गुरुवार, 11 जून 2009

शहीद खुदीराम

खुदीराम को फाँसी हो गई । थोड़ी आयु में, जो थोड़ा-सा समय था, वह भी संघर्ष गुजरा कि देश, धर्म और समाज का पुनरुद्धार हो तो वे अंतिम समय में अपने अभीष्ट से कैसे हट जाते। फांसी के समय वे वेसी ही सजावट के साथ गए, जैसा बरात में सजा होता है। दिन भर उनकी कोठरी राष्ट्रीय गीतों से गूजँती रही, पर वे सदैव गहरी नींद में सोए । जेल अवधि में इनका वजन भी आश्चर्यजनक रुप से बढ गया । नित्य वे दंड-बैठक भी लगाते। जिस दिन उन्हें फाँसी होनी थी, प्रात: काल जल्दी उठे । उपासना की, व्यायाम किया । शरीर सँवारा, जैसे वरयात्रा में जाना हो। हँसते हुए गए। वंदे मातरम् का जयघोष करते हुए , फाँसी के तख्ते पर झूल गए। 
धन्य है यह भूमि , जिसने ऐसे शहीदों को जन्म दिया ।

1 टिप्पणी:

milind ने कहा…

दम निकले ईस देश के खातीर बस ईतना अरमान है,एक बार ईस राह मे मरना सौ जन्मो के समान है.
क्रांतीकारी खुदिराम बोस झिंदाबाद,ईन्कलाब जिंदाबाद

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