की थैली अपने साथ ले जाते थे और सब्जी-भाजी से किराने तक का सामान उसी में लाते थे। वे हमेशा एक कपड़े की थैली अपने साथ रखते थे। अब मुझे पता चला कि दादाजी की उस थैली के पीछे पर्यावरण को अच्छा बनाए रखने की बड़ी सीख छुपी थी।

ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं

एक बार स्वामी विवेकानंद जी मेरठ आए। उनको पढ़ने का खूब शौक था। इसलिए वे अपने शिष्य अखंडानंद द्वारा पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ने के लिए मँगवाते थे। केवल एक ही दिन में पुस्तक पढ़कर वापस करने के कारण ग्रंथपाल क्रोधित हो गया। उसने ग्रंथपाल से कहा कि रोज-रोज पुस्तकें बदलने में मुझे तकलीफ होती है। आप यह पुस्तक पढ़ते हैं कि केवल पन्ने ही बदलते हैं? 

अखंडानंद ने यह बात स्वामी जी को बताई तो वे स्वयं पुस्तकालय में गए और ग्रंथपाल से कहा ये सब पुस्तकें मैंने मँगवाई थीं। ये सब पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं। आप मुझसे इन पुस्तकों में से कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। ग्रंथपाल को शंका थी कि पुस्तकों को पढ़ने समझने के लिए समय तो चाहिए। इसलिए उसने अपनी शंका के समाधान के लिए बहुत सारे प्रश्न पूछे। 

स्वामी विवेकानंद ने प्रत्येक प्रश्न का जवाब तो ठीक दिया ही, पर यह भी बता दिया कि वह प्रश्न पुस्तक के किस पृष्ठ पर है। तब ग्रंथपाल स्वामी जी की मेधा स्मरण शक्ति देखकर ग्रंथपाल आश्चर्यचकित हो गया। ऐसी स्मरण शक्ति का रहस्य पूछा। स्वामी विवेकानंद ने कहा - पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान के द्वारा ही हम इंद्रियों पर संयम रख सकते हैं। 

प्रभु को भी प्रिय है सरलता

सतपुड़ा के वन प्रांत में अनेक प्रकार के वृक्ष में दो वृक्ष सन्निकट थे। एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था। पलाश पर फूल थे। उसकी शोभा से वन भी शोभित था। चंदन का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार सरल तथा पलाश का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार वक्र और कुटिल था, पर थे दोनों पड़ोसी व मित्र। यद्यपि दोनों भिन्न स्वभाव के थे। परंतु दोनों का जन्म एक ही स्थान पर साथ ही हुआ था। अत: दोनों सखा थे। 

कुठार लेकर एक बार लकड़हारे वन में घुस आए। चंदन का वृक्ष सहम गया। पलाश उसे भयभीत करते हुए बोला - 'सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है। ज्यादा सीधे व सरल रहने का जमाना नहीं है। टेढ़ी उँगली से घी निकलता है। देखो सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया। मुझसे सब दूर ही रहते हैं।'

चंदन का वृक्ष धीरे से बोला - 'भाई संसार में जन्म लेने वाले सभी का अंतिम समय आता ही है। परंतु दुख है कि तुमसे जाने कब मिलना होगा। अब चलते हैं। मुझे भूलना मत ईश्वर चाहेगा तो पुन: मिलेंगे। मेरे न रहने का दुख मत करना। आशा करता हूँ सभी वृक्षों के साथ तुम भी फलते-फूलते रहोगे।'

लकड़हारों ने आठ-दस प्रहार किए चंदन उनके कुल्हाड़े को सुगंधित करता हुआ सद्‍गति को प्राप्त हुआ। उसकी लकड़ी ऊँचे दाम में बेची गई। भगवान की काष्ठ प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बाँके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी। मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। बड़ा उत्सव होने वाला था। 

यज्ञीय समिधा (लकड़ी) की आवश्यकता थी। लकड़हारे उसी वन प्रांत में प्रवेश कर उस पलाश को देखने लगा जो काँप रहा था। यमदूत आ पहुँचे। अपने पड़ोसी चंदन के वृक्ष की अंतिम बातें याद करते हुए पलाश परलोक सिधार गया। उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुँचे।

यज्ञ मण्डप अच्छा सजा था। तोरण द्वार बना था। वेदज्ञ पंडितजन मंत्रोच्चार कर रहे थे। समिधा को पहचान कर काष्ट मूर्ति बन चंदन बोला - 'आओ मित्र! ईश्वर की इच्‍छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया। अपने वन के वृक्षों का कुशल मंगल सुनाओ। मुझे वन की बहुत याद आती है। मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ते हैं और मन में जंगल को याद करता हुआ रहता हूँ।

पलाश बोला - 'देखो, यज्ञ मंडप में यज्ञाग्नि प्रज्जवलित हो चुकी है। लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊँगा। अब नहीं मिल सकेंगे। मुझे भय लग रहा है। ‍अब बिछड़ना ही पड़ेगा।' 

चंदन ने कहा - 'भाई मैं सरल व सीधा था मुझे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर‍ दिया तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो। अन्यथा दावानल में जल मरते। सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले तो सरलता, सीधापन मत छोड़ना। सज्जन कठिनता में भी सरलता नहीं छोड़ते जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं। सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एक मात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।' 

बाबा तुलसीदास के रामचरितमानस में भगवान ने स्वयं ही कहा है - 
निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।

अचानक पलाश का मुख एक आध्‍यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।

अपनी भाषा का महत्व

इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे। उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।

एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा - अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।

डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया - अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है। आपके देश की कोई भाषा नहीं है? डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ-साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक-महक नहीं थी। 

गृहस्वामिनी बोली - डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते। 

गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया - मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्‍यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी। फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था। स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी। एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ-साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था।  बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है? मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते। साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार-बार आग्रह करने पर वह बोली - 'महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?' 

साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा - 'बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा - 'महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।' 

इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं 'लड़की' नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है। साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती। जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया। 

मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा। यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। 
गृहस्वामिनी ने कहा - 'डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं...।'

हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं न!

सुकरात के तीन छोटे प्रश्न

प्राचीन यूनान में सुकरात नाम के विद्वान हुए हैं। वे ज्ञानवान और विनम्र थे। एक बार वे बाजार से गुजर रहे थे तो रास्ते में उनकी मुलाकात एक परिचित व्यक्ति से हुई। उन सज्जन ने सुकरात को रोककर कुछ बताना शुरू किया। वह कहने लगा कि 'क्या आप जानते हैं कि कल आपका मित्र आपके बारे में क्या कह रहा था?' 

सुकरात ने उस व्यक्ति की बात को वहीं रोकते हुए कहा - सुनो, भले व्यक्ति। मेरे मित्र ने मेरे बारे में क्या कहा यह बताने से पहले तुम मेरे तीन छोटे प्रश्नों का उत्तर दो। उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा - 'तीन छोटे प्रश्न'।

सुकरात ने कहा - हाँ, तीन छोटे प्रश्न। 

पहला प्रश्न तो यह कि क्या तुम मुझे जो कुछ भी बताने जा रहे हो वह पूरी तरह सही है? 
उस आदमी ने जवाब दिया - 'नहीं, मैंने अभी-अभी यह बात सुनी और ...।' 

सुकरात ने कहा- कोई बात नहीं, इसका मतलब यह कि तुम्हें नहीं पता कि तुम जो कहने जा रहे हो वह सच है या नहीं।'

अब मेरे दूसरे प्रश्न का जवाब दो कि 'क्या जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे लिए अच्छा है?' आदमी ने तुरंत कहा - नहीं, बल्कि इसका ठीक उल्टा है। सुकरात बोले - ठीक है। 

अब मेरे आखिरी प्रश्न का और जवाब दो कि जो कुछ तुम मुझे बताने जा रहे हो वह मेरे किसी काम का है भी या नहीं। 

व्यक्ति बोला - नहीं, उस बात में आपके काम आने जैसा तो कुछ भी नहीं है। 

तीनों प्रश्न पूछने के बाद सुकरात बोले - 'ऐसी बात जो सच नहीं है, जिसमें मेरे बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है और जिसकी मेरे लिए कोई उपयोगिता नहीं है, उसे सुनने से क्या फायदा। और सुनो, ऐसी बातें करने से भी क्या फायदा।

शिवाजी को गुरु का संदेश

जब छत्रपति शिवाजी को यह पता चला कि समर्थ रामदासजी ने महाराष्ट्र के ग्यारह स्थानों में हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित की है और वहाँ हनुमान जयंती उत्सव मनाया जाने लगा है, तो उन्हें उनके दर्शन की उत्कृष्ट अभिलाषा हुई। वे उनसे मिलने के लिए चाफल, माजगाँव होते हुए शिगड़वाड़ी आए। वहाँ समर्थ रामदासजी एक बाग में वृक्ष के नीचे "दासबोध" लिखने में मग्न थे।

शिवाजी ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया और उनसे अनुग्रह के लिए विनती की। समर्थ ने उन्हें त्रयोदशाक्षरी मंत्र देकर अनुग्रह किया और "आत्मानाम" विषय पर गुरुपदेश दिया (यह "लघुबोध" नाम से प्रसिद्ध है और "दासबोध" में समाविष्ट है।) फिर उन्हें श्रीफल, एक अंजलि मिट्टी, दो अंजलियाँ लीद एवं चार अंजलियाँ भरकर कंकड़ दिए। 

जब शिवाजी ने उनके सान्निध्य में रहकर लोगों की सेवा करने की इच्छा व्यक्त की, तो संत बोले- "तुम क्षत्रिय हो, राज्यरक्षण और प्रजापालन तुम्हारा धर्म है। यह रघुपति की इच्छा दिखाई देती है।" और उन्होंने "राजधर्म" एवं "क्षात्रधर्म" पर उपदेश दिया।

शिवाजी जब प्रतापगढ़ वापस आए और उन्होंने जीजामाता को सारी बात बताई, तो उन्होंने पूछा- "श्रीफल, मिट्टी, कंकड़ और लीद का प्रसाद देने का क्या प्रयोजन है?" शिवाजी ने बताया- "श्रीफल मेरे कल्याण का प्रतीक है, मिट्टी देने का उद्देश्य पृथ्वी पर मेरा आधिपत्य होने से है, कंकड़ देकर यह कामना व्यक्त हो गई है कि अनेक दुर्ग अपने कब्जे में कर पाऊँ और लीद अस्तबल का प्रतीक है, अर्थात उनकी इच्छा है कि असंख्य अश्वाधिपति मेरे अधीन रहें।" इस प्रकार राजधर्म को समझकर शिवा ने अपनी शक्ति का विस्तार किया और न्याय नीति की स्थापना की।

राजा बदल गया

उदयपुर नाम का एक राज्य था। राजा रत्नेश का शासन चल रहा था। वे बड़े लापरवाह और कठोर प्रकृति के थे। राज्य में निर्धनता आसमान को छू रही थी। प्रजा रत्नेश का आदर-सम्मान करना भूल चुकी थी। राजा को प्रणाम-नमस्कार किए बिना लोग अपना मुख मोड़ लेते थे। प्रजा के व्यवहार से रत्नेश स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था। 

प्रजा के इस व्यवहार का कारण रत्नेश समझ नहीं पा रहा था। 

एक दिन रत्नेश ने मंत्री से कहा - 'मंत्रीवर! आज हमारा मन यहाँ घुटने लगा है। जंगलों में भ्रमण करने से शायद घुटन मिट जाए।

बस वे दोनों अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर जंगल की ओर निकल पड़े। 

दोनों एक बड़े पर्वत के पास पहुँचे। फागुन का महीना था। धूप चढ़ने लगी थी। थोड़ी देर तक सुस्ताने के लिए दोनों एक घने पेड़ के नीचे रुके। घोड़े से उतरते हुए रत्नेश को एक छोटी सी पर्ण कुटिया दिखाई पड़ी। घने जंगल में कुटिया! कौन हो सकता है? उन्हें अचरज हुआ।

धीमे कदमों से रत्नेश कुटिया के पास पहुँचे, पीछे-पीछे गजेंद्र सिंह भी थे। कुटिया में एक महात्मा थे। उनको देखकर वे दोनों भाव-विभोर हो उठे। 

'महात्मा जी! मैं उदयपुर राज्य का राजा रत्नेश हूँ। और ये हमारे मंत्री गजेंद्र सिंह।' महात्मा जी को राजा ने अपना व मंत्री का परिचय दिया। 

'कैसे आना हुआ? महात्मा जी ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर पूछा। 

हम भ्रमण कर रहे थे। इस पेड़ की शीतल छाँह में सुस्ताने यहाँ रुके तो कुटिया दिख पड़ी। हमारा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हो गए। मंत्री ने कहा। 

हाव-भाव व मुख की आभा ही से रत्नेश समझ गए कि महात्माजी ज्ञान-दर्शन और शास्त्रों में निष्णात हैं। राजा ने उनको अपनी व्यथा बताई - 'महात्माजी! मेरे राज्य की प्रजा मेरा आदर-सम्मान नहीं करती।

प्रजा का तो कर्तव्य बनता है कि वह अपने राजा का आदर करे, किंतु मैं इससे वंचित हूँ। 

रत्नेश के व्यवहार से महात्मा जी परिचित थे। अत: उनको माजरा समझते देर नहीं लगी। 'राजन्! मैं समझ गया हूँ, आप चलिए मेरे साथ।' महात्मा जी बोले और दरिया की ओर बढ़ गए। उनके पीछे-पीछे रत्नेश और गजेंद्र सिंह चल पड़े। 

हरी-भरी घास उगी थी। घोड़े घास में लीन थे। कुटिया की पूर्व दिशा में पर्वत श्रृंखलाएँ थीं। पर्वतों से बहने वाले झरने समतल भूमि में एक साथ मिलकर दरिया बन गए थे। 

दरिया के पास एक चट्‍टान खड़ी थी। चट्‍टान के पास पहुँचकर महात्मा रुक गए। राजा और मंत्री भी अचरज के साथ महात्माजी के पास खड़े थे। राजन्! एक पत्थर उठाइए और इस चट्‍टान के ऊपर प्रहार कीजिए। महात्मा ने रत्नेश से कहा।

रत्नेश हक्के-बक्के रह गए। पर महात्मा जी का आदेश था। अतएव बिना कुछ जाने-समझे रत्नेश ने एक पत्थर उठाया और जोर से चट्‍टान के ऊपर प्रहार किया। चट्‍टान पर लगते ही वह नीचे गिर पड़ा। राजन्! अब दरिया के तट से थोड़ी गीली मिट्‍टी लेकर आइए।' महात्माजी ने फिर आदेश दिया। 

राजा एक मुट्‍ठी गीली मिट्‍टी के साथ चटपट महात्माजी के पास पहुँचे। राजन्! अब प्रहार कीजिए।' महात्मा ने फिर कहा।

रत्नेश ने जोर लगाकर गीली मिट्‍टी चट्‍टान पर फेंकी। गीली मिट्‍टी नीचे गिरने की बजाय चट्‍टान पर चिपक गई। 

गीली मिट्‍टी को चिपकी हुई देखकर महात्मा बोले -

'राजन्! संसार की यही नियति है। संसार कोमलता को आसानी से ग्रहण कर लेता है। कठोरता को त्याग देता है। इसलिए चट्‍टान ने गीली मिट्‍टी को ग्रहण कर लिया और कठोर पत्थर को त्याग दिया।

राजन्। आपके साथ भी ऐसा ही हुआ है।  मेरे साथ! रत्नेश ने अचरज भरे स्वर में कहा। 

हाँ राजन्! आप अहंकारी व कठोर प्रकृति के हैं। आपका यह व्यवहार राज्य की उन्नति और सुख-शांति में बाधक बना हुआ है। यह प्रकृति राज्य की प्रजा को स्वीकार नहीं है। अत: प्रजा आपकी उपेक्षा कर रही है।' महात्मा ने संयत स्वर में समझाया। सुनते ही राजा का सिर झुक गया।

राजन्! अपने व्यवहार में परिवर्तन लाइए आपको आदर-सम्मान सब मिलेगा। 

महात्माजी की नसीहत सुनकर रत्नेश ने उनके चरण पकड़ लिए और बोले - 'महात्मा जी भूल क्षमा हो आपकी शिक्षा शिरोधार्य है।'

विनम्रता से प्रणाम करके दोनों अपने-अपने घोड़े पर सवार हो गए और राजमहल की ओर चल पड़े।

काँच की बरनी

जीवन में सबकुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, तब कुछ तेजी से पा लेने की भी इच्छा होती है और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं। दर्शनशास्त्र के एक प्रोफेसर कक्षा में आए और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने वाले हैं। उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बरनी टेबल पर रखी और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची। 

उन्होंने छात्रों से पूछा, "क्या बरनी पूरी भर गई ?" "हाँ," आवाज आई। फिर प्रोफेसर ने कंकर भरने शुरू किए। धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो जहाँ-जहाँ जगह थी वहाँ कंकर समा गए। प्रोफेसर ने फिर पूछा, "क्या अब बरनी भई गई है?" छात्रों ने एक बार फिर हाँ कहा। अब प्रोफेसर ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरू किया। रेत भी उस बरनी में जहाँ संभव था बैठ गई। प्रोफेसर ने फिर पूछा- "क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई न?" हाँ, अब तो पूरी भर गई है," सभी ने कहा। 

प्रोफेसर ने समझाना शुरू किया। इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो। टेबल टेनिस की गेंद को भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक समझो। छोटे कंकर का मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बड़ा मकान आदि है। रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार-सी बातें, मनमुटाव, झगड़े हैं। अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिए जगह ही नहीं बचती या कंकर भर दिए होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी। ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है। यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पड़े रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिए अधिक समय नहीं रहेगा।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

दो शब्दों ने बनाया दुनिया को दीवाना

दुनियाभर में भारत के दर्शन और हिन्दू धर्म का डंका बजाने वाले स्वामी विवेकानंद के मात्र दो शब्दों ने दुनिया को भारत का दीवाना बना दिया था और उस समय के विद्वानों को यह स्वीकार करना पड़ा था कि भारत सभी धर्मों की माँ है।

12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानंद का बचपन से ही धर्म और अध्यात्म की ओर रुझान था। धर्म-अध्यात्म के मर्मज्ञ विवेकानंद को दुनिया में भारतीय दर्शन की पताका फहराने का मौका उस समय मिला, जब 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। काफी कोशिशों के बाद विवेकानंद इस कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व करने में कामयाब रहे।

विवेकानंद शोध साहित्य से जुड़े डॉ. रामकिशोर के अनुसार विश्व धर्म संसद में शुरुआत में अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने स्वामी विवेकानंद को तुच्छ समझा और यह सोचकर कि वे एक गुलाम देश के प्रतिनिधि हैं, उन्हें पहले दिन सबसे अंत में बोलने का मौका दिया गया। विश्व धर्म संसद का उद्घाटन 11 सितंबर 1893 को हुआ और स्वामीजी को सबसे अंत में थोड़ी देर के लिए बोलने का मौका मिला।

रामकिशोर के अनुसार जब स्वामीजी ने अपने धर्म भाषण की शुरुआत में ‘अमेरिका के भाइयों और बहनों’ कहा तो वातावरण वहाँ मौजूद सात हजार लोगों की तालियों की गड़गड़हाहट से गूँज उठा। तालियाँ लगभग दो मिनट तक लगातार बजती रहीं। 

विवेकानंद को थोड़ी देर के लिए मौका मिला था, लेकिन उनके करिश्माई संबोधन का असर कुछ ऐसा हुआ कि उनका संबोधन निर्धारित समय से काफी अधिक देर तक चला।

स्वामीजी के करिश्मे का ऐसा असर हुआ कि धर्म संसद के अध्यक्ष डॉ. बोराज कह उठे-‘भारत धर्मों की माँ है, जिसका प्रतिनिधित्व भगवा कपड़े पहनने वाले स्वामी ने किया। उन्होंने श्रोताओं पर गहरा असर छोड़ा है। अपने इस संबोधन से विवेकानंद अमेरिका तथा तमाम दुनिया की प्रेस की सुर्खियों में छा गए और उन्हें ‘भारत का तूफानी संत’ करार दिया गया।

न्यूयॉर्क क्रिटिक ने लिखा- 'वे (स्वामी) किसी दैवीय शक्ति से युक्त वक्ता हैं।' न्यूयॉर्क हेराल्ड ने लिखा- ‘विवेकानंद नि:संदेह धर्म संसद की शीषर्तम हस्ती हैं।' विवेकानंद ने धर्म संसद में कई बार हिन्दू दर्शन पर भाषण दिया। 

रामकिशोर का कहना है कि शुरुआत में स्वामीजी को तुच्छ समझकर उन्हें सबसे अंत में बोलने का मौका मिलता था, लेकिन बाद में उनका भाषण इसलिए अंत में रखा जाता था कि लोग उनका भाषण सुनने के लिए ही आखिर तक बैठे रहें।

धर्म संसद का समापन 27 सितंबर 1893 को हुआ, जिसमें सार्वभौमिकता और धार्मिक सहिष्णुता पर जोर दिया गया। इसके बाद स्वामी विवेकानंद की ख्याति ऐसी फैली कि उन्हें दुनिया के कई देशों ने अपने यहाँ धर्म पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया।

रामकिशोर का कहना है कि स्वामीजी एक प्रखर वक्ता ही नहीं, बल्कि दूरदृष्टा भी थे। धर्म संसद में भाग लेने के बाद वे जब कोलंबो के जरिए 1897 में भारत पहुँचे तो उन्होंने भविष्यवाणी की कि भारत 50 साल बाद आजाद हो जाएगा और उनकी भविष्यवाणी बिल्कुल सही साबित हुई।

स्वामीजी ने रामकृष्ण मठ और मिशन की स्थापना के साथ ही हिन्दू दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए काफी कुछ किया। बीसवीं सदी के बहुत से विद्वानों और नेताओं ने स्वामी विवेकानंद के प्रभाव को स्वीकार किया। 

स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने एक बार कहा था-'स्वामी विवेकानंद ने हिन्दूवाद और भारत को बचाने का काम किया।' 

सुभाषचंद्र बोस का कहना था-‘स्वामीजी आधुनिक भारत के निर्माता हैं।’ स्वामी विवेकानंद के जीवन चरित्र ने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को नया हौसला प्रदान करने का भी काम किया। अरबिन्दो घोष स्वामी विवेकानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे।

गुरु और शिष्य


गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय। 
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।

'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान)। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है।

वैसे तो हमारे जीवन में कई जाने-अनजाने गुरु होते हैं जिनमें हमारे माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है फिर शिक्षक और अन्य। लेकिन असल में गुरु का संबंध शिष्य से होता है न कि विद्यार्थी से। आश्रमों में गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता रहा है।

गुरु क्या है, कैसा है और कौन है यह जानने के लिए उनके शिष्यों को जानना जरूरी होता है और यह भी कि गुरु को जानने से शिष्यों को जाना जा सकता है, लेकिन ऐसा सिर्फ वही जान सकता है जो कि खुद गुरु है या शिष्य। गुरु वह है ‍जो जान-परखकर शिष्य को दीक्षा देता है और शिष्‍य भी वह है जो जान-परखकर गुरु बनाता है।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने बहुत प्रयास किए कि नरेंद्र (विवेकानंद) मेरा शिष्य हो जाए क्योंकि रामकृष्ण परमहंस जानते थे कि यह वह व्यक्ति है जिसे सिर्फ जरा-सा धक्का दिया तो यह ध्यान और मोक्ष के मार्ग पर दौड़ने लगेगा।

लेकिन स्वामी विवेकानंद बुद्धिवादी व्यक्ति थे और अपने विचारों के पक्के थे। उन्हें रामकृष्ण परमहंस एक ऐसे व्यक्ति नजर आते थे जो कोरी कल्पना में जीने वाले एक मूर्तिपूजक से ज्यादा कुछ नहीं। वे रामकृष्‍ण परमहंस की सिद्धियों को एक मदारी के चमत्कार से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। फिर भी वे परमहंस के चरणों में झुक गए क्योंकि अंतत: वे जान गए कि इस व्यक्ति में कुछ ऐसी बात है जो बाहर से देखने पर नजर नहीं आती।

तब यह जानना जरूरी है कि आखिर में हम जिसे गुरु बना रहे हैं तो क्या उसके विचारों से, चमत्कारों से या कि उसके आसपास भक्तों की भीड़ से प्रभावित होकर उसे गुरु बना रहे हैं, यदि ऐसा है तो आप सही मार्ग पर नहीं हैं।

गुरु और शिष्य की परम्परा के ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिससे यह जाहिर होता है कि गुरु को शिष्य और शिष्य को गुरु बनाने में कितनी जद्दोजहद का सामना करना पड़ा।

जेतवन का पंछी :

जेतवन में भगवान बुद्ध प्रवचन देते थे। एक दिन एक भिक्षु ने पूछा- तथागत यह वातायन में एक पक्षी प्रतिदिन आपके प्रवचन के शुरू होने के कुछ क्षण पूर्व आकर चुपचाप बैठ जाता है और तब तक शांत बैठा रहता है तब तक आपके प्रवचन समाप्त नहीं हो जाते। यह आपके प्रवचन बड़े ध्यान से सुनता है कृपया इसका रहस्य बताएँ।

बुद्ध ने कुछ क्षण वातायन में बैठे उस पक्षी को देखा फिर कहा- भंते हम जीवन में अहंकारवश या अन्य सांसारिक कार्यों के चलते बहुत सारे ऐसे मौके छोड़ देते हैं जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। यह पक्षी अपने पिछले जन्म में एक सेठ था और इसी तरह बुद्ध उसके नगर से गुजरते थे, लेकिन चूँकि यह सेठ था और इसे बुद्ध के चरणों में नमन करने की फुर्सत नहीं थी, लेकिन बुद्ध सब जानते हैं कि उसे कितनी फुर्सत थी।

यह व्यक्ति बुद्ध को देखने और उन्हें सुनने का मौका चूक गया, लेकिन मरने के बाद जब यह पक्षी बना तो इसकी चेतना में स्मृति शेष रही और यह 'भाव बोध' द्वारा जानता है कि इससे कुछ गलत हुआ है, लेकिन इसका 'भाव बोध' भी अच्छा है कि इसने फिर से चूके हुए मौके को पकड़ लिया। 

हमारे जीवन में भी ऐसे बहुत से मौके आते हैं जबकि हम भगवानश्री को देखने और सुनने से चूक जाते हैं, क्योंकि हम किसी अन्य तथाकथित के चक्कर में लगे रहते हैं। ऐसे आदरणीय और सच्चे गुरुओं को गुरु पूर्णिमा पर शत: शत: नमन...।

जीवन विकास के लिए उपयुक्त आहार

अन्न को शास्त्रों में प्राण की संज्ञा दी गई है । अन्न को प्राण कहने में न तो कोई अयुक्तता है और न अत्युक्ति । निःसन्देह वह प्राण ही है । भोजन के तत्वों से ही शरीर में जीवनी शक्ति का निर्माण होता है । उसी से माँस, रक्त, मज्जा, अस्थि तथा ओजवीर्य आदि का निर्माण हुआ करता है । भोजन के अभाव में इन आवश्यक तत्वों का निर्माण रुक जाये तो शरीर शीघ्र ही स्वत्वहीन होकर स्तब्ध हो जाय । 

अन्न सर्व साधन रूप शरीर का आधार है । प्रत्येक मनुष्य तन, मन अथवा आत्मा से जो कुछ दिखाई देता है, उसका बहुत कुछ आधार हेतु उसका आहार ही है । जन्म काल से लेकर मृत्युपर्यन्त प्राणी का पालन, सम्वर्धन एवं अनुवर्धन आहार के आधार पर ही हुआ करता है । किसी का बलिष्ठ अथवा निर्बल होना, स्वस्थ अथवा अस्वस्थ होना बहुत अंशों तक भोजन पर ही निर्भर रहता है । 

समस्त सृष्टि तथा हमारे जीवन के लिए भोजन का इतना महत्व होते हुए भी कितने व्यक्ति ऐसे होंगे जो प्राण रूप आहार के विषय में जानकारी रखते हों और उसके सम्बन्ध में सावधान रहते हों, संसार में दिखलाई देने वाले शारीरिक एवं मानसिक दोषों में अधिकांश का कारण आहार सम्बंधी अज्ञान एवं असंयम ही है । जो भोजन शरीर को शक्ति और मन को बुद्धि को प्रखरता प्रदान करता है, वही असंयमित भी बना देता है । शारीरिक अथवा मानसिक विकृतियों को भोजन विषयक भूलों का ही परिणाम मानना चाहिये । अन्न दोष संसार के अन्य दोषों की जड़ है- जैसा खाये अन्न वैसा बने मन वाली कहावत से यही प्रतिध्वनित होता है कि मनुष्य की अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों का जन्म एवं पालन अच्छे, बुरे आहार पर ही निर्भर है । 

निःसंदेह मनुष्य जिस प्रकार का राजसी, तामसी अथवा सात्विकी भोजन करता है, उसी प्रकार उसके गुणों एवम् स्वभाव का निर्माण होता है और जिनसे प्रेरित उसके कर्म भी वैसे ही हो जाते हैं फलतः कर्म के अनुसार ही मनुष्य का उत्थान-पतन हुआ करता है । जो मनुष्य इतने महत्वपूर्ण पदार्थ भोजन के सम्बन्ध में अनभिज्ञ है अथवा असंयम बरतता है उसे बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता । आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए प्रक्ताहार विहार का नियम कड़ाई के साथ पालन करने के लिए कहा गया है, जो मनुष्य किसी भी क्षेत्र में स्वस्थ, सुन्दर, सौम्य एवं समुन्नत जीवनयापन करना चाहता है उसके लिए भोजन सम्बंधी ज्ञान तथा उसका संयम बहुत आवश्यक है । भोजन के प्रति असंयम व्यक्ति अन्य किसी प्रकार के संयम का पालन नहीं कर सकता । भोजन का संयम अन्य इन्द्रियों के संयमों के पालन करने में बहुत कुछ सहायक होता है । 

जीवन निर्माण के आधार भोजन सम्बंधी अज्ञान कुछ कम खेद का विषय नहीं है । मनुष्य जो कुछ खाता है और जिसके बल पर जीता है, उसके विषय में क, ख तक न जानना निःसन्देह लज्जा की बात है । कितने आश्चर्य का विषय है जो मनुष्य कपड़ों लत्तों, घर-मकान और देश- देशान्तर के विषय में बहुत कुछ जानता है या जानने के लिए उत्सुक रहता है, वह जीवन तत्व देने वाले भोजन के विषय में जरा भी नहीं जानता और न जानना चाहता है । इसी अज्ञान के कारण हमारी भोजन सम्बंधी न जाने कितनी भ्रान्त धारणायें बन गई हैं । अनेक लोग यह यह समझते हैं कि जो भोजन जिव्हा को रुचिकर लगे, जिसमें दूध, दही, मक्खन आदि पौष्टिक पदार्थों का प्रचुर मात्रा में समावेश हो, मिर्च- मसाले इस मात्रा में पड़े हों जिन्हें देखकर ही मुँह में पानी आये वही भोजन सबसे अच्छा है । इसके विपरीत बहुत से लोग भोजन के नाम पर पापी पेट में जो कुछ माँस, घास, कूड़ा-कर्कट मिल जाये, डाल लेना ही आहार का उद्देश्य समझते हैं । 

भोजन के विषय में यह दोनों मान्यताएँ भ्रमपूर्ण एवं हानिकारक हैं । भोजन का प्रयोजन न तो जिव्हा का स्वाद है और न पेट को पाटना । जो मसालेदार, चटपटे और तले-जले पदार्थों का सेवन करते हैं, उनकी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और जो निस्सार एवं तत्व हीन भोजन से पेट को पाटते रहते हैं उनका आमाशय शीघ्र ही अशक्त हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप दोनों मान्यताओं वालों को रोगों का शिकार बनना पड़ता है । रोग शरीर के भयानक शत्रु हैं- सभी जानते हैं- किन्तु ऐसा जानते हुए भी उनके मल-मूत्र कारक आहार सम्बन्धी त्रुटियों को दूर करने के लिए तत्पर होने को तैयार नहीं । 

भोजन का एकमात्र उद्देश्य भूख निवृत्ति ही नहीं है, उसका मुख्य उद्देश्य आरोग्य एवं स्वास्थ्य ही है । जिस भोजन ने भूख को तो मिटा दिया किन्तु स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाला वह भोजन उपयुक्त भोजन नहीं माना जायेगा । उपयुक्त भोजन वही है, जिससे क्षुधा की निवृत्ति एवं स्वास्थ्य की वृद्धि हो ।

विटामिनों की दृष्टि से हरे शाक तथा फल आदि ही स्वास्थ्य के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त आहार हैं, । इसके अतिरिक्त क्षार नामक आवश्यक तत्व भी फलों तथा शाकों से पाया जा सकता है । अनाज के छिलकों में भी यह तत्व वर्धमान रहता है किन्तु अज्ञानवश मनुष्य अधिकतर अनाजों को छील-पीसकर यह तत्व नष्ट कर देते हैं । 

कहना न होगा कि प्रकृति जिस रूप में फलों, शाकों तथा अनाजों को पैदा और पकाया करती है, उसी रूप में ही वे मनुष्य के वास्तविक आहार हैं । उनकों न तो अतिरिक्त पकाने अथवा उनमें नमक, शक्कर आदि मिलाने की आवश्यकता है । किन्तु मनुष्य का स्वभाव इतना बिगड़ गया है कि वह शाक-भाजियों तथा अन्न आदि को उनके प्रकृत रूप में नहीं खा सकता । इसके लिए यदि आहार को थोड़ा-सा हल्की आँच पर पका लिया जाये तब भी कोई विशेष हानि नहीं होती । किन्तु जब उनको बुरी तरह तला या जला डाला जाता है तो निश्चय ही उनके सारे तत्व नष्ट हो जाते हैं और वह आहार अयुक्ताहार हो जाता है । जहाँ तक सम्भव हो खाद्य पदार्थों को प्रकृत रूप में ही खाना चाहिये अथवा मंदी आँच या भाप पर थोड़ा- सा ही पकाना चाहिये । मिर्च, मसालों का प्रयोग निश्चय ही हानिकारक है इनका उपयोग तो बिल्कुल करना ही नहीं चाहिए । 

इन सब बातों का मुख्य तात्पर्य यह है कि मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन उसी को कहा जायेगा जिसके विटामिन तथा क्षार आदि तत्व सुरक्षित रहें, जो आसानी से पच जाये और जिसमें अधिक से अधिक सात्विक गुण हों । फल, शाक, मेवा, दूध आदि ही ऐसे पदार्थ हैं, जो मनुष्य के लिए स्वास्थ्यवर्धक आहार हैं । 

इसके साथ ही भोजन के संयम में स्वल्प अथवा तृप्ति तक भोजन करना ही ठीक है, अधिक भोजन से मनुष्य में आलस्य, प्रमाद, शिथिलता आदि ऐसे आसुरी दोष आ जाते हैं, जिनसे न तो वह परिश्रमी रह पाता है और न सात्विक स्वभाव का । असात्विकता अथवा असुरता मनुष्य को पतन की ओर ही ले जाती है । काम, क्रोध, आदि विचारों की प्रबलता भी असंयमित एंव अयुक्त आहार करने से ही होती है । यदि शरीर सब तरह से स्वस्थ एवं शुद्ध है तो मनुष्य का मन निश्चय ही सात्विक रहेगा । सात्विक मन एवं स्वस्थ शरीर के सम्पर्क से आत्मा का प्रसन्न तथा प्रमुदित रहना निश्चित है, जो कि एक दैवी लक्षण है जिसे भोजन के माध्यम से मनुष्य को प्राप्त करने का प्रयास करना ही चाहिए ।

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