शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

महात्मा और कन्फ्यूशियस

कन्फ्यूशियस पदयात्रा पर निकले। मार्ग में एक महात्मा पेड़ की छाया में विश्राम कर रहे थे । उन्होंने उन महात्मा से पूछ- "महात्मन ! आप नगर छोड़ कर यहाँ एकांत में क्यों पड़े हैं ?"महात्मा ने उत्तर दिया- "इस राज्य का राजा अत्याचारी , कुटिल और दुष्ट है। प्रजा भी राजा को देख कर वैसी ही बनती जा रही है । ऐसे वातावरण में रहना कठिन हो गया था, इसलिए मैं यहाँ आ गया। यहाँ किसी तरह की चिंता नहीं है ।"

कन्फ्यूशियस ने मुस्करा कर कहा- 
"थोड़ी-सी बुराईयों या बुरे व्यक्तियों के कारण आप नगर छोड़ कर चले आए? 

क्या बुराई के आगे हार मान लेनी चाहिए ? 
यह तो आपका पलायनवाद है ।

"महात्मा ने कहा- 
"ठीक है, मगर इतने झंझटों की अपेक्षा स्वयं बुराई से हट जाना क्या बेहतर नहीं है? हम बुराई से हट कर अच्छाई का आनंद क्यों न लें ?

"इस पर कन्फ्यूशियस ने कहा- 
"आप भूल रहे हैं की झंझटों से भरा जीवन ही आपका आधार है । आपकी जो शान्ति आपके पास है वह छिनी नहीं जा सकती । फिर, यहाँ रह कर भी आप उसी समाज को आप बुरा कह रहे हैं । क्या यह कृतध्नता नहीं होगी की आप समाज को सुधारने की बजाय मुख मोड़ कर जंगल की ओर भाग आये ? आप भाग कर साबित कर रहे हैं की सद्गुण दुर्गुण से दुर्बल है । सत्य असत्य की अपेक्षा निर्बल है । ज्ञान पर अज्ञान ने अधिकार कर लिया है ।"

महात्मा ने उत्तर दिया - 
"मैं यहाँ सद्गुणों की ही रक्षा कर रहा हूँ , बुराईयों की ओर से आखें मूंद कर। आप ही बताईये , क्या मैं भलाई को बुराई का ग्रास होने से नहीं बचा रहा हूँ ?"

कन्फ्यूशियस ने कहा-
आप एकांत में साधना कर अपने को तों बचा लेंगे , लेकिन क्या एक साधक का इतना ही कर्तब्य है ? उसे केवल अपनी मुक्ति की ही बात नहीं सोचनी चाहिए । उसे समाज एवम व्यापक जनमानस की बात भी सोचनी चाहिए । इसी में उसकी साधना की सार्थकता है ।"

उनकी बातो का महात्मा पर बहुत असर हुआ ,और महात्माजी नगर की ओर लौट आये 

1 टिप्पणी:

ajit gupta ने कहा…

बहुत श्रेष्‍ठ विचार।

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