गुरुवार, 12 जुलाई 2012

Vote for life with your Blood.


1. Share blood – Share life.
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2. It is a joy to give Blood.
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3. Tears of a mother cannot save her Child. But your Blood can.
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4. Be a Blood Donor and save a life.
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5. Donation of Blood means a few minutes to you but a lifetime for somebody else.
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6. People can get along without teeth or hair but not without Blood.
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7. Donation of Blood is harmless and safe.
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8. Safe Blood starts with me.
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9. You can Donate Blood 168 times between the age of 18 - 60 years.
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10. Your refusal to Donate Blood may cost a life of your near and dear one.
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11. A life is waiting for a bag of Blood from you.
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12. Remember, today you can give your blood. Tomorrow your near and dear one may need it.
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13. Every tomorrow needs a blood donor today.
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14. Many things in this world can wait but transfusion of Blood to a dying patient cannot.
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15. Calling Blood Donors to save life. Can you hear?
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16. Give a gift of love. Your own Blood.
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17. Vote for life with your Blood.
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18. Be a Life Guard. Give Blood to save life.
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19. Have you donated Blood? If not........do it Now.
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20. Give the gift of Blood, the gift of life.
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21. For every 1000 who can Donate Blood only four do ! What about you ! Give Blood and gift a life.
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22. Blood is meant to circulate. Pass it around.
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23. If blood bank gives blood only to the blood donors, what would be the chance of those who depend on you?
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24. Five minutes of your time + 350 ml. of your blood = One life saved.
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SLOGANS ON BLOOD DONATION

Donor Motivators and Donor Organizers often look for suitable slogan for their campaign. Here are some slogans collected or coined or used by them. These slogans with suitable visuals can be converted into posters.


1 A bottle of blood saved my life. Was it yours?
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2 My son is back home because you donated Blood.
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3 Maa is coming back home because you gave Blood.
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4 Blood donation is a friendly gesture.
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5 Blood owners should be Blood Donors.
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6 Blood is meant for circulation. Donate Blood.
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7 Blood Donors bring Sunshine.
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8 Keep Blood Bank shelves full. You may need Blood someday.
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9 Someone is needing Blood somewhere.
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10 Life of some patients is resting on a fraction of hope in quest of your gift of love.
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11. A life in the surgeon’s hand may be yours. Donate Blood for tomorrow.
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12. Observe your birthday by donating Blood.
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13. Wouldn't you have given blood if this child was yours?
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14. Donate Blood – Gift life.
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15. Give mankind the greatest gift. Donate blood when Blood Bank comes to your place.
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16. A few drops of your Blood can help a life to bloom.
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17. At 18 you grow up. At 18 you drive. At 18 you give Blood to keep someone alive.
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18. Give the gift that keeps on living. Donate Blood.
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19. We need you to save life.
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20. You don’t have to have a medical degree to save a life. Just a fair degree of humanity. Give Blood. Save Life.
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21. Blessed are the young who can Donate Blood.
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22. Blood donation will cost you nothing but it will save a life !
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23. Patients need your gift of love to fight against mortal sickness.
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24. Your donation of Blood today may be an investment for your future.
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हम स्वयं अपने स्वामी बनें

तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दु:खी करते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दु:ख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ कह दिया, तुमने मान लिया। यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किन्तु उसने दूसरों की राय न मानी।

दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या कहते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

Mahatma Anand Swami and the Rich Man

Once, a wealthy man came to Mahatma Anand swami. He was the owner of several factories. All his sons were pursuing the business well. His wife had passed away previously. In spite of prosperity all around, his heart was not at peace. His hunger and sleep had gone. He humbly intimated his distress and ailment to the great saint.

Mahatma Anand swami said, “In your life, you did give importance to action and labor but not to the emotions. Good company and hearing religious discourses only nourish the thoughts.

Now start giving away love, money and labor in order to remove the inner dryness. Give affection to all, go among the orphans and the poor, help them to be self-reliant. Put your physical efforts also in these noble works, as much as you can. Then see that your hunger will be returned to you and you will have a sound sleep.”

The rich man did accordingly and consequently the miraculous transformation, that he experienced, gave him a great peace and happiness which he had never experienced before.

Pragya Puran, Part-I, Page 143. 

जीवन का सच्चा सहचर-ईश्वर

ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे, केवल एक ईश्वर ही हो सकता है।

ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर के लोक, स्वर्ग जैसी आनंदयुक्त प्रतीत होने लगती है। 

यों ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है, पर जो उसे समझते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है। किसी के घर में सोना गड़ा है और उसे वह प्रतीत न हो, तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किंतु यदि मालूम हो कि घर में इतना सोना है, तो उसका भले ही उपयोग न किया जाए, मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम-रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम और सहयोग बरसाता हुआ अनुभव करते हैं, तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है। जिसने ईश्वर को भुला रखा है, अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है, उसे जिंदगी बहुत भारी प्रतीत होती है। इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लडख़ड़ाने लगते हैं। अपने साधनों में कमी दीखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है। जिसे ईश्वर पर विश्वास है, वह सदा यही अनुभव करेगा कि कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है। जहाँ अपना बल थकेगा, उसका बल मिलेगा। 
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 11 जुलाई 2012

Let us encourage virtue and integrity

ऐसी सामाजिक रीति-नीति, प्रथा-परम्परा हमें विकसित करनी चाहिए । धन का मान घटाया जाय और मनुष्य का मूल्यांकन उसके उच्च-चरित्र एवं लोक-मंगल के लिए प्रस्तुत किये त्याग, बलिदान के आधार पर किया जाये । सभी को सम्मान इसी आधार पर मिले । कोई व्यक्ति कितना ही धनी क्यों न हो इस कारण सम्मान प्राप्त न कर सके कि वह दौलत का अधिपति है । उचित तो यह है कि ऐसे लोगों का मूल्य और सम्मान लोक-सेवियों की तुलना में बहुत घटाकर रखा जाय । धन के कारण सम्मान मिलने से लोग अधिक अमीर बनने और किसी भी उपाय से पैसा कमाने को प्रेरित होते हैं । यदि धन का सम्मान गिर जाय, संग्रह को कंजूसी और स्वार्थपरता का प्रतीक मानकर तिरस्कृत किया जाय तो फिर लोग धन के पीछे पागल फिरने की अपेक्षा-सामाजिक सम्मान प्राप्त करने के लिए सत्कर्मों की और प्रवृत होने लगेंगे ।

सादगी को सराहा जाय और उद्धत वेशभूषा एवं भडक़ीली श्रृंगार-सज्जा एवं चित्र-विचित्र बनावट को ओछेपन का प्रतीक माना जाय और जो बचकानी श्रृंगारिकता, भौंड़ी फैशन, अर्द्धनग्ना, हिप्पी साज-सज्जा पनपी है उसे तिरस्कृत किया जाना चाहिए । केवल सत्त्प्रवृत्तियॉं सराही जायें, उन्हीं की चर्चा की जाये और उन्हीं को ही सम्मानित किया जाय ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

क्या हम ईश्वर को मानते है ?

ईश्वर और परलोक आदि के मानने की बात मुँह से न कहिये । जीवन से न कहकर मुँह से कहना अपने को और दुनिया को धोखा देना है । हममें से अधिकांश ऐसे धोखेबाज ही हैं । इसलिये हम कहा करते है कि हजार में नौ-सौ निन्यानवे व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानते । मानते होते तो जगत में पाप दिखाई न देता ।

अगर हम ईश्वर को मानते तो क्या अँधेरे में पाप करते ? समाज या सरकार की आँखों में धूल झोंकते ? उस समय क्या यह न मानते कि ईश्वर की आँखों में धूल नहीं झोंकी गई ? हममें से कितने आदमी ऐसे हैं जो दूसरों को धोखा देते समय यह याद रखते हों कि ईश्वर की आँखें सब देख रही हैं ? अगर हमारे जीवन में यह बात नहीं है, तो ईश्वर की दुहाई देकर दूसरों से झगड़ना हमें शोभा नहीं देता ।

धर्म तत्त्व का दर्शन एवं मर्म (53)-2.70"
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

सद्व्यवहार सब चाहते हैं

संसार की हर एक जड़ चेतन वस्तु चाहती है कि मेरे साथ सद्व्यवहार हो । जिसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे वही बदला लेगी । अगर छाते को लापरवाही से पटक देंगे तो जरूरत पड़ने पर उसकी तानें टूटी और कपड़ा फटा पायेंगे । जूते के साथ लापरवाही बरतेंगे तो वह या तो काट लेगा या जल्दी टूट जायेगा । सूई को यहाँ-वहाँ पटक देंगे तो वह पैर में चुभ कर अपनी उपेक्षा का बदला लेगी, कपड़े उतार कर जहाँ-तहाँ डाल देंगे तो दुबारा तलाश करने पर वे मैले, सलवट पड़े हुए, दाग-धब्बे युक्त मिलेंगे । यदि आप घर की सब वस्तुओं को संभाल कर रखेंगे तो वे समय पर सेवा करने के लिए हाजिर मिलेंगी । इसी प्रकार स्त्री, पुरुष, भाई, बहिन, माता, पिता, मित्र, सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित यदि आपसे भलमनसाहत का व्यवहार पायेंगे तो बदले में उसी प्रकार का वर्ताव लौटा देंगे ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

पैसों से जुड़ी ये चाणक्य नीति ध्यान रखें, मालामाल रहेंगे...

पैसा या धन के महत्व को देखते हुए शास्त्रों में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर हर व्यक्ति को जीवन में सुख और शांति प्राप्त होती है। पैसों के संबंध में आचार्य चाणक्य ने एक महत्वपूर्ण बात बताई है कि-

उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम्।।

इस संस्कृत श्लोक का अर्थ है कि हमारे द्वारा कमाए गए धन का उपभोग करना या व्यय करना ही धन की रक्षा के समान है। इसी प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ पानी उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है।

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति धन या पैसा कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। काफी लोग धन को अत्यधिक संग्रहित करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रहण अनुचित है। इसलिए धन का दान करना चाहिए। सही कार्यों में धन को निवेश करना चाहिए। यही धन की रक्षा के समान है। यदि कोई व्यक्ति दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाता है और उसका उपभोग नहीं करता है तो ऐसे पैसों का लाभ क्या है। हमेशा पैसों का सदुपयोग करते रहना चाहिए। इसी प्रकार किसी तालाब में भरा जल उपयोग न किया जाए तो वह सड़ जाता है। ऐसे पानी को बचाने के लिए जरूरी है कि उसका उपयोग किया जाए। यही बात धन पर भी लागू होती है। 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

All religions are same!!!



All religions are same!!!
We have 26 alphabets in English,
as given below?

 A  B  C  D  E  F  G H   I  J   K    L   M    N   O   P   Q   R
1   2   3  4   5   6   7  8  9  10  11  12  13  14  15  16  17  18
S   T     U   V   W    X     Y     Z
19  20   21  22   23   24   25  26 

With each alphabet getting a number, in chronological order, as above, study the following, and bring down the total to a single digit and see the result yourself.

Hindu
S  h  r  e  e   K  r  i  s  h  n  a
19+8+18+5+5+11+18+9+19+8+14+1=135=9

M u s l i m
M  o  h  a  m  m  e  d
13+15+8+1+13+13+5+4=72=9

Jain
M a h a v  i  r
13+1+8+1+22+9+18=72=9

Sikh
G  u  r  u   N  a  n  a  k
7+21+18+21+14+1+14+1+11=108=9
Parsi
Z  a  r  a  t  h  u  s  t  r a
26+1+18+1+20+8+21+19+20+18+1=153=9

Buddhist
G  a   u  t  a  m
7+1+21+20+1+13=63=9 

Christian
Esa Messiah
5+19+1+13+5+19+19+9+1+8=99=18=9

 Each one ends with number 9

THAT IS NATURE’S CREATION. 
That all religions are same!!!

Amazing!!
 YET MAN FIGHTS WITH MAN, ON RELIGIOUS ISSUES???

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

हार्दिक स्वागत है।

।। दिव्य संदेश ।।


आप के मानस में बिराजे हुऐ उन समस्त सदगुणों को नमन करता हूँ, जिनके वशीभूत होकर आप यहाँ पधारे।

हमारे साथियों,
वंदे वेद मातरम् ।

प्राचीन काल मे संत समाज वाणी द्वारा ही जनमानस को दिशा एवम प्रेरणा देने का कार्य बड़ी सफलता के साथ करता रहा है । 
इसी श्रेष्ठ परम्परा को लक्ष्य करके एक मंच की स्थापना की गयी है । 
 इस मंच का नाम ”जनमानस परिष्कार मंच” है । 
यहाँ संत समाज की वाणी को संकलित करने का प्रयास किया जा रहा है। 



धरती पर स्वर्ग का अवतरण तो होना ही है । 
इसमे किसी को शंका नही होनी चाहिए । 
नवयुग यदि आएगा तो विचार शोधन द्वारा ही, क्रान्ति होगी तो वह लहू और लोहे से नही, विचारो की विचारो से काट द्वारा होगी, समाज का नवनिर्माण होगा तो वह सद् विचारो की स्थापना द्वारा ही संभव होगा । 

यह सम्पूर्ण योजना परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीरामजीशर्मा के सुक्ष्म सानिध्य मे संपन्न हो रही है । 
हमें इस सुक्ष्म सत्ता का संरक्षण सदैव प्राप्त होता रहेगा । 
यह हमारी सुक्ष्म सत्ता का वादा है ।

विचार क्रांति की यह योजना आप सभी के सहयोग से ही संपन्न होगी ।
आप भी अपना अपना अमूल्य सहयोग कर 
"युग निर्माण योजना" 
को सफल बनायें ।
आपके अनमोल सुझाव सादर आमंत्रित है ।

।। वंदे वेद मातरम् ।।

गुरूदेव के चरणों में -
जनमानस परिष्कार मंच
vedmatram@gmail.com
स्वरदूत – 09929827894

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

zindgi ki PRIBHASHA....

1- Give the world the best that you have, and the best will come back to you. 
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2- Kbhi khushi ki asha, 
kbhi gm ki nirasha, 
kbhi spno ki chandni, 
kbhi hqiqat ki chaya, 
kuch khokr kuch pane ki asha, 
shayad yhi h zindgi ki PRIBHASHA. 
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3- Jivaatma ki Yogyata ho to hi usko Jivan me "Satsang or Seva" ka Avasar milta hai-Kirit Bhai 
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4- Khush naseeb wo nahi jiska naseeb acha h,
Balki Khush naseeb wo he jo Apne naseeb se khush he." 
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5- Life never leavs u empty..
It alwys replacs evrythng u lost..
If it asks u 2 put somthng Down, 
its bcoz it wants u 2 pick up somthng better. 
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6- Our life begins with our cry,
Our life ends with other's cry.
Try to utilize this gap & laugh as much as possible between these cries !
Stay Happy Always. 
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7- The Biggest Suspense Of Life Is...
We Know For Whom We Are Praying But ?
We Never Know The Person Who Is Praying For Us
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8- Meaningful Msg:
All that I've learnt about life can be summarized in three words- ??
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"LIFE GOES ON"!!! 
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9- Me Iswar ko manta nhi hu,
Me Iswar ko janta hu..
Kyoki Iswar Mane ka vishay nhi janne ka vishay h. 
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10- Very Short But Much Truthful Lines..
''Get a best friend like a mirror,
because when u cry,
it never laughs" ! 
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11- Very Short, But Much Truthful Lines..
''Get a best friend like a mirror,
because when u cry,
it never laughs"! 
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12- Manushya Yoni Ki Visheshta H Ki Manav Sharir Me Akar Swechhanusar Karm Kar Sakta H, Utthan Aur Patan Ka Marg Swym Chunta H. 
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13- Very Important Thought :
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"TURN" to GOD....
Before you "RETURN" to GOD...! 
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14- Savdhan ! ! ! 
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pal bhar ka krodh aapka pura bhavishya bigad sakta h.
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15- Aap jiwan me kitne b unche kyo na uth jaye apni garibi or kathinayee k din kabhi mat bhuliye. 
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16- Jb aap kisi ko bhotik padarth dene me asmarth ho to b apni sad bhavnaye or shubh kamnaye dusro ko dete rahiye. 
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17- "If u have the ability to stand tall even after u have been hurt badly by ur dear ones, Just a smile will punish them more than ur words" 
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18- Baccho pr nivesh krne ki sbse acchi chij h apna SAMAY or acche SANSKAR. Dhyan rakhe, ek shreshth balak ka nirman so school banane se b accha h. 
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19- Manvta ki sewa krne wale hath utne he dhanya h jitne parmatma ki prarthna karne wale onth. 
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20- The main difference between ATTITUDE & EGO is that, "Attitude" makes you DIFFERENT from others !
While "Ego" makes you ALONE from others...! 
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21- Badhao ko dekh ke vichlit na ho. vishwas rakhe, Jeewan me 99 dwar band ho jate h, tb b koi na koi ek dwar zarur khula rahta h. 
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22- Dheeraj mt khoo. Heenta or hatasha tumhe shobha nahi deti. Apne aatam vishwas ko badhao, Fir se prayas karo, Tumhe safalta zarur milegi. 
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23- No one in life will think exactly like the way you think..!
Learn to appreciate all the differences and understand each other..! 
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24- Dhan or business me itne b busy mat hoiye ki Swasthay, Pariwar, or apne Kartwyo pr dhyan na de paye...
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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

श्री गायत्री चालीसा


ह्रीं, श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥ 
शान्ति, क्रान्ति, जाग्रति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥

जगत जननी, मङ्गल करनि, गायत्री सुखधाम । 
प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
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भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। 
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥ 

अक्षर चौविस परम पुनीता। 
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥ 

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। 
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥ 

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। 
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥ 

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। 
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥ 

ध्यान धरत पुलकित हिय होई। 
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥ 

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। 
निराकार की अद्भुत माया॥७॥ 

तुम्हरी शरण गहै जो कोई। 
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥ 

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। 
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥ 

तुम्हरी महिमा पार न पावैं। 
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥ 

चार वेद की मात पुनीता। 
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥ 

महामन्त्र जितने जग माहीं। 
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥ 

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। 
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥ 

सृष्टि बीज जग जननि भवानी। 
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥ 

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। 
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥ 

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। 
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥ 

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। 
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥ 

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। 
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥ 

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। 
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥ 

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। 
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥ 

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। 
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥ 

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। 
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥ 

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। 
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥ 

मातेश्वरी दया व्रत धारी। 
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥ 

जापर कृपा तुम्हारी होई। 
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥ 

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। 
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥ 

दारिद मिटै कटै सब पीरा। 
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥ 

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। 
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥ 

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। 
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥ 

भूत पिशाच सबै भय खावें। 
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥ 

जो सधवा सुमिरें चित लाई। 
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥ 

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। 
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥ 

जयति जयति जगदंब भवानी। 
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥ 

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। 
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥ 

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। 
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥ 

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। 
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥ 

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। 
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥ 

जो जो शरण तुम्हारी आवें। 
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥ 

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। 
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥ 

सकल बढें उपजें सुख नाना। 
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥ 
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यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥ 

-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

परमार्थ और लोकमंगल...

संत फ्रांसिस ने एक कोढ़ी को चिकित्सा के लिए धन दिया, वस्त्र दिए, स्वयं ने उनकी सेवा की। एक गिरजाघर की मरम्मत के लिए दुकान की कपड़े की कई गाँठें और अपना घोड़ा बेचकर सारा धन दे दिया। उनके पिता को इन बातों का पता चला तो उन्होंने उन्हें मारा-पीटा ही नहीं, अपनी संपदा के उत्तराधिकार से वंचित भी करने की धमकी दी।

पिता की यह धमकी सुनकर-‘‘आपने मुझे एक बहुत बड़े मोह बंधन से मुक्त कर दिया हैं। मैं स्वंय उस संपति को दूर से प्रणाम करता हूँ, जो परमार्थ और लोकमंगल के काम में नहीं आ सकती।’’

यह कहते हुए उन्होंने उनके कपड़े तक उतार दिए। उन्होंने पिता की संपदा के अधिकार को लात मार दी। 

लोकसेवा के मार्ग में बाधा बनने वाली संपदा का परित्याग ही उचित है।

निश्छल मन...

राँका कुम्हार ने बरतन पकाने की भट्ठी तैयार की तथा पकाने के लिए बरतन उसमें रख दिए। उनमें से एक बरतन में बिल्ली के बच्चे भी थे। राँका को इसका पता नहीं था। उसने भट्ठी में आग दी। बरतन पक रहे थे तब बिल्ली आकर चक्कर काटने लगी। राँका सब बात समझकर बड़ा दुःखी हुआ और भगवान से प्रार्थना करता हुआ बैठा रहा दूसरे दिन पके बरतन भट्ठी से निकालने लगा तो देखा की एक बरतन कच्चा रह गया है, उसमें से म्याऊ-म्याऊ की आवाज निकल रही है। यह देखकर वह निहाल हो गया।

निश्छल मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

मानवीय अपराध

एक बार एक सेठ जी स्वंय महामना मालवीय जी के पास अपने एक प्रीतिभोज में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए पहुँचे। महामना जी ने उनके इस निमंत्रण को इन विनम्र किंतु मर्मस्पर्शी शब्दों में अस्वीकार कर दिया-‘‘यह आपकी कृपा है, जो मुझ अकिंचन के पास स्वयं निमंत्रण देने पधारें, किंतु जब तक मेरे इस देश में मेरे हजारों-लाखों भाई आधे पेट रहकर दिन काट रहे हों तो मैं विविध व्यंजनों से परिपूर्ण बड़े-बड़े भोजों मे कैसे सम्मिलित हो सकता हूँ- ये सुस्वादु पदार्थ मेरे गले कैसे उतर सकते हैं।’’

महामना जी की यह मर्मयुक्त बात सुन सेठ जी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रीतिभोज में व्यय होने वाला सारा धन गरीबों के कल्याण हेतु दान दे दिया। बाद में उनका हृदय इस सत्कार्य से आनन्दमग्न हो उठा। 

अन्य लोगों के कष्टपीडि़त और अभावग्रस्त रहते स्वयं मौज-मस्ती में रहना मानवीय अपराध हैं। 

एक बार मनु नाव में वेद रखे हुए जा रहे थे कि समुद्र में तूफान आ गया। तूफान शांत हुआ तो देखा कि एक बड़ी मछली उनकी नाव को सहारा दिए खड़ी है। मनु ने विनीत भाव से पूछा-

भगवान् ! आपने ही मेरी रक्षा की, आप कौन हैं ? ‘‘मत्स्य भगवान दिव्य रूप में प्रकट होकर बोले-‘‘वत्स ! तूने ज्ञान की रक्षा का व्रत लिया, इसलिए तेरी सहायता के लिए मुझे आना पड़ा।’’

सदुद्देश्य के लिए प्रयत्न करने वालों का भगवान स्वयं सहायक होता हैं।

विकृति...

सम्राट पुष्यमित्र का अश्वमेध सानंद संपन्न हुआ और दूसरी रात को अतिथियों की विदाई के उपलक्ष्य में नृत्योत्सव रखा गया।

यज्ञ के ब्रह्मा महर्षि पतंजलि उस उत्सव में सम्मिलित हुए। महर्षि के शिष्य चैत्र को उस आयोजन में महर्षि की उपस्थिति अखरी। उस समय तो उसे कुछ न कहा, पर एक दिन जब महर्षि योगदर्शन पढ़ा रहे थे तो चैत्र ने उपालम्भपूर्वक पूछा-‘‘गुरूवर ! क्या नृत्य गीत के रसरंग चितवृतियों के निरोध में सहायक होते हैं ?’’

महर्षि ने शिष्य का अभिप्राय समझा। उन्होंने कहा-‘‘सौम्य! आत्मा का स्वरूप रसमय है। रस में उसे आनंद मिलता है और तृप्ति भी। वह रस विकृत न होने पाए और शुद्ध स्वरूप में बना रहे, इसी सावधानी का नाम संयम है। विकार की आशंका से रस का परित्याग कर देना उचित नहीं। क्या कोई किसान पशुओं द्वारा खेत चर लिए जाने के भय से कृषि करना छोड़ देता है ? यह तो संयम नहीं, पलायन रहा। रस रहित जीवन बनाकर किया गया संयम-प्रयत्न ऐसा ही है, जैसे जल को तरलता और अग्नि को ऊष्मा से वंचित करना। सो हे भद्र! भ्रम मत करो।’’

रस नहीं, हेय और त्याज्य तो उसकी विकृति है।

संशयग्रस्त मनःस्थिति...

आम यद्यपि पक चुका था, इसी में था कि किसी की तृप्ति बनता, पर वृक्ष में लगे रहने का मोह छूटा नहीं। पेड़ का मालिक पके आमों की खोज-बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी, पर आम पतों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं। दूसरे दिन उसने देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था और अब मित्रों की विरह-व्यथा और सताने लगी। आम कभी तो सोचता-नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों में जा मिलूँ, फिर उसे मोह अपनी ओर खींचता, आम इसी उधेड़बुन में पड़ा रहा। संशय का यही कीड़ा धीरे-धीरे आम को खाने लबा और एक दिन उसका सारा रस चूस लिया, सूखा-पिचका आम नर कंकाल के समान पेड़ में लगा रह गया।

आम की आत्मा यह देखकर बहुत पछताई-कुछ संसार की सेवा भी न बन पड़ी और अंत हुआ तो ऐसा दुःख।

इतनी कथा सुनाने के बाद वसिष्ठ ने अजामिल से कहा-‘‘वत्स ! समझदार होकर भी जो सांसारिकता के मोह में फँसे ‘अब निकलें’-‘अब निकलें’ सोचते रहते हैं उनका भी अंत ऐसे ही होता है।’’

संशयग्रस्त मनःस्थिति के लोग न तो इधर के रहते हैं और न उधर के।

सच्ची तीर्थयात्रा...

हज यात्रा पूरी करके एक दिन अब्दुल्ला बिन मुबारक कावा में सोए हुए थे। सपने में उन्होंने दो फरिश्तों को आपस में बातें करते देखा। एक ने दूसरे से पूछा-‘‘इस साल हज के लिए कितने आदमी आए और उनमें से कितनों की दुआ कबूल हुई ?’’

जवाब में दूसरे फरिश्ते ने कहा-‘‘यों हज करने को 40 लाख आए थे, पर इनमें से दुआ किसी की कबूल नहीं हुई है। इस साल दुआ सिर्फ एक की कबूल हुई है और वह भी ऐसा है, जो यहाँ नहीं आया।’’

पहले फरिश्ते को बहुत अचंभा हुआ। उसने पूछा-‘‘भला वह कौन खुशनसीब है, जो यहा आया भी नहीं और उसकी हज कबूल हो गई ?’’

दूसरे फरिश्ते ने पहले को बताया-‘‘वह है दमिश्क का मोची अली बिन मूफिक।’’

इस पाक हस्ती को देखने के लिए अब्दुल्ला बिन मुबारक अगले ही दिन दमिश्क के लिए चल पड़े और वहाँ उन्होंने मोची मूफिक का घर ढ़ूँढ़ निकाला।

मूफिक की आँखों में आँसू भर आए और सिर हिलाते हुए कहा-‘‘मेरा मुकद्दर ऐसा कहाँ, जो हज को जा पाता। जिंदगी भर की मेहनत से 700 दिरम उस यात्रा के लिए जमा किए थे, पर एक दिन मैंने देखा कि पड़ोस के गरीब लोग पेट की ज्वाला बुझाने के लिए उन चीजों को खा रहे थे, जिन्हें खाया नहीं जा सकता। उनकी बेबसी ने मेरा दिल हिला दिया और हज के लिए जो जमा की थी, सो उन मुफलिसों को बाँट दिया।’’

दीन-दुखियों की सहायता ही सच्ची तीर्थयात्रा है।

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