मंगलवार, 7 जुलाई 2009

जगतगुरु स्वामी रामानंदाचार्य

रामानंद अर्थात रामानंदाचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित और व्यवस्थित करने के अथक प्रयास किए। उन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय को पुनर्गठित किया तथा वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया। रामानंद वैष्णव भक्तिधारा के महान संत हैं। सोचें जिनके शिष्य संत कबीर और रविदास जैसे संत रहे हों तो वे कितने महान रहे होंगे।

बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने हिंदू जनता और साधुओं पर हर तरह की पाबंदी लगा रखी थी। हिंदुओं पर बेवजह के कई नियम तथा बंधन थोपे जाते थे। इन सबसे छुटकारा दिलाने के लिए रामानंद ने बादशाह को योगबल के माध्यम से मजबूर कर दिया। अंतत: बादशाह ने हिंदुओं पर अत्याचार करना बंद कर उन्हें अपने धार्मिक उत्सवों को मनाने तथा हिंदू तरीके से रहने की छूट दे दी।

जन्म : माघ माह की सप्तमी संवत 1356 अर्थात ईस्वी सन 1300 को कान्यकुब्ज ब्राह्मण के कुल में जन्मे श्री रामानंदजी के पिता का नाम पुण्य शर्मा तथा माता का नाम सुशीलादेवी था। वशिष्ठ गोत्र कुल के होने के कारण वाराणसी के एक कुलपुरोहित ने मान्यता अनुसार जन्म के तीन वर्ष तक उन्हें घर से बाहर नहीं निकालने और एक वर्ष तक आईना नहीं दिखाने को कहा था।

दीक्षा : आठ वर्ष की उम्र में उपनयन संस्कार होने के पश्चात उन्होंने वाराणसी पंच गंगाघाट के स्वामी राघवानंदाचार्यजी से दीक्षा प्राप्त की। तपस्या तथा ज्ञानार्जन के बाद बड़े-बड़े साधु तथा विद्वानों पर उनके ज्ञान का प्रभाव दिखने लगा। इस कारण मुमुक्षु लोग अपनी तृष्णा शांत करने हेतु उनके पास आने लगे।

प्रमुख शिष्य : स्वामी रामानंदाचार्यजी के कुल 12 प्रमुख शिष्य थे: 1। संत अनंतानंद, 2. संत सुखानंद, 3. सुरासुरानंद , 4. नरहरीयानंद, 5. योगानंद, 6. पिपानंद, 7. संत कबीरदास, 8. संत सेजा न्हावी, 9. संत धन्ना, 10. संत रविदास, 11. पद्मावती और 12. संत सुरसरी।

संवत्‌ 1532 अर्थात सन्‌ 1476 में आद्य जगद्‍गुरु रामानंदाचार्यजी ने अपनी देह छोड़ दी। उनके देह त्याग के बाद से वैष्ण्व पंथियों में जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य पद पर 'रामानंदाचार्य' की पदवी को आसीन किया जाने लगा। जैसे शंकराचार्य एक उपाधि है, उसी तरह रामानंदाचार्य की गादी पर बैठने वाले को इसी उपाधि से विभूषित किया जाता है।

वर्तमान में इस गादी पर स्वामी श्रीनरेंद्राचार्य महाराज को 21 अक्टूबर 2005 को अनंत विभूषित 'जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य' इस पद पर नियुक्त किया गया है। दक्षिण भारत के लिए श्रीक्षेत्र नाणिज को वैष्णव पीठ रूप में घोषित कर इसका नाम 'जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य पीठ, नणिजधाम' रखा गया है।

आचार्य श्री तुलसी

जैन समुदाय के तेरापंथ संप्रदाय में नौवें पट्टधर एवं अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी विलक्षण प्रतिभा के धनी और प्रखर शक्ति के पुँज थे। आचार्य श्री तुलसी के मन में बचपन से ही धर्म के प्रति आस्था रही और ग्यारह वर्ष की अल्पायु में उन्होंने मुनि दीक्षा ले ली। बाईस वर्ष की अवस्था में तेरापंथ के अष्टमाचार्य श्री कालूगणी ने उन्हें आचार्य पद सौंपा। 

जबसे वे अपने धर्म-संघ के आचार्य पद पर आसीन हुए, उन्होंने अनेक क्रांतिकारी कदम उठाए। उन्होंने आजीवन आत्मसाधना तो की ही, साथ ही अपनी संवेदना के पटल को व्यापक किया। समाज की आधार अमुक इकाई मनुष्य है। जब तक मनुष्य अच्छा नहीं बनेगा, समाज अच्छा हो नहीं सकता। उनकी इस मान्यता में से अणुव्रत की गंगोत्री का उदय हुआ।

अणुव्रत में जात-पाँत, छोटे-बड़े, धनी-निर्धन इत्यादि का कोई भेदभाव नहीं है। अणु का अर्थ है छोटा अर्थात छोटे-छोटे व्रतों से संकल्प शक्ति के विकास द्वारा क्रमशः जीवन को निर्मल करना। संयम, इच्छा परिमाण, अनावश्यक हिंसा से विरति आदि व्रतों का पालन करना, शराब तथा मादक द्रव्यों का त्याग करना, दहेज और अन्य सामाजिक बुराइयों को छोड़ना, राजनीति को नीतियुक्त बनाना, व्यवसाय में बेईमानी न करना, मिलावट, भ्रष्टाचार, चोरी-डकैती आदि से बचाव, पर्यावरण की सुरक्षा यह सब अणुव्रत के अभीष्ट हैं। 

संक्षेप में कहें तो 'अणुव्रत' मानवीय मूल्यों की वह न्यूनतम आचार संहिता है जिसे पालन करके कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो अणुव्रती बन सकता है, लाखों-लाखों व्यक्ति अणुव्रती बने भी हैं।

आचार्य श्री तुलसी समग्र मानव मात्र के कल्याण के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। अणुव्रत को सहज ग्रहणीय, प्रभावी व व्यावहारिक बनाने के लिए उन्होंने उसमें प्रेक्षाध्यान और जीवन-विज्ञान का भी समावेश किया। उनके इंगित पर उनके शिष्य एवं उत्तराधिकारी आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा अनुसंधानिक प्रेक्षाध्यान अंतःकरण के परिशोधन की एक अत्यंत प्रभावशाली प्रक्रिया है। जीवन-विज्ञान शिक्षा द्वारा जीवन निर्माण की प्रेरणा देता है। जिसमें बाल्यावस्था से ही मूल्यपरक शिक्षा द्वारा संस्कारों को अंतर की गहराइयों में पहुँचाने की क्षमता है। 

लगभग साढ़े आठ सौ साधु-साध्वियों, समण-समणियों के विशाल संगठन के संचालक रहे, देश-विदेश में उनकी प्रतिष्ठा थी, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास की इस उक्ति के वे चरितार्थ हैं कि 'प्रभुता पाय काहि मद नाही'। मद या अभिमान उन्हें छू तक नहीं गया। उनमें अभिमान नहीं था, पर स्वाभिमान उच्च दर्जे का था। आज आचार्यश्री हमारे बीच नहीं है किंतु उनके सक्षम प्रतिनिधि अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के सक्षम नेतृत्व में उनका अणुव्रत आंदोलन सतत गतिमान है। जिसने मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन के आगे समाधान का उर्ध्वगामी मार्ग प्रशस्त किया है।

मुनिश्री आचार्य महाप्रज्ञ

कवि, वक्ता, साहित्यकार एवं प्रेक्षाध्यान पद्धति के प्रस्तोता आचार्य महाप्रज्ञ तेरापंथ जैन समाज के प्रखर प्रज्ञासंपन्न आचार्य है। आचार्य महाप्रज्ञ ने प्रेक्षाध्यान के रूप में एक विशिष्ठ वैज्ञानिक साधना-पद्धति का विकास किया। इस साधना-पद्धति के द्वारा सैकड़ों व्यक्ति मानसिक विकृति को दूर हटाकर आध्यत्मिक ऊर्जा एवं शांति प्राप्त करते हैं। 

जन्म : आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म विक्रम संवत 1977 (1920) में आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी को राजस्थान के टमकोर के चोरड़िया परिवार में हुआ। पिता का नाम तोलारामजी एवं माता का नाम बालूजी था। आपका जन्म नाम नथमल था। बचपन में ही पिता का देहांत हो जाने के कारण माता बालूजी ने ही उनका पालन-पोषण किया। माता धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं इसी कारण उनमें धार्मिक चेतना का उदय हुआ।

दीक्षा : 29 जनवरी 1939 अर्थात विक्रम संवत 1987 के माघ शुक्ल की दशमी को सरदार शहर में नथमल ने अपनी माता के साथ संत श्रीमद कालूगणी से दस वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात्य उनकी पहचान धीरे-धीरे मुनि नथमल के रूप में होने लगी।

आचार्य तुलसी : उनके श्रीमद कालूगणी की आज्ञा के चलते उन्होंने मुनि आचार्य तुलसी को गुरु बनाया और उन्ही के सानिध्य में रहकर विद्या अध्ययन किया। दर्शन, न्याय, व्याकरण, कोष, मनोविज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिस पर प्रज्ञासागर जी की पकड़ न हो।

गहन अध्ययन : जैनागमों के अध्ययन के साथ उन्होंने भारतीय एवं भारतीयेत्तर सभी दर्शनों का अध्ययन किया है। संस्कृत, प्राकृत एवं हिन्दी भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार है। वे संस्कृत भाषा के सफल आशु कवि भी है। आपने संस्कृत भाषा के सर्वाधिक कठिन छंद 'रत्रग्धरा' में 'घटिका यंत्र' विषय पर आशु कविता के रूप में श्लोक बनाकर प्रस्तुत किए। संस्कृत भाषा में संबोधि, अश्रुवीणा, मुकुलम्, अतुला-तुला आदि तथा हिन्दी भाषा में 'ऋषभायण' कविता को आपके प्रमुख ग्रंथ माने जाते हैं। आपने जैन आगम, बौद्ध ग्रंथों, वैदिक ग्रंथों तथा प्राचीन शास्त्रों का गहन अध्ययन किया है। जैनों के सबसे प्राचीन एवं अबोधगम्य 'आचारांग सूत्र' पर संस्कृत भाषा में भाष्य लिखकर आचार्य महाप्रज्ञ ने प्राचीन परंपरा को पुनरुज्जीवित किया है। आपके विभिन्न विषयों पर लगभग 150 ग्रंथ है।

महाप्रज्ञ की उपाधि : आचार्यश्री तुलसी ने महाप्रज्ञ जी को 1144 में अग्रगण्य एवं ईस्वी सन् 1965 विक्रम संवत 2022 माद्य शुक्ला सप्तमी को हिंसार (हरियाणा) में निकाय सचिव नियुक्त किया। उनकी अंतः प्रज्ञा व गहन ज्ञान से प्रभावित होकर गंगाशहर में आचार्यश्री तुलसी ने उन्हें महाप्रज्ञ की उपाधि से अंलकृत किया। 

आचार्य पद : विक्रम संवत 2035 राजलदेसर (राजस्थान) मर्यादा महोत्सव के अवसर पर आचार्यश्री तुलसी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में उनकी घोषणा की। विक्रम संवत 2050 सुजानगढ़ मर्यादा महोत्सव के ऐतिहासिक समारोह के मध्य आचार्यश्री तुलसी ने अपनी उपस्थिति में अपने आचार्य पद का विर्सजन कर युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। 

अन्य उपलब्धियाँ : 23 अक्टूबर 1999 को नीदरलैड इंटर कल्चरल ओपन युनिवर्सिटी ने साहित्य के लिए डी.लिट् उपाधि से सम्मानित किया। मानवता के क्षेत्र में महाप्रज्ञ की अनगिनत एवं उल्लेखनीय सेवाओं एवं योगदानों के संदर्भ में उन्हें युगप्राधान पद से सम्मानित किया गया। यह पद उन्हें 1995 में दिया गया।

स्वामी विवेकानंद

विवेकानंदजी का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहाँ उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।

सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ। 

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।

एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए । 

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।

सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुँचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।

फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहाँ इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।

'अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा' यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।

4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

स्वामी विवेकानन्द

१- विवेकानन्द के विचारों का संगीत शास्त्र, गुरु और मातृभूमि– इन तीन स्वर लहरियों से निर्मित हुआ है। इन्हीं से उनको वे उपकरण मिले, जिनसे विश्व-विकार को दूर करने वाले आध्यात्मिक वरदान की विशल्यकरणी उन्होंने प्रस्तुत की। हम उनके इन्हीं प्रखर विचारों के लिए उनको जन्म देनेवाली पुण्यभूमि को, तथा जिन अदृश्य शक्तियों ने उन्हें विश्व में भेजा, उनको धन्य कहते हैं और स्वीकार करते हैं कि उनके महान संदेश की व्यापकता और सार्थकता का मर्म जानने में हम अभी तक असमर्थ रहे हैं। - भगिनी निवेदिता
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२- जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।
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३- तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।
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४- ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
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५- मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।
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६- जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।
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७- जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं।
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८- मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।
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९- सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।
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१०- संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।
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११- उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।
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१२- किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि।स.४/३२०)
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१३- मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना -- इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। (वि।स.६/३५२)
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१४- मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, "भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार" ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता। (वि।स.३/३८१)
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१५- शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष , निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो -- सारा धर्म इसी में है। (वि।स.१/३७९)
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१६- शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो। (वि।स.४/३१९)
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१७- बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी। (वि।स.१/३८०)
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१८- जब तक जीना, तब तक सीखना' -- अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। (वि.स.१/३८६)
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१९- पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ। (वि।स.४/३४७)
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२०- पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं। (वि।स.४/३५१)
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२१- साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना -- यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे -- माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे। (वि।स.४/३५६)
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२२- महाशक्ति का तुममें संचार होगा -- कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ। (वि।स.४/३६१)
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२३- ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो -- संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो। (वि।स.४/२८०)
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२४- पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा। (वि।स.४/३१२)
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विकिसूक्ति से साभार

सोमवार, 6 जुलाई 2009

सतगुरु कबीर

काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १२९७ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ। जुलाहा परिवार में पालन पोषण हुआ, संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवाद तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावन-अक्षरी, उलटबासी में देखें जा सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहब में उनके २०० पद और २५० साखियां हैं। काशी में प्रचलित मान्यता है कि जो यहाँ मरता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। रुढि के विरोधी कबीर को यह कैसे मान्य होता। काशी छोड़ मगहर चले गये और सन् १४१० में वहीं देह त्याग किया। मगहर में कबीर की समाधि है जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं।

हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसी ने उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रुप में हुई। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नाम देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही संवत् १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रुप में प्रकट हुए थे।

कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। एक दिन, एक पहर रहते ही कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढियो पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगास्नान करने के लिये सीढियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल 'राम-राम' शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गूरु स्वीकार कर लिया।

कबीर के ही शब्दों में - 'हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'।

अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदू-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फकीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को हृदयंगम कर लिया।

जनश्रुति के अनुसार उन्हें एक पुत्र कमाल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था।

साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे - 'मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहीं हाथ।' उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्कित्त, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड़ ने 'हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं।

कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं - रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रुप में देखते हैं। यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं।

वे भी कहते हैं - 'हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, 'हरि जननी मैं बालक तोरा'।

उस समय हिंदू जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। काबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे। कबीर को शांतिमय जीवन प्राप्त था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।

वृद्धावस्ता में यश और कीर्कित्त की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं।

इसी क्रंम में वे कालिं जिले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान् गोस्वामी के जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी के उन के मन पर गहरा असर किया-

'बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान। करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'

वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे? सारांश यह कि धर्म की जिज्ञासा में प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर असंवाद्य स्थिति में पड़ चुके हैं।

मूर्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी हाजिर कर दी -

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।।

११९ वर्ष की अवस्था में उन्होंने मगहर में देह त्याग किया।

रविवार, 5 जुलाई 2009

युग-निर्माण योजना : एक दृष्टि में



युग-निर्माण योजना : एक दृष्टि में
लक्ष्य एवं उद्‌देश्य :
  • मनुष्य में देवत्व का उदय, धरती पर स्वर्ग का अवतरण।
  • व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण।
  • स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज।
  • आत्मवत्‌ सर्वभूतेषु, वसुधैव कुटुंबकम्‌।
  • एक राष्ट्र, एक भाषा, एक धर्म, एक शासन।
  • लिंगभेद, जातिभेद, वर्गभेद से ऊपर उठकर सबको विकास का अवसर।
योजना के उद्‌घोषक-विस्तारक :
  • युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा
  • प्रखर प्रज्ञा - सजल श्रद्धा।
तीन समर्थ आयाम :
  • योजना-शक्ति-ईश्वर की
  • अनुशासन-संरक्षण-ऋषियों का
  • पुरुषार्थ-सहकार-सत्पुरुषों का।
आत्मनिर्माण के दो सूत्र :
  • उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कत्र्तृत्व
  • सादा जीवन - उच्च विचार।
हमारे आधारभूत कार्यक्रम :
  • नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति, सामाजिक क्रांति
  • धर्मतंत्र-आधारित विविध माध्यमों से लोकशिक्षण
  • गायत्री-सामूहिक विवेकशीलता एवं यज्ञ-सहकारितायुक्त सत्कर्म।
हमारा उद्‌घोष :
  • हम बदलेंगे-युग बदेलगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा
  • इक्कीसवीं सदी - उज्ज्वल भविष्य
  • सबकी सेवा - सबसे प्रेम।
हमारा प्रतीक :
  • लाल मशाल-समग्र क्रान्ति के लिए सामूहिक सशक्त प्रयास-युग शक्ति का विकास।
हमारा संविधान :
  • युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्र।
हमारी ध्रुव मान्यताएँ :
  • मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।
  • जो जैसा सोचता और करता है, वह वैसा ही बन जाता है।
  • नर-नारी परस्पर प्रतिद्वन्द्वी नहीं, पूरक हैं।
जीवन निर्माण के चार सूत्र :
  • साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा।
आध्यात्मिक जीवन के तीन आधार :
  • उपासना, साधना, आराधना।
प्रगतिशील जीवन के चार चरण :
  • समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी।
समर्थ जीवन के चार स्तंभ :
  • इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम।
आत्मिक प्रगति के चार चरण :
  • आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण, आत्मविकास।
परिवार निर्माण के पंचशील :
  • श्रमशीलता, सुव्यवस्था, शालीनता (शिष्टता), सहकारिता, मितव्ययिता।
तीन को परिष्कृत करें :
  • स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर।
तीन की साधना करें :
  • ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग।
तीन का सन्तुलित समन्वय करें :
  • भावना, विचारणा, क्रिया-प्रक्रिया।
तीन का विकास करें :
  • श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा।
तीन को सुधारें :
  • गुण, कर्म, स्वभाव।
तीन को सँवारें :
  • चिंतन, चरित्र, व्यवहार।
तीन को त्यागें :
  • लोभ, मोह, अहंकार।
  • वासना, तृष्णा, अहंता
  • पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा।
तीन को धारण करें :
  • ओजस्‌, तेजस्‌, वर्चस्‌।
तीन का सम्मान करें :
  • संत, सुधारक, शहीद।
सात आन्दोलन :
  • साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन, नारी जागरण, पर्यावरण, व्यसन मुक्ति एवं कुरीति उन्मूलन।
तीन अभियान :
  • प्रचारात्मक, रचनात्मक, संघर्षात्मक।
प्रचारात्मक अभियान :
  • जन-जन तक युगनिर्माण का संदेश।
रचनात्मक अभियान :
  • नव सृजन में प्रतिभाओं का रचनात्मक सहयोग।
संघर्षात्मक अभियान :
  • सृजन के मार्ग में आने वाली बाधाओं का निवारण।
विचार क्रान्ति अभियान, शान्तिकुंज, हरिद्वार, उत्तरांचल (भारत)

हमारा युग निर्माण सत्संकल्प

इस सृष्टि का निर्माण, विकास और विलय परमात्मा के संकल्प से ही होता रहा है । परमात्मा के संकल्प से होता रहा है । परमात्मा की श्रेष्ठ कृति मनुष्य भी अपने समाज एवं संसार को संकल्पों के आधार पर ही बनाता-बदलता रहता है ।

श्रीराम शर्मा ने इस महत्वपूर्ण समय में जन-जन को ईश्वर के साथ भागीदारी के लिये आमंत्रित एवं प्रेरित किया है । नव सृजन की ईश्वरीय योजना का उन्होंने युग निर्माण योजना कहा है ।

युग निर्माण के ईश्वरीय संकल्प में हर नैष्ठिक की भागीदारी के लिये उन्होंने इस सत्संकल्प की रचना की है । इसके १८ सूत्र गीता के १८ अध्यायों की तरह सारगर्भित हैं । सूत्रों का गठन इस कुशलता से किया है कि यह क्षेत्र, भौगोलिक भेद और मानवीय वर्ग भेद से परे सभी साधक ईश्वरीय भागीदारी निभाते हुए अनुपम एवं अलौकिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं ।

व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर नियम से धीरे-धीरे, समझकर एवं श्रद्घापूवर्क पढ़ें ।

हमारा युग निर्माण सत्संकल्प
( Our Manifesto - Solemn Pledge)


१. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे |
Firmly believing in the Omnipresence of God and His unfailing justice, we pledge to abide by basic Divine principles (Dharma).


२. शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे |
Considering the body as the Temple of God , we will be ever watchful to keep it healthy and full of vitality by adopting the principles of self-control, order and harmony in our lives.


३. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे |
With a view to keep our minds free from the inrush of negative thoughts and emotions, we will adopt a regular program of study of ennobling and inspiring literature (Svaadhyaaya) and up keep the company of Saints (Satsanga).


४. इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम का सतत अभ्यास करेंगे |
We will vigilantly exercise strict control over our senses, thoughts, emotions and spending of our time and resources.

५. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे |

We will consider ourselves inseparable parts of the society and will see our good in the good of all.


६. मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे |
We will abide by basic moral code, refrain from wrong doing and will discharge our duties as citizens committed to the well-being of the society.

७. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे |

We will earnestly and firmly imbibe in our lives the virtues of Wisdom, Honesty, Responsibility and Courage.


८. चारों तरफ मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे |
We will constantly and sincerely endeavour to create an environment of loving kindness, cleanliness, simplicity and goodwill.


९. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे |
We will prefer failure while adhering to basic moral principles to so-called success obtained through unfair and foul means.


१०. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं , योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं , उसके सद्-विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे |
We will never evaluate a person’s greatness by his worldly success, talents and riches but by his righteous conduct and thoughts.


११. दूसरों के साथ वह व्यवहार नही करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं |
We will never do unto others what we would not like to be done unto us.


१२. हम नर-नारी के प्रति पवित्र दृष्टि रखेंगे |
Members of opposite sexes while interacting with each other will have feelings of mutual warmth and understanding based on purity of thoughts and emotions.


१३. संसार में सद-वृतियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान , पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे |
We will regularly and religiously contribute a portion of our time, talents and resources for spreading nobility and righteousness in the world.


१४. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे |
We will give precedence to discriminating wisdom over blind traditions.


१५. सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नव-सृजन की गतिविधियों में पूरी रूचि लेंगे |
We will actively involve ourselves in bringing together persons of goodwill in resisting evil and injustice and in promoting New Creation.


१६. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे | जाति, लिंग, भाषा, प्रांत सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे |
We will remain committed to the principles of national unity and equality of all human beings. In our conduct, we will not make any discrimination between person and person on the basis of caste, creed, colour, religion, region, language or sex.


१७. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है , इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरो को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा |
We firmly believe that each human being is the maker of his own destiny. With this conviction, we will uplift and transform ourselves and help others in doing so. We believe the world will then automatically change for the better.


१८. "हम बदलेंगे-युग बदलेगा""हम सुधरेंगे- युग सुधरेगा" इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है |
Our Motto is : "Ham Badalenge - Yug Badalegaa", "Ham Sudharenge - Yug Sudharegaa"।When we transform ourselves, the world will be transformed. When we reform ourselves, the world will be reformed.

माता भगवती देवी शर्मा

स्नेह सलिला, परम वन्दनीया, शक्तिस्वरूपा, सजल श्रद्धा की प्रतिमूर्ति माता भगवती देवी शर्मा आश्विन कृष्ण चतुर्थी, संवत १९८२ को (तदनुसार २० सितम्बर १९२६) को प्रातः आठ बजे आगरा नगर के श्री जशवंत राव जी के घर चौथी संतान के रूप में जन्मीं ।

ऐश्वर्य सम्पन्न घराने में पली-बढ़ी माताजी का विवाह आगरा से २५ किमी.दूर आँवलखेड़ा में एक जमींदार परिवार पं.रूपकिशोर के सुपुत्र गायत्री साधक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीराम मत्त (आज के युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचर्य) के साथ हुआ । सन् १९४३ में विवाह के बाद माता जी ससुराल पहुँची, जहाँ आचार्य जी ओढ़ी हुई गरीबी का जीवन जी रहे थे । जैसा पति का जीवन वैसा ही अपना जीवन, जहाँ उनका समर्पण उसी के प्रति अपना भी समर्पण, इसी संकल्प के साथ वे अपने धर्म निर्वाह में जुट गयीं ।

उन दिनों आचार्य जी के २४ महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चल रही थीं । वे जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह कर रहे थे । माता जी ने जौ की रोटी व छाछ तैयार करने से अपने पारिवारिक जीवन की शुरुआत की । कुछ ही वर्ष आँवलखेड़ा में बीते थे कि माताजी अपने जीवन सखा के साथ मथुरा आ गयीं । यहाँ पूज्य गुरुदेव अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका अखण्ड ज्योति का सम्पादन करते, पाठकों की वैचारिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक आदि समस्याओं का समाधान पत्र व्यवहार एवं पत्रिका के माध्यम से करते और माताजी आगन्तुकों का आतिथ्य कर घर में जो कुछ था, उसी से उनकी व्यवस्था जुटातीं ।

मात्र २०० रुपये की आय में दो बच्चे, एक माँ, स्वयं दोनों इस तरह कुल पाँच व्यक्तियों के साथ प्रत्येक माह अनेक आने-जाने वालों, अतिथियों का हँसी-खुशी से सेवा सत्कार करना, उनके सुख-दुःख को सुनना तथा सुघर गृहणी की भूमिका निभाना केवल माताजी केवश का था । जो भी आता उसे अपने घर जैसा लगता । आधी रात में दस्तक देने वाले को भी माताजी बिना भोजन किये सोने न देतीं । माताजी की संवेदना का एक स्पर्श पाकर व्यक्ति निहाल हो जाता ।

प्रारंभिक दिनों में अखण्ड ज्योति पत्रिका घर के बने कागज पर हैण्ड प्रेस से छपती थी । माताजी उसके लिए हाथ से कूटकर कागज तैयार करतीं उसे सुखातीं, फिर पैर से चलने वाली हैण्ड प्रेस द्वारा खुद पत्रिका छापतीं । उन पर पते लिखकर डिस्पैच करतीं । यह सभी कार्य माताजी की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया था । बच्चों की देखभाल, पढ़ाई-लिखाई आदि की जिम्मेदारी थी ही । इसी श्रमपूर्ण जीवन ने माताजी को आगे चलकर परम वन्दनीया माताजी के भावभरे वात्सल्यपूर्ण संबोधन से नवाजा और वे जगन्माता बन गयीं ।

माताजी कहती-'हमारा अपना कुछ नहीं, सब कुछ हमारे आराध्य का है, समाज राष्ट्र के लिए समपत है ।' अवसर आने पर वे इसे सत्य कर दिखाती थीं । उन दिनों आचार्य श्री के मस्तिष्क में गायत्री तपोभूमि मथुरा की स्थापना का तानाबाना चल रहा था, परन्तु पैसे का अभाव था । ऐसे समय में माताजी ने अपनी ओर से पहल करके अपने पिता द्वारा प्रदत्त सारे जेवर बचकर निर्माण कार्य में लगाने के लिए सौंप दिये । जो आज असंख्य अनुदानों-वरदानों एवं करोड़ों परिजनों के रूप में फल-फूल रहा है ।

साधारण गृहणी एवं अपने पति के प्रति समपत श्रमशील महिला के रूप में देखने वाली माताजी का असाधारण स्वरूप अंदर ही अंदर पकता तो रहा, परन्तु उभर कर तब आया, जब आचार्यश्री सन् १९५९ में दो वर्ष के प्रवास पर हिमालय तप-साधना के लिए गये । माताजी के जीवन का यह अकेलापन कठिनाइयों भरा था, परन्तु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, अपितु अपने वर्तमान दायित्वों का निर्वाह करते हुए उन्होंने अखण्ड ज्योति पत्रिका का लेखन, सम्पादन एवं पाठकों का मार्गदर्शन आदि वे सभी कार्य बड़ी कुशलता से करना शुरु किया, जो आचार्यश्री छोड़कर गये थे । संपादन के प्रति उनके सूझबूझ भरे दृष्टिकोण ने दो ही वर्ष में अखण्ड ज्योति के पाठकों की संख्या कई गुना बढ़ा दी । अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युग शक्ति गायत्री, महिला जागृति अभियान सहित कुल १३ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक १४ लाख पाठकों का व्यक्तित्व निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण एवं राष्ट्र-विश्व निर्माण संबंधी मार्गदर्शन करती रहीं ।

सन् १९७१ में युग तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार की स्थापना हो चुकी थी । गायत्री परिवार लाखों से करोड़ों की संख्या में पहुँच रहा था । माताजी ने जहाँ कुशल संगठक के रूप में इस परिवार की बागडोर सँभाला, वहीं उन्होंने नारी जागरण आन्दोलन द्वारा देश-विदेश में नारियों को पर्दाप्रथा, मूढ़मान्यताओं से निकालकर उन्हें न केवल घर, परिवार समाज में समुचित सम्मान दिलाया, अपितु धर्म-अध्यात्म से जोड़कर वैदिक कर्मकाण्ड परंपरा में दीक्षित एवं पारंगत करके उन्हें ब्रह्मवादिनी की भूमिका संचालित करने योग्य बनाया । आज उन्हीं के पुरुषार्थ से देश-विदेश की लाखों नारियाँ यज्ञ संस्कारों का सफल संचालन कर रही हैं ।

विकट से विकट परिस्थितियों में भी माताजी संघर्ष पथ पर डटी रहीं । जून १९९० में आचार्य श्री के महाप्रयाण के बाद की घड़ियाँ कुछ ऐसी ही कठिन थीं । विक्षोभ की व्याकुलता तो थी, परअसीम संतुलन को बनाये रखा । अपने करोड़ों परिजनों एवं हजारों आश्रमवासियों को ढाँढस बँधाया और संगठन की मजबूती एवं विस्तार के साथ उसके उद्देश्य को सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने के लिए अक्टूबर ९० में ही शरद पूर्णिमा को नए शंखनाद की घोषणा की । १५ लाख लोगों के विराट् जन समूह को आश्वस्त करते हुए कहा- 'यह दैवी शक्ति द्वारा संचालित मिशन आगे ही बढ़ता जायेगा । कोई भी झंझावत इसे हिला नहीं सकेगा । देवसंस्कृति-भारतीय संस्कृति, विश्व संस्कृति बनेगी ।'

इसी के बाद माताजी अपने नवीन कार्यक्रम में जुट गयी । जहाँ एक ओर पूरे विश्व में सम्प्रदायवाद, जातिवाद दहाड़ रहा था, वहीं उन्होंने तथाकथित धर्माडम्बरियों को ललकारते हुए कुशल सूझबूझ से २६ अश्वमेध यज्ञों के माध्यम से गायत्री (सत्चिन्तन),यज्ञ (सत्कर्म) के निमित्त वातावरण बनाया, सभी मतों, धर्मों, जातियों के लोगों को एक मंच पर लाकर समाज के लिए सोचने हेतु संकल्पित कराया और सभी को छुआछूत के भेदभाव से ऊपर उठकर एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने पर सहमत किया ।

माताजी ने अश्वमेघ शृंखला के क्रम में सन् १९९३ में ही तीन बार विविध देशों में जाकर भारतीय संस्कृति का शंखनाद किया । आज भी आदर्श और दहेज रहित विवाह, परिवारों में संस्कार, कुरीति उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण आदि आन्दोलनों से जुड़कर लाखों लोग राष्ट्र निर्माण में लगे हैं यह उनके विशाल मातृत्व का परिणाम है, इसीलिए गुरुदेव भी स्वयं उन्हें माताजी कहकर पुकारते थे ।


पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य भारत के एक युगदृष्टा मनीषी थे जिन्होने अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की। उनने अपना जीवन समाज की भलाई तथा सांस्कृतिक व चारित्रिक उत्थान के लिये समर्पित कर दिया। उन्होने आधुनिक व प्राचीन विज्ञान व धर्म का समन्वय करके आध्यात्मिक नवचेतना को जगाने का कार्य किया ताकि वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना किया जा सके। उनका व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक, मनीषी व दृष्टा का समन्वित रूप था।

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य (२० सितम्बर १९११ - ०२ जून १९९०) का जन्म आश्विन कृष्ण त्रयोदशी विक्रमी संवत् १९६७ (२० सितम्बर, १९११) को उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के आँवलखेड़ा ग्राम में (जो लतेसर मार्ग पर आगरा से पन्द्रह मील की दूरी पर स्थित है) हुआ था। उनका बाल्यकाल व कैशोर्य काल ग्रामीण परिसर में ही बीता । वे जन्मे तो थे एक जमींदार घराने में, जहाँ उनके पिता श्री पं.रूपकिशोर जी शर्मा आस-पास के, दूर-दराज के राजघरानों के राजपुरोहित, उद्भट विद्वान, भगवत् कथाकार थे, किन्तु उनका अंतःकरण मानव मात्र की पीड़ा से सतत् विचलित रहता था । साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे । छटपटाहट के कारण हिमालय की ओर भाग निकलने व पकड़े जाने पर उनने संबंधियों को बताया कि हिमालय ही उनका घर है एवं वहीं वे जा रहे थे । किसे मालूम था कि हिमालय की ऋषि चेतनाओं का समुच्चय बनकर आयी यह सत्ता वस्तुतः अगले दिनों अपना घर वहीं बनाएगी । जाति-पाँति का कोई भेद नहीं । जातिगत मूढ़ता भरी मान्यता से ग्रसित तत्कालीन भारत के ग्रामीण परिसर में अछूत वृद्ध महिला की जिसे कुष्ठ रोग हो गया था, उसी के टोले में जाकर सेवा कर उनने घरवालों का विरोध तो मोल ले लिया पर अपना व्रत नहीं छोड़ । उन्हें किशोरावस्था में ही समाज सुधार की रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उनने चलाना आरंभ कर दी थीं । औपचारिक शिक्षा स्वल्प ही पायी थी । किन्तु, उन्हें इसके बाद आवश्यकता भी नहीं थी क्योंकि, जो जन्मजात प्रतिभा सम्पन्न हो वह औपचारिक पाठ्यक्रम तक सीमित कैसे रह सकता है । हाट-बाजारों में जाकर स्वास्थ्य-शिक्षा प्रधान परिपत्र बाँटना, पशुधन को कैसे सुरक्षित रखें तथा स्वावलम्बी कैसे बनें, इसके छोटे-छोटे पैम्पलेट्स लिखने, हाथ की प्रेस से छपवाने के लिए उन्हें किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं थी । वे चाहते थे, जनमानस आत्मावलम्बी बने, राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान उसका जागे, इसलिए गाँव में जन्मे । इस लाल ने नारी शक्ति व बेरोजगार युवाओं के लिए गाँव में ही एक बुनताघर स्थापित किया व उसके द्वारा हाथ से कैसे कपड़ा बुना जाय, अपने पैरों पर कैसे खड़ा हुआ जाय-यह सिखाया ।

पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पंचमी की वेला में सन् १९२६ में उनके घर की पूजास्थली में, जो उनकी नियमित उपासना का तब से आधार थी, जबसे महामना पं.मदनमोहन मालवीय जी ने उन्हें काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी, उनकी गुरुसत्ता का आगमन हुआ । अदृश्य छायाधारी सूक्ष्म रूप में । उनने प्रज्ज्वलित दीपक की लौ में से स्वयं को प्रकट कर उन्हें उनके द्वारा विगत कई जन्मों में सम्पन्न क्रिया-कलापों का दिग्दर्शन कराया तथा उन्हें बताया कि वे दुर्गम हिमालय से आये हैं एवं उनसे अनेकानेक ऐसे क्रियाकलाप कराना चाहते हैं, जो अवतारी स्तर की ऋषिसत्ताएँ उनसे अपेक्षा रखती हैं । चार बार कुछ दिन से लेकर एक साल तक की अवधि तक हिमालय आकर रहने, कठोर तप करने का भी उनने संदेश दिया एवं उन्हे तीन संदेश दिए -

१. गायत्री महाशक्ति के चौबीस-चौबीस लक्ष्य के चौबीस महापुरश्चरण जिन्हें आहार के कठोर तप के साथ पूरा करना था ।

२. अखण्ड घृतदीप की स्थापना एवं जन-जन तक इसके प्रकाश को फैलाने के लिए समय अपने ज्ञानयज्ञ अभियान चलाना, जो बाद में अखण्ड ज्योति पत्रिका के १९३८ में प्रथम प्रकाशन से लेकर विचार-क्रान्ति अभियान के विश्वव्यापी होने के रूप में प्रकट हुआ ।

३. चौबीस महापुरश्चरणों के दौरान युगधर्म का निर्वाह करते हुए राष्ट्र के निमित्त भी स्वयं को खपाना, हिमालय यात्रा भी करना तथा उनके संपर्क से आगे का मार्गदर्शन लेना ।

यह कहा जा सकता है कि युग निर्माण मिशन, गायत्री परिवार, प्रज्ञा अभियान, पूज्य गुरुदेव जो सभी एक-दूसरे के पर्याय हैं, जीवन यात्रा का यह एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था, जिसमें भावी रीति-नीति का निर्धारण कर दिया । पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक हमारी वसीयत और विरासत में लिखते हैं कि प्रथम मिलन के दिन समर्पण सम्पन्न हुआ । दो बातें गुरुसत्ता द्वारा विशेष रूप से कही गई-संसारी लोग क्या करते हैं और क्या कहते हैं, उसकी ओर से मुँह मोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर एकाकी साहस के बलबूते चलते रहना एवं दूसरा यह कि अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने की तपश्चर्या में जुट जाना- जौ की रोटी व छाछ पर निर्वाह कर आत्मानुशासन सीखना । इसी से वह सार्मथ्य विकसित होगी जो विशुद्धतः परमार्थ प्रयोजनों में नियोजित होगी । वसंत पर्व का यह दिन गुरु अनुशासन का अवधारण ही हमारे लिए नया जन्म बन गया । सद्गुरु की प्राप्ति हमारे जीवन का अनन्य एवं परम सौभाग्य रहा ।

राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हे उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आनेदशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी । उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर परावाणी से उनका मार्गदर्शन किया कि युगधर्म की महत्ता व समय की पुकार देख-सुनकर तुम्हें अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर अग्निकाण्ड में पानी लेकर दौड़ पड़ने की तरह आवश्यक कार्य भी करने पड़ सकते हैं । इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था । १९२७ से १९३३ तक का समय उनका एक सक्रिय स्वयं सेवक- स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता, जिसमें घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, अनेकानेक मित्रों-सखाओं-मार्गदर्शकों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये । छह-छह माह की उन्हें कई बार जेल हुई । जेल में भी जेल के निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अँग्रेजी सीखकर लौटै । आसनसोल जेल में वे पं.जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी, देवदास गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना । यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्म घट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों-करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था - प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश ।

स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आये, जिनमें शहीद भगतसिंह को फाँसी दिये जाने पर फैले जनआक्रोश के समय श्री अरविन्द के किशोर काल की क्रान्तिकारी स्थिति की तरह उनने भी वे कार्य किये, जिनसे आक्रान्ता शासकों प्रति असहयोग जाहिर होता था । नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, वे मारते रहे परन्तु, समाधि स्थिति को प्राप्त राष्ट्र देवता के पुजारी को बेहोश होना स्वीकृत था पर आन्दोलन के दौरान उनने झण्डा छोड़ा नहीं जबकि, फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे । उन्होंने मुँह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गये पर झण्डे का टुकड़ा चिकित्सकों द्वारा दाँतों में भींचे गये टुकड़े के रूप में जब निकाला गया तक सब उनकी सहनशक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गये । उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला । अभी भी भी आगरा में उनके साथ रहे या उनसे कुछ सीख लिए अगणित व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं । लगानबन्दी के आकड़े एकत्र करने के लिए उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा किया व उनके द्वारा प्रस्तुत वे आँकड़े तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत द्वार गाँधी जी के समक्ष पेश किये गये । बापू ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आँकड़े ब्रिटिश पार्लियामेन्ट भेजे, इसी आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त के लगान माफी के आदेश प्रसारित हुए । कभी जिनने अपनी इस लड़ाई के बदले कुछ न चाहा, उन्हें सरकार ने अपने प्रतिनिधि के साथ सारी सुविधाएँ व पेंशन दिया, जिसे उनने प्रधानमंत्री राहत फण्ड के नाम समपत कर दी । वैरागी जीवन का, सच्चे राष्ट्र संत होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?

१९३५ के बाद उनके जीवन का नया दौर शुरू हुआ, जब गुरुसत्ता की प्रेरणा से वे श्री अरविन्द से मिलने पाण्डिचेरी, गुरुदेव, ऋषिवर रवीन्द्रनाथ टैगौर से मिलने शांति निकेतन तथा बापू से मिलने साबरमती आश्रम, अहमदाबाद गये । सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मंर्चों पर राष्ट्र को कैसे परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त किया जाय, यह र्निदेश लेकर अपना अनुष्ठान यथावत् चलाते हुए उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया, जब आगरा में सैनिक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जी ने उन्हें अपना सहायक बनाया ।

बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए सतत स्वाध्यायरत रहकर उनने अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक १९३८ की वसंत पंचमी पर प्रकाशित किया । प्रयास पहला था, जानकारियाँ कम थीं अतः पुनः सारी तैयारी के साथ विधिवत् १९४० की जनवरी से उनने परिजनों के नाम पाती के साथ अपने हाथ से बने कागज पर पैर से चलने वाली मशीन से छापकर अखण्ड ज्योति पत्रिका का शुभारंभ किया, जो पहले तो दो सौ पचास पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु क्रमशः उनके अध्यवसाय, घर-घर पहुँचाने, मित्रों तक पहुँचाने वाले उनके हृदयस्पर्शी पत्रों द्वारा बढ़ती-बढ़ती नवयुग के मत्स्यावतार की तरह आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है ।

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