शनिवार, 7 अगस्त 2010

'मैं' की मृत्यु

एक संन्यासी ने मुझ से कहा, 'मैं प्रभु के लिए सब छोड़ आया हूं और अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।'

मैं देखता हूं कि सच ही उनके पास कुछ भी नहीं है, पर उनसे कहता हूं कि वह जो छोड़ना था- और वही अकेला था, जो कि छोड़ा जा सकता था- वह अब भी उनके पास है!

वे अपने चारों ओर देखते हैं। सच ही उनके पास कुछ नहीं है, जो है, उनके भीतर है। वह उनकी आंखों में है। वह उनके त्याग में है। वह उनके संन्यास में है। वह 'मैं' है। उसे छोड़ना ही अकेला छोड़ना है। क्योंकि शेष सब छीना जा सकता है और अंतत: मृत्यु सब छीन ही लेती है। 'मैं' को कोई नहीं छीन सकता, उसे तो केवल छोड़ा ही जा सकता है, उसका त्याग ही केवल त्याग है।

इसलिए प्रभु को समर्पित करने योग्य मनुष्य के पास 'मैं' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। शेष जो भी वह छोड़े, वह केवल छोड़ने के भ्रम में है, क्योंकि वह उसका था ही नहीं। और इस सब छोड़ने से उलटे उसका 'मैं' और प्रगाढ़ और घनीभूत हो जाता है। 'मैं' केंद्र से यदि कोई अपना समस्त जीवन भी प्रभु को दे दे, तो भी वह देना नहीं है। 'मैं' को दिये बिना और कुछ भी देना, देना नहीं है।

'मैं' एकमात्र अपरिग्रह है। 'मैं' एकमात्र संसार है। उसे जो छोड़ता है, वही अपरिग्रही है, वही संन्यासी है।

'मैं' संसार है। 'मैं' का अभाव संन्यास है।

'मैं' को दे देना वास्तविक धार्मिक क्रांति और परिवर्तन है। क्योंकि उसके रिक्त स्थान में ही वह आता है, जो कि मेरा 'मैं' नहीं वरन् सर्व का 'मैं' है।

सिमोन वेल का कथन मुझे बहुत प्रिय है, जिसमें उसने कहा है कि प्रभु के अतिरिक्त किसी को भी 'मैं' कहने का कोई अधिकार नहीं है।'

सच ही 'मैं' कहने का अधिकार केवल उसे ही है, जो कि समस्त सत्ता का केंद्र है। पर उसे 'मैं' कहने का कोई कारण नहीं हो सकता, क्योंकि उसके लिए सब 'मैं' ही है। जिसे अधिकार है, उसे कहने का कारण नहीं है, और जिसे कहने का कारण है, उसे कोई अधिकार नहीं है।

पर मनुष्य अपने अनाधिकार को खोकर, अधिकार को पा सकता है। वह 'मैं' होना छोड़ कर 'मैं' हो सकता है। वह अपने केंद्र के आभास को छोड़कर, सत्य केंद्र को पा सकता है। वह जिस क्षण अपने केंद्र को विकेंद्रित कर देता है, उसी क्षण केंद्र को उपलब्ध हो जाता है।

मनुष्य का 'मैं' सत्य नहीं है। वह संघात है। उसकी कोई सत्ता नहीं है। वह संग्रह है। इस संग्रह से सत्य का जो भ्रम पैदा होता है, वही अज्ञान है। पर जो इस संग्रह में झांकता है, देखता है और सत्य को खोजता है, उसके समक्ष आभास टूट जाता है। और 'मैं' की माला के फूल बिखर जाते हैं। और तब वह सूत्र उपलब्ध होता है, जो कि सत्य है और जिस पर कि 'मैं' के फूल टंगे थे और जिसे कि उन फूलों ने ढांक लिया था।

फूलों के हटाने पर- उनके आच्छादन के टूटने पर पाया जाता है कि जो उनका आधार था, वह मेरा ही नहीं है, वह मुझ में और सब में भी है। वह समस्त सत्ता में पिरोया हुआ है।

जो 'मैं' की इस मृत्यु से नहीं गुजरता है, वह परमात्मा के जीवन से वंचित रह जाता है। 'मैं' की मृत्यु - परमात्मा से, सत्य से, सत्ता से, हमारे भेद और अंतर की मृत्यु है। उसके गिरते ही वह फासला गिर जाता है, जो कि हमें स्वयं हमसे ही तोड़े हुए था। और वह व्यक्ति धन्यभागी है, जो शरीर की मृत्यु के पूर्व इस मृत्यु को उपलब्ध होता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

1 टिप्पणी:

वन्दना ने कहा…

जहाँ "मै" का साथ छूटा वहीं आत्मबोध हो गया सिर्फ़ इतना यदि इंसान जान ले तो जीना आ जाये उसे मगर ये अहम छोडना बेहद कठिन है ।

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