मंगलवार, 6 सितंबर 2011

गायत्री की अमोघ शक्ति

गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य के मन:क्षेत्र में समाए हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, ईर्ष्या, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाए बैठे हों, मन में तुरंत ही हलचल आरंभ होती है और उनका उखडऩा, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई पडऩे लगता है।

संसार में समस्त दु:खों की जननी कुबुद्धि ही है। जितने भी दु:खी मनुष्य इस विश्व में दीख पड़ते हैं, उनके दु:खों का एकमात्र कारण उनके कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दु:ख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुत: दु:ख का अस्तित्व ही नहीं है।

संसार में जितने दु:ख हैं, सब कुबुद्धि के कारण हैं। लड़ाई, झगड़ा, आलस्य, अत्याचार आदि के पीछे मनुष्य की दुर्बुद्धि ही काम करती है। इन्हीं कारणों से रोग, अभाव, चिन्ता आदि का प्रादुर्भाव होता है और नाना प्रकार की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं। कुबुद्धि से बुरे विचार बनते हैं। इसीलिए कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। गायत्री उपासना से मस्तिष्क में सद्विचार और हृदय में सद्भाव उत्पन्न होते हैं।

जिनकी स्मरण शक्ति मंद है, मस्तिष्क जल्दी थक जाता है, उन्हें गायत्री उपासना करके थोड़े ही समय में इस महान् शक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। सिर में दर्द, चक्कर आना आदि रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं, उन्हें गायत्री उपासना करनी चाहिए। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान और निरोग बनते हैं।

जिनके घर में कुबुद्धि का साम्राज्य छाया रहता है, आपस में द्वेष, असहयोग, मनमुटाव, कलह, दुराव एवं दुर्भाव रहता है, आये दिन झगड़े होते रहते हैं, आपाधापी और स्वार्थपरता में प्रवृत्ति रहती है, गृह-व्यवस्था को ठीक रखने, समय का सदुपयोग करने, योग्यताएँ बढ़ाने, कुसंग से बचने, श्रमपूर्वक आजीविका कमाने, मन लगाकर विद्या-अध्ययन करने में प्रवृत्ति न होना आदि दुर्गुण कुबुद्धि के प्रतीक हैं। जहाँ यह बुराइयाँ भरी रहती हैं, वे परिवार कभी भी उन्नति नहीं कर सकते, अपनी प्रतिष्ठा को कायम नहीं रख सकते। इसके विपरीत, उनका पतन होना आरंभ हो जाता है। बिखरी हुई बुहारी की सीकों की तरह छिन्न-भिन्न होने पर वर्तमान स्थिति भी स्थिर नहीं रहती। दरिद्रता, हानि, घाटा, शत्रुओं का प्रकोप, मानसिक अशांति की अभिवृद्धि आदि बातें दिन-दिन बढ़ती हैं और वे घर कुछ ही समय में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। कुबुद्धि ऐसी अग्रि है, जहाँ भी वह रहती है, वहीं की वस्तुओं को जलाने और नष्ट करने का कार्य निरन्तर करती रहती है।

जहाँ उपरोक्त प्रकार की स्थिति हो, वहाँ गायत्री उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उसमें बैठे हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं, उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं, तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती ही है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता-जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोत्तरी होती हुई, स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। साधना निर्बल हो, तो प्रगति धीरे-धीरे होती है, पर होती अवश्य है। सद्बुद्धि एक शक्ति है, जो जीवन-क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख-शान्ति का वरदान प्राप्त करता है। 

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार

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