शनिवार, 5 मार्च 2011

अपना विशिष्ट कर्तव्य और उत्तरदायित्व

भगवान ऐसे महान् उत्तरदायित्वों की पूर्ति कुछ विशिष्ट आत्माओं के कंधों पर डालता है । युग-निर्माण परिवार के सदस्य-गण एक ऐसी ही सुदृढ़ शृंखला की कड़ियाँ हैं, जिन्हें अपने पूर्व संचित उच्च संस्कारों के कारण वह गौरव प्राप्त हुआ है कि वे भगवान की इच्छापूर्ण करने वालों की अगली पंक्ति में खड़े होने का सौभाग्य और गर्व-गौरव प्राप्त कर सकें । इस उत्तरदायित्व का भार अपने कन्धों पर जब इच्छा, अनिच्छा से आ ही गया तो उचित यही है कि उसकी पूर्ति मे तत्परतापूर्वक जुटा जाय । 

परिवर्तन होकर रहेगा 
ऐसे निष्ठावान व्यक्ति जो आदर्शवाद को केवल पसन्द ही न करें वरन् उसे व्यवहार में लाने के लिए कटिबद्ध हों और उस मार्ग में चलते हुए यदि असुविधाओं से भरा हुआ जीवन व्यतीत करना पड़े तो उसके लिए भी तत्पर रहें, महापुरुष कहलाते हैं । उन्हें ही इस धरती के धर्मस्तंभ कहते हैं । विख्यात होना न होना अवसर की बात है । नींव में रखें पत्थरों को कोई नहीं जानता, किन्तु शिखर के कँगूरे सबको दीखते हैं पर श्रेय इन कँगूरों को नहीं नींव के पत्थरों को ही रहता है । कँगूरे टूटते-फूटते और हटते, बदलते रहते हैं पर नींव के पत्थर अडिग हैं । जब तक भवन रहता है तब तक ही नहीं वरन् उसके नष्ट हो जाने के बाद भी वे जहाँ के तहाँ बने रहते हैं । इसी प्रवृत्ति के बने हुए लौह-स्तंभों को युग-पुरुष कहते हैं । उन्हीं के द्वारा युगों का निर्माण एवं परिवर्तन व्यवस्था सम्पन्न होती है । 
-वाङ्मय ६६-४-३ 

विश्व शान्ति का विशाल भवन खड़ा करने के लिए ऐसे ही लौह स्तंभों की आवश्यकता है जो बातें बनाने में, यश लूटने में दक्ष न हों वरन् त्याग और बलिदान का दबाव सहने के लिए भी तैयार रहें । ताजमहल विश्व की सबसे सुन्दर और सुदृढ़ इमारतों में एक है । उसकी नींव में लाखों मन लोहा और सीसा लगाया गया है । ताकि उसकी मजबूती और स्थिरता में कमी न आवे । उसके हर पत्थर को परखकर लिया गया है- जिसे लगाया गया है उसे उचित रूप से घिसा और चमकाया गया है । नक्कासी करते समय जो पत्थर छैनी और हथौड़ों की चोटें शान्ति पूर्वक सहते रहे हैं वे ही उस सुन्दर इमारत में सुसज्जित रूप से प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं । कारीगर की चोटें जो नहीं सह सके; टूट गये, उनको कूड़े-कचरे में ही स्थान मिल सका । 

युग निर्माण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है । विश्व-व्यापी विपन्नताओं का समाधान और किसी प्रकार संभव नहीं, रास्ता एक ही है-केवल एक । जब तक मानव मन में भरी हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाकर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना न होगी तब तक संसार की एक भी उलझन न सुलझेगी । 

प्रवृत्तियों के परिवर्तन की दिशा में हर मनुष्य चाहे वह कितना ही अयोग्य एवं तुच्छ क्यों न हो, कुछ न कुछ कर सकता है । ऐसा कृतत्व जनमानस में उत्पन्न किया जाना चाहिए । प्रश्न केवल यह है कि इसे करे कौन? नींव का पत्थर, नाव का पतवार, रेल की पटरी, मोटर का पेट्रोल देखने में तुच्छ भले ही लगें पर अनिवार्य आवश्यकता तो उन्हीं की रहती है । यह आवश्यकता पूर्ण न हो तो इन शक्तिशाली यंत्रों की गतिविधियाँ रुकी ही पड़ी रहेंगी । आज प्रगति का अभियान इसीलिए रुका पड़ा है कि उसे अग्रगामी बनाने वाले लौह-पुरुष दृष्टिगोचर नहीं होते । सस्ती वाहवाही लूटने वाले लुटरे हर जगह मौजूद हैं, नाम बड़ाई के भूखे भिखारी जनसेवा के सदावर्त से अपनी भूख बुझाने के लिए इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहते हैं पर बीज की तरह गलकर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत जो हो सकें ऐसा साहस किन्हीं विरलों में होता है । 

युग निर्माण की नींव खोदी जा चुकी है और उस विशाल भवन के निर्माण की योजना भी बन चुकी है । अब केवल नींव में रखे जाने वाले पत्थरों की तलाश है । भारत भूमि की विशेषता और ऋषि रक्त की महत्ता पर जब ध्यान देते हैं तो यह विश्वास सहज ही हो जाता है कि कर्तव्य की पुकार सुनने और उसे पूरा करने वाले तत्व यहाँ सदा से रहे हैं और अब भी उनका बीज नाश नहीं हुआ है । 

यह सब कैसे, किसके द्वारा, किस तरह होगा इसकी एक रूपरेखा युग निमार्ण योजना ने प्रस्तुत की है । प्रस्तुतकर्त्ता का दावा है कि अगले दिनों इसी पटरी पर प्रगति की रेलगाड़ी द्रुतगति से दौड़ेगी । दूसरे विकल्प सोचे भले जायँ पर वे सफलता के लक्ष्य तक पहुँच न सकेंगे । समय बतायेगा कि इन पंक्तियों में प्रस्तुत भविष्य की रूपरेखा उतनी सही, सार्थक और सफल होकर रही और उसने विश्व मानव के परित्राण में कितना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । योजना के पीछे ईश्वरीय इच्छा या प्रेरणा की झाँकी जो देखते हैं उन्हें भविष्य सही सोचने वाला ही प्रमाणित करेगा । 
-वाङ्मय ६६-४-४ 


हमें नव-निर्माण के लिए इसी मनोभूमि की निष्ठा तथा दृष्टि को विकसित करने की चेष्टा करनी चाहिए । नव-निर्माण की अपनी योजना इसी पृष्ठभूमि पर बनाई जा रही है । हम मानकर चलते हैं कि शासन तथा व्यवस्था की दृष्टि से प्रजातन्त्री शासन पद्धति अन्य सब पद्धतियों से अच्छी है । हम यह मानकर चलते हैं कि मनुष्य केवल भौतिक साधनों की सुव्यवस्था से ही सन्तुष्ट नहीं रह सकता, उसे आत्मिक प्रगति की भी आवश्यकता है । इसके लिए, धर्म, संस्कृति और अध्यात्म को जीवित रहना चाहिए । हम नहीं चाहते कि शासन इन तत्वों को नष्ट करके मनुष्य को मात्र मशीन बना दे । हम यह मानकर चलते हैं कि हर मनुष्य के भीतर पशुता की तरह देवत्व भी विद्यमान है और उसे विश्वास है कि मनुष्य की सर्वोपरि शक्ति 'विचारणा' है उसे यदि उत्कृष्टता की दिशा में मोड़ा जा सके तो धरती पर स्वर्ग अवतरण और मनुष्य में देवत्व के उदय की सम्भावानाएँ मूर्तिमान हो सकती हैं । जन-सहयोग के द्वारा एकत्रित अनुदानों को हम पहाड़ों से ऊँचा और समुद्र से विशाल मानते हैं और यह विश्वास करते हैं कि यदि इस स्वेच्छा-सहयोग को लोक-मंगल के लिए मोड़ा जा सके तो नव-निर्माण के लिए जितने साधनों की आवश्यकता है उससे अधिक ही मिल सकते हैं । हम जानते हैं कि विश्व का नैतिक पुनरुत्थान करने की सर्वतोमुखी क्षमता से सम्पन्न भारत जैसे महान परम्पराओं वाले देश के लिए प्रजातन्त्र प्रणाली ही उपयुक्त हो सकती है, बशर्ते कि इस पद्धति को पश्चिम की नकलची न रहने देकर अपने देश की परिस्थिति के अनुरूप ढाल लिया जाय । 
-वाङ्मय ६६-४-९ 
-युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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